कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
३१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ जाता है । दूसरा वैष्णवी तन्त्र बीज है जो बिन्दु इन्द्र से संयुत है । षष्ठ स्वर के उपरिचर कूर्मबीज कीर्तित किया गया है । दहन और प्लवन के आदि में दशम रन्ध्र का भेदन साधक को प्रणव मन्त्र के द्वारा भेदन करना चाहिए । वासुदेव के बीच के द्वारा आकाश में विनिधापति करे । प्रणव के सहित जो बीज है वह सब प्रतिपादित कर दिया है । आज भी समस्त देवगण क्षति को पद से स्पर्श नहीं किया करते हैं और अपने शरीर की छाया को भूतल में योजित नहीं किया करते हैं । उस दोष के मोक्ष के लिए क्षिति पर मन्त्रराज को लिखना चाहिए । प्रोक्षण करने से अथवा वीक्षण से भी भेदिनी, शुद्ध हो जाया करती है । स्थण्डिल का वीक्षण धर्म बीज के द्वारा समाचरण करना चाहिए । दान्त बल से संयुक्त और बिन्दु से समन्वित धर्म बीज कहा गया है जो धर्म, काम और अर्थ का साधन होता है । आदान, धारण तथा संस्थान, पूजन सलिल से ही पूर्ण, गन्ध और पुरुष का निक्षेप मण्डल का विन्यास और पुनः पुष्प का सश्रय अमृतीकरण यह पात्र प्रतिपति है । मनुष्य अनिरुद्ध के द्वारा आदान करके अस्त्र मन्त्र से धारण करे और पात्र में वाग्बीजराग्र से मण्डल न्यास योजित करे । आद्य बिन्दु के उत्तर अनिरुद्ध बीज होता है । वह अनिरुद्ध जब फट् अन्त में होता है तो अस्त्र मन्त्र कहा गया है । शम्भु आद्यबल प्रान्तःसपूर्व ये संहिता है । पर से पूर्व समाप्ति के अन्तवाले बिन्दु के सहित तीसरा वाग्भव बीज है यह सकल निष्फल नाम वाला है । चतुर्थ स्वर संकल्प संसृष्टि में बिन्दु से और इन्दु से वर्गादि का द्वितीय तो वाग्बीज कहा जाता है और यह कामराज नाम वाला है जो धर्म, अर्थ और काम का साधन होता है । मनोभाव का बीज कुण्डली शक्ति से संयुक्त होता है वह वासुदेव से सम्पृक्त होता है जो आद्य वाग्भव कहा गया है । एक-एक काम बीज आदि तीनों से तो त्रिपुरामद है । आद्य, तृतीय सामीन्दु बिंदुओं से समलंकृत है । यह मदन का मन्त्र है जो काम के भोग का फल प्रदान करने वाला है । ओत्, ऐत के रूप से विन्यस्त यन्त्र भास्कर के सदृश है । उसको
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३१९ में बताऊँगा जो कि कुण्डली की शक्ति है । जो अभेद से कही जाती है । मार्जक इस मन्त्र के द्वारा भूतों का अपसारण करे इसके करने पर स्थानभूत जो है वे सुरार्चन के समय में दूर चले जाया करते हैं । भूतों के वहाँ पर स्थित रहने पर सदा ही वे लुब्धक नैवेद्य मण्डल को विशेष रूप से लुप्त कर दिया करते हैं और देवता उसका ग्रहण नहीं किया करते हैं । इस कारण से यत्नपूर्वक भूतों का अपसारण करना ही चाहिए । वह अपसारण अस्त्र मंत्र के सहित ही करे । उसका मन्त्र यह कहा गया है । वे भूत इस भूमि के पालक होवें । मैं भूतों के अविरोधक के द्वारा ही पूजा कर्म कर रहा हूँ । साधक इसके द्वारा स्थण्डिल से भूतों को अपसारित करके इसके पश्चात् दिग्बन्धन में मन्त्र स्थित होता है । अपनी आत्मा के पूजन के द्वारा ही कर्म के आरम्भ करने की अधिकारिता प्राप्त हुआ करती है और पूजित आसन योगपीठ के सदृश हो जाया करता है । यह पाँचों भूतों के स्वरूप वाले वपु स्वाभाविक रूप से सदा ही अशुद्ध होता है । यह मल की पूर्ति से समायुक्त है और श्लेष्मा, विष्ठा, मूत्र, इनसे पिच्छल रहा करती है, यह शरीर अपरिष्कृत रहा करता है । इस शरीर के बीजभूत ये पाँच महाभूत होते हैं । उन समस्त भूतों को जो देह की संङ्गी हैं और बीज हैं । जो वायु, तेज, पृथ्वी, जल और आकाश है इनकी वृद्धि के लिए क्रम से शोषण, दहन, भस्म, प्रोत्साह, अमृतवर्षण और आप्लवन करना चाहिए जो कि चिंता मोक्ष की विशुद्धि के लिए है । अण्ड के चिंतन से, भेद से उसके मध्य में देव का चिंतन से, स्वकीय इष्टदेव की चिन्ता सर्वात्मा रूप से होती है जो कि आत्मा को हो जाती है । मैं देव हूँ, ऐसा संस्कार हो जाता है । इसके अनन्तर जो नैवेद्य और पुष्प गन्ध आदिक है और भी पूजा के उपकरण के लिए है यहाँ पर देवत्व हो जाता है । देव आधार है, मैं देव हूँ, देव के लिए योजित करें । सबको देवता की सृष्टि से शुद्धता भी समुत्पन्न हो जाया करती है । मन और जीवात्मा की शुद्धि प्राणायाम से हुआ करती है । अन्तर्गत
३२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ जो भी मल है वह भी शुद्ध हो जाता है। ग्रह में यदि देव या यजन करे तो उस समय में उसका विलोकन करना चाहिए और आदित्य बीज के द्वारा क्रम से चारों पाश्र्वों में करे। हान्त समाप्ति से सहित और वह्नि बीज से संहित होवे । चतुर्थ के सहित उपान्त वह सकल आगे हो, यही आदित्य बीज कहा गया है जो कि समस्त रोगों का विनाश करने वाला है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारण है और सन्तोष देने वाला है । किसी अशुद्ध पक्षी का संयोग, पक्षी की विष्ठा का प्रसेचन तथा मूषिकाओं का स्पर्श एवं कृमि और कीट आदि का संगम आदि दोष नष्ट हो जाया करते हैं अवलोकन करने मात्र से ही इनका विनाश होता है और गृह दूषण नष्ट हो जाया करता है । इसके अनन्तर प्रथम योगपीठ का ध्यान का समाचरण करना चाहिए । योगपीठ का ध्यान मात्र ही पर्याप्त है। इसी से योगपीठ मण्डल में प्रवेश किया करता है । योगपीठ के स्मरण करने पर सब कुछ योगपीठ से परिपूर्ण सम हो जाता है । योगपीठ से परमोत्तम कोई आसन नहीं हुआ करता है जिसके ध्यान से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है जिसमें जड़-चेतन मनुष्य सभी हैं। उसके चिन्तन का बड़ा भारी महात्म्य है जिसके कहने का उत्साह कौन कर सकता है ! उसके चिन्तन भर से ही देखो मनुष्यों के शोक विनाश हो जाया करता है । योगपीठ के धारण करने से तो चतुर्वर्ग के फल का वह प्रदायक होता है । अब उसके ध्यान एवं चिन्तन का प्रकार बतलाया जाता है, वह विशुद्ध स्फटिक मणि के सदृश है, चतुष्कोण है और चार वृत्तियों वाला है । आधारशक्ति से विदित प्रग्रह वाला है तथा सूर्य के समान है । आग्नेय आदि चारों कोनों में क्रम से सदा ही धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य स्थित रहा करते हैं । पूर्व आदि दिशाओं में यह निम्नलिखित क्रम से स्थिति करते हैं । अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य, अवैराग्य, हैं इससे धारणार्थ व्यवस्थित हैं। उसके ऊपर जल का समुदाय है। उसमें ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, उस ब्रह्माण्ड के भीतर जल है। उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है। उस कूर्म
६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३२१ से ऊपर में अनन्त है और उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है । अनन्त के शरीर से संयुक्त एक नाल है जो पाताल तक गोचर होता है । पृथ्वी के मध्य में एक पद्म स्थित है जिसके दल दिशायें हैं और गिरि उसका केशर हैं । उसके आठ दिशाओं में दिक्पाल है और मध्यभाग में स्वर्ग अवस्थित है । उस पद्म की कर्णिका में ब्रह्मलोक है । उसके नीचे भाग में महालोक आदि हैं । स्वर्ग में ज्योतिर्मणि हैं और देवगण हैं । उनके अनन्तर में चारों वेद हैं । रज, सत्व, तम ये तीन गुण हैं जो प्रकृति से समुद्गत हैं । ये सदा ही पद्म के मध्य में स्थित है और परतत्व हैं । वहाँ पर आत्मा संस्थित है । जो ऊर्ध्वछेदन है, जो ऊपर की ओर है । अधः छेदन है जो नीचे की ओर है वहाँ पर केशर के अग्रभाग में पुनः स्थित है । इसके अनन्तर सूर्य, अग्नि, चन्द्र और मरुत के मण्डल क्रम से है । योग पीठ में शिव का आसन है और इसके परे में सुखासन है फिर आराध्य आसन है इसके पर में विमलासन है । मध्य में सम्पूर्ण इस चराचर जगत् का विशेष चिंतन करना चाहिए । वहाँ पर तीन भागों में विनिश्चित हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव का चिन्तन करना चाहिए । वहाँ पर अभ्यर्थना करने में समुपस्थित अपने आपका चिंतन करे । मण्डल, योगपीठ और पद्म का चिन्तन करना चाहिए । शव आदि चारों आसनों का भी यहाँ पर चिन्तन करे । इसके उपरान्त योगपीठ का ध्यान करके मण्डल के साथ एकता पुनः ध्यान करे । पीछे आसन का यजन करे । योगपीठ के ध्यान के द्वारा जो जिस प्रकार से जल दिया जाता है और नैवेद्य, पुष्प, धूप आदि स्वयं ही वहां पर उपस्थित हो जाया करते हैं । योगपीठ के पूजन में गन्धर्वों के सहित सब देवगण और चर, सचर, गुह्यक सभी चिन्तित और पूजित हो जाया करते हैं । अपने अभीष्ट देवता के पूजन बिना जिसके विचिन्तन से चतुर्वर्ग का लाभ उपासक किया करता है और उसकी तुष्टि एवं पुष्टि हो जाती है । आवाहन के अनन्तर ही दोनों करों के द्वारा अवतारित करना चाहिए । पहले दोनों करों को ऊँचा करे और ऊपर की ओर उत्क्षिप्त
३२२ श्रीकालिका पुराण
करके अन्तर सहित निरन्तर नीचे की ओर नमित करते हुए पूजक को करना चाहिए । गणेश के बीज से उससे अवतरित होओ, यह कहे । अभीष्ट देवों के अवलम्बन के लिए दो बार उच्चारण करे । नासिका की वायु निःसारण से देवता आकाश में स्थित हो जाते हैं । इस प्रकार से करने पर उसी स्थिति मण्डल में हो जाया करती है । स्वान्तः अंशु और बिन्दु से बीज कहा जाया करता है । यह विघ्नों के बीजों का विनाश करने वाला है और धर्म, कर्म काम साधने वाला है । गन्ध पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और जो भी अन्य वस्तु दी जाती है तथा वस्त्र और अलंकार आदि उनका देवता उच्चारण करके प्रोक्षण तथा पूजन करे । मूल मन्त्र से उत्सर्जन करके प्रतिनाम से निवेदन करना चाहिए । वरुण के बीज के द्वारा उनका प्रोक्षण करे । इष्ट मूल मन्त्र के द्वारा उसी भाँति उत्सर्ग और निवेदन करे । ऊपर चन्द्र और बिन्दु से वरुण और बीज कहा जाता है । विलोकन, पूरक तथा पृथक्-पृथक् दान-जप कर्म माला की प्रतिपत्ति यह तीन हैं । अपने इष्ट मन्त्र के द्वारा माला का प्रोक्षण कीर्तिक किया गया है । पहले गाठापत बीज का उच्चारण करके इसके अनन्तर ही करना चाहिए । हे माला! आप अविघ्न करे, इसी मन्त्र के द्वारा माला का ग्रहण करे । जप के अन्त में माला का न्यास शिर पर करे, ऐसा कहा गया है । हाथों से माला लेकर श्री बीज के द्वारा उसी भाँति अर्चना करनी चाहिए । अन्त्य दन्त्यान्य मात्राओं आदि वर्ग और तृतीय पर से पर के पूर्व में श्री बीज बिन्दु से इन्दु से माला का अवतार शिर से सदा किया जाता है । उसके हाथों से आदान करके सारस्वत से श्री बीजों का आद्य-आद्य बिन्दु चन्द्रार्ध से संयुत, यह चार बीज सारस्वत कहे जाते हैं । पौराणिकों और वैदिकों द्वारा और मूल मन्त्र के द्वारा करे । प्रदक्षिणा और प्रणाम करे जो धर्म व अर्थ का साधक है । भूमि का वीक्षण करके तथा उसका अध्युक्षण करके पूर्व से क्षिति बीज के द्वारा उस भूमि का शिर से स्पर्श करता हुआ अपने इष्ट देवताओं को प्रणिपात
