कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
किष्किन्धाकाण्ड ४८३
बड़े मेघ, बारी-बारी से गरज रहे थे. और जल बरसाते हुए एक-दूसरे के निकट आकर टकराते थे, जैसे बड़े-बड़े हाथी गरजते हुए और मदजल को बहाते हुए क्रोध के साथ दौड़कर एक दूसरे से टकरा जाते हों।
हवाएँ बारी-बारी विभिन्न दिशाओं से बहती थी। मेघ अपने चंचल तथा छोटे जल-विन्दुओं को शरो की बौछार के समान अपने लक्ष्य पर प्रयुक्त करते थे। वह दृश्य ऐसा था, जैसे एक दिशा दूसरी दिशा से युद्ध कर रही हो।
अपनी प्रियतमाओं को छोड़कर दूसरे राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए गये हुए राजा लोग (वर्षा के आगमन पर) लौटकर आ गये हों और उनके आगमन से पहले निष्प्राण बनी हुई (उनकी पत्नियों की) देह में प्राण के लौट आने मे वे तरुणियाँ निःश्वास भर उठी हों—उसी प्रकार वृक्षों की सूखी शाखाएँ वर्षा के आगमन से पल्लवित होकर नव सौन्दर्य के साथ विकसितमुख-सी दिखाई पड़ती थी।
पाटलवृक्ष (पुष्पहीन हो) दरिद्रता प्रकट करते थे। दिनकर शीतल बन गया, श्वेतकुमुद समृद्ध बन गये। कुवलय-पुष्प निर्धन बन गये। मयूर सम्पत्ति पाये हुए व्यक्ति के समान नाच उठे। कोकिल वियुक्त प्रियतमों के जैसे शिथिल हो चुप हो रहे।
उन पर्वत-सानुओं में जहाँ विविध रंगवाले भ्रमर तथा तितलियाँ उत्तम रत्नो के समान विश्राम करती थी, मधु के भार से झुककर हिलनेवाले अर्द्ध-विकसित रक्त कांदल-पुष्प ऐसा दृश्य उपस्थित करते थे, मानों विशाल धरती-रूपी तरुणी वर्षाकाल के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर, यह विचार कर कि वसंत को भी इस वर्षाकाल ने जीत लिया है, अपने हाथ हिलाती बसन्त ऋतु का तिरस्कार कर रही हो।
करवाल-समान तीक्ष्ण दंतोंवाले सर्प, दीर्घनाल, श्वेतकुमुद की लताओ से जोडन (सर्पों) के फन के जैसे ही पुष्पों को शिर पर धारण किये हुए थे, प्रेम से लिपट जाते थे और उनसे हटते नही थे। वे श्वेतकुमुद भी उन काममत्त सर्पों के समान ही होकर उनसे उलझे पड़े रहते थे।
इन्द्रगोप इस प्रकार फैले थे कि धरती पर तिल रखने का भी स्थान नही था, वे चिरकाल के प्रवास के उपरात लौटे हुए अपने प्रियतमों से मिलनेवाली अगरु तथा पुष्प-वासित कुतलोंवाली तरुणियों के द्वारा वार-बार थूकी हुई पान की पीक के समान ही बिखरे हुए थे।
उस गगनचुंबी मेरुपर्वत से, जिसपर मधुर जम्बूफलों से भरे हुए वृक्ष होते हैं, स्वर्ण को बहाकर ले चलनेवाली (जम्बू-नामक) नदी जिस प्रकार बहती है, उसी प्रकार जलधाराएँ कर्णिकार, बेंगे आदि पुष्पों को बहाती हुई उस पर्वत से बह रही थी।
सुन्दर तथा दीर्घनाल रक्तकुमुद तथा कर्णिकार मनोहर इन्द्रगोपों से भरे हुए ऐसे लगते थे, जैसे पृथ्वी देवी मधुरगान करनेवाले भ्रमरो को अपने विकसित करों को उठा-कर स्वर्ण तथा रत्न प्रदान कर रही हो।
धैवत स्वर मे गानेवाले भ्रमर 'ताल' के समान थे। बिजली, गर्जन तथा वर्षा से युक्त मेघ चर्म से आवृत 'मर्दल' के समान थे। मयूर, कंकण-धारिणी नायिकाओं के समान थे।
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रक्तकुमुद नाट्य-रंग पर रखे हुए दीपो की पंक्तियों के समान थे। कोमल 'करुविल' पुष्प दर्शको के नेत्रों के समान थे।
भ्रमर और भ्रमरी के वेग से उड़कर आने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि, उनके टकराने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि—दोनों ध्वनियाँ—देवागनाओ के नृत्य की ध्वनि की समता करती थी। 'कूदाल' के विशाल पुष्प ऐसे विकसित थे, जैसे उन (देवागनाओ) के अमृत-समान आर्यभाषा (सस्कृत) के गीतों के गायन के उपयुक्त बडे भाल हों।
पुन्नाग के वनों से बहनेवाली नदियाँ अपने पुत्रो के लिए पुष्ट पर्वत-रूपी स्तनों से स्रवित धरतीमाता की दुग्ध-धाराओं के समान थी। कर्णिकार वृक्ष ऐसे थे, मानों धन की इच्छा से आकर याचना करनेवालो को सदा दान देने के लिए अपनी शाखाओ में स्वर्ण-खंडों को लटकाये हुए खड़े हों।
पुष्प-भरे वनों में सर्वत्र मधुर गान करनेवाला विविध चित्तियों से युक्त भ्रमर आदि कीडे भरे हुए थे, जो दर्शकों को वड़ा आनन्द देते थे, हरिण अपने मार्ग में पड़नेवाले वृक्षों से रगड़ खाते हुए और उस कारण से (चन्दन, अगरु आदि) विविध सुगंधों से युक्त होकर आते थे और हरिणियाँ उन्हें (उनकी गंध के कारण) कोई दूसरा मृग समझकर उनसे रूठ जाती थी।
अपने प्रियतम के रथारूढ होकर प्रवास में चले जाने पर जिस प्रकार विरहिणी तरुणियों के भाले-सदृश नयन आनन्दहीन हो मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार कुवलय-पुष्प बद हो गये। मन्मथ-सदृश अपने प्रियतमों के आगमन पर जिस प्रकार उमंग से भरी उन तरुणियों का किंचित् दत-प्रकाशन से युक्त मदहास छिटक पडता है, उसी प्रकार कुदललताएँ पुष्पित हो उठी।
पर्वत से प्रवहमाण जलधाराएँ स्वर्ण को बहुलता से दोनों ओर बिखेरने लगीं, मानों आनन्द-नृत्य करनेवाले मयूरों को देखकर उन्हें नटवर्ग समझकर राजा लोग उन्हें भूरि-भूरि पुरस्कार दे रहे हों। कमललताएँ जल-मध्य इस प्रकार उठी हुई थी, मानों गगनपथ में आनेवाले मेघो को देखकर उन्हें अतिथि समझकर आनन्दित हुई (गृहस्थ-धर्म मे निरत) तरुणियों के वदन हों।
कामशास्त्र मे निपुण विटों के समान ही भ्रमर सद्योविकसित मधुपूर्ण पुष्पों का आलिंगन करते हुए उनके मधु का संचय करने लगे। वे ऐसे थे, मानों कविगण भरतशास्त्र के अनुसार नाटक का निर्माण करने के उद्देश्य से सफल अर्थ-व्यवस्था के अनुकूल रस-सञ्चय कर रहे हों।
हिरण अत्यन्त आनन्दित हो उठे, मानों यह सोचकर ही वे ऐसे प्रसन्न हुए हों कि हमे अपनी चितवन से परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि-युक्त अति सुन्दरी (सीता) को एक राक्षस ने हमारा ही रूप धारण कर दुःसह दुःख दिया है, इस कारण से उत्पन्न अपने आनन्द को हम शब्दों में व्यक्त नही कर पाते।
हस छोटी नदियों मे गोते लगाकर इस प्रकार आनन्दित होने लगे. मानों
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दीर्घकाल के विरह से पीडित होने के कारण अब अति प्रेम के साथ अपनी प्रियतमाओ से मिलकर भरपूर आनन्द उठा रहे हो ।
अपार सागर से जल भरकर चलनेवाले काले मेघो के निकट ही पक्ति बाँधकर उड़नेवाले अति धवल बगुलों का झुण्ड कृष्ण नामक काले वर्णवाले भगवान् के वक्ष पर शोभायमान मुक्ताहार के सदृश लगता था ।
सारस पक्षी, जो पक्ति बाँधकर एक-दूसरे से सटकर वर्षाकालिक काले मेघ के निकट हो गगन में उड़ रहे थे, वे दिव्य देवों के द्वारा लक्ष्मी के नायक के रूप में वर्णित अनुपम भगवान् के वक्ष पर शोभायमान उत्तरीय वस्त्र की समता करते थे ।
अधिक ताप उत्पन्न करनेवाले धूप-रूपी राजा के हट जाने तथा उत्तम सद्गुणो से भरे वर्षाकाल-रूपी राजा के आगमन के कारण विशाल पृथ्वी देवी अपने महिमामय मन में आनन्दित और शरीर से रोमाञ्चित हो उठी हो—हरियाली इस प्रकार का दृश्य उपस्थित कर रही थी ।
मयूर ऐसे लगते थे, मानो मधुवर्षी कमलपुष्प में उत्पन्न ब्रह्मा अति ज्ञानवान्, (देव) तत्त्व-ज्ञान के नायक (अर्थात्, वेद आदि के द्वारा प्रशंसित विष्णु के अवतार श्रीरामचन्द्र) के दुःख को देखकर उनका उपकार करने के उद्देश्य से कानन में सर्वत्र अपनी आँखें फैलाये हुए देवी सीता का अन्वेषण कर रहे हों ।
कमलपुष्प ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे तरुणियो के वे चरण हो, जिनमें (शत्रुओ के रक्त से) रक्तवर्ण हुए भालों तथा दृढ धनुषों को धारण करनेवाले वीर पुरुषों के केशों को भी नया रंग देनेवाले महावर का रस लगा हुआ हो । (भाव यह है कि तरुणियों के चरण महावर से रंजित थे । प्रणय-कलह के समय वे तरुणियां अपने प्रियतमों के सिर पर पदाघात करती, तो उससे उन पुरुषों के काले केश भी लाल रंगवाले बन जाते थे ।)
कोकिल मौन हो रहे, मानो उनके प्रति राघव के यह आदेश देने पर कि तुम अपनी जैसी ही बोलीवाली देवी को ढूँढ़कर लाओ, पृथ्वी में सर्वत्र घूम-घूमकर (देवी सीता को) बुलाते रहे हों और अब थककर चुप हो गये हों ।
वर्षा-सिंचित भूमि पर उगी हुई हरी घास को अघाकर चरनेवाली गायें यत्र-तत्र उगे हुए ‘मालान’ नामक छोटे पौधों को अपने खुरों से उखाड़ देती थी । वे पौधे, जिनमे सफेद पुष्प लगे थे, बिखरे हुए गाढ़े दही का दृश्य उपस्थित करते थे । ‘पिडव’ नामक पौधे के पुष्प, मधु-सदृश मीठी बोलीवाली कुड्मल-सदृश स्तनोंवाली ग्वालिनों के घटो में से छलकनेवाले दूध के झाग का दृश्य उपस्थित करती थी ।
‘वैंगै’ नामक वृक्ष, भीलनियों के केशों के समान सुरभित थे । पुन्नाग-वृक्ष मछुआ-त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे, जिनसे शीघ्रगामी भ्रमरकुल आकृष्ट हो रहा था । उत्पल-पुष्प अन्त्यज जाति की स्त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे । नवोविकसित कुंदलताएँ ग्वालिनों के केश के समान महक रही थीं ।
श्रीरामचन्द्र ने देवी सीता के वदन को नहीं, किन्तु मरणदायक मन्मथ को असंख्य सहस्र पुष्पबाण प्रदान करनेवाले वर्षाकाल को ही देखा । वे दुःख-सागर का पार नहीं देख पा
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रहे थे। वे मूच्छित हो गये, नहीं तो वे किसको देखकर अपने प्राण को वश में रख सकते थे ?
