कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
बृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री (लेखक—आचार्य वी० आर० श्रीरामचन्द्र दीक्षितार एम्० ए० )
भारतवर्षकी वास्तविक प्रतिभा यहाँके प्राचीन ऋषि- मुनियोंमें पायी जाती है। उनकी दृष्टि बड़ी दूरदर्शिनी थी । वे वस्तुओंको उनके वास्तविक रूपमे देखते थे। इन्हीं ऋषि- मुनियोंकी कृपासे वह वैदिक एव वेदान्तिक वाङ्मय उपलब्ध हुआ है, जिसे आज हम बड़ी रुचिके साथ एक निधिके रूप- मे सँजोते हैं। इस वाङ्मयमें उपनिषद् साहित्यका बहुत ऊँचा स्थान है और उसका यह गौरव न्याय्य भी है। उपनिषदोंमे बृहदारण्यकोपनिषद् एक विशेष स्थान रखता है। उपनिषदोंकी महत्ताका पार पाना दुष्कर है। उनकी गणना उस श्रेणीके साहित्यमें की जा सकती है, जिसका सृजन तब होता था, जब देशके गण्यमान्य व्यक्ति—प्रधानतया राजा तथा ऊँची श्रेणीके राजनीतिज्ञ अपने कठिन कर्मठ जीवनके बाद वन्य आश्रमोंमें चले जाते थे और मोक्षकी आकाङ्क्षासे अपने जीवनके सन्ध्याकालको भजन-ध्यानमें व्यतीत करते थे। उन आश्रमोंमें उन शिष्ट नरेशों एवं विद्वान् ब्राह्मणोंके बीच जो वार्तालाप होता था, उसे भावी सन्ततिके हितार्थ लिपिबद्ध कर लिया जाता था। उपनिषद् शब्दके वाच्यार्थ निकट उपवेशनसे ही उपनिषदोंके उद्भवकी उपर्युक्त सम्भावनाका सङ्केत मिल जाता है। उपनिषदोंके नामोंसे ही उनको जन्म देनेवाले भौगोलिक प्रदेशोंका भी सङ्केत मिलता है और यह भी पता चलता है कि सबका लक्ष्य उसी एक दुरधिगम महान् तत्त्व अर्थात् आत्म-साक्षात्कारका ही विवेचन और निर्णय करना है। उपनिषदोंमे मुख्यतया पुनर्जन्मके सिद्धान्तका प्रतिपादन हुआ है । इस सिद्धान्तका धर्म अथवा इतिहासकी अपेक्षा हिंदू-दर्शनसे अधिक सम्बन्ध है । संक्षेपमे यह सिद्धान्त हमे बतलाता है कि सभी प्राणियोंके हृदयमे एक ही परमात्माका निवास है, जो अमर और अविनाशी है। शरीरके शान्त हो जानेपर उसमे रहने- वाला देही उसको त्यागकर दूसरे शरीरमे प्रवेश कर जाता है। इसलिये वास्तवमे मृत्यु शरीरकी होती है, आत्माकी नही। इस तथ्यका अर्थात् आत्माकी अमरताका जिसको ज्ञान हो जाता है, वह जीवन-मरणके चक्करसे छूटकर ब्रह्मसे एकत्व प्राप्त कर लेता है। बृहदारण्यकका शाब्दिक अर्थ है एक विशाल वनसे सम्बन्धित । ऐसा अनुमान होता है कि किसी आत्मदर्शना- भिलाषी विद्वत्समाजने इस ग्रन्थरत्नको किसी वृहद्वनमे जन्म दिया होगा, जो प्राचीन भारतमे पर्याप्त प्रसिद्ध था । आज यह कहना सम्भव नहीं है कि वह वन कौन सा था तथा किस युगमे यह ग्रन्थ लिखा गया था। यह प्रमाणभूत वैदिक ग्रन्थ माध्यन्दिन और काण्व नामक दो शाखाओमें प्राप्त है, पर श्रीशङ्कराचार्यजीने अपनी भाष्यरचनाके लिये काण्व शाखाके पाठको ही ग्रहण किया है। यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण उपनिषदोंकी कोटिमे आता है। मधु, याज्ञवल्क्य और खिल नामसे इसके तीन खण्ड हैं। पर हम इस उपनिषद्में यत्र- तत्र प्राप्य ऐतिहासिक सामग्रीपर ही विचार करेंगे। अश्वमेध प्रथम अध्यायके आरम्भमें ही अश्वमेध यज्ञका उल्लेख है । वास्तवमे प्रथम अध्यायके अन्तर्गत प्रथम खण्डका नाम ही अश्वब्राह्मण है। इसमे यज्ञीय अश्वके शरीरको यज्ञके अधिष्ठातृ देवता प्रजापतिका विराट् देह मानकर वर्णन किया गया है । अश्वमेध एक वैदिक यज्ञ है । ऊर्ध्वलोकोंमे सबसे ऊँचे ब्रह्मलोककी प्राप्ति ही इसके अनुष्ठानका उद्देश्य होता है। पर यह स्थिति नित्य नहीं है । यज्ञ करनेवालेको फिर जन्म लेना पड़ता है और आवागमनसे उसे तबतक मुक्ति नहीं मिलती, जबतक कि वह अज्ञानपर विजय पाकर ब्रह्मके साथ एकाकार नहीं हो जाता। वैदिक संहिताओंमें उल्लिखित तीन कर्म ऐसे हैं, जिनका स्वरूप राजनीतिक है। इन कर्मोंका राज्याभिषेक-संस्कारसे घनिष्ठ सम्बन्ध है। राजसूय यज्ञके अनुष्ठानसे मनुष्य राजा बनता है। इसलिये जैसा कि मैने अपने ‘Hindu Administrative Institutions' नामक ग्रन्थमें कहा है, यह यज्ञ राजाके लिये राज्याधिकार ग्रहण सस्कार है। वाजपेय यज्ञका करनेवाला सम्राट्की पदवी प्राप्त करता है। स्मृतिकार^१ कात्यायनने राजसूयसे वाजपेय यज्ञकी श्रेष्ठता बतायी है। शतपथ ब्राह्मणमे^२ राजसूय यज्ञका विस्तृत वर्णन मिलता है। वाजपेयकी महत्ता- का वर्णन भी इस ग्रन्थमें^३ पाया जाता है। अश्वमेधका उद्देश्य भी राजनीतिक होता था। प्रत्येक प्रतापी नरेशसे यह आशा की जाती थी कि वह इस इन्द्रपद ( १ ) १५ १ १०.२, (२) ५ २, (३) ५ १. १. ८,
- बृहदारण्यकोपनिषद्में ऐतिहासिक अध्ययनकी सामग्री * १५९ प्रदान करनेवाले यज्ञका अनुष्ठान करे । यद्यपि इस यज्ञका स्वरूप बड़ा जटिल है, फिर भी एगेलिंग (Eggeling) के शब्दोंमें यह एक राजकीय महोत्सव था। इस यज्ञके मूलका हमे कोई पता नहीं है । पर ऋग्वेदमे, यहाँतक कि पहले ही मण्डल ( १ । १६२-१६३ ) मे इसका उल्लेख मिलता है। अश्वमेधका, जिसका शतपथब्राह्मणके १३ वे खण्डमे निरूपण किया गया है, महाभारतमें भी रोचक वर्णन मिलता है। वहाँ पाण्डवोंने बड़े समारोहसे इसे किया है। उक्त इतिहास ग्रन्थमें इस प्रसङ्गके अन्तमे लिखा है 'अश्वमेध यजमानको समस्त पाप- कर्मों और दुष्कृतोंसे मुक्त कर देता है।' पर प्राय. इसका अनुष्ठान विश्व-विजय कर लेनेके उपरान्त ही होता था । दूसरे शब्दोंमें इसका यह अर्थ है कि प्राचीन हिन्दू राजा भारतवर्ष- को अपने शासनाधीन भूमण्डलका एक प्रदेश तथा अपनेको अखिल पृथ्वीका अधिपति मानते थे ।१ उपनिषदोंका प्रधान विषय ब्रह्मज्ञान है और इसको प्राप्त करनेके लिये उन विधियों और साधनोंका उल्लेख किया गया है, जिनसे हम आत्म-सम्बन्धी अपने अज्ञानको मिटाकर ब्रह्मत्व लाभ करें । प्रथम अध्यायके दूसरे खण्डका नाम अग्नि-ब्राह्मण है । इसमे अश्वमेधमे प्रयुक्त होनेवाली अग्निकी उत्पत्ति और स्वरूपका वर्णन है । यहाँ ध्यानपर भी जोर दिया गया है। जैसे यज्ञीय अश्वका प्रजापतिके रूपमे ध्यान किया जाता है, वैसे ही अग्निका भी उसी रूपमें ध्यान करना चाहिये । बृहदारण्यकोपनिषद्ने इस वैदिक अनुष्ठानको प्रत्येक सच्चे क्षत्रियके लिये विधेय बताया है । ऐतिहासिक कालमें भी पुष्यमित्र, शुङ्ग और समुद्रगुप्त आदि राजाओंने इस महान् यज्ञको किया था और इस प्रकार विजित प्रदेशोंपर अपने चक्रवर्तित्वकी प्रतिष्ठा की थी । इसका अनुष्ठान ईस्वी सन्की दसवीं शताब्दिके आसपास बद हुआ प्रतीत होता है। धर्म 'धर्म' शब्द बड़ा व्यापक और विभिन्न अर्थोंमें प्रयुक्त होता है । इससे सदाचारके विविध स्वरूपोंका बोध होता है । प्रत्येक मत एव सम्प्रदायका एक विशिष्ट धर्म होता है । इसीको हम हिंदू-धर्म, बौद्ध-धर्म या जैन-धर्म आदि नामोंसे पुकारते है । परंतु एक हिंदूके लिये सभी कुछ धर्म है, क्योंकि उसका सत्यमें विश्वास है । ससारकी सृष्टिके समय केवल मात्र एक विराट् था । इस विराट्ने अपनेको एकाकी पाया और अपने हितक लिये एव परिणामतः जगत्के हितार्थ उसने न केवल स्त्री-पुरुषों की वर इतर जीवों तथा अन्य पदार्थोंकी सृष्टि की। फिर भी उसको सतोष नहीं हुआ, तब उसने ब्राह्मण जातिकी रचना की । तत्पश्चात् क्षत्रियोकी उत्पत्ति हुई, जिन्हें रक्षाका भार सौंपा गया । क्षत्रियोंको ऐसे विशेष गुणोंसे विभूषित किया गया, जिनकी ब्राह्मण भी प्रशसा करते हैं। राजसूय यज्ञमे ब्राह्मणका आसन सदैव नीचे रहता है, यद्यपि क्षत्रियोंको प्रकट उन्होंने ही किया है । यज्ञके समाप्त हो जानेपर क्षत्रिय यजमान ब्राह्मणको प्रणाम करता था। ऐसा किये बिना वह अपने मूलको ही नष्ट करनेवाला हो जायगा । क्षत्रियकी राजाके रूपमे प्रतिष्ठा होती थी । इस वर्णकी सृष्टिके बाद भी धनका अभाव प्रतीत हुआ, जिसके बिना यज्ञादिका सपूर्ण होना असभव था । अतः वैश्योंकी उत्पत्ति हुई । किंतु विराट्को जीवनमे ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके लिये एक भृत्यकी भी आवश्यकताका अनुभव हुआ । अतएव शूद्र जातिका आविर्भाव हुआ । इस वर्णके अधिष्ठातृ देवता पूषण हैं। इसका वाच्यार्थ है 'पोषण करनेवालां।'