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२३ करना चाहिए । समाप्ति से हीन बीज है और बिन्दु-बिन्दु से संयुत क्षिति बीज है इसको जान लेना चाहिए । यह चारों वर्गों का प्रदान करने वाला है । फिर दर्पण, व्यंजन, घण्टा, चामर का प्रोक्षण करे । हे भैरव! यह प्रोक्षण पूर्व में कहे हुए नैवेद्य लोकमन्त्र के द्वारा करे । इनके बिन्दु और इन्दु से युक्त आद्य नामों के अक्षर हैं-तस्मै नमः अर्थात् उसके लिए नमस्कार है, यह प्रांतः में, ग्रहण करना चाहिए । हे भैरव! वाग्भव के द्वितीय कामबीज से मुद्रा का बन्धन करना चाहिए । मूल मन्त्र से दर्शन करे । मुद्रा का परित्याग तारा बीज के द्वारा समाचरण करे । चन्द्र बिन्दुओं से प्रांतादि षष्ठ स्वर से संयुत जो है वह ताराबीज कहा गया है जो धर्म अर्थ और काम का साधन होता है । क्योंकि वह मुद्रा अर्थात् आनन्द को दिया करती है इसलिए यह मुद्रा-नाम से कीर्तित की गई है । मुद्रा दर्शित किए जाने पर पूजा का समापन हुआ करता है । वह स्वयं काम, मोक्ष, धर्म, अर्थ और मोद से समन्वित होती हैं । गमन करने के लिए अन्त में इन छः महामन्त्रों का उच्चारण करना चाहिए और भक्ति मार्ग के द्वारा पत्र-पुष्प फल, जल दिया गया है और जो नैवेद्य आवेदित किया गया है उसे कृपा करके ग्रहण करिए । मैं आवाहन कैसे किया जाता है, यह नहीं जान पाता हूँ और मुझे विसर्जन करने का भी ज्ञान नहीं हैं । मैं यजन के भाव को भी नहीं समझता हूँ अतएव हे परमेश्वरि! मेरी आप ही गति हैं । कर्म, मन और वचन से आपसे अन्य मेरी कोई भी गति नहीं है । हे माता! जिन-जिन सहस्रों योनियों में मैं गमन करूँ, हे अच्युते! उन योनियों में सदा आपके प्रति मेरी भक्ति होवे जो कभी भी च्युत न होवे । देवी, दात्री, भोक्त्री यह सम्पूर्ण जगत् देवीमय ही है । देवी सर्वत्र जय प्राप्त करती है । जो देवी है वह मैं ही हूँ । जो अक्षर परिभ्रष्ट हो और जो मात्रा से हीन हो, हे देवी! वह सभी आप क्षमा कर देवें । कौन ऐसा है जिसका मन स्खलित न होता हो । हे भैरव! इन मन्त्रों के पढ़े जाने पर देवी स्वयं ही प्रसन्न हो जाया करती है और वह अविलम्ब ही चतुर्वर्ग को प्रदान कर दिया करती है । ऐशानी दिशा में मण्डल की
३२४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
रचना करे जो द्वार और पद्म से वर्जित होवे । विसर्जन के लिए निर्माल्य धारिणी के पूजन के लिए मण्डल रचना करे । निर्माल्य धारिण का ध्यान पाद्य आदि के पूजन करे । उसमें निर्माल्य का निक्षेपण करके मन्त्र से विसर्जन करे । हे परमेश्वरि! अपने परमस्थान को गमन कीजिए जहाँ पर ब्रह्मा आदि देवगण परम को नहीं जानते हैं । इस मन्त्र के द्वारा विसर्जन करके अनन्तर पूरक वायु के द्वारा ध्यान करते हुए इस मन्त्र से नमस्कार करके उसको हृदय में स्थापित करे । हे परमेश्वरि! हे देवि! परमोत्तम स्थान पर अपने आसन पर विराजमान होइए । जहाँ पर मेरे हृदय में ब्रह्मादिक सब देवता स्थिति हैं । इसके उपरान्त एक जटा बीजों से इष्ट देवी का बुद्धि से स्मरण करता हुआ निर्माल्य को मूर्धा में ग्रहण करे जो कि धर्म-काम और अर्थ का साधन होता है । इसके अनन्तर विभूति के मण्डल की प्रतिपत्ति करे । समस्त अंगुलियों के समूहों से आठ दलों से संयुत पद्म को क्षति बीज के द्वारा निर्मन्थन करे । हे भैरव! मण्डल का भी निर्मन्थन करना चाहिए । इसके पश्चात् मूल मन्त्र के द्वारा अथवा पुनः सर्ववश्य के द्वारा अनामिकाओं के अग्रभाग से ललाट का संस्पर्श करे । समाप्ति के सहित प्रान्त, उसके आगे ताराबीज, स्मरबीज विसर्ग के सहित पर सभी-परम एक जटाबीज होता है जो धर्म काम और अर्थ का साधन है । इसके अनन्तर आत्मा के सहित भास्करबीज के मन्त्र के द्वारा भास्कर के लिए अच्छिद्रार्थ अर्घ्य का निवेदन करना चाहिए । हे ब्रह्मन्! भास्वान्, कर्मदायी के लिए नमस्कार है । इसके बाद दोनों हाथों को जोड़कर कथित मन्त्र को पढ़कर एकाग्रमन से वागियों द्वारा अच्छिद्र का अवधारण करे । यज्ञ का छिद्र, तपश्चर्या का छिद्र, जो छिद्र, मेरे पूजन में हो वह सब अच्छिद्र हो जावे । भास्कर भगवान् के प्रसाद से ही अच्छिद्रता हो जावे । इसके पश्चात् पुष्प, नैवेद्य, जलपात्र आदि जो भी हे उन सबको देवीबीज के द्वारा पुनःविलोकन करना चाहिए । हाथ से अथवा चक्षु से जहाँ-जहाँ पर पहले मन्त्र न्यास किया है वहाँ-वहाँ ही इससे विसृष्टि होती है ।
४०२ श्रीकालिका पुराण ४०२ ३२५ प्रान्तादि पञ्चम वह्निबीज षष्ठ स्वर से आहित तथा उपांत वाग्भव दुर्गा बीज कहा जाता है । स्थण्डिल, जलती हुई अग्नि, जल सूर्य की किरणों, और शुद्ध प्रतिमाओं में तथा शालग्राम की शिलाओं में, शिवलिंग में, शिला में विभूति के लिए पूजा करना चाहिए । एकाग्रमन वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्यास करे । योगपीठ के बीज से स्थण्डिल आदि में साधक वासुदेव भगवान्, रुद्र देव, ब्रह्माजी की और सूर्य की पूजाओं में सर्वत्र बुद्ध पुरुष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए । इस प्रकार से इन प्रतिपत्तियों से जो विष्णु भगवान् की पूजा करे तो उसको भगवान् हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते हैं । शिव हों या मिहिर हों जो भी अन्य प्रभृति होवे सभी सुरगण इस विधि में प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयी महामाया महादेवी प्रसन्न होती हैं । महामाया महादेवी इस प्रतिपत्ति का नित्य ही पूजन में चाहती रहती हैं । इस प्रकार से जो भी कोई भी पूजा किया करता है वह सम्यक फल का भागी होता है । इनसे विहीन जो भी पूजा होती है उससे अल्प से भी अल्प फल हुआ करता है । यह परम रहस्य है और परमाधिक कल्याण का अयन है । मन्त्र वेदों से परिपूर्ण और शुद्ध समस्त पापों का विनाश करने वाला होता है । जो इसका ब्राह्मणों के सन्निधान में श्रवण कराता है, श्राद्ध, यज्ञ, सुरों के पूजनों में इसको सुनाता है वह इस कर्म का बहुत अच्छा फल प्राप्त करता है । वह पूजा के बिना भी अनन्त का लाभ करता है । देवी तन्त्र कथन श्री भगवान् ने कहा-आप दोनों ही भली भाँति देवी के तन्त्र का श्रवण करिए जिसके द्वारा आराधना की हुई देवी शीघ्र ही फल प्रदायक हो जाया करती है । पूर्व में दिए हुए तन्त्र से विशेष रूप से यह निश्चय ही उत्तम तन्त्र है । सामान्यतया से यह पहले आपके आगे कहा गया है । फिर देवी की पूजा में भक्ति कर्म में विशेष रूप से जो
३२६ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ तन्त्र शेष हैं उनको मैं पुनः बतलाऊँगा । जो पुरुष महामाया की भक्ति को एकाग्रमन वाला होकर किया करता है । फल, पुष्प, ताम्बूल और जो अन्न पान आदिक हैं वह सब देवी को समर्पित किए बिना कभी नहीं खाना चाहिए । मार्ग में अथवा पर्वत के शिखर पर और सभा में साधक जैसे-तैसे निवेदन करके ही अपने अर्थ को कल्पित करना चाहिए । मदिरा के पात्र को, रक्त वर्ण वाली स्त्रियों को, सिंह को, शिव को, रक्त पद्म को, व्याघ्र और वारण (गज) के संगम को देखकर ही गुरु के लिए, राजा के लिए और फिर महामाया के लिए नमन अर्थात् नमस्कार करे । जो भार्या पतिव्रता हो उससे सदा ही ऋतुकाल में संगम करना चाहिए । चण्डिका देवी का ध्यान करके जो किया जाता है तब वह कार्य विभूति के लिए होता है । चाहे शान्तिक कर्म हो अथवा पौष्टिक कर्म हो तथा इष्टापूर्त्त कर्म हों । जब भी करे तब नमस्कार करके देवी मन्त्र का समाचरण करना चाहिए । जिस समय में तौर्यत्रिक (नृत्यगान) अथवा केवल गति को हीं देखें । और वह देवी के लिए निवेदन करके ही अपना उपयोग करना चाहिए । जो भी कोई भूषण हो अथवा वस्त्र हो या मलय से समुत्पन्न चन्दन हो उसे अपने शरीर में यदि उपयोग करे तो वहाँ पर 'धी' अर्थात् बुद्धि से मन्त्र का न्यास करना चाहिए । चाहे वह व्यायाम में हो और वह विधान में हो, सभा में हो, जल में हो या स्थल में हो, कहीं पर भी हो मन्त्र का बुद्धि से न्यास करे । जहाँ-जहाँ पर भी स्वयं गमन करे वहाँ पर ही सदा देवी का स्मरण करना चाहिए । जो जो भी कर्म पूजन का अंग स्वरूप हो उसका समाचरण मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । मंत्र से हीन पूजन का जो भी अंग होता है वह तो सब निष्फल होता है । जिस कर्म में जो भी अभीष्ट हो हे भैरव! जो मन्त्र पूजाओं में होवे । वह-वह कर्म नैवेद्य के आलोक मन्त्र के द्वारा उस-उस कर्म को समाचरित करे । देवी का मण्डल न्यास इष्ट मन्त्र के द्वारा करना चाहिए । पूजा के अन्त में मण्डल को लीप कर उसके द्वारा तिलक कराना
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२७ चाहिए । और उसको सर्ववश्य मन्त्र के द्वारा ललाट में तिलक का न्यास करे जो कि धर्म, काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है । उसके वश में सम्पूर्ण जगत् हो जाता है । यज्ञ पूजा तथा राजा सर्वशास्त्र है, यह श्रुत है । पूजन के बिना जो भी कोई नर इस मन्त्र के द्वारा निरन्तर करे उसके सब वश में हो जाते हैं चाहे वह राजा हो, राजा का पुत्र हो, स्त्रियाँ हों अथवा यक्ष तथा राक्षस हों । चारों प्रकार के भूत ग्राम सब उसके वश में हो जाया करते हैं । प्रवास में अर्थात् अपने घर से दूर देश में हो, अथवा मार्ग में हो, दुर्ग में हो, स्थान के न प्राप्त होने पर कहीं भी हो अथवा जल में हो अथवा कारागार में घिरा हुआ हो अथवा निरन्तर भूखा हो वहीं पर महामाया की पूजा करके जो कि बुद्धि पुरुष को मानसी ही करनी चाहिए । मन में भय के समुत्पन्न हो जाने पर तथा सिंह और व्याघ्र आदि के द्वारा समाकुल होने पर, दूसरे के चक्र में समागम होने पर मानसिक पूजन ही इन स्थितियों में रहने पर करना चाहिए क्योंकि ऐसी दशा में अन्य कोई भी चारा नहीं है । मन के द्वारा हृदय के अन्दर योग नामक पीठ का ध्यान करके वहीं पर पृथ्वी के मध्य में पूजन का समाचरण करना चाहिए । प्रसाधन, स्नान, दन्तधावन कर्म और अन्य सभी मन के द्वारा हो करके पूजन करना चाहिए । इसके पीछे बाहर के देश में पुष्प आदि के द्वारा पूजन की जाती है उसी भाँति हृदय में भी सभी प्रतिपत्तियाँ करनी चाहिए । देवी का यजन करने वाला निरन्तर अष्टमी तिथि में अपने रुधिरों से पूजा करनी चाहिए । लिंग में विराजमान देवी का पूजन करे । उसी भाँति पुस्तक में संस्थित देवी का पूजन करे । स्थण्डिल में संस्थित महामाया का और पादुका प्रतिमाओं में पूजन करे । चित्र और त्रिशिख में शंख का यजन करे अथवा जल में पूजन करे । शिला में, पर्वत के अग्रभाग में तथा पर्वतों में खोह में नित्य ही भक्तिभाव और श्रद्धा से संयुत देवी का पूजन करना चाहिए । वाराणसी पुरी में सदा का पूजन करना सम्पूर्ण फलों की देने वाली हुआ करती है । उससे भी दुगुनी फलप्रदाती
