कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४५
[बायाँ स्तम्भ]
द्वारा ही मैंने सनातनी आत्मविद्याको प्राप्त किया और सन्- चित्-आनन्दरूपसे मुझे नित्य ब्रह्मत्व प्राप्त है ॥ १-११ ॥
तदनन्तर सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके साम्यसे प्रकृतिकी सृष्टि हुई । दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान प्रकृतिमें पड़ी चेतनकी छाया ही सत्यवत् प्रतीत होती है । उस चेतनकी छायासे प्रकृति तीन प्रकारकी प्रतीत होती है, प्रकृतिके द्वारा अवच्छिन्न होनेके कारण ही तुम्हे जीवत्व प्राप्त हुआ है । शुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृति माया कहलाती है। उस शुद्ध सत्त्वप्रधाना मायामें प्रतिबिम्बित चेतन ही अज (ब्रह्मा) कहा गया है। वह माया सर्वज्ञ ईश्वरकी अपने अधीन रहनेवाली उपाधि है। मायाको वशमें रखना, एक (अद्वितीय) होना और सर्वज्ञत्व—ये उन ईश्वरके लक्षण हैं। सात्त्विक, समष्टिरूप तथा सब लोकोंके साक्षी होनेके कारण वे ईश्वर जगत्की सृष्टि करने, न करने तथा अन्यथा करनेमें समर्थ हैं। इस प्रकार सर्वज्ञत्व आदि गुणोंमे युक्त वह चेतन ईश्वर कहलाता है। मायाकी दो शक्तियाँ हैं—विक्षेप और आवरण । विक्षेप-शक्ति लिङ्ग शरीरसे लेकर ब्रह्माण्डतकके जगत्की सृष्टि करती है। दूसरी आवरण- शक्ति है, जो भीतर द्रष्टा और दृश्यके भेदको तथा बाहर ब्रह्म और सृष्टिके भेदको आवृत करती है। वही संसार-बन्धनका कारण है, साक्षीको वह अपने सामने लिङ्ग-शरीरसे युक्त प्रतीत होती है। कारणरूपा प्रकृतिमें चेतनकी छायाका समावेश होनेसे व्यावहारिक जगत्में कार्य करनेवाला जीव प्रकट होता है। उसका यह जीवत्व आरोपवश साक्षीमें भी आभासित होता है। आवरण शक्ति के नष्ट होनेपर भेदकी स्पष्ट प्रतीति होने लगती है (इससे चेतनका जड़में आत्मभाव नहीं रहता, अत ) जीवत्व चला जाता है। तथा जो शक्ति सृष्टि और ब्रह्मके भेदको आवृत करके स्थित होती है, उसके वशीभूत हुआ ब्रह्म विकारको प्राप्त हुआ सा भासित होता है, वहाँ भी आवरणके नष्ट होनेपर ब्रह्म और सृष्टिका भेद स्पष्टरूपसे प्रतीत होने लगता है । उन दोनोमेंसे सृष्टिमें ही विकारकी स्थिति होती है, ब्रह्ममें नहीं। अस्ति (है), भाति (प्रतीत होता है), प्रिय (आनन्दमय), रूप और
[दायाँ स्तम्भ]
नाम—ये पाँच अंश हे । इनमें अस्ति, भाति और प्रिय—ये तीनों ब्रह्मके स्वरूप है तथा नाम और रूप—ये दोनों जगत्के स्वरूप हैं। इन दोनो—नाम-रूपोंके सम्बन्धसे ही सच्चिदानन्द परब्रह्म जगत्-रूप बनता है ॥ १२—२४ ॥
साधकको हृदयमे अथवा बाहर सर्वदा समाधि साधन करना चाहिये । हृदयमें दो प्रकारकी समाधि होती है—सविकल्प और निर्विकल्परूप । सविकल्प समाधि भी दो प्रकारकी होती है— एक दृश्यानुविद्ध और दूसरी शब्दानुविद्ध । चित्तमें उत्पन्न होने- वाले कामादि विकार दृश्य हैं तथा चेतन आत्मा उनका साक्षी है—इस प्रकार ध्यान करना चाहिये । यह दृश्यानुविद्ध सविकल्प समाधि है । मे असङ्ग, सच्चिदानन्द, स्वयम्प्रकाश, अद्वैतस्वरूप हूँ—इस प्रकारकी सविकल्प समाधि शब्दानुविद्ध कहलाती है। आत्मानुभूति रसके आवेगवश दृश्य और शब्दादिकी उपेक्षा करनेवाले साधकके हृदयमें निर्विकल्प समाधि होती है । उस समय योगीकी स्थिति वायुशून्य प्रदेशमें रखे हुए दीपककी भाँति अविचल होती है । यह हृदयमे होनेवाली निर्विकल्प और सविकल्प समाधि है । इसी तरह बाह्य- देशमें भी जिस-किसी वस्तुको लक्ष्य करके चित्त एकाग्र हो जाता है, उसमें समाधि लग जाती है । पहली समाधि द्रष्टा और दृश्यके विवेकसे होती है, दूसरी प्रकारकी समाधि वह है, जिसमें प्रत्येक वस्तुसे उसके नाम और रूपको पृथक् करके उसके अधिष्ठानभूत चेतनका चिन्तन होता है। और तीसरी समाधि पूर्ववत् है, जिसमें सर्वत्र व्यापक चैतन्य रसानुभूतिजनित आवेगसे स्तब्धता छा जाती है। इन छः प्रकारकी समाधियोंके साधनमे ही निरन्तर अपना समय व्यतीत करे । देहाभिमानके नष्ट हो जाने और परमात्म-ज्ञान होनेपर जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहीं वहीं परम अमृतत्वका अनुभव होता है। हृदयकी गाँठें खुल जाती हैं, सारे संशय नष्ट हो जाते हैं, उस निष्फल और सकल ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर विद्वान् पुरुषके समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं। 'मुझमें जीवत्व और ईश्वरत्व कल्पित हैं, वास्तविक नहीं' इस प्रकार जो जानता है, वह मुक्त है—इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है॥ २५-३३॥
॥ ऋग्वेदीय सरस्वतीरहस्योपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! देवीकी ब्रह्मस्वरूपता, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, देवी-महिमा और इसके पाठका फल
[बायाँ स्तम्भ] सभी देवता, देवीके समीप जाकर, प्रार्थना करने लगे— 'महादेवि ! तुम कौन हो ?' ॥ १ ॥ उन्होंने कहा-'मैं ब्रह्मस्वरूपा हूँ। मुझसे प्रकृति पुरुषात्मक कारणरूप और कार्यरूप जगत् उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द और अनानन्दरूपा हूँ । मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूँ । अवश्य जाननेयोग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत् मैं ही हूँ। वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं हूँ, नीचे ऊपर, अगल-बगल भी मे ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं- के रूपमें सञ्चार करती हूँ । मैं आदित्यों और विश्वेदेवोंके रूपोंमें फिरा करती हूँ । मैं मित्र और वरुण दोनोंका, इन्द्र एव अग्निका और दोनों अश्विनीकुमारोंका भरण पोषण करती हूँ । मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भगको धारण करती हूँ । त्रैलोक्यको आक्रान्त करनेके लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करनेवाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापतिको मै ही धारण करती हूँ । देवोंको हवि पहुँचानेवाले और सावधानीसे सोमरस निकालनेवाले यजमानके लिये हविर्द्रव्योंसे युक्त धनको धारण करती हूँ। मे सम्पूर्ण जगत्की ईश्वरी, उपासकोंको धन देनेवाली, ज्ञानवती और यज्ञाहोंमें (यजन करने योग्य देवोंमें) मुख्य हूँ। मैं ही इस जगत्के पितारूप आकाशको सर्वाधिष्ठान-
[दायाँ स्तम्भ] स्वरूप परमात्माके ऊपर उत्पन्न करती हूँ । मेरा स्थान आत्मस्वरूपको धारण करनेवाली बुद्धिवृत्तिमें है। जो इस प्रकार जानता है, वह दैवी सम्पत्ति लाभ करता है' ॥२-७॥ तत्र उन देवोंने कहा—'देवीको नमस्कार है। बड़े-बड़ोंको अपने-अपने कर्तव्यमे प्रवृत्त करनेवाली कल्याणकर्त्री महादेवीको सदा नमस्कार है। गुण-साम्यावस्थारूपिणी मङ्गलमयी देवीको नमस्कार है । नियमयुक्त होकर हम उन्हे प्रणाम करते ह । उन अग्निके से वर्णवाली, ज्ञानसे जगमगानेवाली, दीप्तिमती, कर्मफलप्राप्तिके हेतु सेवन की जानेवाली दुर्गा-देवीकी हम शरणमें हैं । असुरोका नाश करनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है। प्राणरूप देवोंने जिस प्रकाशमान वैखरी वाणीको उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते हे । वे कामधेनु- तुल्य आनन्ददायक और अन्न तथा बल देनेवाली वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतिसे सतुष्ट होकर हमारे समीप आयें । कालका भी नाश करनेवाली, वेदोंद्वारा स्तुत विष्णुशक्ति, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति ), सरस्वती ( ब्रह्मशक्ति ), देवमाता अदिति और दक्ष कन्या ( सती ), पापनाशिनी एव कल्याण- कारिणी भगवतीको हम प्रणाम करते हैं। हम महालक्ष्मीको जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणीका ही ध्यान करते हे । वे देवी हमें उस विषयमें ( ज्ञान-ध्यानमें ) प्रवृत्त करें । हे दक्ष ! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और