१ यह वर्णधर्मका ही वर्णन है । इससे हमें यह मान लेना चाहिये कि समाजका चार वर्णोंमें विभाजन एक वैदिक व्यवस्था है; और हिंदू होनेके नाते हमें यह भी मानना चाहिये कि यह मनुष्यकृत नहीं, भगवत्कृत है। ऋग्वेदके पुरुषसूक्तसे ही इस बातका प्रमाण मिल जाता है । वैदिक कालके बादके साहित्यमें एतद्विषयक प्रचुर प्रमाणोंका तो कहना ही क्या है । इसीलिये श्रीकृष्ण महाराज भगवद्गीतामें कहते है— 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश. ।' आधुनिक विद्वान् 'सृष्टम्' शब्दके वास्तविक तात्पर्यको बिना समझे ही इसकी इस प्रकारसे असदालोचना करते हैं— मानो यह व्यवस्था भगवान्की नहीं, बल्कि भारतीय प्राचीन पूर्वजोंकी बनायी हुई हो । यदि और कुछ नहीं तब भी यह एक दृढ आर्थिक व्यवस्था थी, जिसमे आधुनिक सभ्यताके प्रतियोगिता, योग्यतमावशेष आदि कई निकृष्ट दोषोंका सर्वथा अभाव था । दु.खकी बात है कि यह व्यवस्था धीरे- धीरे मिट रही है और अव्यवस्थाग्रस्त जगत्की दुरवस्था और भी बढ़ती जा रही है । जबतक हम ऐसी ही किसी व्यवस्थाका, जिसको ससार स्वीकार कर ले, पुनर्निर्माण नहीं कर लेंगे तबतक विश्वके अनेक आर्थिक और सामाजिक दोषोंका, जो आज हमारे सामने उपस्थित है, सन्तोषजनक परिहार नहीं होगा, चाहे हम कितने ही सभा-सम्मेलन कर लें । ( १ ) शतपथब्राह्मण १२ ७. १ ( १ ) १ ४. १०. १.
१६० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * बृहदारण्यकोपनिषद्में लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, नाम भी हैं जैसे विश्वामित्र और जमदग्नि, गौतम और भरद्वाज, वैश्य एवं शूद्र आदि चारों वर्णोंकी सृष्टि कर लेनेके बाद भी वसिष्ठ और कश्यप, अत्रि और मैत्रेयी । यह मैत्रेयी विराट्को पूर्ण सन्तोष नहीं प्राप्त हुआ। उसके मनमें यह याज्ञवल्क्य ऋषिकी पत्नी थी । उपनिषद्के दूसरे अध्यायके आशङ्का छिपी हुई थी कि क्षत्रिय लोग उच्छृङ्खल हो जायेंगे। चौथे ब्राह्मणमें जो कथा है, उसका समावेश आत्म विद्याकी उनको नियन्त्रणमे तथा अपने उचित स्थानपर स्थिर प्राप्तिके लिये त्यागकी आवश्यकता बतानेके लिये किया गया रखनेके लिये धर्मकी उत्पत्ति हुई और सच्चे क्षत्रियको है, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयीका संवाद है। इस संलापका बताया गया कि धर्म ही राजाओंका भी राजा है। दूसरे शब्दोंमें निष्कर्ष यह है कि केवल आत्मा ही ध्यानीय है । एक धर्मसे बड़ा और कुछ नहीं था। चाहे कोई राजा कितना भी इतिहासका विद्यार्थी इससे इस निश्चयपर पहुँचता है कि शक्तिशाली हो, धर्मका अनुशासन मानना उसके लिये ये व्यक्ति बृहदारण्यकोपनिषद्की रचनाके पूर्वके एक युगमें अनिवार्य था। दुर्बल व्यक्ति भी धर्मकी शरणमे जाकर त्राण विद्यमान थे । उनमेंसे कुछ प्रसिद्ध वैदिक ऋषि हैं। मैत्रेयी पा सकते थे। उपनिषदोंके अनुसार धर्म ही सत्य है और इस बातके उदाहरणके रूपमें उपस्थित की जा सकती हैं कि सत्य ही धर्म है। किसी वस्तुके सैद्धान्तिक ज्ञानका नाम सत्य वैदिक कालमे भारतवर्षमें स्त्रियाँ न केवल शिक्षित और है, पर आचरणमे लानेपर वही धर्म कहा जाता है। किसी संस्कृत ही होती थीं, परन्तु वे आत्मज्ञानकी प्राप्तिमे भी स्वतन्त्र विशेष धर्मका आचरण करनेके लिये मनुष्यको पहले चारों थीं। यह कहना भूल है कि वे अशिक्षित, अज्ञ और पराधीन वर्णोंमेसे किसी एकसे सम्बन्ध स्थिर करना चाहिये, क्योंकि थीं। यहाँ एक प्रश्न यह उठता है कि क्या याज्ञवल्क्य- प्रत्येक वर्णका अपना विशेष धर्म है। स्मृतिकी रचना करनेवाले ही वे ऋषि हैं, जिनका उल्लेख उपनिषद्मे हुआ है। याज्ञवल्क्य स्मृतिको ध्यानसे देखनेपर यह कहा जा चुका है कि धर्मसे बढकर कुछ नहीं है यह पता चलता है कि इसका आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त और धर्म ही राजाओंका भी राजा है। इसका यह अर्थ हुआ नामक तीन खण्डोंमें विभाजन एक ऐसी प्रणाली है जो पीछेकी कि राजाओंका कर्तव्य नयी धाराओंको बनाना नहीं है, अपेक्षा प्राचीन धर्म शास्त्रोंमे ही अधिक पायी जाती है। वर पूर्वनिश्चित नियमोंको ही शासनव्यवहारमें लाना है। मेरी सम्मतिमे यह स्मृति जिस रूपमे प्राप्त हैं, वह पर्याप्त अतः राजाका कर्तव्य धर्मकी व्याख्या करके निर्णय देना है। इससे पहलेकी रचना है, सम्भवतः कौटिल्यके अर्थशास्त्रसे भी यह प्रकट होता है कि हिंदू कालके भारतवर्षमें कोई धारासभा पूर्वकी। यद्यपि अपने वर्तमान स्वरूपमें यह ग्रन्थ आदिसे अन्त- नहीं थी । वास्तवमें उल्लेखके योग्य कोई धारा-निर्माण- तक ऋषि याज्ञवल्क्यकी ही रचना न भी हो, पर यह बिल्कुल विभाग नहीं था । राजाको अनीति मार्गपर जानेसे रोकनेके सम्भव है कि यह याज्ञवल्क्यके सम्प्रदायकी वस्तु हो और कई उपायोंमेंसे एक यह भी था कि उसे देशके विधानोंके सम्भवतः उनके किमी उत्साही शिष्यद्वारा लिपिबद्ध हुई हो। अनुसार ही शासन करनेको बाध्य किया जाता था। इन विधानोंके निर्माणका कार्य अधिक बुद्धिवाले व्यक्तियोंके बृहदारण्यकके स्वरूप, इसके विषय तथा शतपथ ब्राह्मणका (ब्राह्मणोंके) हाथमे था । अन्तिम भाग होनेके कारण आधुनिक विद्वानोंकी सम्मतिमें इसके रचना कालको आठवीं और सातवीं शताब्दी ईसापूर्व उपनिषद्में आये हुए कुछ नाम माना जाता है । परन्तु इसका रचनाकाल चाहे जो भी हो, यह ग्रन्थ है अत्यन्त प्राचीन । विश्वमें व्याप्त मायापर विजय बृहदारण्यकोपनिषद्में आये हुए कई नामोंमेंसे याज्ञवल्क्य पानेका सर्वोत्तम साधन क्या है--यही इसका प्रतिपाद्य विषय है एव जनक वैदेहका नाम मुख्यरूपसे उल्लेखनीय है। गर्ग और अन्तमे यह इस निष्कर्षपर पहुँचता है कि परमात्माका कुलके भी एक वग़जका उल्लेख है, जिसने काशीके किन्हीं ज्ञान हुए बिना मायापर विजय सम्भव नहीं । राजा अजातशत्रुसे मिलकर उन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वास्तविक सत्यका उपदेश किया था (अध्याय २-१) । कुछ अन्य व्यक्तियोंके
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(१) उसी ग्रन्थमें १ ४. १४—१५
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कल्याण प्रार्थना
पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ (ईशा० १६)
