कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
कंब रामायण
बालकांड
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मंगलाचरण
काव्य-पीठिका
हम उस भगवान् की ही शरण में हैं, जो समस्त लोको का सर्जन, उनकी रक्षा और उनका विनाश—ये तीनो क्रीडाएँ निरंतर करता रहता है ।
बड़े-बड़े आत्मज्ञानी भी उस परमात्मा के पूर्ण स्वरूप को नही जान सकते, उस परमात्मा (के तत्त्व) को समझाना मेरे जैसे (मंदबुद्धि) व्यक्ति के लिए असंभव है; फिर भी शास्त्रो में प्रतिपादित त्रिगुणो (सत्त्व, रज और तम) मे—जिनका प्रतिरूप बनकर वह परमात्मा त्रिमूर्त्ति के रूप में प्रकट हुआ, उनमें से प्रथम गुण के स्वरूप (विष्णु) भगवान् के कल्याणकारक गुणों के सागर में गोते लगाना तो उत्तम ही है।
जिन ज्ञानियों ने आरंभ तथा समाप्ति में 'हरि: ॐ' कहकर नित्य और अनन्त वेदो को अधिगत (प्राप्त) कर लिया है और जो अपने परिपक्व ज्ञान के कारण संसार-त्यागी बन चुके है, वे महानुभाव उस (विष्णु) भगवान् के उन चरणो को, जो सन्मार्ग पर चलनेवाले भक्तों के उद्धारक हैं, छोड़कर अन्य किसी से प्रेम नहीं करते।
अकलंक विजयश्री से विभूषित (श्रीरामचन्द्र) के गुणो का वर्णन करने की अभिलाषा मैं कर रहा हूँ; यह ऐसा ही है, जैसा कि कोई बिल्ली, घोर गर्जन करनेवाले ऊँची तरंगों से भरे क्षीरसागर के निकट पहुँचकर उसके समस्त क्षीर को पी जाने की अभिलाषा करे।
अभिशाप¹ की वाणी से (उस दिन) सप्त तालवृक्षो को एक साथ भेदन कर देनेवाले (श्रीराम) की महान् गाथा आविर्भूत हो गई थी; उस गाथा को मधुर काव्य के रूप में कहनेवाले (वाल्मीकि) की वाणी जिस देश में सुस्थिर हो चुकी है, वही मैं भी अपने (अर्थगांभीर्य-हीन) सरल तथा दुर्बल शब्दों में दूसरा काव्य रचना चाहता हूँ—यह भी कैसा (बुद्धिहीन) प्रयास है।
१. क्रौंच को मारनेवाले व्याध के प्रति वाल्मीकि के मुँह से जो अभिशाप-वचन निकल पडा था, वही रामायण का प्रथम मंगलाचरण भी हुआ।
२ कंब रामायण
(मेरी इस मूर्खता पर) संसार मेरा उपहास करेगा और इससे मेरा अपयश होगा, फिर भी मैं रामचरित का गान करने लगा हूँ; इसका प्रयोजन यही है कि सत्यज्ञान तथा अलौकिक प्रतिभा से संपन्न (वाल्मीकि महर्षि) के दिव्य काव्य का महत्त्व और भी अधिक प्रकट हो।
जिन (सहृदय व्यक्तियों) के कान विविध प्रकार की रसमय कविता सुनने के आदी हो चुके हैं, उन्हें मेरी कविता उसी प्रकार (कर्कश) लगेगी, जिस प्रकार 'याल्'¹ (वीणा) के मधुर स्वर को सुनते हुए मुग्ध हो खड़े रहनेवाले अशुण² के कानों में 'पटह' (चमड़े के ढोल) की ध्वनि लगे।
(काव्य, नाटक और संगीत-रूपी) त्रिविध तमिल-वाङ्मय का जिन्होंने भली भाँति अध्ययन किया है, उन उत्तम विद्वानों और कवियों से मैं निवेदन करना चाहता हूँ—"क्या उन्मत्तों के वचन, मंद बुद्धिवालों के वचन तथा भक्तजनों के वचन, इनकी परीक्षा करना उचित हो सकता है?"
बालक (खेलते समय) धरती पर घरौंदे बनाते हैं, जिन में कोठरियाँ, आँगन, नृत्यशाला आदि स्थानों को कुछ टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से दिखाने की चेष्टा करते हैं (उन्हें देखकर) क्या कुशल कारीगर (उन घरौंदों के शिल्प-शास्त्र के अनुकूल न होने से) क्षुब्ध होंगे? किंचित् भी काव्य-ज्ञान से रहित मैं, जो यह क्षुद्र काव्य रचने लगा हूँ, इस पर क्या मर्मज्ञ विद्वान् क्रुद्ध होंगे?
देववाणी (संस्कृत) में जिन तीन महापुरुषों³ ने रामायण की रचना की है, उनमें प्रथम कवि वाग्मी (वाल्मीकि) महर्षि की रचना के अनुसार ही मैंने तमिल-पद्यों में यह रामायण रची है।
धर्म-रक्षा के लिए, परम पुरुष ने जो अवतार लिये थे, उनमें से रामावतार का वर्णन करनेवाला यह प्रसिद्ध काव्य 'शडैयप्प वल्लल'⁴ के ग्राम 'तिरुवेण्णेय नल्लूर' में निर्मित हुआ। (१-११)
१ 'याल्' एक प्रकार की वीणा। प्राचीन तमिल-साहित्य में याल् का प्रायः उल्लेख हुआ है। यह माना जाता था कि याल् का स्वर सुनकर हिरन मन्त्रमुग्ध-सा हो जाता था और उसके बाद पटह की कर्कश ध्वनि का वह सहन नहीं कर सकता था और कभी-कभी वैसी ध्वनि सुनने पर अपने प्राण भी छोड़ देता था।
२ हिरन की एक जाति।
३ संस्कृत के तीन रामायणकर्त्ता हैं—वाल्मीकि, वसिष्ठ और बोधायन। कुछ विद्वान वसिष्ठ के स्थान पर व्यास का नाम लेते हैं, जिन्होंने 'अध्यात्मरामायण' की रचना की थी। कंब ने भी कई स्थानों में अध्यात्मरामायण का अनुसरण किया है।
४ शडैयप्प वल्लल एक धनी और उदार व्यक्ति थे। उन्होंने महाकवि कंबर को आश्रय दिया था। यद्यपि बाद को महाकवि कंबर चोलराजा के आश्रय में भी रहे थे, तथापि अपने प्रथम आश्रयदाता का हृदयंगम कृतज्ञता के साथ उन्होंने इस ग्रन्थ के आरंभ में कई स्थानों में किया है।
अध्याय १
नदी पटल
[ कोशल देश का वर्णन करने के लिए प्रस्तुत होकर कवि पहले उस देश को हरा-भरा करनेवाली सरयू नदी का वर्णन कर रहा है । ]
कोशल देश में, जहाँ बड़े ही अपराधकर्मी (पुरुषों की ) पंचेन्द्रिय-रूपी बाण एवं रत्नहारों से विभूषित युवतियों के कटाक्ष-रूपी बाण—ये दोनों सन्मार्ग की सीमा को लाँघ-कर कभी नहीं चलते, उस समस्त भूप्रदेश को सुशोभित करती हुई सरयू नदी बहती है।
भस्मधारी (शिव) के रंगवाले मेघ ने, गगनमार्ग से चलकर, समुद्र के जल का पान किया और (जल पीकर ) वक्ष पर लक्ष्मी को धारण करनेवाले विलक्षण कांतिपूर्ण विष्णु का रंग पाकर लौटा।
मेघ उमड़कर उठा और हिमाचल के ऊपर छा गया; मानो सागर ही, यह सोचकर कि शिवजी का ससुर यह (हिमाचल) पर्वत सूर्यातप से संतप्त हो रहा है और उस ताप से उसकी रक्षा करनी चाहिए, हिमाचल पर फैल गया हो।
मेघ ने जलधाराएँ क्या बरसाई, एक महान् दाता के सदृश अपनी समस्त संपत्ति को ही लुटा दिया। (वह दृश्य ऐसा था कि) आकाश ने जब देखा कि यह भारी हिमाचल¹ (पर्वत) स्वर्णमय है, तो उस सोने को खोदकर निकालने के उद्देश्य से अपने चाँदी के बने हथौड़े उस पर मार रहा हो।