सीमाहीन वर्षाकाल के आगमन से मनुष्य शिथिलमन हो जाते हैं—यह कथन तपस्या करनेवाले मुनियों के विषय में भी सत्य सिद्ध होता है तब उन प्रभु के दुःखी होने में क्या आश्चर्य हो सकता है, जो मधु तथा अमृत से भी अधिक मधुर बोलीवाली धवल (शंख)-वलयधारिणी सीता की भुजाओं का आलिंगन-सुख प्राप्त करते रहते थे।
नीलोत्पल, नीलकमल, अतसी-पुष्प आदि की समानता करनेवाले वे प्रभु शोकोद्विग्न हुए। वे ऐसी आशंका उत्पन्न करते थे कि कदाचित् इनकी देह में प्राण नहीं हों। इस प्रकार, व्याकुल होकर हंसिनी-सदृश सहज सुन्दरी सीता देवी के संबंध में निम्नलिखित वचन कह उठे—
हे काले मेघ ! राक्षसों ने कंचुकाबद्ध स्तनोंवाली सीता को कहाँ ले जाकर छिपा रखा है ? उन (राक्षसों) का आवास कहाँ है ? यह भी मैं नहीं जान पाया हूँ, तो भी मैं जीवित हूँ। तुम जल से भरे हो, तो भी क्या तुम में दया नहीं है ? मेरे प्राणों को क्यों व्याकुल कर रहे हो ?
तुम विद्युत्-रूपी दंतों से भयंकर हो। अपने काले रूप को गगन में सब ओर फैलाकर तुम बढ़ते हो। पापी तथा मायावी राक्षसों की समता करनेवाले तुम क्या मेरे प्राणों का हरण किये बिना नहीं हटनेवाले हो ?
हे मयूर ! बरछे तथा तीर के समान तीक्ष्ण नयनोंवाली तथा समुद्र में उत्पन्न दिव्य अमृत एवं कोकिल के सदृश बोलीवाली मेरी देवी को ढूँढ़कर नहीं लाते हो। तुम बड़े कठोर हो। मुझ एकाकी तथा निद्राहीन रहनेवाले की मनोव्यथा को जानते हुए भी क्यों अपना बल दिखाकर मुझे सताते हो ?
हे लता ! वर्षाकालिक उत्तरी पवन के अनुसार तुम हिल-डुलकर मेरे प्राणों में घुम जाती हो। तुम अब पुष्पमय हो गई हो और उज्ज्वल ललाटवाली सीता की कटि के समान ही लचक-लचककर क्यों मेरे प्राणों को गला रही हो ?
हे हरिण ! किसी भी स्पृहणीय वस्तु को मैं अब नहीं चाहता हूँ। पराक्रमपूर्ण कार्य भी कुछ नहीं कर पा रहा हूँ। प्रज्ञा के मिट जाने से अब मैं कैसे जीवित रह सकूँगा ? मेरे प्राण-समान देवी मुझसे वियुक्त हो चली गयी हैं। तुम कहो कि वह अब कहाँ हैं ?
हे मेरे प्राण ! पाद-कटक से भूषित तथा रूई के समान मृदुल चरणोंवाली दोषहीन जानकी के साथ ही क्या तुम भी मुझे छोड़कर जाना चाहते हो ? यदि ऐसा करना था, तो जब देवी मुझसे वियुक्त हुई, तभी तुम भी निश्शंक होकर मुझे छोड़ जाते। हे मिटनेवाले, (मेरे प्राण) ! क्या तुम्हें उस देवी के साथ का अपना सम्बन्ध तब ज्ञात नहीं हुआ था ?
हे निष्ठुर ! 'कानरे' वृक्ष, जानकी के केशों के साथ तुम्हारा वैर था, अतः तुम मेरे साथ भी कड़ा वैर निकाल रहे हो ? तुम उस (जानकी) को मुझे नहीं ला देते। उसके बारे में कुछ कहते भी नहीं, भला तुम कब मेरे हितकारी रहे ?
कुरवंड पुष्प-सदृश तीक्ष्ण एवं उज्ज्वल दंतोंवाले घोर सर्प विष के समान ही यह काम्पू पुष्पों से भरित कुन्दलता भी प्राणहारी बन गई है। दुस्सह पीडाग्नि को प्रज्वलित कर
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मुझे निरन्तर सताते रहनेवाले यह (इन्द्रगोप) क्या एक ही हैं ? (अर्थात्, पीडा देनेवाले अनेक हैं)। इस 'रावणकोप' के रहते हुए यह 'इन्द्रगोप'१ भी क्यों मुझे सताने लगा है ?
स्वर्णमय ललाट-पट्ट (ताज) पहनने योग्य ललाटवाली सीता को धोखे से हरण करने के लिए मारीच एक स्वर्णमय हिरण के रूप में आया था। अब यम (मेरे प्राणों का हरण करने के लिए) उत्तरी पवन के रूप में आया है। अहो, अहित करनेवालों को अपने इच्छानुसार रूप धरना भी संभव होता है।
भयंकर कृत्यवाले राक्षसों के समान आकाश में घोर गर्जन करनेवाले हे मेघ ! तुम बार-बार चमककर कमल-पुष्प के आवास को तजकर (मिथिला में) अवतीर्ण हुई उस (लक्ष्मी) देवी को दिखा रहे हो। क्या तुम्हारे मन में मुझपर इतनी दया उत्पन्न हो गई है कि उस सीता को लाकर मुझे देनेवाले हो ?
हे मोर (प्राणियों को पीडा देनेवाला हे मन्मथ) ! विरह-ताप मेरे अन्तर में न समाकर उमड़ रहा है और मेरे प्राणों को जला रहा है। अब (प्राणों के जल जाने के बाद भी) तुम मेरे अन्दर में पुनः-पुनः शर छोड़कर घाव कर रहे हो। यह तुम्हारा कार्य व्यर्थ है। प्रशंसनीय विद्या से युक्त मेरा अनुज यदि तुम्हें एक बार भी देख ले, तो फिर उसके क्रोध को रोकना असंभव होगा।
हे अनंग ! धनुष और तीक्ष्ण बाण इसलिए नहीं है कि भयंकर युद्ध से डरे हुए योद्धाओं पर उनका प्रयोग किया जाय, उनका प्रयोग तो उनपर करना चाहिए, जो (प्रयोग करनेवाले के) पराक्रम का आदर नहीं करते हों। तुम तो निर्दय हो, यह सोचकर कि तुम्हारा बल हम जैसे दुर्बलों पर ही सफल होगा, रात-दिन हमें सताया करते हो। क्या तुम्हारा यह कार्य प्रशंसा के योग्य है ?
इस प्रकार के वचन कहकर शिथिल तथा दुःखित होनेवाले, अपने भाई को, जो अपना उपमान स्वयं ही था, देखकर लक्ष्मण व्याकुल हुआ और अपने सिर पर कर जोड़कर इस प्रकार सांत्वना के वचन कहने लगा—हे महात्मन् ! आपने अपने को क्या समझा है ?
विवेक एवं विद्या से सुसम्पन्न हे सिंह ! हे तपःसंपन्न ! वर्षाकाल का भी अन्त होता है। आप क्यों इस प्रकार दुःखी हो रहे हैं ? क्या आप इसलिए चिंतित हैं कि वर्षा का आगमन हो गया है ? अथवा काले राक्षसों के पराक्रम का विचार करके आप दुःखी हो रहे हैं ? या यह सोच रहे हैं कि वाली के द्वारा निर्मित वानर-सेना अभी तक देवी के अन्वेषण के लिए आई नहीं है ?