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ 'शावा 'पो॑ षद् यह ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदसंहिताका चालीसवाँ अध्याय है। मन्त्र-भागका अंश होनेसे इसका विशेष महत्त्व है। इसीको सबसे पहली उपनिषद् माना जाता है। शुक्लयजुर्वेदके प्रथम उनतालीस अध्यायोंमें कर्मकाण्डका निरूपण हुआ है। यह उस काण्डका अन्तिम अध्याय है और इसमें भगवत्तत्त्वरूप ज्ञानकाण्डका निरूपण किया गया है। इसके पहले मन्त्रमें 'ईशा वास्यम्' वाक्य आनेसे इसका नाम 'ईशावास्य' माना गया है। शान्तिपाठ • ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥* ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=सच्चिदानन्दघन, अदः=वह परब्रह्म; पूर्णम्=सब प्रकारसे पूर्ण है, इदम्=यह (जगत् भी), पूर्णम्=पूर्ण (ही) है; (क्योंकि) पूर्णात्=उस पूर्ण (परब्रह्म) से ही; पूर्णम्=यह पूर्ण, उदच्यते=उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य=पूर्णके, पूर्णम्=पूर्णको, आदाय=निकाल लेनेपर (भी), पूर्णम्, एव=ही, अवशिष्यते=बच रहता है। व्याख्या—वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकारसे सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत् भी उस परब्रह्मसे पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तमसे ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्मकी पूर्णतासे जगत् पूर्ण होनेपर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्णमेंसे पूर्णको निकाल लेनेपर भी वह पूर्ण ही बच रहता है। त्रिविध तापकी शान्ति हो। ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ॥ १ ॥ जगत्याम्=अखिल ब्रह्माण्डमें, यत् किं च=जो कुछ भी, जगत्=जड-चेतनस्वरूप जगत् है, इदम्=यह, सर्वम्=समस्त; ईशा=ईश्वरसे, वास्यम्=व्याप्त है, तेन=उस ईश्वरको साथ रखते हुए, त्यक्तेन=त्यागपूर्वक, भुञ्जीथाः= (इसे) भोगते रहो, मा गृधः=(इसमें) आसक्त मत होओ, (क्योंकि) धनम्=धन—भोग्य-पदार्थ, कस्य स्वित्= किसका है अर्थात् किसीका भी नहीं है ॥ १ ॥ व्याख्या—मनुष्योंके प्रति वेद भगवान्का पवित्र आदेश है कि अखिल विश्व-ब्रह्माण्डमें जो कुछ भी यह चराचरात्मक जगत् तुम्हारे देखने-सुननेमें आ रहा है, सब-का-सब सर्वाधार, सर्वनियन्ता, सर्वाधिपति, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वकल्याण- गुणस्वरूप परमेश्वरसे व्याप्त है, सदा सर्वत्र उन्हींसे परिपूर्ण है (गीता ९।४)। इसका कोई भी अंग उनसे रहित नहीं है (गीता १०। ३९,४२)। ऐसा समझकर उन ईश्वरको निरन्तर अपने साथ रखते हुए—सदा-सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत्में त्यागभावसे केवल कर्तव्यपालनके लिये ही विषयोंका यथाविधि उपभोग करो अर्थात् यथार्थ—विश्वरूप ईश्वरकी पूजाके लिये ही कर्मोंका आचरण करो। विषयोंमें मनको मत फँसने दो, इसीमे तुम्हारा निश्चित कल्याण है (गीता २।६४; ३।९; १८।४६)। वस्तुतः ये भोग्य-पदार्थ किसीके भी नहीं हैं। मनुष्य भूलसे ही इनमें
- यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद्के पाँचवें अध्यायके प्रथम ब्राह्मणकी प्रथम कण्डिकाका पूर्वार्द्धरूप है। उ० अ० २१—
१६२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ममता और आसक्ति कर बैठता है। ये सब परमेश्वरके हैं और उन्हींके लिये इनका उपयोग होना चाहिये * ॥ १ ॥ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ कर्माणि=शास्त्रनियत कर्मोंको, कुर्वन्=(ईश्वरपूजार्थ) करते हुए; एव=ही, इह=इस जगत्में, शतम् समाः=सौ वर्षोंतक, जिजीविषेत्=जीनेकी इच्छा करनी चाहिये, एवम्=इस प्रकार (त्यागभावसे, परमेश्वरके लिये), कर्म=किये जानेवाले कर्म, त्वयि=तुझ, नरे=मनुष्यमें, न लिप्यते=लिप्त नहीं होंगे; इतः=इससे (भिन्न), अन्यथा=अन्य कोई प्रकार अर्थात् मार्ग, न अस्ति=नहीं है (जिससे कि मनुष्य कर्मसे मुक्त हो सके) ॥ २ ॥ व्याख्या—अतएव समस्त जगत्के एकमात्र कर्ता, धर्ता, हर्ता, सर्वशक्तिमान् सर्वमय परमेश्वरका सतत स्मरण रखते हुए सब कुछ उन्हींका समझकर उन्हींकी पूजाके लिये शास्त्रनियत कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते हुए ही सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करो—इस प्रकार अपने पूरे जीवनको परमेश्वरके प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रोक्त स्वकर्मका आचरण करते हुए जीवन-निर्वाह करना केवल यज्ञार्थ—परमेश्वरकी पूजाके लिये ही है; अपने लिये नहीं—भोग भोगनेके लिये नहीं। कर्म करते हुए कर्मोंमें लिप्त न होनेका यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्मबन्धनसे मुक्त होनेका नहीं है (गीता २।५०, ५१, ५।१०) ॥ २ ॥ सम्बन्ध—इस प्रकार कर्मफलरूप जन्मबन्धनसे मुक्त होनेके निश्चित मार्गका निर्देश करके अब इसके विपरीत मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंकी गतिका वर्णन करते हैं— असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३ ॥ असुर्याः=असुरोंके, (जो) नाम=प्रसिद्ध, लोकाः=नाना प्रकारकी योनियाँ एवं नरकरूप लोक हैं; ते=वे सभी; अन्धेन तमसा=अज्ञान तथा दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे; आवृताः=आच्छादित हैं, ये के च=जो कोई भी; आत्महनः=आत्माकी हत्या करनेवाले, जनाः=मनुष्य हैं; ते=वे; प्रेत्य=मरकर; तान्=उन्हीं भयङ्कर लोकोंको; अभिगच्छन्ति=बार-बार प्राप्त होते हैं ॥ ३ ॥ व्याख्या—मानव शरीर अन्य सभी शरीरोंसे श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एव वह जीवको भगवान्की विशेष कृपासे जन्म-मृत्युरूप संसार-समुद्रसे तरनेके लिये ही मिलता है। ऐसे शरीरको पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्मसमूहको ईश्वर-पूजाके लिये समर्पण नहीं करते और कामोपभोगको ही जीवनका परम ध्येय मानकर विषयोंकी आसक्ति और कामनावश जिस किसी प्रकारसे भी केवल विषयोंकी प्राप्ति और उनके यथेच्छ उपभोगमें ही लगे रहते हैं, वे वस्तुतः आत्माकी हत्या करनेवाले ही हैं; क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करनेवाले वे लोग अपने जीवनको केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं वर अपनेको और भी अधिक कर्मबन्धनमे जकड़ रहे हैं। इन काम भोग-परायण लोगोंको,—चाहे वे कोई भी क्यो न हों, उन्हें चाहे संसारमें कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों,—मरनेके बाद उन कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार कूकर-शूकर, कीट- पतङ्गादि विभिन्न शोक-सन्तापपूर्ण आसुरी योनियोंमें और भयानक नरकोंमे भटकना पड़ता है। (गीता १६। १६, १९, २०) इसीलिये श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है कि मनुष्यको अपनेद्वारा अपना उद्धार करना चाहिये, अपना पतन नहीं करना चाहिये (गीता ६।५) ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—जो परमेश्वर सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हैं, जिनका सतत स्मरण करते हुए तथा जिनकी पूजाके लिये ही समस्त कर्म करने चाहिये, वे कैसे हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
- कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ ऐसा माना है— इस ब्रह्माण्डमें जो कुछ यह जगत् है, सब ईश्वरसे व्याप्त है। उस ईश्वरके द्वारा तुम्हारे लिये जो त्याग किया गया है अर्थात् प्रदान किया गया है, उसीको अनासक्तरूपसे भोगो। किसीके भी धनकी इच्छा मत करो।
