कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९४४ )
बोधसागर
३६
नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥ हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥ तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥ मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥ जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥ जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥ तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥ मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥ मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥ खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥ जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥ बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥ ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥ जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥ कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥ जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥ तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥
सत्यकबीर बचन
तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥
चौपाई
उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥ कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥ कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥
कुंडलिया
निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर । मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥
३७
जीवधर्मयोग
( १९४५ )
फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा । दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥ पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी । बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥ कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास । जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥ तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा । कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥ कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै । आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥ हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय । हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥ रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै । परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥ निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै । जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥ हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध । हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥ ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे । कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥ नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे । टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥ हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं । पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥ खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।
( १९४६ )
बोधसागर
३८
कहन सुनन कछु नाहिं, विचार हृदय निजआने ॥ आने हृदय विचार, चारु चिर चोर चपेरे । मूसे जो घर मोर भोर, निश ताको हेरे ॥
चौपाई
काल कराल आपही जानी । ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी ॥ षट्दरशन सोई प्रभु थापा । सब पंथनमें आपै आपा ॥ मूसा ईशा महम्मद आदिक । सोई सब मतके मरजादिक ॥ सब धर्मनको सोइ अचारज । सबहीको कीने प्रभु कारज ॥ सब ही धर्म ताहिको जानी । प्रणवों सबहि मनोक्रम बानी ॥ सोई प्रभु सबही ये देखा । बपुरा जीव करे कह लेखा ॥