३२८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵ भगवान् पुरुषोत्तम की सन्निधि में हुआ करती है । उससे भी दुगुने फल की देने विशेष रूप से द्वारका में कही है । समस्त क्षेत्रों में और तीर्थों में की हुई पूजा द्वारावती की पूजा के ही समान हुआ करती है । विंध्याचल में की हुई पूजा सौगुनी फलदायिका होती है, ऐसा कहा गया है और गंगा में भी की गई पूजा उसी के समान होती है । आर्यावर्त्त, मध्यदेश, ब्रह्मवर्त्त तथा पुष्कर में करतोया नाम की नदी के जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गई है । हे भैरव! उससे भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड में होती है । उसमें भी चौगुनी जाल्पिपेश्वर की सन्निधि में की हुई बतलायी हुई है । वहाँ पर सिद्धेश्वरि की योनि में की गई पूजा उससे भी दुगुनी बताई गई है । उससे भी चौगुने फल को देने वाली लौहित्य नदी के जल में कही गई है । उसी के समान कामरूप देश में सभी जगह जल और स्थल में मानी गई है । जैसे सबसे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है । कामरूप में सुरालय में देवी की पूजा प्रशस्त होती है । देवी का क्षेत्र कामरूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल में देवी विरल ही हुआ करती है और कामरूप में तो घर-घर में ही विद्यमान रहती है । इससे भी सौ गुने महत्व वाली पूजा नीलकूट पर्वत के शिखर पर होती है । उससे भी दुगुने शिवलिंग में की गई पूजा फलदायिनी होती है । उससे भी दुगुनी फलदायिनी शैल पुत्र्यादि की योनियों में कही गई हैं । उससे भी सौ गुनी अधिक महत्व वाली पूजा कामाख्या देवी की योनि मण्डल में बतलाई गई है । कामाख्या में महामाया की पूजा को एक बार कर चुका है वह इस लोक में कामनाओं को प्राप्त करता है और परलोक में भगवान् शिव की स्वरूपता का लाभ किया करता है । उस पुरुष के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और फिर उसका कोई भी कृत्य शेष नहीं रह जाता है । वह पुरुष अपना मनोवांछित अर्थ इस लोक में प्राप्त करके चिरायु हो जाता है । उसकी गति वायु के ही समान हो जाती है जो अन्यों के द्वारा कभी भी बाधित नहीं हुआ करती
௰ श्रीकालिका पुराण ௰ ३२९ है । वह पुरुष संग्राम अथवा शास्त्रावाद में दुर्जय हो जाता है । वैष्णवी तन्त्र के द्वारा कामाख्या के योनि मण्डल में एक बार अभ्यर्चन करके उसका सौ गुना फल का लाभ किया करता है । मूलमूर्ति महामाया योगनिद्रा जगन्मयी है उसका वैष्णवी तन्त्र पहले ही प्रतिपादित कर दिया गया है । अन्य जो मूर्तियाँ कही गई है जो शैलपुत्री आदि दूसरी हैं वे सब उसी के विभाग हैं और उसके ही शरीर से निर्गत हुई हैं । जिस रीति से नित्य ही सूर्य के बिम्ब से किरणें निःसकरण किया करती हैं ठीक उसी भाँति देवी महामाया के शरीर से उग्रचण्डा आदि निकला करती हैं । मेरे द्वारा आपको उन्हीं के अंगरूप कहने चाहिए महामाया का स्वरूप तो एक ही है और कार्यों के सम्पादन करने के लिए वही भिन्नता को प्राप्त हुई हैं । कामाख्या तो महामाया है और मूलमूर्ति गान ही गाया जाया करता है । वह पीठों के द्वारा विभिन्न नामों वाली होकर महामाया गायी जाया करती है । जिस प्रकार से एक ही भगवान् विष्णु नित्य होने से सनातन हैं । जनों के पीड़ा को दूर करने से वही प्रभु जनार्दन, इन नाम से कहे गए हैं । ठीक उसी भाँति महामाया कामार्थ गिरि में संगत हुई थी उसी समय यह महादेवी के द्वारा और नरों के द्वारा निरन्तर कामाख्या कही जाती है । जैसे कोई पुरुष छत्र के ग्रहण करने से छत्री हो जाया करता है और स्नान काल में स्नापक कहा जाता है ठीक उसी रीति से नाम से यह कामाख्या हो गई है । महामाया का शरीर के लिए समुपस्थित हुआ था । लोहित, कुकर्मों से पीत जो कामार्थ उपयोजित किए गए हैं । कामकाल में खंड का परित्याग करके वह स्वयं ही स्त्रक् को ग्रहण किया करती है । जिस समय वह काम को त्याग कर देने वाली होती है उस समय में वह असिधारिणी होती है । लोहित पंकज को न्यस्त करने वाले शिव प्रेम कामकाल में सित प्रेत के ऊपर संस्थित काम को परित्यक्त कर देने वाली रमण करती है । उसी भाँति इधर-उधर गमन करके सिंह के ऊपर विराजमान होती हुई कामदा हो जाती है । किसी समय तो वह सित प्रेत पर होती है और
३३० [ornament] श्रीकालिका पुराण [ornament] ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ किसी समय में रक्त पंकज पर स्थित होती हैं । किसी अवसर पर वह केशरी के पीठ पर संस्थित होती हुई कामरूप वाली रमण किया करती है । जिस अवसर पर वह लोहित पद्म पर संस्थित हुआ करती है तो उस समय उसके आगे केशरी चरण किया करता है । जिस समय प्रेत पर स्थित देवी होती है उस समय आगे अन्य का निरीक्षण किया करती है । जिस समय वह महामाया के स्वरूप से वह वरदा होती है उस समय पूजा के काल में प्रेत, पद्म और सिंह के ऊपर स्थित होती है । जिस अवसर पर रक्त पद्म में ध्यान करे तब आगे हरि का चिन्तन करना चाहिए । जब हरि में ध्यान करे तब अन्य दो आगे चिन्तन करे । एक ही स्थान तीनों के ध्यान करने पर प्रेत पद्म हरि में क्रम से करना चाहिए । उन पर कामदा देवी के स्थित होने पर कामदा हरि में क्रम से करना चाहिए । एक-एक पर भी जैसे भी उसी भाँति शिवा का चिन्तन करे । वह एक समस्त जगतों की प्रकृति जहाँ-तहाँ ब्रह्मा, विष्णु, देवों के द्वारा वह जगन्मयी धारण की जाया