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६३ अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ (तत्)=वे परमेश्वर; अनेजत्=अचल; एकम्=एक; (और) मनसः=मनसे (भी), जवीयः=अधिक तीव्र गतियुक्त हैं, पूर्वम्=सबके आदि, अर्षत्=ज्ञानस्वरूप या सबके जाननेवाले हैं, एनत्=इन परमेश्वरको, देवाः=इन्द्रादि देवता भी, न आप्नुवन्=नहीं पा सके या जान सके हैं, तत्=वे (परब्रह्म पुरुषोत्तम), अन्यान्=दूसरे, धावतः=दौड़ने- वालोंको, तिष्ठत्=(स्वयं) स्थित रहते हुए ही; अत्येति=अतिक्रमण कर जाते हैं, तस्मिन्=उनके होनेपर ही—उन्हींकी सत्ता-शक्तिसे, मातरिश्वा=वायु आदि देवता, अपः=जलवर्षण, जीवकी प्राणधारणादि क्रिया प्रभृति कर्म, दधाति=सम्पादन करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥ व्याख्या—वे सर्वान्तर्यामी सर्वशक्तिमान् परमेश्वर अचल और एक हैं, तथापि मनसे भी अधिक तीव्र वेगयुक्त हैं। जहाँतक मनकी गति है, वे उससे भी कहीं आगे पहलेसे ही विद्यमान हैं। मन तो वहाँतक पहुँच ही नहीं पाता । वे सबके आदि और ज्ञानस्वरूप हैं अथवा सबके आदि होनेके कारण सबको पहलेसे ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण- रूपसे नहीं जान सकते (गीता १०। २)। जितने भी तीव्र वेगयुक्त बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी गतिभर परमेश्वरके अनुसन्धानमें सदा दौड़ लगाते रहते हैं, परंतु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहाँतक पहुँच ही नहीं पाते। असीमकी सीमाका पता ससीमको कैसे लग सकता है ? बल्कि वायु आदि देवताओंमें जो शक्ति है, जिसके द्वारा वे जलवर्षण, प्रकाशन, प्राणि-प्राणधारण आदि कर्म करनेमें समर्थ होते हैं, वह इन अचिन्त्यशक्ति परमेश्वरकी शक्तिका एक अंशमात्र ही है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—अब परमेश्वरकी अचिन्त्यशक्तिमत्ता तथा व्यापकताका प्रकारान्तरसे पुन वर्णन करते हैं— तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ तत्=वे; एजति=चलते हैं; तत्=वे; न एजति=नहीं चलते, तत्=वे, दूरे=दूरसे भी दूर हैं; तत्=वे, उ अन्तिके= अत्यन्त समीप हैं; तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के, अन्तः=भीतर परिपूर्ण हैं, (और) तत्=वे, अस्य=इस, सर्वस्य=समस्त जगत्के; उ बाह्यतः=बाहर भी हैं ॥ ५ ॥ व्याख्या—वे परमेश्वर चलते भी हैं और नहीं भी चलते, एक ही कालमे परस्परविरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमे रह सकती हैं, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिन्त्य शक्तिकी महिमा है। दूसरे प्रकारसे यह भी कहा जा सकता है कि भगवान् जो अपने दिव्य परम धाममें और लीलाधाममें अपने प्रिय भक्तोंको सुख पहुँचानेके लिये अप्राकृत सगुण- साकार रूपमे प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है, और निर्गुणरूपसे जो सदा-सर्वथा अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा-प्रेमसे रहित मनुष्योंको कभी दर्शन ही नहीं देते, अतः उनके लिये दूर-से दूर हैं, और प्रेमकी पुकार सुनते ही जिन प्रेमीजनोके सामने चाहे जहाँ उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिये वे समीप-से- समीप है। इसके अतिरिक्त वे सदा-सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिये दूर-से-दूर भी वही हैं और समीप-से-समीप भी वही हैं; क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं है, जहाँ वे न हों। सबके अन्तर्यामी होनेके कारण भी वे अत्यन्त समीप हैं; पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूपमें नहीं पहचानते, उनके लिये वे बहुत दूर हैं। वस्तुतः वे इस समस्त जगत्के परम आधार हैं और परम कारण हैं, इसलिये बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं। * (गीता ७। ७) ॥ ५ ॥
- कुछ आदरणीय विद्वानोंने इसका भावार्थ इस प्रकार माना है— यह आत्मतत्त्व अचल रहकर ही चलता हुआ-सा जान पड़ता है, अज्ञानियोंके लिये अप्राप्य होनेसे बहुत दूर है और ज्ञानियोंका आत्मा होनेसे समीप है। महाकाशमें घटाकाशकी भाँति भीतर और बाहर भी वही है। एक दूसरे विद्वान् यह अर्थ करते हैं—
१६४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध- अब अगले दो मन्त्रोंमे इन परब्रह्म परमेश्वरको जाननेवाले महापुरुषकी स्थितिका वर्णन किया जाता है— यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ तु=परन्तु, यः=जो मनुष्य, सर्वाणि=सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणियोंको, आत्मनि=परमात्मामे, एव=ही; अनुपश्यति=निरन्तर देखता है, च=और, सर्वभूतेषु=सम्पूर्ण प्राणियोंमे, आत्मानम्=परमात्माको (देखता है); ततः= उसके पश्चात् (वह कभी भी), न विजुगुप्सते=किसीसे घृणा नहीं करता ॥ ६ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जो मनुष्य प्राणिमात्रको सर्वाधार परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मामें देखता है और सर्वान्तर्यामी परम प्रभु परमात्माको प्राणिमात्रमें देखता है, वह कैसे किससे घृणा या द्वेष कर सकता है ? वह तो सदा सर्वत्र अपने परम प्रभुके ही दर्शन करता हुआ (गीता ६। २९-३०) मन-ही-मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकार सेवा करना और उन्हें सुख पहुँचाना चाहता है *॥ ६ ॥ यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ यस्मिन्=जिस स्थितिमें, विजानतः=परब्रह्म परमेश्वरको भलीभाँति जाननेवाले महापुरुषके (अनुभवमे), सर्वाणि= सम्पूर्ण, भूतानि=प्राणी, आत्मा=एकमात्र परमात्मस्वरूप, एव=ही; अभूत्=हो चुकते हैं, तत्र=उस अवस्थामें; (उस) एकत्वम्=एकताका-एकमात्र परमेश्वरका, अनुपश्यतः=निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये; कः=कौन-सा; मोहः= मोह (रह जाता है और), कः=कौन-सा, शोकः=शोक ! (वह शोक-मोहसे सर्वथा रहित, आनन्दपरिपूर्ण हो जाता है) ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस प्रकार जब मनुष्य परमात्माको भलीभाँति पहचान लेता है, तब उसकी सर्वत्र भगवद्दृष्टि हो जाती है-तब वह प्राणिमात्रमे एकमात्र तत्त्व श्रीपरमात्माको ही देखता है। उसे सदा सर्वत्र परमात्माके दर्शन होते रहते हैं और इस कारण वह इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि शोक-मोहादि विकारोंकी छाया भी कहीं उसके चित्तप्रदेशमे नहीं रह जाती । लोगोंके देखनेमें वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभुमे ही क्रीड़ा करता है (गीता ६। ३१) । उसके लिये प्रभु और प्रभुकी लीलाके अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता † ॥ ७ ॥ सम्बन्ध- अब इस प्रकार परमप्रभु परमेश्वरको तत्त्वसे जाननेका तथा सर्वत्र देखनेका फल बतलाते हे— स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ सः=वह महापुरुष, शुक्रम्=(उन) परम तेजोमय, अकायम्=सूक्ष्मशरीरसे रहित; अव्रणम्=छिद्ररहित या क्षत- रहित, अस्नाविरम्=शिराओंसे रहित-स्थूल पाञ्चभौतिक शरीरसे रहित, शुद्धम्=अप्राकृत दिव्य सच्चिदानन्दस्वरूप; अपाप- दूसरे सब उससे भय-प्रकम्पित रहते हैं, पर वे किसीके भयसे नहीं कापते। वे दूर भी हैं, समीप भी हैं, सबके भीतर भी हैं और बाहर भी ।
- कुछ आदरणीय विद्वान् इस मन्त्रका भावार्थ इस प्रकार करते हैं— (१) जो मुमुक्षु सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने आत्मासे पृथक् नहीं देखता और उन प्राणियोंके आत्माको अपना ही आत्मा जानता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें अपने आत्मस्वरूपको देखनेवाला पुरुष किसीसे भी घृणा नहीं करता । (२) जो पुरुष सब प्राणियोंको परमात्मामें और सब प्राणियोंमें परमात्माको देखता है, वह निर्भय हो जाता है। फिर वह अपनी रक्षाकी कोई चिन्ता नहीं करता । • † कुछ आदरणीय विद्वान् इसका ऐसा भावार्थ मानते हैं— जिस समय आत्मस्वरूपमें परमार्थतत्त्वको जाननेवालेकी दृष्टिमें समस्त प्राणी आत्मभावको ही प्राप्त हो गये होते हैं, उस समय अथवा उस आत्मामें कहाँ मोह रह सकता है और कहाँ शोक ?