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कल्याण सच्चिदानन्दमयी देवी जगन्नाथ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥ (देव्युपनिषद्)
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४७ उनके स्तुत्यर्ह और मृत्युरहित देवता उत्पन्न हुए। काम ( क ), योनि ( ए ), कमला ( ई ), वज्रपाणि—इन्द्र ( ल ), गुहा ( ह्रीँ )। ह, स—वर्ण, मातरिश्वा—वायु ( क ), अभ्र ( ह ), इन्द्र ( ल ), पुन. गुहा ( ह्रीँ )। स, क, ल—वर्ण, और माया ( ह्रीँ ), यह सर्वात्मिका जगन्माताकी मूल विद्या है और यह ब्रह्मरूपिणी है। ( शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती- लक्ष्मी-गौरीरूपा, अशुद्ध मिश्र शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूपका निर्विकल्प ज्ञान देनेवाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी—यही इस मन्त्रका भावार्थ है। यह मन्त्र सब मन्त्रोंका मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्रमें पञ्चदशी कादि श्रीविद्याके नामसे प्रसिद्ध है। इसके छ. प्रकार- के अर्थ अर्थात् भावार्थ, वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ और तत्त्वार्थ 'नित्या षोडशिकार्णव' ग्रन्थमे बताये गये हैं। इसी प्रकार 'वरिवस्यारहस्य' आदि ग्रन्थोंमें इसके और भी अनेक अर्थ दर्शाये हैं। श्रुतिमे भी ये मन्त्र इस प्रकारसे अर्थात् कचित् स्वरूपोद्धार, क्वचित् लक्षणा और लक्षित लक्षणासे और कहीं वर्णके पृथक् पृथक् अवयव दरसाकर जान बूझकर विश्रृङ्खलरूपसे कहे गये हैं। इससे यह मालूम होगा कि ये मन्त्र कितने गोपनीय और महत्त्वपूर्ण हैं।) ये परमात्माकी शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण धारण करनेवाली हैं। ये 'श्रीमहा- विद्या' हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह शोकको पार कर जाता है। भगवती ! तुम्हें नमस्कार है। माता ! सब प्रकारसे हमारी रक्षा करो ॥ ८—१६ ॥ ( मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहते हैं— ) वही ये अष्ट वसु हैं, वही ये एकादश रुद्र हैं, वही ये द्वादश आदित्य हैं, वही ये सोमपान करनेवाले और न करनेवाले विश्वेदेव हैं, वही ये यातुधान ( एक प्रकारके राक्षस ), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं, वही ये सत्त्व रज-तम हैं, वही ये ब्रह्म- विष्णु-रुद्ररूपिणी हैं, वही ये प्रजापति इन्द्र-मनु हैं, वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं, पापका नाश करनेवाली, भोग-मोक्ष देनेवाली, अन्तरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष, शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मङ्गलरूपिणी उन देवीको हम सदा प्रणाम करते हैं। वियत्—आकाश ( ह ) तथा 'ई' कारसे युक्त, वीतिहोत्र— अग्नि ( र ) सहित, अर्धचन्द्र ( ँ ) से अलंकृत जो देवी- का बीज (ह्रीँ) है, वह सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। इस एकाक्षर ब्रह्मका ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण हैं और जो ज्ञानके सागर हैं। ( यह मन्त्र देवीप्रणव माना जाता है। ॐकारके समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थसे भरा है। सक्षेपमें इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान-क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत शिव-शक्ति-स्फुरण है।) वाणी ( ऐँ ), माया ( ही ), ब्रह्मासू—काम ( क्लीँ ), इसके आगे वक्त्र अर्थात् आकारसे युक्त छठा व्यञ्जन ( चा ), 'अवाम श्रोत्र'— दक्षिण कर्ण ( उ ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वारसे युक्त सूर्य ( मु ), नारायण अर्थात् 'आ'से युक्त टकारसे तीसरा वर्ण (डा), अधर अर्थात् 'ऐ'से युक्त वायु ( यै ) और 'विच्चे'—यह नवार्णमन्त्र उपासकोंको आनन्द और ब्रह्मसायुज्य देनेवाला है। (इस मन्त्रका अर्थ—हे चित्स्वरूपाणी महासरस्वती ! हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी ! हे आनन्दरूपिणी महाकाली ! ब्रह्मविद्या पानेके लिये हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली- महालक्ष्मी-महासरस्वतीस्वरूपिणी चण्डिके ! तुम्हें नमस्कार है। अविद्यारूप रज्जुकी दृढ ग्रन्थिको खोलकर मुझे मुक्त करो।) जो हृदयरूप कमलके मध्यमें रहती हैं, प्रातःकालीन सूर्यके समान जिनकी प्रभा है, जो पाश और अङ्कुश धारण किये रहती हैं, जिनका मनोहर रूप है, जिनके हाथ वरद और अभय मुद्राओंसे युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो लाल वस्त्र पहने रहती हैं और भक्तोंके मनोरथ पूर्ण करती हैं, उन देवीको मै भजता हूँ। महाभयका नाश करनेवाली, महासङ्कटको शान्त करनेवाली और महान् करुणाकी साक्षात् मूर्ति तुम महादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप ब्रह्मादिक भी नहीं जानते— इसलिये जिन्हें अज्ञेया कहते हैं, जिनका अन्त नहीं मिलता— इसलिये जिन्हें अनन्ता कहते हैं, जिनका स्वरूप देख नहीं पड़ता—इसलिये जिन्हें अलक्ष्या कहते हैं, जिनका जन्म समझमे नहीं आता—इसलिये जिन्हें अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है—इसलिये जिन्हें एका कहते है, जो अकेली ही विश्वरूपमें सजी हुई हैं—इसलिये जिन्हे नैका कहते हैं, वे इसीलिये अज्ञेया, अनन्ता, अजा, एका और नैका कहाती हैं। सब मन्त्रोंमें 'मातृका'—मूलाक्षररूपसे रहनेवाली, शब्दोंमें अर्थरूपसे रहनेवाली ज्ञानोंमे 'चिन्मयातीता', शून्यों- में 'शून्यसाक्षिणी' तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा नामसे प्रसिद्ध हैं। उन दुर्विज्ञेया, दुराचारनाशिनी और ससार-सागरसे तारनेवाली दुर्गादेवीको ससारसे डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १७—२५ ॥
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
६४८ -- देव्युपनिषद् -- इस अथर्वशीर्षका जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों पापोंका नाश करता है, प्रातःकालमें अध्ययन करनेवाला रात्रि- अथर्वशीर्षके जपका फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्षको में किये हुए पापोंका नाश करता है, दोनो समय अध्ययन न जानकर जो प्रतिमास्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करनेवाला पहलेका पापी भी निष्पाप होता है । मध्यरात्रिमे करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता । अष्टोत्तरशत (१०८ तुरीय* सन्ध्याके समय जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है। नयी बार ) जप (इत्यादि ) इसकी पुरश्चरणविधि है। जो इसका दस प्रतिमापर जप करनेसे देवताका सान्निध्य प्राप्त होता है । बार पाठ करता है, वह उसी क्षण पापोंसे मुक्त हो जाता है मौमाश्विनी (अमृतसिद्धि) योगमें महादेवीकी सन्निधिमे जप और महादेवीके प्रसादसे बडे दुस्तर सकटोंको पार कर जाता करनेसे महामृत्युसे तर जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह है। इसका सायङ्कालमे अध्ययन करनेवाल दिनमे किये हुए महामृत्युसे तर जाता है । इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है ॥ २६ ॥ ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्ति . ! शान्ति . !! शान्ति . !!! सब ब्रह्म है सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमय' पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत' प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । (छान्दोग्य ३ । १४ । १) यह सब ब्रह्म ही है । ब्रह्मसे ही जगत् उत्पन्न होता है, ब्रह्ममें ही विलीन होता है और ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है। शान्त (मयत) होकर ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये । पुरुष कर्ममय है। इस लोकमें जैसा कुछ कर्म करता है, मरनेके बाद प लोकमें वह वैसा ही होता है। इसलिये सत्कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।
