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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

प्रथम लम्बक १०५

प्रथम लम्बक १०५ दिन में सूर्य के तेज से पराभूत इन यक्ष राक्षसों और पिशाचों का प्रभाव क्षीण हो जाता है। अतः ये रात में प्रभावशाली होकर हृषित होते हैं॥३५॥ जहां देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन समुचित रूप से नहीं होता या जहां अनुचित और भ्रष्ट रूप से भोजन किया जाता है, वहाँ ये प्रबल हो जाते हैं॥३६॥ जहाँ धर्मासम्भोगी या (पतिव्रता स्त्री) रहती है वहाँ ये नहीं जाते और पवित्र और तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी कभी नहीं छेड़ते ॥३७॥ ऐसा कहकर भूतिवर्मा उसी समय बोला—जाओ! तुम्हारे शापनाश का कारण सुप्रतीक आ गया है। यह मालूम होते ही मैं यहाँ आया और तुम्हें देखा। अब मैं पुष्पदन्त द्वारा कही हुई उस कथा को सुनाता हूँ ॥३८ ३९॥ किन्तु मुझे यह एक कौतूहल (जिज्ञासा) है कि वह पुष्पदन्त के नाम से और तुम माल्यवान् के नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए, अर्थात् नामकरण का कारण बताओ ॥४०॥ पुष्पदन्त की पूर्वकथा काणभूति के प्रश्न को सुनकर सुप्रतीक ने उससे कहा—गंगा के तटपर बहुसुवर्ण नाम का एक गाँव है॥४१॥ उस गाँव में गोविन्ददत्त नाम का विभिन्न शास्त्रों का जाननेवाला ब्राह्मण रहता था। उसकी अग्निशिखा नाम की परम पतिव्रता पत्नी थी ॥४२॥ उस ब्राह्मण ने उस ब्राह्मणी से पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी मूर्ख किन्तु सुन्दर और अभिमानी थे ॥४३॥ कुछ समय के अनन्तर गोविन्ददत्त के घर पर दूसरी अग्नि के समान (क्रोधी) वैश्वानर नाम का एक ब्राह्मण आया ॥४४॥ उस समय गोविन्ददत्त के कहीं बाहर रहने पर उस अतिथि ने घर में जाकर उसके पुत्रों का अभिवादन किया ॥४५॥ इन ब्राह्मणकुमारों ने उस अतिथि के आगत-स्वागत में और अभिवादन के उत्तर में केवल हूँक दिया। इस प्रकार के व्यवहार से क्रुद्ध होकर वह ब्राह्मण उनके घर से निकल चला ॥४६॥ इसके अनन्तर ही आये हुए गोविन्ददत्त ने इस प्रकार जाते ब्राह्मण से पूछा और क्षमा- प्रार्थना आदि द्वारा अनुनय-विनय किया ॥४७॥ 'तुम्हारे पुत्र मूर्ख हैं अतएव पतित हैं और उनके सम्पर्क में रहने के कारण तुम भी पतित हो। अतः तुम जैसे पतित के यहाँ मैं भोजन न करूँगा। उसके लिए मुझे प्रायश्चित्त करना होगा'—ब्राह्मण ने उसे इस प्रकार कहा ॥४८॥

