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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९५२ )

बोधसागर

४४

जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥ सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥ जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥ शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥ तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥

सत्यकबीर वचन-रेखता

हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं । खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं । हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं । सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥ हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी । आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥ तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी । चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।

चौपाई

पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥ यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥ हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥ बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥ करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥ जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥ जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥ जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥ बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥ ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥

४५

जीवधर्मबोध

( १९५३ )

बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥ ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥ सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥ तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥ उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥ नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥ साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥ कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥ ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥ शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥ कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥ कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥ धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥ है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥ कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥ उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥ त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥ निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥ निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥ जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥ रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥ मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥

( १९५४ )

बोधसागर

४६

योगवाशिष्ठ द्वितिय मुमुक्षुप्रकरण चतुर्थसर्गः

वशिष्ठ वचन

दोहा—जीवन मुक्ति विदेहको, तू नहीं जाने हेत । सहित असम्यकज्ञानके, जान न रघुकुलकेत ॥ स्वसंवेदमें भेद जो, भाषत ज्ञान बिहीन । ज्ञानवन्तको भेव नहीं, सम्यकहृदय जेहि पीन ॥

चौपाई

सदाकाल ऐसहि चलि आई । निज निजमता मुनीश मिलाई ॥ कोई कह भिन्न जो मारग लेई । गुरु निज पक्षन विचलन देई ॥ उत्तम करनी जौँ नहीं करिये । तो नहीं उत्तम गुरुपद धरिये ॥ शम दमादि करि इन्द्री जीते । आवागौन दुसह दुःख बीते ॥ चारि खानि जिव जो तन धारी । मालुष प्रभु निज रूप सँवारी ॥ भक्ति हेत यह उत्तम देही । प्रभुहि बिसार जो धरि तनयेही ॥ सोई अधर्म आत्महत्यारा । नर तन पाय न काज सुधारा ॥

इति

अथ मनुष्यको नित्यकर्म वर्णन

चौपाई

भोरहि उठि नित कर्म करीजै । करि तन शुद्ध भजन चित दीजै ॥ प्रभु प्रति बिनय बचनते मांगे । महा दीन हूँ ताके आगे ॥ मोर मनोरथ कर प्रभु पूरा । दीनबन्धु कीजै दुख दूरा ॥ सर्व समय तुहि जग करता । तेरो हुकुम सर्वपर बर्ता ॥ मोर उधार करो प्रभु सोई । विघ्न बिहाय कृपा तौ होई ॥ गुरु अचारजको निज टेरे । सदा सहायक अपनो हरे ॥ बार बार कर प्रभु प्रति बिनती । यद्यपि सो न करे कछु गिनती ॥ कबहुके दाय़ा प्रभुकी होई । दुःखदरिद्र सब डारे खोई ॥ लामालाभ एक सम गनिये । सदाकाल प्रभु गुनगन भनिये ॥

४७

जीवधर्मबोध

( १९५५ )

जपतप वेद पाठ शुभ कर्मा । गुरु जासु वश भाषे मर्मा ॥ गृही होयके साधू होई । निजु निजु धर्म धरे सब कोई ॥

