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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(८९६)

कवीरपंथी—

दस कोट कन्हई ॥ अनंत कोट विष्णु गये, मोरे एक पलाई ॥ सात कोट शंभू गये, सुहम्मद कोट चारी ॥ देवतनकी गिनती नहीं, का सृष्टि बिचारी ॥ बलि बावन केते भये, कौरव दल भारी ॥ लंकापति रावन गये, रघुपति कइ वारी ॥ ना बालक ना वृद्ध हों, ना पुरुष न नारी ॥ कहैं कवीर सुन गोरख, यह उमर हमारी ॥

शब्द ३८०—तुज बिन मेरा कोई नहीं, मैं किसे भजोरे दिवाना ॥ टे० ॥ मूल कमल चौकी गनपतकी, सुध बुध सबैं हेराना ॥ लोक लाज कुल पांचो मिलिया, हिलमिल मंगल गाना ॥ नाभ कैमलते लहर उठत है, सुनियो संत सुजाना ॥ इंगला पिगला सुषुमन नारी, उनमुनके घर लाना ॥ बंकनालते अमीरस झरिया, चारखे संत सयाना ॥ चंद सूर दोग्य आसन कीन्है, अनहद घोर निशाना ॥ कहैं कवीर सुनो भाइ साधो, तत्त भेद अब जाना ॥ जो कोई होय नामका भेदी, नामहि सो लौ लाना ॥

शब्द ३८१—मेरे मन बस गये गगन अटरिया ॥ टेक ॥ गगन अटरिया पियाको बासा, ज्ञान पुरुष मठ धरिया ॥ जापर सुरस नगारा बाजे, उठत शब्द धुनकरिया ॥ त्रिकुटी महलमें ध्यान लगावे, जहां अमीरस झरिया ॥ कहैं कवीर जेहि शब्द न वेधे, तापर हनत कटरिया ॥

शब्द ३८२—तैं व्रतधारी नामका, तोहे और न भावे । काँच बांधके का करें, कंचन जो पावे ॥ टे० ॥ जप तप तीरथ संजमा, कोई काम न आवे ॥ विषै पियासे ना बुझे, नल का ससुझावे ॥ स्वात बुंदके कारने, चात्रिक लौ लावे ॥ सोई बुंद मोती भये, का सागर नावे ॥ राई ते लख नाम है, गुरुकृपा ते पावे ॥ कहैं कवीर धावत वने, तो गरभ न आवे ॥

शब्द ३८३—देखो रे घट जंतर बाजे, कौन बजावन हारा ॥ टे० ॥

शब्दावली

(८१७)

तनकी तांत सरंगी बाजे, केहि विधि गावन हारा ॥ उग्रगीता बांच सुनाऊं, जाने दास हमारा ॥ दूटो तार फूटगो तूबा, जंत्री होगये न्यारा ॥ अपरंपार पार पुरुषोत्तम, ताका करो विचारा ॥ जंत्री बिना जंत्र ना बाजे, बाजे सोई बजावे ॥ कहें कवीर सुनो भाइ साधो, शब्दमें सुरति समावे ॥

शब्द ३८४-यह संसे मोहि निशदिन व्यापे, कोई ना कहे समुझाई ॥ दीपक जोत औ प्राण आतमा, ना जानो कहाँ जाई ॥ टेक ॥ नाही ग्रह द्वार जहाँ नाही पांच तत्त्व जहाँ नाही ॥ इंगला पिंगला सुषुमन नाडी, बिनसे कहाँ समाहीं ॥ जल जरे तृण जहाँ बांचे, ले बैसंदर सीचे ॥ भीतर मूल फूल फल बाहिर, समुझपर कहु कैसे ॥ सीखे सुने पढे का होई, जौलो पद ना परसे ॥ कहें कवीर गगना बिनसे, ज्यों धागा उनमुनमें दरसे ॥

शब्द ३८५-अपने साहबसों मिल रहिये ॥ टेक ॥ जो काहूकी भली न आवे, बुरी काहेको कहिये ॥ जो कोई संत मिले बड़ भागी, दुख सुख उनसो कहिये ॥ जो कोई बादी बाद बढ़ावे, चार बात सुन रहिये ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, गुरुके चरण चित गहिये ॥

शब्द ३८६-मेरे मन लागा बान सुरंगी ॥ टे० ॥ जा तन लगी सोई तन जाने, का जाने जगत पतंगी ॥ ध्यानका धनुष ज्ञानका तुक्का, घायल पांचों संगी ॥ धन सतगुरु उपदेश दियो है, कीटते हो गये भुंगी ॥ कहें कवीर सोई जन बिरही, निशदिन प्रेम उमंगी ॥

शब्द ३८७-धन हो धन साहब बलिहारी । दाय्या कर जिव राख लिये हो, सुनिये परम उपकारी ॥ टे० ॥ प्रथमें प्रगट भये मथुरामें, तारे गोप गँवारी ॥ विप्र मधूकर लोक पठाये, कालरहा झक मारी ॥ तक्षक आय डसे रानीको, बिषम चढे अति भारी ॥

कवीरपंथी शब्दावली २९

(८९८)

