कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
सत्यनाम ।
कवीरपंथी शब्दावलीकी साधारण अनुक्रमणिका ।
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १ | मुख्यपत्र वंशावली | ... १ |
| भूमिका | ... २ | |
| प्रस्तावना | ... ५ | |
| अनुक्रमणिका | ... १७ | |
| ध्यान देकर पढ़ो—कवीरपंथी ग्रन्थोंको | ||
| सूचीसहित | ... २२ | |
| २ | मंगलाचरण | ... २५ |
| ३ | शब्दावलीकी उत्थानिका | ... २५ |
| १ शब्दावली | ... ३७ | |
| २ ग्रन्थारम्भः | ... ३७ | |
| १ मंगलाचरण | ... ३७ | |
| २ इससे लाभ क्या | ... ३७ | |
| ३ सद्गुरुका स्वरूप शब्दकी | ||
| महिमा | ... ३७ | |
| ४ शब्द क्या बतलाता है ? | ... ३७ | |
| ५ इसलिये (वंशव्याख्या) परन्तु, | ||
| किन्तु । | ... ३८ | |
| ४ | कवीर पंथी शब्दावली | |
| प्रथम खण्ड प्रारम्भः । | ||
| ५ | संज्ञा मुमिरन प्रारम्भः | ... ४० |
| १ संज्ञा गौरी | ... ४० | |
| २ आरती | ... ४३ | |
| ३ संज्ञा साखी | ... ४३ | |
| ४ विज्ञान स्तोत्र | ... ४९ | |
| ५ दयासागर स्तुति | ... ५१ | |
| (जीवके उद्धारक मार्ग) | ... ५२ | |
| ६ चैतावनी | ... ५३ | |
| (सत्यकाशब्द) | ... ५३ | |
| ७ ज्ञान गुदरी | ... ५५ | |
| ८ रत्ना स्तुति | ... ५७ | |
| ९ अष्टक (साहब गुरुज्ञानी) | ... ५८ | |
| १० स्तुति (गुरु दुषित नुभ विन्) | ... ५९ | |
| ११ विनय (दरस दीजे गुरु परम- | ||
| (स्नेही) | ... ५९ | |
| १२ स्तोत्र (विदेह सूर्य) | ... ६० | |
| १३ स्तोत्र (जयजय कबीर) | ... ६१ |
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १४ | नाभाजी कृत छप्पय | ... ६२ |
| छप्पय भक्तमालका | ... ६३ | |
| १५ | सूचना (विचार जनक विदेहि | |
| नानका) | ... ६४ | |
| १६ | स्तोत्र अष्टक (* मंगलरूप | |
| अनूप पूरन) | ... ६४ | |
| और कवित्त अजर अखण्ड रूप | ... ६६ | |
| १७ | साखी (बारोंतन शनधन सब) | ... ६७ |
| ६ | संज्ञापाठ बुरहानपुरी | ... ६७ |
| १ | * गुरु शतक सारनाम | |
| ... ६८ | ||
| २ | छन्द (नुभ होहु जाहु बयाल) | ... ६८ |
| ३ | शब्द अष्टपदी स्तोत्र) | |
| ... ६९ | ||
| (प्रभुजी विन् कोन छुडावे) | ... ६९ | |
| ४ | छन्द (साहब स्वतः प्रकाश | |
| पारख) | ... ७१ | |
| ५ | अर्जनाभा अष्टक (हो सबक | |
| अज्ञान) | ... ७२ | |
| ६ | अष्टक (मुखसाहब मुखरूप) | ... ७२ |
| ७ | अष्टक (* मंगलरूप अनूपम | |
| पूरन) | ... ७३ | |
| ८ | घनाक्षरी (अजर अखंडरूप) | ... ७५ |
| ९ | आरती (आरति हो गुरु | |
| आरति हो) | ... ७५ | |
| १० | प्राथना स्तुति दोहा | ... ७६ |
| ११ | गुरुस्तुति छन्द | ... ७६ |
| द्वितीय खण्ड प्रारम्भ । | ||
| स्तोत्र दर्शन । | ||
| १ | सन्ध्या बन्दन स्तुति | ... ७७ |
| २ | कबीर मान् विद्योग सबध्या | ... ७८ |
| ३ | विनय पत्रिका | ... ८१ |
| ४ | ध्वनि इमन (समय ८ बजे | |
| रात्रि) | ... ८५ | |
| ५ | बेधताल त्योरा (स० १० बजे | |
| रात) | ... ८६ |
( १८ )
शब्दावली—
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ६ | गौड मिश्रित देश | ... ८७ |
| ७ | सोरठ (समय १२ बजे रात) | ... ८९ |
| ८ | बिहाग (समय २ बजे रात) | ... ९० |
| ९ | कालिंगडा (समय ४ बजे रात) | ... ९० |
| १० | प्रभातो (समय प्रातःकाल) | ... ९१ |
| ११ | सैरबो (समय सुव्योदय) | ... ९८ |
| १२ | रागिनी आसावरी (समय १० बजे दिन) | ... १०० |
| १३ | ध्वनि पिलू (समय ३-३।। बजे दिन) | ... १०४ |
| १४ | प्रातः संध्या साखी | ... १०५ |
| १५ | प्रभातो स्तुति | ... १०७ |
| १६ | कबीर भानु उदय सर्वया | ... १०८ |
| १७ | सत्य कबीर का सत्य और मनराजाके झूठका युद्ध. | ... १०९ |
| १८ | मध्याह्न संध्या साखी | ... ११२ |
| १९ | मध्याह्न दिनकी स्तुति | ... ११४ |
| २० | माध्याह्न सर्वया | ... ११६ |
| २१ | छोटी एकोत्तर नित्य पाठकी | ... १२० |
| २२ | गुरु शतकसार नाम स्तोत्र * | ... १२१ |
| २३ | स्तोत्र (कबीर कृपालं) | ... १२२ |
| २४ | संस्कृत स्तोत्र ३- | |
| पृष्ठ १२६ तक | ... १२२ | |
| २५ | स्तोत्र (भो कबीर हरन पौर) | ... १२७ |
| २६ | कबीर चालीसा | ... १२७ |
| २७ | अर्जौ नामा (कतरहौ पुकार) | ... १३१ |
| २८ | अर्जौ नामा (सतगुरु मिहरबान) | ... १३३ |
| २९ | विनय अष्टपदी प्रभुजी तुम बिन (* पृष्ठ ४१) | ... १३७ |
| ३० | दशाष्टक स्तोत्र (नमामि सर्वं सन्त) | ... १३७ |
| ३१ | स्तोत्र दशक (नमस्कार बारबार) | ... १४० |
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३२ | स्तोत्र (जय जयदीनदयाल कृपालहितं) | ... १४१ |
| ३३ | ,, (जय जय भवतारन अन्न-निवारन) | ... १४२ |
| ३४ | अष्टक (भो कबीर हरन पौर) | ... १४३ |
| ३५ | स्तोत्र संस्कृत छन्द शिखरनी | ... १४३ |
| ३६ | नाराध छन्द स्तोत्र (नमामि सर्वं लायकम्) | ... १४४ |
| ३७ | स्तोत्र (कृपालं चित्त नंदनम्) | ... १४५ |
| ३८ | स्तोत्र छन्द तोटक (परमं सदयं भवतापहरं) | ... १४५ |
| ३९ | संस्कृत स्तोत्र अष्टक | ... १४६ |
| ४० | कबीरसा ब्राह्म्यस्तोत्र | ... १४७ |
| ४१ | गुरु स्तुति संस्कृत | ... १४९ |
| ४२ | स्तोत्र सर्वया कवित्त | ... १५० |
| ४३ | कबीर पंचाशिका | ... १५१ |
| ४४ | गुरुस्तोत्र (कबीरमहिमा) | ... १५६ |