वर्षा के जल की धारा बड़े वेग से धरती पर प्रवाहित हो चली और उसने सर्वत्र शीतलता उत्पन्न कर दी, मानो मनु के उपदिष्ट धर्म-मार्ग पर चलनेवाले किसी प्रजावत्सल और गौरव-संपन्न राजा की कीर्त्ति ही सर्वत्र फैल रही हो, अथवा चतुर्वेदों को पूरा अधिगत किये हुए ब्राह्मण के हाथ में प्रदत्त दान (का यश) हो।
हिमाचल के ऊपर से वर्षा की धारा प्रबल वेग के साथ नीचे बह चली और किसी रूपाजीवा (वेश्या) नारी के समान वह (पर्वत की) शिखा, हृदय तथा पाद से संलग्न होती हुई उसकी सीमा से बाहर चली गई : क्षण-भर के लिए वह पर्वत से लगी रही; परन्तु दूसरे ही क्षण वहाँ की सभी वस्तुओं को अपने साथ बहाकर आगे बढ़ गई।
वर्षा का प्रवाह हिमाचल के रत्न, मोर-पंख, हाथियों के दाँत, स्वर्ण, चन्दन आदि अमूल्य पदार्थों को समेटकर ले चला, जिससे वह वाणिज्य करनेवाले व्यक्ति की समानता करने लगा।
वह प्रवाह कभी रंग-बिरंगे पुष्पों से भर जाता : कभी मृदु मकरंद उस पर छा जाते; कभी मधु धारा, कभी हाथियों का मदजल और कभी लोहित धातु उसमें मिले
१. प्राचीन तमिल-साहित्य में हिमाचल और मेरु पर्वत दोनों को कभी-कभी एक ही माना गया है. अतः यहाँ हिमाचल को (मेरु के जैसे) सोने का पहाड़ कहा गया है।
४ | कम्ब रामायण
दिखाई पडत । यो अपने इन विविध रंगों के कारण यह (प्रवाह) गगन पर चमकनेवाले इन्द्र-धनुष की-सी शोभा दिखाने लगा।
वह प्रवाह कभी बड़े-बड़े प्रस्तर-खंडो को लुढकाता हुआ, कभी गगनचुम्बी वृक्षो को उखाड़ता हुआ और कभी अपने समीप-स्थित पत्र-शाखा जैसी सभी वस्तुओ को उठाये हुए चल रहा था, वह प्रवाह भी क्या था ? जब श्रीरामचन्द्र समुद्र पार करके लंका मे पहुँचना चाहते थे, तब (वह प्रवाह) हिल्लोलों से भरे हुए समुद्र में सेतु बाँधने का आयोजन करनेवाली वानर-सेना ही जान पड़ता था। (अर्थात्, पत्थरो तथा वृक्षो से भरा हुआ वह प्रवाह समुद्र पर पुल बाँधनेवाली वानर-सेना के सदृश दीखता था।)
उसके मीठे जल पर भँवरो और मक्खियो का झुण्ड मँडराता हुआ दिखाई पड़ता था, वह प्रवाह किनारो को लाँघकर उद्दाम उमंग के साथ बह चला; उसका अन्तर भाग स्वच्छ नहीं था ओर (वह) सागुवान¹ के बड़े-बड़े वृक्षों को गिराता हुआ दौड़ा जा रहा था, जैसे कोई मद्यप डकार लेते हुए भागा जा रहा हो।
उस प्रवाह मे बड़े-बड़े मृग थे, भारी मुखवाले मत्त गज थे; वह भयकर कोलाहल करता हुआ अपने आगे-आगे ध्वजाओ के समान बहुत-सी लताओं² को बहाता चला जा रहा था, (इन सबसे वह प्रवाह) ऐसा लगता था, मानो समुद्र पर चढ़ाई करने के लिए कोई बड़ी सेना को साथ लिये जा रहा हो।
[वर्षा-प्रवाह का वर्णन करने के पश्चात् अब कवि सरयू नदी का विशेष वर्णन करता है।]
क्षुब्ध जलधि से परिवृत इस धरती पर जीवन धारण करनेवाले जो प्राणी हैं, उनके लिए सरयूनदी मातृस्तन्य-सदृश है। सूर्यवंश के नरेश जिस महान् सद्धर्म का पालन अनादि काल से करते आ रहे थे, उसी धर्म का पालन वह नदी भी कर रही है।
सरयू की धारा, कोशल देश की रमणियों के बनाये सुगन्धपूर्ण, कुंकुम, केसर, कोष्ठ (एक सुगंधित द्रव्य), इलायची, शीतल चंदन, सिन्दूर, नागरमोथा, गुग्गुल, मोम आदि पदार्थो के मिलने से बहुत ही सुगंधित रहती है। (जब स्त्रियाँ नदी में स्नान करती थीं, तब ये वस्तुएँ उसके प्रवाह मे मिल जाती थी और नदी का जल सुगन्धित हो जाता था।)
सरयू की बाढ़, अपने जल-रूपी बाणो के कारण, आसपास रहनेवाले व्याध लोगो के छोटे-बड़े गाँवो मे बड़ी हलचल मचा देती है। वह व्याध-नारियों को अपनी छाती पीटकर रोते-कलपते हुए भागने पर बाध्य कर देती है। ऐसे समय में वह नदी शत्रुओं के लिए भयकर (किसी) वीर नरेश की सेना का दृश्य उपस्थित करती है।
¹ मद्यप और जल-प्रवाह दोनो के समान विशेषण दिये गये हैं। सागुवान पेड को तमिल मे 'तेवकु' कहते है। इस शब्द को क्रिया के रूप मे रखने पर दूसरा अर्थ निकलता है। 'डकार लेते हुए', मद्यप के पक्ष मे, यह अर्थ संगत होता है।
² तमिल मे 'कोडि' शब्द का अर्थ होता ह 'लता'। शब्दश्लेष से उसका दूसरा अर्थ 'ध्वजा' भी होता है। मूल मे इस शब्द का प्रयोग करके कवि ने बड़ा चमत्कार दिखाया है।
बालकाण्ड ५
वह नदी, किनारे के छोटे-छोटे गाँवों में से, जमा हुआ गाढ़ा और सुगंधित दही, दूध, मक्खन और घी को छींकों के साथ ही उठा ले जाती है (वहा ले जाती है), कदंब-वृक्षों को गिरा देती है; हिरनी के समान भीरू नयनवाली ग्वालिनों के दुकूल बहा ले जाती है। प्रबल वेग से बहती हुई वह नदी, कालिय नाग पर, जो अपने फनों और धारियों से भयंकर लगता है—नाचनेवाले कृष्ण की समानता करती है।
सरयू का वह प्रबल प्रवाह अपने मार्ग में (बाँधों) के किवाड़ों को ढकेलकर आगे बढ़ जाता है; कृषक उसे देखते ही आनन्दित हो जाते हैं और हाथ उठा-उठाकर आनन्द-रव करने लगते हैं, नदी का पूरा भरा हुआ अग्रभाग किनारों से उमड़ता हुआ आगे बढ़ जाता है, उसके ऊपर भौंरे झुण्ड-के-झुण्ड मँडराते जाते हैं; वह यत्र-तत्र मोतियों और रत्नों को बिखेर देता है, बाढ़ को रोकने के लिए जहाँ-तहाँ गड़े हुए खूंटों को वीचि-रूपी अपने विशाल हाथों से उखाड़ता हुआ, लहलहाते हुए खेतों से भरे 'मरुदम्' १ (कहलाने-वाले) प्रदेश में ऐसे आ पहुँचता, जैसे कोई मत्तगज मदजल बहाता हुआ आया हो।
हिमाचल के ऊपर से आया हुआ वह प्रवाह, पर्वत (कुरिंजि) के पदार्थों को पर्वत की तलहटी पर के अरण्य (मुल्लै) प्रदेश में बहा ले जाता है और अरण्य के पदार्थों को खेतों और बगीचों से भरे हुए (मरुदम्) प्रदेश में लाकर फैला देता है तथा समुद्री तट (नेयदल) प्रदेश को अपनी उपजाऊ मिट्टी के द्वारा लहलहाते खेतों में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार, वह पर्वत अरण्य, खेतों आदि की वस्तुओं को अपने-अपने स्थानों से हटा-हटाकर दूसरे स्थानों पर रख देता है। देव, मनुष्य, पशु-पक्षी तथा स्थावर—इन चार प्रकार की योनियों में भ्रमण करते रहनेवाले प्राणियों के साथ जिस प्रकार उनके संचित कर्म (पाप और पुण्य) लगे चलते हैं और उन्हें भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न होने के लिए बाध्य करते हैं, उसी प्रकार यह नदी भी विभिन्न भू-प्रदेशों के पदार्थों को स्थानान्तरित करती हुई आगे बढ़ती है।