इति

अथ नरशरीर गुरु अधीन वर्णन—चौपाई

प्रथमै जिव जब गर्भमें आवै । तीन तापते सो अकुलावै ॥ जठरानलकी तीक्ष्ण तापा । महादुःख तहैं जीवहि व्यापा ॥ जठर अग्निसे अस दुख पावा । जैसे तस लाल हो तावा ॥ तेहि तावापर जिव जो धरई । तलफि तलफि गरमीते भरई ॥ ऐसे जठर अग्नि तेहि दागे । तहैं जिव बिनय करे प्रभु आगे ॥ अबकि बार प्रभु मोहि वचावो । बाहरनकिस भजन मन लावो ॥ दुतिये मल अरु सूत्र मलीना । तामैं दूवा दुखिया दीना । भोगे दुःख महा दुरगंधा । तृतीये उलटा टांगा बंधा ॥ यहि विधि जीव नर्क तहैं भोगा । तीन ताप व्यापे सौ शोगा ॥ बार बार तहैं करे करारा । त्राहि नाथ कर मोर उबारा ॥ भजन छोड़ि न करो कछु आना । प्रभुकी भावभक्तिमें ध्याना ॥ तहैं जिवके सन्मुख प्रभु ठाढ़ा । दया करे सो दुख लखिगाढ़ा ॥ सो करार सुनि हरि हर्षाना । बन्धन काठके बाहर आना ॥ जबहि गर्भसे बाहर काढ़ा । भूला कौन मोहमद बाढा ॥ गर्भमें पोषे पालै आपै । प्रभुकी दया दुःख नहीं व्यापै ॥ पालि पोषि पुनि बाहर धरई । मातु पिताको आश्रित करई ॥ मातु पितहि सौपे शिशुसेवा । गुप्त हो तबहि परम गुरुदेवा ॥ मातु पिता तबलो तेहि पाला । जबलों नहीं बीते पन बाला ॥ बालापन जबही बितजाई । विद्या पाठ गुरु ढिग जाई ॥ मातुपिता गुरु आदि अवस्था । ताबिन जीव न पावै रस्ता ॥ पुनि गुरु कुटुम्ब जातिगण जोई । कुल मरजाद सिखावै सोई ॥

(१९५६)

बोधसागर

४८

विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥ विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥ वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥ तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥ ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥ आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥ पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥ दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥ तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥ चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥ पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥ छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥ सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥ एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥ अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥ भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥ अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥ प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥ दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥ भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥ ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥ ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥ जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥ दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥ तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥

४९

जीवधर्मबोध

( १९५७ )

चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥ तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥ पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥ आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥ उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥ सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥ याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥ ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥ दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥ भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥ विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥ उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥ उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥ जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥ शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥ दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥ दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥ तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥ भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥ बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥ सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥ तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥ मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥ प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥ तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥

( १९५८ )

बोधसागर

५०

चौथो ज्ञानीको मरजादा । जैसे सनकादिक प्रहलादा ॥ बहुरि तीन विधि भक्ती धरिये । प्रथमहिभक्ति आप जो करिये ॥ दुतिये औरनसे करवावै । पुनि लखिभक्ति करत हरषावै ॥ नौथा भक्ती बहुरि बखानो । श्रीनो कीर्तन सुमिरन जानो ॥ सेवा अरु अर्चा पुनि वंदन । दाससख्यपुनि आत्मनिवेदन ॥ पुनि बारह प्रकारकी भक्ती । प्रथमै संतन संगत युक्ती ॥ पुनि हो भक्तन कृपाके लायक । ऐसे करिये कर्म सुभायक ॥ तृतिये भक्तन चरित जो आही । श्रद्धा अरु निश्चय तेहि माही ॥ चौथे हरिचरित्र सुन काना । पंचम सुनत प्रेम अधिकाणा ॥ षष्ठम हरि निजरूप निरताये । जस अद्वैत बाद बतलाये ॥ सप्तम प्रीति माह नित गाढ़े । अष्टम प्रभु प्रकाश उर बाढ़े ॥ नौमै सकल विकारहि त्यागा । हरिगुन आपमें आवन लागा ॥ सर्वज्ञता होय पुनि दशमै । ग्यारहे सब हरि गुनहो इसमें ॥ बारहे निजु तम हरिकी प्रीति । सकल भर्मभय जीवकी बीति ॥ तीन प्रकार भक्तिको भेवा । प्रथम कीजिये गुरुकी सेवा ॥ तन मन धनसे प्रीति लगावै । गुरुकी सेवा सब सुख पावै ॥ दुतिये साधुन सेवा अहई । ताते जीव परमपद लहई ॥ तृतिये जप तप कीन प्रमाना । निर्गुणसर्गुण भक्ति त्रिधाना ॥ अगुण सगुण जो भक्ति उचारा । स्वसंवेद थापे दोहु बारा ॥ दोहुते पार भक्ति जो गहई । परम पुरुषकी भक्ति सो अहई ॥ ब्रह्मा भक्ती शिवकी भक्ती । रामकृष्ण विष्णु अरु शक्ती ॥ निर्गुण भक्ति योगेश्वर धारी । पुरुष भक्ति इनतेहैं न्यारी ॥ जैते भक्ति जकत में कीना । सबही जानिये गुरु आधीना ॥ प्रथमै निश्चय गुरु की करई । निश्चयबिन कछु काज न सरई ॥ सबही धर्मकेरि समताई । गुरु निश्चय बिनमुक्ति न पाई ॥