| ४५ | कबीरनाम महात्म्य (कबीर-कोत्तरशत भाषा कवित्त) | ... १६० |
| ४६ | विनय रत्नावली प्रारम्भः (स्वामी श्रीपरमानन्दजी विरचित) | ... १८५ |
| ४७ | अर्जौनामा (महंत बीज-कवासजीका) | ... १८९ |
| ४८ | स्फुट विनयके छन्द कवित्त इत्यादि | ... १९२ |
| ४९ | विनयशब्दावली (श्री पूर्ण साहब छत) १९४ से २०७ | |
| ५० | आराधना गद्यमय स्वाधी-श्रीयुगलानंदविहारी २०७ से २११ | |
| ५१ | गुरु सहस्र नाम संस्कृत | २१२ से २१७ |
| ५२ | नाम लीला | २१८ से २२० |
| ५३ | धर्मदासजी विरचित किन्ती २२० से २२९ |
अनुक्रमणिका ।
(१९)
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ५४ | स्तोत्र फुटकर उर्दू हिन्दी- | |
| गजल शेर कवित्त साखी | ||
| आदि कवीश्वरोंके वचन ... | २२९ | |
| ५५ | सद्गुरुको महिमा साखियाँ २५९ से २७६ | |
| ५६ | गजल कम्वाली प्रार्थना ... | २७६ |
| ५७ | गुरु स्तुति संस्कृत ... | २७७ |
| ५८ | दूसरे खण्ड की समाप्ति ... | २७७ |
| तीसरा खण्ड । | ||
| ८ | अध्यात्म साधन (चौका | |
| विधान) ... | ||
| गुरु पूजा प्रकरण (संगला- | ||
| चरण) 1: ... | २७८ | |
| २ | उछाह मंगल (पधरावनीके | |
| शब्द) ... | २७८ | |
| १ | छत्तीसगढ़ी चौका विधानके | |
| पद X ... | २८१ | |
| २ | व्यंजनभोगका शब्द ... | २८१ |
| ३ | शब्द ध्वन ... | २८२ |
| ४ | ,, गारी ... | २८२ |
| ५ | ,, अचवन ... | २८३ |
| ६ | ,, विजना ... | २८३ |
| ७ | ,, भोगकी आरती ... | २८४ |
| ८ | चौकाकी रमैनी ... | २८४ |
| ९ | चौकाके पद ... | २८६ |
| १० | पद डोरी ... | २८९ |
| ११ | चौपड ... | २९१ |
| १२ | चौकाकी आरती और मंगल | |
| बन जा दिन ... | २९२ | |
| १३ | नारियलका शब्द (मोरहु | |
| नरियर मोरहु हो) ... | २९३ | |
| १४ | भोगका शब्द (सत पुरुषको | |
| भोग लागे) ... | २९३ | |
| १५ | तिनका का शब्द (जमुनियाको | |
| डार) ... | २९४ |
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| १६ | शब्द कंठीका (पाया निज- | |
| नाथ गलेको हुरबा) ... | २९४ | |
| १७ | शब्द नामका (गुरु पंड्या | |
| लागो नाथ लखावदीजे | ||
| हो) ... | २९४ | |
| १८ | शब्द दोहल प्रारम्भ, | |
| दोहल ... | २९५ | |
| १९ | आरती दर्शन जिसमें २५ | |
| आरती हैं ... | ३०७ | |
| आवश्यक कितापि (चौका विधानके | ||
| दूसरे भागके विषयमें इसमें | ||
| रोसडा स्थानका संक्षिप्त | ||
| वर्णन है 1) ... | ३१५ | |
| अध्यात्म साधन गुरु पूजा प्रकरण | ||
| दूसरा भाग “आनंदी चौका” | ३२१ | |
| ९ | पूर्व बिहारादि प्रदेशोंमें प्रच- | |
| लित चौकाविधान प्रारम्भ X ... | ३२१ | |
| १ | रमैनी ८ ... | ३२१ |
| २ | शब्द नारियर (वनजारिन) ... | ३२४ |
| ३ | आरती चौकाकी ... | ३२५ |
| ४ | शब्द भोग (सतपुरुष भोग | |
| लागे) ... | ३२६ | |
| ५ | शब्द तिनका ... | ३२७ |
| ६ | शब्द नाम लखावन ... | ३२७ |
| ७ | शब्द कंठी ... | ३२८ |
| ८ | शब्द उपदेश (घन सतगुरु जिन | |
| दियो उपदेश) ... | ३२८ | |
| ९ | शब्द अजी (समुन्नति गहो मोरि | |
| वाहीं) ... | ३२९ | |
| १० | पान परवानाका शब्द ... | ३३० |
X इस हेंडिगमें पृष्ठ २८१ पर “चौका विधान के पद” के बदले “चौकी विधानकी पद” छप गया है सो पाठक सुधार लेंगे ।
(२०)
शब्दावली—
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| चलावा चौका प्रारम्भः । | ||
| १ | मंगल (सतगुरु हंस उवारन जगमे आइया) . . . | ३३० |
| २ | दीहल प्रारम्भः (१) . . . | ३३१ |
| ३ | शब्द नारियर . . . | ३३५ |
| ४ | डोरी पदप्रारम्भः (चलावा चौका का) . . . | ३३६ |
| ५ | शब्द व्यंजन भोग (३२६ *) . . . | ३४० |
| ६ | अचवन (*सेवक लिये प्रेमजल झारो ३२८) . . . | ३४१ |
| ७ | शब्द धुन (*३२६) . . . | ३४२ |
| ८ | गारी प्रारम्भ (३२७) . . . | ३४३ |
| १० | लम्बेब चौका(मे गाने योग्य नाना प्रकारके राग रागनियोंके शब्द पढ़ादि) . . . | ३५० |
| ११ | चौका आरती महात्म्य . . . | ३८२ |
| १२ | कबोरपंथके धार्मिक सामान्य ११ नियम . . . | ३९६ |
| तीसरे खण्डके विषयमें सूचना . . . | ३९७ | |
| १३ | मूल रमनी अर्थात् शब्द कुंजी . . . | ३९८ |
| १४ | आदि वाणीका शब्द . . . | ४१० |
| १५ | कडिहार भेदका शब्द . . . | ४११ |
चौथा खण्ड प्रारम्भः ।
| १६ | सत्य कबोरकी आगमवाणी . . . | ४१२ |
|---|---|---|
| १७ | राम परखकी रमनी . . . | ४१३ |
| १८ | निरख प्रबोधकी रमनी १ . . . | ४१४ |
| १९ | शब्द पारखकी रमनी (सिगी शब्द) . . . | ४१६ |
| २० | सर्वांग बत्तीसी रमनी . . . | ४१८ |
| २१ | रमनी सोलह तिथिकी . . . | ४२२ |
| २२ | रमनी अक्षरखण्डकी . . . | ४२३ |
| २३ | रमनी प्रेम अछरकी . . . | ४२४ |
| २४ | रहनी गहनी . . . | ४२५ |
| २५ | यम जाल . . . | ४२५ |
| २६ | सांचा कडिहार . . . | ४२५ |
| २७ | सत्य नाम . . . | ४२६ |
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| २८ | रहनी पहचान . . . | ४२७ |
| २९ | अष्टाङ्गयोगकी रमनी . . . | ४२७ |
| १ | अविगत योग . . . | ४२७ |
| २ | कर्म योग . . . | ४२८ |
| ३ | सत्कर्म योग . . . | ४२८ |
| ४ | सांख्य योग . . . | ४२८ |
| ५ | ज्ञान योग १ . . . | ४२९ |
| ६ | विचार योग २ . . . | ४२९ |
| ७ | विवेक योग ३ . . . | ४३० |
| ८ | शीलयोग ४ . . . | ४३० |