करती है । सित प्रेत महादेव हैं, ब्रह्मा लोहितपद्म हैं, हरि हरि हैं ऐसे ही महान् ओज वाले के वाहन जानने चाहिए । क्योंकि अपनी मूर्ति से उनका वाहन होना युक्त नहीं होता है । इसी कारण से अन्य मूर्ति करके तीनों वाहनता को प्राप्त हुए हैं । जिस-जिस में महामाया शिव निरन्तर प्रसन्न होती हैं उसी-उसी रूप से तीनों ही आसन हुए थे । सिंह के ऊपर रक्त पद्म स्थिति है, उसके ऊर्ध्व में गत शिव हैं । उनके ऊपर वह वर देने वाली अभय दायिनी महामाया है । इस प्रकार के स्वरूप से ध्यान करके निरन्तर शिव का पूजन करना चाहिए । उससे ब्रह्मा, विष्णु और शिव बिना ही संशय के पूजित हो जाते हैं । इस प्रकार से सदा कामाख्या एक रूप वाली महामाया ध्यान से और रूप से भिन्न है इससे वहाँ पर उसका पूजन करना चाहिए । इस प्रकार से दुर्गा के विशेष तन्त्रों को आप दोनों को कह दिए हैं । हे परमश्रेष्ठों! अब उसके अंग मन्त्रों का आप श्रवण करिए ।
३३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ मृणाल के सदृश आयत स्पर्श वाली दश बाहुओं से युक्त है । दाहिने हाथ में त्रिशूल, देव, खड्ग, चक्र क्रम से नीचे की ओर हैं । बाहुओं के संघों में तीक्ष्ण बाण तथा शक्ति से संगत है । ऊपर की ओर खेटक, पूर्ण, चाप, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं । नीचे की ओर बिना शिर वाले महिष असुर को प्रदर्शित करना चाहिए । जिसका शिर छिन्न हो गया है और जो दानव अपने हाथ में खण्ड लिए हुए हैं । जो हृदय में बल से विद्ध हो रहा है और जिसकी अँतड़ियाँ बाहर निकल रही हैं । स्रवित होते हुए रक्त से जिसके अंग रुधिर प्लावित हो रहे हैं और जो रक्त से विस्फुरित नेत्रों वाला हो रहा है । जो नागपाश से वेष्टित है और जो क्रोधावेश के कारण कुटिल भौंहों से समन्वित मुख वाला है । जो पाश के सहित बाँये हाथ से दुर्गा के द्वारा मस्तक के केश पकड़ा हुआ है । जिसमें मुख से रुधिर प्रवाहित हो रहा है ऐसी देवी के सिंह का भी प्रदर्शन करना चाहिए । देवी का दाहिना चरण सिंह के ऊपर संस्थित है तथा कुछ ऊपर की ओर वाम चरण का अंगुष्ठ महिषासुर पर स्थित है । इस प्रकार के ध्यान को करते हुए फिर देवी का ध्यान करे जो उग्र चण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चामुण्डा चण्डिका है । इन आठ शक्तियों से निरन्तर परिवेष्टित है । इसी रीति से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी का निरन्तर चिन्तन करना चाहिए । इसका एक मन होकर श्रवण करो । यह धर्म काम और अर्थ का साधन है । इसका अंग मन्त्र दुर्गा तन्त्र, यह श्रुत किया गया है । सूर्य के मकर राशि पर स्थित होने पर जो शुक्ल पक्ष की पंचमी होती है । उसमें इस तन्त्र के द्वारा विधि-विधान के साथ शिवा का भली भाँति पूजन करके फिर शुक्ल पक्ष की अष्टमी में यथाविधि देवी का पूजन करके नवमी तिथि में बहुत बलिदानों का समाचरण करना चाहिए और सन्ध्या के समय में अपने शरीर से उक्षित रुधिर की बलि करनी चाहिए । उस प्रकार से करने पर कल्याणों से युक्त होता हुआ पुरुष नित्य ही प्रमुदित होता है ।
वह मनुष्य पुत्रों और प्रपौत्रों से समृद्ध और धन-धान्य समृद्धियों से समन्वित होता है और वह दीर्घ आयु वाला, सर्व प्रकार के सुभग इस लोक में होता है । शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में चैत्र मास में उस समय में होने वाले पुष्पों से और अशोकों से भी जो पुरुष इस मन्त्र के द्वारा पूजन किया करता है उसे कभी शोक नहीं होता है अथवा कोई रोग भी नहीं होता है और न दुर्गत ही होती है । ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनुष्य भली भाँति उपवास करे और नवमी तिथि में तिलों सहित अन्नों, यावकों, मोदकों से, क्षीर, घृत-शहद, शर्करा के सहित पिष्टक से, अनेक पशुओं के रुधिर से और माँसों से पूजन करे । इसके अनन्तर शुक्ल पक्ष की दशमी में तिलों से मिश्रित जल से दुर्गा मन्त्र के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से करने पर दशमी तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन हो जाता है और ऐसा करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है । आषाढ़ मास के शुक्ल की दशमी में तिलों से मिश्रित जल से दुर्गा मन्त्र के द्वारा तीन अंजलियाँ देनी चाहिए । इस रीति से करने पर दशमी तिथि में दस जन्मों में भी जो पाप किया है वह प्रलीन हो जाता है और करने वाला पुरुष दीर्घायु भी हो जाता है । आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की जो अष्टमी है और श्रावण मास की अष्टमी है उसमें पवित्रा धारण करावे । पवित्राओं का आरोपण देवी का परमाधिक प्रीति करने वाला होता है । हे भैरव! दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा बीज से, हे भैरव! पवित्रारोपण का समाचरण करे । विशेष रूप से श्रवण को प्राप्त करके देवी को पवित्रारोपण करना चाहिए । समस्त देवों का पवित्रारोपण करना चाहिए । आषाढ़ में अथवा श्रावण में सम्वत्सर के फल का प्रदायक होता है । द्वितीया तो देवी के श्री की है जो अन्य सब तिथियों में उत्तम है, ऐसा कहा गया है । तृतीया तिथि भवभामिनी की है और चतुर्थी उसके सुत की है, पंचमी सोमराज की है और षष्ठी गुही की बतायी गयी है । सप्तमी भुवन भास्कर की कही गई है तथा अष्टमी