छन्द—आप खास है आप दार है आप खेल खेलायऊ । मलसोध जीव प्रबोध कीनो बौध होकर आयऊ ॥ जग जगन्नाथको माथ नावैं रूप और बनायऊ । थापे महात्म बौधको खुद बौधीदास कहायऊ ॥
चौपाई
दोय पुत्र ब्रह्माके भयऊ । यकसुरदुतियअसुर जो कहेउ ॥ सत्तोगुनी सुर कह सब कोई । विषय विकारी असुर सो होई ॥ तीन लोकमें विषय विकारा । चौथा लोक विषयते न्यारा ॥
सत्यकबीर वचन—चौपाई
विषय विकार मान मद जेते । सो सब प्रभु असुरनको देते ॥ जाने थोर बहुत जो कहई । तीनों काल मूर्ख सो रहई ॥ जेते जाने तेते जो भनिये । मध्यम गतिमें ताको गनिये ॥ जाने बहुत कहे जो थोरा । सोई ज्ञानी सब शिरमौरा ॥ सब धर्मनको भेद जो पावै । ताकी बुद्धि शुद्ध है जावै ॥ जाके धर्म ताहिंते जांचो । तब लखिपरे झूठ कह सांचो ॥
३९
जीवधर्मबोध
( १९४७ )
जौन धर्मगति चह चित सुनिया। ढोढों ताको पंडित गुनिया ॥ पक्षरहित जो बात बतावै। तामें कछू कसर जौ आवै ॥ तौ पूछो औरन बुध लोई। निजबल बुद्ध बतावे सोई ॥ एक कि भूल दूसरा कहई। यहिविधिचतुरशंकनिजदहई ॥ औरको धर्म औरते बूझै। ताको दिनदोपहर नहि सूझै ॥ वायस मिल वायसहि प्रशंसा। हम सम नहि ब्रह्माको वंशा ॥ हमसम और न बोल सुधारा। जाने कह कोकिला गँवारा ॥ सो सुनि भूलि जाहि जिवसंठा। जानन कागहि जो कटुकंठा ॥ जिमि उलूक निजपरको ठानू। कानते सुने न देखे भानू ॥ तामें सब कोइ मिथ्या करई। जगमें कतहु न सूरज अहई ॥ ताकी शास्त्र भरनको साचा। चमगुदरी उठि बोली वाचा ॥ सुनि लीजै उलूक मम आता। जो कछु कहो सत्य तुम बाता ॥ मैं कबहुँ दिनकर नहि देखा। कहै जक्त सब झूठा लेखा ॥ भरे बहुरिके ताकी साखी। आय छछन्दर ऐसे भाषी ॥ सत्य वचन तुम दोहुकी आही। दिनकर तीनकाल कहुनाही ॥ ऐसहि अंधहि अन्ध सराहत। जो दिनपतिहि दूरकरचाहत ॥ तिनके वचनमें जो जिव बंधे। तिनसमान सो सबही अन्धे ॥ जाधर पकै हरामको दाना। तिनको धर्म कर्म बिन माना ॥ जो कोई करे हराम कमाई। आप खाय अरु और खिलाई ॥ जो हरामको दाना देहे। ताको दंड आप शिर लैहे ॥ खाय हराम हरामही करि है। करि हराम भवसागर परि है ॥ जो कोई अन्न हरामको खाई। ताकी बुद्धि अन्ध हो जाई ॥ बुद्धि विभंग होय जब जाको। धर्मकथा भावै नहि ताको ॥ अन्धकार जब हृदयें घरे। शुद्धपन्थ सो कबहु न हेरे ॥ खाय हराम हरामी जायौ। मातु पिताकुलकानि गवायौ ॥
( १९४८ )
बोधसागर
४०
करि श्रम शुद्ध अन्नभक्ष जोई । ताकी कृपा शुद्ध सब होई ॥ भक्ष सुअन निजधर्म जो पाला । ज्ञान दृष्टि पावै ततकाला ॥ विषकी बेल है यह संसारा । चहुँदिश आवै विषकी झारा ॥ जलथलमें विष रहा समार्ई । विष नहिं तजै भजै चितलाई ॥ विषहीमें निज भौन बनाई । विषय भोगि विषको तनपाई ॥ सबही सन्त श्रुति कहे बखानी । नरस्वरूप नारायण जानी ॥ लिखो वेद वेदान्त पुराना । तौरे तो इअील कुराना ॥ सब ही मिल करते निरधारा । नर ईश्वर निज रूप संवारा ॥ निश्चय नर नारायण देही । पै जब ईश्वर गुनगह येही ॥ जबलों ईश्वर गुन नहिं गहई । संज्ञा जीव तासुको रहई ॥ ताते जीव शीव शिव कहिये । विषयबिकारनतनमन गहिये ॥ जब सबही शुभगुनगहि लीना । ब्रह्मस्वरूप ताहि कहि दीना ॥ ब्रह्मस्वरूप आप जब मंडा । तब रचि सके कोटि ब्रह्मण्डा ॥ सिरजै पोष प्रलय करिडारी । पुण्यपाप नहिं ताहि विचारी ॥ जिमि शिशुमाटीधूल खेलोना । नाना भांति रचै मनभौना ॥ खेलि खेलि पुनि मिट्टी मेल। ऐसहि ब्रह्म सृष्टि को खेला ॥ सकल सृष्टिको करता होई । ताको नाम जपै सब कोई ॥ जो जिव विषयनमें लपटावै । दिन दिन तुच्छ देह सो पावै ॥ जब जब तुच्छ अन्त है जाई । नरकनमें निज भोन बनाई ॥ ताते विषई जीव सबनकी । विषयविहिन देह ईश्वरकी ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर कबीर तु क्या करो, साधो अपना शरीर ।
पांचो इन्द्री वश करो, तुमही दास कबीर ॥
बुलेशाह वचन
काम क्रोध लोभ मोह हंकार । पञ्चो कटुवां जू दो मार ॥ इन्हा करवी है बदवो । बुछा आपै अल्लह हो ॥