वेद भले ही भ्रम में पड़ जाय, चन्द्र अपने स्थान से विचलित हो जाय, गगन तथा गभीर समुद्र से आवृत्त धरती भी हिल उठे, किन्तु तुममें वैसी अस्थिरता (चांचल्य) कभी संभव नहीं है। अनेक चन्द्रकला-समान बड़े दाँतों से युक्त अग्र राक्षसों का प्रभाव क्या तुम्हारे भव्य भ्रुकुटि-रूपी धनुष के वक्र होने मात्र से विनष्ट नहीं हो जायगा ।
१. 'कोप' और 'गोप'—दोनों शब्द तमिल में एक ही जैसे लिखे जाते हैं। अत, तमिल में 'रावणगोप' और 'इन्द्रगोप' शब्दों को 'रावणकोप' और 'इन्द्रकोप' भी पढ़ा जा सकता है।—अनु०
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हे ज्ञानवान् ! हनुमान् नामक व्यक्ति के ( ज्ञान, शक्ति इत्यादि गुणों के ) परिमाण को हमने जान लिया है । किन्तु, अंगद आदि ५६० समुद्र संख्यावाले वानरों के स्वरूप को हमने देखा नहीं है । पाप के समान दुःखदायक ( वर्षाकाल के ) मास भी शीघ्र बीत रहे हैं, आपकी धनुष-समान भौंहोंवाली देवी सुलभता से आ पहुँचेगी, यह निश्चित है, ( अतः ) आप शोक छोड़ें ।
हे प्रभो ! पहले जब अरण्यवासी वेदों के पारगामी मुनि तुम्हारी शरण में आये थे, तब तुमने प्रतिज्ञा की थी कि 'तुम लोगों को सतानेवाले मायावी राक्षसों को परास्त करके तुम्हारे कष्ट दूर करूँगा।' विधिवश तुम्हारे प्रति भी उन ( राक्षसों ) ने अपराध किया है, अतः उन राक्षसों का विनाश करो और मधुर यश प्राप्त करो तथा और देवों को भी स्वर्गलोक दिलाओ । अब इस प्रकार प्रज्ञाहौन हो रहना उचित नहीं है ।
हे मेरे प्रभु ! शत्रु-विजय करने का श्रेय तुमको ही प्राप्त होगी, अन्यथा यह यश और किसको मिल सकता ? शोक करना वीरता का कार्य नहीं है, वह तो दुर्बलता है । यह उचित है कि हम समय की प्रतीक्षा करें और उसके अनुसार कार्य करें । यदि आप अभी प्रयत्न करना चाहते हो, तो भी आपके लिए असाध्य कार्य कुछ नहीं है । आप शोक से उद्विग्न न हो—इस प्रकार ( लक्ष्मण ने ) कहा ।
शिथिलप्राण हो निश्चेष्ट बैठे हुए आदि भगवान् (के अवतार रामचन्द्र) अनुज के वचनों से सांत्वना पाकर शोक-मुक्त हुए, इस प्रकार अनेक दिन व्यतीत हुए । एक रोग के शान्त होते ही दूसरा रोग उत्पन्न हो गया हो, ऐसे ही अब वर्षाकाल का उत्तरार्ध आरम्भ हुआ ।
बड़े-बड़े जलाशय भर गये । उनमें तरंगें घनी होकर उठने लगीं । काले वर्णवाले कोकिल दुर्बल हुए, ऊँचे पर्वत ठंडे हुए, विशाल दिशाएँ अदृश्य हुईं, अपने प्रियतमों से वियुक्त व्यक्ति दुःखी हुए, क्रौंचों के जोड़े एकप्राण होकर परस्पर गाढ़ालिंगन में बँध गये ।
उत्तरी पवन, स्वर्णमय आभरणों से भूषित अप्सराओं के अनिन्दनीय विशाल जघन-तट के वस्त्रों तथा उनके झूलों का स्पर्श करके उनके प्रेम से पीड़ित हुए व्यक्तियों पर ऐसे जा लगता था, जैसे जले हुए घाव में तीक्ष्ण बाण चुभ गया हो ।
समुद्र भर गये, सूर्य-किरणें अपना ताप तजकर ठंडी हो गईं । जल से आँके जानेवाले घटी-यन्त्र के द्वारा ही समय का ज्ञान संभव था, अन्यथा यह जानना असंभव था कि कब दिन हुआ है और कब रात ।
मयूर-सदृश तरुणियों की कोमल मधुर बोली से पराजित होनेवाले तोते धान के पौधों में जा छिपते थे, जिससे धान की बालियाँ टूट जाती थीं । ( रमणियो के ) धवल तथा मृदु दंतों से पराजित मुक्ताएँ विशाल सागर की लहरों में छिपी पड़ी रहती थीं । 'नेयिदल' प्रदेश ( समुद्री तटों ) की युवतियों के आँगनों में उत्पन्न होनेवाले पुष्पित 'पुन्ने' वृक्ष मानो सोने की गठरी को खोल रहे थे ।
ऊँचे हाथी उज्ज्वल तथा बड़ी बूँदों के गिरते रहने पर भी पर्वत के समान अचल तथा निद्राहीन स्थिर खड़े थे, जैसे काली रात तथा दिन के समय में निरंतर ध्यानरत रहनेवाले दृढचित्त तपस्वी हों ।
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शीत से काँपनेवाले इस, चन्दन-वृक्ष के पत्तों से छायी हुई झोपड़ियों के भीतर, वेदिकाओं के निकट होम-कुण्डों में प्रातः और संध्या को जलाई जानेवाली अगरु की लकड़ियों के धुएँ में घुस-घूमकर अपनी ठंड दूर कर लेते थे। वानरियाँ पर्वत-कंदराओं में सोई पड़ी थी। बलिष्ठ वानर ऐसे सिकुड़े बैठे थे, जैसे अष्टांगयोग की प्रक्रिया के द्वारा अपनी इंद्रियों का दमन करनेवाले अनुपम योगी हों।
मेघ घोर वर्षा कर रहे थे, जिससे निर्मल पर्वत निर्झरों की धाराएँ तरुणियों के केश-पाश की सुगन्धि से सुवासित नहीं हो पाती थी—(अर्थात्, तरुणियाँ उनमें स्नान नहीं करती थी)। रत्नमय स्तम्भों पर डाले गये झूले सूने पड़े थे। मंच, चमकते हुए रत्नों को आकाश में नहीं फेंकते थे (अर्थात्, अनाजों के खेत में बने मंचों पर खड़े होकर अब कोई पक्षियों को उड़ाने के लिए रत्नमय पत्थरों को नहीं फेंकता था।)
केतकी-वृक्षों के काले तथा शीतल पत्तों के मध्य कामोद्दीपक पुष्प पंक्तियों में खिले थे और उनके घेरे के मध्य सारसियाँ अपने विशाल तथा सुन्दर पक्षों को सिकोड़े ऐसे बैठी थीं, जैसे अपने प्रियतम के विरह में पीड़ित स्त्रियाँ हों।
नाना विहग मृदंग के समान नाद कर रहे थे। विविध भ्रमर संगीत कर रहे थे। मयूर नृत्य की विविध भंगियाँ दिखा रहे थे और अनेक प्रकार के नृत्य दिखानेवाली वेश्याओं की समता करते थे। और, हरिण-समुदाय, जो मेघ-गर्जन से भयभीत होकर वृक्षों के नीचे आ ठहरते थे, (उस नृत्य के) दर्शक बने थे।
कोमल पुष्प-शाखा को परास्त करनेवाली कटि से शोभित तरुणियाँ तथा युवक अगरु-धूम से आवृत होनेवाले दीपों के प्रकाश में पर्यन्त पर शयन करते थे। शीत से काँपने-वाले भ्रमर पुष्प का त्याग कर, चन्दन-वृक्ष के कोटरों में विश्राम करते थे।
मनोहर हंसों के जोड़े कमल-शय्या को तजकर बड़े वृक्षों से भरे उद्यानों में आ ठहरे थे। सुगन्धित लकड़ियों से बने हुए झोपड़ों में धवल दंतोंवाली व्याध-स्त्रियों के साथ उनके प्रियपुरुष निद्रा करते थे।
ग्वाले लताओं से आवृत अत्युन्नत तथा छोटे पत्तोंवाले वृक्ष के नीचे बकरियों के बच्चों को गोद में लिये पड़े थे। चोरों के समान छिपकर फिरनेवाले भूत भी भूखे ही दाँत कटकटाते हुए एक स्थान में खड़े थे।
बड़े-बड़े दृढ़चित्तवाले हाथी आकाश के मेघों से बाण-सदृश पानी की बूँदों के अपने शरीर पर गिरने से सिकुड़ जाते थे और पर्वत के सानुओ के ऊपर जहाँ मधु के पुराने तथा असंख्य छत्ते लगे थे, नहीं रह पाते थे और कन्दराओं के भीतर घुस जाते थे।
इस प्रकार के वर्षाकाल में रात्रि का अंधकार भी आ पहुँचा। तब ज्ञानवान (रामचन्द्र) ने अंजन-सदृश आँखोंवाली तथा मंदहास-युक्त जानकी की याद में ज्वाला-सी निःश्वास भरते हुए लक्ष्मण से कहा—
आभरण-भूषिता, पीनस्तनी वह (सीता) मेघ के सदृश काले रंगवाले तथा बिजली के सदृश दाँतोंवाले राक्षस की माया का लक्ष्य बनकर पीड़ित हो अपने प्राण छोड़ेगी। मेरे लिए भी जीवित रहना सर्वथा असम्भव है। आह! यह कैसी अवस्था है।
४१० कंब रामायण
शुभ्र वर्णवाले तथा विनाशकारी शर मेरे तूणीर में सोये पड़े हैं। मैं गगनोन्नत भुजावाला होकर भी इस प्रकार की पीड़ा भोग रहा हूँ। मेरी ऐसी दशा है, मानों मेरे कंठ में बरछा चुभा हो, फिर भी मैं निष्प्राण नहीं हुआ हूँ।
पत्ती जोड़ों के भीतर चमकते हुए जुगनुओं के प्रकाश में अपनी संगिनियों के साथ सो रहे हैं। (मन्मथ के द्वारा) चुनकर फेंके गये पुष्पबाणों से मेरा हृदय छिन्न हो गया है और दुःसह पीडा से पीड़ित हो रहा हूँ। फिर भी, मैं जीवित हूँ।
मेघ में विद्युत् की कौंध को और वज्र के गर्जन को देखता तथा सुनता हुआ मैं विषदंतवाले सर्प के समान पीडित होकर चुप पड़ा हूँ। वनवास में मैंने जो कार्य किये हैं, उनपर स्वर्गवासी (देवता) और धरतीवासी (मनुष्य) हँसेंगे। अब (मेरे अपमान के लिए) और क्या आवश्यक है ?