कवीरपंथी—

सुमिरत प्रगट भये द्वापरमें, लीन्हे हंस उबारी ॥ एक समैं हरि जाचन आये, लीन्हा बसन उतारी ॥ अंमर देत बार ना लाये, राखे लज्जा भारी ॥ पांडव यज्ञ सुफल ना होने, बहुतक जुरे अचारी ॥ तुमरे भक्त जब आस उठाये, अघर घंट झनकारी ॥ हरिके मंदिर उठे न पावे, सिंधु लहर अधिकारी ॥ शब्द देयके सिंधु हटाये, कृतम चले संसारी ॥ साह सिकन्दर कसनी लीन्हा, अगिनमें दिये झुकाई ॥ मस्ता हाथी आन झुकाये, सिंहरूप दिखलाई ॥ मगहर जाय लीला एक कीन्हा, हिंदू तुरुक व्रतधारी ॥ दोनों दीन प्रतिज्ञा दीन्हे, मिट गये झगरा भारी ॥ काशी प्रगटे हांसी कराये, सँग गनिका मतवारी ॥ हरिके पंडा जरत उबारे, आपन चरन जल दारी ॥ जो जस सुमरे तहां तस प्रगटे, काह पुरुष को नारी ॥ साह दमोदर बूढत बचाये, राखे सिंधु मझारी ॥ जो जो सरन गहे सतगुरुकी, जिन जन सुरति संभारी ॥ धर्मदासपर दाय़ा कीन्हे, राज दिया लिख भारी ॥ जो सुमरे तेहि लोक पठाये, धर्मनि कहे पुकारी ॥ साहब कवीर परम सुखसागर, हमहूको लेव उबारी ॥

शब्द ३८८—लखे कोई विरला पद निरवान ॥ टे० ॥ करम काट जब भरम नशान ॥ सतगुरु चरन कमल धर ध्यान ॥ बिन रसनाके अंतर ध्यान ॥ ता विच दरसे पुरुष पुरान ॥ तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निशान ॥ रामानंद गुरु कीन्ह बखान ॥ साहेब कवीरके निरमल ज्ञान ॥

सत्यनाम ।

अथ शब्द बीजक प्रारम्भः ।

शब्द ३८९—संतो भगति सतो गुरु आनी । नारी एक पुरुष दुइ जाये, बूझहु पंडित ज्ञानी ॥ टे० ॥ पाहन फोरि गंग यक निकरी,

शब्दावली

(८९९)

चहुँ दिशि पानी पानी । तेहि पानी डुइ परबत बूढे, दरिया लहरि समानी ॥ उडि मक्खी तरवरको लागी, बोले एके बानी । वहि मक्खीके मक्खा नाही, गरभ रहा विन पानी ॥ नारी सकल पुरुषहिं खायो, ताते रही अकेला । कहहिं कवीर जो अबकी समुझे, सोई गुरु हम चेला ॥ १ ॥

शब्द ३९०-संतो जागत नींद न कीजै । काल न खाय कल्प नहिं व्यापै, देह जरा नहिं छीजै ॥ टे० ॥ उलटि गंग समुद्रहिं सोखै, शशि औ सूर आसै । नौ ग्रह मारि रोगिया बैठे, जलमें विंब प्रकाशै ॥ विन चरननको चहुँ दिशि धावै, विन लोचन जग सूझै । ससा उलटि सिंहको आसै, ई अचरज को बूझै ॥ औघे घडा नहीं जल बूढे, सीधे सो जल भरिया । जेहि कारन नर भिन्न भिन्न करै, गुरु प्रसादसे तरिया ॥ पैठि गुफामें सब जग देखै, बाहर कछुव न सूझै । उलटा बान पारथिहिं लागै, सूरा होय सो बूझै ॥ गायन कहै कबहुँ नहिं गावै, अनबोला नित गावै । नटवत बाजा पेखनी पेखै, अनहद हेत बढावै ॥ कथनी वदनी निज कै जोहै, ई सब अकथ कहानी । धरति उलटि अकाशहिं वेधे, ई पुरुषन की बानी ॥ बिना प्याला अमृत अचवै, नदी नीर भरि राखै । कहै कवीर सो जुग जुग जीवै, राम सुधारस चाखै ॥ २ ॥

शब्द ३९१-संतो घरमें झगरा भारी । राति दिवस मिलि उठि उठि लागैं, पांच ढोटा एक नारी ॥ टे० ॥ न्यारो न्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी । कोइ काहूकों हटा न मानै आपुहिं आप सुरादी ॥ दुर्भति केर दोहागिनि मेठै ढोटे चांप चपेरे । कहहिं कवीर सोइ जन मेरा घरकी रार निवेरे ॥ ३ ॥

शब्द ३९२-संतो देखत जग बौराना । सांच कहाँ तो मारन धावै झूठै जग पतियाना ॥ टे० ॥ नेमी देखे धरमी देखे प्रात करै

(९००)

कवीरपंथी—

अस्नाना । आतम मारि पखानहि पूजे उनमें कछूव न ज्ञाना ॥ बहुतक देखा पीर औलिया पढे किताब कुराना । करि सुरीद तदवीर बतावै उनमें इहै जो ज्ञाना ॥ आसन मारि हिम्भ धरि बैठे मनमें बहुत गुमाना । पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गरब भुलाना ॥ माला पहिने टोपी दीन्है छाप तिलक अनुमाना । साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ हिंदू कहै मोहि राम पियारा तुरक कहै रहिमाना । आपसमें दोउ लरि लरि मूये मरम न काहू जाना ॥ घर घर मंत्र जे देत फिरत हैं महिमा के अभिमाना । गुरुवा सहित शिष्य सब बूढे अंतकाल पछिताना ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो ई सब भरम भुलाना । केतिक कहौ कहा नहि माने सहजै सहज समाना ॥ ४ ॥

शब्द ३९३-सन्तो अचरज एक भौ भाई । कहौ तो को पति- याई ॥ टे० ॥ एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु विचारा ॥ एकै अंड सकल चौरासी भरम भूल संसारा ॥ एकै नारी जाल पसारा जगमें भयो अंदेसा । खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ नाग फांस लिये घट भीतर मूसि सकल जग खाई ॥ ज्ञान खड़ग बिलु सब जग जूझै पकरि काहु ना पाई ॥ आपहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई । कहहि कवीर जन उबरे जेहि गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥

शब्द ३९४-सन्तो अचरज एक भौ भारी, पुत्र धरल मह- तारी ॥ टे० ॥ पिताके संग भई बावरी कन्या रहल कुमारी ॥ खसमहि छोड़ि ससुर संग गवनी सो किन लेहु बिचारी ॥ भाई के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा । ननद भौज परंपंच रच्यो है मोर नाम कहि लीन्हा ॥ समधीके संग नाहीं आई

