कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( ८५ )
ही कृपासे शाहजादी फिर जीवित होकर मेरे जीवनका कारण बनी है तुम्हारे इस पुण्यका फल परमात्मा तुम्हें देगा किन्तु जबतक मेरे शरीरमें प्राण है तब तक मैं तुम्हारा कृतज्ञ रहूँगा। अब सुझे सिवाय शाहजादीसे विवाह करनेके किसी प्रकारकी और इच्छा नहीं है। यदि यह स्वीकार करलेतो धर्मानुसार तुम दोनों अपने सन्मुख साक्षी बनकर हम दोनोंका सम्बन्ध जोड़ दो।
अब्दमशाहकी बातको सुनकर व्यापारीने शाहजादीको कहा कि, हे शाहजादी! यदि अब्दमशाह न होता तो तू कब्रकी कब्रमें मरकर संसारसे चलबसी होती। इसके अतिरिक्त उसने तेरे लिये कैसे २ कष्ट उठाये हैं अब उचित है कि, तू भी उसे स्वीकार करले इस प्रकारसे अनेक बातोंके समझानेपर शाहजादीने उत्तर दिया कि, आप लोगोंकी मैं बहुत कृतज्ञ हूँ आप लोगोंकी आज्ञा कदापि उल्लंघन नहीं कर सकती किन्तु अब्दमशाह इस बातका प्रण करे कि, वह कभी मुझसे अलग न होगा और न कभी मेरी आज्ञासे बाहर जायगा तब मैं इसको स्वीकार करूँगी और मेरे विवाह का यही मुद्दर होगा।
शाहजादीकी बातको सुनकर अब्दमशाह आनन्दके मारे उछल पड़े और शपथ पूर्वक शाहजादीके कहे अनुसार प्रतिज्ञा करके शाहजादीके उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे। फिर शाहजादीने व्यापारी और हकीमसे कहा कि शरअ ( मुसलमानी धर्मशास्त्र )
१ मुसलमानी धर्मानुसार विवाह करनेके समय बरकी ओरसे कन्याके लिये मुहर की रीतिपूरीकी जाती है। जिसमें बर अपनी प्रतिज्ञाके साथ २ नियत रुपया या अशरकी का दस्तोबेज अपनी स्त्रीके नामसे लिख देता है कि, वह आजसे उसके इतने रुपयाका ऋणी हुआ प्रथम तो कभी वह उस स्त्रीको छोड़ेगा ही नहीं यदि किसी कारणवश उसे छोड़ना चाहें अमुक रकम देकर केही छुटकारा पा सकेगा जब तक वह ऋण उसका न चुकादे तब तक वह उसको कदापि नहीं छोड़ सकता इसीका नाम मुहर है शाहजादीने अपना मुहर यही मांगा कि, यावज्जीवन अब्दमशाह छोड़कर कहीं न जावे।
( ८६ )
सुल्तानबोध
के अनुसार विवाहके लिये दो साक्षीकी आवश्यकता है सो तुम दोनों हमारे विवाहके साक्षी हो जाओ जिसमें लोक परलोकमें हम पापके भागी न होंवे तब मैं विवाहको स्वीकार करूँगी । उन दोनोंने शाहजादीके बचनको मानकर साक्षी बनना स्वीकार किया और दोनोंकी गांठ जोड़ ( पाणिग्रहण ) करा दिया । पश्चात् वे दोनों तो अपने कारवानमें चले गये और अह्मशाह शाहजादीको पाकर परम आनन्दित हो अपनी पर्णकुटीमें बास करने लगे ॥
दोनोंमें परस्पर ऐसा प्रेम हुआ कि, कोई किसीके वियोग को क्षणमात्र के लिये भी सह नहीं सकता था । जड़लके फल फूल पत्ते और कन्द मूलपर वे अपना दिन बिताते और स्वर्गसे भी बढ़के आनन्दको मनाते थे ॥
कुछ दिनोंके पश्चात् शाहजादी गर्भवती हुयी और समय पूरा होनेपर परम सुन्दर पुत्रको प्रसव किया । उसी पुत्रका नाम अह्म शाहने इब्राहीम रक्खा । किताबोंमें लिखा है कि, अह्मशाहके संग के प्रतापसे शाहजादी भी सर्वशुभ गुणोंसे सम्पन्न महान् तपस्विनी और भजनानन्दी होगयी थी । जिस समय उसे गर्भ स्थित हुआ था उस समय समस्त बन नाना प्रकारके फल फूल और मेवोंसे सम्पन्न हो गया था । सदा वसन्त ऋतुकाही आनन्द वहाँ दीखने लग गया था । नाना प्रकारके पशु पक्षियों ने आकर वहाँ बास किया था । जिससे वह बन कानन बनकर स्वर्गके समान सुख-दाई हो रहा था । इब्राहीमके जन्म लेनेपर उनकी आकृति सम्पूर्ण रूपसे हजरत इब्राहीम खली लुछासे मिलती थी इसी कारणसे उनका भी नाम इब्राहीम रक्खा । जिस समय शाह-इब्राहीम का जन्म हुआ वह एक सो एकसठ ( १६१ ) हिजरी थी।