| ९ | संतोष योग ५ . . . | ४३० |
| १० | निर्वे' योग ६ . . . | ४३१ |
| ११ | सहज योग ७ . . . | ४३२ |
| १२ | शून्य योग ८ . . . | ४३२ |
| १३ | अष्टाङ्ग योगका सार . . . | ४३३ |
| १ | ज्ञान परीक्षा . . . | ४३३ |
| २ | विचार परीक्षा . . . | ४३३ |
| ३ | विवेक परीक्षा . . . | ४३३ |
| ४ | शील परीक्षा . . . | ४३४ |
| ५ | संतोष परीक्षा . . . | ४३४ |
| ६ | निर्वे' परीक्षा . . . | ४३४ |
| ७ | सहज परीक्षा . . . | ४३५ |
| ८ | शून्य परीक्षा . . . | ४३५ |
| ३० | करीमकी हिकमत . . . | ४३६ |
| ३१ | काया मजिद . . . | ४३६ |
| ३२ | रमनी मन (१) . . . | ४३६ |
| मनराजा (२) . . . | ४३७ | |
| ३३ | रमनी कथता वकता (१) . . . | ४३७ |
| बोलना (२) . . . | ४३८ | |
| ३४ | रमनी सात गुहकी . . . | ४३८ |
| ३५ | निर्बान देसकी . . . | ४३८ |
| ३६ | गुहकी (१) . . . | ४३९ |
| विरह वार्ताकी . . . | ४३९ | |
| गुरुटंककी (२) . . . | ४४० | |
| गुरु महिमाकी (३) . . . | ४४० | |
| ३७ | जुलाहाकी . . . | ४४१ |
| ३८ | स्वरूप महिमाकी . . . | ४४१ |
अनुक्रमणिका ।
( २१ )
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ३९ | कालजीतकी | ४४२ |
| ४० | रमैनी निर्बान पदकी | ४४२ |
| ४१ | स्वरूप पहिचानकी | ४४३ |
| ४२ | रमैनी निर्बान एकतारकी | ४४३ |
| ४३ | ज्ञान विरहकी | ४४४ |
| ४४ | घट दर्शनकी | ४४४ |
| ४५ | योग योगकी | ४४५ |
| ४६ | आदि रमैनी | ४४५ |
| ४७ | एक ओंकारकी | ४४६ |
| गुरु महिमा (४) | ४४६ | |
| ४८ | रमैनी गृही रहनीकी | ४४७ |
| ४९ | रमैनी बेरागी (साधु) रहनी की | |
| रमैनी बेरागी गुरुशिष्य अधिकारी | ४४८ | |
| ५ | ४४९ | |
| ५० | रमैनी बेरागी कर्मखण्डकी | ४४९ से ४५४ |
| ५१ | पंच देह निर्णय | |
| निरख पत्रोद्यकी रमैनी २ | ४५४ से ४६० | |
| निरख प्रबोध (३) | ४५९ | |
| ५२ | बीजककी रमैनी ८४ | |
| निरख प्राबोधकी रमैनी ४-१० तक | ४६१ | |
| ४८९ से ४९५ | ||
| ५३ | ज्ञान चौतीसा (केता कह कबीर १) | |
| ज्ञान चौतीसा (काया कुंजकरमकी | ||
| बारो २) | ४९६ से ५०० | |
| ज्ञान चौतीसा चौतीसा बीजककी | ५०० | |
| ३ | ५०९ | |
| ५४ | विप्रमतीसी (बीजककी) | ५१२ |
| ५५ | कहुरा (बीजकका) | ५१३ |
| ५६ | चाँचर | ५१९ |
| ५७ | बेलि | ५२१ |
| ५८ | विरहुली | ५२२ |
| ५९ | हिंडोला | ५२३ |
| नंबर | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|
| गुरु महिमाकी रमैनी १८ (६) | ||
| ५२४ से ५३५ | ||
| गुरु उपदेश महिला (७) ... ५३५ | ||
| (३२) | शब्दावली-अनुक्रमणिका समाप्त . | |
| शिष्यकी अधीनता (८) ... ५३७ | ||
| गुरुसेवा महात्म्य (९) ... ५३७ | ||
| गुरु भावना (१०) ... ५३७ | ||
| गुरु चरणोदक महात्म्य (११) ५३८ | ||
| ६० | ज्ञानदीपककी रमैनी ५३९ से ६३५ | |
| ६१ | तत्त्व दर्शन साखियाँ (पंचीकरण) | |
| ६४० से ६५० |
खण्ड पाँचवा प्रारम्भ ।
| ६२ | १ वसंत प्रारम्भ (७०) ६५१ से ६७७ |
|---|---|
| २ होरी प्रारम्भ: (४९) ६७८ से ७०० | |
| ३ फाल प्रारम्भ: (४) ... ७०० | |
| ४ धमार प्रारम्भ: (२७) ७०२ से ७१४ | |
| ६३ | चाँचर ... ७१४ |
| ६४ | कहुरा प्रारम्भ: (३६) ७१५ से ७२८ |
| ६५ | गौरी प्रारम्भ: (५०) ७२८ से ७४३ |
| ६६ | राग कल्याण (१५) ७४४ से ७४८ |
| ६७ | राग कान्हुरा (२५) ७४९ से ७५६ |
| ६८ | राग काफो (१६) ७५६ से ७६१ |
| ६९ | मंगल (१०) ७६१ से ७६५ |
| ७० | तीसा मंत्र (३०) ७६५ से ७६९ |
छठा खण्ड प्रारम्भ: ।
| ७१ | शब्द प्रारम्भ: (३८८) पृ. ७७० से ८९८ |
|---|---|
| ७२ | शब्द बीजक ११५ ८९८ से ९३२ |
| ७३ | भेदवाणी ... ९३३ |
| ७४ | गजल कल्याली ... ९३७ |
| ७५ | सुवाबतीसी (सम्याभगवतीदास |
| विरचित) ... ९३९ | |
| ७६ | शब्दार्थ चिन्तामणि कोष ... ९४४ |
इति श्रीकबीरपंथी शब्दावलीकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका समाप्त शुभम् ।
सत्यनाम ।
ध्यान देकर पढो ।
कबीर पंथियो !
उठो ! जागो ! और चेतो यह समय तुम्हारे पंथके लिये बड़ा कठिन आया हुआ है । इस समय तुम्हारे पंथकी दशा डावांडोल हो रही है । तुम्हारे वचन वंश गद्दीके विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है । नाद वंशकी गद्दी स्थापित होने पर भी, धर्म ग्रन्थोंको भली प्रकार नहीं जाननेके कारण, सेवक सती, साधु संत, महंत और गुसाई सब कल्पनाकी हवाई जहाजमें उड़ते फिरते हैं । किसीको भी स्थिरता नहीं मिलती है । सेवकोंमें जो माननीय हैं वह अपनीही चलाना चाहते हैं, भेष उनकी दृष्टिमें निर्मल्य जैसे दीख पड़ती है; भेषों में कुसम्प होनेके कारणसे उनका बल दबसा गया है । अपने सत्य सिद्धान्तको दृढ़तासे पकड़कर चलानेके बदले, नाना मति और भिन्न २ विचारके कारण, मनमतके जालमें फँस गये हैं जिसके मन में जो आता है उसी को वह सिद्धान्त समझकर, सत्यगुरुमत का अनादर कर रहा है । यह सब क्यों हो रहा है ? केवल सद्गुरु कबीरकी वाणियों और कबीरपंथके ग्रन्थोंपर ध्यान नहीं देनेसे । अब अपना समय व्यर्थ पक्षपातमें पड़कर नष्ट मत करो—क्योंकि, सद्गुरु कबीरका वचन है ।
“पछापछीके कारने, सब जग गया भुलान ।
निर्पच्छ होइके हरिभजे, सोई संत सुजान ॥”
इसलिये मिथ्या पक्षपातको छोड़कर सत्य गुरु कबीरके शब्दोंके आश्रय अपना कल्याण दूँढो—क्योंकि.
“गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय ।
ताको काल घसीटिहै, राखि सकै नहिं कोय ॥”
इसी, लिये आगम संदेशमें, सद्गुरु कबीरने कहा है—
“शब्दहिं गहे सो पंथ चलावे ।
विना शब्द नहिं मारग पावे ॥”
देखो इस समय कबीरपंथी मात्र कबीर की वाणी वचन और शब्दोंको छोड़कर अपना पंथ खो बैठे हैं—क्योंकि, —जब आगम वाणीमें कहा है —
“तेरहैं पीढी ज्ञान रजधानी, चूरासरन औतारा हो ।
उनके अंग छाया नहिं होई, देह विदेह अपारा हो ॥
उनके आगे जोग मत चलिहैं, राजनीति उठजाई हो ॥
पांचस्वादकी इच्छा नाहीं, सो मति सब उन आई हो”
२३
देखो इस वाणीमें स्पष्ट लिखा है—तेरहें पीढीके समाप्त होनेपर—ज्ञानका दौरा आयेगा और चूरासनका औतार होगा—उस चूरासनके अंगमें छाया नहीं होगी क्योंकि, उसकी देह विदेह होगी ।
आगम संदेशमें “चूरासन” का भाव यों दर्शाया है—“परगटे वचन चूरासन अंसू । शब्दरूप सब जगत प्रसंसू ॥ शब्दे पुरुष शब्दे गुरुराई । विना शब्द नहिं जिव मुक्ताई ॥ जाते जीव मुक्त हो भाई । मुक्तात्मन सोइ नाम कहाई ॥”
इस समय शब्दकी ओर ध्यान न देने वाले और अपने अपने मनपरही चलने वाले, प्रायः सेवक सती संत महंतों की मानता होरही है कि, चूरासन कोई देह धारी पुरुष प्रकट होकर पंथ चलायेगा । इसी कल्पना और संशयमें डोला खाते हुए अधिकांश लोग कबीर पंथसे वेपंथ जाकर, कालके फन्देमें पड़कर, अपना किया कराया सब नष्ट कर रहे हैं । उन्हें इतनी समझ नहीं है कि, वचन चूरासन कोई देहधारी पुरुष नहीं है । वह तो कबीर, सद्गुरु कबीरका ज्ञान विचार और वाणी-है । ऊपरके वचनमें स्पष्ट कहा है—“शब्दरूप सब जगत प्रसंसू” प्रत्यक्ष देखो—कबीरकी वाणीका संसार भरमें कितना आदर है और तो और संसारभर को काफिर कहने वाले मुसलमान भी कबीरके साखी शब्द और वाणी वचन को मुश्दिद बरहक्क (सद्गुरु) की वाणी कहकर मानते और आदर देते हैं । आर्थ्य समाजियों को ही ले लो, उन्हें, स्वामीदयानन्दकी उटपटांग अर्थहीन लिखी बातों को भुलाकर, कबीर की वाणी और सिद्धान्तको झखमारके आदर देना पड़ता है वर्तमान के आर्थ्य समाजियोंके ग्रन्थोंमें तुम्हें प्रायः कबीरकी वाणीके प्रमाण मिलेंगे—
कितने ऐसे कबीरपंथी हैं जो फिरसे पिछले राज्यकी स्थापना करना चाहते हैं । उनको इतनी स्पष्ट बात भी नहीं समझ पड़ती है कि, जब स्वतः कबीर मुख वचन है कि, तेरहों पीढीके पश्चात् उसीके अमलमें, राजनीति उठजायगी और ज्ञान राजधानी चलेगी, तब भी वे राज्य स्थापना करनेके लिये—वर्तमान राज्य शासनका आश्रय लेकर अपना मन माना करना चाहते हैं । इसका परिणाम यही है कि, कबीर वचनके अनुसार स्थापना तो ज्ञानकी ही होगी और उस ज्ञानको प्रगट करनेवाले कबीरके वे शब्द जो मनको चुरा करके सत्यपंथमें लगावेंगे
२४
उसी चूराभनका प्रकाश अब विशेष होगा। किन्तु काल निरञ्जनके वहकावटमें पड़े मिथ्या मान गुमानको लिये, वे भूले हुए जीव, भ्रमके आश्रय. सन्तमहंत भेष और कबीर धर्मदासके विरुद्ध, अपना राज्य स्थापित करनेमें लगे हैं और राज-कचहरियोंमें मारे मारे फिरते हैं। उनको न तो अपनी समझ है, न किसी जानकार का वचन सुनना चाहते हैं कि, यह सब कालकी बाजी है, इससे सत्य धर्मका कोई सरोकार नहीं है। कबीर प्रत्यक्ष रूपसे कहते हैं—
“राजद्वार जावे नहि कबहीं। कैसो कष्ट आवे पुनि जबहीं ॥ महिमा वंश तबै मिटजाई। राजद्वारे द्रव्य लुटाई ॥ होवे वैर नगरमेंभारी। कलिजुग राज करे सुख छारी ॥ कलिजुग होय मलेच्छ सो राजा। जो बिगरे तो होय अकाजा ॥”
इसका प्रत्यक्ष प्रमाण, कबीर कॉसिल और उसके संचालकोंका परस्पर का झगडा है।
कहांतक कहाजाय मनमतका पार नहीं है। इस मनमतके वश पडकर लोभ वश कितने साधु संत महंत नामधारी जीव भी, उसी घसीटनमें पडकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं।
इसी लिये हे प्यारे सत्य धर्मके खोजी कबीरपंथियो! मिथ्या अभिमान और मनमतको त्यागकर, कबीर धर्मदासके ग्रन्थ और वाणीका विचार करके, वर्तमानके उलझनोंको सुलझाओ और अपना अमूल्य जीवन सफल करो—
श्री वेंकटेश्वर और लक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेसने आपहीके पंथकी रक्षाके लिये कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन किया है।
मंगला वरण ।
यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।
तं कवीरमहं वन्दे मनोवाक्कायकर्मभिः ।
सत्सुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुरुष
मुनीन्द्र करुणामय कवीर सुरतयोग
संतायन धनी धर्मदासकी दया
सर्व संत महंतोंकी दया—
अथ शब्दावलीकी उत्थानिका—
सद्गुरु कवीरने संसारी जीवोंके चितानेके लिये अनंत शब्दोंका प्रकाश करके, भवसागरसे पार करनेका प्रशस्त मार्ग तय्यार कर दिया है। तथापि बलि-हारी है, कालभगवानकी कि, अपना राज्य बना रखनेके लिये सत्यमें भी असत्यकी मिलौनी कर कुछ का कुछ कर दिखाता है ।
जहां सद्गुरुका वचन है कि—
पच्छा पच्छी कारने, सब जग गया भुलान ।
निर्पछ होइके हरिभजे, सोई सन्त सुजान ॥
वहां सद्गुरुका नाम रखकर कालने सत्यशब्दमें इतनी मिलौनी करदी है कि, संसारी जीवोंको निर्पक्ष वाणीकी पहचान ही नहीं होती, उलटा वे कालकी वाणीको ही सिद्धान्त वाणी समझकर उन्हींमें भूलकर साम्प्रदायिक गर्तमें गिर पड़े हैं और जबतक सद्गुरुके बताये संकेतके अनुसार सत्यशब्दको जाननेका प्रयत्न नहीं किया जायगा तबतक वे भवसागरमें गोता खातेही रहेंगे ।
सद्गुरु कालवाणीसे सत्यवाणीको अलग करनेकी कैसी सरल युक्ति बता रहे हैं ।
अनबनि वानी चार प्रकार । काल सन्धि झाई औ सार ॥
अब इनकी पहचान बतलाते हैं —
कालशब्द ।
अक्षर पूजा सेवा जाप । और महात्म जेतें थाप ॥
यही कहावत अक्षर काल । जाय गडी उर होयके भाल ॥
(२६)
[ शब्दावली—
सन्धिशब्द ।
ओहं सोहं आतमाराम । भाया मंत्रादिक सब काम ॥ यहि सब अक्षर संधिक कहै । जेहिमा निशिवासर जिव रहे ॥
झाईशब्द ।
निर्गुण अलख अकह निरवान । मन बुधि इन्द्रीय जाय न जान ॥ विधिनिशोध जहैं बनत न दोय । कह कबीरपद झाई सोय ॥
— इनमेंसे —
भरमिक संधि झाई औ काल । सारशब्द काटे भ्रमजाल ॥
— इस लिये —
परे जीब तेहि जमकी धार । जौलौं पावे शब्द न सार ॥
— इसहेतु —
जीब दुसह दुख देखि दयाल । तब प्रेरी प्रभु परख रिसाल ॥
शब्दकुंजी.
विशेष जाननेके लिये इसी ग्रन्थमें छपे हुए शब्द कुंजी (अथवाभूलरमैनी जिसको बहुधा लोग सताइस रमैनी भी कहते हैं—) को गुरुमुख द्वारा विचारना चाहिये । क्योंकि.