- ईशावास्योपनिषद् * १६५ विद्धम् = शुभाशुभकर्म-सम्पर्कशून्य परमेश्वरको, पर्यगात् = प्राप्त हो जाता है, (जो) कविः = सर्वद्रष्टा, मनीषी = सर्वज्ञ एवं ज्ञानस्वरूप, परिभूः = सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्वनियन्ता; स्वयम्भूः = स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं (और), शाश्वतीभ्यः = अनादि; समाभ्यः = कालसे, याथातथ्यतः = सब प्राणियोंके कर्मानुसार यथायोग्य, अर्थान् = सम्पूर्ण पदार्थोंकी, व्यदधात् = रचना करते आये है ॥ ८ ॥ व्याख्या-उपर्युक्त वर्णनके अनुसार परमेश्वरको सर्वत्र जानने-देखनेवाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वरको प्राप्त होता है, जो शुभाशुभ कर्मजनित प्राकृत सूक्ष्म देह तथा पाञ्चभौतिक अस्थि-शिरा-मांसादिमय षड्विकारयुक्त स्थूल देहसे रहित, छिद्ररहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानन्दघन हैं, एवं जो क्रान्तदर्शी-सर्वद्रष्टा हैं, सबके ज्ञाता, सबको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले सर्वाधिपति और कर्मपरवश नहीं, वरं स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले हैं। तथा जो सनातन कालसे सब प्राणियोंके लिये उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थोंकी यथायोग्य रचना और विभाग-व्यवस्था करते आये हैं * ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-अब अगले तीन मन्त्रोंमें विद्या और अविद्याका तत्त्व समझाया जायगा। इस प्रकरणमें परब्रह्म परमेश्वरकी प्राप्तिके साधन 'ज्ञान'को विद्याके नामसे कहा गया है और स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्ति अथवा इस लोकके विविध भोगैश्वर्यकी प्राप्तिके साधन 'कर्म'को अविद्याके नामसे। इन ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको भलीभाँति समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य ही इन दोनों साधनोंके द्वारा सर्वोत्तम तथा वास्तविक फल प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं-इस रहस्यको समझानेके लिये पहले उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं- अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ॥ ९ ॥ ये = जो मनुष्य; अविद्याम् = अविद्याकी; उपासते = उपासना करते हैं, ते = वे, अन्धम् = अज्ञानस्वरूप, तमः = घोर अन्धकारमें, प्रविशन्ति = प्रवेश करते हैं, (और) ये = जो मनुष्य, विद्यायाम् = विद्यामे, रताः = रत हैं अर्थात् ज्ञानके मिथ्याभिमानमे मत्त हैं, ते = वे, ततः = उससे, उ = भी, भूयः इव = मानो अधिकतर, तमः = अन्धकारमे (प्रवेश करते हैं) ॥ ९ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य भोगोंमें आसक्त होकर उनकी प्राप्तिके साधनरूप अविद्याका-विविध प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं, वे उन कर्मोंके फलस्वरूप अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण विविध योनियों और भोगोंको ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य-जन्मके चरम और परम लक्ष्य श्रीपरमेश्वरको न पाकर निरन्तर जन्म-मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें पड़े हुए विविध तापोंसे सतत होते रहते हैं। दूसरे जो मनुष्य न तो अन्त:करणकी शुद्धिके लिये कर्त्तापनके अभिमानसे रहित कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं और न विवेक-वैराग्यादि ज्ञानके प्राथमिक साधनोंका ही सेवन करते हैं, परंतु केवल शास्त्रोंको पढ़-सुनकर अपनेमे विद्याका-ज्ञानका मिथ्या आरोप करके ज्ञानाभिमानी वन बैठते हैं, ऐसे मिथ्याज्ञानी मनुष्य अपनेको ज्ञानी मानकर, 'हमारे लिये कोई भी कर्तव्य नहीं है' इस प्रकार कहते हुए कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देते हैं और इन्द्रियोंके वशमे होकर शास्त्रविधिसे विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। इससे वे लोग सकामभावसे कर्म करनेवाले विषयासक्त मनुष्योंकी अपेक्षा भी अधिकतरं अन्धकारको-पशु-पक्षी, शूकर-कूकुर आदि नीच योनियोंको और रौरव-कुम्भीपाकादि घोर नरकोंको प्राप्त होते हैं ॥ ९ ॥ सम्बन्ध-शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर ज्ञान तथा कर्मका अनुष्ठान करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, उसका संकेतसे वर्णन करते हैं- अन्यदेवाहुर्विद्ययान्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥
- इस मन्त्रका भावार्थ कुछ आदरणीय महानुभावोंने इस प्रकार भी किया है- वह पूर्वोक्त निर्विशेष आत्मा आकाशके सदृश सर्वव्यापक, दीप्तिमान्, अशरीरी, अक्षत, स्नायुरहित (स्थूलशरीरसे रहित) तथा धर्माधर्मरूप पापसे रहित है। वह सर्वद्रष्टा, सर्वज्ञ, सबके ऊपर और स्वयं ही सब कुछ है। उस नित्यमुक्त ईश्वरने सम्वत्सर नामक प्रजापतियोंको उनकी योग्यताके अनुसार अर्थोंका-कर्तव्य-पदार्थोंका-यथायोग्य विभाग कर दिया है।
१६६ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * विद्यया=ज्ञानके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत् एव=दूसरा ही फल, आहुः=बतलाते हैं ( और ) अविद्यया=कर्मके यथार्थ अनुष्ठानसे, अन्यत्=दूसरा ( ही ) फल, आहुः=बतलाते हैं; इति=इस प्रकार; ( हमने ) धीराणाम्=( उन ) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम=वचन सुने हैं, ये=जिन्होंने; नः=हमें, तत्=उस विषयको, विचचक्षिरे=व्याख्या करके भली- भाँति समझाया था ॥ १० ॥ व्याख्या-सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले ज्ञानका यथार्थ स्वरूप है-नित्यानित्यवस्तुका विवेक, क्षणभङ्गुर विनाश- शील अनित्य इहलौकिक और पारलौकिक भोगसामग्रियो और उनके साधनोंसे पूर्ण विरक्ति, संयमित पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मके चिन्तनमे अखण्ड संलग्नता । इसके अनुष्ठानमे परब्रह्म पुरुषोत्तमका यथार्थ ज्ञान होता है और उसके अनन्तर उनकी प्राप्ति होती है ( गीता १८ । ४९-५५ ) । ज्ञानाभिमानमे रत स्वेच्छाचारी मनुष्योंको जो दुर्गतिरूप फल मिलता है, यथार्थ ज्ञानका यह सर्वोत्तम फल उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करानेवाले कर्मका स्वरूप है-कर्ममें कर्तापनके अभिमानका अभाव, राग द्वेष और फलकामनाका अभाव एव अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थितिके अनुरूप केवल भगवत्-सेवाके भावसे श्रद्धापूर्वक शास्त्रविहित कर्मोंका यथायोग्य सेवन । इसके अनुष्ठानसे समस्त दुर्गुण और दुराचारोंका अशेष रूपसे नाश हो जाता है और हर्ष- शोकादि समस्त विकारोंसे रहित होकर साधक मृत्युमय संसार-सागरसे तर जाता है । सकामभावसे किये जानेवाले कर्मोंका जो फल उन कर्ताओंको मिलता है, उससे इस यथार्थ कर्म सेवनका यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषोसे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १० ॥ सम्बन्ध-अब उपर्युक्त प्रकारसे ज्ञान और कर्म-दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट शब्दोंमें बतलाते हैं- विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥ यः=जो मनुष्य, तत् उभयम्=उन दोनोंको, ( अर्थात् ) विद्याम्=ज्ञानके तत्त्वको, च=और, अविद्याम्= कर्मके तत्त्वको, च=भी, सह=साथ-साथ, वेद=यथार्थतः जान लेता है, अविद्यया=( वह ) कर्मोंके अनुष्ठानसे, मृत्युम्= मृत्युको, तीर्त्वा=पार करके, विद्यया=ज्ञानके अनुष्ठानसे, अमृतम्=अमृतको, अश्नुते=भोगता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या-कर्म और अकर्मका वास्तविक रहस्य समझनेमे बड़े-बड़े बुद्धिमान् पुरुष भी भूल कर बैठते ह ( गीता ४। १६) । इसी कारण कर्म-रहस्यसे अनभिज्ञ ज्ञानाभिमानी मनुष्य कर्मको ब्रह्मज्ञानमें बाधक समझ लेते हे और अपने वर्णा- श्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मोंका त्याग कर देते है, परंतु इस प्रकारके त्यागसे उन्हें त्यागका यथार्थ फल-कर्मबन्धनसे छुटकारा नहीं मिलता (गीता १८।८)। इसी प्रकार ज्ञान (अकर्मावस्था-नैष्कर्म्य) का तत्त्व न समझनेके कारण मनुष्य अपनेको ज्ञानी तथा संसारसे ऊपर उठे हुए मान लेते है। अतः वे या तो अपनेको पुण्य-पापसे अलिप्त मानकर मनमाने कर्माचरणमे प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मोंको भाररूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलस्य, निद्रा तथा प्रमादमे अपने दुर्लभ मानव- जीवनके अमूल्य समयको नष्ट कर देते हैं। इन दोनो प्रकारके अनर्थोंसे बचनेका एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञानके रहस्यको साथ-साथ समझकर उनका यथा- योग्य अनुष्ठान करना ही है। इसीलिये इस मन्त्रमें यह कहा गया है कि जो मनुष्य इन दोनोंके तत्त्वको एक ही साथ भलीभाँति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थितिके अनुरूप शास्त्रविहित कर्मोंका स्वरूपतः त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापनके अभिमानसे तथा राग-द्वेष और फलकामनासे रहित होकर उनका यथायोग्य आचरण करता है। इससे उसकी जीवनयात्रा भी सुखपूर्वक चलती है और इस भावसे कर्मानुष्ठान करनेके फलस्वरूप उसका अन्तःकरण समस्त