बोधसागर
( ८७ )
माता पिताने बड़े प्रेमसे इब्राहीमको पालना आरम्भ किया । दो वर्षके पश्चात् उनको अन्न प्राशन कराया ॥
दो बरस पूरेका जब वह हो गया । और गिजा फिल जुमले वह खाने लगा ॥ गैबसे आने लगनेा दिरत आम । कुदरते एजिदसे उसको विलदवाम ॥ उसकी बर्कत से लगे अशजार पर । अच्छी अच्छी वज अकेशीरी समर ॥ कुदरते हकसे हुआ वह दशतोबर । गुलशनों गुलजार पर भी फौकतर ॥
आखिरकार देखते देखते बालक इब्राहीम सात बरसके हो गये । अब अह्मशाहको इस बातकी चिन्ता हुई कि बालकको विद्या अभ्यास कराना चाहिये सबसे पहले जैसा मुसलमानोंमें रीति है बालकको कुरान पढ़ाना आरम्भ किया । जब कुछ दिनों तक घेरमेंही पढ़ाकर देख लिया तब एक दिन बालकको गोदमें लेकर अह्मशाह शहरमें गये वहाँ दूँदते दूँदते एक सज्जन मोलवी साहेब मिले जिनके यहाँ इब्राहीमके पढ़नेको ठीक करके उनसे कह दिया कि, सबेरे मैं इब्राहीमको यहाँ रख जाया करूँगा और शामको आकर लेजाया करूँगा ।
अलगरज हर सुबह वह मढ़नेको ।
लाता उस मुकतबमें इब्राहीमको ॥
उलफते कलवीसे अपने विलदवाम ।
फिर उन्हें लेनेको आता वक्त शाम ॥
था यही हररोज अह्मका शआर ।
आते जाते शहरमें विलइजतरार ॥
थी जेबस शफकत उन्हें बेइन्तहा ।
तनहा आना जाना दिलपर शाकथा ॥
( इब्राहीम अह्मका बादशाह बनना )
जबसे बलखके बादशाहकी इकलौती बेटीका उससे वियोग हुआ तबसे बादशाह बहुत उदास और दुखी रहने लगा ।
( ८८ )
सुलतानबोध
उसका चित्त संसारसे उदास हुआ वह सदा दुर्वैश फकीर और ईश्वरके भक्तोंके संगमें रहने लगा । जहाँ किसी महात्माका समाचार पाता वहीं उनके दर्शनको चला जाता और अपनी शान्ति के लिये उनसे प्रार्थना करता । दूसरी आदत उसकी सदासे यह थी कि, जब कभी वह शहरमें निकलता तब मदरसे और मुकतबोंमें जाकर लड़कोंका पढ़ना सुनता और उन्हें मिठाई वगैरह देकर खुश करता और शिक्षकों को इनाम देकर लड़कोंको छुट्टी दिलाता । इसके अतिरिक्त एक संतने भी उसे कहा था कि, मुकतबके लड़कोंको खुश रखनेसे तेरी सुराद कभी न कभी पूरी होजायगी । सो एक दिन बादशाहकी सवारी संयोगसे उसी मुकतबके पाससे निकली जिसमें इब्राहीम अद्दम पढ़ते थे । जिस समय बादशाहकी सवारी मुकतबके पास पहुँची उस समय बादशाहके कानमें बहुत मीठा और रीतिके अनुसार कुरान पढ़ते हुए किसी बच्चेका शब्द सुनपडा । बादशाहने एकदम सवारी रोकली और कुछ देरतक वहाँ ही खड़ा खड़ा सुनता रहा । फिर तो उस शब्दपर इतना मोहित हुआ कि, सवारीसे उतरकर मुकतब में पहुँचा ।
गुजराउसमुकतबकेआगे नागहाँ । मसहफइब्राहीमपढताथाजहाँ ॥ बादशाहने जब सुनीउसकीसदा । दिलपैउसकेकछुअसरपैदाहुआ॥ करकेउजाअपनेउसघोडेकोखड़ा । पढना इब्राहीमका सुनतारहा ॥
मुखरिजै इलफ़ाज उसके महवशद ।
सुनके अश अश कर गया हर जीखरद॥
था हमेशासे तरीका शाहका ।
जिस जगह मुकतब सरेरह देखता ॥
सुनता पढना जाके हरेक तिफ्लका ।
करता फिर इन आम हरयकको अता ॥
बोधसागर
( ८१ )
आता पठना जिसका खातिरमें पसन्द । उसको देता नकद औरों से दो चन्द ॥ देके जर उस्ताद को शाहे निकों । छुट्टी दिलवाता था फिर हर तिफलको ॥