१०४ कथासरित्सागरे

१०४ कथासरित्सागरे अथ गोविन्ददत्तस्तमुवाच शपथोत्तरम्। न स्पृशाम्यपि बालेष्वेतानहं कुतनयानिति ॥४९॥ तद्भार्यापि समेवैत्य तमुवाचातिविप्रिया। ततः कथञ्चिदातिथ्यं तत्र वैश्वानरोऽग्रहीत् ॥५०॥ सर्वदृष्ट्वा देवदत्ताख्यस्तस्यैकस्तनयस्तदा । अभूद्गोविन्ददत्तस्य नैर्घृण्येनानुतापवान् ॥५१॥ व्यर्थं जीवितमालोक्य पितृभ्यामथ दूषितम्। सनिर्वेदः स तपसे ययौ बदरिकाश्रमम् ॥५२॥ ततः पर्णाशनः पूर्वं धूमपश्चाप्यनन्तरम्। तस्थौ चिराय तपसे तोषयिष्यन्नुमापतिम् ॥५३॥ ददौ च दर्शनं तस्य शम्भुस्तीव्रतपोजितः। तस्यैवामुचरश्चाथ स वव्रे वरमीश्वरात् ॥५४॥ विद्याः प्राप्नुहि भोगांश्च भुवि भुङ्क्ष्व शतस्तव। भविताभिमतं सर्वमिति शम्भुस्तमादिशत् ॥५५॥ ततः स गत्वा विद्यार्थी पुरं पाटलिपुत्रकम्। सिषेवे वेदकुम्भाख्यमुपाध्यायं यथाविधि ॥५६॥ ततस्तं तमुपाध्यायपत्नी जातु स्मरातुरा। हठाद् वव्रे यतः स्त्रीणां चञ्चलाश्चित्तवृत्तयः ॥५७॥ तेन सन्त्यज्य तं देशमनङ्गीकृतविप्लवः । स देवदत्तः प्रययौ प्रतिष्ठानमतन्द्रितः ॥५८॥ तत्र वृद्धमुपाध्यायं वृद्धया भार्ययान्वितम्। मन्त्रस्वाम्याख्यमभ्यर्थ्य विद्याः सम्यग्ग्रहीतवान् ॥५९॥ कृतविद्यश्च तं तत्र ददर्श नृपतेः सुता। सुसर्माख्यस्य सुभगं धीर्नाम धीरिवाच्युतम् ॥६०॥ सोऽपि तां दृष्टवान्कक्ष्यां स्थितां वातायनोपरि। विहरन्तीं विमानस्थं चन्द्रस्येवाधिदेवताम् ॥६१॥ बद्धाविव तयोरन्योन्यं भारपुद्गलया दृशा। मापसक्तुं समर्थौ तौ बभूवतुरुभावपि ॥६२॥ साप तस्यैषयाऽऽहूत्या मूर्तेयेव स्मराज्ञया। इतो निकटमेहीति सञ्ज्ञां चक्रे नृपात्मजा ॥६३॥ ततः समीप तस्याश्च ययावन्तःपुरस्य सः। सा च चिक्षेप दन्तेन पुष्पमादाय तं प्रति ॥६४॥