- श्रीविद्याके उपासकोंके लिये चार सन्ध्याएँ आवश्यक हैं । इनमें तुरीय-सन्ध्या मध्यरात्रिमें होती है ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥
ऋग्वेदीय
बह्वृचोपनिषद्
शान्तिपाठ
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
देवीसे सबकी उत्पत्ति और देवीकी ब्रह्मरूपता
हरिः ॐ। एकमात्र देवी ही सृष्टिसे पूर्व थीं, उन्होंने ब्रह्माण्डकी सृष्टि की। वे कामकलाके नामसे विख्यात हैं, वे ही शृङ्गारकला कहलाती हैं। उन्हींसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, विष्णु प्रकट हुए, रुद्र प्रादुर्भूत हुए। उन्हींसे समस्त मरुद्गण उत्पन्न हुए। उन्हींसे गानेवाले गन्धर्व, नाचनेवाली अप्सराएँ और वाद्य बजानेवाले किन्नर सब ओर उत्पन्न हुए। उन्हींसे भोग-सामग्री उत्पन्न हुई, सब कुछ उत्पन्न हुआ, सब कुछ शक्तिसे ही उत्पन्न हुआ। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—जितने स्थावर जङ्गम प्राणी हैं, उनकी तथा मनुष्यकी सृष्टि भी उन्हींसे हुई। वे ही अपरा शक्ति हैं, वे ही वैशाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या या सादि विद्या कहलाती हैं, वे ही रहस्यरूपा हैं। वे ही प्रणववाच्य अक्षर तत्त्व हैं, ॐ अर्थात् सच्चिदानन्दस्वरूपा वे वाणीमात्रमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों पुरों तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों प्रकारके शरीरोंको व्याप्तकर बाहर और भीतर प्रकाश फैला रही हैं। देश, काल और वस्तुके भीतर असङ्ग होकर रहती हुई वे महात्रिपुरसुन्दरी प्रत्यक्चेतना हैं। वे ही आत्मा हैं, उनके अतिरिक्त सब असत्य है, अनात्मा है। ये ब्रह्मविद्या हैं, भावाभाव-कलासे विनिर्मुक्त चिन्मयी विद्या-शक्ति हैं तथा अद्वितीय ब्रह्मका बोध करानेवाली हैं। वे सत्, चित् और आनन्दरूप लहरोंवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी बाहर और भीतर प्रविष्ट होकर स्वयं अकेली ही विराजमान हो रही हैं। उनके अस्ति, भाति और प्रिय—इन तीन रूपोंमें जो अस्ति है, वह सन्मात्रका बोधक है। जो भाति है, वह चिन्मात्र है और जो प्रिय है, वह आनन्द है। इस प्रकार सब आकारोंमें श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही विराजमान हैं, तुम और मैं, सारा विश्व और सारे देवता तथा अन्य सब कुछ श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही हैं। ललिता नामकी वस्तु ही एकमात्र सत्य है, वही अद्वितीय, अखण्ड परब्रह्म तत्त्व है। पाँचों रूप अर्थात् अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूपके परित्यागसे तथा अपने स्वरूपके अपरित्योगसे अधिष्ठानरूप जो एक सत्ता बच रहती है, वही महान् परम तत्त्व है॥ २॥
उसीको ‘प्रज्ञान ही ब्रह्म है’ अथवा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इत्यादि वाक्योंसे प्रकट किया जाता है। ‘वह तू है’ इत्यादि वाक्योंसे उसीका कथन किया जाता है। ‘यह आत्मा ब्रह्म है’, ‘ब्रह्म ही मे हूँ’, ‘जो मै हूँ’, ‘वह मे हूँ’, ‘जो वह है, सो मै हूँ’—इत्यादि श्रुतिवाक्योंके द्वारा जिनका निरूपण होता है, वे यही षोडशी श्रीविद्या हैं। वही पञ्चदशाक्षर मन्त्रवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी, स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, वाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला इत्यादि नामोंसे अभिहित होती हैं। ऋचाएँ एक अविनाशी परम आकाशमें प्रतिष्ठित हैं, जिसमे सारे देवता भलीभाँति निवास करते हैं, उसको जाननेका प्रयत्न जिसने नहीं किया, वह ऋचाओंके अध्ययनसे क्या कर सकता है। निश्चय ही उसको जो जान लेते हैं, वे ही उसमे सदाके लिये स्थित हो जाते हैं।
॥ ऋग्वेदीय बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय सौभाग्यलक्ष्म्युपनि द् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड श्रीमहालक्ष्मीका श्रीसूक्तके अनुसार ध्यान, न्यास, पूजन और यन्त्रकी विधि हरि ॐ। एक समय देवताओंने भगवान् आदिनारायण- ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे से कहा—'भगवन् ! हमारे लिये सौभाग्यलक्ष्मी विद्याका स्वाहा। ॐ रजतस्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य- उपदेश कीजिये।' भगवान्ने कहा—'बहुत अच्छा, आप स्रजायै नमः कवचाय हुम्। ॐ हिरण्यायै नमः नेत्रत्रयाय सब देवगण एकाग्रचित्त होकर सुनें । जो स्थूल, सूक्ष्म एव कारण- वौषट्। ॐ हिरण्यवर्णायै नमः अस्त्राय फट् । रूप तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीयस्वरूपा है—नहीं-नहीं, तुरीय- —पश्चात् श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। सिर, नेत्र, मे भी अतीत अर्थात् निर्गुणस्वरूपा है, सबसे बढ़कर उत्कृष्ट कर्ण, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, हृदय, नाभि, लिङ्ग, अर्थात् भयङ्कर रूपवाली है, तथा जो सभी मन्त्रोंको आसन गुदा, ऊरु (जाँघ), जानु, जङ्घा (पिंडली)—इन स्थानोंमें बनाकर उनपर विराजमान हैं, पीठों और उपपीठोमे प्रतिष्ठित श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे क्रमशः न्यास करे। इसके बाद निम्नलिखित देवताओंसे आवृत्त है, चार भुजाओंसे युक्त है—उन श्री मन्त्रके अनुसार ध्यान करे— अर्थात् लक्ष्मीदेवीका 'हिरण्यवर्णीम्०' इत्यादि श्रीसूक्तकी अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा पञ्चदश ऋचाओंके द्वारा ध्यान करें । करकमलधृतेष्टाभीतीयुग्माम्बुजा च । मणिकटकविचित्राऽऽलङ्कृताऽऽल्पजालै सकलभुवनमाता सन्ततं श्रीः श्रियै नः ॥ अर्थात् हल्के लाल (गुलाबी) रंगके कमलदल- पर बैठी हुईं, कमल परागकी राशिके समान पीत वर्णवाली, चारो हाथोंमें क्रमशः वर मुद्रा, अभय मुद्रा और दो कमल-पुष्प धारण किये हुए, मणिमय कड़ोंसे विचित्र शोभा धारण करने- वाली और अलङ्कारसमूहोंसे अलङ्कृत, समस्त लोकोंकी जननी श्रीमहालक्ष्मीदेवी निरन्तर हमें श्रीसम्पन्न करें ॥ १ ॥ (तत्पश्चात् यन्त्र लिखकर उसकी पूजा करे। यन्त्रके कर्णिकावृत्तके ऊपर अष्टदल, उसपर द्वादशदल तथा उदशदलके ऊपर षोडशदल बनाकर तीनोंको एक एक वृत्तसे ेर दे।) पीठकर्णिका अर्थात् बीजकोषके भीतर साध्य-कार्यसहित श्रीबीज (श्रीं) को लिखे। उसके बाद अष्टदल, द्वादशदल और
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श्रीश्रीमहालक्ष्मी — भूयाद्भूयो द्विपचामयचषदकरा तप्तकार्तस्वरभा युष्मानामभयप्रदद्वयकरधृतकुम्भाभिरिषिच्यमाना । रक्तौघा बद्धमौलिविमलतरदुकूलार्तवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः श्रीः श्रिये नः ॥