अपने सदा की आदतके अनुसार बादशाहने मुकदंबके हर एक लडके का पठना सुना और सबको इनाम भी दिया । परन्तु जब इब्राहीम की बारी आयी तब उस छोटेसे बच्चे का शुद्ध शुद्ध पठना, उसकी अदब के साथ बात चीत और उसके रंग रूप को देखकर बादशाह एकदम आश्चर्य सागर में गोता खाने लगा । उसके हृदयमें उस बच्चे का इतना प्रेम प्रवाह उमड़ चला कि वह हैरतमें पड़ गया । आखिर अपने प्रेम प्रवाह को रोक नहीं सका एक दम इब्राहीम को गोदमें उठाकर प्यार करने लगा । यद्यपि बादशाही रोंब दाब से यह बात कदापि मुमकिन नहीं थी तथापि अन्तर्गत हृदयमें किसी अनजानी शक्तिने ऐसा काम किया कि बादशाह अपना पद एक दम भूल गया और इब्राहीम को उठाकर गले लगा लिया । इब्राहीम के हृदय में भी खून ने जोश मारा वह भी बादशाह के हृदय से चिपट गया । अब बादशाहके हृदय पर और भी बड़ा भारी प्रभाव पड़ा ।
जुज्वको है जुज्वसे पैवस्तगी । खून को है खून से दिलवस्तगी ॥ दाब शाही से यह विलकुल दूर था । लेकरह इस अमरमें मजबूर था ॥ दिलको अपने जब्रगो उसने किया । जोश उलफतपर न उससे रुकसका ॥
(१०)
मुलतानबोध
जुज्वको है गचै जायद इजतरार । कलको भी बेजुज्वके कबहो करार ॥ गो नहीं जाहिरका पैगामों सलाम । जुज्व कलमें है मगर पिनहाँ कलाम ॥ दिलको हरेकके खलिश है जो यहाँ । है अनासिरकी कशिशयह ऐ जवाँ ॥ जज्व अपने जुज्वको करते हैं कल । उस कशिशका है बदनमें शोरोगुल ॥ हरबशरको है जो दिलमें इजतराब । खींचती है उसको पिनहानीतनाब ॥ रिश्तए उलफसे रहता है बंधा । जुज्व अपने कुलके साथऐबाखुदा ॥ जुज्व तनको है जो कुलके साथरन्त । है कशिशसे उसकी तेरी अकलखब्बत ॥ अपनी गुलफतसे तुझे है यह गुमाँ । मुझको जोफे कलब और मादा है अयाँ ॥
बादशाह दिल भरके इब्राहीमको प्यार कर लेने पर जैसे ही गौर से उसकी ओर देखने लगा वैसे ही उसे अपनी लडकी की याद आयी । लडकी की याद आतेही उसकी सुरत बाद- शाह के सामने आ खड़ी हुई । अब बादशाह देखता है तो इब्रा- हीमकी और उसकी लडकी की शकल में बाल बराबर भी भेद नहीं है । कहते हैं कि, उस समय बादशाह इतना रोया कि, उसका चेहरा लाल हो गया और आगे के कपडे आँसू से भीग गये । फिर जब मन कुछ ठहरा तब बादशाहने मुल्लाजीसे पूछा कि,—यह लडका कहाँ रहता है ? इसका बाप कौन है ? यह
बोधसागर
( ११ )
यहाँ कितने दिनोंसे पढने आया है ? मुल्लाजीने बादशाहके प्रश्नोंका यथायोग्य उत्तर दे दिया ।
दस्त बस्तः यों मुअलिमने कहा । बाप इसका है फकीरे बेनवा ॥ रहता है सहरामें आबादीसे दूर । अहल दुनियासे निहायत है नफ़ूर ॥ अह्म उसका है लकबएनेकपै । इस पेसरका नाम इब्राहीम है ॥ एक बरस गुजरा कि पढनेको यहाँ । आता है यहतिफलेशाहेजहाँ ॥ सुबहको लाता है बाप इसका यहाँ । शामको लेजाता है आकर वहाँ ॥ है जेवस दुर्वैश वह साफी निहाद । है मुझे हृदसे ज्यादा एतकाद ॥ जसतन अल्लाह इसे बहरेसबाब । याद करवाता हूँ रब्बानी किताब ॥
मुल्लाजीकी जबानी अह्मशाहका नाम सुनतेही बादशाह चौंक उठा । उसे पहलेकी सब बातें :—अह्मशाहका शाहजादी पर आशिक होना, उसका मोती लाना, वजीरका उसे धक्का देकर निकाल देना उसके छातीपर सुक्का मारना और शाहजादीका मर जाना इत्यादि-याद आगयीं । तब बादशाहने अपने मनमें अनुमान किया कि, हो नही इसमें जरूर कोई छिपा हुआ भेद है । नहीं तो इस बालकके ऊपर मेरा इतना प्रेम क्यों होता ? दूसरे इसका रूप मेरी बेटीसे पूरा पूरा मिल रहा है । सो इसमें अवश्य कुछ भेद छिपा हुआ है । इसलिये इस बालकको अपने महलमें लेचलकर बादशाह बेगमको दिखलावें जिसमें उसके हृदयमें कुछ संतोष हो । इतना सोचकर बादशाह इब्राहीमको गोदमें लिये हुए उठ खड़ा हुआ और मुल्लाजीसे कहा कि, जब इस लड़के का बाप आवे तब उसे मेरे पास भेज देना वहीं से वह अपना लडका ले जायगा । फिर मुल्लाजीको बहुत कुछ इनाम देकर रवाना होगया ।