शब्दावली

(१०१)

सहज भई घरुवारी । कहहिं कवीर सुनो हो सन्तो पुरुष जनम भौ भारी ॥ ६ ॥

शब्द ३९५-सन्तो कहौं तोको पतियाई । झूँठा कहत साँच बनि आई ॥ ८० ॥ लोके रतन अवेध अमोलिक नहिं गाहक नहिं, साई । चिमिक २ चमके हग चहुँ दिशि अरब रहा छरियाई ॥ आपहिं गुरु किरपा कछु कीन्हा निरगुन अलख लखाई सहज समाधि उनसुनी जागे सहज मिले रघुराई ॥ जहाँ जहाँ देखो तहाँ तहाँ सोई मन मानिक बेध्यो हीरा । परम तत्त्व यह गुरु सो पायो कहै उपदेश कवीरा ॥ ७ ॥

शब्द ३९६-सन्तो आवै जाय सो माया । है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥ ८० ॥ क्या मकसुद मच्छ कच्छ होना संखासुर न संहारा । अहैं दयाल द्रोह नहिं वाके कहौं कौन को मारा ॥ वै कर्ता नहिं बराह कहावै धरनि धरे नहिं भारा ॥ ई सब काम साहेबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ खंभ फोर जो बाहर होई ताहि पतीज सब कोई ॥ हिरनाकुश नख उदर विदारे सो नहिं करता होई बावन रूप न बलिको जांचे जो जांचे सो माया । विना विवेक सकल जम जहाँडे माये जग भरमाया ॥ परशुराम छत्री नहिं मारा ई छल मायहिं कीन्हा । सतगुरु भगति भेद नहिं जाने जीव अमिथ्या दीन्हा ॥ सिरजन हार न व्याही सीता जल पषान नहिं बधा । वै रघुनाथ एकके सुमिरे जो सुमिरे सो अंधा ॥ गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा । हे मिहर्बान सबनको साहेब नहिं जीता नहिं हारा ॥ वै करता नहिं बोध कहावै नहीं असुरको मारा ॥ ज्ञान हीन करता के भरमें माया जग संहारा ॥ वै कर्ता नहिं भये निकलंकी, नहिं कलि-गहि मारा । ई छल बल सब मायै कीन्हा, जत सत् सबटारा ॥

(१०२)

कवीरपंथी-

दस औतार ईसरी माया कर्ता कै जिन पूजा । कहहिं कवीर सुनौहो सन्तो उपजै खपै सो दूजा ॥ ८ ॥

शब्द ३१७-सन्तो बोले ते जग मारे । अनबोलेते कैसे के बनिहै शब्दै कोइ न विचारे ॥ ८० ॥ पहिले जन्म पहिले जनम पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ॥ बाप पूतकी एकै नारी ई अचरज को काछे ॥ उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी । स्वान बापुरा धरनि ढाकनो बिल्ली घरमें दासी ॥ काँर दुकार कार करि आगे बैल करै पटवारी ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो भैसे न्याव निवारी ॥ ९ ॥ १ पाठ भेद-(कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी )

शब्द ३१८-सन्तो राह दुनो हम दीठा । हिन्दू तुरक हटा नहिं मानै स्वाद सबनको मीठा ॥ ८० ॥ हिन्दू बात एकादशी साथै दूध सिंघाडा सेती ॥ अनको त्यागे मन नहिं हटके वारन करै सगौती ॥ तुरुक रोजा निमाज गुजारे बिसमिल बांग पुकारै । उनकी भिस्त कहाँसे होहैं सङ्झे सुरगी मारै ॥ हिंदूकी दया मेहर तुरकनकी दोनों घटसो त्यागी । वे हलाल वे झटका मारै आगि दुनों घर लागी । हिंदू तुरुककी एक राह है सतगुरु इहै बताई । कहै कवीर सुनो हो संतो राम न कहौ खुदाई ॥ १० ॥

शब्द ३१९-संतो पांडे निपुन कसाई । बकरा मारि मैसापर धावै दिलमें दरद न आई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक दे बैठे विधि सो देवि पुजार्ई । आतम राम पलकसो विनशे रुधिरकी नदी बहाई ॥ अति पुनीत ऊंचे कुल कहिये सभा माहि अधि-कार्ई । इनते दिच्छा सब कोई मांगे हंसि आवै मोहिं भाई ॥ पाप कटनको कथा सुनावै कर्म करावै नीचा । बृद्धत दोऊ पर-स्पर देखा गहे हाथ जम घीचा ॥ गाय बधे तेहि तुरका कहिये

शब्दावली

(१०३)

उनते क्या वै छोटा। कहहिं कवीर मुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ११ ॥

शब्द ४००—संतो मते मात जन रंगी। पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ टे० ॥ अरघ उरघ लै भाठी रोपी ब्रह्म अग्नि उदगारी। मूंदे मदन कर्म कटि कस्मल संतत चुवै अगारी ॥ गोरख दत्त वशिष्ठव्यास कवि नारद सुक मुनि जोरी, सभा बैठि शम्भू शनकादिक तहं फिरि अघर कटोरी ॥ अम्बरीष औ जाज्ञ (वल्क) जनक जड़ सेष सहस मुख पाना। कहलौं कहौं अनन्त कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ध्रुव प्रह्लाद विभीषन माते माती शिवकी नारी। सगुन ब्रह्म माते बृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना, कहैं कवीर गूणकी सक्कर क्यों कर करै बखाना ॥ १२ ॥

शब्द ४०१—राम तेरि माया द्रन्द्व मचावै गति मति वाकी समुझ परै नहिं सुर नर मुनिहिं नचावै ॥ टे० ॥ क्या सेमरकी साखा बढये फूल अन्तपम बानी। केतिक चात्रिक लाग रहे हैं चाखत रुवा उडानी ॥ कहा खजूर बडाई तेरी फल कोई नहिं पावै। श्रीषम रिनु जब आय तुलानी छाया काम न आवै ॥ अपना चतुर औरको सिखवै कामिनि कनक स्यानी। कहहिं कवीर मुनो हो सन्तो राम चरण रति मानी ॥ १३ ॥