प्रथम लम्बक १०५

प्रथम लम्बक १०५ तब गोबिन्ददत्त ने शपथपूर्वक कहा कि मैं इन कुपुत्रों का कभी स्पर्श नहीं करता। गोबिन्ददत्त की भार्या ने भी उसी प्रकार कहा। तब वैश्वानर ने किसी प्रकार उसका आतिथ्य ग्रहण किया ।।४९-५० ।। इस घटना को देखकर गोबिन्ददत्त का एक पुत्र देवदत्त अपनी इस स्थिति पर ग्लानि के कारण पश्चात्ताप करने लगा ॥५१॥ माता-पिता के द्वारा इस प्रकार क्षेपित (तिरस्कृत) जीवन को देखकर और विरक्त होकर देवदत्त तपस्या के लिए बदरिकाश्रम को चला गया ॥५२॥ वह देवदत्त बदरिकाश्रम में पहले पत्ते खाकर, फिर धूमपान करके शिवजी को प्रसन्न करने की इच्छा से चिरकाल तक तपस्या करता रहा ॥५३॥ जब उसकी तीव्र तपस्या से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दर्शन दिये तब उसने उनसे उनका ही अनुचर होने का वर माँगा ॥५४॥ 'विद्याओं का अध्ययन करो और संसार के भोगों को भोगो तब तुम्हारी कामना सिद्ध होगी'—शिवजी ने उसे ऐसी आज्ञा दी ॥५५॥ शिवजी का आदेश प्राप्त कर देवदत्त विद्याध्ययन के लिए पाटलिपुत्र नामक नगर में आया और वेदकुंभ नामक अध्यापक की विधिपूर्वक सेवा करके पढ़ने लगा ॥५६॥ जब वह गुरु-गृह में विद्याध्ययन करता हुआ सेवा कर रहा था तब किसी समय कामातुरा गुरु-पत्नी ने हठपूर्वक उसका वरण कर लिया। खेद है कि स्त्रियों की चित्तवृत्ति चंचल होती है ॥५७॥ इस प्रकार काम-व्याकुल देवदत्त पाटलिपुत्र को छोड़कर सावधानी के साथ प्रतिष्ठान नगर को चला गया ॥५८॥ वहाँ पर उसने बड़ी शाखीवाले एक वृद्ध गुरु से प्रार्थना करके विद्याओं का अध्ययन किया ॥५९॥ प्रतिष्ठान में रहते हुए विद्वान् सुन्दर देवदत्त को एक बार नगर के राजा सुधर्मा की धी नामक कन्या ने देखा जो स्वर्ग से अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी के समान थी ॥६० ॥ उसने भी खिड़की पर खड़ी उस कन्या को इस प्रकार देखा मानो विमान पर बैठकर विहार करती हुई चन्द्रमा की अधिष्ठात्री देवी हो ॥६१॥ कामकीलित दृष्टि से परस्पर आबद्ध उन दोनों का वहाँ से हटना अशक्य हो गया ॥६२॥ तब राजकन्या ने कामदेव की मूर्तिमान् आज्ञा के समान एक अंगुली से 'यहाँ समीप आओ' ऐसा संकेत किया ॥६३॥ उधर देवदत्त राजभवन की तरफ गया उधर वह रनिवास से बाहर आई और उसने दाँतों-तले फूल दबाकर फिर उसकी ओर फेंका ॥६४॥ १४

१०६ कथासरित्सागर

१०६ कथासरित्सागर सञ्ज्ञामेतामजानानो गूढां राजसुताकृताम् । स कर्तव्यविमूढः सन्नुपाध्यायगृहं ययौ ॥६५॥ रुलोठ तत्र धरणीं न किञ्चिद्वक्तुमीश्वरः । यापन् दह्यमानोऽन्तमूकः प्रमुषितो यथा ॥६६॥ वितर्क्य कामनैश्चित्यमुपाध्यायेन धीमता । युक्त्या पृष्टः कथञ्चिन्नु यथावृत्तं शशंस सः ॥६७॥ तद्बुद्ध्वा तमुपाध्यायो विदग्धो वाक्यमब्रवीत् । दन्तेन पुष्पं मुञ्चन्त्या तया सञ्ज्ञा कृता तव ॥६८॥ यद्दन्तपुष्पवन्ताख्यं पुष्पादयं सुरमन्दिरम् । तत्रागत्य प्रतीक्षस्वा साम्प्रतं गम्यतामिति ॥६९॥ श्रुत्वेति ज्ञातसञ्ज्ञार्थः स तत्याज शुचं युवा । ततो देवगृहस्यान्तस्तस्य गत्वा स्थितोऽभवत् ॥७०॥ साप्यष्टमीं समुद्दिश्य तत्र राजसुता ययौ । एकैव देवं द्रष्टुं च गर्भागारमथाविशत् ॥७१॥ दृष्टोऽत्र द्वारपट्टस्य पश्चात्सोऽथ प्रियस्तया । गृहीतानन चोत्थाय सा कण्ठे सहसा ततः ॥७२॥ चित्रं त्वया कथं ज्ञाता सा सञ्ज्ञेत्युदितं तया । उपाध्यायेन सा ज्ञाता न मयेति जगाद सः ॥७३॥ मुञ्च मामविदग्धस्त्वमित्युक्त्वा सत्वरात्क्रुधा । म त्रमदभयात्साथ राजकन्या ततो ययौ ॥७४॥ सोऽपि गत्वा विविक्ते तां दृष्टनष्टां स्मरन्प्रियाम् । दद्यदत्तो वियोगाग्निबिगरुद्धजीवितोऽभवत् ॥७५॥ दृष्ट्वा स तादृशं दाग्भुं प्राणप्रसन्नं किलादिदात् । गणः पञ्चशिखो नाम तस्याभीप्सितसिद्धये ॥७६॥ स चागत्य समाश्वास्य स्त्रीवेषं तं गणोत्तमः । अकारयत्स्वयं चाभूद् वृद्धब्राह्मणरूपभृत् ॥७७॥ ततस्तेन समं गत्वा तं मृगममहीपतिम् । जनकं मुत्तमञ्जय्याः स जगाद गणाग्रणीः ॥७८॥ पुत्रो मे प्रोषितः क्वापि तमन्वष्टुं व्रजाम्यहम् । तमं स्नुषां निक्षेपो राजन्सम्प्रति रक्ष्यतम् ॥७९॥