महलमें पहुँचकर बादशाहने बेगमको बुलाकर इब्राहीमको
( ९२ )
मुल्तानबोध
उसकी गोदमें रख दिया । बेगमने जैसेही इब्राहीमको गौर करके देखा वैसेही लडकीकी शकल देखकर एकदम बेहोश होकर गिर पड़ी । फिर तो महलमें धूम मच गयी । बेगमको होशमें लानेके सैकड़ों उपाय किये गये । जब वह होशमें आयी तब इब्राहीमको गोदमें लेकर बार बार बलाई लेने और नाना प्रकार के संकल्प विकल्प मनमें करने लगी ।
गोदमें फिर उसको लेकर नागहाँ । साँस ठंडीभरके करती थी व्यों ॥ ऐ मेरे लखते जिगरके हम शबीह । ऐ मेरे नूरे बरसके हम शबीह ॥ ऐ मेरे रशके कमरके हमसिफत । ऐ मेरे गुल वर्गतरके हम सिफत ॥ ऐ मेरे उस गुलबदनके हम अनाँ । ऐ मेरे शीरी दहनके हमनिशाँ ॥ ऐ मेरे उस लाबुते चींके करीं । ऐ मेरे आहुये मिराकीके करीं ॥ ऐ मेरे ताबिन्दः अखतरकी शबीह । ऐ मेरे मेहरे मनौवर की शबीह ॥ ऐ मेरे नादीदः दुनियाके मिसाल । ऐ मेरे फरजन्द जेबाके मिसाल ॥ ऐ मेरे युसुकके हमतजाँतराश । ऐ मेरे लैलाके हमवज अवकमाश ॥ ऐ मेरे जाने जहाँके हम अनाँ । ऐ मेरे गुंचः देहाँके हम अनाँ ॥ ऐ मेरे उस मूकभरके हम कमरा । ऐ मेरे याकूत लबके हम गोहर ॥
देताहै हर जुज्व तेरा बे गुमाँ ।
युसुफे गुमगश्तः मेरे का निशाँ ॥
है जो हर हर जुज्व तेरा बिलएकीं ।
यादगार लैलीय महमल नशी ॥
इस प्रकार अनेक तरहसे बेटीका स्मरण कर लेनेके पश्चात् बेगम ने इब्राहीम से पूछा कि, तेरी माँ और बापका नाम क्या है ? इब्राहीमने बापका नाम अह्मशाह और माँका नाम वही बतलाया जो बादशाह की लडकीका नाम था ।
शाहकी दुखतरका जो कुछ नाम था । वही इब्राहीमने माँका लिया ॥
बोधसागर
( १३ )
और बतायानामअद्दम बापका । दशतमें अपनीकहीरहनेको जा ॥
अद्दम शाहके नाम को बलख निवासी स्त्री पुरुष बच्चे से बूढे तक सभी जानते थे । क्यों कि वह शाहजादी पर आशिक था । और शाहजादीका मरजाना भी अद्दमशाहके ही शापका फल लगाना मान रखा था । यही कारण हैकि, अद्दमशाहको सब लोग महात्मा सिद्ध समझते थे । इब्राहीमके मुखसे बादशाह-जादी और अद्दम दोनोंका नाम सुनकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । बादशाह और बेगमके अन्तःकरणमें न जाने कितनी करुपनाएँ आती थीं और कितनी आशा और निराशा उनके चारों ओर फिर रही थीं । आखिर बादशाह बेगमने अपने हाथसे इब्राहीमको स्नान कराकर अच्छे २ कपडे पहनाया और उत्तम उत्तम पदार्थ उसे खानेको दिया । फिर बादशाह इब्राहीमको बेगमके पास छोड़कर अपने खानगी स्थानमें जा बैठा और इस भेद पर विचार करने लगा । अन्तमें बादशाहने निश्चय किया कि, अद्दमशाहसे इनका वृत्तान्त पूछना चाहिये वह संसार त्यागी फकीर है वह कदापि झूठ नहीं बोलेगा ।
बादशाहके दिलमें आया यों रुयाल ॥
पूछिये अद्दमसे उस दुखतर का हाल ॥
फर्कऊसकीरास्त गौरीमें नहीं । जो कहेगा वह सच्चहै बिल यकीं ॥ मर्द हकहै पाय बन्दे रास्ती । झूठ हर्गिज न बोलेगा कभी ॥
इतना विचार कर बादशाहने दरवान को बुलाकर हुकम दिया कि अगर कोई लड़का लेने आवे तो उसे द्वारपर मत रोकना बल्कि उसे सीधा मेरे पास पहुँचाना । उसको प्रतिष्ठापूर्वक ले आना, खबरदार उसके मनमें किसी प्रकारसे बुरा न लगने पावे इतना हुकम देकर बादशाह अद्दमशाहकी इन्तजारी करने लगा ।