वेदना से पीड़ित होता हुआ मैं (सीता को) भूलकर जीवित नहीं रह सकता हूँ। यदि वर्षा इसी प्रकार रहेगी, तो मेरा प्राण त्याग कर स्वर्ग पहुँचना निश्चित है। तो क्या मैं इस अपयश को अगले जन्म में ही मिटा सकूँगा। कदाचित् अगले जन्म में भी मैं गृहस्थी से सन्यास लेकर ही यह अपयश मिटा सकूँगा।
हे वीर ! इस स्थान पर रहकर यदि हम राक्षसों का पता लगावें, तो बहुत समय व्यतीत होगा। अतः, यह प्रयत्न (सीता का अन्वेषण) आवश्यक नहीं। मेरे लिए इसी में यश है कि मैं (सीता की) विरह-पीडा में प्राण त्याग दूँ।
मैं शर-सदृश उज्ज्वल कटाक्ष-पूर्ण नयनोंवाली तथा श्रेष्ठ आभरणों से भूषित (सीता) के प्रवाल वर्णयुक्त तथा कुमुद-सदृश अधर का अमृतपान करता रहा। यह वर्षा मानो ताँबे को पिघलाकर बरसा रही है और मेरे शरीर को जला रही है। तो, क्या अब ऐसे ही मरना मेरे लिए उचित है ?
घृत की आहुति देकर प्रज्वलित की हुई अग्नि के समक्ष, जनक ने मुझसे कहा था कि यह (सीता) तुम्हारी शरण में है। उनके उस वचन को मैंने असत्य कर दिया है। ऐसे मुझ अधार्मिक व्यक्ति में सत्य कैसे टिक सकता है ? अतः, अब मुझे मर जाना ही उचित है।
सांत्वना देने के लिए तुम हो। सांत्वना पाकर सहन करने के लिए मैं हूँ। कंकण-धारिणी (सीता) अब यहाँ आ जाय—यह संभव नहीं है। इस पीडा को कौन दूर कर सकता है ? क्या इस पीडा का कभी अन्त भी होनेवाला है ?
मैं श्रेष्ठ शरों को चुन-चुनकर प्रयोग करूँ, तो उनसे जब सत्यलोक जल जाय, देवता प्रभृति सृष्टि के अतिप्राचीन व्यक्ति मिट जायें तथा सभी लोक एवं वहाँ के प्राणी अशेष रूप से ध्वस्त हो जायें, तभी क्या मैं मयूर-सदृश उस (सीता) को देख सकूँगा ?
वज्र-निर्घोष-सदृश टंकार से युक्त धनुष को धारण करनेवाले हे वीर ! इस प्रकार मैं सब लोकों तथा वहाँ के प्राणियों को न मिटाकर पीडा का अनुभव करता हुआ बैठा हूँ, तो यह इसी डर से कि (वैसा करके) मैं धर्म की रक्षा नहीं कर पाऊँगा; अन्यथा शत्रु-राक्षस सब देवताओं के साथ मिलकर मेरे विरुद्ध आवें, तो भी वे मुझसे बच नहीं सकते।—राम ने इस प्रकार कहा।
किष्किन्धाकाण्ड ४११
तब अनुज ने कहा—हे आज्ञा-रूपी चक्र से युक्त प्रभु ! जिस वर्षा ऋतु को हमने यहाँ व्यतीत करना चाहा, वह अब व्यतीत हो चुका है। शरद्-काल भी अब समाप्ति पर आ गया है। अतः, उस चोर (रावण) के आवास को खोजकर पहचानने का समय आ पहुँचा है। अब आप क्यो शिथिलमन हो रहे हैं ?
अरुण नयनवाले विष्णु भगवान् के यह आज्ञा करने पर कि तुम अमृत-तरंगो से पूर्ण विशाल क्षीरसागर से अमृत को दे सकते थे, फिर भी वैसी आज्ञा देना उचित न समझ-कर, पर्वत आदि सभी मथन-उपकरणो के द्वारा उसे मथकर ही अमृत को निकलवाया था।
चक्रधारी भगवान् यदि मन में संकल्प-मात्र कर लें, तो समस्त लोको के टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें अपने मुँह में डालकर चबा डालें, तो भी वह वैसा नही करता, परन्तु अनेक बड़े शस्त्रों को लेकर युद्ध करके ही सब (दुर्जनों) को वह विजित करता है।
हे महाभाग ! ललाटनेत्र तथा परशुधारी शिव भगवान्, जब क्रुद्ध होकर, आकाश मे संचरण करनेवाले त्रिपुरो को ध्वस्त करने लगे, तब उन्होने जो-जो उपाय किये थे और जो-जो उपकरण जुटाये, उन्हे कौन जान सकता है ?
यदि हम अपने अनुकूल रहनेवाले सब (मित्रो) को अपना साथी बना लें, मन्त्रणा करने योग्य सब विषयों को भली भाँति विचार कर निर्णय करें, फिर उचित समय को पहचानकर उचित ढंग से कार्य करें, तब 'विजय' नामक वस्तु क्या हमसे दूर रह सकती है ?
बलवान् राक्षसो ने धर्म-मार्ग से विमुख होकर अधर्म-मार्ग को ही अपने लिए ग्राह्य मान लिया है, उचित सन्मार्ग से जब वे (राक्षस) भ्रष्ट हो गये हैं, तब यश और विजय दोनो (तुम्हारे सिवा) अन्य किसके पास होंगे ?
स्वर्ण-आभरण पहननेवाली उन देवी के कष्टो को दूर करने का समय धीरे-धीरे आ पहुँचा है। अब आप दुःख-मुक्त हो जायें । ऋषि-मुनियों की सहायता करनेवाले हम क्या राक्षसो के (शस्त्रो के) लक्ष्य बनेगे ? हे मनोहर धनुष धारण करनेवाले ! आप ही कहिए।—इस प्रकार लक्ष्मण ने कहा।
युगो के अधिपति (विष्णु भगवान् के अवतार रामचन्द्र ने) लक्ष्मण के वचनो को उचित समझा। इसी प्रकार, जब वे यह सोचते हुए कि क्या इस वर्षाकाल का भी कभी अन्त होनेवाला है, कृश हो रहे, तब वर्षाकाल भी समाप्ति पर आ गया।
महान् दान-कार्य मे निरत कोई उदार व्यक्ति, धरती के सभी लोगों को उनके इच्छानुसार सभी पदार्थ का दान देकर निर्धन हो गया हो और फिर, किसी उत्तम याचक के द्वारा कुछ माँगे जाने पर उसे दान देने के लिए अपने पास कुछ न होने से लज्जित हो गया हो। इसी प्रकार सब मेघ श्वेत वर्ण हो गये (अर्थात्, शरत्काल आ गया)।
पाप-पुण्य नामक दो कर्मों के फल को जानने से सद्द्विवेक के प्राप्त होने पर जिस प्रकार अविद्या के तम मिट जाते हैं, उसी प्रकार (शरत्काल के आगमन पर) वर्षाकाल का गाढ अन्धकार मिट गया।
जिस प्रकार घोर युद्ध के समाप्त होने पर युद्ध की भेरी निःशब्द हो जाती है, उसी प्रकार जल-भरे मेघ भी गर्जन करना छोड़कर निःशब्द हो गये। भयंकर बाणो के सदृश
४१२ | कंब रामायणं
वर्षा की बौछार भी थम गई। जैसे करवाळ कोशों मे बंद करके रख दिये गये हो, वैसे ही विद्युत् भी अदृश्य हो गई।
विशाल प्रान्तवाले ऊँचे पर्वत अपने सानुओ के निर्झरो से रहित हो गये। उनके केवल कुछ जल-स्रोत ही बहते रह गये। वे (पर्वत) ऐसे लगते थे, मानो वे यज्ञोपवीत और उत्तरीय के साथ श्वेत वस्त्र भी कटि मे धारण किये हों।
पर्वतो के ऊपर से मेघो के हट जाने से दिगंतों तक प्रवाहित होनेवाली नदियाँ जल-रहित हो गईं। अतः, वे (नदियाँ) सन्मार्ग पर न चलनेवाले उस व्यक्ति के समान थीं, जो उत्तम पुण्य के घट जाने पर निर्धन हो गया हो।
गड-स्थलों से मद-जल बहानेवाले हाथियो के समान स्थित काले मेघ गगन के प्रदेश को उन्मुक्त छोड़कर उड़े जा रहे थे। चन्द्रमा इस प्रकार चमक उठा, जिस प्रकार यवनिका के उठने पर विविध नाट्य-भंगियाँ दिखानेवाली नर्तकी का वदन हो।
उत्तरी पवन पुष्प-मकरन्द को बिखेरता हुआ इस प्रकार प्रवाहित हो उठा, जिससे स्वर्णमय आभरण धारण करनेवाली तरुणियो के विशाल तथा मनोज्ञ स्तनों पर अंकित चन्दन, कस्तूरी, कुंकुम आदि का लेप सूख गया।
हंस गगन मे सभी दिशाओ में मानो यह सोचकर उड़ रहेथे कि दशरथ चक्रवर्ती के कुमार (श्रीराम) के दुःख को दूर करने के लिए उचित समय अब आ गया है। अतः, हम भी (सीता) देवी का अन्वेषण करने चलें।
सरोवरों का जल छल-कपट से रहित तपस्वी जनो के मन के सदृश स्वच्छ हो गया। उन जलाशयो में विचरनेवाले मीन, 'रुई पर चलना है'—इस कथन को सुनने मात्र से जिनके कोमल चरण लाल हो जाते हो, ऐसी सुन्दर युवतियो के अञ्जन-लगे नयनों के समान घूम रहे थे।
नालो पर विकसित कमल-पुष्प रूठी हुई तरुणियो के वदन की समता करते थे। 'किडै' नामक पौधे, जिनमे अतिसुन्दर, सुगन्धित तथा रक्तवर्ण पुष्प भरे थे, सुरत-श्रांत युवतियो के रक्त अधरो का दृश्य उपस्थित करते थे।
अनेक प्रकार के मेढ़क जो (वर्षाकाल मे) शिक्षा देने में चतुर अध्यापकों के पास पाठ सीखनेवाले कोलाहल से पूर्ण वटुकों के समान बोल रहे थे, अब उन बुद्धिमानो के समान ही मौन हो गये, जो अपना वचन जहाँ फलप्रद होता हो, वही बोलते हैं और अन्यत्र मौन रहते हैं।
मेघों की विशाल वर्षा से हीन होकर मयूर अपने पंखो को सिकोड़े हुए दुःखी बने हुए और मन में कोई भी उमंग या फल की कामना से रहित होकर मिथिला-नगर के हंस (अर्थात्, देवी सीता) के समान ही व्याकुल हो दबे पड़े रहे।
समुद्र, मानो अपने तरंग-रूपी करो से नदी-रूपी अपनी पत्नियों के उमड़ते हुए जल-रूपी सुन्दर आँचल को पकड़कर खींच रहे थे और वे नदियाँ मानो अपने बलवान् पति का आलिंगन करके मदहास कर रही थी, जो (मंदहास) मुक्ताजल का दृश्य उपस्थित करते थे।
गुवाक (सुपारी)-वृक्षों के फल, शास्त्रों के ज्ञानमय वचनो का श्रवण करनेवाले
किष्किन्धाकाण्ड ४६३
पुरुषो के समान तथा विरह से पीडित तरुणियो के समान ही धीरे-धीरे अपने पूर्व रंग का त्याग कर अनिन्दनीय सुनहले रंग को प्राप्त करने लगे।