राजपुत्री के गुप्त संकेत (इशारे) को न समझकर देवदत्त कर्तव्यमूढ़ होकर गुरुगृह को आया ॥६५॥ घर आकर संकोचवश कुछ कहने में असमर्थ वह देवदत्त काम-संताप से अन्दर-ही-अन्दर जलता एवं ठगा हुआ-सा मूक हो गया ॥६६॥ बुद्धिमान् आचार्य ने काम-विकारों से उसकी स्थिति को समझकर युक्ति से उससे पूछा तो उसने जो कुछ हुआ था सब कह डाला ॥६७॥ वृत्तान्त सुनकर चतुर आचार्य ने कहा- 'दाँत से फूल फेंकते हुए उसने तुम्हें सूचित किया है-॥६८॥ कि जो यह पुष्पों से शोभित पुष्पवन्त नाम का देव-मन्दिर है उसमें मेरी प्रतीक्षा करना। इस समय जाओ ॥६९॥ गुरु से यह सुनकर और संकेत का अर्थ समझकर उस युवक ने घाम का परित्याग कर दिया और उस मन्दिर के अन्दर जाकर उसकी प्रतीक्षा में बैठ गया ॥७०॥ वह राजकुमारी भी अष्टमी तिथि के कारण अकेली ही पुष्पवन्तेश्वर के दर्शन करने को मन्दिर में आई और अन्दर गई ॥७१॥ मन्दिर में जाकर उसने द्वार के किवाड़ के पीछे उस प्रियतम को देखा। उसने भी उठकर उसे सहसा गले लगा लिया ॥७२॥ राजपुत्री ने पूछा कि आश्चर्य है, तुमने संकेत को कैसे जान लिया। उसने कहा-'मैंने नहीं मेरे गुरु ने जाना'। यह सुनकर राजकन्या क्रोध करके उससे बोली- 'मुझे छोड़ो तुम मूर्ख (गँवार) हो'। ऐसा कहकर गुप्त बात के प्रकट हो जाने के भय से वह राजगृह को चली गई ॥७३-७४॥ देवदत्त भी एकान्त में जाकर, प्राप्त होकर चली गई प्रियतमा का स्मरण करता हुआ वियोग-अग्नि से विनष्टजीवन-सा हो गया ॥७५॥ पूर्व-तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने भक्त को इस प्रकार पीड़ित देखकर उसकी अभीष्ट-सिद्धि के लिए पंचशिख नामक गण को आज्ञा दी ॥७६॥ पंचशिख नामक गण ने उसे आश्वासन दिया। देवदत्त को स्त्री-वेष धारण कराया और स्वयं बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥७७॥ तब वह पंचशिख स्त्री-वेषधारी देवदत्त को साथ लेकर उस सुन्दरी के पिता राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला ॥७८॥ मेरा लड़का कहीं चला गया है मैं उसे खोजने के लिए जा रहा हूँ अतः तुम मेरी इस स्नुषा (पतोहू) को धरोहर (अमानत) के रूप में रख लो ॥७९॥