शब्द ४०२—रामरा संशय गांठ न छूटै, ताते पकरि जम लूटै, ॥ टे० ॥ होय मिसकीन कुलीन कहावे तुम जोगी सन्यासी। ज्ञानी गुनी सूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥ सुम्रिति वेद पुरान पढ़ैं सब अनुभव भाव न दरसे। लोह हिरन्य होय धौं कैसे जो नहिं पारस परसे ॥ जियत न तरे मुयेका तरिहो जियते

(१०४)

कवीरपंथी—

जो न तरे । गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहैं मरे ॥ जो कहु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझ स्याना । कहैं कवीर तासों का कहिये देखत दधि भुलाना ॥ १४ ॥

शब्द ४०३—रामरा चली बिनावन माहो । घर छोड़े जात जोलाहो ॥ टे० ॥ गज नौ गज दस गज उनइसकी पुरिया एक तनाई । सात सूत नौ गाड़ बहतारि पाट लागु अधिकार्ई ॥ तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढार्ई । तामैं घटै बढै रतिओ नहीं करकच करघ रहाई ॥ तिन उठि बैठ खसम सो बरबस तापर लागु तिहाई । भीनी पुरिया काम न आवे जोलहा चला रिसार्ई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जिन यह सूधि उपाई, छाड़ि पसार राम भजु बौरै भवसागर कठिनाई ॥ १५ ॥

शब्द ४०४—रामरा झीझी जंतर बाजे । कर चरन विहूना राजै ॥ टे० ॥ कर विनु बाजे सुने सरवन विनु सरवने सरोता होई । पाटन स्ववस सभा विनु अवसर बूझे सुनि जन लोई ॥ इंद्रि विनु भोग स्वाद जिह्वा विनु अच्छय पिंड विहूना । जागत चौर मंदिर तहैं मूसे स्वम्भ अच्छत घर सूना ॥ बीज विनु अंकुर पेड़ विनु तरुवर विनु फूले फल फलिया । बांझके कोख पुत्र अव- तरिया विनु पग तरुवर चढिया ॥ मसि विनु द्राइत कलम विनु कागज विनु अच्छर सुधि होई । सुधि विनु सहज ज्ञान विनु ज्ञाता कहैं कवीर जन सोई ॥ १६ ॥

शब्द ४०५—राम गाइ औरन समुझावे, हरि जाने विनु विकल फिरे ॥ टे० ॥ जा मुख वेद गायत्री उचरे तासु वचन संसार तरे ॥ जाके पांव जगत उठि लागे सो ब्राह्मन जिव बद्ध करै ॥ अपना ऊंच नीच घर भोजन धीन कर्म करि उदर भरै । ग्रहन अमावस ढुकि ढुकि मांगै कर दीपक लिये कूप परै ॥ एकादशी व्रती

शब्दावली

(१०५)

नहीं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै । तजि कपूर गांठी विष बाँधै ज्ञान गंवाय मुगुध फिरे ॥ छीजे साहु चोर प्रतिपालै संत जनन की कूट करै । कहहिँ कवीर जिह्वाके लम्पट यहि विधि प्रानी नरक परै ॥ १७ ॥

शब्द ४०६-रामगुन न्यारो न्यारो न्यारो । अबुझा लोग कहाँ लौ बूझैं बूझनहार विचारो । केते रामचन्द्र तपसी सो जिन यह जग विटमाया ॥ केते कान्ह भये सुरलीधर तिन भी अन्त न पाया ॥ केतिक सिध साधक संन्यासीजिन बनवास बसाया ॥ केते मुनि जन गोरख कहिये तिन भी अंत न पाया ॥ जाकी गति ब्रह्मै नहीं पाई शिव शनकादिक हारे । ताके गुन नर कैसे पैहो कहे कवीर पुकारे ॥ १८ ॥

शब्द ४०७-ए तत राम जपो हो प्रानी तुम बूझा अकथ कहानी । जाको भाव होत हरि ऊपर, जागत रैन बिहानी ॥ टे० ॥ डाइनि डारे सोनहा डारे सिंह रहे बन घरे । पांच कुटुम्ब मिलि जूझन लागे बाजन बाज घनेरे ॥ रोहु मिरगा संशय बन हाँके पारथ बाना मेलै ॥ शायर जरे सकल बन डाहे मच्छ अहेरा खेलै ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो जो यह पद निरवारै । जो यह पदको गाइ विचारे आपु तरे अरु तारै ॥ १९ ॥

शब्द ४०८-कोइ राम रसिक रस पियहुगे सुख जियहुगे ॥ टे० ॥ फल अंकृतै बीज नहीं बोकला सुक पंछी रस खाई । चुवै न बुंद अंग नहीं भीजै दास भँवर सँग लाई ॥ निगम रसाल चारि फल लागै तामैं तीन समाई । एकहै दूरि चहै सब कोई जतन जतन कोई पाई ॥ गयउ बसंत ग्रीषम ऋतु आई बहुरि न तरुवरतर आवै । कहै कवीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ २० ॥

(१०६)

कवीरपंथी-

शब्द ४०९-राम न रमसि कौन दंड लागा । मरि जेबेका करिबे अभागा ॥ ८० ॥ कोइ तीरथ कोइ सुंडित केशा । पाखंड भरम मन्त्र उपदेशा ॥ विद्या वेद पढि कर हंकारा । अन्तकाल मुख फाँके छारा ॥ दुखित सुखिन सब कुटुम्ब जिवैवै । मरन बेर अकसर दुख पैवै । कहैं कवीर यह कलि है खोटी । जो रह करवा निकसै टोटी ॥ २१ ॥