नदी की बाढ़ को बढ़ते हुए देखकर कृषकजन आनन्दित हो उठते हैं और 'पटह' २ बजाकर उसकी सूचना देते हैं। वह नदी अपनी वीचियों से जल-बिंदुओं तथा स्वर्ण और मोतियों को बिखेरती हुई, धरती को चीरती हुई, नालों की शाखा-प्रशाखाओं में बँटकर बहती हुई इस प्रकार दौड़ चलती है, जिस प्रकार किसी पुण्यवान् मनुष्य की वंशावली विभक्त होकर विकसित हो रही हो।
सरयू का प्रवाह हिमाचल पर उत्पन्न हुआ; वहाँ से चलकर वह समुद्र में जा मिला। वह आरंभ में एक ही रहा, परन्तु धीरे-धीरे असंख्य नालों, नहरों, तालाबों और
१. तमिल-लाक्षणकार भूमि को पाँच प्रकारों में विभाजित करते हैं— (१) कुरिंजि—पार्वतीय प्रदेश, (२) मुल्लै—अरण्य-प्रदेश, (३) मरुदम्—नदियों के जल से सिंचित समतल प्रदेश, (४) नेयदल—समुद्री तट और (५) पालै--वालूमय प्रदेश या मरूभूमि ।
२. प्राचीन तमिल देश में नहरों और नालों की रखवाली करने के लिए 'मल्ल' नामक लोग नियुक्त थे; नदी में जब पानी आता था, तब वे पटह-वाद्यों को बजाकर लोगों को सूचना देते थे, जिससे तट पर के गाँवों के लोग सूचना पाकर सावधान हो जाते थे।
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रूपों में बँट गया ; अनन्त वेदों के द्वारा प्रतिपाद्यमान जो अप्रमेय परब्रह्म है, वह एक और अद्वितीय होकर भी विभिन्न मतवादियों के सिद्धान्तों के द्वारा बहुधा प्रतिपादित है और तद्विषयक ज्ञान अनेक मतों में विभक्त हो गया है। उसी प्रकार सरयू नदी भी अनेक धाराओं में विभक्त हो गई है।
सरयू का प्रवाह मकरन्द उगलनेवाले उपवनों में, घने बग़ीचों में, कमल-भरी वापियों में, सुगन्धिमय तड़ागों में, मछली-सदा-कूँदों से भरे प्रचुर (पुष्कल) वनों में, एवं लहलहाते खेतों में, सर्वत्र होता बह चला, जैसे प्राणियों के नाना प्रकार के शरीरों में प्राण बहा करता है। (१-२०)
अध्याय २
कोशलदेश पटल
महर्षि वाल्मीकि ने अतिपरिष्कृत और सुन्दर श्लोकों में रामायण की रचना की है, जो देवताओं के लिए भी कर्णामृत के समान है। उस काव्य में वर्णित कोशल देश की महिमा, प्रेम से विवश होकर मैं गा रहा हूँ; किन्तु यह कार्य मेरे लिए वैसा ही दुष्कर है, जैसा गूँगे व्यक्ति के लिए बोलने का प्रयास करना।
वह कोशल देश बड़ा ही वैभवपूर्ण है; वहाँ के खेतों की मेड़ों पर मोती और शंखों के ढेर के झुंड बिखरे रहते हैं; तीव्र जल-धाराओं के किनारों पर सोने के ढेले पड़े रहते हैं; उन गर्तों में जहाँ भैंसें गोता लगाये पड़ी रहती हैं, कमलों के रक्त-पुष्प बड़े ही सुन्दर दृश्य उपस्थित करते हैं; जोतने के उपरान्त जब खेत समतल बना दिये जाते हैं, तब वहाँ मणियाँ चमकने लगती हैं; इतना ही नहीं, शालि-धान के खेतों में जहाँ निरन्तर जल का निकास होता रहता है, हंस आकर विश्राम करने लगते हैं; गन्ने के खेतों में रसभरा लाल-लाल मीठा मधु बहता रहता है और पुष्प-वाटिकाओं में झुण्ड-के-झुण्ड भौरें मँडराते रहते हैं।
वहाँ जीवन का कोलाहल खूब सुनाई पड़ता है: एक ओर गन्ने पेरने से ईख का रस, झरने के जल के समान, शब्द करता हुआ प्रवाहित होता है, तो दूसरी ओर नदियों के तट पर रहनेवाले शंख-कीटों के बोलने की ध्वनि सुनाई पड़ती है: एक ओर बड़े-बड़े बैल आपस में टकराकर बड़ा क्षोभ उत्पन्न करते हैं, तो दूसरी ओर तालाबों में महाकाय भैंसों के उतरने से उत्ताल-तरंग का शब्द होता है। इस प्रकार, नाना प्रकार की ध्वनियों का एक विचित्र कोलाहल उस 'मरुदम्' प्रदेश में सदा होता रहता है।
लहलहाते खेतों और सुन्दर वृक्षों का वह प्रदेश भी वैसा गंभीर है, मानो कोई राजा दरबार में सिंहासन पर आसीन हों और उसके सामने भाँट नाच रहे हों; कमल-कलिकाएँ दीप लिये खड़ी हों; मेघ मर्दल बजाते हों, भ्रमर गुंजार करके मधुर वीणा का नाद सुनाते हों, नदी के जल पर उठ-उठकर थिरकनेवाली चंचल लहरें यवनिका का दृश्य उपस्थित
बालकाण्ड ७
करती हो और कुवलय-पुष्पों का समुदाय अपने विशाल नयनों (पंखुड़ियों) को खोलकर इस सुमधुर दृश्य को मंत्र-मुग्ध होकर देखता खड़ा है।
वहाँ के विकसित कमल-पुष्पों पर भ्रमर तथा लक्ष्मी देवी विश्राम करती हैं, पुष्पमालाओं से अलंकृत रसिक-जनों पर रमणियों के कटाक्ष तथा कामदेव के बाण आह्वान करते हैं; बड़ी-बड़ी मेघराशियों से गिरनेवाली जलधाराएँ प्रवाल तथा मोतियों की संपदा उत्पन्न करती हैं; वहाँ के निगमियों की जिह्वा पर सदा सत्यवचन तथा शास्त्र-चर्चा निवास करती है।
शंख-कीट तालाबों में (निर्भय होकर) विश्राम करते हैं, (क्योंकि) भैंसे (उन्हें कष्ट न देकर) वृक्षों की शीतल छाया में विश्राम कर रही हैं; भ्रमर (नगर-निवासिनियों की पुष्पमालाओं पर) विश्राम करते हैं (क्योंकि) लक्ष्मी देवी कमल-पुष्प पर विश्राम कर रही हैं; सीपियाँ (खेत की) मेड़ों पर विश्राम करती हैं; (क्योंकि) कछुए कीचड़ में विश्राम कर रहे हैं; हंस धान के अग्रभागों पर विश्राम करते हैं; (क्योंकि) मोर (उन्हें कष्ट न देकर) उपवनों में विश्राम कर रहे हैं।
(उस देश के वैभव की कितनी प्रशंसा करूँ?) वहाँ खेतों में हल जोतने पर सोना निकल पड़ता है, उसको समतल बनाने पर रत्न बिखर जाते हैं; शंख मोती उगलते हैं; धान की सुनहली बालियाँ हैं; मछलियाँ हैं और कोमल पत्तेवाले गन्ने हैं; भ्रमरों, कमल-पुष्पों एवं कृषकों के हर्षोत्फुल्ल मुखों से परिपूर्ण वह देश कितना नयनाभिराम है?