खण्ड १] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५१ षोडशदल पद्मोंके ऊपर और वृत्तवृत्तोंके बीचमें श्रीसूक्तकी आधी-आधी ऋचा लिखे । ( अर्थात् अष्टदलके ऊपर और पहले भूपृत्तके अंदर 'अश्वपूर्वां रथमध्यां' इत्यादि ऋचाको, द्वादशदलके ऊपर तथा द्वितीय भूपृत्तके भीतर 'कां सोस्मिता हिरण्यप्राकाराम्' इत्यादि तथा षोडशारके ऊपर तथा तृतीय भूपृत्तके भीतर 'गन्धद्वारा दुराधर्षा' इत्यादि ऋचा लिखे ।) उसके बाहर निर्भूवृत्तमे 'य शुचि प्रयतो भूत्वा' इत्यादि फलश्रुतिरूप ऋचाको लिखकर षोडशारके मध्य और ऊपर अकारसे सकारतक मातृका वर्षोंको लिखे । ( क्रम यह है कि प्रत्येक मकार-पर्यन्त दलमे दो दो व्यञ्जन वर्ण तथा प्रत्येक दलके ऊपर भूपृत्तके नीचे क्रमशः अकारादि सोलह स्वर-वर्णोंको लिखे । इसी प्रकार द्वादशदलके दो दो दलोके पार्श्वमे क्रमशः 'ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौं जगत्प्रसूत्यै नम' ये अक्षर लिखे तथा द्वादशदलके दलोमे 'ह्रीं श्रीं क्लीं' इन बीजोको दो दो करके लिखे । फिर भूपृत्तके नीचे अष्टदल कमलके दो दो दलों- के पार्श्वमे क्रमश 'ह' ओर 'क्ष' लिखे । अष्टदलके दलोंमे आ, ई, ऊ और ऋ अनुस्वारसहित लिखकर षट्कोणके कोणों- मे 'श्रीं ह्रीं क्लीं' बीजोंको क्रमशः दो दो वार लिखे और प्रणवद्वारा षट्कोणको घेर दे ।) सबके ऊपर निर्भूवृत्तमे थपड्युक्त त्वरिता- बीजके साथ श्रीबीजको लिखे । इस प्रकार इस अङ्गोवाला श्रीचक्र अर्थात् प्रणव, षट्कोण, भूपृत्त एव अष्टदल, भूपृत्त, द्वादशदल, भूपृत्त, षोडशदल, भूपृत्त एव निर्भूवृत्त बनाये । 'श्रा हृदयाय नम' इत्यादि अङ्गमन्त्रोंसे प्रथम आवरण- पूजा होती है । पद्म आदि निधियोंसे द्वितीय आवरण पूजा होती है । लोकपालो अर्थात् इन्द्र आदि देवताओसे तृतीय आवरण-पूजा होती है। उनके वज्रादि आयुधोंमे चतुर्थ आवरण- पूजा होती हे । श्रीसूक्तके अन्तर्गत ऋचाओंद्वारा आवाहनादि अर्थात् आवाहन, सनिधापन, सग्रोवन, सम्मुखीकरण आदि कार्य होते हैं । (फेली हुई अञ्जलिमें दोनों अनामिकाओके मूलमे अङ्गुष्ठके सिरोंको रखनेसे आवाहनी मुद्रा होती है । दोनों अङ्गुष्ठोंको ऊपर उठा दोनों मुष्टियोंको सयुक्त करनेसे मनिधापनी मुद्रा होती है । इन दोनों अङ्गुष्ठोंको मुष्टियोंमे प्रवेश करानेमे सम्बोधनी मुद्रा होती हे । दोनों मुष्टियोंको उत्तान करके मिलाये रखनेसे सम्मुखीकरणी मुद्रा होती है और आवाहनी मुद्राको अधोमुख करनेसे स्थापनी मुद्रा होती है ।) इसके पश्चात् (देवीकी षोडशोपचार पूजा करके) पुरश्चरणके लिये षोडश सहस्र मन्त्र-जप करे । (यहाँतक श्रीमहालक्ष्मी पूजाका क्रम बताया गया ।)
(इसके बाद सौभाग्यलक्ष्मी-पूजाका क्रम लिखा जाता है—) एकाक्षर सौभाग्यलक्ष्मी मन्त्र 'श्रीं' के भृगु ऋषि हैं, 'नीवृद्गायत्री' छन्द है और श्री देवता है। 'श्रीं' बीज है। 'श्रां' इत्यादिके द्वारा अङ्गन्यास करे। जैसे— श्रां हृदयाय नम । श्रीं शिरसे स्वाहा। श्रूं शिखायै वषट् । श्रैं कवचाय हुम् । श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । श्रः अस्त्राय फट् । इसके पश्चात् नीचे लिखे अनुसार ध्यान करे— भूयाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्तस्वराभा शुभ्राभ्रामेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भििरासिच्यमाना। रक्तौघायद्बमौलिर्विमुलतरदुकूलातंवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसिकृतवसति पद्माग्रा श्री श्रियै न ॥ 'जिन्होंने अपने दोनों हाथोंमें दो पद्म तथा शेष दोमे वर और अभय मुद्राएँ धारण कर रक्खी हैं, तप्त काञ्चनके समान जिनके शरीरकी कान्ति है, शुभ्र मेघकी सी आभासे युक्त दो हाथियोंकी सूँड़ोंमे धारण किये हुए कलशोंके जलसे जिनका अभिषेक हो रहा है, रक्तवर्णके माणिक्यादि रत्नोंका मुकुट जिनके सिरपर सुशोभित है, जिनके वस्त्र अत्यन्त स्वच्छ हैं, ऋतुके अनुकूल चन्दनादि आलेपनके द्वारा जिनके अङ्ग लिप्त हैं, पद्मके समान जिनके नेत्र हैं, पद्मनाभ अर्थात् क्षीरशायी विष्णुभगवान्के उरःस्थलमें जिनका निवास है, वे कमलके आसनपर विराजमान श्रीदेवी हमारे लिये परम ऐश्वर्यका विधान करें।' (इस प्रकार ध्यान करके एक पीठयन्त्र अङ्कित करे ।) वह पीठयन्त्र तीन वृत्तोंमे युक्त अष्टदल पद्म, द्वादश रागिखण्ड तथा चतुष्कोण—इस आकारका रमापीठ होता है । अष्टदल- की कर्णिका अर्थात् बीजकोषमे साध्यसहित श्रीबीज (श्रीं ) लिखना चाहिये—जैसे 'श्रीं श्रीर्मां देवीं जुषताम्।' (इसके पश्चात् प्रात कृत्य, पीठन्यास एव ऋष्यादिन्यास करके) आदिमे प्रणव और अन्तमे 'नमः' जोड़कर प्रत्येक नामके साथ चतुर्थी विभक्तिका प्रयोग करते हुए (जैसे—'ॐ विभूत्यै नमः' इत्यादि) विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सनति, व्युष्टि, सत्कृति एव ऋद्धि--इन नौ शक्तियोंकी पूजा करे । (इसके बाद 'श्रीमत्पद्मासनाय नम.' कहकर आसनका न्यास करे, और) अङ्गन्यासके द्वारा प्रथम आवरणकी पूजा करे । ('श्रा हृदयाय नम' इत्यादिके द्वारा अग्नि आदि कोणमे स्थित केशरोंमे तथा दिशाओंमे पूजा करके पूर्वादि दिशाओंमे) क्रमशः वासुदेव, सकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको पूजे (तथा
६५२ ॐ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् ॐ [ खण्ड २
अग्नि आदि कोणोंमे क्रमशः मद्रक—नव शाक विशेष, सलिल, गुग्गुल एव कुरुण्टक—पुष्पविशेषकी पूजा करे। देवीके दक्षिणमे शङ्खनामक निधि और वसुधाकी तथा वाममें पद्म-नामक निधि और वसुमतीकी पूजा करे ।) इस प्रकार द्वितीय आवरणकी पूजा होती है। फिर बालक्षी आदि अर्थात् बालकी, विमला, कमला, वनमालिका, विभीषिका, मालिका, शाङ्करी और वसुमालिकाकी पूजा करे। इस प्रकार तृतीय आवरणकी पूजा होती है। इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओं तथा उनके वज्र आदि आयुधोंकी पूजासे चतुर्थ आवरणकी पूजा होती है। पुरश्चरणके लिये बारह लाख मन्त्र-जप करना चाहिये। (इस प्रकार एकाक्षरी सौभाग्यलक्ष्मीकी पूजा-विधि समाप्त हुई।)
(अब 'श्रीं ह्रीं श्रीं' रूप त्र्यक्षरी विद्याकी पूजा-विधि बतायी जाती है। इसका पूजा क्रम एकाक्षरीके पूजा क्रमके समान ही है। केवल तृतीय आवरणकी पूजामें कुछ विशेषता है।) यहाँ आदिमे प्रणव और अन्तमे नमः लगाकर प्रत्येक नामका चतुर्थी विभक्तिसहित प्रयोग करते हुए (जैसे, 'ॐ श्रियै नम इत्यादि) श्री, लक्ष्मी, वरदा, विष्णुपत्नी, वसुप्रदा, हिरण्यरूप्रा, स्वर्णमालिनी, रजतस्रजा, स्वर्णप्रभा, स्वर्णप्राकारा, पद्मवासिनी, पद्महस्ता, पद्मप्रिया, मुक्तालङ्कारा, चन्द्रसूर्या, विल्वप्रिया, ईश्वरी, भुक्ति, मुक्ति, विभूति, ऋद्धि, समृद्धि, कुष्टि, पुष्टि, धनदा, धनेश्वरी, श्रद्धा, भोगिनी, भोगदा, सावित्री, धात्री, विधात्री प्रभृति नाम मन्त्रोंके द्वारा शक्ति की पूजा करे। एकाक्षर मन्त्रके समान ही अङ्गादिके द्वारा पीठ पूजा करे। पुरश्चरणके लिये एक लाख मन्त्र-जप करे। जपका दशांश तर्पण, तर्पणका दशांश हवन और हवनका दशांश ब्राह्मणभोजन करावे (तथा ब्राह्मण भोजनका दशांश अभिषेक अर्थात् मार्जन करे)। निष्काम उपासना करनेवालेको ही श्रीविद्याकी सिद्धि होती है। सकाम उपासना करनेवालोको कदापि सिद्धि नही होती । इस प्रकार सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्का श्रीक्रम नामक प्रथम खण्ड समाप्त हुआ ॥ १ ॥
॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
योगसम्बन्धी उपदेश
इसके बाद आदिनारायणमे देवताओंने कहा—भगवन् ! तुरीया मायाके द्वारा निर्दिष्ट तत्त्वके विषयमे हमसे कहिये। 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् आदिनारायणने उपदेश आरम्भ किया—