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा शापभीतेन तेनादाय सुधर्मणा। स्वकन्यान्तःपुरे गुप्ते स्त्रीति संस्थापितो युवा ॥८०॥ ततः पञ्चशिखे याते स्वप्रियान्तःपुरे वसन्। स्त्रीवेषः स द्विजस्तस्या विश्रम्भास्पदतां ययौ ॥८१॥ एकदा चोत्सुका रात्रौ तेनात्मानं प्रकाश्य सा। गुप्तं गान्धर्वविधिना परिणीता नृपात्मजा ॥८२॥ तस्यां च धृतगर्भायां तं द्विजं स गणोत्तमः। स्मृतमात्रागतो रात्रौ ततोऽप्यपवरक्षितम् ॥८३॥ ततस्तस्य समुत्सार्य यूनः स्त्रीवेषमाशु तम्। प्रातः पञ्चशिखः सोऽभूत्पूर्ववद् ब्राह्मणाकृतिः ॥८४॥ तेनैव सह गत्वा च सुधर्मानुपमभ्यधात्। अद्य प्राप्तो मया राजन्पुत्रस्तद्देहि मे स्नुषाम् ॥८५॥ ततः स राजा तां बुद्ध्वा रात्रौ क्वापि पलायिताम्। तच्छापभयसम्भ्रान्तो मन्त्रिभ्यः एवमब्रवीत् ॥८६॥ न विप्रोऽयमयं कोऽपि देवो मद्वञ्चनागतः। एवम्पाया भवन्तीह वृत्तान्ताः सततं यतः ॥८७॥ शिबिकथा तथा च पूर्वं राजाऽभूत्तपस्वी करुणापरः। दाता धीरः शिबिर्नाम सर्वसत्त्वाभयप्रदः ॥८८॥ तं वञ्चयितुमिन्द्रोऽथ कृत्वा श्येनवपुः स्वयम्। मायाकपोतवपुषं धर्ममन्वपतद्द्रुतम् ॥८९॥ कपोतश्च भयाद् गत्वा शिबेरङ्कमशिश्रियत्। मनुष्यवाचा श्येनोऽथ स च राजानमब्रवीत् ॥९०॥ राजन्भक्ष्यमिदं मुञ्च कपोतं क्षुधितस्य मे। अन्यथा मां मृतं विद्धि कस्ते धर्मस्ततो भवेत् ॥९१॥ ततः शिबिरुवाचायमेष मे शरणागतः। अत्याज्यस्तद्वदाम्यन्यं मांसमेतत्समं तव ॥९२॥ श्येनो जगाद यद्येवमात्ममांसं प्रयच्छ मे। तथेति तद्हृष्टः संस्तं राजा प्रत्यपद्यत ॥९३॥ यथा यथा च मांसं स्वमुत्कृत्यारोपयन्नृपः। तथा तथा तुलायां स कपोतोऽप्यधिकोऽभवत्।