❖ ईशावास्योपनिषद् ❖ १६७ दुर्गुणों एवं विकारोंसे रहित होकर अत्यन्त निर्मल हो जाता है और भगवत्कृपासे वह मृत्युमय संसारसे सहज ही तर जाता है । इस कर्मसाधनके साथ-ही-साथ विवेक-वैराग्यसम्पन्न होकर निरन्तर ब्रह्मविचाररूप ज्ञानाभ्यास करते रहनेसे श्री- परमेश्वरके यथार्थ ज्ञानका उदय होनेपर वह शीघ्र ही परब्रह्म परमेश्वरको साक्षात् प्राप्त कर लेता है * ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—अब अगले तीन मन्त्रोंमें असम्भूति और सम्भूतिका तत्त्व बतलाया जायगा । इस प्रकरणमें 'असम्भूति' शब्दका अर्थ है—जिनकी पूर्णरूपसे सत्ता न हो, ऐसी विनाशशील देव, पितर और मनुष्यादि योनियाँ एवं उनकी भोगसामग्रियाँ । इसीलिये चौदहवें मन्त्रमें 'असम्भूति'के स्थानपर स्पष्टतया 'विनाश' शब्दका प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार 'सम्भूति' शब्दका अर्थ है— सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाला अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम (गीता ७ । ६-७) । देव, पितर और मनुष्यादिकी उपासना किस प्रकार करनी चाहिये और अविनाशी परब्रह्मकी किस प्रकार—इस तत्त्वको समझकर उनका अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य ही उनके सर्वोत्तम फलोंको प्राप्त हो सकते हैं, अन्यथा नहीं । इस भावको समझानेके लिये, पहले, उन दोनोंके यथार्थ स्वरूपको न समझकर अनुष्ठान करनेवालोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हैं— अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याँरताः ॥ १२ ॥ ये=जो मनुष्य; असम्भूतिम्=विनाशशील देव-पितरादिकी; उपासते=उपासना करते हैं; (ते)=वे; अन्धम्= अज्ञानरूप; तमः=घोर अन्धकारमें; प्रविशन्ति=प्रवेश करते हैं, (और) ये=जो, सम्भूत्याम्=अविनाशी परमेश्वरमें; रताः=रत हैं अर्थात् उनकी उपासनाके मिथ्याभिमानमें मत्त हैं; ते=वे; ततः=उनसे; उ=भी; भूयः इव=मानो अधिकतर; तमः=अन्धकारमें (प्रवेश करते हैं) ॥ १२ ॥ व्याख्या—जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोककी भोग- सामग्रियोंमें आसक्त होकर उन्हींको सुखका हेतु समझते हैं तथा उन्हींके अर्जन-सेवनमें सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग- सामग्रियोंकी प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धिके लिये उन विभिन्न देवता, पितर और मनुष्यादिकी उपासना करते हैं जो स्वयं जन्म- मरणके चक्रमें पड़े हुए होनेके कारण शरीरकी दृष्टिसे विनाशशील हैं । ऐसे वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासनाके फलस्वरूप विभिन्न देवताओंके लोकोंको और विभिन्न भोगयोनियोंको प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञानरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है। दूसरे जो मनुष्य शास्त्रके तात्पर्यको तथा भगवान्के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यको न समझनेके कारण न तो भगवान्का भजन-ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धाके अभाव तथा भोगासक्तिके कारण लोकसेवा और शास्त्रविहित देवोपासनामें ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपनेको ईश्वरोपासक बतलाकर सरलहृदय जनता- से अपनी पूजा कराने लगते हैं। ये लोग मिथ्या अभिमानके कारण देवताओंको तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार अवश्यकर्तव्य देवपूजा तथा गुरुजनोंका सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरोंको भी अपने वाग्- जालमें फँसाकर उनके मनोंमें भी देवोपासना आदिमे अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपनेको ही ईश्वरके समकक्ष मानते- मनवाते हुए मनमाने दुराचरणमें प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसे दम्भी मनुष्योंको अपने दुष्कर्मोंका कुफल भोगनेके लिये बाध्य होकर कूकर-शूकर आदि नीच योनियोंमें और रौरव-कुम्भीपाकादि नरकोंम जाकर भीषण यन्त्रणाएँ भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओंकी उपासना करनेवालोंकी अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकारमें प्रवेश करना है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध—शास्त्रके यथार्थ तात्पर्यको समझकर सम्भूति और असम्भूतिकी उपासना करनेसे जो सर्वोत्तम परिणाम होता है, अब संक्षेपसे उसका वर्णन करते हैं—
- कुछ महानुभावोंने इसका यह भावार्थ माना है— अविद्या अर्थात् अग्निहोत्रादि कर्म यानी 'मृत्यु' शब्दवाच्य स्वाभाविक कर्म और ज्ञान—इन दोनोंको तरकर, विद्या अर्थात् देवताज्ञानसे अमृत यानी देवात्मभावको प्राप्त हो जाता है। इस देवात्मभावकी प्राप्तिको ही अमृत कहा जाता है।
१६८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ सम्भवात् = अविनाशी ब्रह्मकी उपासनासे, अन्यत् एव = दूसरा ही फल; आहुः = बतलाते हैं; (और) असम्भवात् = विनाशशील देव पितरादिकी उपासनासे, अन्यत् = दूसरा (ही) फल, आहुः = बतलाते हैं; इति = इस प्रकार; (हमने) धीराणाम् = (उन) धीर पुरुषोंके, शुश्रुम = वचन सुने हैं; ये = जिन्होंने, नः = हमें; तत् = उस विषयको, विचचक्षिरे = व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ व्याख्या-अविनाशी ब्रह्मकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, सर्वाधार, सर्वमय, सम्पूर्ण संसारके कर्ता, धर्ता, हर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपरिपूरित हृदयसे नित्य-निरन्तर उनके दिव्य परम मधुर नाम, रूप, लीला, धाम तथा प्राकृत गुणरहित एव दिव्य गुणगणमय सच्चिदानन्द- घन स्वरूपका श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना । इस प्रकारकी सच्ची उपासनासे उपासकको शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ९।३४)। ईश्वरोपासनाका मिथ्या स्वाँग भरनेवाले दम्भियों- को जो फल मिलता है, उससे इन सच्चे उपासकोंको मिलनेवाला यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इसी प्रकार विनाशी देवता आदिकी उपासनाका यथार्थ स्वरूप है-शास्त्रोंके एव श्रीभगवान्के आज्ञानुसार (गीता १७।१४) देवता, पितर, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषोंकी अवश्यकर्त्तव्य समझकर सेवा- पूजादि करना और उसको भगवान्की आज्ञाका पालन एव उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्कामभावसे अन्य देवताओंकी सेवा-पूजा करनेवालोंके अन्तःकरणकी शुद्धि होती है तथा श्रीभगवान्की कृपा एव प्रसन्नता प्राप्त होती है, जिससे वे मृत्युमय संसारसागरसे तर जाते हैं। विनाशशील देवता आदिकी सकाम उपासनामे जो फल मिलता है, उससे यह फल सर्वथा भिन्न और विलक्षण है । इस प्रकार हमने उन धीर तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंमे सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक् पृथक् रूपसे व्याख्या करके भलीभाँति समझाया था ॥ १३ ॥ सम्बन्ध - अब उपर्युक्त प्रकारसे सम्भूति और असम्भूति दोनोंके तत्त्वको एक साथ भलीभाँति समझनेका फल स्पष्ट बतलाते हैं- सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयं सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते ॥ १४ ॥ यः = जो मनुष्य; तत् उभयम् = उन दोनोंको; (अर्थात्) सम्भूतिम् = अविनाशी परमेश्वरको; च = और; विनाशम् = विनाशशील देवादिको, च = भी, सह = साथ-साथ; वेद = यथार्थतः जान लेता है; विनाशेन = (वह) विनाशशील देवादिकी उपासनासे, मृत्युम् = मृत्युको, तीर्त्वा = पार करके; सम्भूत्या = अविनाशी परमेश्वरकी उपासनासे, अमृतम् = अमृत- को, अश्नुते = भोग करता है अर्थात् अविनाशी आनन्दमय परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्रत्यक्ष प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वाधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ है, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण (प्राकृत गुणोंसे सर्वथा रहित) और नित्य सगुण (स्वरूप- भूत दिव्यकल्याणगुणगणविभूषित) हैं। और इसीके साथ जो यह भी समझ लेता है कि देवता, पितर, मनुष्य आदि जितनी भी योनियाँ तथा भोगसामग्रियाँ हैं, सभी विनाशशील, क्षणभङ्गुर और जन्म-मृत्युशील होनेके कारण महान् दुःखकी कारण हैं; तथापि इनमें जो सत्ता-स्फूर्ति तथा शक्ति है, वह सभी भगवान्की है और भगवान्के जगच्चक्रके सुचारुरूपसे चलते रहनेके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ ही इनकी यथास्थान यथायोग्य सेवा पूजा आदि करनेकी शास्त्रोंने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान्की ही वाणी है। वह मनुष्य इहलौकिक तथा पारलौकिक देव पितरादि लोकोंके भोगोंमे आसक्त न होकर कामना-ममता आदिको हृदयसे निकालकर इन सबकी यथायोग्य शास्त्रविहित सेवा-पूजादि करता है। इससे उसकी जीवन-
- ईशावास्योपनिषद् * १६९ यात्रा सुखपूर्वक चलती है,* और उसके आभ्यन्तरिक विकारोंका नाश होकर अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भगवत्कृपासे वह सहज ही मृत्युमय संसार-सागरको तर जाता है। विनाशशील देवता आदिकी निष्काम उपासनाके साथ-ही-साथ अविनाशी परात्पर प्रभुकी उपासनासे वह शीघ्र ही अमृतरूप परमेश्वरको प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है † ॥ १४ ॥ सम्बन्ध—श्रीपरमेश्वरकी उपासना करनेवालोंको परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, यह कहा गया है। अत भगवान्के भक्तको अन्तकालमें परमेश्वरसे उनकी प्राप्तिके लिये किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं— हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ पूषन्=हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर; सत्यस्य = सत्यस्वरूप आप सर्वेश्वरका, मुखम् = श्रीमुख, हिरण्मयेन = ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलखरूप; पात्रेण = पात्रसे, अपिहितम् = ढका हुआ है; सत्यधर्माय = आपकी भक्तिरूप सत्य- धर्मका अनुष्ठान करनेवाले मुझको; दृष्टये = अपने दर्शन करानेके लिये; तत् =उस आवरणको, त्वम् = आप, अपावृणु = हटा लीजिये ॥ १५ ॥ व्याख्या—भक्त इस प्रकार प्रार्थना करे कि हे भगवन् ! आप अखिल ब्रह्माण्डके पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्य धर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूँ; अतएव मेरी पुष्टि—मेरे मनोरथकी पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। आपका दिव्य श्रीमुख—सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय सूर्यमण्डलसे चमचमाती हुई ज्योतिर्मयी यवनिकासे आवृत्त है। मैं आपका निरावरण प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूँ, अतएव आपके पास पहुँचकर आपका निरावरण दर्शन करनेमें बाधा देनेवाले जितने भी, जो भी आवरण—प्रतिबन्धक हों, उन सबको मेरे लिये आप हटा लीजिये ! अपने सच्चिदानन्दस्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट कीजिये ‡ ॥ १५ ॥ पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह। तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६ ॥ पूषन् = हे भक्तोंका पोषण करनेवाले; एकर्षे = हे मुख्य ज्ञानस्वरूप, यम = हे सबके नियन्ता; सूर्य = हे भक्तो या ज्ञानियों (सूरियों) के परम लक्ष्यरूप, प्राजापत्य = हे प्रजापतिके प्रिय; रश्मीन् = इन रश्मियोंको; व्यूह = एकत्र कीजिये या हटा लीजिये; तेजः = इस तेजको, समूह = समेट लीजिये या अपने तेजमें मिला लीजिये; यत् = जो, ते = आपका, कल्याणतमम् = अतिशय कल्याणमय; रूपम् = दिव्य स्वरूप है, तत् =उस, ते = आपके दिव्य स्वरूपको, पश्यामि = मैं आपकी कृपासे ध्यानके द्वारा देख रहा हूँ, यः = जो; असौ = वह (सूर्यका आत्मा) है; असौ = वह, पुरुषः = परम पुरुष (आपका ही स्वरूप है), अहम् = मैं (भी), सः अस्मि = वही हूँ ॥ १६ ॥ व्याख्या—भगवन् ! आप अपनी सहज कृपासे भक्तोंके भक्ति-साधनमे पुष्टि प्रदान करके उनका पोषण करनेवाले हैं, आप समस्त ज्ञानियोंमें अग्रगण्य, परम ज्ञानस्वरूप तथा अपने भक्तोंको अपने स्वरूपका यथार्थ ज्ञान प्रदान करनेवाले हैं (गीता १० । १२); आप सबका यथायोग्य नियमन, नियन्त्रण और शासन करनेवाले हैं; आप ही भक्तों या ज्ञानी महापुरुषोंके लक्ष्य हैं और अविज्ञेय होनेपर भी अपने भक्तवत्सल स्वभावके कारण भक्तिके द्वारा उनके जाननेमें आ