३३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ तिथि दुर्गा देवी की है । मातृगणों की नवमी तिथि कही है तथा दशमी तिथि वासुकि की होती है । एकादशी ऋषियों की है और द्वादशी भगवान् चक्रपाणि की होती है । त्रयोदशी कामदेव की है और मेरी चतुर्दशी तिथि है ① ब्रह्मा और दिक्पालों की पौर्णमासी तिथि मानी गयी है । जो पुरुष देवों को पवित्राओं का आरोपण नहीं करता है उसकी साम्वत्सरी पूजा के फल को भगवान् केशव हरण कर लिया करते हैं । इसीलिए प्रयत्नपूर्वक पवित्रारोपण अवश्य करना चाहिए । ऐसा करने पर बहुत फल की प्राप्ति होती है । पवित्रा जिस सूत्र से और जैसे भी करना चाहिए उसका ज्ञान होना चाहिए तभी उसे पवित्रारोपण करना चाहिए । हे भैरव! सर्वप्रथम तो दर्भ सूत्र है उससे पर पद्म सूत्र होता है । इसके पश्चात् क्षेम सुपुण्य होता है और इससे पर कपास का सूत्र हुआ करता है । यत्नपूर्वक पवित्रा विचित्र करने चाहिए । अर्थात् कई रंगों से समन्वित होने चाहिए । गन्धमाल्य सुरभियों से जैसा कहा गया है विरचित होने चाहिए । उस सूत को कन्या कर ले अथवा पवित्रता प्रमदा उसको करले । जो विधवा हो और साधुशीला हो वह उसको करले किन्तु दुःशील या दुःख शील कभी भी इसको न करे । इस पवित्रा की रचना में ऐसे सूत्र का वर्णन कर देवे जो सुई से भिन्न हो, दग्ध हो, भस्म और धूप से अविगुण्ठित हो । जिसका उपयोग किया गया हो, जो चूहों के द्वारा कुतरा हुआ हो, मद्य एवं रक्त से दूषित हो, मलिन, नील रक्त हो, ऐसे सूत्र का यत्नपूर्वक परिवर्जन कर देना चाहिए । सूत्रों से कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम पवित्रा की रचना करे । कनिष्ठ जो पवित्रा है वह सत्ताईस तन्तुओं का होता है । यह पवित्रा मर्त्यलोक में यश, कीर्ति, सुख और सौभाग्य का बढ़ाने वाला होता है । चौवन तन्तुओं का पवित्रा मध्यम कहा गया है । परम दिव्य भोगों का आवाहन करने वाला पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष का प्रदान करने वाला उत्तम होता है जो एक सौ आठ तन्तुओं के द्वारा निर्मित होता है उसको महादेवी के लिए अर्पित करके मनुष्य भगवान् शिव के सायुज्य
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३३५ की प्राप्ति किया करता है । यदि भगवान् वासुदेव के लिए उत्तम पवित्रा को समर्पित करे तो वेदपुरुष सीधा हरि के लोक में गमन किया करता है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । महादेवी को अर्पित पवित्रा तो भुक्ति और मुक्ति के प्रदान करने वाला होता है । जो पुरुष रत्न माला में महादेवी की सेवा में पवित्रा का समर्पण किया करता है वह सहस्र करोड़ कल्पों तक स्वर्ग में निवास करके शिव ही हो जाया करता है । यह तो नागहार नाम वाला भगवान् शंकर का पवित्रा होता है । एक सहस्र आठ तन्तुओं के द्वारा परम मनोहर पवित्रा बनाकर जो मेरे लिए अर्पित किया करता है वह उसमें जितने ही तन्तुओं का संचय होता है उतने ही सहस्र कल्पों तक मेरे ही लोक में आनन्द का उपभोग किया करता है । एक हजार आठ से भगवान् हरि की वनमाला कही गई है । उनके तन्तुओं के दान से भगवान् विष्णु के सायुज्य की प्राप्ति होती है । जो कनिष्ठ पवित्रा होता है वह कल्पपर्यन्त रहने वाला होता है । बारह ग्रन्थियों से समन्वित आत्ममान के द्वारा उसे योजित करे । ऊरुओं तक आने वाला मध्यम पवित्रा होता है । वहाँ पर ग्रन्थियों को योजित कर लेना चाहिए । इसका चौबीस का मान आत्मा का है वह उत्तम कोटि का पवित्रा होता है । है भैरव! वह जन्तु पर्यन्त कहा गया है । अपने मान से छत्तीस ग्रन्थियों को योजित करे । एक सौ आठ ग्रन्थियों का सुविधान से करना चाहिए । नागहार नामक जो है उसी के समान अन्यों में विद्यमान से पवित्र किया जाता है । जिस सूत्र के द्वारा पुनः ग्रन्थियाँ होती हैं, उससे अन्यय वर्ग वाले सूत्र से लक्षण से समन्वित पवित्रा की रचना करनी चाहिए । कनिष्ठ में सात वेष्ठनों के द्वारा ग्रन्थि करे । मध्यम में दुगनी करे और उत्तम में तिगुनी करे । पूर्व दिन में पवित्रताओं का अधिवासन करना चाहिए । फिर वहाँ दूसरे दिन में मन्त्रा में मन्त्र करे । दुर्गा बीज मन्त्र लोक वैष्णवी तन्त्र के द्वारा करे । विचक्षण पुरुष को प्रत्येक ग्रन्थि में स्वयं मन्त्र का न्यास करना चाहिए । हे भैरव! यहाँ पर जितनी भी ग्रन्थियाँ हों उतनी ही भाँति न्यास करे ।
൘९ श्रीकालिका पुराण ൘९ ३३५ की प्राप्ति किया करता है। यदि भगवान् वासुदेव के लिए उत्तम पवित्रा को समर्पित करे तो वेदपुरुष सीधा हरि के लोक में गमन किया करता है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। महादेवी को अर्पित पवित्रा तो भुक्ति और मुक्ति के प्रदान करने वाला होता है। जो पुरुष रत्न माला में महादेवी की सेवा में पवित्रा का समर्पण किया करता है वह सहस्त्र करोड़ कल्पों तक स्वर्ग में निवास करके शिव ही हो जाया करता है। यह तो नागहार नाम वाला भगवान् शंकर का पवित्रा होता है। एक सहस्त्र आठ तन्तुओं के द्वारा परम मनोहर पवित्रा बनाकर जो मेरे लिए अर्पित किया करता है वह उसमें जितने ही तन्तुओं का संचय होता है उतने ही सहस्त्र कल्पों तक मेरे ही लोक में आनन्द का उपभोग किया करता है। एक हजार आठ से भगवान् हरि की वनमाला कही गई है। उनके तन्तुओं के दान से भगवान् विष्णु के सायुज्य की प्राप्ति होती है। जो कनिष्ठ पवित्रा होता है वह कल्पपर्यन्त रहने वाला होता है। बारह