( ९४ )
सुलतानबोध
उधर अपने नियत समय पर जब अह्मशाह इब्राहीमको लेनेके लिये सुकतबमें आया तब उसे मालूम हुआ कि, इब्राहीमको बादशाह अपने महल में ले गया है और कह गया है कि अह्मशाह वहाँही से उसको लेजावे। उसे किसी प्रकार डरना नहीं चाहिये जिस समय वह आयेगा उसी समय अपना लडका ले जायगा। यह सुनते ही अह्मशाहने बेकरार होकर सीधे बादशाहकी डचोढ़ी पर जा खड़ा हुआ और दरवानसे कहाकि, बादशाहसे जाकर कहदे कि, इब्राहीमका बाप उसे घर लेजाने आया है। जल्दी उसे बाहर भेज दो।
जैसेही अह्मशाहके आनेकी खबर बादशाहको पहुंची वैसेही बादशाहने उसे अन्दर अपने पास बुला लिया और बड़ी प्रतिष्ठा के साथ उच्चासन पर बैठाकर ईश्वरका शपथ देकर उनसे पूछा कि सच बता तुझकोसौगन्देखुदा। नामहैइसतिफलकीमादरकाक्या हैवहकिसकीदुखतरेआलीगोहर। रास्तकहदेकौनहैउसकापदर ॥
बादशाहकी बातको सुनकर अह्मशाहने कहा = “ऐबादशाह वह वही तुम्हरी लडकी है जिसपर मैं आशिक हुआ था”। सुनकरअह्ममनेकहाऐबादशाह। हैवहदुखतर आपकीबेइशतवाह॥ मादरइसकीहैवहीरशकेकमर। जिसपैमैंआशिकहुआथादेखकर॥ नामभीउसकादियाउसकोबता।दुखतरेसुलतानकाजोकुछनामथा॥
अह्मकी बातको सुनकर बादशाहके आश्रयका पारावार नहीं रहा उसने आश्रय मुद्रासे अह्मशाहसे कहा कि मेरी बेटी को मरे हुए तो मुद्दत होगयी। उसको हम लोगोंने कब्रमें गाड़ दिया उसकी तो हड्डी तक गलगयी होगी। वह अब तुम्हारे घरमें कहाँसे आगयी? क्या कोई आज तक मर करके भी जिया है।
बादशाहकी बातको सुनकर अह्मशाहने शाहजादी के जीने और विवाह होने आदिका सब वृत्तान्त कह सुनाया।
बोधसागर
( १५ )
जबकहा अद्भमने ऐआलमपनाह। सुवतलासकतेमैथीवहरश्कमाह ॥ खल्क उसदुखतरकोसुदाजानकर। कब्रमेंचुपरखकेआयीअपने घर॥ कब्रमें उसकोकिया था दफनजब। एकपहरभरसेसिवागुजरीथीतब॥ मिट्टी जो डाली थीं उससन्दूकपर। जिसकेअन्दरथीवहमाहेसीमवर॥ कुदते हकसे हवाका रास्ता। रहगया था कब्रके अन्दर खुला॥ था जिलाना बसकिमज्जूरे खुदा। इस सबबसे कब्रमें रखना रहा ॥ मुझकोजजे इश्कमें आयी तरंग। कब्रपर उसके गया मैंवे दरंग ॥ पासवान कब्र सोते देखकर। लाशदुखतरकोकिया मैंनेबदर ॥ लाशको मैंने निकाला कब्रसे। फिर कियाहमवारमिट्टीडालकर॥ मैं वले मुर्दाहो उसको जानकर। रखकेउसकीलाशकोबलायसर॥ जल्दतर उस दश्तोबरमें लेगया। थी जहाँ ऐ शह मेरी रहनेकीजा॥ करके रौशन आग मैं बैठ। वहाँ। बाहजार्। दर्द वअन्दोहो फिगा॥ देखता था हुस्नकी उसके बहार। औररोताथा निहायत जारजार॥ कुदरते हकसेहुआ बारिद वहाँ ऐन। उस हालतके अन्दर कारवाँ॥ देखकर आतशको रौशनएकजवाँ। आगलेनेके लिये आया वहाँ ॥
पास वाने कब्र उसको जानकर।
फर्त दहशतसे हुआ दिलमें मुनतशिर ॥
दश्तमें मुर्दे को तनहा देखकुर। होगया दहतसे लरजाँ वह बशर कारवाँमें जाके दी उसने खबर। उसमें था मर्द तबीबे पुर हुनर॥
साथ लेकर उसको मीरे कारवाँ।
सुनतेही उस बातके आया वहाँ ॥
देखकर दुखतरकोउसने योंकहा। है यह सकते के मर्जमें सुबतला॥
कहके विसमिल्हाह नशतर को लिया।
उससे की झट पट रगे कफान वा ॥
जबकिनिकलाउसकेतनमेंसेलहू। होगयीहुशियारवहफर्बुन्दःसू ॥
( ९६ )
मुलतानबोध
कर दिया आंखोंको उसने अपने बा । पूछा उन दोनों से क्या है माजरा ॥
कौन हो तुम और यह किसका है मर्का ।
घर से मुझको कौन लाया है यहाँ ॥
मैं भी आखिर सुनके उनका मकाल ।
अन्दर आया करनेको दरियाफत हाल ॥
देखकर जिन्दा मैं उसको ऐ शहा ।