प्रभात के समय मधुर स्वरवाले 'याल्'-वाद्य (एक प्रकार की वीणा) को हाथ में लेकर, मृदंग की ध्वनि के साथ जब मधु-पान से मस्त गवैये गाने लगते हैं, तब उस संगीत-लहरी को सुनकर रजत-प्रासादों में, सुनहली धूप की छटा बिखेरनेवाले स्वर्ण-पर्यंकों पर निद्रामग्न मयूर-पंख के जैसे नयनवाली तरुणियाँ, जाग उठती हैं।
वहाँ एक ओर कोल्हुओं से गन्ने का रस निर्झर के रूप में बहता है, तो दूसरी ओर नारियल के कटे हुए घौंदों से मीठा रस प्रवाहित होता है। कहीं उपवनों में पके हुए फलों का मीठा रस चू रहा है, तो कहीं पुष्पों से मकरन्द झरकर नीचे गिर रहा है। ये सभी रस मिलकर, लहराती हुई धारा बनकर, जब समुद्र में जा गिरते हैं, तब समुद्र के मीन उन रसों को पीकर मस्त हो जाते हैं।
मधु पीकर मस्त हुए कृषक लोग खेत निराने जाते हैं; वहाँ वे खेतों में पौधों के साथ उगे हुए कमल, कुमुद आदि पुष्पों में, मधुर स्वरवाली कृषक-बालाओं के नयन, कर, चरण आदि अंगों की छटा देखते हुए निराना भूल जाते हैं और यों ही इधर-उधर फिरते रहते हैं। नीच जन जब स्त्रियों पर आसक्त हो जाते हैं, तब उस आसक्ति को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ते।
वहाँ की रमणियों के सौन्दर्य का क्या कहना? उनके मधुर स्वर, मनोहर कटाक्ष, जो कटार के जैसे पैने हैं, पुरुषों के मन को हर लेते हैं; उनकी विद्युत् की-सी छटा अवर्णनीय है, उनके केश पुष्प, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों से सुवासित हैं; जब वे नदियों में स्नान करती हैं तो नदी का जल उनके केशों की सुगंधि से सुवासित हो जाता है;
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तना ही नहीं, जब वह जल समुद्र में जाकर गिरता है, तब सारे समुद्र की दुर्गन्ध को अपनी उस सुगंधि से मिटा देता है।
यहाँ पुरुष अतिरूपवान् हैं, उनके कानों और अन्य अंगों में कुण्डल आदि आभूषण शोभा देते हैं, उनके शरीर चन्दन, कर्पूर आदि से लिप्त रहते हैं; जब वे नदियों में स्नान करते हैं, तब नदियाँ उन सुगंधित द्रव्यों से भर जाती हैं और जिन खेतों को वे सींचती हैं, उनकी मिट्टी भी सुवासित होकर कर्पूर आदि की गंध बिखेरती है, जिस कारण से भौंरों के झुण्ड सदा उस मिट्टी पर ही मँडराते रहते हैं।
मीन के समान नेत्रवाली कृषक-बालाओं के पीछे-पीछे राजहंसिनियाँ, उनकी चाल का अनुकरण करती हुईं, भटक जाती हैं, तो कमल की सेज पर सोये हुए अपने बच्चों को भी भूल जाती हैं; हंस-शिशु निद्रा से उठकर भूख से चिल्ला उठते हैं, उन्हें देखकर भैंसों को अपने बछड़ों की याद आ जाती है और उनके स्तनों से दूध स्रवित होने लगता है, उस दूध को पीकर हंस-शिशु तृप्त हो जाते हैं, फिर हरे-हरे मेंढक लोरियाँ गाकर उन्हें सुला देते हैं।
वहाँ के उद्यानों में कहीं कोयल का जोड़ा, एक दूसरे को प्यार करता हुआ बैठा है; कहीं सुन्दर मयूर नाच रहे हैं; उन उद्यानों की शोभा, विशालनयन नर्तकियों की नृत्यशालाओं के लिए भी शृंगार है; प्रातःकाल के समय, मधुपान से मत्त भ्रमर भी संध्या-गीत गा उठते हैं (प्रभात-गीत गाने की सुध उन्हें नहीं रहती) : पद्म-पर्यंको में सोये हुए राजहंस उस ध्वनि को सुनकर अचानक जाग उठते हैं।
कोशल देश के निवासी मनोविनोदों में अपना समय व्यतीत करते हैं। कहीं सभी गुणों से सम्पन्न अपने-अपने योग्य सुन्दरियों के साथ युवक विवाह-संबंध करते हैं; कहीं लोग चील के साथ उड़नेवाली परछाईं के जैसे संगीत का रसास्वादन करते हुए मस्त होते हैं (अर्थात, संगीत साहित्य का उसी प्रकार अनुसरण करता है, जिस प्रकार छाया उड़नेवाले पक्षी का अनुसरण करती है), कहीं रसिकजन अमृत से भी श्रेष्ठ काव्य-माधुर्य का पान करने में संलग्न हैं; कहीं अतिथि-सत्कार हो रहे हैं, जहाँ गृहस्थजन अतिथियों की मुखाकृति को देखकर ही उनके मनोभाव समझ लेते हैं और उन्हें उचित उपचार से संतुष्ट कर आनन्द प्राप्त करते हैं।
कहीं लोग एकत्र होकर मुर्गों का युद्ध देखते हैं, पूर्व-वैर न होने पर भी, ये कुक्कुट एक दूसरे पर बड़ा क्रोध दिखाते हैं, उनके मन में रोष भरा है, सिर पर की कलँगी उनकी लाल-लाल आँखों से भी अधिक रक्तिम होकर चमकती है, टाँगों में बँधी छोटी-छोटी पेनी छुरियों से वे एक दूसरे पर चोट करते हुए अमन्द उत्साह से घनघोर युद्ध करते हैं, वे कुक्कुट यदि अपने वीरता-पूर्ण जीवन में कोई कमी रखते हैं, तो यही कि वे जीवन की सार्थकता को नहीं पहचानते।
कहीं लोग भैंसों को लड़ाकर उसका तमाशा देखते हैं, लाल आँखवाले वे भैंसे बड़े रोष के साथ एक दूसरे पर आघात करते हैं और एक दूसरे को ढकेलने की चेष्टा करते हैं; ऐसा प्रतीत होता है, मानो विश्व के नाना पदार्थों को एक रूप बना देनेवाला घोर
बालकाण्ड ९
अंधकार अत्र दो पक्षों में विभक्त होकर इन भैसों के भयंकर रूप में आ गया हो और लड़ रहा हो; उस युद्ध को देखनेवाले दर्शक जब प्रसन्नता से अट्टहास कर उठते हैं और सिर हिलाने लगते हैं, तब उनके सिर के फूलों पर बैठे हुए भ्रमर गूँजते हुए उड़ जाते हैं वहाँ जो कोलाहल होता है, उसका शब्द मेघ-मंडल तक गूँज उठता है।
किसान खेतों को हल से जोतते हैं, वे बड़े-बड़े बलवान् बैलों को जोर-जोर से हाँक लगाते हुए ललकारते हैं; उनकी ललकारों की गंभीर ध्वनि से कमल के नाल टूट-टूटकर गिर जाते हैं; मोती और सोना धरती से फूट निकलते हैं; मणियाँ बिखर जाती हैं : ‘चलंचल’ नामक सीप मुँह खोलकर रो उठते हैं; हल की धारियों में तैरती हुई मछलियाँ छटपटाती हुई उछल पड़ती हैं; कछुए अपने पैरों और सिर को अपने पेट में समेटकर निःस्तब्ध हो पड़ जाते हैं और मीन खेतों से भागकर नालों के गहरे जल में छिप जाते हैं।
बड़ी-बड़ी नौकाएँ, जो अमूल्य वस्तुओं को लेकर विदेशों में गई थीं और वहाँ अपने बोझ उतारकर वापस लौट आई हैं, समुद्र-तट पर पड़ी हैं, मानो भारी बोझ ढोने से दुखती हुई अपनी लंबी पीठ को आराम दे रही हों। ये नौकाएँ भी उस पृथ्वी के ही समान दीखती हैं, जो मनु-नीति का अनुसरण करनेवाले, उचित स्थान पर क्रोध दिखानेवाले, दंड का भी उचित प्रयोग करनेवाले, इच्छारहित, धर्मज्ञ और प्रजावत्सल राजा के द्वारा सुरक्षित होने के कारण पाप-भार से मुक्त हो गई हो।
धान की कटी बालियों का ढेर आसमान को छूता हुआ पड़ा हैं : कृषक लोग, (हाँकनेवाले के) संकेतों को समझकर चलनेवाले बैलों के द्वारा उन बालियों की दौनी करके धान निकाल लेते हैं; दरिद्रों को दान देने के बाद बचा हुआ धान गाड़ियों में लादकर अपने घर ले जाते हैं, जिससे अतिथियों तथा कुटुम्ब के संग वे भरपेट भोजन कर सकें। गाड़ियाँ जब धान लादकर चलती हैं, तब भार के मारे पहिये धँस जाते हैं, मानों धरती भी उस बोझ के आगे अपनी पीठ मरोड़ रही हो।
उस देश में सभी आवश्यक पदार्थ उपजते हैं; धान के खेतों में धान, महँकते बागों में पके फल, बाँगर भूमि में चना आदि अनाज, लताओं में फल, कंद-मूल—जो मिट्टी के भीतर से खोदकर निकाले जाते हैं—आदि वहाँ पर होते हैं, जिन्हें कृषक उसी प्रकार बटोर लेते हैं, जिस प्रकार भ्रमर पुष्पों से मधु को एकत्र कर लेते हैं।