ग्रन्थियों से समन्वित आत्ममान के द्वारा उसे योजित करे। ऊरुओं तक आने वाला मध्यम पवित्रा होता है। वहाँ पर ग्रन्थियों को योजित कर लेना चाहिए। इसका चौबीस का मान आत्मा का है वह उत्तम कोटि का पवित्रा होता है। हे भैरव! वह जन्तु पर्यन्त कहा गया है। अपने मान से छत्तीस ग्रन्थियों को योजित करे। एक सौ आठ ग्रन्थियों का सुविधान से करना चाहिए। नागहार नामक जो है उसी के समान अन्यों में विद्यमान से पवित्र किया जाता है। जिस सूत्र के द्वारा पुनः ग्रन्थियाँ होती हैं, उससे अन्यय वर्ग वाले सूत्र से लक्षण से समन्वित पवित्रा की रचना करनी चाहिए। कनिष्ठ में सात वेष्ठनों के द्वारा ग्रन्थि करे। मध्यम में दुगनी करे और उत्तम में तिगुनी करे। पूर्व दिन में पवित्रताओं का अधिवासन करना चाहिए। फिर वहाँ दूसरे दिन में मन्त्रा में मन्त्र करे। दुर्गा बीज मन्त्र लोक वैष्णवी तन्त्र के द्वारा करे। विचक्षण पुरुष को प्रत्येक ग्रन्थि में स्वयं मन्त्र का न्यास करना चाहिए। हे भैरव! यहाँ पर जितनी भी ग्रन्थियाँ हों उतनी ही भाँति न्यास करे।
३३६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ उसके मन्त्र उससे अंगोपयोजन होवें। दुर्गा तन्त्र के मन्त्र के द्वारा सत्त्व न्यास करना चाहिए। एक स्थान में यज्ञपात्र में समस्त पवित्राओं को रखकर उसमें गन्ध आदि और पुष्पों को रखकर परम शोभन, हे भैरव! अँगुली के अग्रभाग से फिर तत्त्व न्यास करावे। द्विज का मन्त्र न्यास 'इन्द्रविष्णुः' यह कहा गया है। शूद्रों के मन्त्र से मेरा तत्व न्यास कहा गया है। इसके द्वारा इसके मन्त्र और इससे ही दान करावे। कुंकुम, उशीर, कर्पूर और चंदन आदि विलेपनों से पवित्रताओं का विलेपन करके तत्व न्यास को योजित करना चाहिए। मनुष्य विधिपूर्वक मण्डल में देवी का अभ्यर्चन करे। दुर्गा बीज द्वारा देवी के मस्तक में पवित्रा का समर्पण करना चाहिए। जिस देव का जो कहा है उसका उसी से ही मण्डल होता है। जिस-जिसका जो मन्त्र है जैसा भी ध्यान आदि पूजन है वह उसी मन्त्र से ही यत्नपूर्वक पूजन करके उसके ही बीज और मन्त्र से मस्तक में पवित्रा का अर्पण करे। जो भी मुझको पवित्रा का समर्पण करता है और दोनों देवों के लिए देता है। हे भैरव! सभी देवों का सम्पूर्ण अर्थ होता है। अग्नि, ब्रह्माभवानी, गज वक्त्र, महोरग, स्कन्द, भानु, मातृगण, दिक्पाल, नवग्रह, इन सबको घटों में यथाविधि, प्रत्येक का पूजन करके परम सावधान होते हुए इनके लिए एक-एक पवित्रा मस्तक में समर्पित करे। पञ्चगव्य चरु को बना करके देवी के लिए तीन आहुतियाँ देवे। उसी से भगवान् विष्णु और शम्भू के लिए यथाविधि देवे। आज्य (घृत) तथा तिल संयुत घृत से अष्टोत्तर शत आहुतियाँ देनी चाहिए। साधन करने वाले को महादेवी के लिए एक सौ आठ आहुतियाँ देनी चाहिए। इसी विधान से भगवान् विष्णु आदि को भी साधक द्वारा आहुतियाँ देनी चाहिए। धर्म, काम और अर्थ की सिद्धि के लिए पवित्रारोपण करना चाहिए। यह एक परमावश्यक कृत्य है। अनेक प्रकार के नैवेद्य पेय पिष्टक मोदकों से, कूष्माण्ड, नारिकेल, खजूर, आम्र, दाड़िम, कर्क, रुद्राक्ष आदि विविध भाँति के फलों के द्वारा,
[Page Header] ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३३७
[Main Text] समस्त भक्ष्य भोज्य आदि से, माँस ओदन से, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र-भूषण से भवानी का साधक यजन करे । हे भैरव! नर और नर्तकों के समुदाय तथा वेश्याओं के द्वारा देवी का मनोविनोद करे । नृत्य और गीतों से समुदित होकर रात्रि में जागरण करे । द्विजातियों के साथ और ज्ञानियों को तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे । पवित्रारोपण के हो जाने पर दक्षिणा का उपदायन करे । दक्षिणा में सुवर्ण, गौ, तिल, घृत, वस्त्र अथवा शाक ही देवे । इसके अनन्तर साधक इस मन्त्र का उच्चारण करे, हे परमेश्वरि! मणि, विद्रुम की मालाओं से और मन्धर के कुसुम आदि के द्वारा आपकी यह साम्वत्सरी पूजा सम्पन्न होवे । इसके उपरान्त पूजाओं से और प्रतिपत्तियों के द्वारा देवी का विसर्जन करना चाहिए । इस रीति से देवी को यथाविधि पवित्राओं के दान के हो जाने पर सम्वत्सर की जो पूजा है वह वासर से सम्पूर्ण हो जाया करती है । वह मनुष्य सैंकड़ों करोड़ कल्पों में देवी के ही घर में निवास किया करता है और वहाँ पर भी उसको सुख, सौभाग्य की अतुल समृद्धि होती है ।
[Section Header] महिषासुर उपाख्यान
श्री भगवान् ने कहा-दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा दुर्गा का महोत्सव करना चाहिए । शरद् काल में महानवमी को राजास आदि का बलिदान करना चाहिए । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जो अष्टमी तिथि होती है, वह महाअष्टमी कही गई है जो देवी की परम प्रीति करने वाली हुआ करती है । इसके पश्चात् जो नवमी तिथि होती है वह महानवमी कही गई है । वह समस्त लोकों की पूजनीय और शिव की होती है । हे भैरव! हे वत्स! इन दोनों में जो पूजा होती है उसमें जो कुछ भी विशेषता है उसका आप श्रवण करिए । मण्डल में विधि के साथ देवी का प्रयत्त होकर मनुष्य भली भाँति पूजा करे । हे भैरव! वैष्णवी तन्त्र से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा के मन्त्र से मूर्ति भेद में जैसे देवी भूति के लिए पूजा का ग्रहण किया करती है । कन्या राशि पर सूर्य के आ जाने