- कई आदरणीय महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'अव्याकृत प्रकृति' और सम्भूतिका अर्थ 'कार्यब्रह्म' किया है। एवं कहा है कि कार्यब्रह्मकी उपासनामे अधर्म तथा कामनादि दोषजनित अनैश्वर्यरूप मृत्युको पार करके, हिरण्यगर्भकी उपासनासे अणिमादि ऐश्वर्यकी प्राप्तिरूप फल मिलना है। अतएव उससे अनैश्वर्य आदि मृत्युको पार करके इम अव्यक्तोपासनामे प्रकृतिलयरूप अमृत प्राप्त कर लेना है। † कुछ अन्य महानुभावोंने असम्भूतिका अर्थ 'महाएकता' और सम्भूतिका 'सृष्टिकर्त्ता' माना है। ‡ एक महानुभावने इस मन्त्रका यह अर्थ किया है— हे पूर्ण परमात्मन् ! सोनेके ढकनेमे (सोनेके समान मन-लुभावने विषयरूपी मायाके परदेमे) तुझ सत्यका मुख ढका हुआ है अर्थात् हम विषयोंमे फँसे हुए हैं। हे सबके पोषक ! उस ढकनेको मुझ सत्य-परायण साधकके लिये तू उठा दे, जिससे मैं दर्शन कर सकूँ। उ० अ० २२—
१७० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * जाते हैं, आप प्रजापतिके भी प्रिय हैं। हे प्रभो ! इस सूर्यमण्डलकी तप्त रश्मियोंको एकत्र करके अपनेमें लुप्त कर लीजिये। इसके उग्र तेजको समेटकर अपनेमें मिला लीजिये और मुझे अपने दिव्यस्वरूपके प्रत्यक्ष दर्शन कराइये। अभी तो मैं आपकी कृपासे आपके सौन्दर्य-माधुर्य-निधि दिव्य परम कल्याणरूप सच्चिदानन्दस्वरूपका ध्यान दृष्टिसे दर्शन कर रहा हूँ, साथ ही बुद्धिके द्वारा समझ भी रहा हूँ कि वही आप परम पुरुष इस सूर्यके और समस्त विश्वके आत्मा हैं। अतः आपके लिये जो वह सूर्यमण्डलस्थ पुरुष है, वही मैं भी हूँ। उस पुरुषमें और मुझमें किसी प्रकारका भेद नहीं है * ॥ १६ ॥ सम्बन्ध-ध्यानके द्वारा भगवान्के दिव्य मङ्गलमय स्वरूपके दर्शन करता हुआ साधक अब भगवान्की साक्षात् सेवामें पहुँचनेके लिये व्यग्र हो रहा है और शरीरका त्याग करते समय सूक्ष्म तथा स्थूल शरीरके सर्वथा विघटनकी भावना करता हुआ भगवान्से प्रार्थना करता है- वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ँ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृत ँ स्मर क्रतो स्मर कृत ँ स्मर ॥ १७ ॥ अथ = अब, वायुः = ये प्राण और इन्द्रियाँ, अमृतम् = अविनाशी; अनिलम् = समष्टि वायु-तत्त्वमे; ( प्रविशतु = प्रविष्ट हो जायँ, ) इदम् = यह, शरीरम् = स्थूल शरीर; भस्मान्तम् = अग्निमे जलकर भस्मरूप, ( भूयात् = हो जाय; ) ॐ = हे सच्चिदानन्दघन; क्रतो = यज्ञमय भगवन्, स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = मेरे द्वारा किये हुए कर्मोंका; स्मर = स्मरण करें; क्रतो = हे यज्ञमय भगवन्; स्मर = ( आप मुझ भक्तको ) स्मरण करें; कृतम् = ( मेरे ) कर्मोंको, स्मर = स्मरण करें ॥ १७ ॥ व्याख्या-परमधामका यात्री वह साधक अपने प्राण, इन्द्रिय और शरीरको अपनेसे सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने-अपने उपादान तत्त्वोंमे सदाके लिये विलीन करना एव सूक्ष्म और स्थूल शरीरका सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिये कहता है कि प्राणादि समष्टिवायु आदिमे प्रविष्ट हो जायँ और स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाय । फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीभगवान्से प्रार्थना करता है कि हे यज्ञमय विष्णु-सच्चिदानन्द विज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मोंको स्मरण कीजिये। आप स्वभावसे ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्तिरूप कार्योंका स्मरण करेंगे; क्योंकि आपने कहा है, 'अहं स्मरामि मद्भक्तं नयामि परमा गतिम्'-मैं अपने भक्तका स्मरण करता हूँ और उसे परम गतिमें पहुँचा देता हूँ, अपनी सेवामे स्वीकार कर लेता हूँ; क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ गति है। इसी अभिप्रायसे भक्त यहाँ दूसरी बार फिर कहता है कि भगवन् ! आप मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण कीजिये । अन्तकालमें मैं आपकी स्मृतिमें आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवामे शीघ्र पहुँच जाऊँगा † ॥ १७ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार अपने आराध्यदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान्से प्रार्थना करके अब साधक अपुनरावर्ती अर्चि आदि मार्गके द्वारा परम धाममें जाते समय उस मार्गके अग्नि-अभिमानी देवतासे प्रार्थना करता है-
- एक आदरणीय विद्वान्ने १६ वें मन्त्रका यह अर्थ किया है- हे जगत्का पोषण करनेवाले पूषन् ! अकेले विचरण करनेवाले एकर्षे ! सबका नियमन करनेवाले यम ! प्राण और रसोंका शोषण करनेवाले सूर्य ! प्रजापति-पुत्र प्राजापत्य ! अपनी किरणोंको हटा लो, अपने तेजको समेट लो। तुम्हारा जो परम कल्याणमय और अत्यन्त शोभन स्वरूप है, उसे तुम आत्माकी कृपासे मै देखता हूँ। तथा यह मै तुममे सेवककी भाँति याचना नहीं करता, क्योकि यह जो व्याहृतिरूप अङ्गोंवाला आदित्यमण्डलस्थ पुरुष है-जो पुरुषाकार होनेसे अथवा जो प्राण और बुद्धिरूपसे सम्पूर्ण जगत्को पूर्ण किये हुए है या जो शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण पुरुष है-वह मै ही हू ॥ १६ ॥ अनुसार... समय जो मेरा स्मरणीय है, उसका स्मरण कर, अब यह उसका समय उपस्थित हो गया है, अत तू स्मरण कर। 'क्रतो स्मर कृत स्मर'का पुनरुक्ति यहाँ आदरके लिये है।
- ईशावास्योपनिषद् * १७१ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम ॥ १८ ॥ अग्ने=हे अग्निके अधिष्ठातृ देवता !, अस्मान्=हमें, राये=परम धनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये; सुपथा= सुन्दर शुभ ( उत्तरायण ) मार्गसे; नय=(आप) ले चलिये, देव=हे देव; ( आप हमारे ) विश्वानि=सम्पूर्ण, वयुनानि= कर्मोंको; विद्वान्=जाननेवाले हैं; ( अत' ) अस्मत्=हमारे, जुहुराणम्=इस मार्गके प्रतिबन्धक, एन:= ( यदि कोई ) पाप हैं ( तो उन सबको ); युयोधि=( आप ) दूर कर दीजिये; ते=आपको, भूयिष्ठाम्=वार-वार; नमउक्तिम्= नमस्कारके वचन; विधेम=( हम ) कहते हैं—वार-वार नमस्कार करते हैं ॥ १८ ॥ व्याख्या—साधक कहता है—हे अग्निदेवता ! मैं अब अपने परम प्रभु भगवान्की सेवामें पहुँचना और सदाके लिये उन्हींकी सेवामे रहना चाहता हूँ । आप शीघ्र ही मुझे परम सुन्दर मङ्गलमय उत्तरायणमार्गसे भगवान्के परमधाममें पहुँचा दीजिये । आप मेरे कर्मोंको जानते हैं। मैंने जीवनमे भगवान्की भक्ति की है और उनकी कृपासे इस समय भी मैं ध्याननेत्रोंसे उनके दिव्य स्वरूपके दर्शन और उनके नामोंका उच्चारण कर रहा हूँ । मेरा अधिकार है कि मैं इसी मार्गसे जाऊँ । तथापि यदि आपके ध्यानमें मेरा कोई ऐसा कर्म शेष हो, जो इस मार्गमें प्रतिबन्धकरूप हो, तो आप कृपा करके उसे नष्ट कर दीजिये । मैं आपको बार-बार विनयपूर्वक नमस्कार करता हूँ *-† ॥ १८ ॥ ॥ यजुर्वेदीय ईशावास्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः इसका अर्थ ईशावास्योपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है ।
- इस मन्त्रका भावार्थ एक सज्जन इस प्रकार करते हैं— हे सबके अग्रणी ( जगद्गुरो ) ! तू हमें धनके लिये—लोक और परलोकके सुखके लिये- नेकीके रास्तेसे चला । हे सबके अन्तर्यामी प्रकाशमान ' तू हमारे सब ज्ञानोंको जाननेवाला है । हमसे अच्छे मार्गमें बाधा देनेवाले कुटिल पापको दूर कर । हम तुझे बार-बार नमस्कार करते हैं । † इस उपनिषद्का पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ मन्त्र सबके लिये मननीय हैं । उन मन्त्रोंके भावके अनुसार सबको भगवान्से दर्शन देनेके लिये प्रार्थना करनी चाहिये । 'सत्यधर्माय दृष्टये' का यह भाव भी समझना चाहिये कि 'भगवन् ! आप अपने स्वरूपका वह आवरण—वह परदा हटा दीजिये, जिससे सत्यधर्मरूप आप परमेश्वरकी प्राप्ति तथा आपके मङ्गलमय श्रीविग्रहका दर्शन हो सके । इसी प्रकार सत्रहवें और अठारहवें मन्त्रके भावका भी प्रत्येक मनुष्यको विशेषत मुमूर्षु अवस्थामें अवश्य स्मरण करना चाहिये । इन मन्त्रोंके अनुसार अन्तकालमें भगवान्की प्रार्थना करनेसे मनुष्यमात्रका कल्याण हो सकता है । भगवान्ने स्वयं भी गीतामें कहा है—'अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् । य प्रयाति स मद्भाव याति नास्त्यत्र सशय ॥' मुमूर्षुमात्रके लाभके लिये इन दो मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—'हे परमात्मन् ! मेरे ये इन्द्रिय और प्राण आदि अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें लीन हो जायँ और मेरा यह स्थूल शरीर भी भस्म हो जाय । इनके प्रति मेरे मनमें किञ्चित् भी आसक्ति न रहे । हे यज्ञमय विष्णो ! आप कृपा करके मेरा और मेरे कर्मोंका स्मरण करें । आपके स्मरण कर लेनेसे मैं और मेरे कर्म सब पवित्र हो जायँगे । फिर तो मै अवश्य ही आपके चरणोंकी सेवामें पहुँच जाऊँगा ॥ १७ ॥ हे अग्निरूप परमेश्वर ! आप ही मेरे धन हैं—सर्वस्व हैं, अतः आपकी ही प्राप्तिके लिये आप मुझे उत्तम मार्गसे अपने चरणोंके समीप पहुँचाइये । मेरे जितने भी शुभाशुभ कर्म हैं, वे आपसे छिपे नहीं हैं, आप सबको जानते हैं, मैं उन कर्मोंके बलपर आपको नहीं पा सकता, आप स्वयं ही दया करके मुझे अपना लीजिये । आपकी प्राप्तिमें जो भी प्रतिबन्धक पाप हों उन सबको आप दूर कर दें; मैं वारवार आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १८ ॥'