लाया सिजदए शुक्र यजदाँका बजा ॥
पूछा मुझसे फिर उन्होंने माजरा ।
मिन व अन एह वाल मैंने कह दिया ॥
मेरा और दुखतरका एजाबोकबूल। होगया पेशे गवा हानैं अदूल ॥
फिर हुआ जो लुफवइन आमें खुदा। पैदा इब्राहीम यह उससे हुआ ॥
माजरा है यह बेला कम और कास्त ।
जो कहा मैंने यह है सब रास्त रास्त ॥
अब्दमशाहके द्वारा अपनी बेटीका सब वृत्तान्त सुनकर बादशाह मारे खुशीके उछल पड़ा । वह उसी समय उठकर महलमें गया और बादशाह बेगमसे सब वृत्तान्त कह सुनाया । बेगमने बेटीके मिलने की खुशीमें दान पुण्य खेरात करना आरम्भ कर दिया उधर बादशाह ने शाहजादीके बचपनकी सखी सहेलियों और उसको दूध पिलानेवाली बुढ़ियों को पालकी पर सवार करा करा कर शाहजादीकी जाँच करनेको भेज दिया । तब तक आप अब्दमशाह को बातोंमें फँसा रखा ।
थोड़ीदेरमें जाँच करने वालियों ने आकर बादशाहसे कहाकि सचमुच वही शाहजादी है । फिर तो बादशाहने बेगमको साथ लेकर उसी समय बेटी से मिलने के लिये जंगलमें जाने की तैयारी की । आगे आगे बेगमोंके मुहाफ और पीछे सब
बोधसागर
(१७)
दरवारियों सहित बादशाहकी सवारी रवाना हुई। जब अह्म-शाहकी कुटीके निकट सवारी पहुँची तब बादशाह नीचे उतर पड़ा और बेगम को साथ लेकर पाय प्यादे झोपडी की ओर चला। बादशाहने देखा कि, एक टूटी फूटी झोपडीमें सैकड़ों जगह से फटे हुए कपडे पहनी हुई यास की टूटी चटाईपर बैठी हुई शाहजादी निमाज पढ़ रही है। जब वह निमाज पढ़ चुकी तब लौडियों ने हाथ जोडकर कहा कि, आपके पिता और माता आपसे मिलने को आये हैं। दासीकी बात सुनतेही शाहजादी दौडकर माता पिताके पग पर गिर पडी। फिर दोनों ने उसे उठाकर गले लगाया और शकुन के आंसू बहाकर उसे शाही महल में अपने साथ ले जाने की इच्छा प्रकट की। शाहजादीने कहा आपकी आज्ञा मेरे शिर पर है किन्तु पतिकी आज्ञा विना मैं यहाँ से एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकती। बादशाहने अह्मशाह से आज्ञा दिला दी। फिर तो उसके वह फकीरी वेष को उतार कर शाहाना कपडोंसे उसे सजाया और बेगम ने अपनी पालकीमें साथ ही बैठाया। वैसे ही अह्मशाह और बादशाह एक ही सवारीमें बैठ कर शाहीमहल को रवाना हुए। बादशाहने महलमें पहुँच कर उत्सव करने की आज्ञा दी।
राह हकमें माल व जर विलकुल दिया।
इस कदर खैरात की बेइन्तहा ॥
इस प्रकार खूब धूम धामके साथ आनन्द मनाया गया। चौथे दिन अह्मशाहने बादशाहसे कहा कि, फकीरों का एकान्तमें रहना ही अच्छा है इसलिये मुझे तो जंगलमें ही जाने दीजिये। अगर आप चाहें तो मेरी स्त्री और मेरा लडका आपकी सेवामें रहेगा। बादशाह ने बहुत प्रकारसे समझा-
नं. ६ कबीरसागर - ४
( ९८ )
मुलतानबोध
कर अह्मशाह को अपने पास रखना चाहा किन्तु उन्होंने एक भी नहीं माना आखिर मजबूरीसे बादशाहने उन्हें बिदा किया । अह्मशाह अपनी उसी कुटीमें जाकर रहने लगे जब उनका जी चाहता तब आकर अपने लड़के और स्त्रीको देख जाते । कहते हैं कि, जबतक जीते रहे तबतक उनकी यही रीति रही ।
बादशाहने अपने घर लाकर इब्राहीमको पढ़ाने के लिये अच्छे अच्छे शिक्षक सब प्रकार की विद्या और गुणसे पूर्ण देश देशसे बुलाकर रखा “होनहार विरवानके होत चीकने पात” के अनुसार इब्राहीमकी बुद्धि ऐसी तीव्र थी कि शिक्षक लोग यदि एक बात बतलाते तो इब्राहीम उससे दश अधिक निकालते इस प्रकार सदगुरु की कृपा द्वारा इब्राहीमने थोडे ही वर्षोंमें अनेक विद्या और कला कौशल तथा राजनीतिमें योग्यता प्राप्त कर ली । समय पाकर बादशाहने इब्राहीमको राज्य सिंहासन पर बैठाकर बलख का बादशाह बना दिया ।