५१

जीवधर्मबोध

( १९५९ )

धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥ निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥ निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥ जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥ द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥ पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥ तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥ बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥ गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥ करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥ निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥ तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥ गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥

सत्यकबीर बचन

साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान । गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥ गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव । कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥ कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ । सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥ कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार । नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥ गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग । कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥ गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।

( १९६० )

बोधसागर

५२

कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥ कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान । ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥ कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और । हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥ कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार । हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान । केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥ कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥

चौपाई

गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥ पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥ चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥ मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥ गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥ दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥ ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥ दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥ चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥ शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥ जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥ आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥ सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥

५३

जीवधर्मबोध

( १९६१ )

गुरु गोविंद दोउ एक स्वरूपा । बिलु गुरु परा जीव भ्रमरूपा ॥ बिन गुरु कोई विद्या नहिं आवै । अलख अभेद सो कैसे पावै ॥ बिना निशाने तीर चलावै । अंध समान ठौर नहिं पावै ॥ अच्छे गुरुके दूँढन मांही । निगुरा रहन भलो कछु नाहीं॥ जो कोई कर्म धर्म बतलाये । सो गुरु करि लीजे मन भाये ॥ बहुरि जहां उत्तम गुरु पिये । ताके चरननमें चित लैये ॥ जो दृढ हो सांचा गुरु दूँढा । निश्चय लहै गहै पद गूँढा ॥ गुरु बिन अज्ञ रहै नर कैसे । मानुष ज्यों पशु देखी जैसे ॥ जो मानुष हो गुरु बीहीना । सो जड़ पशु पंछी ते दीना ॥ पशु पंछी जेते जगमांही । बिन गुरु सबही ज्ञान गहाही ॥ निज पितु मातु ढंग सब धरही । बिना सिपाये सब कछु करही ॥ बिनगुरु करहि कर्म विधि नाना । नरके कबहुँ आव न ध्याना ॥ नर सब जिवते अबला बहूता । गुरुद्वारे पावै बल बूता ॥ शिष येते पशुहू सिपि जाहीं । मनुष सो ज्ञान होय तेहि नाहीं॥ गुरु द्वारे नर सो गुन पावै । नरते सो ईश्वर है जावै ॥ यहि विधि नर है गुर आधीना । करिये कर्म कर्म हो छीना ॥ कर्म कीजिये सतगुरुसङ्ग । तब उर उपजै ज्ञान अभंगा ॥

दोहा-गुरुव्रानी रविकर निकर, कर उर शिष्य प्रकाश । ज्ञानदीपके जगमगे, भयौ धर्मको नाश ॥

चौपाई

सर्वोपरि गुरुकेर महातम । बिनगुरुकोलखि पावै आतम॥ गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा । गुरुसमान कोइ देव न दूजा ॥ गुरुके चरनन जिन चित दीन्हा । आतमपरमातम तिन चीन्हा॥ गुरुकी कृपा हनै सब शोका । सोई सुखदायक दोहु लोका ॥ रामकृष्ण गुरुके गुन गायौ । ताके चरननमें चित लायौ ॥

नं. ११ बोधसागर - ७

( १९६२ )