उस देश के सभी प्रान्तों में अन्न का सदाव्रत बड़ी धूम से चलता है; ब्राह्मणों को भोजन देने के उपरान्त गृहस्थजन अपने अतिथियों तथा बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करते हैं. भोजन के पदार्थ में तीन श्रेष्ठ फल १ (आम, कटहल और केला), विविध रसमय दाल, उस दाल को डुबो देनेवाला घी, लाल-लाल दही के टुकड़े, खाँड़ इत्यादि होते हैं और इन व्यंजनों से घिरा हुआ भात होता है।
भ्रमर उस प्रदेश में निरन्तर निवास करते हैं, क्योंकि वहाँ की कामिनियों के
१. तमिल देश के तीन प्रधान फल हैं—आम, कटहल और केले। इन्हीं तीन फलों का वर्णन तमिल-साहित्य में प्रायः मिलता है।
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पंकज समान मुख-मंडल पर जो काजल-अंकित रमणीय नयन हैं, उन्हें वे भ्रमरियाँ समझ लेते हैं और उन्ही की संगति की कामना करते हुए सदा वहीं मँडराते रहते हैं ।
कामदेव जिन पुरुषों को विचलित नहीं कर सकता, उन्हें भी वहाँ की युवतियों का दृष्टि-पात अधीर बना देता है, उनके मनोज्ञ स्तन, सामने आनेवाले पुरुषों का सिर इस तरह झुका देते हैं, जैसे मालिक अपने नौकरों पर क्रोध करके उनका सिर नीचे कर देता है । उधर नारियल के घौदों से जो मधु-धारा बहती है, उसे पीकर मोटे मीन मस्त पड़े रहते हैं।
धरती पर चलनेवाले काले बादलों जैसी भैंसें, नदी के ठंडे जल में गोता लगाती हुई अपने बछड़ों को याद करती हैं, तो उनके थनों से दूध स्रवित होने लगता है; जब वह दूध नदी के जल से मिलकर खेतों मेप हुँचता है, तब उसी दुग्ध-धारा से सिंचकर धान का शस्य बढ़ता है ।
वहाँ की अति समृद्ध पाक-शालाओ में बडे-बडे भांडों में चावल पकाया जाता है, चावल धोने का पानी कल-कल शब्द करता हुआ वहाँ से बहकर क्रमुक-वन में होकर लाल धान के खेतो में पहुँचता है और अंकुरो को पुष्ट करता है।
कूडे के ढेरो पर बैठे हुए और सिर पर कलँगी से शोभायमान लाल मुर्गे जब अपने नखों से कूडे को कुरेदते हैं, तब उसमें से चमकती हुई मणियाँ बिखर जाती हैं; चिडियाँ उन्हें जुगनू समझकर अपने घोंसलों में लाकर रखती हैं।
अहीर तरुणियाँ उज्ज्वल और गाढे दही को अपने सुन्दर करो से हिला-हिलाकर मथती हैं, तब मथानी की ध्वनि रह-रहकर जोर से उमड़ पड़ती है; उनके हाथो में पडे शख के नक्काशीदार सफेद कगन बोल उठते हैं, और उनकी पतली कमर आगे बढ़-बढ़कर लचक जाती है ।
फुलबारियो में तोते बोलते हैं; पुष्पो में भ्रमर गाते हैं, जलाशयों में पक्षियो का मधुर कलरव होता है, दानी लोगो के घरों में अतिथियों के भोजन के लिए धान कूटनेवाली औरतें गृहस्थ की प्रशंसा के गीत गाती रहती हैं ।
भोली और काली आँखोंवाली बालिकाएँ नदी से मोतियों को अपने चुल्लू मे भर-भरकर ले आती हैं और घर के आँगन मे उनसे घरौंदे बनाकर खेलती हैं; इस तरह बिखरे हुए मोती गुवाक (सुपारी) के फलो में मिल जाते हैं; और गुवाक साफ करनेवाले लोग उन मोतियों को असार वस्तु समझकर फेंक देते हैं ।
दृढ़ सींगो और कठोर कपालवाले भेड़ों के बलवान् जोड़े जब परस्पर भिड़कर लड़ते हैं, तब उनके टकराने की कर्कश ध्वनि से दूरस्थ पर्वत-शृंगो पर रहनेवाले मेघो में बिजली कौंध जाती है ।
पर्वतों के बीच अरण्यो में जंगली हाथियों को फँसानेवाले धीर शिकारी कठघरे बनाकर उनमे हाथियों के झुण्ड को—बच्चोंवाली हथनियों से उन्हें अलग करके-फँसा लेते हैं; और फिर उन मस्त हाथियों को सुदृढ श्रृंखलाओं में वे वीर बाँधने लगते हैं, तब वहाँ बड़ा विकट कोलाहल होता है; उस कोलाहल को सुनकर गैरिकूट में हंसिनी के साथ क्रीडा करनेवाले मराल (हंस) उड़कर भाग खड़े होते हैं।
बालकाण्ड ११
किसान लोग जब भूमि से कंद-मूल खोदकर निकालते हैं, तब उन कंदो के साथ कई श्रेष्ठ रत्न भी निकल पड़ते हैं; फलो के भार से झुकी हुई आम्रवृक्षो की डालियो से निरन्तर मधु-धारा बहती रहती है; सदा कमल-पुष्पो से प्रेम करनेवाले हंस 'पुन्ने' (नामक) पुष्पो से आकृष्ट होकर उनके पास अटक जाते हैं।
कृषक-रमणियाँ 'कुरवै' नृत्य (एक प्रकार का लोक-नृत्य) करती हुई गाती हैं; उनके गायन का मधुर स्वर सुनकर ग्वालो के आँगन मे बँधे हुए बछड़े, जो बाँसुरी का नाद सुनने के अभ्यस्त हैं, निद्रा-निमग्न हो जाते हैं, वहाँ की स्त्रियो के राग सुनकर खेतो की रखवाली करनेवाले कृषक बेसुध हो जाते हैं।
पहाड़ों पर उगे हुए बाँस, हवा के झोके खाकर टकराने लगते हैं; उनकी चोट खाकर शहद के बड़े-बड़े छत्तो से शहद बह निकलता है; ऊँची चट्टानो पर से गिरती हुई मधु की धारा ऐसी लगती है, मानो कोई विशाल सर्प चट्टानो से लटक रहा हो, यह मधु की धारा कुमुद-पुष्पो से भरे सर मे जा गिरती है, तो (शंख) कीट उसे पीकर तृप्त होते हैं।
वहाँ की सुन्दरियाँ, जिनके विशाल नयन और अर्द्धचन्द्र सदृश ललाट हैं, वे विद्या एवं धन से संपन्न हैं, अतः जो कोई दुःखी पुरुष उनके यहाँ आता है, उसे धन आदि देकर संतुष्ट करती हैं; वे सदा इस तरह के धर्म-कर्मों में निरत रहती हैं; उनका अन्य कोई दैनिक कार्य नही है।
भोजनालयो मे, जहाँ रोज अनगिनत अतिथियो को भोजन दिया जाता है, अर्द्धचन्द्राकार कटारो से काटी गई तरकारियो, दालो और मोती के दानो जैसे चावलो की बड़ी-बड़ी राशियाँ लगी रहती हैं।
वहाँ के निवासियो की विभूतियो का वर्णन कौन कर सकता है ? बड़ी-बड़ी नावें विदेशो से अनन्त निधियाँ ला देती हैं; धरती शस्य के रूप में अनन्त समृद्धि देती है; खाने श्रेष्ठ रत्न प्रदान करती हैं तथा उनके विभिन्न कुल उन्हे दुर्लभ सदाचार की शिक्षा देते हैं।
वहाँ कही भी कोई पाप-कृत्य नही होता, अतः किसी की अकाल-मृत्यु नही होती; लोगो के चित्त विशुद्ध रहते हैं, अतः किसी के मन में वैर या द्वेष-भाव नही रहता; वहाँ के निवासी धर्म-कृत्यों को छोड़ अन्य कोई कार्य नही करते, अतः सदा प्रजा की उन्नति ही होती रहती है।
(उस देश मे) नदियों के प्रवाह के सिवाय अन्य कोई अपना मार्ग छोड़कर नही चलता; नारियो की कुंकुमपत्र-रेखाओ से चित्रित (पुरुषो की) भुजाओ को छोड़कर अन्य किसी वस्तु का (धान की राशियो पर लगाये गये निशान आदि) चिह्न नही मिटता; रमणियो के कटि-प्रदेश के अतिरिक्त अन्य कोई क्षुद्र नही होता; नारियो के पुष्पालंकृत घुँघराले और सुगंधित केशो को छोड़कर और कोई विक्षिप्त (बिखरा हुआ या पागल) नही दीखता।
अगरु का धूम, पाकशालाओ का धूम, गुड़ की भट्टियो का धूम एवं वेद-ध्वनि से गुंजायमान यज्ञशालाओ का धूम—ये सब मिलकर मेघ बन जाते हैं और (अयोध्या के) गगन मे फैल जाते हैं।
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उस देश की नारियों की छटा प्राप्तकर मयूर (गर्व से) संचरण करते हैं; उनके वक्षों पर शोभायमान रत्नाभरणों की कांति पाकर सूर्यातप (आनन्द से) सर्वत्र फैल जाता है, उनके केशों की शोभा पाकर मेघ (अभिमान से) गगन पर चढ़ जाते हैं और उनके नेत्रों की छवि प्राप्त कर जलाशयों में मीन (हर्ष से) इधर-उधर तैरते हैं।
सरोवरों में नारियाँ जब अपनी टूटती-सी सूक्ष्म कटि के साथ लहरों को उद्वेलित करती हुई गोता लगाती हैं, तब उनके रक्ताधर को देखकर कुमुद खिल पड़ते हैं, जल पर चलनेवाले हंस की-सी गतिवाली नारियों के मुख की समता करते हुए कमल खिल जाते हैं।