४१
जीवधर्मबोध
(१९४९)
यह संसार दुसह दुःख दागा । बिरत विचारी सन्तसो त्यागा॥ कौन राम कौनी विधिजपना । कौन ठौर तेहि प्रभुको थपना॥
सत्यकबीर-बचन
सारखी-रामजपत है नामको, नाम जपता है थीर । ताहुते कछु अपर है, ताको जपै कबीर ॥
चौपाई
उत्तम धर्म जो कोइ लखि पैंये । आप गहो अरु और गहैंये ॥ ताते सत्यपुरुष हिय हवैं । कृपा वारि तब तोपर वषैं ॥ सत्यकबीर केर परमाना । यहि विधि तैंसो करे बखाना॥ जो कोउ जीवहि राह बतावैं । परमपुरुषकी भक्तिमें लावैं ॥ ऐसो पुण्य तासुको बरना । एक मनुष्य प्रभु सन्मुख करना॥ कोटि गाय जिमि गहे कसाई । ताके करते लेत छोड़ाई ॥ परम पुरुषते जब जिव जूटै । काल कसाई करते छूटै ॥ भक्ति कठिन अतिशय कठिनाई । बिना भक्ति कोइ पार न पाई॥ भक्ति भवन अति उत्तम ऊंचा । इनसीठी बिरला कोइ पहुँचा॥ लागे तहां त्रिविधि सोपाना । एकते एक विचित्र बखाना ॥ रजगुन तमगुन सतगुन वरतो । द्वै तजिके तृतिये पग धरतो ॥ जब सतगुन सीठीपर चढ़िये । तब तहैं ज्ञान अगोचर पढ़िये॥ पढ़िके ज्ञान भयौ जब पक्का । तब सो भक्ति भवनको तक्का ॥ भक्तिभौत जब चाहत चलिये । तब सतगुरु प्रतिहारते मिलिये ॥ ताहि पौरि यहि भेट चढ़ावो । भक्तिभौन तब पैठन पावो ॥ तन मन धन सब अर्पन कीजै । शिर उतारि तेहि चरणधरीजै॥ जो दयाल हो सो प्रतिहारा । भक्तिभौन तब हो पैठारा ॥ भक्तिभौनको भेद जो पाया । त्रिगुन पौरि सो बहुरिन आया॥ आदि अन्त सतगुरु गुनगावो । जिन तोहि भक्तिभौन बैठावो॥
( १९५० )
बोधसागर
४२
भक्तिहि भक्ति भेद बहुतेरा । गहसो भक्ति भेट भवफेरा ॥ विमल भक्ति गहिये मन लाई । जाते त्रिगुनातीत कहाई ॥ आप आप जिव आप फँसाई । आपै बँधा आप दुख पाई ॥ जस क्रमयक जेहि कह खुसियारी । ताकी ऐसी कथा उचारी ॥ सो ऐसो निज भौन बनावै । आपको तामें आप फँसावै ॥ आप चरित ग्रह बंधै आपू । काहूको कछु दोष न पापू ॥ ताहीमें सो फँसि मरिजाई । विविध भांतिसे सो दुखपाई ॥ बंधा तौ पै खुलै न कोई । जब लगि सतगुरु कृपा न होई ॥ हाथ पांव पटकै औ रोवै । तब गुरुकृपा केर भ्रम खोवै ॥ जाति पांति कुल कानि गवावै । भली बुरी कछु चित्त नहिं ल्यावै ॥ सकल नेहको नाता तोरे । प्रीति सदा सतगुरुसे जोरे ॥ वेद कितोब शरा अरु सुन्नत । सो नहिं कछु निज मनमें उन्नत ॥ यह सबही दुनियांकी फांसी । ताते नहिं भेटे अविनाशी ॥
कवित्त-शरीअतकी सलाई जिव आँखन चलाई भय अंध यमबन्ध धोरवधन्धमें परत है । कोई कह हम हिंदू ही जो ऊंचे कुलबिंदू कोई कह हौ ईसाई ईशा आसराध रत है ॥ कोइ वह मुसलमान हौही साबित ईमान मारो काफिरन सारा जंग जेहाद करत है । नहिं चीन्है कोइ देव करे भरम कि सेव गुरु सैन बिन येव लड़ि लड़िके मरत है ॥
सत्यकबीर वचन
मुसलमानकी काटी चमड़ी हिंदूकी बेधे कान । कहे कबीर इस बोलतेको पहिचान हिंदूकी है मुसलमान ॥
चौपाई
जीवधर्म पुरुषार्थ गोगू । ताते सुख पावै सब लोगू ॥
४३
जीवधर्मबोध
( १९५१ )
कछुक कहो पुरुष पुरुषारथ । जो हित स्वारथ अरु परमारथ॥ शिव दधीच हरिचंद समाजा । बलि विक्रम करणादिक राजा ॥ सूरशाह सिकन्दर हातम । हनुमत भीष्म द्रोण भाषेतिम ॥ ब्रह्मा हरि शिव मनु सतरूपा । गोरखदत्त कि कथा अनूपा ॥ कौशिक व्यास वशिष्ठो नारद । शृंगी शुक् विज्ञान विशारद ॥ केते ऋषि मुनि करनी करहीं । कीरति जासु जक्त उच्चरहीं ॥ जीअत ही साधू जो मरेऊ । सूरसती शुभ करनी करेऊ ॥ साकजके हरि कानन कहई । स्वान शृंगाल पेट तेहि भरई ॥ सूर सन्त इमि करनी करही । जक्त जीव ले पार उतरही ॥ तप बल शेष धरे महि भारा । तपबल ब्रह्मा सिरजन हारा ॥ तप बल विष्णु जक्तको पोषै । तप बल शंभु ताहि पुनि सोषै ॥ तप आधार जक्त जगदीशा । तप बल जीव बने हैं ईशा ॥ जैसे जगमें सूर सयाना । निजभुजबल अरिदलदलनाना ॥ करि श्रम सुखी भये सब सोई । तन धन मोह स्यार सब रोई ॥ जहँ लगि जब विद्या चतुराई । पुरुषारथसे सब कछु पाई ॥ आलसी जीवको विद्या नाहीं । धन नहि होय अविद्या पाहीं ॥ निरधनको कोइ मित्र न होई । बिना मित्र निरबल नर सोई ॥ निरबलको सबही दुख घरे । दुखिया दीन तुच्छ जग हेरे ॥ पुरुषनको पुरुषारथ चाही । नारि पतिव्रत धर्म निबाही ॥ मृदु सजापर सोवनहारे । भय सो कीट पतंग बेचारे ॥ विविध प्रकार विषय जिन भोगा । अंतकाल सहसो सब शोगा ॥ मचे जबै घमसान लड़ाई । कोई धीर वीर ठहराई ॥ कैसहु महा महिष किन होई । जो रन तजिके भागे सोई ॥ कतल कैद हो राज विभंगा । कायर नहि देखे रनरंगा ॥ ऋषि मुनि शूर वीरकी करनी । कहलो कहो जाय नहि वरनी ॥