प्रथम लम्बक १९

प्रथम लम्बक १९ यह सुनकर राजा सुशर्मा ने ब्राह्मण के शाप के भय से उस युवा को स्त्री समझकर सुरक्षित कन्या के महल में रखवा दिया॥८०॥ पंचशिख के चले जाने पर वह ब्राह्मण-कुमार देवदत्त अपनी प्रियतमा के भवन में स्त्री-वेश धारण करके रहता हुआ अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया॥८१॥ एक बार रात को उसे अत्यन्त उत्सुक देखकर देवदत्त ने अपने को प्रकट करके गान्धर्व विधि से उससे विवाह कर लिया॥८२॥ वह राजकन्या जब गर्भिणी हो गई, तब उस ब्राह्मण ने पंचशिख-यक्ष को स्मरण किया और स्मरण करते ही वह आ गया तब देवदत्त को गुप्त रूप से ले गया॥८३॥ तब प्रातःकाल पंचशिख पहले के समान ब्राह्मण का वेश बनाकर और उस जवान के स्त्री-वेष को हटाकर राजा सुशर्मा के पास जाकर बोला—'राजन् ! आज मुझे लड़का मिल गया। अब मेरी स्नुषा (पतोहू) को लौटा दो' ॥८४-८५॥ जब राजा को यह पता चला कि वह ब्राह्मण-स्नुषा कहीं भाग गई तब वह ब्राह्मण के शाप के भय से मन्त्रियों को बुलाकर परामर्श करने लगा॥८६॥ राजा ने मन्त्रियों से कहा—'यह ब्राह्मण नहीं कोई देवता है, जो मेरी परीक्षा लेने या वंचना के लिए आया है। देखा जाता है, प्रायः ऐसी बातें सर्वदा हुआ करती हैं' ॥८७॥ राजा शिबि की कथा इसी प्रकार प्राचीन युग में परम तपस्वी, दयालु, दाता धीर एवं समस्त प्राणियों को अभय देनेवाला शिबि नामक राजा हुआ। उसकी परीक्षा के लिए स्वयं इन्द्र ने बाज का रूप धारण करके कबूतर-रूपधारी धर्म का पीछा किया॥८८-८९॥ कबूतर ने बाज के भय से राजा शिबि की गोद में शरण ली। तब बाज मनुष्य की बोली में राजा से बोला—॥९० ॥ 'राजन् ! यह कबूतर मेरा भक्ष्य है। मैं भूखा हूँ। यदि तुम इसे नहीं छोड़ते तो मुझे मरा हुआ समझो। इस प्रकार मेरी हिंसा करके तुम्हें कौन-सा धर्म प्राप्त होगा ? ॥९१॥ तब शिबि ने उससे कहा कि 'यह मेरी शरण में आ गया है, इसलिए इसे अब छोड़ नहीं सकता। तुम्हारी क्षुधा-निवृत्ति के लिए इसके समान दूसरा मांस देता हूँ' ॥९२॥ बाज ने कहा— यदि ऐसी बात है, तो अपना मांस मुझे दो।' राजा ने भी प्रसन्न हो 'ऐसा ही सही' —यह कहकर इसकी बात को स्वीकार किया॥९३॥ राजा जैसे-जैसे अपना मांस काटकर तराजू पर चढ़ाता था वैसे-ही-वैसे कबूतर भारी होता जाता था॥९४॥