बोधसागर

५४

संत कबीर गद्गौ गुरु चरना । बारबार ताको जस वरना ॥ गुरु करिके जो दांष लगावै । सूकर श्वान केर तन पावै ॥ नारद गुरुको दोष लगायौ । चौरासी ताको भरमायौ ॥ पूरव कथा यह कागभसुंडर । उठिकेन्हिप्रनाम गुरुकोकर ॥ नाथ करत शिवमंदिर मांही । गुरु तासुचलिआयौ ताही ॥ गुरुको देखि न सो सनमाना । निरखि अर्नात शंभुरिसियाना ॥ भै अकाशबानी तेहि काला । रे खल तैं गुरुधर्म न पाला ॥ धरु जड़ माहस सर्प शरीरा । गुरु अपमान पाव बहुपीरा ॥ एक बार पथकी यह बाता । बद्रिकाश्रममहिमें चलिजाता ॥ जाता दीख महि पंथ दुहेला । एक गुरु ताको एक चेला ॥ परम प्राति निजु गुरुसे धरई । चरनामृत बिन भोग न करई ॥ लागे तहां पहारको पानी । खेदते दुःखित गुरु कह जानी ॥ गुरुकी सेव शिष्य सो त्यागा । गारी देना ताहिको लागा ॥ गुरुहि दुखी तजिके चलि गेऊ । बद्रिपतिकी मारग लियऊ ॥ तहैंते पलटिके सो जब आई । कुष्ठवरन ताके तन छाई ॥ बाटहि माह कुष्ठ भरि मारा । यह चरित्र निज नैन निहारा ॥ गुरु निरादरको जिमि पापा । तिमि सेवाफल अगिनित थापा ॥ कॉटिन जप तप करे जो कोई । गुरुविहीन सब निरफल होई ॥ मुनि सुकदेवसे को बड़ि ज्ञानी । गर्भते योगमुक्ति जिन ठानी ॥ तपबल सो वैकुण्ठ सिधाया । बिन गुरु तहां रहन नहि पाया ॥ गुरुकी निंदा करे जो प्रानी । घोर नरकमें वासा ठानी ॥ गुरुते ईर्षा जो जड़ करिहै । सो यमदंड भांति बहु भरि है ॥ गुरुकह बड़ गोविंदते कीन्हा । जाकी कृपा गोविंदहि चीन्हा ॥ गुरुसम और न दूजा दाता । सबको मन वेदन विरुथाता ॥ रिद्धि सिद्धि गति मुक्ति अमाया । बिन गुरु दया न कहुँ कछु पाया ॥

५५

जीवधर्मबोध

( १९६३ )

गुरुविन कहो गाँठि को खोले । गुरुविन अंध टटोलत डोले ॥ बारबार कर गुरु गुण गाना । कहा कौन गुरुदेव समाना ॥ धन्य धन्य गुरु देव गोसाईं । तान्यौ भव गोखुरकी नाईं ॥ गुरुगुरु जपिके जागे योगी । विरति विचार प्रपंच वियोगी ॥ जादिनते गुरु शरनमें आये । तादिनते दुःख दोष दुराये ॥ गुरुकी पारन सकल सुखदाईं । गुरुप्रमाद अमरावति पाईं ॥ जौ गुरु जीवहि नाम न देता । तौ कहु कौन मुक्तिपद चेता ॥ ताते गुरु सब सुखको कारन । तासु चरनरजकर शिर धारन ॥ धन्य धन्य सो शिष्य बड़भागी । तन मन धन गुरुसेवा लागी ॥ तीरथ व्रत कछु काज न नाहीं । गुरुके चरणनमें पति जाही ॥ गुरुसमान तीरथ नहीं औरा । गुरु महात्मविदित सब ठौरा ॥ कोटिन तीर्थ गुरुजीके चरना । संत कबीर जो निजुमुख वरना ॥ गुरुको शीव न मानै जोईं । सो जिव निश्चय जाय बिगोईं ॥ गुरुसे लगन जासुकी लागे । तन मन धन तनसम सो त्यागे ॥ अब सुनिये गुरुपारख पदको । सोई परम गुरु है बेहदको ॥ हदके गुरुको जिन भल पूजा । ताहि मिले पारख गुरु दूजा ॥ हद बेहद माह गुरु सोईं । बिना ज्ञान लखि परत है दोईं ॥