बंद उर्दधि बिनु गुरु लखे, लागत लौन सखान ।
बाबर गुरुमुख द्वार ह्वै, अमृत सूं अधिकान ॥
आजकल छापा होने और ग्रन्थोंके सहजमें मिलनेके कारण और स्कूलोंकी बाहुल्यतासे, लोग अक्षर पढ़ना सीखकर ग्रन्थोंको आपही आप पढ़कर, बिना समझे बूझे ही स्वतः गुरु बन बैठें हैं । इसीलिये जहां देखिये वहां नास्तिकताका प्रचार होकर प्रायः सब पंथ और सम्प्रदायवाले, भवसागरमें उबड़ुब कर रहे हैं ।
यथार्थ भावको समझे विनाही, मिथ्या पक्ष धारण कर लोग मनमती बन गये हैं; उनको इतनी समझ ही नहीं है कि, पक्षपातके सिवाय भवसागर दूसरा है ही नहीं ।
पक्षहि भवकर जानिये, दूसर भव है नाहि ।
जन्म भरण सुख दुख सुभाव, तिन्हें अभावहि काहि ॥
कबीरके नाम, उनके नामसे वाणीका प्रचार भारतके कोने कोने पाया जाता है । यह नहीं कि, बहुत दिन बीतने अथवा वर्तमान कालके रेल डाक और प्रेसके सुभीता के कारण इसका प्रचार हो गया हो, बरन कबीरकी वाणीका प्रभाव ही ऐसा है कबीरका उपदेशही ऐसा सार्वजनिक और निर्पक्ष था कि, उनके वर्तमान रहते ही,
उत्थानिका]
(२७)
साखी और शब्दोंका इतना प्रचार हो गया था कि, मारवाड और गुजरात आदि देशोंमें, उसी समय पद और वाणियों तथा साखियोंका संग्रह कर लोगोंने ग्रन्थरूप में बना लिया था.
थोडे दिन हुए हैं ऐसाही एक ग्रन्थ, रायबहादुर बाबू श्याम सुन्दर दासजीने नागरी प्रचारिणी सभाकी ओरसे छपाकर प्रकाशित कराया है—जिसका नाम कवीर ग्रन्थावली रखा है—बाबू साहबकी सम्मतिसे वह ग्रन्थ कवीर साहबके मगहरमें गुप्त होनेकी लीलाके पश्चात् केवल पचास वर्षकाही है. यद्यपि बाबू साहबकी दृष्टिमें उस समय कवीर साहबका अवसान हो गया था तथापि कवीर-पंथी और अन्यलेखकोंके प्रमाण से—कवीर साहबने मगहरमें अन्तिम लीला करके भी शरीर नहीं छोड़ा था. यों तो जब आप अपनेको शब्दरूपही कहते हैं तब आपके शरीर छोड़नेकी बात ही क्या है.
क्योंकि,
पांच तत्त्वसे है नहीं, स्वासा नाहि शरीर ।
अस अहार करता नहीं, ताका नाम कबीर ॥
तथापि अपने हिन्दू मुसलमान शिष्योंकी परीक्षा करनेके लिये, आपने मगहर में लीला दिखाई थी और शिष्योंको जो उपदेश देना चाहा सो दे चुकनेपर तत्कालही आप उसी शरीरसे मथुरामें प्रकट हुए और वहांसे अमर कंटक आदि स्थानोंमें अपना अमर चिह्न छोड़ते हुए चांधोगढ़ पहुँचे और धर्मदासजीको उपदेश दे जगन्नाथकी ओर चले गये ।
इससे यह सिद्ध होता है कि, बाबू साहबने जो ग्रन्थ छपवाया है वह जिस सम्बतका लिखा हुआ है उस समयमें कबीर साहब उसी काशीवाले शरीरसेही वर्तमान थे और कवीर साहबके इतने निकट समय या वर्तमानमें ही ग्रन्थ लिखे जानेके कारण, बाबू साहब कवीर साहबकी वाणीकी भाषाको भी वैसी ही समझते हैं जैसी उस ग्रन्थमें लिखी है और इसी दृष्टिसे आपने उसे वैसीही छपवाया है ।
किन्तु यह किसीसे छिपी नहीं है कि, कवीर साहब अपना केंद्र काशी ही बनाकर वहांही प्रकट हुए और वहांकीही प्रचलित हिन्दी भाषामें आपने वाणीका भी प्रकाश किया था. तथापि मारवाड देशमें जाकर वाणी मारवाडी मिश्रित क्यों हो गयी ? इसका कारण यह हो सकता है :-
(१) कबीर साहबका उपदेश इतना सर्व प्रिय था कि, आपके वर्तमान रहतेही देश देशान्तरोंके लोग, उपदेश और वाणी सुनकर लिख लेते और बड़े प्रेम से रखते थे और अपने स्वाभाविक उच्चारणके अनुसार उसे गाते और बोलते
(२८)
[शब्दावली—
भी थे जिससे उसी उसी देशके उच्चारणके अनुसार लिखनेमें वाणीका रूपभी वैसाही बनता गया। जैसे आजकल भी गुजरात या महाराष्ट्र प्रान्तमें हिन्दी भाषा या हिन्दी भाषाकी कविताकी दशा है। और गुजराती या मराठीभाषावाले अपने स्वाभाविक उच्चारणके कारण विशेष नामोंको भी अपने उच्चारणके अनुसारही लिखते और बोलते हैं। दृष्टान्तके लिये संयुक्त प्रान्तके “मेरठको लिजिये आजकल प्रसिद्ध मेरठ कैंसके कारण वर्तमानपत्रोंमें मेरठका नाम बारम्बार आता है इतना प्रसिद्ध नामहोनेपर भी गुजराती पत्रवाले मेरठको “भीरत” ही लिखते हैं।
इसी प्रकारसे यदि कवीरसाहबकी वाणी उस समय मारवाड आदि देशोंमें जाकर मारवाडी आदि उच्चारणोंवाली होगयी हो तो कौन आश्चर्यकी बात है।
मैंने मारवाड, पञ्जाब, सिन्ध, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, बंगाल, आसाम, भूटान, नेपाल और बिहार आदि प्रान्तोंके भ्रमण कालमें देखा है, हिन्दीमें और शुद्ध हिन्दीभाषामें छपे हुए ग्रन्थोंको जिस जिस प्रान्तके लोग पढ़ते हैं, उस प्रान्तके टोन (स्वर) का प्रभाव उन ग्रन्थ और वाणियों पर ऐसा पड़ता है कि, सुननेवालोंको वह उसी देशकी भाषामें लिखा जान पड़ता है।
गत वर्ष जब मैं वंशधरकी गद्दीके सर्वमेष समस्त आचार्य श्री १०८ पं श्रीकाशी दास साहबजीके साथ तिरहुतके कतिपय स्थानोंमें भ्रमणको गया था, तब वहाँके भावुक सेवक सती और साधुओंके, प्रेम मग्न भजनकीरतन को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता और प्रभावका अनुभव करता था। किन्तु शुद्ध हिन्दी भाषामें छपे हुए शब्दोंको भी जब वे गाने लगते थे तब, उनका उच्चारण ठीक तिरहुतिया भाषाके समान सुन पड़ता था, इतनेही नहीं शब्दोंके क्रियापद आदिको भी वे अपने प्रांतिक रूपमें बदलकर बोलते थे कारण मात्र यही है कि, वे थोड़े पढ़े लिखे लोग अपने स्वभाव और आदत तथा प्रेमके वश होकर शुद्ध अशुद्धिका विचार किये बिनाही प्रेममें मग्न होकर भजनमें लीन होते और लिखते भी हैं।
इसी प्रकार मारवाड और पंजाबवाले पानीको पाणी आदि उच्चारणके अभ्यासके कारण शब्दोंको अपने प्रांतिक टोनमें बदल लेते हैं। गुजराती और काठियावाड वालों का कहनाही क्या, जिस समय वे तम्बूरा और मजीरेकी गगन भेदी झंकारमें मस्त होते हैं—“कहत कवीरा सुनोभाई साधो” के गानमें ऐसे
उत्थानिका । ]
(२९)
लीन होजाते हैं कि, जो कुछ वह गाते हैं चाहे वह किसी भाषाका हो सब उन्हें काठियावाडी या गुजरातीही जान पडती है ।