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ `नो निषद् यह उपनिषद् सामवेदके ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अन्तर्गत है। तलवकारको जैमिनीय उपनिषद् भी कहते हैं। ‘तलवकार ब्राह्मण’ के अस्तित्वके सम्बन्धमे कुछ पाश्चात्त्य विद्वानोंको सन्देह हो गया था, परन्तु डा० बर्नलको कहींसे एक प्राचीन प्रति मिल गयी, तबसे वह सन्देह जाता रहा। इस उपनिषद्में सबसे पहले ‘केन’ शब्द आया है, इसीसे इसका ‘केनोपनिषद्’ नाम पड़ गया। इसे ‘तलवकार उपनिषद्’ और ‘ब्राह्मणोपनिषद्’ भी कहते हैं। तलवकार ब्राह्मणका यह नवम अध्याय है। इसके पूर्वके आठ अध्यायोंमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये विभिन्न कर्म और उपासनाओंका वर्णन है। इस उपनिषद्का प्रतिपाद्य विषय परब्रह्म- तत्त्व बहुत ही गहन है, अतएव उसको भलीभाँति समझानेके लिये गुरु-शिष्य-संवादके रूपमे तत्त्वका विवेचन किया गया है। शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॐ=हे परब्रह्म परमात्मन्, मम=मेरे, अङ्गानि=सम्पूर्ण अङ्ग, वाक्=वाणी; प्राणः=प्राण, चक्षुः=नेत्र, श्रोत्रम्=कान, च= और, सर्वाणि=सब, इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ, अथो=तथा, बलम्=शक्ति, आप्यायन्तु=परिपृष्ट हों, सर्वम्=(यह जो) सर्वरूप; औपनिषदम्=उपनिषद्-प्रतिपादित; ब्रह्म=ब्रह्म है, अहम्=मैं; ब्रह्म=इस ब्रह्मको, मा निराकुर्याम्=अस्वीकार न करूँ; (और) ब्रह्म=ब्रह्म, मा=मुझको, मा निराकरोत्=परित्याग न करे, अनिराकरणम्=(उसके साथ मेरा) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, मे=मेरे साथ; अनिराकरणम्=(उसका) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो, उपनिषत्सु=उपनिषदोंमें प्रतिपादित; ये=जो, धर्माः=धर्मसमूह हैं, ते=वे सब, तदात्मनि=उस परमात्मामें, निरते=लगे हुए, मयि=मुझमें; सन्तु=हों, ते=वे सब, मयि=मुझमें, सन्तु=हों। ॐ=हे परमात्मन्; शान्तिः शान्तिः शान्तिः=त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। व्याख्या—हे परमात्मन् ! मेरे सारे अङ्ग, वाणी, नेत्र श्रोत्र आदि सभी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणसमूह, शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज—सब पुष्टि एव वृद्धिको प्राप्त हों। उपनिषदोंमें सर्वरूप ब्रह्मका जो स्वरूप वर्णित है, उसे मैं कभी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी प्रत्याख्यान न करे। मुझे सदा अपनाये रक्खे। मेरे साथ ब्रह्मका और ब्रह्मके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध बना रहे। उपनिषदोंमे जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, वे सारे धर्म, उपनिषदोंके एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म परमात्मामें निरन्तर लगे हुए मुझ साधकमें सदा प्रकाशित रहें, मुझमे नित्य निरन्तर बने रहें। और मेरे त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो। सम्बन्ध—शिष्य गुरुदेवसे पूछता है— ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ केन=किसके द्वारा, इषितम्=सत्ता-स्फूर्ति पाकर, (और) प्रेषितम्=प्रेरित—सञ्चालित होकर (यह), मनः=मन (अन्तःकरण), पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है, केन=किसके द्वारा, युक्तः=नियुक्त होकर; प्रथमः=अन्य सबसे श्रेष्ठ, प्राणः=प्राण, प्रैति=चलता है, केन=किसके द्वारा, इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस;
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१७४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड चेतन दोनोंसे ही भिन्न है-जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वय जाननेमे न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये सकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध-अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुन' पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं— यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ यत्=जो, वाचा=वाणीके द्वारा, अनभ्युदितम्=नहीं बतलाया गया है, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, वाक्=वाणी, अभ्युद्यते=बोली जाती है अर्थात् जिसकी शक्तिसे वक्ता बोलनेमे समर्थ होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि= जान, इदम् यत्=वाणीके द्वारा बतानेमे आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते=(लोग) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ४ व्याख्या--वाणीके द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है तथा प्राकृत वाणीसे बतलाये हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मतत्त्व वाणीसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्तिके किसी अगसे वाणीमें प्रकाशित होनेकी—बोलनेकी शक्ति आयी है, जो वाणीका भी ज्ञाता, प्रेरक और प्रवर्तक है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे वाणी बोली जाती है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ४ ॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ यत्=जिसको, (कोई भी) मनसा=मनसे (अन्तःकरणकेद्वारा ), न=नहीं, मनुते=समझ सकता, [अपि तु=बल्कि,] येन=जिससे, मनः=मन, मतम्=( मनुष्यका ) जाना हुआ हो जाता है, आहुः=ऐसा कहते हैं, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी, उपासते= ( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह, न=ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥ व्याख्या-बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमे आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनमें मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अगसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी सामर्थ्य और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रसे 'जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ यत्=जिसको (कोई भी); चक्षुषा=चक्षुके द्वारा, न=नहीं, पश्यति=देख सकता, [अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे; चक्षूंषि=चक्षु, (अपने विषयोंको ) पश्यति=देखता है, तत्=उसको, एव=ही; त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान; इदम् यत्=चक्षुके द्वारा देखनेमें आनेवाले जिस दृश्यवर्गकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥ व्याख्या-चक्षुका जो कुछ भी विषय है, जो इसके द्वारा देखने-जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत आँखोंसे देखे जानेवाले जिस पदार्थसमूहकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक रूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर चक्षु आदि इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रत्यक्ष करनेमें समर्थ होती हैं, जो इनको जाननेवाला और इन्हें अपने विषयोंको जाननेमें प्रवृत्त करनेवाला
- केनोपनिषद् * १७५ है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशका यह प्रभाव है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु अपने विषयोंको देखता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ६ ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७ ॥ यत्=जिसको ( कोई भी ), श्रोत्रेण=श्रोत्रके द्वारा, न=नहीं, शृणोति=सुन सकता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे, इदम्=यह; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; श्रुतम्=सुनी हुई है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=श्रोत्र-इन्द्रियके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं; इदम्=यह; न=ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ व्याख्या—जो कुछ भी सुननेमें आनेवाला पदार्थ है तथा प्राकृत कानोंसे सुने जानेवाले जिस वस्तु-समुदायकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर श्रोत्रेन्द्रियसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो श्रोत्र-इन्द्रियका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें सुननेकी शक्ति देनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे श्रोत्र-इन्द्रियमें शब्दको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे श्रोत्र अपने विषयोंको सुननेमें प्रवृत्त होता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ७ ॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ यत्=जो, प्राणेन=प्राणके द्वारा, न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता, [ अपि तु=बल्कि, ] येन=जिससे, प्राणः=प्राण; प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है, तत्=उसको, एव=ही, त्वम्=तू, ब्रह्म=ब्रह्म, विद्धि=जान, इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिन तत्त्वोंकी, उपासते=( लोग ) उपासना करते हैं, इदम्=ये, न=ब्रह्म नहीं हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—प्राणके द्वारा जो कुछ भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणोंसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है । परब्रह्म परमेश्वर उनसे सर्वथा अतीत है । उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है । इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है ?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है । सारांश यह कि प्राकृत मन, प्राण तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता । इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना नहीं है । परब्रह्म परमेश्वरके मन-बुद्धि आदिसे अतीत स्वरूपको साङ्केतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है ॥ ८ ॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमाꣳस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥ 'यदि=यदि, त्वम्=तू, इति=यह, मन्यसे=मानता है (कि), सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ; अपि=तो, नूनम्=निश्चय ही, ब्रह्मणः=ब्रह्मका, रूपम्=स्वरूप, दभ्रम्=थोड़ा-सा, एव=ही, (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि) अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर) का, यत्=जो (आंशिक) स्वरूप, त्वम्=तू है, (और) अस्य=इसका, यत्=जो (आंशिक) स्वरूप, देवेषु=देवताओंमें है, [ तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है, ] अथ नु=इसीलिये, मन्ये=मैं मानता हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ, (स्वरूप) मीमांस्यम् एव=निस्सन्देह विचारणीय है ॥ १ ॥