गगर नामक प्राणी, अनेक दिनों तक जल में रहने से शीत की पीडा से व्याकुल होकर जलाशयो से बाहर धूप में ऐसे पडे हुए थे कि सूर्य की कांति उनके शरीर पर बिखर रही थी। इस प्रकार, जलाशयो के तटो पर अनेक स्थानो में अपने मुख को बन्द किये वे सोये पड़े थे।
'वजी' नामक लताएँ, जिनमें (बैठकर) तोते मधुर स्वर मे बोल रहे थे, जिनमें मनोहर पंखोवाले भ्रमर केशों का दृश्य उपस्थित करते हुए उड़ रहे थे, जिनमें अतिसुन्दर पल्लव थे (जो कान की समता करते थे) और जो कटि के समान ही लचक-लचक जाती थी, तरुणियो के समान शोभायमान थी।
घोंघे, जिनकी पीठ झुकी हुई थी, अपने नेत्रो को सिकोड़कर कीचड़ में धँस गये, मानो उनके द्वारा उत्पन्न किये गये मोती के (रमणियों के दाँतो से) पराजित हो जाने से वे हरिण-सदृश रमणियों के सम्मुख प्रकट होना नही चाहते हो।
वर्षा के कारण पुष्ट हुए समतल प्रदेशों के कमल-पुष्पों के विशाल पत्तो की छाया में विश्राम करनेवाले दोषहीन केंकडे अब अपनी स्त्रियों के साथ अपने बिलो में उनके द्वारो को बन्द करके ऐसे पड़े थे, जैसे लोभी व्यक्ति हों। (१-१२१)
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अध्याय १०
किष्किन्धा पटल
इस प्रकार शरत् काल जब व्यतीत होने लगा, तब वीर अग्रज राम ने अपने अनुज को देखकर कहा—हे वीर ! निश्चित अवधि व्यतीत हो गई। किन्तु, निद्रा मे पड़ा हुआ वह राजा (सुग्रीव) अभी तक नही आया। उसका यह कैसा कार्य है ?
वह (सुग्रीव) दुर्लभ राज्य-सपत्ति को पाकर हमारे उपकारो को भूल गया है। अतः, उत्तम सदाचार मे वह भ्रष्ट हो गया है, धर्म को भुला दिया है, इसके प्रति किये हमारे स्नेह की बात छोड़ दो, वह हमारे पराक्रम को भी भूल गया है। इस प्रकार वह सुखी जीवन मे मत्त हो गया है।
जो कृतघ्न होकर अपूर्व रूप में प्राप्त स्नेह को भी भुला दे, उचित सत्य को मिटा दे एव अपने प्रण को पूर्ण न करे, उसको मारना दोष नहीं है। अतः, तुम जाओ और उसकी मनोदशा को जानकर लौट आओ।
तुम जाकर यह मेरा संदेश उस (सुग्रीव) को दो कि घोर पापियों को युद्ध में निर्मल करके स्वर्ग भेजने तथा (लोक मे) धर्म को सुरक्षित बनाने के लिए मैने जो धनुष
४६४ | कम्ब रामायण
उठाया है, वह अभी वर्त्तमान है। भयंकर यम भी है। तुमलोगो को मारनेवाला बाण भी मेरे पास है।
विष के समान व्यक्तियो को दण्ड देना पाप नहीं है। मनु का यही विधान है। इस बात को तुम उस (सुग्रीव) के हृदय में बिठा दो, जिसने पाँच वर्ष (की आयु) में कुछ नहीं जाना।
तुम उससे यह सत्य वचन भी कहना कि यदि वह चाहता है कि नगर, प्रजा, राज्य तथा अपने बन्धुजन—इन सबके साथ स्वयं भी राज करता हुआ सुखी रहे, तो अविलंब यहाँ चला आये। यदि वह इस प्रकार नहीं आयगा, तो संसार में वानरी का नाम तक शेष नहीं रहेगा।
यदि सुग्रीव प्रभृति वानर, हमसे भी अधिक बलवान् वीर को खोजने का विचार करें, तो उनसे कहना कि तुमको (अर्थात्, लक्ष्मण को) जीतनेवाला तीनों भुवनों में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई नहीं है।
तुम पहले उन्हें नीतिमार्ग को समझाना। यदि उस वचन से उनका मन न बदले, तो तुम क्रुद्ध न होना और वहीं उन्हें मिटा न देना। किन्तु, उनके दिये उत्तरों को मेरे पास आकर कहना।—यों कहकर यशोभूषित (रामचन्द्र) ने लक्ष्मण को विदा किया।
रामचन्द्र की आज्ञा को सिर पर धारण करके, उनके चरणों को नमस्कार करके, किंचित् भी विलंब न करके अपनी विशाल पीठ पर तूणीर बाँध तथा शर-प्रयोग के लिए अतिश्रेष्ठ धनुष को कर में लिये हुए, अनन्यचित्त से वह (लक्ष्मण) दुर्गम मार्ग पर चल पड़ा।
(राम की) आज्ञा से चलनेवाला वह (लक्ष्मण) सुकुमार होते हुए भी (पूर्व में सुग्रीव जिस मार्ग से उन दोनों को किष्किंधा तक ले गया था उसी) पूर्व-प्रसिद्ध मार्ग से नहीं गया, किन्तु वृक्षों और शिलाओं को चूर-चूर करके उन्हें दूर फेंकता हुआ एक नया मार्ग बनाकर उसपर चला। (भाव यह है कि सुग्रीव ने प्रसिद्ध मार्ग में कोई रुकावट अथवा हानिकारक उपाय कर रखा होगा, इस विचार से लक्ष्मण उस मार्ग से नहीं गये।)
वीर-कंकण से भूषित लक्ष्मण के अरुण चरणों की चाप से, स्वर्ग को छूनेवाले मेरु पर्वत-जैसे ऊँचे उठे हुए पर्वत धरती में धँसकर समतल हो गये। पाताल में स्थित कर्ण- नेत्र (अर्थात्, सर्प या आदिशेष) भी लोगों की दृष्टि में आ गया।
बलिष्ठ वाली के भाई के पास जानेवाला मनुकुल श्रेष्ठ का अनुज, भयंकर अरण्य को भेदकर अतिवेग से आगे बढ़ता हुआ, गगन-चुम्बी सालवृक्षों को छेदनेवाले (राम के) बाण की समता करता था।
किसी दिग्गज के बच्चे के खो जाने पर उसे ढूँढ़ता हुआ, उसके पद-चिह्नों का अनुसरण करके दूसरा कोई दिग्गज चल पड़ा हो—सुग्रीव को ढूँढ़ता हुआ जानेवाला वह लक्ष्मण वैसे ही लगता था।
जिस प्रकार सूर्य ऊँचे उदयाचल से अस्ताचल पर जा पहुँचा हो, उसी प्रकार स्वर्ण की कांति से युक्त शरीरवाला लक्ष्मण एक ऊँचे उज्ज्वल पर्वत से (ऋष्यमूक से) दूसरे पर्वत पर (किष्किंधा पर) शीघ्र जा पहुँचा।
किष्किन्धाकाण्ड २६५
अपने रक्षक अग्रज के अनुपम शर के समान वह अत्युन्नत किष्किन्धा-पर्वत पर जा पहुँचा। वह एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर फाँदकर जानेवाले स्वर्णरंग केसरी की समता करता था।
उसे देखकर वानर, ऐसे भागे, जैसे यम को देख लिया हो। वे वालिकुमार के निकट जा पहुँचे और उससे कहा—हे प्रभु ! अतिक्रुद्ध रामानुज चंडवेग से यहाँ आ रहा है। यही सुनते ही—
वह कुमार भी, साहसिक कृत्य करनेवाले लक्ष्मण के आगमन का कारण जानने के लिए (लक्ष्मण के) समीप आया और उस चक्रवर्ती कुमार के मन का भाव पहचानकर स्वर्ण का वीर-कंकण धारण करनेवाले अपने पितृव्य (सुग्रीव) के प्रासाद में जा पहुँचा।
नल (नामक वानर-शिल्पी) के द्वारा निर्मित प्रासाद में पुष्प-दलों की शय्या पर पड़े उस सुग्रीव के निकट जा पहुँचा, जो दीर्घ कुंतलों तथा बाल-स्तनोंवाली रमणियों के द्वारा अपने सुन्दर पैरों को सहलाये जाते हुए, निद्रा का अतिथि बनने की इच्छा कर रहा था।
जो स्वच्छ ज्ञानवाले राम-लक्ष्मण के द्वारा प्रदत्त उस विशाल राज्य-सम्पत्ति-रूपी मदिरा का पान करके अतिमत्त हो गया था, जो अति उच्च्वल स्वर्ण-पर्वत के मध्य ठहरे हुए ऊँचे रजत-पर्वत के समान शोभायमान था।
जो, सिंधुवार, साखू, अगरु, चंदन तथा सुगन्धित लताओं तथा सुरभित पुष्पों का स्पर्श करके वहनेवाले बाल-पवन के कारण सुख-निद्रा में मग्न था।
जो मधुर ‘किडे’ (नामक फूल) के समान अधखिली स्त्रियों के, धवल हास करनेवाले मुक्ता-सदृश पैने दंतों से मधु-समान जो रस उत्पन्न होता था, उसका पान करके उन्माद, मूर्च्छा तथा अन्य (तंद्रा, शिथिलता आदि) गुणों के बढ़ जाने से मत्त गज के समान पड़ा था।
जो, मुकुट, कुंडल आदि के कांति-पुंजों के व्याप्त होने से ऐसा उज्ज्वल लगता था, जैसे सूर्य-किरणों से आवृत हिमाचल हो।
वह सुग्रीव लेटा था। तारा के गर्भ से उत्पन्न वीर अंगद पहले उसके समीप गया और अपने विशाल करों को जोड़े, उसे निद्रा से जगाने के लिए मृदु वचन कहने लगा—
हे मेरे पिता ! मेरे वचन सुनिए। उन रामचन्द्र का अनुज, अपने मुख से अपने मन के महान् क्रोध को प्रकट करते हुए अवार्य वेग से आ पहुँचा है। अब आपका विचार क्या है? कहिए।
वह (सुग्रीव) राज्य-सम्पत्ति के मोह से भूला हुआ था और सुगंधित मद्य-रूपी विष भी उसके शिर पर चढ़ा हुआ था। अतएव प्रज्ञा-रहित हो कोमल पर्यङ्क पर पड़ा था; अंगद के वचनों को वह सुन नहीं सका।
यह दशा देखकर कपिशार्दूल एवं केसरी की समता करनेवाला वह युवराज (अंगद), यह सोचकर कि अब सुग्रीव के सम्मुख खड़े रहने से कुछ न होगा, दोषरहित चित्तवाले हनुमान् को बुलाने के लिए उनके पास गया।
४९६ कंब रामायण
इन्द्रपुत्र का सुत (अंगद) मन्त्रणा मे अतिकुशल वायुकुमार को साथ लिये हुए उग्र सेनापतियो के साथ चलकर (सुग्रीव के प्रासाद से) बाहर निकलकर अपनी माता के प्रासाद की ओर चला।
वहाँ पहुँचकर उसने (तारा से) प्रश्न किया कि अब क्या करना चाहिए ? तब तारा ने उत्तर दिया—तुमलोग न करने योग्य पाप-कर्म सुलभता से कर डालते हो, फिर उन कर्मों के परिणाम को अनायास ही दूर करने का उपाय भी करना चाहते हो । क्या उपकार को भूलकर (कृतघ्न होनेवाले) तुमलोग (पाप से) मुक्त हो सकते हो ?