इसी प्रकार दक्षिणी मराठी भाषाभाषी जिस समय “कबीरांचे दोहरे” और पदे” की हांक लगाते हैं, उस समय कबीर उन्हें खास मराठी भाषाभाषीही जान पडते हैं, और कबीरके शब्दोंका उच्चारण ठीक मराठी जैसा जान पडता है, इसी प्रकार महाराष्ट्रके पढे लिखे लोग भी जब कभी अपने ग्रन्थ या भाषण आदिमें कबीरकी साखी आदि कोट करते हैं वहाँ उसमें इतना मराठीपन आजाता है कि, फिर उसे हिन्दीभाषाभाषी कबीरकी वाणी कहनेसे हिचकते हैं इत्यादि । ( २ ) यदि उपर्युक्त विवेचनके विरुद्ध कोई ऐसा समझता हो कि, कबीर जिस जिस देशमें गये, उस उस देशकी भाषामें ही, उन्होंने वहाँके लोगोंको उपदेश दिया, तो यह बात भी उनका महत्त्वही प्रकट करती है—
किन्तु मेरा निश्चय है कि, कबीरसाहबने जो कुछ कहा है वह सब उससमय की प्रचलित हिन्दीमेंही कहा है
इसी विचारको लेकर मैंने भारतके अनेक प्रान्तोंमें घूमकर सहस्रों कबीर-पंथी ग्रन्थोंका संग्रह किया है—जिसमें एकही नामके ग्रन्थकी भिन्न भिन्न प्रान्तोंमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। अब जब मैं उनका मिलान करने बैठता हूँ तब वाणी एक होनेपरभी लिखावट और उच्चारणमें बहुत अन्तर जान पडता है और जिस समय उस उस प्रान्तके लोग अपने अपने प्रान्तके लिखे ग्रन्थोंको पढ़ते हैं, उस समय सुननेसे औरही भाव अन्तःकरणमें उदय होता है ।
इस प्रकारके कई दृष्टान्त इस ग्रन्थके बीच बीचमें या अन्तमें लिखकर पाठकोंका मनोरंजन करूंगा,
लिखते लिखते मैं कहींका कहीं चला गया—इसलिये अब प्रकृत विषय पर आता हूँ ।
शब्दावली ।
यों तो—कबीरकी शब्दावली—कबीर साहबना भजन, कबीरांचे पदे और दोहरे आदि नामसे सैकड़ों पुस्तकें लाखोंकी संख्यामें हरसाल छपती और छोटे २ जंगली देहातों बाजारों और बड़े २ शहरोंतक बिकती रहती हैं और हिन्दू मुसलमान ईसाई इत्यादि सभी धर्मके लोगोंकी जवानपर कबीरकी साखी मसले वर्तमानही रहते हैं, किन्तु “शब्दावली” के नामसे बड़ी पुस्तक एकही छपी है—जिसकी दो आवृत्ति आजतक हो चुकी है ।
उस शब्दावलीमें केवल कबीर साहबही नहीं वरन बहुतसे लोगोंकी वाणीका
(३०)
[शब्दावली—
संग्रह है—जिसे कवरदहके एक वैरागीने संग्रह किया था और अपने हाथसे लिख लिखकर, वहां जानेवाले संत महंतोंके हाथसे बेचा करता था। यद्यपि वह उसकी कीमत लोगोंसे २०, २५, रुपया लिया करता था। तथापि पैसेवाले महंत संत लोग जो वहां जाते थे, वह अपने स्वार्थके मारे लेलिया करते थे। क्योंकि, महंतोंके सबसे अधिक स्वार्थ, चौका आरतीकी रमैनी आदि उसमें दियी हुई होती थी। इसी बातको दृष्टिमें रखकर ग्रन्थ लेनेवालोंको केवल स्वार्थलोलुप समझकर वह लिखने वालाभी पहले चौका आरतीकेही पद और रमैनी लिखता था। उसकी लेखन शैली और ग्रंथका प्रबन्ध देखकर तो जान पड़ता है कि, उसे भी इस ग्रन्थसे सिवाय द्रव्य प्राप्तिके दूसरा कोई सरोकारही नहीं था। इसी लिये उसने उस ग्रन्थका क्रम-बांधनेका प्रयत्न नहीं किया, वरन उसके उलटा जो कुछ उसे जहांसे मिला चाहे वह किसीका शब्द या पद भजन रहा हो “कहें कबीर” करके उसे लिख दिया।
जब तक वंशघरकी गद्दी कवैरदह रही तबतक तो उसका व्यापार चलता रहा किन्तु, वंशघरकी गद्दीके लिये विरोध चला और गद्दीका कारबार कवैर-दहसे कोदरमाल चला आया और वंशघरके सन्त महंतोंने उग्रनाम साहबको अपना आचार्य मान लिया, और लोगोंका कवरदह जाना आना छूट गया, तब उस शब्दावली लिखनेवालेका रोजगार मरा और सन्तमहंतोंको शब्दावलीका सहज में, २०, २५, खर्च करके भी मिलना बन्द हुआ। तब नये बननेवाले महंतोंको शब्दावलीकी आवश्यकता पड़नेपर न मिलनेसे अडचन पड़ने लगी, महंतोंके उस अडचन को उग्रनाम साहबने अनुभव किया और शब्दावलीको छपानेकी आवश्यकता समझी, किन्तु उस समय उनकी आर्थिक दशा ऐसी नहीं थी कि, वे इसमें अपनी ओरसे कुछ कर सकते, इसलिये उन्होंने इशारेसे उसी शब्दावलीकी एक कापी बम्बई पहुंची और विना शुद्ध या क्रमबद्धकिये ज्यों की त्यों छापदी गयी इतना भी विचार नहीं किया गया कि, किस विषयके शब्द पहले आने चाहिये और किस विषयके पीछे, इसमें कबीर साहबके शब्द कितने हैं और इतरोंके कितने, इन बातोंके विचार किये विनाही आंख मूंदकर ग्रन्थ छपकर तय्यार होगा, उसपर तुरां यह हुआ कि, ग्रन्थके मुख्यपत्र (टायटल) पर “महात्मा श्री कबीरजी साहब कृत” “अपूर्व ग्रन्थ” छपा गया।
इस बातको देखकर समझदार कबीर पंथियोंको बड़ा कष्ट हुआ क्योंकि, उक्त ग्रन्थमें कितने शब्द ऐसे हैं जो कबीर साहब तो क्या कबीरपंथियों के भी नहीं हैं। कितने शब्द ऐसे हैं कि, दूसरोंके होनेपर और उसमें कर्ताका नाम वर्तमान
उत्थानिका । ]
( ३१ )
रहनेपरभी अन्तमें कहँ कबीरका छाप लगाकर कबीर साहबको बदनाम किया गया है इत्यादि।
इसके पश्चात् ही श्रीउग्रनाम साहबकी इच्छा और इन्दौरके प्रसिद्ध विद्वान् महोपदेशक सदगुरु श्रीमहंत शम्भुदासजीके उत्साह और मेरे प्रयत्नसे सम्बत् १९६० वि. का कबीरपंथी महासंत समागम कोदरमालमें हुआ, जिसमें श्रीमहंत शम्भुदासजीकी सम्मतिसे अथाह परिश्रम करके मैंने भारत वर्षका दौरा कर सर्व देशोंके संत महंतोंको एकत्रित किया और वंशगद्दीके झगडेके कारण जो पार्टी बंध गयी थी उसे तुडवाकर, वंशघरके सर्व संतमहंतोंको एकही सूत्रमें बाँधनेके लिये सबमें उग्रनाम साहबकेही पंजेका प्रचार करवाया । इस कार्यके करनेमें यद्यपि मुझे अनन्त कष्ट और दुःख उठाना पडा, यहाँतक कि, अदालतोंमें भी घसीटा गया तथापि सदगुरु श्रीमहंत शम्भुदासजीके उत्साहसे, सब अडचनोंको दूर करके कार्य पूरा करकेही विश्राम लिया उस उक्त महा सभामें तीन लाखसे भी अधिक कबीर पंथी इकट्ठे हुए थे ।
महासभाके पश्चात् जब पं श्री० उग्रनाम साहबकी गद्दी दामा खेडामें स्थापित हुई, तब उन्हें स्वतंत्रता मिलनेमें निजधर्म और नामकी उन्नति करनेकी भी अभिलाषा उत्पन्न हुई । उन्हीं अभिलाषाओंमें “ग्रन्थ छापनेके” लिये प्रेस खोलनेकी भी एक अभिलाषा थी.