शब्द ४१०-अवधू छोड़ो मन विस्तारा । सौ पद गहु जाहि ते सद्गति पार ब्रह्म ते न्यारा ॥ ८० ॥ नहीं महादेव नहीं मद्भ्यमद हरि हजरत तब नाही । आदम ब्रह्मा नहीं तब होते नहीं धूप नहीं छाहीं ॥ असी सहस्र पैगम्बर नाही सहस्र अठासी मूनी । चन्द्र सूर तारा गन नाही मच्छ कच्छ नहि दूनी ॥ वेद किताब सुम्रिति नहि संजम नहि जमन परसाई । बांग नेमाज कलमा नहि होते रामों नहीं खुदाई ॥ आदि अन्त मन मध्य न होते आतत पवन न पानी । लख चौरासी जीव जनतु नहि साखी शब्द न बानी ॥ कहैं कवीर सुनो हो अवधू आगे करहु विचारा । पूरनब्रह्म कहाँते प्रगटे किरतम किन उपचारा ॥ २२ ॥

शब्द ४११-अवधू कुदरतकी गति न्यारी । रंक निवाज करै वह राजा राजा भूपति करै भिखारी ॥ ८० ॥ येते लौगहि फल नहि लागै चन्दन फूल न फूले । मच्छ शिकारी रमें जंगलमें सिंह समुद्रहि झूले ॥ रेंडा रुख भया मल्यागिरि चहुँ दिशि फूटी बासा । तीन लोक ब्रह्मंड खंडमें देखै अन्ध तमाशा ॥ पंगुल मेरु सुमेरु उल्लै त्रिभुवन मुक्ता डोलै । गुंगा ज्ञान विज्ञान परगासै अनहद बानी बोले ॥ बांधि अकाश पताल पठावै शेष सरगपर राजे । कहैं कवीर राम है राजा जो कछु करै सो छाजे ॥ २३ ॥

शब्द ४१२-अवधू सो जोगी गुरु मेरा । जो ई पदको करै

शब्दावली

(१०७)

निवेरा ॥ टे० ॥ तरुवर एक मूल विन ठाढो विन फूले फल लागा । साखा पत्र कछू नहिं वाके अष्ट गगन सुख जागा ॥ पौ विन पत्र करह विन तुम्बा विनु जिह्वा गुन गावै । गावन हारके रूप न रेखा सतगुरु होइ लखावै ॥ पंछिक खोज मीनको मारग कहैं कवीर दोउ भारी । अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरतिकी बलिहारी ॥ २४ ॥

शब्द ४१३-अवधू ओ तत रावल राता । नाचै बाजन बाज बराता ॥ टे० ॥ मौरके माथे दुलहा दीन्हो अकथा जोर कहाता । मडवक चारन समधी दीन्हो पुत्र विवाहल माता ॥ दुलहिन लीप चौक बैठाये निरभय पद परभाता । भातहिं उलटि बरातहिं खायो भली बनी कुशलाता ॥ पाणि ग्रहण भये भव मंडयो सुषुप्तनि सुरति समाता ॥ कहैं कवीर सुनो हो संतो बूझो पंडित ज्ञाता ॥ २५ ॥

शब्द ४१४-कोइ विरला दोस्त हमारा भाइ रे बहुत का कहिये । गांठन भजन संवारे सोई ज्यों राम रखे त्यों रहिये ॥ टे० ॥ आसन पवन जोग श्रुति सुमृति ज्योतिष पढि बैलाना । छौ दरशन पाखंड छानवे ये कल काहु न जाना ॥ आलम दुनी सकल फिरि आये या कल जीव न आना । ताही करिके जगत उठावे मनमें मनन समाना ॥ कहैं कवीर जोगी औ जंगम फीकी उनकी आशा । रामै नाम रटे ज्यों चात्रिक निश्चय भगति निवाशा ॥ २६ ॥

शब्द ४१५-भाई अदुत रूप अनूप कथा है कहौं तोको पति-याई । जहँ जहँ देखौं तहँ तहँ सोई सब घट रह्यो समाई ॥ टे० ॥ लच्छ विनु सुख दरिद्र विनु दुख है नौंद विना सुख सोवै ॥ जस विनु ज्योति रूप विनु आशिक रतन विहूना रोवै ॥ भरम विनु

(१०८)

कबीरपंथी—

ज्ञान मने बिनु निरखै रूप बिना बहु रूपा । थिति बिनु सुरति रहस बिनु आनंद ऐसो चरित अनूपा ॥ कहै कवीर जगत बिनु ( हरि ) मानिक देखौ चित अनुमानी । परि हरि लाभै लोग कुटुम्ब सब भजहुँ न झारंग पानी ॥ २७ ॥

शब्द ४१६—भाइरे गैया एक विरंचि दियो है भार अभर भौ भाई । नौ नारीको पानि पियति है तिरषा तच्छ न बुताई ॥८०॥ कोठा बहतरि औ लौ लाय वज्र केवार लगाई । खूटा गाडि डोरी दृढ बांधो तैयो तोरि पराई ॥ चारि वृक्ष छौ साख वाके पत्र अठारह भाई एतिक ले गैया गम कीन्हो गैया अति हर-हाई ई सातौ अवरन है सातौ नौ औ चौदह भाई । एतिक गैया खाय बढायो गैया तउ न अघाई ॥ घूटामे राती है गैया स्वेत साँग है भाई । अवरन बरन कछू नहीं वाके भच्छ अभच्छौ खाई ॥ ब्रह्मा विष्णु खोजिकै आये शिव शनकादिक भाई ॥ सिद्ध अनंत वहि खोज परे हैं गैया किनहुँ न पाई ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो जो या पद अरथाई । जो या पदको गाइ विचरिहैं आगे है तरि जाई ॥ २८ ॥