उसने फिर आगे कहा—विजयी (रामचन्द्र) ने तुम्हें सेना-सहित आने की जो अवधि दी है. यदि वह व्यतीत हो जायगी, तो तुम लोगों के जीवन की अवधि भी समाप्त हो जायगी—यो मेरें कहते रहने पर भी तुमलोगों ने कुछ सुना नहीं। अब देखो, तुमलोग कैसे फँस गये हो।
जिन वीर ने अपने धनुष को ऐसा झुकाया कि यम ने बाली के अपूर्व प्राणो का हरण कर लिया और जिन्होने तुमलोगो को अतुलित राज्य-सम्पत्ति प्रदान की, वे भी आज तुम्हारी उपेक्षा-योग्य हो गये हैं। तुम्हारे जैसे स्वभाववाले लोगों के लिए यह कार्य (रामचन्द्र की उपेक्षा करना) ठीक ही तो है।
देवताओ से भी उत्तम वे (राम) अपनी पत्नी के वियोग में निष्प्राण-से हो मूर्च्छित पडे हैं। इधर तुम उनकी उस व्यथा को मन में भी न लाकर सद्योविकसित नीलोत्पल-समान नेत्रवाली रमणियों के प्रेमामृत का पान कर रहे हो।
(तुमलोग) सत्य से मुकर गये हो, कृतघ्न हो गये हो। तुमलोगों के पापों का परिणाम अब दीख रहा है। तुमलोग इस प्रकार गुणहीन हो गये हो। यदि उन महावीर (राम) से युद्ध मोल लोगे, तो विनष्ट हो जाओगे।—जब तारा इस प्रकार उनकी भर्त्सना करती हुई बोल रही थी, तब—
उधर बड़े-बड़े पराक्रमी वानरों ने नगर के विशाल कपाट को, जो बड़ी अर्गला से बद करने योग्य था, बन्द करके भीतर से अर्गला डाल दी और बड़ी शिलाओ को लाकर (उस कपाट के पीछे) चुन दिया।
वे वानर-वीर इस प्रकार नगर-द्वार को सुरक्षित करके और यह विचार कर कि (यदि कदाचित् लक्ष्मण भीतर प्रविष्ट हो जाय तो) उनसे युद्ध करने के लिए सन्नद्ध रहना चाहिए, वृक्षो को तोड़कर एव बड़ी शिलाओ को उखाड़कर हाथ में लिये हुए, प्राकार के समीप खडे रहे।
राजपुगव (लक्ष्मण) ने यह सोचते हुए कि ये हमसे बचना चाहते हैं, क्रोध से मन्दहास करके, लक्ष्मी के निवास कमलपुष्प की समता करनेवाले अपने चरण से, उस नगर के कपाट पर अनायास ही आघात किया।
उनके दिव्यचरण का स्पर्श पाते ही वह नगर-कपाट, सुरक्षा के लिए द्वार पर रखी शिलाएँ तथा दृढ प्राचीर, सब ऐसे विध्वस्त हो गये, जैसे अस्पृश्य पाप-पुज हों।
वह दृढ कपाट, वह पुरातन नगर-द्वार शिलाओ से निर्मित प्राचीर, सब सहज ही
किष्किन्धाकाण्ड ४९७
ढहकर सब दिशाओ मे दस योजन तक बिखर गये । तब वानर भय से विह्वल हो उठे ।
उस दृढ तथा उन्नत प्राचीर और उस विशाल नगर-द्वार के ढहकर गिरने से पत्थरों के प्रहार से शिर मे चोट खाये हुए वानर व्याकुल होकर दीर्घ दिशाओं मे भागकर अपने अपूर्व प्राणो को बचा पाये ।
अकथनीय घोर दुःख पाकर, अपना स्थान छोड़कर भागे हुए दोषहीन वे वानर, भयभीत होकर घोर शब्द करने लगे । उस ध्वनि से वह (किष्किन्धा) नगरी, उन्नत शिखरवाले मन्दर-पर्वत से मथे जानेवाले मीन-भरे तथा शब्दायमान समुद्र की समता करने लगी ।
अनेक वानर, भयभीत होकर, किष्किन्धा पर्वत से हटकर समीपवर्ती वनों में जा छिपे । उससे वह ऊँचा (किष्किन्धा) पर्वत, ऐसा लगने लगा जैसा नक्षत्रपूर्ण आकाश नक्षत्रहीन होने पर दीखता है ।
उस समय प्रतापी (रामचन्द्र) की आज्ञा-रूपी चक्र के जैसे लगनेवाले वे (लक्ष्मण) उस स्वर्णमय नगर की बीथियों म प्रविष्ट हो चलने लगे । तारा को घेरकर खड़े रहनेवाले (अंगद आदि) वानर कह उठे—अहो ! वे आ गये हैं । अब क्या करें ?
हे उत्तम कंकण धारण करनेवाली ! उन (लक्ष्मण) का हृदय पुष्प के समान कोमल है । यदि आप राजप्रासाद के द्वार पर जाकर उन्हें रोक दें, तो वह वीर, जो विचारवान् हैं, उस ओर आँख उठाकर भी नही देखेंगे । यही उत्तम उपाय है ।—यों हनुमान् ने कहा ।
तब तारा ने (उनसे) यह कहकर कि, तुम सब लोग जाओ । मै जाकर उन वीर (लक्ष्मण) के मन को शांत करूँगी—साहस के साथ पुष्पांकृत केशोंवाली अन्य सखियों-सहित चल पड़ी । इधर अन्य वानर उनसे हटकर दूर पर खड़े हो गये ।
कंठ में रस्सी (का आभरण) धारण किये हुए हाथी-जैसे लक्ष्मण, प्रसिद्ध वानरो के आनन्दपूर्ण आवास किष्किन्धा की राजवीथियों को पार कर विशाल राज-सौध में ज्यों ही प्रविष्ट होनेवाले थे, त्यों ही सहज सुगन्ध-भरित केशोंवाली तारा उनके मार्ग के मध्य उन्हें रोककर खड़ी हो गई ।
मनोज्ञ लावण्य, धवल चन्द्र-सदृश मन्दहास, सुन्दर कटि, उत्तम तथा नित्य यौवन-पूर्ण मृदु स्तन—इनसे युक्त उत्तम मयूर-तुल्य रमणियों के साथ वह तारा उस श्रेष्ठमार्ग को रोके खड़ी रही ।
रमणियों की सेना ने दृढता से (लक्ष्मण को) इस प्रकार घेर लिया कि (लक्ष्मण के) धनुष तथा करवाल उनके आभरणों में चमक उठे । उन (रमणियों) के मंजीर, जिनमें छोटे-छोटे कंकड़ भरे थे, बज उठे । मेखलाएँ भी बड़ा कोलाहल कर उठीं । सर्वत्र विविध भ्रू-लताएँ फैल गईं ।
शब्दायमान नूपुर नगाड़े बने थे । रमणियों के जघन बड़े रथ थे । परस्पर अनुरूप नयन-युगल बरछे थे । कठोर भौंहें युद्ध करनेवाले धनुष थीं । इस प्रकार, जब वे रमणियाँ घेरकर खड़ी हो गईं, तब स्वयं गौरव से भी गुरु होनेवाली भुजाओंवाले उन (लक्ष्मण) का
४६८ | कंब रामायण
शांत न होनेवाला क्रोध भी शांत हो गया। वे अपने सिर को झुकाकर उनकी ओर दृष्टि उठाने से भी संकोच करते हुए खड़े रहे।
लक्ष्मण, अपना कमल-वदन नीचा किये, अपने विशाल धनुष को धरती पर टेके, ऐसे खड़े रहे, जैसे अपनी साँसों के बीच खड़े हों। तब मनोहर कंधों, परिशुद्ध हृदय और दीर्घ नयनोंवाली तारा, उन वानर-रमणयों में से, जो धरती की अप्सराएँ जैसी थीं, पृथक होकर गद्गद स्वर में ये वचन कहने लगी—
हे वीर! हमारा यह बडा भाग्य है कि तुम हमारे इस घर में पधारे हो। अनंतकाल तक तप करने पर ही ऐसा भाग्य प्राप्त होता है, अन्यथा इन्द्र आदि के लिए भी ऐसा भाग्य दुर्लभ है। (तुम्हारे आगमन से) हम कर्मरहित हो उत्तम-गति प्राप्त कर चुकीं। इससे बढकर अन्य क्या सुकृत हो सकता है?