११० कथासरित्सागर

११० कथासरित्सागर

स्वं शरीरं सकलं तुलां राजाध्यरोपयत् । 'साधु साधु' शमं स्वतस्त्रिव्या वागुदुभूवत ॥९५॥ इन्द्रयमौ ततस्त्यक्त्वा रूपं श्येनकपोतयो । तुष्टावतश्चतुरुद्वे तं राजानं चक्षतु शिविम् ॥९६॥ दत्त्वा चास्मै वरानन्यांस्तावन्तर्धानमीयतु । एवं मामपि कोप्येष देवो जिज्ञासुरागत ॥९७॥ इत्युक्त्वा सचिवांस्त्वैरं स सुशर्मा महीपति । समुवाच भयत्रस्तं विप्ररूपं गणोत्तमम् ॥९८॥ अभयं देहि साधो स्नुषा स हारिता निशि । माययेव गता क्वापि रहस्यमाजाप्यहर्निशम् ॥९९॥ कृच्छ्रात्स दयमेवाथ विप्ररूपो गणोऽब्रवीत् । तर्हि पुत्राय राजन् देहि स्वां समभामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा शापभीतेन राज्ञा तस्मै निजा सुता । सा दत्ता देवदत्ताय तत पञ्चशिखो ययौ ॥१०१॥ देवदत्तोऽपि तां भूय प्रकाश प्राप्य वल्लभाम् । अजृम्भेऽनन्यपुत्रस्य श्वशुरस्य विभूतिषु ॥१०२॥ कालेन तस्य पुत्रं च दौहित्रमभिषिच्य स । राज्ये महीधरं नाम सुशर्मा शिश्रिये वनम् ॥१०३॥ ततो दृष्ट्वा सुतैश्वर्यं कृतार्थ स तपोवनम् । राजपुत्र्या तया साकं देवदत्तोऽप्यशिश्रियत् ॥१०४॥ तत्राराध्य पुरं शम्भुं त्यक्त्वा मर्त्यकलेबरम् । तत्प्रसादेन तस्यैव गणभावमुपागत ॥१०५॥ प्रियादन्तोऽस्मिन्मातृपुष्पारसर्गा न ज्ञातवान्यत । अत स पुष्पदन्ताख्य सम्पन्नो गणसंसदि ॥१०६॥ तद्भार्या च प्रतीहारी देव्या जाता जयाभिधा । इत्थं स पुष्पदन्ताख्यो मदाख्यामधुना शृणु ॥१०७॥

माल्यवतः पूर्वकथा

य स गोविन्ददत्ताख्यो देवदत्तपिता द्विज । तस्यैव सोमदत्ताख्य पुत्रोऽहमभवं पुरा ॥१०८॥ तेनैव मन्युना गत्वा तपश्चाहं हिमाचले । अकार्ये बहुभिर्मास्यैः शङ्कर नन्दमन्ववा ॥१०९॥

प्रथम लम्बक १११

प्रथम लम्बक १११ तब राजा ने अपना सारा शरीर तराजू पर चढ़ा दिया और 'साधु-साधु'—इस प्रकार की आकाशवाणी हुई ॥१९५॥ तब इन्द्र और धर्म ने बाज एवं कबूतर का रूप छोड़कर और प्रसन्न होकर राजा के शरीर को पहले ही जैसा अक्षत कर दिया ॥१९६॥ इसी प्रकार मेरी परीक्षा करने के लिए यह कोई देवता आया है ॥१९७॥ मन्त्रियों से इस प्रकार कहकर भय से नम्र राजा सुशर्मा उस ब्राह्मण-रूपी यक्ष से बोला— 'महाराज ! अभय-दान दो ! भली भाँति सुरक्षित वह तुम्हारी स्नुषा (पतोहू) आज की रात किसी माया के द्वारा हरण कर ली गई। क्षमा करो' ! ॥१९९॥ यह ब्राह्मण कठिनाई और दया भाव से बोला—'राजन् ! यदि ऐसा है तो मेरे पुत्र के लिए अपनी कन्या दो' ॥१ ॥ यह सुनकर शाप से त्रस्त राजा ने अपनी कन्या देवदत्त को दे दी और तब पंचशिख भी शिवलोक को गया ॥१ १॥ देवदत्त भी अपनी प्यारी राजकन्या को प्रयास-रूप से प्राप्त करके श्वशुर-संपत्ति का आनन्द लेने लगा क्योंकि राजा को उस कन्या के अतिरिक्त कोई दूसरी सन्तान न थी ॥१ २॥ कुछ समय के अनन्तर देवदत्त के पुत्र और अपने दौहित्र महीधर का राज्य में अभिषिक्त करके राजा सुशर्मा अन्तिम अवस्था में वन को चला गया ॥१ ३॥ कुछ समय के अनन्तर अपने बालक को राज्य करते हुए देखकर कृतार्थ होकर वह देवदत्त भी उस राजपुत्री के साथ तपोवन में गया ॥१ ४॥ देवदत्त तपोवन में पुनः शिवजी की आराधना करके शिवजी को प्रसन्न करके और इस मानव-देह को छोड़कर शिव का गण बन गया ॥१ ५॥ पिता के दोषों से फैले हुए पुण्य से वह गणेश का न समझ सका अतः उसका नाम पुण्यदन्त हुआ और उसकी पत्नी जया नाम से पार्वती की प्रतिहारी बन गई। अब मेरे नाम का कारण सुनो ॥१ ६ १ ७॥ माल्यवान् की पूर्वकथा मैं उसी देवदत्त के पिता गोविन्ददत्त का सोमदत्त नामक बालक था ॥१ ८॥ मैं भी उसी पश्चात्ताप के कारण घर से निकलकर हिमाचल पर तप करने लगा और उस समय बहुत-सी पुण्यशालाओं से शिवजी को प्रसन्न करता था ॥१ ९॥