'योगसे योगको जानना चाहिये, योगसे योग बढता है। जो योगी योगमे सदा सावधान रहता है, वह योगी चिरकालतक—अनन्तकालतक आनन्दोपभोग करता है। मितभोगी अर्थात् शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक अन्न वस्त्रादिका उपभोग करनेवाला साधक राग द्वेष मोहरूपी कषाय—मलके परिपक्व हो जानेपर, निद्रा—आलस्य त्यागकर, प्रपञ्चके ब्रह्मत्वकी प्राप्तिमे बाधक होनेके कारण एकान्त स्थानमें (संसारके कोलाहलसे रहित प्रदेशमे ) जाकर साधन करता है—आत्माको परमात्मामे लगानेका अभ्यास करता है। वह या तो शीतोष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेके लिये राजयोगमें प्रवृत्त होता है अथवा गुरूपदिष्ट मार्गपर चलता हुआ प्राणायामके द्वारा हठयोगका अवलम्बन करता है। तात्पर्य यह कि राजयोग और हठयोगके भेदसे योग द्विविध है । प्राणायामका अभ्यास करनेवाले पहले मुखसे वायुको खींचकर भीतर भरते हैं और नाभि प्रदेशसे अपानवायुको जठराग्निके कोष्ठमें खींचकर मुखके द्वारा खींची हुई वायुके साथ उसका सयोग कराते अँगूठे, अँगुलियों तथा दोनों हथेलियोंके द्वारा दो नेत्र तथा नासा पुटोंको बन्द करके प्राणायामके द्वारा तथा प्रणवका नाना प्रकारसे ध्यान करके उसीमे त योगीजन चैतन्यस्वरूप आत्माका साक्षात्कार करते हें
'अभ्यासकी एक और विधि है—जो कान, मुख, नासाछिद्रोंको बन्द करके ही की जाती है । वह सुषुम्णा नाडीमे प्रणवके विशुद्ध अनाहत नामक ना सुनना । अनाहतचक्रमे ध्वनिको सुननेपर नाना विचित्र घोष सुने जाते हैं, और इस साधनाके द्वार तेजस्वी हो जाता है, उसके शरीरसे दिव्य गन्ध आ है और स्वस्थ होकर वह दिव्यदेह प्राप्त करता है मे अर्थात् सुषुम्णा नाडीमें पूरे मनोयोगके सा सुनते रहनेसे आरम्भमें ही—जहाँसे वह सुषुम् आरम्भ होती है, उस मूलाधारचक्रमें ही साधक योग जाता है अर्थात् दीपशिखाके आकारके जीवात्माव पुण्डरीकसे मूलाधारचक्रमें लाकर सुषुम्णा नाडीसे स देता है। इस प्रकार इच्छाशक्तिकी प्रेरणासे जब सुषुम्णा मार्गपर चलने लगता है, तब द्वितीय अर्थात् स्व
खण्ड ३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५३
चक्रको विघटित करके—भेदकर उसीके मध्यस्थित छिद्रमेसे होकर प्राणवायु मध्यगा होती है अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश कर जाती है ॥ ४-६ ॥
पद्मासनादिपर स्थित हुए योगीका आसन दृढ होता है । उसके बाद विष्णुग्रन्थि अर्थात् मायाको, जो तृतीय मणिपूरक नामक चक्रमें रहकर अनेक कामनाओंका विस्तार करती रहती है, विच्छिन्न कर देनेपर परमानन्दकी प्राप्ति सम्भव हो जाती है । शून्य अर्थात् मायाको लाँघकर उठता हुआ प्राणवायु जब नाड़ीके साथ सङ्घर्षणको प्राप्त होता है, तब उससे भेरीके समान ध्वनि सुन पड़ती है और तृतीय मणिपूरक चक्रको भेदकर चलनेपर प्राणवायुसे मर्दल-ध्वनि अर्थात् मृदङ्ग-जैसी ध्वनि होती है । इसके आगे अन्य चक्रोंको भेदता हुआ वह महाशून्य अर्थात् आज्ञाग-चक्रमें जाता है, जहाँ सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । उसके बाद प्राणवायु तालुचक्रसे चित्तको जयकर तालुचक्रको भेदता है, जहाँ चित्तगत सम्पूर्ण आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥ ७-९ ॥
इस साधनाकी समाप्तिमें वैष्णवशब्द—प्रणव शब्दायमान होता है, शब्दके रूपमे स्वय प्रकट होता है । उस प्रणव-ध्वनिमें चित्त विलीन हो जाता है, इस प्रकार सनकादि मुनियोंने कहा है । उस महाशून्य चक्रमें स्थित होकर साधक अन्त अर्थात् जीवमे अनन्त—परमात्माका समारोप करता है, मायाग्रस्त स्वरूप—अग्ररूप आत्मामें निरंश परमात्माको समर्पितकर तथा आत्माकी सर्वव्यापक प्रकृतिका ध्यान करके कृतकृत्य हो जाता है, अमृतस्वरूप हो जाता है । सम्प्रज्ञात योगको असम्प्रज्ञात योगसे जीते और भाव अर्थात् सविचार समाधिका निरोध अभाव—निर्विचार समाधिसे करे, उसके बाद निर्विकल्प समाधिको प्राप्त करके साधक परमतत्त्व—कैवल्यमें स्थित होता है । निर्विकल्प समाधिमे स्थित साधकका अहम्भाव छूट जाता है और आत्मतत्त्वमे अध्यस्त मायात्मक जगत्का भी लोप हो जाता है । ऐसा विद्वान् पुनः 'यह मै हूँ और यह मेरा है' इत्यादि चिन्तामे नहीं पड़ता ॥ १०-१३ ॥
'जिस प्रकार पानीमें नमक मिलानेसे वह उसमे घुल मिल जाता है, उसी प्रकार मनका आत्मामें विलीन हो जाना समाधि कहलाता है। जब प्राणायामके अभ्याससे प्राणवायु सम्यक्रूपसे क्षीण होकर कुम्भकमे स्थिर हो जाता है, और मानसिक वृत्तियाँ अत्यन्त विलीन हो जाती हैं, उस समय तैलधारावत् चित्तका आत्माके साथ एकीभाव समाधि कहलाता है । जीवात्मा और परमात्माका समत्व होनेपर जब सारे सङ्कल्प नष्ट हो जाते हैं, उस स्थितिको समाधि कहते हैं । प्रभा अर्थात् जागतिक बोधसे शून्य जिस स्थितिमें मन और बुद्धि पूर्णत. विलीन हो जाते हे, जिसमें कुछ आभासित नहीं होता—सब शून्याकार प्रतीत होता है, वह निरामय—भवरोगकी निवृत्तिकी अवस्था समाधि कहलाती है । शरीरके इधर-उधर चलनेपर भी देही अर्थात् जीवात्मा जब निश्चल, नित्य स्वयम्प्रकाश स्वरूपमें स्थित रहता है, उसे समाधि कहना चाहिये। उस समय साधकका मन जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ वहाँ परमपदकी प्राप्ति होती है । उसके लिये सर्वत्र परब्रह्म समवस्थित होता है । सर्वत्र परब्रह्म समवस्थित होता है' ॥ १४-१९ ॥
॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय खण्ड
नवचक्र-विवेक
पश्चात् भगवान् आदिनारायणसे देवताओने निवेदन किया—'भगवन् ! आप कृपया हमारे लिये नवचक्रविवेकके विषयमे उपदेश कीजिये ।' 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान्ने उपदेश आरम्भ किया—
'मूलाधारमें ब्रह्मचक्र है, वह योनिके आकारमें तीन घेरोंसे युक्त है, वहाँ कर्णिकाके मूलमें कुण्डलिनी शक्ति सोये हुए सर्पके आकारमें स्थित है । तप्त अग्निके रूपमे उसका तबतक ध्यान करना चाहिये, जबतक वह जाग्रत् न हो जाय । वहीं भगवती त्रिपुराका स्थान कामरूप नामक पीठ है, जिसकी उपासना करनेसे सारे भोगोंकी प्राप्ति होती है। इतना आधारनामक प्रथम चक्रके विषयमें हुआ ॥ १ ॥
'दूसरा छः दलोका स्वाधिष्ठान-चक्र है । उस षट्दल पद्मके कर्णिकापीठमें पश्चिमाभिमुख एक शिवलिङ्गका, जो मूँगेके अङ्कुरके समान लाल वर्णका है, ध्यान करे । वहाँ उड्डयानपीठ है, उसकी उपासना करनेसे जगत्को आकर्षित करनेकी सिद्धि प्राप्त होती है । तीसरा नाभिचक्र सर्पके समान कुटिल आकारका ओर पाँच घेरोंसे आवृत है। उस चक्रमे कोटि-कोटि बालसूर्यौंकी-सी प्रभासे युक्त तथा तड़ित्के समान क्षीण
६५४ ॱ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् ॱ [ खण्ड ३ अङ्गोंवाली कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे । यह शक्ति जाग्रत् होनेपर सामर्थ्यवती होती है और सब प्रकारकी सिद्धियों- को प्रदान करती है । मणिपूरक चक्र हृदयचक्र है । वह अष्टदल पद्मके आकारका नीचेकी ओर मुख किये रहता है । उस चक्रमें ज्योतिर्मय लिङ्गका ध्यान करना चाहिये । वही ज्योतिर्मय लिङ्ग हस्रम्लाके नामसे विख्यात है, जो सर्वप्रिय है, उसके जाग्रत् होनेपर समस्त लोकोंको वशमें करनेकी शक्ति प्राप्त होती है । कण्ठमें जो चक्र है, वह चार अङ्गुल प्रमाणका है, उसमें बायीं ओर इडा अर्थात् चन्द्रनाड़ी और दाहिनी ओर पिङ्गला अर्थात् सूर्यनाड़ी है । इन दोनोंके बीचमें श्वेतवर्णकी सुषुम्णा नाड़ीका ध्यान करे । जो इसको जानता है, उसका अनाहत चक्र सिद्धि प्रदान करता है । इसके आगे तालुचक्र है, जहाँ निरन्तर अमृतकी धार प्रवाहित होती रहती है । तालुचक्रमे दश अथवा बारह दल होते हैं । घण्टीके चिह्नकी जड़में तथा आगेके दाँतोंकी जड़तक फैला हुआ जो चक्रके आकारका रन्ध्र—छिद्र है, उसीमे तालु- चक्र स्थित है । उस चक्रमे शून्यका ध्यान करे । इससे चित्त शून्यमें विलीन हो जाता है। सातवाँ भ्रूचक्र अँगूठेके परिमाणका है, उस द्विदल पद्ममे निवातदीपशिखाके आकारमें ज्ञान- नेत्रका ध्यान करे। इस चक्रके जाग्रत् होनेपर कपालकुन्द अर्थात् अष्टकके कारणभूत कर्मोंकी वाक्सिद्धि अर्थात् उनके विषयका सारा ज्ञान हो जाता है । आठवाँ आज्ञाचक्र है, उसे ब्रह्मरन्ध्र अथवा निर्वाणचक्र भी कहते हैं । वह रन्ध्र सूईकी नोकके परिमाणका है । वहाँ गतिशील धूम्रशिखाके आकारका ध्यान करे । वहाँ जालन्धर पीठ है । उसकी उपासना करनेसे मुक्तिलाभ होता है । अतएव इसे परब्रह्म- चक्र भी कहते हैं । नवाँ आकाशचक्र है । वहाँ षोडशदल पद्म ऊपरकी ओर मुख किये स्थित है । उनके बीचकी कर्णिका त्रिगुणांकी जननी होनेके कारण तीन शिखरोंवाले पर्वतके आकारकी कही गयी है । उसके बीचमें ऊपरकी ओर झुकी हुई शक्ति है । उसको देखते हुए ध्यान करे । वहाँ ही पूर्णगिरि पीठ है, जिसकी उपासना करनेसे सब प्रकारकी कामनाओंकी सिद्धि होती है ॥ २-९ ॥ 'इस सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्को जो नित्य पढता है, वह अग्निपूत होता है, वह वायुपूत होता है । वह सब प्रकारके धन धान्य, स्त्री पुत्र, हाथी घोड़े, गाय भैंस, दास दासीमे युक्त योगी और ज्ञानी होता है । अन्तमे वह परमपदको प्राप्त करता है—जहाँसे फिर नहीं लौटता, फिर नहीं लौटता ॥ १० ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ ऋग्वेदीय सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यूतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! 'न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः ।' ( कठोपनिषद् १ । १ । २७ ) 'धनसे मनुष्य कभी तृप्त होनेवाला नहीं है ।'
खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६५५ (सौभाग्यलक्ष्मी-उपनिषद्में वर्णित श्रीसूक्त) अथ श्रीसूक्तप्रारम्भः हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥ १ ॥ वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः । हे जातवेदा (सर्वज्ञ) अग्निदेव ! सुवर्णके-से रगवाली, तस्य फलानि तपसा नुदन्तु किञ्चित् हरितवर्णविशिष्टा, सोने और चाँदीके हार पहननेवाली, या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६ ॥ चन्द्रवत् प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवीको मेरे लिये हे सूर्यके समान प्रकाशस्वरूपे ! तुम्हारे ही तपसे आवाहन करो ॥ १ ॥ वृक्षोंमें श्रेष्ठ मङ्गलमय विल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ । उसके फल हमारे तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । बाहरी और भीतरी दारिद्रयको दूर करें ॥ ६ ॥ यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २ ॥ उपैतु मा देवसखः अग्ने ! उन लक्ष्मीदेवीको, जिनका कभी विनाश नहीं कीर्तिश्च मणिना सह । होता तथा जिनके आगमनसे मैं सोना, गौ, घोडे तथा प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् पुत्रादिको प्राप्त करूँगा, मेरे लिये आवाहन करो ॥ २ ॥ कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७ ॥ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम् । देवि ! देवसखा कुवेर और उनके मित्र मणिभद्र श्रियं देवीमुप ह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम् ॥ ३ ॥ तथा दक्ष प्रजापतिकी कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हों । अर्थात् जिन देवीके आगे घोड़े तथा उनके पीछे रथ रहते हैं मुझे धन और यशकी प्राप्ति हो । मैं इस राष्ट्रमे—देशमें तथा जो हस्तिनादको सुनकर प्रमुदित होती हैं, उन्हीं श्रीदेवीका उत्पन्न हुआ हूँ, मुझे कीर्ति और ऋद्धि प्रदान करें ॥ ७ ॥ मैं आवाहन करता हूँ, लक्ष्मीदेवी मुझे प्राप्त हों ॥ ३ ॥ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् । कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८ ॥ ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् । लक्ष्मीकी ज्येष्ठ बहिन अलक्ष्मी (दरिद्रताकी अधिष्ठात्री पद्मेस्थितां पद्मवर्णां देवी) का, जो क्षुधा और पिपासासे मलिन—क्षीणकाय तामिहोप ह्वये श्रियम् ॥ ४ ॥ रहती हैं, मैं नाश चाहता हूँ । देवि ! मेरे घरसे सब प्रकारके जो साक्षात् ब्रह्मरूपा, मन्द-मन्द मुसकरानेवाली, सोनेके दारिद्र्य और अमङ्गलको दूर करो ॥ ८ ॥ आवरणसे आवृत्त, दयार्द्र, तेजोमयी, पूर्णकामा, भक्तानु- गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ग्रहकारिणी, कमलके आसनपर विराजमान तथा पद्मवर्णा हैं, ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९ ॥ उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ आवाहन करता हूँ ॥ ४ ॥ जो दुराधर्षा तथा नित्यपुष्टा हैं, तथा गोबरसे (पशुओंसे) युक्त चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं गन्धगुणवती पृथिवी ही जिनका स्वरूप है, सब भूतोंकी स्वामिनी श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् । उन लक्ष्मीदेवीका मैं यहाँ—अपने घरमें आवाहन करता तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये- हूँ ॥ ९ ॥ ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५ ॥ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि । मैं चन्द्रके समान शुभ्र कान्तिवाली, सुन्दर द्युतिशालिनी, पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥१०॥ यशसे दीप्तिमती, स्वर्गलोकमें देवगणोंके द्वारा पूजिता, मनकी कामनाओं और सङ्कल्पकी सिद्धि एव वाणीकी सत्यता उदारशीला, पद्मस्तहा लक्ष्मीदेवीकी शरण ग्रहण करता हूँ । मुझे प्राप्त हों, गौ आदि पशुओं एव विभिन्न अन्नों—भोग्य मेरा दारिद्र्य दूर हो जाय । मैं आपको शरण्यके रूपमें वरण पदार्थोंके रूपमें तथा यशके रूपमें श्रीदेवी हमारे यहाँ करता हूँ ॥ ५ ॥ आगमन करें ॥ १० ॥
६५६ * सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् * [ खण्ड ३ कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम। श्रियं वासय मे कुले मातर पद्ममालिनीम् ॥११॥ लक्ष्मीके पुत्र कर्दमकी हम संतान हैं। कर्दम ऋषि ! आप हमारे यहाँ उत्पन्न हो तथा पद्मोंकी माला धारण करनेवाली माता लक्ष्मीदेवीको हमारे कुलमें स्थापित करें ॥ ११ ॥ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे । नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥१२॥ जल स्निग्ध पदार्थोंकी सृष्टि करे। लक्ष्मीपुत्र चिक्लीत ! आप भी मेरे घरमे वास करें और माता लक्ष्मीदेवीका मेरे कुलमे निवास करायें ॥ १२ ॥ आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥१३॥ अग्ने ! आर्द्रस्वभावा, कमलहस्ता, पुष्टिरूपा, पीतवर्णा, पद्मोंकी माला धारण करनेवाली, चन्द्रमाके समान शुभ्र कान्तिसे युक्त, स्वर्णमयी लक्ष्मीदेवीका मेरे यहाँ आवाहन करें ॥ १३ ॥ आर्द्रां य करिणां यष्टि सुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह ॥१४॥ अग्ने ! जो दुष्टोंका निग्रह करनेवाली होनेपर भी कोमल- स्वभावकी हैं, जो मङ्गलदायिनी, अवलम्बन प्रदान करनेवाली यष्टिरूपा, सुन्दर वर्णवाली, सुवर्णमालाधारिणी, सूर्यरस्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवीका मेरे लिये आवाहन करें ॥१४॥ तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम् ॥१५॥ अग्ने ! कभी नष्ट न होनेवाली उन लक्ष्मीदेवीका मेरे लिये आवाहन करें, जिनके आगमनसे बहुत-सा धन, गौएँ, दासियाँ, अश्व और पुत्रादिको हम प्राप्त करें ॥ १५ ॥ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् । सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥१६॥ जिसे लक्ष्मीकी कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और संयमशील होकर अग्निमें घीकी आहुतियाँ दे तथा इन पन्द्रह ऋचाओंवाले श्रीसूक्तका निरन्तर पाठ करे ॥ १६ ॥ ॥ श्रीसूक्त समाप्त ॥ सङ्गका त्याग ही मोक्ष है भावभावे पदार्थानां हर्षामर्षविकारदा । मलिना वासना यैषा सा सङ्ग इति कथ्यते ॥ दुःखैर्न ग्लानिमायासि हृदि हृष्यसि नो सुखैः । आशावैवश्यमुत्सृज्य निदाघासङ्गतां व्रज ॥ सङ्गत्यागं विदुर्मोक्षं सङ्गत्यागादजन्मन्ता । सङ्गं त्यज त्वं भावानां जीवन्मुक्तो भवानघ ॥