फिर, संगीत से भी मधुर बोलीवाली उस तारा ने प्रश्न किया—हे वीर! तुम उग्र रूप धारण करके यहाँ आये हो। तुम्हें देखकर वानर-सेना (तुम्हारे) आगमन का कारण न जानने से भयभीत हो रही है। तुम्हारा क्या उद्देश्य है? हे प्रभो! आज्ञा-रूपी चक्र को प्रवर्त्तित करनेवाले (चक्रवर्ती श्रीराम) के चरण-युगल को कभी न छोड़नेवाले तुम अब (उन्हें छोड़कर) किस कार्य से यहाँ आये हो?
पुष्पहार-भूषित वक्षवाले (लक्ष्मण) करुणा से आर्द्र हुए। उनका क्रोध कम हुआ। यह सोचते हुए कि कौन यह वचन कह रही है, उस तारा के मुख को, जो मानो दिन में धरती पर अवतीर्ण उज्ज्वल पूर्ण चन्द्र-जैसा था, निहारकर देखा। तब उसे देखकर उन्हें अपनी माताओं का स्मरण हो आया, जिससे वे व्याकुल हो उठे।
मंगल-सूत्ररहित, रत्नमय अन्य आभरणों से हीन, सुगंधित मधुपूर्ण पुष्पहार से आभूषित, कुंकुम, चंदन आदि के रस से अलिप्त, पीन एवं तापमय स्तनों तथा क्रमुकवृक्ष-सदृश अपने कंठ को (अपने आँचल से) ढके हुए उस नारीरत्न (तारा) को देखकर उदार स्वभाववाले वे (लक्ष्मण) अपने नयनों में अश्रु-भरे खड़े रहे।
उन (लक्ष्मण) के मन में यह विचार उठने से कि मेरी दोनों माताएँ (अर्थात्, कौशल्या और सुमित्रा) इसी वेश में रहती होंगी, वे शिथिलचित्त होकर दीर्घकाल तक वैसे ही खड़े रहे। फिर, यह सोचकर कि उनसे पूछे गये प्रश्नों का उन्हें कुछ उत्तर देना है, सुन्दर कुंतलोंवाली उस (तारा) को देखकर अपने उद्दिष्ट कार्य के बारे में यों कहने लगे—
सूर्यपुत्र सुग्रीव, मनुकुल के श्रेष्ठ नरेश (राम) के प्रति दिये अपने इस वचन को कि 'मैं अपनी सेना के साथ आपकी देवी का अन्वेषण कर उनका समाचार प्राप्त करूँगा' भूल गया है। मेरे अग्रज ने आदेश दिया है कि तुम शीघ्र जाकर उस सुग्रीव का हाल जानकर आओ। इसलिए मैं यहाँ आया हूँ। उसके उत्तम राज्य-शासन का हाल तुम बताओ—लक्ष्मण ने कहा।
हे प्रभु! क्रोध न करो। छोटे लोगों के अपराध को क्षमा करके तुम शांत हो जाओ। इस प्रकार क्षमा कर सकनेवाला तुम्हारे अतिरिक्त और कौन हैं? वह अपने वचन
' किष्किन्धाकाण्ड ४६६
को भूला नहीं है। उसने संसार मे सर्वत्र अपने अनेक दूतों को भेजा है और सब स्थानो से वानरों की सेना के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। (तुम लोगो के) उपकार का प्रत्युपकार भी क्या सम्भव है ?
सहस्र कोटि वानर-दूत, सेनाओ को बुला लाने के लिए (सुग्रीव की) आज्ञा से गये हैं। उनके लौट आने का समय भी आ गया है। तुम जो शरणागत के लिए माता से भी अधिक हितकारी हो, अपने क्रोध को शांत करो। यही धर्म है, यदि अपराधी ही न हो, तो दण्डनीय कौन होगा ?^१
तुम लोगो ने अपने शरणागत को अभयदान देकर जो अपार सम्पत्ति प्रदान की है, उसे प्राप्त कर यदि वह कभी तुम्हारी आज्ञा का उल्लङ्घन करे, तो वह भी तुम्हारे ही कार्य का परिणाम होगा न ? स्त्री के निमित्त होनेवाले युद्ध में (अपने मित्र के साथ जाकर) यदि कोई अपना शरीर न त्याग करे, तो क्या उसकी मित्रता टिक सकेगी ?
तुम सरल स्वभाववाले ने उस शत्रु को मिटाकर (सुग्रीव को) राज्य का वैभव प्रदान किया और उसके साथ शाश्वत रहनेवाला महान् उपकार किया है। यदि वही तुम्हारी उपेक्षा करे, तो अपनी इस क्षुद्रता के कारण वह अपना महत्त्व ही नहीं खो बैठेगा, किंतु इसी जन्म मे दारिद्र्य को पाकर इह एव पर दोनों लोको के सुख से वञ्चित हो जायगा।
उस समय, युद्ध-कुशल वाली के प्रताप को मिटानेवाला एक ही बाण तो था। अब (यदि तुम इस सुग्रीव को मिटाना चाहो तो) तुम्हे किसकी सहायता अपेक्षित है ? तुम्हारे धनुष से बढकर तुम्हारा अन्य सहायक कौन है ? तुम्हे तो देवी का अन्वेषण करने- वाले लोगों की आवश्यकता है। तुम्हारे चरणों की शरण में आये हुए (सुग्रीव आदि) जन तुम्हारा कार्य करके कृतार्थ होगे।
तारा के ये वचन सुनकर बहुश्रुत लक्ष्मण, करुणार्द्र होकर मन में लज्जा का अनुभव करता हुआ खड़ा रहा। उसको इस दशा में देखकर और समझकर कि, इनका क्रोध शांत हो गया, घोर युद्ध में सहायक बननेवाले दृढ कंधो से युक्त हनुमान् उनके समीप आया।
क्रोध के समय में भी अकुटिल प्रेमवाले लक्ष्मण ने अपने समीप आकर चरणो को नमस्कार करके खडे हुए हनुमान् को देखकर कहा—तुम तो अपार शास्त्र-ज्ञान से युक्त हो। तुम भी कैसे पूर्व घटित वृत्तांत को भूल गये ? तब वचन-चतुर हनुमान् ने उत्तर दिया—हे प्रभो ! सुनो—
अविकृत प्रेमवाली माता का, पिता का. गुरु का, दिव्य शक्ति से युक्त ब्राह्मणो का, गाय का, शिशुओं का और स्त्रियों का वध करनेवालों का भी कुछ प्रायश्चित्त हो सकता है। किन्तु, अनश्वर उपकार को भूल जाने का भी क्या कोई प्रायश्चित्त हो सकता है ?
हे स्वामिन् ! आप और वानराधिप सुग्रीव में जो सच्चा स्नेह उत्पन्न हुआ, वह
^१. भाव यह है कि जो अपराध करे और दण्ड के योग्य हो वही क्षमा के योग्य भी होता है। यदि कोई अपराधी न हो और दंडनीय भी न हो, तो क्षमा का भाव कहाँ रहेगा ? —अनु०
५८० कंब रामायण
मेरा ही तो कार्य था। यदि वह मैत्री मिट जाय, तो उस पाप से क्या कोई मुक्त हो सकता है ? उस कारण से हमारा भी चित्त मलिन हो जायगा न ?
हे हमारे प्रभु ! (हमारे) तप, सुकृत, धर्म-देवता तथा अन्य सब कुछ आप ही हैं। ऐसा मेरा सुदृढ विश्वास है। पर, यह सब रहने दीजिए। यदि त्रिलोक की रक्षा करनेवाले आप क्रोध करें, तो हमारे लिए अन्य आश्रय क्या रहेगा ? (आपकी) करुणा ही (हमारे लिए) गति है।
वानरराज (आपके कार्य को) भूले नहीं हैं। उन्होंने बलवान् वानर-सेनाओं को एकत्र करने के लिए स्थान-स्थान पर दूत भेजे हैं और उनके आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसीलिए विलंब हो रहा है। आप स्वयं धर्म के रक्षक हैं। यदि वह आपको दिये हुए अपने वचन को तोड़ दें; तो इस लोक में उनका जन्म ही व्यर्थ होगा और नरक से भी उसको मुक्ति नहीं मिलेगी।
हे मत्तगज-सदृश वीर ! हमसे उपकार पाये बिना ही जो हमारा उपकार करता है. उसके लिए, यदि आवश्यकता पड़े, तो युद्ध में उसके सहायतार्थ जाकर, उसके शत्रुओं को निहत करना हमारा धर्म है। यदि हम उसके शत्रु का नाश न भी कर सकें, तो कम-से-कम उन शत्रुओं से आहत होकर अपने प्राण तो त्याग सकते हैं। इससे बढ़कर ससार में क्या उपकार हो सकता है ?