नाना की गद्दी पर बैठकर इब्राहीम अब इब्राहीमशाह हुये । राज्यके कामको इस योग्यता से किया कि, शत्रु और राज्य के लालची दूसरे बादशाह लोगोंने स्वयं प्रशंसा करके उनसे दोस्ती कर ली ।
इस प्रकारसे रामराज्य सा राज्य करने पर भी इब्राहीमशाह को फकीरों दुवैशों की संगति का ऐसा चसका लगा था कि, दिन रातमें राजकाजसे जभी अवकाश मिलता तभी साधु सन्तों के पास पहुँचते । चाहे कितने ही दूर पर किसी अच्छे महात्मा के रहने का समाचार पाते जरूर वहाँ जाकर उनसे सतसंग करके लाभ उठाते । इसी प्रकार राज्य करते हुये कई वर्ष
बोधसागर
( ११ )
बीतने पर उनके नानाका जिन्होंने अपना राज्य इन्हें देकर आप भजनके लिये एकान्त वास किया था देहान्त हो गया ।
नानाके मर जाने पर इब्राहीम शाहके मन पर बड़ा धक्का लगा उनका चित्त संसारसे एकदम वैराग्यको प्राप्त हुआ अब उन्हें दिन रात परलोक की चिन्ता रहने लगी ।
याने इब्राहीमशाहे दो जहाँ ॥ करता था जाहिरमें गो कारे शहाँ ॥ लैक था दुनियासे दिलबरदाशता ॥ बेवफा व बेबका पिन्दाशता ॥ कारदुनियाँस नथी चसपीदगी ॥ कुछ तहेदिलसे नथी गरवीदगी ॥ जानता था कार दुनियाँ सुस्तआर ॥ करता था बहरे जरूरत कारो बार ॥ मुल्करानी उसनेकी वबा आब ताब ॥ दसबरस वरलाह आलम बिलसवाब ॥ अदल अपने असिरमें ऐसा किया ॥ महो सुतलक होगया जौरो जफा ॥ शाम आपरवानेको देत कलीफ अगर ॥ किताजल्द उसका करे गुलगीर सर ॥ जुलमसे तोडे जो बुज ठत्री हरी ॥ फेर दे कस्साब गरदन पर छुरी ॥
इसके आगे नानाकी मृत्यु देखकर इब्राहीमशाहके हृदयमें विरागका अंकुर विशेष वृद्धिको प्राप्त हुआ और सदगुरुने जिस प्रकार उन्हें उपदेश देकर सत्य पदको प्राप्त कराया उसका
( १०० )
सुलतानबोध
विशेष वृत्तान्त सुलतानबोधमें लिखा है । यद्यपि और और लिखने वालोंके विचार और लिखनेसे सुलतानबोधमें बहुत कुछ भेद पड़ता है तथापि सबका लक्ष एकही है और सबने अन्त में फल भी एकही दर्शाया है । इसकारण और यहाँ पुस्तक बढ जानेके भयसे अधिक न लिख कर शाह इब्राहीम अद्दमके फकीर हो जाने पश्चात् की करामात औ प्रचार की बातों में से थोडी सी बातें यहाँ लिखकर यह ग्रंथ समाप्त किया जायगा ।
शाहइब्राहीम अद्दम का स्फुट वृत्तान्त
वार्ता १
कहते हैं अद्दम हुए जिस दम फकीर । छोड सुलतानीका सब तांजो शरीर ॥ मालोजर जितना खजाने बीच था । लेके दरियामें दिया सारा जुबा ॥ पूछा एकने क्या किया यह ऐ मालिक । क्यों न हर एकको दिया यह ऐ मालिक ॥ दरजबांब उसको कहा यह मालोजर । याँदये बोगर्जब हसदें नखवैत का घर ॥ यों सुना है मैं बुजुंगोंसे कलाम । जानते हैं इस मिसलको खास व आम ॥ आप पर जो चीज होवे ना पसन्द । गैरेंपर उसको मत रखना पसंद ॥
१ बादशाही, राज्य । २ राजमुकुट । ३ राजसिंहासन । ४ धनदोलत । ५ बादशाह । ६ उत्तर में । ७ पूंजी । ८ कीना गुस्सा, क्रोध, आंटी । ९ ईर्षा । १० अभिमान । ११ बर्बोल । १२ हूसरा ।
बोधसागर
( १०१ )
- वार्ता २ ।