सत्यकबीर बचन-चौपाई

गुरुसम दाता कोइ न भाई । मुक्तिको मारग दियौ बताई ॥ गुरुविन हदये ज्ञान न आवै । ज्यों कस्तूरी मृगा भुलावै ॥ गुरुविन मिटै न अपनो आपा । धर्मजबड़ी बांधा शापा ॥ गुरुविन केहरि रूपमें पड़िया । गुरु विन गजछायासे लड़िया ॥ गुरुविन श्रान देखि बहु भेषा । मन्दिर एक काँचकी देखा ॥ चहुँदिश दीस आपनी छाया । भूकत भूकत प्रान गँवाया ॥

( १९६४ )

बोधसागर

५६

गुरुबिन सुवा नलनिसे बंधा । गुरुबिना कपि पड़ौ जो फंदा ॥ कहे कबीर भर्म संसारा । बिन सदगुरु को उतरे पारा ॥ सार्वी-भर्म जेवड़ी जगबंधा, फिर जन्मै मरिजाय । कहैं कबीर सतगुरु मिलै, तब सतलोकसिधाय ॥ मीन चकार मगल मधु, पशु है तजै न नेह । नर है तजै कबीर जो, तिनके मुँह दे खेह ॥

शब्द

नरको नहिं परतीत हमारी । झूठी बनिज कियौ झूठे संग पूजी सबै मिलिहारी ॥ शब्दरशन मिलि पंथ चलायौ तिरदेवा अधिकारी ॥ राजा नय बड़ो परपंची रैअत रहत उजाड़ी ॥ इतने उत उतते इत राखत यमकी साट सँवारी ॥ ज्यों कपि डोरि बांधी बाजीगर अपनी खूशी रारी ॥ इहै पेड उतपति पल्यको विषया सबै बिकारी । जैसे श्वान अपावन राजित त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को मानै बात हमारी ॥ अजहुँ लेव छोडाय कालसे जौकै सुरति सँभारी ॥ दोहा-गुरुकी महिमा अधिक है, थके विष्णु विधि वाम ॥ जोरि युगलकर पायपरि, कोटि कोटि परनाम ॥

इति नर शरीर गुरुआधीन

अथ शरनागतीको वर्णन-चौपाई

सतगुरु शरण सकल सुखदाई । ताते जिव सत लोक समाई ॥ साचे गुरुकी गहिये शरना । सोई जीव दुसह दुःख हरना ॥ झूठे गुरुसे काज न सरिहै । धोखे जिव यमके सुख परिहै ॥ सूर कि शरण परे जो कोई । सो जिव कबहुँ न जाय बिगोई ॥

५७

जीवधर्मबोध

( १९६५ )

कायर क्रूरकी शरणमें लागे । अंतमें छोड़िके ताको भागे ॥ श्वान पूछि गहि जाय न पारा । बूड़ि मरे भवसागर धारा ॥ अंधको राह देखाव कि अंधा । बंधेको खोले कह बंधा ॥ केत उपासक भाषे सोई । भक्ती अरु शरणागत दोई ॥ उभय भांतिसे प्रभुपद पाये । तामें ऐसो भेद बताये ॥ भक्ती ग्राहक ऐसे कहई । युक्ति जतन करि हरिपद गहई ॥ एकजन्म नहिं जन्म अनेका । छूटें नहीं भक्तिको टेका ॥ काहू जन्म मिले हरि अपना । छूटै सकलभय भर्म कलपना ॥ पुनि कह शरनागत जो ग्राही । करनकरावन मोहि कछु नाहीं ॥ शरन हो आपको हरि अर्पनकर । बहुरि नहीं कछु युक्ति यतनकर ॥ शरण हो फेर यतन जौं गहिये । तो शरणागत मिथ्या कहिये ॥ शरन हैं जौं निश्चयमें घाटा । ताकी यमगन रोकै बाटा ॥ जो सतगुरुकी शरणको ताकी । तेहि कछु यतन रहै नहिं बाकी ॥ ताते शरणागत सब परहै । शरण गहै ते जीव उबरहै ॥ शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञानभक्ति तेहिमाह समावै ॥ शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनों लोक सहाई ॥ सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरुकी शरणमें आवै ॥ शरणागतहो षट्गुन गहिये । ऐमे ताको व्यौरा कहिये ॥ विधि निषेध निजगुरुकी टेवा । दुतिये साधु प्रीत अरु सेवा ॥ तृतिये यह निश्चय उरधारै । मो अधबिसरि नाथ मोहितारै ॥ चौथे यह निश्चय मन माहीं । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ॥ कैसेहु दुःख सांकरे गूढा । प्रभुतजि और सहाय न दूढा ॥ पञ्चम सतगुरु मूर्तिको ध्याना । ताके सन्मुख बिनती ठाना ॥ प्रभु तजि मोर ठेकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं ॥ मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारस ॥