- ( अन्नपूर्णोपनिषद् ) पदार्थोंके होनेमें हर्ष और न होनेमें शोकरूपी विकार उत्पन्न करनेवाली जो मलिना वासना है, उसे सङ्ग कहते हैं। निदाघ ! तुम दुःखोंमें ग्लानिका अनुभव मत करो और सुखोंसे हृदयमे हर्षित मत होओ। यों आशाओंकी परवशताको छोड़कर असंगावस्थाको प्राप्त करो। हे निष्पाप ! सङ्गके त्यागको ही मोक्ष कहते हैं, सङ्गके त्यागसे जन्म-( मरण ) से छुटकारा मिलता है। अतएव समस्त पदार्थोंमें सङ्गका त्याग करके जीते ही मुक्त हो जाओ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय सीतोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीसीताजीके स्वरूपका तात्त्विक वर्णन
एक बार देवताओोंने प्रजापति ब्रह्माजीसे पूछा कि 'श्रीसीता- जी कौन हैं ! उनका क्या स्वरूप है ?' तब उन प्रजापतिने बतलाया कि “वे शक्तिरूपा ही श्रीसीताजी हैं। मूल प्रकृति- स्वरूपा होनेके कारण वे सीताजी ही प्रकृति कहलाती हैं। वे श्रीसीताजी प्रणवकी प्रकृतिस्वरूपा होनेसे भी प्रकृति कही जाती हैं। 'सीता' यह उनका नामात्मक रूप तीन वर्णोंका है और वे साक्षात् योगमायास्वरूपा हैं। सम्पूर्ण जगत्-प्रपञ्च- के भगवान् विष्णु बीज हैं और उनकी योगमाया 'ईकार' रूपा हैं। 'सकार' सत्य, अमृत, प्राप्ति* नामक ऐश्वर्य अथवा सिद्धि एवं चन्द्रका वाचक कहा गया है। दीर्घरूप-मात्रायुक्त 'तकार' महालक्ष्मीका स्वरूप, प्रकाशमय एव विस्तारकारी (जगत्स्रष्टा) कहा गया है। वे 'ईकार'रूपिणी अव्यक्तरूपा महामाया अपने चन्द्रसन्निभ अमृतमय अवयवों एव दिव्य अलकार, माला, मुक्तामालादि आभूषणोंसे अलकृत स्वरूपमें व्यक्त होती हैं। उनके तीन स्वरूप हैं, जिनमें अपने प्रथम स्वरूपसे वे शब्दब्रह्ममयी हैं। वे बुद्धिरस्वरूपा स्वाध्यायकालमें प्रसन्न होनेपर बोधको प्रकट करती हैं। अपने दूसरे स्वरूपमें वे पृथ्वीपर महाराज सीरध्वज जनककी यज्ञभूमिमें हलाग्रसे उत्पन्न हुईं। अपने तीसरे स्वरूपमें वे 'ईकार' रूपिणी अव्यक्तस्वरूपा रहती हैं। इन्हीं तीनों रूपोंको सीता कहा जाता है। शौनकीय तन्त्रमें निम्नलिखित भावके श्लोक मिलते हैं— “श्रीसीताजी श्रीरामकी नित्य सन्निधिके कारण जगदानन्द- कारिणी हैं। समस्त शरीरधारियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और सहार करनेवाली हैं। श्रीसीताजीको मूलप्रकृति कही जाने- वाली षडैश्वर्यसम्पन्ना भगवती जानना चाहिये। प्रणव- स्वरूपा होनेके कारण ब्रह्मवादी उन्हें प्रकृति बतलाते हैं। ब्रह्मसूत्रके 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस सूत्रमें उन्हींका प्रति- पादन है। वे श्रीसीताजी सर्ववेदमयी, सर्वदेवमयी, सर्वलोक- मयी, सर्वकीर्तिमयी, सर्वधर्ममयी, सबकी आधारभूता, कार्य एवं कारणरूपा, चेतन एवं जड दोनोंकी स्वरूपभूता, ब्रह्मा- जीसे लेकर जड पदार्थोंतककी आत्मभूता, इन सबके गुण एव कर्मके भेदसे सबकी शरीररूपा, देवता, ऋषि, मनुष्य एव गन्धर्वोंकी स्वरूपभूता, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच प्रभृति प्राणियोंकी शरीररूपा; पञ्चमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन एवं प्राणरूपा अर्थात् समस्त विश्वरूपा महालक्ष्मी देवताओंके भी स्वामी भगवान्से भिन्न एव अभिन्नस्वरूपा जानी जाती हैं। “वे श्रीसीताजी शक्त्यासना—शक्तिस्वरूपा होकर इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति एव साक्षात् शक्ति—इन तीन रूपोंमें प्रकट होती हैं। इच्छाशक्तिमय उनका स्वरूप भी त्रिविध होता है— श्रीदेवी, भूमिदेवी एवं नीलादेवीके रूपमें कल्याणरूपा, प्रभाव
- अणिमादि अष्टविध ऐश्वर्यमें 'प्राप्ति' नामक सिद्धिका भी वर्णन आता है। प्राप्ति कहते हैं सर्वत्र गमनकी शक्तिको। उ० अ० ८३—
६५८ * सीतोपनिषद् *
रूपा तथा चन्द्र, सूर्य एव अग्निरूपा वे होती हैं। चन्द्रस्वरूपमे वे ओषधियोंका पोषण करती हैं। कल्पवृक्ष, पुष्प, फल, लता एव गुल्मो (झाड़ियों), ओषधियों एव दिव्य ओषधियोंकी स्वरूपभूता होती हैं तथा उसी चन्द्रके अमृतस्वरूपमें देवताओंके लिये 'महस्तोम' नामक यज्ञके फलको देनेवाली होती हैं। अमृतके द्वारा देवताओंको, अन्नके द्वारा पशुओं (प्राणियों) को तथा तृणके द्वारा उसपर अवलम्बित रहनेवाले जीवोंको—इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणियोंको वे तृप्त करती हैं।
"वे सूर्यादि समस्त भुवनोंको-लोकोंको प्रकाशित करनेवाली हैं। दिन, रात्रि, निमेषसे लेकर घड़ी प्रभृति कालकी कलाएँ, आठ पहरोंसे युक्त दिन-रात्रिके भेदसे पक्ष, मास, ऋतु, अयन तथा संवत्सरके भेदसे मनुष्योंकी सौ वर्षकी आयुकी कल्पनाके द्वारा वे स्वयं ही प्रकाशित होती हैं। विलम्ब तथा शीघ्रतासे उपलक्षित निमेषसे लेकर परार्धपर्यन्त कालचक्र तथा जगच्चक्रादि प्रकारसे चक्रके समान घूमनेवाले कालके सभी विशेष-विशेष विभाग उन्हींके स्वरूप हैं, जो प्रकाशरूपा एव कालरूपा हैं।
"वे अग्निरूपा होकर प्राणियोंके लिये अन्न एव जलादि-पानके लिये क्षुधा एव पिपासारूपसे, देवताओंके लिये मुखरूपसे (देवता अग्निमें होमे हुए पदार्थ ही पाते हैं), वनौषधियोंके लिये शीतोष्णरूपसे, तथा काष्ठके बाहर एव भीतर नित्य एव अनित्य दोनों प्रकारसे (नित्यरूपमे व्याप्त अग्नितत्त्व एव अनित्यरूपमे प्रज्वलिताग्नि प्रभृति रूपोंमें) स्थित हैं।
"वे श्रीसीताजी अपने श्रीदेवीरूपमें तीन प्रकारका रूप धारण करके श्रीभगवान्के संकल्पानुसार सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये व्यक्त होती हैं। वे लोकरक्षणार्थ श्री तथा लक्ष्मीरूपमें लक्षित होती हैं, यों जाना जाता है। भूदेवी सम्पूर्ण जलमय समुद्रोंसहित सातों द्वीपवाली पृथिवीके रूपमें भूः भुवः आदि चौदहों भुवनोंकी आधार एव आधेयभूता प्रणवस्वरूपा होकर व्यक्त होती है। विद्युन्मालाके समान मुखवाली नीलादेवी भी सम्पूर्ण ओषधियों एव समस्त प्राणियोंके पोषणके लिये सर्वरूपा हो जाती है। समस्त भुवनोंके अधोभागमे जलाकारस्वरूप, मण्डूकमयी तथा भुवनोंकी आधाररूपा वही आदिशक्ति जानी जाती है।
"उन श्रीसीताजीका क्रियाशक्ति-रूप श्रीहरिके मुखसे नादके रूपमें व्यक्त हुआ। उस नादसे बिन्दु प्रकट हुआ। बिन्दुसे ॐकारका आविर्भाव हुआ। ॐकारसे परे राम-वैखानस नामका पर्वत है। उस पर्वतकी कर्म एव ज्ञानात्मिका अनेक शाखाएँ व्यक्त हैं। उसी पर्वतपर वेदत्रयीस्वरूप सर्वार्थको प्रकट करनेवाला आदि-शास्त्र है। तात्पर्य यह कि श्रीराम वैखानस पर्वत ही नित्य वेदस्वरूप हैं और लोकमें वह वेदोंके रूपमे व्यक्त होता है। उस आदि शास्त्रको ऋक्, यजुः एव सामात्मक होनेसे त्रयी कहा जाता है। कार्य-सिद्धिके लिये चार नामोसे उसका वर्णन होता है। अर्थात् देवस्वरूप वर्णनके मन्त्र, यज्ञ विधि निर्देशक मन्त्र तथा यज्ञमें गानके मन्त्र—ये ही तीन प्रकारके मन्त्र होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं; किंतु यज्ञमे ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु एव उद्गाताके कार्यकी दृष्टिसे वेदोंको चार नामोंसे सम्बोधित किया जाता है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्वाङ्गिरमवेद। यज्ञकर्ममें चातुर्होत्र प्रधान है और उसमे देवस्वरूपादि तीनका ही उपयोग होनेसे वेदोंको त्रयी कहते हैं। अथर्वाङ्गिरस वेद साम, ऋक् एव यजुःस्वरूप ही है। आभिचारिक कर्मोंकी समानतासे इन चारोंका पृथक्-पृथक् निर्देश होता है।