शब्द ४१७—भाईरे नयन रसिक जो जागे । पारब्रह्म अविगत अविनाशी कैसेहुके मन लागे ॥८१॥ अमली लोग खुमारी तृष्णा कतहुँ सन्तोष न पावे । काम क्रोध दोनों मतवाले माया भरि भरि प्यावै ॥ ब्रह्म कलाल चढाइनि भाठी ले इन्द्री रस चाखै । संगहि पोच है ज्ञान पुकारै चतुर होइ सो नाखै ॥ संकट सोच पोच या कलिमों बहुतक व्याधि शरीरा । जहंवां धीर गँभीर अति निर्मल तहँ उठि मिलहु कवीरा ॥ २९ ॥

शब्द ४१८—भाईरे दुइ जगदीश कहाँते आया, कहु कौने भरमाया । अछाः राम करीम केशव हरि हजरत नाम धराया

शब्दावली

(१०९)

॥ टे० ॥ गहना एक कनक ते गहना तामें भाव न दूजा । कहन सुननको दुइ करि थाये यक निमाञ्ज यक पूजा ॥ वही महादेव वही महम्मद ब्रह्मा आदम कहिये । कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावै एक जमींपर रहिये ॥ वद किताब पढैं वे खुतबा वे मोलना वे पांडे । बिगत विगतके नाम धरावे यक माटीके भांडे ॥ कहैं कवीर वै दोनों भूले रामहि किनहु न पाया । वे खसिया वे गाय कटावैं बादैं जनम गँवाया ॥ ३० ॥

शब्द ४१९-हंसा संशय छूरी कुहिया । गैया पियै बछरुवै दुहिया ॥ टेक ॥ घर घर सावज खेलै अहेरा पारथ वोटा लेई । पानी मांहिं तलफिगै भ्रुसुरि धूरि हिलोरा देई ॥ धरती वरसे बादल भीजै भीट भया पैराऊ । हंस उड़ाने ताल सुखाने चहले बीधा पाऊ ॥ जौ लगि कर डोलै पग चलई तौ लगि आश न कीजै । कहहिं कवीर जेहि चलत न दीखै तासु बचन कालीजै ॥ ३१ ॥

शब्द ४२०-हंसा हो चित चेतु सवेरा । इन्ह परपंच कयल बहुतेरा ॥ टेक ॥ पारखंड रूप रच्यो इन्ह त्रिगुन तेहि पारखंड भूलल संसारा । घरको खसम बधिक भौ राजा परजा काधौं करे विचारा ॥ भगति न जानै भगत कहावै तजि अमृत विषके लिय सारा । आगे बढे ऐसेहि बूढ़े तिनहुं न मानत कहा हमारा ॥ कहल हमारा गांठी बांधो निशि बासर रहिहहु हुशियारा । ये कलिके गुरु बड परपंची डारि ठगोरी सब जग मारा ॥ वेद किताब दोय फन्द पसारा ते फन्दे परु आप बिचारा । कहैं कवीर ते हंस न विछुरे जेहि मै मिलों छोडावन हारा ॥ ३२ ॥

शब्द ४२१-हंसा प्यारे सरवर ते जे जाय ॥ टे० ॥ जेहि सरवर बिच मोतिया चुगते बहुविधि केलि कराय ॥ सूखे ताल पुरइनि

(९१०)

कवीरपंथी-

जल छोड़े कमल गयो कुंभिलाय । कहैं कवीर जो अबकी बिछरे बहुरि मिलै कब आय ॥ ३३ ॥

शब्द ४२२-हरि जन हंस दशा लिये डोलैं। निर्मल नाम चुनि चुनि बोलैं ॥ टे० ॥ सुकताहल लिये चाँच लोभावैं। मौन रहै कि हरिगुन गावैं ॥ मानसरोवर तटके बासी। राम चरण चित अन्त उदासी ॥ काग बुद्धि निकट नहिं आवै। प्रतिदिन हंसा दर्शन पावै ॥ नीर छीर को करै निबेरा। कहैं कवीर सोई जन मेरा ॥ ३४ ॥

शब्द ४२३-हरि मोर पीव मैं राम की बहुरिया। राम मोर बडो मैं तन की लहुरिया ॥ टे० ॥ हरि मोर रहैंटा मैं रतन पिउरिया। हरि को नाम लै कातल बहुरिया ॥ छः मास ताग वरष दिन कुकुरी। लोग कहल भल कातल बपुरी ॥ कहैं कवीर सूत भल काता। रहैंटा न हाय सुकति कर दाता ॥ ३५ ॥

शब्द ४२४-हरि ठग ठगत ठगौरी लाई। हरि वियोग कस जियहु रे भाई ॥ टे० ॥ को काको पुरुष कवन काकि नारी। अकथ कथा जम जाल पसारी ॥ को काको पुत्र कवन काको बापा। को रे मरै को सहे सन्तापा ॥ ठगि ठगि मूल सबन को लीन्हौं। राम ठगौरी विरलै चीन्हौं ॥ कहैं कवीर ठग सो मन माना। गई ठगौरी ठग पहिचाना ॥ ३६ ॥

शब्द ४२५-हरि ठग ठगत सकल जग डोलै। गवन करत मोसे मुखहु न बोले ॥ टे० ॥ बालापनके मीत हमारे। हमैं छोड़ि कहैं चले सकारे ॥ तुम अहु पुरुष हौं नारि तुम्हारी। तुम्हरी चाल पाहनहुंते भारी ॥ माटिक देह पवनको शरीरा। हरि ठग ठग सो डरल कवीरा ॥ ३७ ॥

शब्द ४२६-हरि विनु भरम बिगुरन गन्दा। जहं जहं गये अपनपौ खोये तेहि फंदे बहु फन्दा ॥ टे० ॥ जोगी कहै जोग है नीको

शब्दावली

(१११)

द्वितीया और न भाई। चुंडित मुंडित मौन जटाधरि तिनहुं कहां सिधि पाई॥ ज्ञानी गुनी स्मर कवि दाता ये जो कहहिं वड हमहीं। जहंसे उपजे तहहिं समाने छूटि गये सब तबहीं ॥ बाँये दहिने तजो विकारे निजुके हरिपद गहिया। कहै कवीर गुंगे गुर खाया पूछे सो का कहिया ॥ ३८ ॥