( १९६६ )

बोधसागर

५८

छटयें आपको प्रभुहिं समपैं । ताको कबहुँ काल नहिं दपैं ॥ यह षट्गुन जो कोई धारा । शरणागत पलमें कर पारा ॥ काहू साधनको नहिं काजा । शरणागती सकल सुखसाजा ॥ कोइ कोइ आचारज हैं ऐसे । शरणागत विधि भापे जैसे ॥ निशदिन प्रभुको ध्यान लगावैं । यक क्षण भरि बिसरै नहिं पावैं ॥ टुटै न तार भजन दिन राती । शरणागत कहिये यहि भांती ॥

सत्यकबीर बचन

साखी-कबीर जो जाकी शरन गहै, ताको ताकी लाज । उलटि मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥

चौपाई

जल अरु मीन कि प्रीति निहारो । तजे प्रान हो जलते न्यारो ॥ ऐसे सतगुरु पद रति राते । निशदिन तासु ध्यानमें माते ॥

कुण्डलिया

रामानन्द कि फौजमें, कबीरके शिरमौर । लूला लँगड़ा पांगुला, सबको करि गये ठौर ॥ सबको करि गये ठौर, सुनो कलिके नर नारी । गहिये ताकी शरण, हरण भवकी भय भारी ॥ भय भारी हटजाय, उपाय न कलिमें दूजी । मेटे यमकी त्रास, आस ताहीते पूजी ॥ शरणगहे सुख होय जिव, बीते सकल कलेश । गह्यौ बिभीषण शरण हरि, कीन्हा लंक नरेश ॥ कीन्हों लंकनरेश देशपति, प्रथम सो रहेऊ । शरण कबीर सराहि, जाहि खल दल बहु तरेऊ ॥ तन्यौ थपच चंडाल, डाल अघरहेऊ नकनिका । परमपुरुष पद पाय, यथा काशी की गणिका ॥

५९

जीवधर्मबोध

( १९६७ )

शरणागतको धर्म यह तन मन करिये भेट । गुप्त प्रकट सब आपिये पुनि यम गहे न फेट ॥ फेट गहे तब कौन सकल तेरौ नहिं मेरो । बाहर भीतर पौर ठौर सब तेरौ डेरो ॥ तेरौ डेरो भयो वस्तु तामें सब तेरी । तूही तहैं रखवाल छुटी सब संशय मेरी ॥

चौपाई

अब कलिमें आयू नर थोरी । को चित योग युक्तिमें जोरी ॥ पुण्यदान कह ध्यान अगाधू । कर्मविहीन गृही अरु साधू ॥ ताते शरनागत सुखदाई । और यतन कलिमें नहिं पाई ॥ कलिके जीव अनन्त अपारा । शरण कबीर होय भवपारा ॥ मूर्ख पुरोहित जस बिन ज्ञाना । ताको दान देत यजमाना ॥ दृढ़ है सतगुरु शरण गहीजै । सकल भर्मभय ताते छीजै ॥