( १९५२ )
बोधसागर
४४
जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥ सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥ जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥ शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥ तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥
सत्यकबीर वचन-रेखता
हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं । खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं । हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं । सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥ हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी । आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥ तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी । चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।
चौपाई
पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥ यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥ हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥ बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥ करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥ जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥ जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥ जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥ बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥ ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥
४५
जीवधर्मबोध
( १९५३ )
बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥ ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥ सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥ तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥ उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥ नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥ साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥ कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥ ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥ शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥ कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥ कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥ धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥ है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥ कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥ उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥ त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥ निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥ निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥ जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥ रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥ मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥
( १९५४ )
बोधसागर
४६
योगवाशिष्ठ द्वितिय मुमुक्षुप्रकरण चतुर्थसर्गः
वशिष्ठ वचन
दोहा—जीवन मुक्ति विदेहको, तू नहीं जाने हेत । सहित असम्यकज्ञानके, जान न रघुकुलकेत ॥ स्वसंवेदमें भेद जो, भाषत ज्ञान बिहीन । ज्ञानवन्तको भेव नहीं, सम्यकहृदय जेहि पीन ॥
चौपाई
सदाकाल ऐसहि चलि आई । निज निजमता मुनीश मिलाई ॥ कोई कह भिन्न जो मारग लेई । गुरु निज पक्षन विचलन देई ॥ उत्तम करनी जौँ नहीं करिये । तो नहीं उत्तम गुरुपद धरिये ॥ शम दमादि करि इन्द्री जीते । आवागौन दुसह दुःख बीते ॥ चारि खानि जिव जो तन धारी । मालुष प्रभु निज रूप सँवारी ॥ भक्ति हेत यह उत्तम देही । प्रभुहि बिसार जो धरि तनयेही ॥ सोई अधर्म आत्महत्यारा । नर तन पाय न काज सुधारा ॥
इति
अथ मनुष्यको नित्यकर्म वर्णन
चौपाई
भोरहि उठि नित कर्म करीजै । करि तन शुद्ध भजन चित दीजै ॥ प्रभु प्रति बिनय बचनते मांगे । महा दीन हूँ ताके आगे ॥ मोर मनोरथ कर प्रभु पूरा । दीनबन्धु कीजै दुख दूरा ॥ सर्व समय तुहि जग करता । तेरो हुकुम सर्वपर बर्ता ॥ मोर उधार करो प्रभु सोई । विघ्न बिहाय कृपा तौ होई ॥ गुरु अचारजको निज टेरे । सदा सहायक अपनो हरे ॥ बार बार कर प्रभु प्रति बिनती । यद्यपि सो न करे कछु गिनती ॥ कबहुके दाय़ा प्रभुकी होई । दुःखदरिद्र सब डारे खोई ॥ लामालाभ एक सम गनिये । सदाकाल प्रभु गुनगन भनिये ॥
४७
जीवधर्मबोध
( १९५५ )
जपतप वेद पाठ शुभ कर्मा । गुरु जासु वश भाषे मर्मा ॥ गृही होयके साधू होई । निजु निजु धर्म धरे सब कोई ॥
इति
अथ नरशरीर गुरु अधीन वर्णन—चौपाई
प्रथमै जिव जब गर्भमें आवै । तीन तापते सो अकुलावै ॥ जठरानलकी तीक्ष्ण तापा । महादुःख तहैं जीवहि व्यापा ॥ जठर अग्निसे अस दुख पावा । जैसे तस लाल हो तावा ॥ तेहि तावापर जिव जो धरई । तलफि तलफि गरमीते भरई ॥ ऐसे जठर अग्नि तेहि दागे । तहैं जिव बिनय करे प्रभु आगे ॥ अबकि बार प्रभु मोहि वचावो । बाहरनकिस भजन मन लावो ॥ दुतिये मल अरु सूत्र मलीना । तामैं दूवा दुखिया दीना । भोगे दुःख महा दुरगंधा । तृतीये उलटा टांगा बंधा ॥ यहि विधि जीव नर्क तहैं भोगा । तीन ताप व्यापे सौ शोगा ॥ बार बार तहैं करे करारा । त्राहि नाथ कर मोर उबारा ॥ भजन छोड़ि न करो कछु आना । प्रभुकी भावभक्तिमें ध्याना ॥ तहैं जिवके सन्मुख प्रभु ठाढ़ा । दया करे सो दुख लखिगाढ़ा ॥ सो करार सुनि हरि हर्षाना । बन्धन काठके बाहर आना ॥ जबहि गर्भसे बाहर काढ़ा । भूला कौन मोहमद बाढा ॥ गर्भमें पोषे पालै आपै । प्रभुकी दया दुःख नहीं व्यापै ॥ पालि पोषि पुनि बाहर धरई । मातु पिताको आश्रित करई ॥ मातु पितहि सौपे शिशुसेवा । गुप्त हो तबहि परम गुरुदेवा ॥ मातु पिता तबलो तेहि पाला । जबलों नहीं बीते पन बाला ॥ बालापन जबही बितजाई । विद्या पाठ गुरु ढिग जाई ॥ मातुपिता गुरु आदि अवस्था । ताबिन जीव न पावै रस्ता ॥ पुनि गुरु कुटुम्ब जातिगण जोई । कुल मरजाद सिखावै सोई ॥
(१९५६)
बोधसागर
४८
विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥ विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥ वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥ तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥ ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥ आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥ पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥ दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥ तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥ चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥ पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥ छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥ सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥ एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥ अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥ भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥ अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥ प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥ दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥ भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥ ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥ ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥ जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥ दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥ तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥
४९
जीवधर्मबोध
( १९५७ )
चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥ तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥ पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥ आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥ उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥ सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥ याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥ ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥ दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥ भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥ विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥ उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥ उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥ जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥ शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥ दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥ दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥ तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥ भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥ बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥ सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥ तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥ मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥ प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥ तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥
( १९५८ )
बोधसागर
५०
चौथो ज्ञानीको मरजादा । जैसे सनकादिक प्रहलादा ॥ बहुरि तीन विधि भक्ती धरिये । प्रथमहिभक्ति आप जो करिये ॥ दुतिये औरनसे करवावै । पुनि लखिभक्ति करत हरषावै ॥ नौथा भक्ती बहुरि बखानो । श्रीनो कीर्तन सुमिरन जानो ॥ सेवा अरु अर्चा पुनि वंदन । दाससख्यपुनि आत्मनिवेदन ॥ पुनि बारह प्रकारकी भक्ती । प्रथमै संतन संगत युक्ती ॥ पुनि हो भक्तन कृपाके लायक । ऐसे करिये कर्म सुभायक ॥ तृतिये भक्तन चरित जो आही । श्रद्धा अरु निश्चय तेहि माही ॥ चौथे हरिचरित्र सुन काना । पंचम सुनत प्रेम अधिकाणा ॥ षष्ठम हरि निजरूप निरताये । जस अद्वैत बाद बतलाये ॥ सप्तम प्रीति माह नित गाढ़े । अष्टम प्रभु प्रकाश उर बाढ़े ॥ नौमै सकल विकारहि त्यागा । हरिगुन आपमें आवन लागा ॥ सर्वज्ञता होय पुनि दशमै । ग्यारहे सब हरि गुनहो इसमें ॥ बारहे निजु तम हरिकी प्रीति । सकल भर्मभय जीवकी बीति ॥ तीन प्रकार भक्तिको भेवा । प्रथम कीजिये गुरुकी सेवा ॥ तन मन धनसे प्रीति लगावै । गुरुकी सेवा सब सुख पावै ॥ दुतिये साधुन सेवा अहई । ताते जीव परमपद लहई ॥ तृतिये जप तप कीन प्रमाना । निर्गुणसर्गुण भक्ति त्रिधाना ॥ अगुण सगुण जो भक्ति उचारा । स्वसंवेद थापे दोहु बारा ॥ दोहुते पार भक्ति जो गहई । परम पुरुषकी भक्ति सो अहई ॥ ब्रह्मा भक्ती शिवकी भक्ती । रामकृष्ण विष्णु अरु शक्ती ॥ निर्गुण भक्ति योगेश्वर धारी । पुरुष भक्ति इनतेहैं न्यारी ॥ जैते भक्ति जकत में कीना । सबही जानिये गुरु आधीना ॥ प्रथमै निश्चय गुरु की करई । निश्चयबिन कछु काज न सरई ॥ सबही धर्मकेरि समताई । गुरु निश्चय बिनमुक्ति न पाई ॥
५१
जीवधर्मबोध
( १९५९ )
धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥ निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥ निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥ जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥ द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥ पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥ तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥ बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥ गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥ करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥ निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥ तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥ गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान । गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥ गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव । कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥ कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ । सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥ कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार । नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥ गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग । कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥ गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।
( १९६० )
बोधसागर
५२
कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥ कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान । ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥ कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और । हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥ कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार । हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान । केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥ कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥
चौपाई
गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥ पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥ चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥ मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥ गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥ दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥ ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥ दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥ चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥ शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥ जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥ आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥ सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥
५३
जीवधर्मबोध
( १९६१ )
गुरु गोविंद दोउ एक स्वरूपा । बिलु गुरु परा जीव भ्रमरूपा ॥ बिन गुरु कोई विद्या नहिं आवै । अलख अभेद सो कैसे पावै ॥ बिना निशाने तीर चलावै । अंध समान ठौर नहिं पावै ॥ अच्छे गुरुके दूँढन मांही । निगुरा रहन भलो कछु नाहीं॥ जो कोई कर्म धर्म बतलाये । सो गुरु करि लीजे मन भाये ॥ बहुरि जहां उत्तम गुरु पिये । ताके चरननमें चित लैये ॥ जो दृढ हो सांचा गुरु दूँढा । निश्चय लहै गहै पद गूँढा ॥ गुरु बिन अज्ञ रहै नर कैसे । मानुष ज्यों पशु देखी जैसे ॥ जो मानुष हो गुरु बीहीना । सो जड़ पशु पंछी ते दीना ॥ पशु पंछी जेते जगमांही । बिन गुरु सबही ज्ञान गहाही ॥ निज पितु मातु ढंग सब धरही । बिना सिपाये सब कछु करही ॥ बिनगुरु करहि कर्म विधि नाना । नरके कबहुँ आव न ध्याना ॥ नर सब जिवते अबला बहूता । गुरुद्वारे पावै बल बूता ॥ शिष येते पशुहू सिपि जाहीं । मनुष सो ज्ञान होय तेहि नाहीं॥ गुरु द्वारे नर सो गुन पावै । नरते सो ईश्वर है जावै ॥ यहि विधि नर है गुर आधीना । करिये कर्म कर्म हो छीना ॥ कर्म कीजिये सतगुरुसङ्ग । तब उर उपजै ज्ञान अभंगा ॥