शब्द ४२७-ऐसे हरि सो जगत लरतु है। पंडुर कतहुं गुरुठ धरतु है॥टे०॥ मूस विलारी कैसनि हेतू। जम्बुक कर केहरि सो खेतू॥ अचरज यक देखा संसारा। सोनहा खेद कुंजर असवारा॥ कह कवीर सुनो संतो भाई। यह संधी कोह बिरले पाई ॥ ३९ ॥

शब्द ४२८-पंडित बाद बदौ सो झूठा। रामके कहे जगत गति पावै खांड कहै मुख मीठा॥टेक॥ पावक कहै पांव जो दाहै जल कहै तिरषा बुझाई। भोजन कहे भूख जो भाजे तो दुनिया तरि जाई॥ नरके संग सुवा हरि बोले हरि प्रताप नहिं जानै। जो कबहुं उडि जाय जंगलको तौ हरि सुरति न आने❧ ॥ बिनु देखे विनु अरस परसके नाम लिये का होई। धनके कहे धनिक जो हो तो निर्धन रहत न कोई ॥ सांची प्रीति विषय माया सों हरि भगतनकी हांसी। कह कवीर यक नाम भजे विनु बांधे जमपुर जासी ॥ ४० ॥

शब्द ४२९-पण्डित देखौ मनमों जानी। कहुधौं छूत कहांते उपजी तबहि छूति तुम मानी॥टेक॥ नादे बिन्दु रुधिर यक संगै घटहीमें घट सजै। अष्ट कमलकी पुहुमी आई यह छूति कहांते उपजै ॥ लख चौरासी बहुत बासना सो सब सरि भौ मांटी। एकै पाट सकल बैठारे सींच लेत धौं काटी ॥ छूतिहिं जेवन छूतिहिं

  • देखो सुवाबतीसी।

(९१२)

कवीरपंथी—

अचवन छूतिहि जग उपजाया । कह कवीर ते छूति बिर्वाजित जाके संग न माया ॥ ४१ ॥

शब्द ४३०—पंडित सोधि कहहु समुझाई । जाते आवागमन नशाई ॥ अर्थ धर्म औ काम मोक्ष फल कौन दिशा बस भाई ॥ टेक ॥ उत्तर दछिन पूरब पच्छिम सरग पतालके माही । विन गोपाल ठौर नहिं कतहुं नरक जात धौं काही ॥ अनजानेको नरक सरग है हरि जानेको नाहीं । जेहि डरको सब लोक डरतु है सो डर हमरे नाहीं ॥ पापपुन्यकी शंका नाहीं सरग नरक नहिं जाहीं । कहैं कवीर सुनो हो संतो जहैं पद तहां समाहीं ॥ ४२ ॥

शब्द ४३१—पंडित मिथ्या करो विचारा । ना ह्लां सृष्टि न सिरजनहारा ॥ टेक ॥ थूल स्थूल पवन नहिं पावक रवि शशि धरनि न नीरा । ज्योति स्वरूपी काल न उहवां बचन न आहि शरीरा ॥ धरम करम कछुवो नहिं उहवां ना कछु मंत्र न पूजा । संजम सहित भाव नहिं एको सो तो एक न दूजा ॥ गोरख राम एको नहिं उहवां ना वर्हिं भेद विचारा । हरि हर ब्रह्म नहीं शिव सकती तिरथौं नहीं अचारा ॥ माय बाप गुरु जाके नाहीं सो दूजा कि अकेला । कह कवीर जो अबकी समझैं सोइ गुरु हम चैला ॥ ४३ ॥

शब्द ४३२—बूझहु पंडित करहु विचारी, पुरुष अहे कि नारी ॥ टेक ॥ ब्राह्मन केरे ब्रह्मनी होती जोगी के घर चेली । कलमां पठि पठि भई तुरकिनी कलिमें रहै अकेली ॥ वर नहिं वरै व्याह नहिं करई पुत्र जनम होनिहारी । कारे मूडे एक नहिं छाडे अबहुं आदि कुवारी । मायिक न रहै जाइ न ससुरे साईं संग न सोवे ॥ कह कवीर वे जुग जुग जीवे जाति पांति कुल खोवे ॥ ४४ ॥

शब्द ४३३—कौन सुआ कह पंडित जना । सो समुझाय कहौ

शब्दावली

(११३)

मोहि सना ॥ ८० ॥ मूये ब्रह्मा विष्णु महेशा । पार्वती सुत भये गनेशा ॥ मूये चन्द्र मुखे रवि केता । मुखे हनुमत जिन बांधी सेता ॥ मूये कृष्ण मुखे करतारा । यक न मुआ जो सिरजन हारा ॥ कहैं कवीर मुआ नहीं सोई । जाको आवागमन न होई ॥ ४५ ॥ शब्द ४३४-पंडित अचरज यक बड़ होई । यक मरमुखे अन्न नहीं खाई यक मर सीझ रसोई ॥ ८० ॥ करि अस्नान तिलक करि बैठे नौ गुण कांध जनेऊ । हांडी हाड हाड थारी मुख अब षट करम बनेऊ ॥ धरम कथे जहं जीव बचे तहं अकरम कर मेरे भाई । जो तोहरेको ब्राह्मन कहिय तो केहि कहिय कसाई ॥ कह कवीर सुनो हो संतो भरम भूलि दुनियाई । अपरम पार पार पुरुषोत्तम यह गति विरलै पाई ॥ ४६ ॥