दामाखेडेमें प्रेस खुला और, अन्यकामोंके साथ शब्दावलीको छापनेकी भी चर्चा आरम्भ हुई, उस समय मैंने अपना मन्तव्य प्रकट करके चाहा कि, शब्दावली इस रूपमें छपाजाय कि, जिसमें दूसरोंको आक्षेप करनेका अवसर न मिले. किन्तु उग्रनाम दबू स्वभाव और उनके परिवारवालोंका द्वेष के कारण मेरी प्रत्येक बातोंके विरोध करने और प्रेसके मैनेजर दीवान हंसदासके रहनेके कारण, मेरा वश नहीं चला. ग्रन्थके सम्पादक बने बाबा साहब और छपानेवाले मैनेजर और प्रिंटर दीवान हंसदास ।
यहाँपर यह जता देना अनुचित न होगा कि, दामाखेडेमें प्रेस खोलनेमें प्रबल और मुख्य कारण मेराही प्रयत्न था किंतु उग्रनाम साहबके परिवार-वालोंको द्वेष और प्रायः खुशामदी लोगोंके कारण मुझे उससे अलगही रहना पडा और प्रेसके प्रुफोंको देख देनेके सिवाय मेरा उससे कोई संबन्ध नहीं रहा यहाँ तक कि, मैंने उसमें जो कुछ छपवाया सो भी मूल्य देकर.
(३२)
[ शब्दावली—
इस प्रकार ग्रन्थ छपना आरम्भ हुआ और लगभग आधे तक छप गया कि, दामाखेडेमें शादी विवाह आमद रफत उलट फेरकी तूफान चली और प्रेस बन्द हो गया। शादी विवाह हो गया बिछडे मिले खूब धमाचौकडी मची और उसीमें मुझे वहां से दामाखेडा हमेशेके लिये छोडना पडा। पश्चात् उग्रनाम साहबका देहान्त हुआ। राज्य पलटा और फ्रान्स जर्मनीकी लडाई शुरू हुई, देशमें सब प्रकारकी वस्तुएं महंगी हो गयीं, खास तौरसे प्रेसकी वस्तुओंकी कीमत चौगुनी हो गयी। उसी समय असली साठे उन्नीस हजारकी लागतका प्रेस जिसकी कीमत लडाईके समय, साठ सत्तर हजारसे कम नहीं थी, तीन चार हजार तक दाम मिलते हुए भी, केवल नौ सौमें एक मुसलमानको, दया नाम साहब और उनके निकट वतियों द्वारा दे दिया गया। शब्दावली लगभग आधा छपकर अधूरी रह गयी। कई वर्षोंके पश्चात् एक टेकधारी सज्जनने बम्बईवाली प्रतिके ऊपरसे छपे हुए फार्मोंको साथ लेकर उसी विके हुए प्रेसमें छपाकर बारह रुपया मूल्यसे प्रसिद्ध किया और मजा यह कि, आपने भी कवीर साहबके ऊपर कृपा करके उन्हें ग्रन्थकर्ता करके प्रसिद्ध किया “यजमान जावे नर्कमें या स्वर्गमें पुरोहितको तो हलुए मांडेसे गर्ज” के अनुसार—कवीरके नाम पर धब्बा आता हो या कुछ हमें तो नाम और रुपया चाहिये।
इन्हीं बातोंको देखकर कतिपय स्वधर्मी और इतर सज्जनोंके अनुरोधसे मुझे ग्रन्थ प्रकाशनकी ओर लौटना और जन्म भरके परिश्रम स्वरूप हजारों कवीरपंथी ग्रन्थोंमेंसे जहां तक छप सके उनके छपवानेके प्रयत्नके लिये फिर बम्बई आना पडा है।
प्रथमवार बम्बई छोडते समय, हस्त लिखित और छपे ग्रन्थोंकी कई पेटियां बम्बईमेंही छोड गया था किन्तु, १०।१२ वर्षतक उनकी खोज खबर न लेनेके कारण वे सब दीमकके गालमें चले गये। उन पेटियोंमें हाथके लिखे कितने ग्रन्थ थे—केवल शब्दावलीकेही भिन्न भिन्न स्थानों और ग्रान्तोंकी लिखी हुई १५-२० प्रतियां थीं। ऐसी दशामें संतोष करके कलेजा मसोसके रहना पडा है।
इतना होनेपर भी शब्दावलीकी २०।२५ प्रति मेरे पास इस समय भी उपस्थित है। जिनमेंसे ५।७ प्रतियां तो इन्दौर उज्जैन मारवाड कानपुर आदि स्थानोंसे २।३ महीनेके अन्दरही संग्रह किया है। जिन २ लोगोंने अपनी अपनी
उत्थानिका ]
(३३)
प्रतियां दी हैं, उन लोगोंने छपी हुई ? । २ प्रतिके साथ अपनी हस्त लिखित प्रतिभी वापस पाने के इरादेसेही दिये हैं ।
इसके अतिरिक्त धर्ममें व्यापारके प्रवेशके कारण एकही कवीरके नाम लेनेवालोंमें निजनिज शाखाओंकी श्रेष्ठता दिखानेके लिये लोभ और तृष्णा द्वारा इतनी स्वार्थ परता और विचारशून्यता आ गयी है कि, जिस प्रकार वंश-घरवालोंने प्रत्येक ग्रन्थोंमें मिलौनी कर, अपनी श्रेष्ठता मानता बढानेके लिये, सबको कालदूत कहना आरंभ कर दिया था, उसी प्रकार अपने को सर्व श्रेष्ठ बतलानेवाली एक शाखाके कुछ अदूरदर्शी व्यक्तियोंने प्रत्येक वाणी-जिनमें धर्मदास साहबका नाम आया है-उसमेंसे धर्मदास शब्दको निकालकर, उसके बदले कुछ और ही रखना आरंभकर दिया है । पुरानी वाणियोंमेंसे धर्मदास-जीका नाम उनने निकाला तो निकाला, किन्तु थोडे दिनोंकी बनी गुरुमहिमामेंसेभी अंतिम साखी जिसमें धर्मदासजीका नाम आता है, निकालकर छपवाया है । यह गुरु महिमा श्रीमहंत शंबुदासजी कृत है ।
इस प्रकार धर्मदासके नामको लुप्त करनेका प्रयत्न सूर्य्यपर धूल डालने के समान है, इससे उनकी शाखाका गौरव नहीं बढता है किन्तु उलटा उनकी निन्दा होती है। भला वह कहाँ तक धर्मदासका नाम मिटानेका प्रयत्न करेंगे। कवीरके साथही साथ धर्मदासका नाम तो इतना अटल अविनाशी हो गया है कि, इन थोडेसे धर्मदास द्वेषियोंके सिवाय सब पंथवाले धर्मदासकी श्रेष्ठताको स्वीकार करते हैं और कवीर धर्मदासके सम्वादवाले ग्रंथोंको पढकर अपना कल्याण चाहते हैं।
ऐसेही सब बातोंको विचारकर इस “कवीरपंथी शब्दावली” के सम्पादनमें मुझे प्रवृत्त होना पडा है।
इस संग्रहमें कई विभाग करके अलग अलग विषयोंको संक्षेपमें दर्शानेका प्रयत्न किया है । जो वाणी प्रत्यक्षमें दूसरोंकी है । उन्हें अगले विभागोंमें रखा है और जिन वाणियोंमें कवीरकेही नाम आते हैं वे सब इकट्ठा संग्रह किया है। इस वाणी जंगलमेंसे खास कवीरकी वाणीको परखनेकी कुंजीभी इसीमें छाप दी है। तथापि पाठकोंको अधिकार है अपने ज्ञान पहुँच और रुचिके अनुसार लाभ उठा सकते हैं ।
कवीरपंथी शब्दावली २
(३४)
[शब्दावली—
इस ग्रन्थमें कई चित्रभी दिये गये हैं। अपने स्वभाव और सदाके नियमके अनुसार जैसी वाणी मिली है वैसेही इस संग्रहमें रख दिया है जैसे पहले मैंने बहुतसे ग्रन्थ छपवाये हैं। वैसेहीशब्दावलीमें भी मैंने अपनी बुद्धी लगाकर विशेष सुधार नहीं किया है। मेरा कामतो जीर्णोद्धार करके डूबतेको बचाना है, अब आगे विद्वान् लोग उसे जैसा चाहें सुधार करें।