बादशाहत छोड़कर अद्दम चले । कोई व सिंहराँकी तरफको शहरस ॥ बेटेको अपने किया कायमंमुकाम । बादशाहत वह लगा करने तमाम ॥ आपली फिर राह सिंहरा की गरज । कुछ न रखी माल दुनियाकी गरज ॥ साथ एक प्याला लिया और बोरियाँ । एकमिसवाँक और एक सकिया लिया ॥ एक सोजन खलका सीनेके लिये । साथ यह असबाब जरूरी ले लिये ॥ शहरसे बाहर निकल जो की नजर । सोते देखा एकको वा खाकपर ॥ बोरिया फँका वहाँ औ यह कहा । खाकसारोंको जमीन है बोरिया ॥ आगे जा देखा तो एक बेचारः आँष । औकस पीता है बैठे वे हिजाब ॥ हाथसे प्यालेको भी फोडा वहीं । यानी पी लेवेंगे हम पानी योहीं ॥ आगे देखा एक सोता है गरीब । हाथको रखे सिन्हाने बेनसीब ॥ तकिया भी छोडा फजूली जानकर । यानी एक यह भी है मुझपर बौरसर ॥
- इस वार्तामें जिन २ शब्दोंपर अंक दिये गये हैं उनका अर्थ वार्ताके अन्तकी टिप्पणी में देखो ।
( १०२ )
मुसलमानबोध
आगे जाकर देखा तो एक नेक खो । उंगलियोंसे मांजता है दांतको ॥ हाथसे मिर्वांक भी तब फकदी । मिसल ईसों एक सोजनही रखी ॥ सैर करते करते आखिरं एक जाँ । एक पहाड पर गुजर उनका हुआ ॥ आदमी वाँ था न वाँ है वाँन था । यातो था वह कोहँ या मैदान था ॥ दूरसे एक झोपडी आयी नजर । देखा एक दुवैशों को उस कोह पर ॥ करके इश्क अल्लाह पर बैठे वहाँ । बैठना इनका हुआ उस पर गिराँ ॥ बोला वह दुवैशों ऐ दुवैश ? तू । रातको रहना न याँ दिलरेशें तू ॥ याँ न दाना है न पानी है कहीं । मसल्लैहत तेरा यहाँ रहना नहीं ॥ तब यह बोले उससे ऐ हौसिला । रिज्केंका हरैगिज न करियो तू गिलैं ॥ तेरा मैं महिमाँ नहीं ऐ तकियेद्वार । जिसका महिमा हूँ वही हैगमगुसाँर ॥ जिसने दी है जान वह देवेगा नानँ । गर नहीं बावँर तो करले इमतहौन ॥ जो किसीके पास आता है अंजीज । किस्मत अपनी साथ लाता है अंजीज ॥ है खुदा सबका नहीं करता शरीकँ ।
बोधसागर
( १०३ )
रिजकमें बाहँम किसीको लाशरीकँ ॥ देख आते मत किसीको सहँम जा । उसकी किंसमतका है साथ उसके धरा ॥ कहके यह और हँट वहाँसे जा रहे । सामने तकियाँके जा सुस्ता रहे ॥ शामको एक लोटा और दो रोटियाँ । तकियाँवालेको वहाँ पर उतरियाँ ॥ और उनके वास्ते खँवाने तआम । यक पुलाओंकी रिकाबी एक जाम ॥ जर्फ चीनी और उनपर ख्वाँन पोश । यक तकल्लुँफसे उनमें नाय नोश ॥ खाके इब्राहीमने पानी पिया । शुक्नेने आमतकाफिरकसिजदा किया ॥ यह तो ने अमत लेकबस चलते रहे । वह जो तकियादार थे जलते रहे ॥ शाम जब आयी वही फिर उतरियाँ । साथ यक लोटाके वा दो रोटिया ॥ मारे गुस्साके उन्होंने यों कहा । मैं नहीं खानेका खाना आपका ॥ एकको तुम भजो कुलियाँ और पुलाँओं । मुझको जौकी रोटियाँ रुखी खिलाओ ॥ जैसा वह दुवैश मैं दुवैश हूँ । जैसा वह दिलरेश मैं दिलरेश हूँ ॥ क्यों बढ़ायी एककी यह इज्वैशाँ । है फकीर आपसमें सब एकसा ॥
( १०४ )
मुलतानबोध
जब किया यह शिकंवः उसने आशकार । तब हुआ उसपर खताँबे किर्दगाँ ॥ कि ऐ फकीर ! इतना न भूल अपने तई । तुझको शरैम इस बात पर आती नहीं ॥ उसकी गर पछे तो वह तो बादशाह । मेरी खाँतिर तज दिया ताजो कुलाह ॥ छोड़ कर लज्जात दुनियाकी तमाम । वह शर बऔवहकबाब औवहत आँम ॥ वह हुकूमत साहिबी सब अपनी छोड़ । बन्दगीमें मेरी आया हाथ जोड़ ॥ साहिबी जो छोड़ कर होवे गुलाम । क्यों न दूँ मैं उसको यकरुँवाने तआम ॥ तेरी इस रोटीसे यह खाना है कम । याद कर उसके वह नाँजो नअम ॥ और अपना वक्त भी तू याद कर । किस तरह औकात होती थी बसर् ॥ एक घसियारा था तू मदें गरीब । खोदता था घास तू ऐ बेनसीब ॥ जड़लोंमें खोदता फिरता था घास । एक टका आता था उसका तेरे पास ॥ तू हुआ था छोड़कर उसको फकीर । माँ न बेगम थी न बाबा था अमीर ॥ उस मुशकूँत से बसर् करता था तू । सर पर गट्टे लेके नित मरता था तू ॥ तुझको मैं पक्की पकायी रोटियाँ ।