शब्द ४३५-पंडित बूझ पियो तुम पानी । जा माटीके घरमें बैठे तामें सुछि समानी ॥ छप्पन कोटि जादव जहं विनशे सुनि जन सहस अठासी । परग परग पैगम्बर गाडे ते सरि माटी मासी ॥ मच्छ कच्छ घरियार वियाने रुधिर नीर जल भरिया । नदिया नीर नरक बहि आवै पशु मानुष सब सरिया ॥ हाड झरो झरि गूद गली गलि दूध कहातै आयो । सो तुम पांडे जेवन बैठे मटिअहि छूत लगायो ॥ बेद किताब छोड दिहु पांडे ई सब मनके करमा । कहैं कवीर सुनो हो पांडे ई सब तुम्हरे धरमा ॥ ४७ ॥

शब्द ४३६-पंडित देखौ हृदय विचारी । कौन पुरुष को है नारी ॥ ८० ॥ सहज समाना घट घट बोले वाको चरित अनूपा । वाको नाम का कहि लीजे ना बहि वरन न रूपा ॥ तैं मैं क्या कोर नर बौरै क्या तेरा क्या मेरा । राम खुदाय सकति शिव एकै कहु धौ काहि निवेरा ॥ बेद पुरान कुरान कितेबा नाना भांति बखानी । हिन्दू तुरुक जैन ओ जोगी एकल काहु न जानी ॥

(११४)

कवीरपंथी—

छः दरशनमें जे परवाना तासु नाम मन माना । कहै कवीर हमहीं हैं बौरै ई सब खलक स्याना ॥ ४८ ॥

शब्द ४३७-बुझ बुझ पंडित पद निर्बाना । सांझ परे कहंवा बस भाना ॥ ८० ॥ नीच ऊंच पर्वत ढेल न भीत । विन गायन तहवां उठ गीत ॥ ओस न प्यास मन्दिर नहिं जहंवां । सहसौ घेनु दुहावै तहवां ॥ नितै अमावस नित संकांती । नित नित नव ग्रह बैठे पांती ॥ मैं तोहि पूछौ पंडित जना । हृदया ग्रह न लागु केहि खना ॥ कह कवीर इतनो नहिं जान । कौन शब्द गुरु लागा कान ॥ ४९ ॥

शब्द ४३८-बुझ बुझ पंडित विरवा न होई । अध बस पुरुष अधा बस जोई ॥ ८० ॥ विरवा एक सकल संसारा । सरग शीश जर गेल पतारा ॥ बारह पखुरी चौबिस पाता । घन बरोह लागी चहुं घाता ॥ फलै न फूलै वाकि है बानी । रैन दिवस विकार जुव पानी ॥ कह कवीर कछु अच्छलो न जहिया । हरि विरवा प्रतिपालत तहिया ॥ ५० ॥

शब्द ४३९-बुझ बुझ पंडित मन चितलाय । कबहिं भरल वहे कबहि सुखाय ॥ ८० ॥ खन ऊबे खन डूबे खन अवगाह । रतन न मिले पाव नहिं थाह ॥ नदिया नाहिं सरस बहे नीर । मच्छ न मरे केवट रहे तीर ॥ पोहकर नहीं बांधल तहं घाट । पुरइनि नहीं कमल महि बाट ॥ कहै कवीर यह मनका धोखा । बैठारहै चला चह चोखा ॥ ५१ ॥

शब्द ४४०-बूझ लीजे ब्रह्म ज्ञानी । घुरि घुरि बरषा बरषावै परिया बुंद न पानी ॥ ८० ॥ चीटीके पग हस्ती बांधे छेरी बीगै खायो । उदधि मांहते निकसि छांछरी चौड़े गेह करायो ॥ मेढुक सर्प रहै इक संगे बिछी स्वान बियाही । नितउठि सिंह सियार सों

शब्दावली

(९१५)

डरपै अद्भुत कथो न जाही ॥ (कौने) संशय भूगा तन वन घेरे पारथ बाना मेले । शायर जरे सकल वन ढाहै मच्छ अहेरा खेले ॥ कह कवीर यह अद्भुत ज्ञाना को यहि ज्ञानहि वूझे । विनु पंखै उड़ि जाय अकाशे जीवहि मरन न सूझे ॥ ५२ ॥

शब्द ४४१-वह विरवा चीन्है जो कोय । जरा मरन रहितै तन होय ॥ टे० ॥ विरवा एक सकल संसारा । पेड एक फूटल तिन डारा ॥ मध्यके डार चारि फल लागा । साखा पत्र गनत को बागा ॥ वेलि एक त्रिभुवन लपटानी । बांधेते छूटिहि नहि प्रानी ॥ कहहि कवीर हम जात पुकारा । पंडित होय सो करे विचारा ॥ ५३ ॥

शब्द ४४२-साईके संग सासुर आई । संग न सूती स्वाद न मानी गौ जौबन सपनेकी नाई ॥ टे० ॥ जना चार मिलि लगन सोधाई जना पांच मिलि मंडप छाई । सखी सहेली मंगल गावै दुख सुख माथे हरदि चढाई ॥ नाना रूप परी मन भांवरि गांठी जोरि भई पतियाई । अरघै दैदै चली सुवासिनि चौकहि रांड भई संग साई ॥ भयो विवाह चली बिन दूलह बाट जात समधी समझाई । कहै कवीर हम गौने जैबे तरव कन्त ले तूर बजाई ॥ ५४ ॥

शब्द ४४३-नलको ढाढस देखो आई । कछु अकथ कथा है भाई ॥ टे० ॥ सिंहसारदूल यक हर जोतिनि सीकस बोइन धाना । बनकी खुलइया चाखुर फेरे छागर भये किसाना ॥ छेरी बाघहि व्याह होत है मंगल गावै गाई । बनके रोझ धै दाइज दीन्हों गोह लोकंदै जाई ॥ कागा कपडा धोवन लागे बकुला किररे दांता । मांछी मूँड सुडावन लागी हमहुं जाब बराता ॥ कहहि कवीर सुनो हो सन्तो जो यह पद अर्थौवै । सोई पंडित सोई ज्ञाता सोई भक्त कहावै ॥ ५५ ॥

शब्द ४४४-नलको नहि परतीति हमारी । झूठे बनज कियो