वहाँ की वनिताओं के कटाक्ष अपने उपमानीभूत सभी वस्तुओं का उपहास करते हैं, उनकी गति हथिनी की गति का उपहास करती है, परस्पर सटे हुए उनके उन्नत उरोज पंकज की कलियों का उपहास करते हैं, और उनके सुन्दर मुख षोडश कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा का उपहास करते हैं।
वहाँ जो रत्न बिखरे हैं, उनकी कांति सूर्य की किरणों से भी विलक्षण है, वहाँ की रमणियों के स्तन नारियल के शीतल फलों से भी विलक्षण हैं, उनके उज्ज्वल दुकूल दूध पर पड़े झाग से भी विलक्षण हैं और उनके विवाहोत्सवों में बजनेवाले नगाड़े काले बादलों (के गर्जन) से भी विलक्षण हैं।
उस देश के हरे-हरे उपवनों की समता कर सकती हैं, केवल काली घटाएँ; खेतों में लगे धान के अंबारों की समता कर सकता है, केवल पर्वत, वहाँ के बाँधों से घिरे हुए विशाल जलाशयों की समता कर सकता है, केवल अपार जलराशि समुद्र; और, अनन्त निधियों से संपन्न उस कोशल देश की समता कर सकता है, केवल देवलोक।
जो धानों की राशियाँ नहीं हैं, वे मोतियों के ढेर हैं, जो मोतियों के ढेर नहीं हैं, वे समुद्र से निकाले गये नमक के ढेर हैं, जो नमक के ढेर नहीं, वे नदियों से निकली अमूल्य वस्तुओं के समूह हैं, और, जो उन वस्तुओं के समूह नहीं हैं, वे सैकत श्रेणियाँ हैं, जहाँ रत्न बिखरे पड़े हैं।
बालिकाएँ जहाँ कन्दुक-क्रीड़ा करती हैं, वे चन्दन के बाग नहीं हैं, परन्तु चंपक-पुष्पों के उपवन हैं—(बालिकाओं के शरीर की सुगंधि पाकर चन्दन-वन भी चंपक-उपवन के समान महँक उठते हैं), मयूरवाहन सुन्दर सुब्रह्मण्यम् (कार्तिकेय) के जैसे वहाँ के बालक जहाँ धनुर्विद्या आदि कलाओं का अभ्यास करते हैं, वे नन्दन वन नहीं हैं, परन्तु मकरन्द-भरे रजनीगंधा के वन हैं—(उन बालकों के शरीर से भी रजनीगन्धा की-सी सुरभि पाकर परिजात-वन भी रजनीगन्धा की फुलवारी के समान महँकने लगता है।)
वहाँ के कोकिल उन सुन्दरियों की कण्ठध्वनि का अनुकरण करते हुए बोल उठते हैं, मयूर उनके नृत्य का अनुकरण करते हुए नाचने लगते हैं और सीप उनके दाँतों के उपमान होनेवाले मोती उगलते हैं।
(उस देश के) मद्य-विक्रेताओं के यहाँ मद्य पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है, उन मद्यो का पान करनेवाले कृषकों के यहाँ खेती के उपयुक्त सभी आवश्यक साधन
बालकाण्ड १३
उपस्थित रहते हैं; विवाह-मंगल में व्यस्त युवकों के घरों में उस समय के अनुकूल मंगल-वाद्य बजते रहते हैं; और, संगीत-कला-निपुण 'बाण' (एक गायक जाति) लोगों के घरों में घुमावदार 'किल्लै' (एक प्रकार की वीणा)-वाद्य विद्यमान रहते हैं।
वहाँ पुष्प-मालाएँ शीतल नव मधु बरसाती हैं; जल-पोत उत्कृष्ट रत्नों को (विदेशों से लाकर) बरसाते हैं. हवाएँ प्राणों को स्थिर रखनेवाला अमृत बरसाती हैं और कवियों की वाणी कर्ण-पेय मधुर कवित्व रस बरसाती हैं।
पुष्पों से अलंकृत केशों और मुक्ता-मालाओं से भूषित वक्षों से अतिरमणीय दिखनेवाली कामिनियों को उद्यानों में देखकर बड़े कलापवाले मयूर भ्रम में पड़ जाते हैं कि वे भी मयूरी हैं और इसलिए युवकों के मन के जैसे ही वे मयूर भी उनके पीछे-पीछे चलने लगते हैं।
उस देश में दान का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ कोई भी याचक नहीं है; शूरता का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ युद्ध नहीं होते; सत्यवचन का महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ कोई कभी असत्य-भाषण नहीं करता; और, पंडितों का भी महत्त्व नहीं, क्योंकि वहाँ के सभी लोग बहुश्रुत तथा ज्ञानी हैं।
तिल, जौ, माष, कुलत्थी आदि धान्यों से भरी हुई गाड़ियाँ और नमक के खेतों से नमक लादकर लानेवाली गाड़ियाँ, वहाँ की गलियों में पहुँचकर एक दूसरे की कतारों में इस प्रकार खो जाती हैं कि उन्हें अलग-अलग पहचानना कठिन हो जाता है।
वहाँ के विभिन्न प्रान्तों में उत्पन्न होनेवाले खाँड़, शहद, दही, मद्य आदि पदार्थ दूसरे प्रान्तों में यों स्थानान्तरित होते रहते हैं, जैसे मोक्ष-प्राप्ति के उपाय से वंचित प्राणी अपने किये कर्मों के फल भोगते हुए विभिन्न जन्म ग्रहण कर भटकते रहते हैं।
यज्ञों को देखने के लिए आई हुई जन-मंडली और मेलों को देखने के लिए आई हुई जन-मंडली—दोनों, संगीत और बाँसुरी की ध्वनियों से प्रतिध्वनित होनेवाली गलियों में इस तरह मिल जाती हैं, जैसे अलग-अलग दिशाओं से बहती हुई दो नदियाँ एक स्थान पर आकर मिल जाती हों।
शंख-ध्वनि, मृदंग का नाद, पटहों का रव आदि स्वर, खेतों में बड़े-बड़े बैलों को हाँकनेवाले कृषकों की हाँक में समा जाते हैं।
माताएँ अपने नन्हें बच्चों को दूध पिलाकर अपने हाथ से अन्न उठाकर खिलाती हैं. उन बच्चों के मुँह से लार उनके वक्ष पर गिरती है, जहाँ (विष्णु भगवान् के) पाँच आयुधों के चिह्नोंवाली माला पड़ी है, अन्न उठाते समय उन नारियों के मुकुलित होनेवाले कर यों दीखते हैं, जैसे चन्द्र की कांति से पंकज मुकुलित हो रहे हों।
वहाँ के लोग शीलवान् हैं, इसलिए उनका सौन्दर्य नित नवीन रहता है; वे सत्यवादी हैं, इसलिए वहाँ नीति स्थिर रहती है; वहाँ स्त्रियों का आदर होता है, इसलिए धर्म सुरक्षित रहता है; और, वर्षा समय पर होती है, क्योंकि वहाँ की स्त्रियाँ पवित्र आचरणवाली हैं।
उस विशाल कोशल देश की, जो उपवनों से घिरा हुआ है, सीमा का पता कोई
१४ | कंब रामायण
भी नही लगा सकता ; सरयू नदी अपनी अनन्त शाखा-प्रशाखाओ से बहती हुई उस सीमा को खोज रही है, फिर भी उसे पहचान नही पाई है ।
यह कोशल देश इतना पुण्यभूयिष्ठ है कि यदि प्रभञ्जन के आघात से समुद्र की जलराशि भूमि पर चढ़ आवे, तो भी उस देश की कोई हानि नही हो सकती । ऐसे कोशल का वर्णन करने के पश्चात् अब हम अयोध्या नगर का वर्णन करेगे । ( १—६१ )
अध्याय ३
नगर पटल
अयोध्या नगरी सस्कृत भाषा के महाकवियो तथा विद्वानो द्वारा रस-भरे, सार-गर्भित, मधुर शब्दो मे वर्णित हुई है , जिस स्वर्गलोक की प्राप्ति की इच्छा से असख्य लोगो के निवासी तपस्या मे लीन रहते हैं, उस स्वर्ग के निवासी भी अयोध्या नगरी का निवास प्राप्त करने की कामना करते रहते हैं ।
क्या वह अयोध्या नगरी भूदेवी का मुख है या उसका तिलक है ? अथवा उसके नयन है ? उसके स्तनो पर सुशोभित मनोहर रत्नहार है ? अथवा उस भूदेवी के प्राणो का निवास है ?
क्या वह नगरी लक्ष्मी देवी का आवास-भूत अति सुन्दर कमल है ? या वह स्वर्णमंजूषा है, जिसके भीतर विष्णु भगवान् के वक्ष पर प्रकाशित होनेवाले कौस्तुभ मणि जैसे सुन्दर रत्न रखे हुए हैं ? अथवा वह देवलोक से भी ऊँचा वैकुण्ठधाम ही है ? कदाचित् यह वह स्थान है, जहाँ प्रलय के समय सारी सृष्टि समा जाती है । इस नगर के सम्बन्ध मे और क्या कहें ?
अपने अर्धांग मे उमा देवी को स्थापित करनेवाले (परमशिव) दो देवियो (श्री और भूमि) के पति अतुलनीय (विष्णु) भगवान् तथा क्ष्माधन देव (ब्रह्मा) ने भी इस अयोध्या की समानता करनेवाला दूसरा नगर नही देखा । चन्द्र तथा सूर्य भी इसके उपमान हो सकनेवाले एक नगर को देखने की प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर ही निर्निमेष नयनो से अभी तक अन्तरिक्ष मे घूम रहे हैं अन्यथा उनके इस प्रकार भ्रमण करने का दूसरा कारण क्या हो सकता है ?