सत्यकबीर बचन-शब्द

बिरिजमें महारि न खेले सिकार । चारपांच दश बीश महाभट संग लीने तीनो भरतार । मीनरूप है रहै जगतमें डारि बहावै तिरगुन जार ॥ जलरूपी है रहै संत कोई गहि पकरे गुरुचरण करार । कहै कबीर सुनो भाई साधो यहि ते रहियौ सदा होशियार ॥

इति शरण

अथ सतसंग कुसंगका वर्णन-चौपाई

सर्व शास्त्रको यामें एका । बिनसतसंग न उपजे विवेका ॥ बिनविवेक नहिं उज्जल करनी । जाते मुक्तिपन्थ पग धरनी ॥ सतसंगतकी महिमा भारी । लिखते शेष शारदा हारी ॥ वेद कतेब पार नहिं पावैं । संतनको नित गुन गन गावैं ॥

( १९६८ )

बोधसागर

६०

विधिहरि हर नितजाको ध्यावै । संतको भेद सोऊ नहि पावै ॥ सतसंगत सब सुखकी खानी । सर्वलाभ ताहीते जानी ॥ जो तप कीजै वर्ष हजारन । छनसतसंगत कष्ट नेवारन ॥ सत्यस्वरूपी ईश्वर कहिये । ताके भक्तन संगत गहिये ॥ तासु नाम सतसंग कहावै । सो संगतगहि जिव तरिजावै ॥ साधुनकी सेवा मन लावै । तब सतसंगतको नर पावै ॥ सतसंगत कह विविधि प्रकारा । तामें द्वैविधि मुख्य उचारा ॥ हरिभक्तन ढिग बैठन ढंगा । दुतिये वेद पाठ सतसंगा ॥ जोकर भगवतभक्तन सेवा । ताते मिलै परम गुरु देवा ॥ सदशास्त्रन पढ़ि तिनहि बिचारे । कंठ पाठ सुख तिनको धारे ॥ तेहि अनुसार कर्म सब करई । सार असार तहां निरुबरई ॥ सोई शास्त्र है जिव सुखदाई । जाते भक्ती सुक्ती पाई ॥ जाहि शास्त्रपढ़ितन मन भटके । ताको ले पानीमें पटकै ॥ जैसे साधन अरु सतसंगा । वर्णन वेदकीन बहु ढंगा ॥ हरिभक्तनकी सङ्गत जोई । तेहि समान कहु तुलै न कोई ॥ सतसङ्गत जो टूटन चहई । सबही ठौर ताहिको लहई ॥ अपने पापको कारण आही । सतसङ्गत जेहि दरसे नाहीं ॥ अपनी दृष्टि दोष जो धारे । तेहि कारण परदोष निहारे ॥ निजु दग दोष चंद द्वै दरसै । अंधेको अन्धेर सब सरसै ॥ भक्तीमें दृढ हो न जबलों । सतसंगत करते रह तबलों ॥ मनक्रम साधुकि सेवा गहिये । गाहीते सबही सुख लहिये ॥ साहिब सदा सन्तके साथ । विन सतसङ्ग न आवे हाथा ॥ सन्तजान साहिबकी देही । भक्तन सङ्ग पाइये तेही ॥ भक्तन सुख हरि भोजन करही । सदा सो तिनके सङ्ग विचरही ॥ वरन विवेक एक नहि करिये । साधु जानि सेवा चित धरिहे ॥

६१

जीवधर्मबोध

( ११६९ )