"ऋग्वेदकी इक्कीस शाखाएँ कही गयी हैं। यजुर्वेदीयोंकी एक सौ नौ शाखाएँ हैं। सामवेदकी एक सहस्र शाखाएँ हैं और अथर्ववेदकी पाँच शाखाएँ। इन वेदोंमें प्रथम (सर्वश्रेष्ठ) वैखानस मत है, जो प्रत्यक्ष दर्शन है। इसलिये मुनियोंद्वारा नित्य परम वैखानस (श्रीरामरूप) का स्मरण किया जाता है। कल्प, व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त, ज्योतिष तथा छन्द—ये छः वेदाङ्ग हैं। अयन, मीमांसा और न्यायशास्त्रका विस्तार—ये वेदोंके उपाङ्ग हैं। धर्मज्ञ पुरुषोके सेवनके लिये चारों वेद तथा वेदोंसे अधिक ये अङ्ग-उपाङ्गादि हैं। सभी वैदिक शाखाओंमें उनके समयाचार (साम्प्रदायिक आचरण) की शास्त्रके साथ सगति लगानेके लिये निबन्ध हैं। धर्मशास्त्रों (स्मृतियो) को महर्षियोंने अपने अन्त:करणके दिव्य ज्ञानसे पूर्ण किया है। मुनियोंने इतिहास-पुराण, वास्तुवेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा आयुर्वेद—ये पाँच उपवेद बताये हैं। इन सबके साथ दण्ड, नीति और व्यापार-विद्या तथा परतत्त्वमें प्राणजय करके स्थिति—इस प्रकार इक्कीस भेदयुक्त यह स्वत:प्रकाश—स्वयं प्रकटित शास्त्र है।
"पूर्वकालमे वैखानस ऋषिके हृदयमें भगवान् विष्णुकी वाणी प्रकट हुई। उसी वाणीको वेदत्रयीके रूपमें इस प्रकार कल्पित करके देहधारी अपनी उन्नति करता है। वैखानस ऋषिने अपने हृदयमे प्रकट उस भगवद्वाणीको सख्यारूपमे सङ्कल्प करके पहले जिस प्रकार प्रकट किया, उसी प्रकार वह
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *- ६५९ सब मैं बतलाता हूँ; सुनो। जो सनातन ब्रह्ममय रूपधारिणी क्रियाशक्ति कही गयी है, वह भगवान्की साक्षात् शक्ति है। भगवान्के स्मरणमात्र (संकल्पमात्र) से वे जगत्के रूपोंको प्रकट करती तथा दृश्य-जगत्मे स्वय व्यक्त होती ह। वे शासन एव कृपास्वरूपा, शान्ति तथा तेजोरूपा, व्यक्त (प्राणियों) की, अव्यक्त (देवादि) की कारणभूता एव उनके चरणादि समस्त अवयव तथा मुख एवं वर्ण (रूपादि) भेदस्वरूपा, भगवान्के साथ चलनेवाली (उनके सकल्पसे ही गति करनेवाली), भगवान्से कभी विलग न होनेवाली एव अविनाशिनी, निरन्तर भगवान्के साथका ही आश्रय करनेवाली, कहे हुए और न कहे हुए सभी स्वरूपोंवाली, निमेष-उन्मेषसे लेकर सृष्टि, स्थिति, सहार, तिरोधान, अनुग्रह आदि समस्त सामर्थ्यांस युक्त होनेके कारण साक्षात् शक्तिरूपमे वर्णित होती है। “श्रीसीताजीका इच्छाशक्ति रूप भी तीन प्रकारका है। प्रलयके समय विश्रामके लिये भगवान्के दाहिने वक्षःस्थलपर श्रीवत्सकी आकृति धारण करके जो विश्राम करती हैं, वे योगशक्ति हैं। भोगशक्ति भोगरूपा है। वे कल्पवृक्ष, कामधेनु, चिन्तामणि तथा शङ्ख, पद्म (तथा मकर, कच्छप) आदि नौ निधियोंमे निवास करती ह और भगवद्भक्तोंकी कामनाके अनुसार अथवा उनकी कामनाके बिना भी नित्य नैमित्तिक कर्मके द्वारा, अग्निहोत्रादिसे अथवा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधिसे-किसी भी निमित्तसे भगवान्की उपासना करनेवालोंके उपभोगके लिये बड़े-बड़े भोगोंसे, विशाल द्वार एव प्राकारवाले भवनोंसे, विमानोंसे अथवा भगवद्विग्रहके अर्चन पूजनादिकी सामग्रियोंसे अर्चनरूपमें, स्नानादि (तीर्थस्नानादि) रूपमें, पितृपूजा आदिके रूपमे, अन्न (भोज्य पदार्थ) एव पीने योग्य रस आदिसे, यह भगवान्को प्रसन्न करनेके लिये है—यो कहकर वे सब उपभोग-सामग्रियोंका सम्पादन करती हैं। “श्रीसीताजीकी वीरशक्ति चतुर्भुजा हैं। उनके हाथोंमें अभय एव वरदानकी मुद्राएँ तथा दो कमठ हैं। किरीट एव आभूषणोंसे वे भूषिता हैं। सम्पूर्ण देवताओंसे घिरी हुई, कल्पवृक्षके मूलमें चार श्वेत हाथियोंद्वारा रत्नजटित कलशोंके अमृत-जलसे अभिषिक्त होती हुई वे आसीन है। ब्रह्मादि समस्त देवता उनकी वन्दना करते हैं। अणिमादि अष्ट ऐश्वर्यंसे वे युक्त हैं और उनके सम्मुख खड़ी होकर कामधेनु उनकी स्तुति करती हैं। वेद और शास्त्र आदि भी मूर्त्तिमान् होकर उनकी स्तुति करते हैं। जया आदि अप्सराएँ एव देवनारियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। सूर्य एव चन्द्र दीपक बनकर वहाँ प्रकाश कर रहे हैं। तुम्बुरु एव देवर्षि नारद आदि उनका गुणगान कर रहे हैं। राका और सिनीवाली नामकी देवियाँ उनपर छत्र लगाये हैं। ह्लादिनी एव माया उनके दोनों ओर चँवर डुला रही हैं। स्वाहा एव स्वधा उनपर पखे झलती हैं। भृगु और पुण्य आदि महात्मा उनकी पूजा कर रहे हैं। दिव्य सिंहासनपर अष्टदलपद्मके ऊपर आसीन वे महादेवी समस्त कारणों एव कार्योंको निर्मित करनेवाली हैं। इस प्रकार भगवती लक्ष्मीके भगवान्से पृथक् निवासका ध्यान करना चाहिये। उन्होंने अपनेको अनुरूप दिव्य आभूषणोंसे अलकृत किया है। वे स्थिर होकर प्रसन्न नेत्रोंसे समस्त देवताओंद्वारा पूजित वीरमक्ष्मी कही जाती हैं।” ॥ अथर्ववेदीय सीतोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीराधि । पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रुतियोंद्वारा श्रीराधिकाजीकी उपासना और स्तुति किसी समय उपासनाओंके स्वरूप एव लक्ष्यका विचार ( तात्पर्य यह कि विशुद्ध हृदयसे ही श्रीराधिकाजीकी उपासना करते समय ब्रह्मवेत्ताओं (-वेदज्ञों ) ने परस्पर यह विचार सम्भव है, अतः यजनसे आत्मशुद्धि करके तब प्रणाम करती करना प्रारम्भ किया कि श्रीराधिकाजीकी उपासना किस हैं) ॥ ३ ॥ लिये होती है । इस विचारमें प्रवृत्त होनेपर उनपर भगवान् 'जिनके दिव्य शरीरकी कान्तिके पड़नेसे ( जिन योगमाया- आदित्य ( वेदोंके अधिष्ठाता प्रकाशमय ज्ञानके रूपमें ) रूपके आश्रयसे) इन्द्रनीलमणिके समान वर्णवाला (इन्द्रियातीत अत्यन्त कृपालु हुए । अर्थात् प्रकाशस्वरूप वैदिक ज्ञान उनमें नीलिमाव्यञ्जक ) देवाधिदेव श्रीकृष्णचन्द्रका शरीर भी गौर प्रकट हुआ । (उन्होंने श्रीराधिकाजीकी उपासनाके सम्बन्धमें जान पड़ने लगता है ( घनसत्त्व होकर आविर्भूत होता है ) श्रुतियोंको इस प्रकार सलग्न पाया—) ॥ १ ॥ तथा जिनकी कान्ति पड़नेसे भौंरे, कौए और कोयल ( विषय- श्रुतियाँ कहती हैं—'सम्पूर्ण देवताओंमें जो देवत्व रस-लोलुप, कटुभाषी पापी एव मधुरभाषी, पर स्वरूपसे कृष्ण ( शक्ति ) है, वह श्रीराधिकाजीकी ही है । समस्त प्राणी अर्थात् योग-ज्ञानादि साधक, जिनका बाह्यरूप नीरस एव श्रीराधिकाजीके द्वारा ही अवस्थित हैं । अर्थात् देवतासे अनाकर्षक है ) भी ( रासमण्डलमें ) गौरवर्णके ( सत्त्वगुणी लेकर क्षुद्र प्राणियोंतक सभी जीव श्रीराधिकाजीकी शक्तिसे एव भक्तियुक्त ) हो जाते हैं, उन विश्वकी पालिका श्रीराधिका- स्थित एव चेष्टायुक्त हैं और उन्हींसे अभिव्यक्त हुए हैं। इसलिये जीको हम नमस्कार करती हैं ॥ ४ ॥ हम सब श्रुतियाँ उन श्रीराधिकाजीको नमस्कार करती हैं ॥२॥ 'हम सब श्रुतियाँ, सांख्य-योग शास्त्र तथा उपनिषद् जिन 'देवताओंके निवास पञ्चभूत, इन्द्रियों आदिमें श्रीराधिका- परब्रह्मकी अभिन्न शक्तिकी अगम्यताका प्रतिपादन करती हैं, जीकी प्रेरणासे ही कम्पन ( चेष्टा ) होती है । तथा उन्हींकी जिनको स्वरूपतः भली प्रकार पुराण भी नहीं जानते, उन प्रेरणासे वे हँसते ( उल्लास प्राप्त करते ) और नाचते ( क्रिया- देवताओंकी पालिका श्रीराधिकाजीको हम नमस्कार करती हैं॥५॥ शील होते ) हैं । सबकी अधिदेवता श्रीराधिकाजी ही हैं सम्पूर्ण संसारके अधीश्वर त्रिभुवनमोहन श्रीकृष्णचन्द्र ( सब उनके वशमें हैं ) । अतएव अपने सम्पूर्ण पापोंके जिन्हें प्राणसे भी अधिक प्रिय मानते हैं, वृन्दावनमें नाशके लिये व्याहृतियों ( भूः-भुवः-स्वः या श्रीं-क्लीं-ह्रीं )- स्थित अपनी ( श्रुतियोंकी ) इष्ट—आराध्य-देवी उन श्रीवृन्दा द्वारा हवन करके फिर श्रीराधिकाजीको हम प्रणाम करती हैं ।