ब्रह्मदेव ने बहुप्रशंसित इस रमणीय अयोध्यापुरी का निर्माण करने के हेतु तीक्ष्ण वज्रायुध धारण करनेवाले (देवेन्द्र) की नगरी अमरावती एव कुबेर की राजधानी (अलकापुरी) की सृष्टि करके पहले ही नगर-निर्माण का अभ्यास कर लिया था, मय आदि देवशिल्पी भी इस नगर की शोभा देखकर लज्जित हो गये और शिल्प-कला मे अपनी हार स्वीकार कर सकल्पमात्र से सृष्टि करनेवाली अपनी शक्ति को भूल बैठे, तो मेघ-मडल को छूनेवाले उन प्रासादो का वर्णन कैसे किया जाय ?
अपरिमेय वेदो में यह अर्थ प्रतिपादित हुआ है कि (इस समाज म) 'जो पुण्य
बालकाण्ड १५
कर्म करते हैं, वे परलोक में आनन्द प्राप्त करते हैं'—वैसे धर्म का पालन करते हुए इस पृथ्वी पर श्रीराघव के अतिरिक्त और किन्होंने बड़ा तप किया है ? धर्म के त्राता, अनिर्वचनीय गुणों से भूषित (रामचन्द्र) ने जिस नगर में रहकर सप्त लोकों की रक्षा की, उस अयोध्या से भी बढ़कर सुखप्रद स्थान दूसरा कोई हो सकता है- ऐसा मानना भी क्या उचित है ?
महान् करुणा (भगवान् की करुणा) और धर्म की सहायता से पंचेन्द्रिय-रूपी अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके, उत्तरोत्तर बढ़नेवाली तपस्या और ज्ञान प्राप्त करनेवाले महापुरुष जिस भगवान् की शरण में जाते हैं, वह अरुण नयनवाले विष्णु इस नगर में अवतीर्ण हुए और (सीता देवी के रूप में रहनेवाली) लक्ष्मी के साथ यहाँ रहकर अनन्त काल तक लोक-पालन करते रहे, तो इस अयोध्या की समता कर सकनेवाला स्वर्णमय नगर देवलोक में भी कहाँ मिल सकता है ?
सभी राज्यों के नरेश उसी अयोध्या में एकत्र रहते हैं सभी श्रेष्ठ आभरण और दुर्लभ रत्न वहीं पर होते हैं, बड़ी जंजीरों से बँधे मत्त गज, तुरंग, रथ आदि इस संसार की सभी श्रेष्ठ वस्तुएँ वहीं पर होती हैं; मुनि, देव, यक्ष, विद्याधर आदि सब उसी नगर में जमा रहते हैं; तो उस नगर की उपमा किसके साथ हो सकती है ? ऐसे नगरी के विषय में क्या मुझ जैसा व्यक्ति कुछ कह सकता है ?
[ नीचे के छह पद्यों में नगर के प्राचीर का वर्णन है । ]
हिमावृत, अति उन्नत पर्वत-श्रेणियों में भी शिल्प-शास्त्र के अनुसार बने चतुष्कोण आकारवाले पर्वत इस सृष्टि में कहीं नहीं हैं, अतः (अयोध्या के) उस प्राचीर का उपमान भी कहीं नहीं है; वे स्वर्णमय प्राचीर उन विद्वानों के उन्नत ज्ञान के सदृश हैं, जिन्होंने बड़ी तत्परता के साथ सर्व शास्त्रों का अध्ययन किया हो ।
गंभीर ज्ञान से भी उसका स्वरूप तथा अंत नहीं जाना जा सकता, अतः वह प्राचीर वेदों के समान है, उसके अति उन्नत शिखर अपर लोक तक पहुँचते हैं, अतः वह देवी के समान है; पंचेन्द्रिय-तुल्य बलवान् यंत्रों को अपने वश में रखने के कारण वह मुनियों के समान है; रक्षा करने में वह हरिणवाहना कन्या (दुर्गा देवी) के समान है; शूलायुधों को धारण करने के कारण वह कालिका के समान है, अपनी विशालता के कारण वह सभी महान् पदार्थों के समान है; किसी के लिए भी अगम्य (पहुँच के बाहर) होने के कारण वह स्वयं भगवान् के समान है ।
ऊपर उठा हुआ वह प्राचीर अंतरिक्ष में पहुँच गया है, मानो वह देखना चाहता है कि क्या देवताओं का निवास (स्वर्गपुरी) इस अयोध्या से भी अधिक सुन्दर है; जिस नगर में मधुर-स्वरवाली ऐसी असंख्य रमणियाँ हैं, जिनके पद-नख, लाक्षा-रस से अंकित श्रेणी में रखे हुए चंद्रों के सदृश हैं; पद रक्त-कमल तुल्य हैं; कटियाँ नाल-तुल्य हैं; उरोज छोटे नारियल के समान हैं तथा जिनकी भुजाएँ लचीले कोमल बाँस के सदृश सुकुमार हैं।
वह प्राचीर उस नगर के चक्रवर्ती के ही समान है; क्योंकि वह संसार के मापदंड से युक्त है—(चक्रवर्ती वेत्रदंड से युक्त हो सारे संसार की रक्षा करता है, उसी प्रकार प्राचीर
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कव रामायण
भी अपने भीतर दंडो से युक्त है ); वह शत्रुओं के मुकुटधारी शिरो को काट देता है— ( राजा अपने शस्त्रो से और प्राचीर अपने भीतर लगे हुए यंत्रो से शत्रु का शिर छेदन करता है।), वह मानव-शास्त्र के अनुसार स्थित है—( राजा मनु के प्रतिपादित धर्म पर चलते हैं और प्राचीर मानवो के शिल्प-शास्त्र के अनुसार बनता है), वह इस प्रकार (नगर की) सुरक्षा करता है कि कोई (शत्रु) आँख उठाकर भी उसे देख नही सकता, वह अत्यन्त बलिष्ठ है, वहाँ धनुष, तलवार आदि का अभ्यास होता रहता है, वहाँ कठोर तन्त्र—( राजतंत्र तथा सेना का प्रबंध ) रहता है, वह शत्रुओं के लिए दुर्जय है, महा औन्नत्य (ऊँचाई) से युक्त है तथा चक्र—(शासन-चक्र तथा यंत्र) चलाता रहता है ।
उस प्राचीर मे निष्ठुर त्रिशूल, प्राणघातक खड्ग, धनुष, फरसा, गदा, चक्र, तोमर, मूसल, मेघ के गर्जन के सदृश भयंकर 'कवण्कल' (पत्थर फेंकनेवाला यन्त्र) इत्यादि अनेक कल-पुरजे और यन्त्र लगे हैं, जो मशको को, पक्षिराज (गरुड) को, तीव्रगामी हवा को, अहित विचारवाले के मन को भी भग्न करनेवाले हैं ।
अष्ट दिशाओ में भी अंधकार को हटाकर सुन्दर रूप में प्रकाश फैलानेवाले सूर्य के कुल में उत्पन्न जो राजा हैं, वे आभरणों की अपेक्षा यश को ही उत्कृष्ट (आभर आभरण) माननेवाले हैं, अतः वे अच्छे चरित्रवाले बनकर संसार के प्राणियो की रक्षा में निरत रहते हैं, उनका शासन-चक्र, अनुपम वेत्रदंड तथा आज्ञा, अष्ट दिशाओ मे तथा ऊपर के लोको मे भी फैलकर रक्षा करते हैं। इसलिए, उस नगर के चारो ओर जो प्राचीर बनाई गई है, वह अलंकार-मात्र है।
[ नीचे के आठ पद्यों मे परिखा (खाई) का वर्णन है । ]
अब हम जिस परिखा (खाई) का वर्णन करने लगे हैं, वह उस उन्नत प्राचीर को इस प्रकार घेरे हुए पडी है, जिस प्रकार उन्नत चक्रवाल पर्वत को घेरकर उत्तुंग तरंगो से भरा सागर पडा रहता है। वह (परिखा) वारनारी के मन के समान गहरी, असत्कविता के समान स्वच्छता-हीन ( गदी ), कुलीन कन्याओ के जघन-तट के समान किसी के लिए भी अगम्य होकर सुरक्षित, तथा ऐसे मगरो से भरी है, जो (लोगो को) सन्मार्ग से हटाकर बुरे मार्ग पर खींच ले चलनेवाली इंद्रियों के समान प्रबल हैं ।
गगन मे संचरण करनेवाला मेघ-समुदाय, उस विशाल तथा पाताल तक गंभीर परिखा को देखकर समझता है कि यही भयंकर समुद्र है, और वहाँ उतरकर जल भर लेता है, फिर ऊपर उठकर उस प्राचीर को देखकर समझता है कि यह कोई गगनोन्नत पर्वत है और वही पर अपनी जलधाराएँ बरसाने लगता है ।