साधु सेवके वैरी पाँचा । तामें भटक जाय जिव काँचा ॥ रूप वरन विद्या बल धनमद । ताने जीवन लहै सेवापद ॥ जेते सुख श्रुति संत बखानी । तातो स्वर्ग मुक्ति सुखदानी ॥ ताहुते सुख अधिक जो होई । सत संगत सम तुलै न कोई ॥ सतसंगतसे ईश्वर पावै । ताते अधिक और कह गावै ॥ जहैं ईश्वर तहैं सुरगन छाया । सब दयाल जब प्रभुकी दया ॥ गुन गन युक्ति मुक्ति जिन पाई । जहैं लगिलखो विभूति भलाई ॥ सो सबही सतसंग प्रतापा । यह पद सब संतन मिलिथापा ॥ अब कुसंगको वर्णन करिये । दुष्ट देखि ततछन परिहरिये ॥ भरुअहि निज उर लेहु लगाई । दुष्ट संग याते दुखदाई ॥ सर्प तो एक प्रानकर घाता । कूंग संग ले नरक निपाता ॥ दोहूँ लोकमें काज विभंगा । मति मलीन हो किये कुसंगा ॥

इति

अथ मनमायाको वर्णन—कविच

यह मन महाराज मनहीहै यमराज मन कीने सब काज मन पोषत भरत है । ठाकुरवो ठग मन फैला सब जग मन कालवो दयाल मन तारत तरतहै ॥ मनसो न खोट मन कीने हरि ओट जिव भवमें डुबाय बरमायके छरत है । अकथ अनूप मन ईश्वर स्वरूप मन तिहुँ पुर भूप जो उपायके हरत है ॥

चौपाई

यह मन तीन लोकको नाथा । तीन देव इंद्री तेहि साथा ॥ गुन इंद्री याते प्रकटाही । पुनि यार्हमें लय है जाही ॥ यहि मनको कोइ भेद न जाना । सुर नर मुनि परे बंदीखाना ॥ ऊपर मन अरु हेठ है माया । तासुमध्य जग जीवनिकाया ॥

( १९७० )

बोधसागर

६२

चक्की चले दल सब जिवको । होहि पिसान न पावै पिवको ॥ कहा बापुरा जीव कडारा । सुरनरमुनिसबछलिछलिमारा ॥

कुंडलिया

चलती चक्की देखिके दिया कबीरा रोय । दोपट भीतर आनिके साबित गया न कोय ॥ साबित गया न कोय मिले नाहिं सन्त सनेही । कठिन कालको घेर फेर पर समुझावै तेही ॥ समुझाये जौंचेतसो किले सतगुरु अटको । फेर न पीसो जाय देख तेहि यमगनसटको ॥

चौपाई

यह मन सकलजक्त बिस्तारा । यहि मनको कछु वारन पारा ॥ मनको रचना सकल जहाना । सात प्रकार सृष्टि जग नाना ॥ मानुष देव नाग कहि देता । किन्नर पशु पच्छी अरु प्रेता ॥ सात जीव हैं सृष्टिके साता । तिनकी अब सुनिये यह बाता ॥

दोहा-स्वप्ना जाग्रत प्रथमपुनि, संकल्प जाग्रित होय ॥ केवल जाग्रत त्रितयकह, चिरजाग्रत चौथो होय ॥ पंचम दृढ़ जाग्रित कहै, छठे जाग्रत सुपनाहि ॥ सतय छोन जाग्रत कहो, सात सृष्टि यह आहि ॥

चौपाई

स्वपने विषे जो जाग्रत होई । स्वप्ना जाग्रत कहिये सोई ॥ पुनि संकल्प जाग्रतकह जोई । अजौं नींद नाहिं आई होई ॥ तामैं जो मनराज फुराना । तेहि मनराजमें जग दरसाना ॥ दृढ़ वासना भई तेहिमाही । पूर्व वासना बिसरी जो जाही ॥ यहि मनराजको रचित जो देही । अभिभूतकता दृढ़ गहयेही ॥

६३

जीवधर्मबोध

( १९७१ )

केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥ सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥ चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥ निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥ पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥ पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥ षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥ पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥ तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥ सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥ छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥ सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥

सत्यकबीर वचन

सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।

जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥

कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।

सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥

कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।

ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥

कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।

उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥

छन्द भुजंगप्रयात

महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।

गहै कौन पावै मनी रामराजा।

लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।