हे प्रतापी सिंह-सदृश ! यहाँ अब आपका खड़ा रहना उचित नहीं है। यदि हमारे शत्रु जान लेंगे, तो उससे आपकी और हमारी मित्रता भग हो जायगी। आपकी प्रदान की हुई संपत्ति को तथा आपके ज्येष्ठ भ्राता (राम-सदृश) वानराधिप को अब चलकर देखें।
हनुमान् के वचन सुनकर पर्वत-समान पुष्ट भुजाओंवाले लक्ष्मण ने अपना क्रोध शात करके मन में विचार किया—यह सुग्रीव, नई सम्पत्ति के प्राप्त होने से बेसुध हो गया है और अन्यत्र जाना नहीं चाहता है, अतएव संकीर्णबुद्धि हो गया है. यह राम की आज्ञा का उल्लंघन करनेवाला नहीं है।
यों सोचकर फिर वीरकंकण-भूषित चरण तथा बलिष्ठ भुजाओंवाले राजकुमार (लक्ष्मण) ने हनुमान् को देखकर कहा—अभी तुमसे एक बात और कहनी है. यह तुमसे कहना ही उचित है, तुम इसपर विचार करो; यह कहकर वह आगे कहने लगा— -
मैंने अपनी आँखों देखा है कि (सीता) देवी के अपहरण के कारण उत्पन्न क्रोध तथा मानभग से उत्पन्न अग्नि किस प्रकार उनके प्राणों को सता रही है, राजधर्म छोड़कर दूसरों पर अत्याचार करनेवाले पापियों को उचित दंड देने का मैने निश्चय कर लिया है। उससे मुझे भले ही अपयश प्राप्त हो, फिर भी मुझे उसकी कोई चिन्ता नहीं है।
अपने कोप को शात करके मै जीवित रहता हूँ. तो यह अपने प्रभु को सांत्वना देने के लिए ही; अनेक दिन व्यर्थ व्यतीत हो गये हैं, अन्यथा (हम दोनो के क्रोध से) त्रिभुवन भी दग्ध हो जायंगे; देव भी मिट जायँगे, इतना ही नही. उत्तम धर्म भी विनष्ट हो जायँगे; अविनाशी प्रारब्ध कर्म को कौन मिटा सकता है ?
किष्किन्धाकाण्ड ५०१
प्रभु ने ( पहले ) तुमको देखा ( तुम्हारे द्वारा मित्रता करके ) आपत्ति के समय में तुम्हारे स्वामी ( सुग्रीव ) की सहायता की और मेरे समान ही उस ( सुग्रीव ) को भी अपना भाई समझा ; इसी कारण से उन्होंने इतने दिन यहाँ व्यतीत किये हैं ; अन्यथा एक धनुष की सहायता से ही विद्युत्-सदृश देवी का अन्वेषण करना कोई बड़ी बात नहीं थी ।
केवल आकाश में ही नहीं, किंतु इस सारे ब्रह्माण्ड मे । जिसमें चतुर्दश भुवन, सात बड़े पर्वत और सात कुलपर्वत हैं । जहाँ भी सीताजी हों, उस स्थान को पहचान कर, उन्हें मुक्त करके लाना ( श्रीराम के शर के लिए ) कोई असंभव कार्य नहीं है ; फिर भी, उस दिन तुमलोगो ने जो वचन दिया था, उसकी उपेक्षा करना तुम्हारे लिए उचित नहीं ।
तुम लोगो ने विलंब-मात्र नहीं किया । किन्तु, चिरकाल से गर्व से फूले हुए राक्षसो को जीवित रहने दिया । देवताओं को दुःखी होने दिया । परम्परा से आगत शास्त्रज्ञान तथा होमाग्नि से युक्त मुनियों को विपदा मे पड़ने दिया, पाप को बढ़ने दिया । क्रोध न करनेवाले ( श्रीराम ) को क्रुद्ध कर दिया । तुम्हारा तो इससे अंत ही हो जायगा—यों ( लक्ष्मण ने ) कहा ।
उत्तम कुल में अवतीर्ण ( लक्ष्मण ) के यह कहते ही मारुति ने उनको नमस्कार करके कहा—हे प्राचीन शास्त्रो के ज्ञाता ! बीती बातो को मन में न रखो । यदि हम लोग अपने ऊपर लिये हुए कार्य को पूर्ण नही करेंगे, तो हम मरण के योग्य हैं : इसका साक्षी धर्म ही है । आप भीतर आइए और अपने ज्येष्ठ भ्राता ( सुग्रीव ) से मिलिए ।
स्वर्ण-वलयो से भूषित धनुष को धारण करनेवाले ( लक्ष्मण ) यह कहकर कि, पूर्व में हमने तुम्हारे कहे अनुसार कार्य किया और अब भी हम तुम्हारे कहे अनुसार करने को तैयार हैं, सुग्रीव के मन की थाह लेने के लिए हनुमान् के संग चल पड़े ।
तारा भी, भाले-सदृश नयन, रक्तकुमुद-सदृश अधर, धनुष-सदृश ललाट, हंस की गति, कलापी-तुल्य छवि, ध्वजायुक्त रथ-सदृश जघन, मुक्ता-सदृश दंत, बलिष्ठ बाँस-जैसी मृदु भुजाएँ, कोकिल सदृश ध्वनि, स्वर्ण-कलश-तुल्य स्तन, बिजली-जैसी कटि, कुमिल ( नामक ) पुष्प-सदृश नासिका, कालमेघ-तुल्य केश—इनसे युक्त रमणियों के साथ वहाँ से ( अतःपुर मे चली ) ।
वालिपुत्र ( अंगद ) भी चतुर मंत्रियों के साथ जाकर वीर ( लक्ष्मण ) के कमल-सदृश चरणों पर नत हुआ और भयमुक्त हो खड़ा रहा । तब धनुर्धारी ( लक्ष्मण ) ने उससे कहा—हे वीर, तुम शीघ्र जाकर अपने पिता को मेरे आगमन का समाचार दो । अंगद 'हाँ !' कहकर उन्हें नमस्कार करके चला गया ।
दीर्घ बाहुवाला ( अंगद ) वहाँ से चलकर अपने चाचा के सौध में प्रविष्ट हुआ । वहाँ सुग्रीव के सुन्दर चरणों को दृढ़ता से पकड़ लिया और उसे निद्रा से जगाकर कहा—उस महान् ( राम ) का अनुज आपके सौध के द्वार पर उपस्थित हैं । उसका क्रोध मीनों से भरे समुद्र से भी विशाल हैं। फिर उसने सारा वृत्तांत भी सुनाया ।
अविमुक्त निद्रावाला ( सुग्रीव ) रमणियों के चलने से उत्पन्न कोलाहल को सुनकर जाग पड़ा । पूर्वघटित किसी भी वृत्तांत को न जानने के कारण उसने अंगद से प्रश्न
५०२ कंब रामायण
किया। घने स्वर्णहारों तथा पुष्पहारों से विभूषित हे वीर ! हमने कोई अपराध नहीं किया। ऐसी अवस्था में उनका हमपर क्रोध करने का क्या कारण है ?
(तब सुग्रीव से अंगद ने कहा—) हे पिता। निश्चित तिथि को आप (श्रीरामचन्द्र के समीप) गये नहीं। अपार संपत्ति प्राप्त करके गर्व में फूल गये। उपकार को भूल गये। इन कारणों से (लक्ष्मण का) क्रोध भड़क उठा है। नीतिशास्त्र के पंडित हनुमान् ने उनका क्रोध शांत करने के लिए उनसे प्रार्थना की, तब (लक्ष्मण ने) हमें जीवित रहने दिया।
वानर-वीरों ने (लक्ष्मण के) आगमन का वेग (उग्रता) देखकर किष्किन्धानगर के गगनचुंबी दरवाजे को बंद कर दिया और आसपास के एक भी पर्वत को छोड़े बिना, सब पर्वतों को लाकर (दरवाजे पर) रख दिया। एवं उमड़ते क्रोध के साथ उन (लक्ष्मण) से युद्ध करने के लिए सन्नद्ध हो खड़े रहे।
पौरुषवान् (लक्ष्मण) ने (वानरों का) वह कार्य देखकर अपने सुन्दर कमल- सदृश चरण से (फाटक को) छुआ—(अर्थात्, पदाघात किया)। उसके छूने के पहले ही, दक्षिण से उत्तर तक फैली हुई, शिला-निर्मित प्राचीर, सुदृढ़ नगर-द्वार तथा फाटक पर चुने गये पर्वत, सब टूटकर बिखर गये और चूर-चूर हो गये।
यह देखकर बलवान् वानर-सेना किस दशा को प्राप्त हुई—मैं क्या कहूँ? कहाँ भागकर छिपी—मैं क्या कहूँ? (वानरों की) वह दशा देखकर माता (तारा) आभरण- भूषित रमणियों के साथ, बिजली-सदृश तथा पत्राकार बरछा धारण किये हुए (लक्ष्मण) के सम्मुख जाकर (उनके) मार्ग में खड़ी हो गई।
कुमार (लक्ष्मण) ने स्त्रियों की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा, मन-ही-मन उमड़नेवाले क्रोध के साथ खड़े रहे। तब नारी-रत्न (तारा) ने मधुर वचन कहकर प्रश्न किया--हे उत्तम ! हमारे यहाँ आपका यों आगमन कैसे हुआ? तब उन कुमार ने अपने आगमन का कारण कह सुनाया।
माता (तारा ने) उनके आगमन का प्रयोजन ठीक-ठीक समझ लिया। उनके क्रोध को शांत करते हुए ये वचन कहे—(सुग्रीव) आपकी आज्ञा को नहीं भूला है। भयंकर सेना को शीघ्र लाने के लिए दूतों को पर्वतों तथा पत्थरों से भरी विविध दिशाओं में प्रेषित कर दिया है और उनके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा है। यही अब घटित वृत्तांत है।—यों (अंगद ने) कहा।
(अंगद के यों) कहते ही, सूर्यपुत्र कह उठा—यदि वे (राम-लक्ष्मण) क्रोध- करके उठ आयेंगे, तो इस धरती में तथा स्वर्ग में कौन उनके सम्मुख खड़ा रह सकेगा? धनुर्वीर वह कुमार (लक्ष्मण) जब इस प्रकार क्रोध के साथ, शीघ्र गति से आया, तो मुझे समाचार दिये बिना तुम लोगों ने क्या किया?
तब अंगद ने उत्तर दिया—विविध पुष्प-मालाओं से भूषित बलिष्ठ तथा उन्नत भुजावाले हे मेरे पिता ! मैंने पहले ही आपसे निवेदन किया था। किंतु, तब आप मत्त होकर पड़े थे। अतः, आपने ध्यान नहीं दिया। फिर, अन्य कोई उपाय न देखकर मैंने