कई वर्षोंसे इस कामसे उदासीन रहने पर फिर मुझे इस काममें प्रवृत्त होनेकी आवश्यकता नहीं थी तथापि यह देखकर कि कवीर पंथियोंमें जो विद्वान् कहलाते हैं, उनकी दृष्टिमें तो ये ग्रन्थ और वाणी महान् तुच्छही हैं और साधारण पंथायी लोगोंको धर्म व्यापारके कारण परस्पर तू तू मैं मैं सेही फुरसत नहीं। धनी मानी महन्तोंको अपनी नामबरी और ऐशोआरामसे अवकाश नहीं। सभा सुसाइटी और कॉसिलोंको अपने निरर्थक ध्येयकी दौड धूपसेही फुरसत नहीं।
फिर इन नष्ट प्रायः होनेवाले ग्रन्थ और वाणियोंको जब कोई धनी धोरी नहीं तो मुझसे ही जहां तक बन सके इसमें कुछ कर डालूँ। इसी विचार को लेकर मैं इसमें फिर प्रवृत्त हुआ हूँ।
यद्यपि उपर्युक्त पंक्तियोंकी बातें कुछ लोगोंको कडवी लगेगी तथापि सत्यके अनुरोधसे कहना पडा है। आशा है इस उत्थानिकाके पाठकमुझे क्षमा करते हुए इसके यथार्थ आशयकी ओर ध्यान देंगे।
अन्तमें मुझे कवीरपन्थके माननेवाले और कवीर साहबके वचनपर श्रद्धा रखनेवाले—सबही लोगोंसे—वे चाहे पंथकी किसी शाखाके अनुयायी हों—कहना है कि, ये सीधी साधी भाषामें लिखे, हुए ग्रन्थ और वाणी उपेक्षाके योग्य नहीं हैं। कालके प्रभावसे इनमें धर्मव्यापारके कारण जो भिलौनी हुई है, श्रावणके अन्धोंके समान सदा चैन ही चैन देखनेवालोंकी, अदूरदर्शताके कारण ग्रन्थोंमें सांप्रदायिकता घुस गयी है, यदि उन पक्षपातमय वाणियोंको इन ग्रन्थोंमेंसे निकालकर बाहर कर दिया जाय, तो ये अमूल्य रत्नोंके भण्डार बहुत ही मूल्यवान प्रमाणित होंगे।
यद्यपि “बीजक” सब कवीरपंथियोंका सर्वस्व है तथापि उसमें भी भी सांप्रदायिकताने अपना अधिकार जमा लिया है। मूलकी ओर तो किसीका ध्यान ही नहीं है, टीकाका ही बीजकका सिद्धांत समझकर, साधारणमें पक्षपातका इतना बड़ा आडम्बर फैला हुआ है कि, जो पंथकी जिस शाखाका माननेवाला
उत्थानिका ।]
(३५)
है, उसी शाखाके किसी पुरुषकी की हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ कहकर, चाहे वह किसी दूसरी टीकाकी नकलही क्यों नहो, उसीको यह पढ़ेगा। और ठीक उसी प्रकारकी दूसरी टीकाको बुरा बतलायगा इस प्रकारकी बात, श्रद्धेय पूर्णसाहबकी टीका तथा मेहीदास और प्रागदासकी टीकावालोंसे मिलनेसे साफ २ प्रगट हो जाती है। यद्यपि मेहीदासजी और प्रागदासजीकी टीका पूर्ण साहबकी टीकासेही बनायीं गयीं हैं और रद्दीके भाव विककर पंसादीकी दूकान पर पुडिया बांधी गयी है तथापि जिनके पास वे टीकाएँ हैं वे पूर्ण साहबकी भी भूल निकाल कर अपनी मानी हुई टीकाको सर्व श्रेष्ठ बतलाते हैं।
इसके अतिरिक्त पाठके उलट फेरने भी खासा साम्प्रदायिकताका तांडव नाच नचवा दिया है। साम्प्रदायिक नशामें चूर सब अपनी अपनी शाखाकेही पाठ को सर्व श्रेष्ठ बतलाकर दूसरोंकी सत्यताकी भी उपेक्षा करते हैं इसका कारण मिथ्या पक्षपात ही है। आज कवीर साहबके उपदेशोंका-आश्रय लेकर दूसरे लोग संसारमें बहुत कुछ कर रहे हैं और उनके कामोंको देखकर कुछ समझ-बूझवाले कवीरपंथियोंके मुहमें पानी भर आता है किंतु ऐसा होनेपर भी उनको अपने घरकी पवित्र वस्तुका ध्यान नहीं है और दूसरोंके जूठनको देखकर ललचा ललचा मरते हैं।
प्यारे भाइयो ? सद्गुरुके इस वचन पर जरा गौर करो फिर आपको पता लग जायगा कि, आपके घरमें कैसे २ अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं—
सद्गुरु कहते हैं—
“सब सँग रसिये सबसँग बसिये, सबका लीजे नाम ।
हांजी हांजी सबकी कीजे, रहिये अपने ठाम ॥”
अर्थात्—
“वेद आदि विद्या सबै, बोध हेत हिय धार ।”
अथवा—
“सब मत महरम करू, तब देखू निज सैन”
सब कुछ पढ़ो, सब कुछ देखो सब सुनो, सबके साथ प्रीतिके साथ बर-तावा करो, किसीके दिलको मत दुखाओ “आत्मवत्सर्वभूतेषु” के न्यायसे, सबकी सहायता करो किंतु “रहिये अपने ठौर” को मत भूलो; यही गुरुकी
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[शब्दावली-उत्थानिका]
आज्ञा है, यही अपने आत्माको प्रवंचानेसे बचानेका मार्ग है; इस आदर्शको ही सामने रख कर, अपने मानव जन्मको सफल कर सकते हो, यही आदर्श तुम्हें सब प्रकारकी गुलामीकी परतंत्रतासे छुड़ाकर मुक्ति और स्वतंत्रता अर्थात् जीवन मुक्तिका मार्ग दिखा सकता है । सद्गुरु कहते हैं—
अपने अपने धर्ममें, सब सुखलह सब काल ।
निज धर्म जिन अपने गह्यो, सहजे भये निहाल ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
“स्वधर्मं निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”
इस लिये प्यारो ! आपकी विद्या और सब दौड धूपकी सफलता इसीमें है कि, आप वर्तमान कालका ध्यान रखते हुए अपने धर्मके भोलेभाले सांप्रदायिक पक्षमें डूबे हुओंको-सत्य कवीरके सच्चे उपदेशके द्वारा बाहर निकालने का प्रयत्न कीजिये. क्योंकि, यह सांप्रदायिक पक्षपात ऐसा बुरा है कि, इसमें पड़े हुए बडी कठिनाईसे सीधे रस्ते पर लाये जा सकते हैं.
उत्थानिका का कलेवर बहुत बड़ाहो गया है. इसलिये विशेष न लिखकर मैं इसे यहाँही समाप्त करता हूँ और आशा करता हूँ कि, सत्य धर्मके अनुयायी महात्मागण इस शब्दावलीको अपनाकर और इसके गुण दोषका विवेचन कर अपना कर्तव्य निबाहेंगे और मुझपर अनुग्रह करेंगे ।
सर्वं सज्जनोंका परमार्थी-कृपाकांक्षी—
बम्बई.
मिति आषाढवदी
१४ सम्बत १९८६. वि
ता० ५।७।२९.
श्रीयुगलानन्दविहारी.
कबीराश्रमाचार्य—
कबीराश्रम (खरसिया.)
विलासपुर