ऊँचे प्राचीर के बाहर स्थित विशाल परिखा मे अपनी सुरभि को चारो ओर फेंकता हुआ पकज-वन खिला हुआ है; वह ऐसा लगता है, मानो मानिनियो के उज्ज्वल वदनो से जो कमल पहले परास्त हो गये थे, वे अब अपने समस्त बल को एकत्र करके युद्ध करने के लिए आ जुटे हों और उस प्राचीर को घेरकर पडे हों ।
बडी कुशलता के साथ लगाये गये यंत्रो से शोभित उस प्राचीर के चारो ओर
बालकाण्ड १७
धरती को भेदकर जो परिखा बनाई गई है, उनके भीतर बड़े-बड़े मगर निवास करते हैं और ऊपर उठ-उठकर इस प्रकार डुबकियाँ लगाते रहते हैं, जिस प्रकार अतिगम्भीर समुद्र के मध्य, अदम्य मद से डूबे हुए हाथी हों।
वे मगर, चोखे करवालों की जैसी अपनी पूँछों को हिलाते हुए जाज्वल्यमान नेत्रों से चिनगारियाँ उगलते हुए, एक दूसरे के साथ चढ़ा-ऊपरी करते हुए, आगे बढ़ते हैं; तो ऐसा लगता है, जैसे युद्धरंग में क्रोधोन्मत्त राक्षस टूट पड़े हों।
वह परिखा चक्रवर्ती की सेना की जैसी है, क्योकि वहाँ उड़ते हुए हंस पक्षी श्वेत छत्रों के सदृश हैं; वहाँ के भयंकर मगर, ग्रहों से घिरे हुए पर्वताकार हाथियों के सदृश हैं; नालदंडों के साथ स्पंदित होनेवाले कमल-पुष्प घोड़ों के सदृश हैं; तथा वहाँ के मीन त्रिशूल, करवाल आदि शस्त्रों के सदृश हैं।
उस खाई के किनारे पर चाँदी के चबूतरे बने हैं और उन चबूतरों के मध्य फर्श पर स्वर्ण और स्फटिक-खंड बिछे हैं, इस कारण, देवताओं के लिए भी यह असम्भव है कि वे उस स्वच्छ धरती और उस खाई के स्वच्छ जल को पृथक्-पृथक् पहचान सकें।
विचार करने पर ऐसा लगता है कि उस अति विशाल तथा दीर्घ परिखा-रूपी समुद्र के निकट फैले हुए वनों को, समुद्र के निकट स्थिर होकर पड़े हुए घनीभूत अंधकार कह सकते हैं, वे उपवन उस स्वर्णमय प्राचीर की नीले रंग की साड़ी के समान हैं।
उस नगर के चारों दिशाओं से चार नगर-द्वार हैं; जो दिगंतों में रहनेवाले गजों के समान खड़े हैं, पूर्वकाल में स्वर्गलोक को नापनेवाले त्रिविक्रम के चरण से भी अधिक उन्नत होकर, समस्त सम्पत्तियों से भरी इस धरती पर रहनेवाले प्राणियों को सन्मार्ग पर चलाते रहने के कारण वे चारों नगर-द्वार चारों वेदों की समानता करते हैं।
कबूतरी के बुलाते रहने पर भी कबूतर उसके पास जाकर प्यार से उसका आलिंगन नहीं करता, किंतु वहाँ पर निर्मित एक कपोती की प्रतिमा के पास (उसे सजीव समझकर) मुग्ध हो खड़ा रहता है। यह देखकर कबूतरी रूठकर अकलंक स्वर्णमय स्वर्गलोक में स्थित, पुण्यवान् लोगों के निवासभूत कल्पक-उद्यान में जा छिपती है।
[यहाँ से तीन पद्यों में नगर के गोपुर (शिखर) का वर्णन किया गया है।]
कटे हुए पत्थरों को चुनकर भित्तियाँ बनाई गई हैं, जिनके ऊपर स्फटिक पत्थर लगाये गये हैं, उनके ऊपर चमकते हुए स्वर्ण-पत्र बिछाये गये हैं; जिनके मध्य कांति बिखेरते हुए विविध रत्न जड़े हुए हैं; उन भित्तियों के ऊपर रुचिर रजतमय आड़े की छतें रखी गई हैं, जिनके ऊपर वज्रमय स्तंभ खड़े कर दिये गये हैं।
उन खंभों के ऊपर मरकत जड़ी हुई छतें बिछाई गई हैं; उन छतों पर हीरक-पत्थर चुने गये हैं; स्वर्ण-पत्रों और विद्युत् के समान चमकते रत्नों से निर्मित सिंह की प्रतिमाएँ यत्र-तत्र रखी गई हैं, उन सिंहों के ऊपर गोमेदक की छत बिछाई गई हैं।
उस छत के ऊपर एक दूसरी मंजिल निर्मित है, इस प्रकार सात मंजिले बनी थीं; जो इस भाँति विशाल थी, मानो सत्यलो के निवासियो के रहने के लिए ही बनाई गई हों।
१८ = कंब रामायण
शिल्प-शास्त्र के अनुसार निर्मित वह स्वर्ण-पत्रों से आवृत गोपुर अपनी कांति को ऊपर के सप्त लोकों तक फेंकता है, उस गोपुर पर माणिक्य-मय कलश रखे हैं। वह गोपुर ऐसा लगता है, मानो भूमिदेवी को मुकुट पहनाया गया हो।
धवल प्रासाद, जिनपर सफेद कौडियों को पकाकर बनाये गये चूने की पुताई की गई है और जो इतने उज्ज्वल हैं कि उनके सम्मुख चन्द्रमा भी काला दीखता है, ऐसे लगते हैं, मानो भयंकर प्रभंजन के चलने से क्षीर सागर से उत्तुंग तरंगें ऊपर की ओर उठ आई हों।
(उन धवल सौधो के उपरिभाग में) बिंदियोंवाले सुन्दर कबूतरों के रहने के लिए दरवे (कबूतरों के आवास) बने हुए हैं, जिनमें सोने के पत्र लगाये गये हैं, धवल प्रासाद पर ये सुनहले ताक ऐसे लगते हैं, मानों हिमाचल के शिखर पर अकलंक सूर्य की प्रभातकालीन सुनहली किरणों के पुञ्ज पड़े हों।
(उस नगर में) इस प्रकार के असंख्य कोटि प्रासाद हैं, जिनमें हीरकमय सुन्दर खंभों के मस्तकों पर मरकत-मय छतों को सुचारु रूप से बिठाकर उन छतों पर सजीव दीखनेवाले चित्र अंकित किये गये हैं; वे प्रासाद ऐसे हैं कि स्वर्ग-लोक के निवासी भी उन्हें देखकर विस्मित हो जाते हैं।
(उस नगर में) ऐसे अनेक सौध हैं, जिनके चन्द्रकांतमय तल पर चन्दन के खंभे खड़े करके, उनके प्रवालमय मस्तकों पर रक्तवर्ण के माणिक्य-मय शहतीर रखे गये हैं और जिनकी दीवारें इन्द्रनील रत्नों से जड़ी हैं।
वे प्रासाद ऐसे हैं कि उनके खंभो के पाद कमल के आकार के हैं, वे नाग-लोक के सर्पों को छूनेवाले हैं, अतिमनोहर दर्शनीय अलंकारों से भरे हैं, विशाल अंतराल (खाली स्थान) से युक्त हैं, बाहर से सोने के उपकरणों से अलंकृत हैं अतः वे (प्रासाद) वार-नारियों की तुलना करते हैं।
(वारनारियाँ) जिनके पाद कमल के समान होते हैं. जो कामी पुरुषो (चेटो)¹ का आलिंगन करती हैं, सुन्दर अलंकारों से सुशोभित होती हैं, उनका अंतर प्रेम से शून्य होता है. पर बाहर स्वर्णाभरणो से भूषित रहती हैं।
उन मनोहर प्रासादों के भीतर जानेवाले व्यक्ति उनकी शोभा पर मुग्ध होकर निर्निमेष नयनों से उसे देखते रह जाते हैं और जब दीवारो की कांति उन व्यक्तियों पर पड़ती हैं, तब वे देवों के समान दीखते हैं; अतः अपनी ऊँचाई के कारण देवलोक में भी पहुँचे हुए वे प्रासाद उन दिव्य विमानों के जैसे ही हैं, जो संकल्पमात्र से सब दिशाओं में चले जाते हैं।
वे प्रासाद, जो मनोहर आभरण-भूषित रमणियाँ और मालाधारी पुरुषों के आवास हैं और धर्म-मार्ग से कभी विचलित न होनेवाले (गृहस्थों) के आवास हैं, रत्न और स्वर्ण के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु से नहीं बने हैं, वे अपनी कांति से सूर्य को भी परास्त करनेवाले हैं।
गगन तक उन्नत, अपार संपत्ति से युक्त, अति प्रसिद्ध तथा देदीप्यमान कांति से
¹ तमिल में 'चेटु' शब्द के दो अर्थ होते हैं—(१) शेषनाग, (२) चेट या वेश्याप्रेमी। प्रासाद और वारनारी, दोनों, चेटों को आलिंगित करते हैं।