दोहा-गुरुव्रानी रविकर निकर, कर उर शिष्य प्रकाश । ज्ञानदीपके जगमगे, भयौ धर्मको नाश ॥
चौपाई
सर्वोपरि गुरुकेर महातम । बिनगुरुकोलखि पावै आतम॥ गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा । गुरुसमान कोइ देव न दूजा ॥ गुरुके चरनन जिन चित दीन्हा । आतमपरमातम तिन चीन्हा॥ गुरुकी कृपा हनै सब शोका । सोई सुखदायक दोहु लोका ॥ रामकृष्ण गुरुके गुन गायौ । ताके चरननमें चित लायौ ॥
नं. ११ बोधसागर - ७
( १९६२ )
बोधसागर
५४
संत कबीर गद्गौ गुरु चरना । बारबार ताको जस वरना ॥ गुरु करिके जो दांष लगावै । सूकर श्वान केर तन पावै ॥ नारद गुरुको दोष लगायौ । चौरासी ताको भरमायौ ॥ पूरव कथा यह कागभसुंडर । उठिकेन्हिप्रनाम गुरुकोकर ॥ नाथ करत शिवमंदिर मांही । गुरु तासुचलिआयौ ताही ॥ गुरुको देखि न सो सनमाना । निरखि अर्नात शंभुरिसियाना ॥ भै अकाशबानी तेहि काला । रे खल तैं गुरुधर्म न पाला ॥ धरु जड़ माहस सर्प शरीरा । गुरु अपमान पाव बहुपीरा ॥ एक बार पथकी यह बाता । बद्रिकाश्रममहिमें चलिजाता ॥ जाता दीख महि पंथ दुहेला । एक गुरु ताको एक चेला ॥ परम प्राति निजु गुरुसे धरई । चरनामृत बिन भोग न करई ॥ लागे तहां पहारको पानी । खेदते दुःखित गुरु कह जानी ॥ गुरुकी सेव शिष्य सो त्यागा । गारी देना ताहिको लागा ॥ गुरुहि दुखी तजिके चलि गेऊ । बद्रिपतिकी मारग लियऊ ॥ तहैंते पलटिके सो जब आई । कुष्ठवरन ताके तन छाई ॥ बाटहि माह कुष्ठ भरि मारा । यह चरित्र निज नैन निहारा ॥ गुरु निरादरको जिमि पापा । तिमि सेवाफल अगिनित थापा ॥ कॉटिन जप तप करे जो कोई । गुरुविहीन सब निरफल होई ॥ मुनि सुकदेवसे को बड़ि ज्ञानी । गर्भते योगमुक्ति जिन ठानी ॥ तपबल सो वैकुण्ठ सिधाया । बिन गुरु तहां रहन नहि पाया ॥ गुरुकी निंदा करे जो प्रानी । घोर नरकमें वासा ठानी ॥ गुरुते ईर्षा जो जड़ करिहै । सो यमदंड भांति बहु भरि है ॥ गुरुकह बड़ गोविंदते कीन्हा । जाकी कृपा गोविंदहि चीन्हा ॥ गुरुसम और न दूजा दाता । सबको मन वेदन विरुथाता ॥ रिद्धि सिद्धि गति मुक्ति अमाया । बिन गुरु दया न कहुँ कछु पाया ॥
५५
जीवधर्मबोध
( १९६३ )
गुरुविन कहो गाँठि को खोले । गुरुविन अंध टटोलत डोले ॥ बारबार कर गुरु गुण गाना । कहा कौन गुरुदेव समाना ॥ धन्य धन्य गुरु देव गोसाईं । तान्यौ भव गोखुरकी नाईं ॥ गुरुगुरु जपिके जागे योगी । विरति विचार प्रपंच वियोगी ॥ जादिनते गुरु शरनमें आये । तादिनते दुःख दोष दुराये ॥ गुरुकी पारन सकल सुखदाईं । गुरुप्रमाद अमरावति पाईं ॥ जौ गुरु जीवहि नाम न देता । तौ कहु कौन मुक्तिपद चेता ॥ ताते गुरु सब सुखको कारन । तासु चरनरजकर शिर धारन ॥ धन्य धन्य सो शिष्य बड़भागी । तन मन धन गुरुसेवा लागी ॥ तीरथ व्रत कछु काज न नाहीं । गुरुके चरणनमें पति जाही ॥ गुरुसमान तीरथ नहीं औरा । गुरु महात्मविदित सब ठौरा ॥ कोटिन तीर्थ गुरुजीके चरना । संत कबीर जो निजुमुख वरना ॥ गुरुको शीव न मानै जोईं । सो जिव निश्चय जाय बिगोईं ॥ गुरुसे लगन जासुकी लागे । तन मन धन तनसम सो त्यागे ॥ अब सुनिये गुरुपारख पदको । सोई परम गुरु है बेहदको ॥ हदके गुरुको जिन भल पूजा । ताहि मिले पारख गुरु दूजा ॥ हद बेहद माह गुरु सोईं । बिना ज्ञान लखि परत है दोईं ॥
सत्यकबीर बचन-चौपाई
गुरुसम दाता कोइ न भाई । मुक्तिको मारग दियौ बताई ॥ गुरुविन हदये ज्ञान न आवै । ज्यों कस्तूरी मृगा भुलावै ॥ गुरुविन मिटै न अपनो आपा । धर्मजबड़ी बांधा शापा ॥ गुरुविन केहरि रूपमें पड़िया । गुरु विन गजछायासे लड़िया ॥ गुरुविन श्रान देखि बहु भेषा । मन्दिर एक काँचकी देखा ॥ चहुँदिश दीस आपनी छाया । भूकत भूकत प्रान गँवाया ॥