११२ कथासरित्सागर

११२ कथासरित्सागर तथैव प्रकटीभूतात्प्रसन्नादिन्दुशेखरात् । त्यक्तान्यमोक्षलिप्सेन त्वद्गणत्वं मया वृतम् ॥११०॥ यत् पूजितोऽस्मि भवता स्वयमाहृतेन माल्येन दुर्गवनभूमिसमुद्भवेन । सन्माल्यवानिति भविष्यसि मे गणस्त्व- मित्यादिशच्च स विभुर्गिरिजापतिर्माम् ॥१११॥ अथ मर्त्यवपुर्विमुच्य पुण्या सहसा त्वद्गणसामहं प्रपन्नः । इति धूर्जटिना कृतः प्रसादादभिधानं मम माल्यवानीतीदम् ॥११२॥ सोऽहं गतः पुनरिहाथ मनुष्यभावं । शापेन शल्यदुहितुर्वत काणभूते ! तन् कथां हरकृतां कथयाधुना त्वं येनावयोर्भवति शापद्दोषोपशान्तिः ॥११३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके सप्तमस्तरङ्गः

अष्टमस्तरङ्गः एव गुणाढ्यवचसा सा च सप्तकथामयी । स्वभाषया कथा दिव्या कथिता काणभूतिना ॥१॥ तथैव च गुणाढ्येन पैशाच्या भाषया तया । निबद्धा सप्तभिर्वर्षैर्ग्रन्थलक्षणि सप्त सा ॥२॥ मैतां विद्याधरा हार्थुरिति तामात्मशोणितैः । अटव्यां मध्यमाबाध्य लिखन्न स महाकविः ॥३॥ तया च श्रोतुमायातैः सिद्धविद्याधरादिभिः । निरन्तरमभूत्तत्र सवितानमिवाम्बरम् ॥४॥ गुणाढ्येन निबद्धां च तां दृष्ट्वैव महाकथाम् । जगाम मुक्तशापः सन्काणभूतिर्निजां गतिम् ॥५॥ पिशाचा येऽपि तत्रासन्नन्ये तत्सहचारिणः । तेऽपि प्रापुर्दिवं सर्वे दिव्यामाकर्ण्य तां कथाम् ॥६॥ प्रतिष्ठां प्रापणीयेयं पृथिव्यां मे बृहत्कथा । मयमर्त्योऽपि मे दत्त्वा शापान्तोक्तावुदीरितः ॥७॥ तत्कथं प्रापयाम्येनां कस्मै तावत्समर्पये । इति चाचिन्तयत्तत्र स गुणाढ्यो महाकविः ॥८॥

प्रथम लम्बक ११५

प्रथम लम्बक ११५ उसी प्रकार प्रकट हुए शिवजी से मैंने सांसारिक भोगों की लिप्सा छोड़कर उनके गण होने का वर माँगा ॥११० ॥ गिरिजापति शंकर भगवान् ने मुझे यह आदेश दिया कि चूंकि तुमने वन में उत्पन्न हुए पुष्पों की मालाओं से मेरी पूजा की है, अतः तुम माल्यवान् नामक मेरे गण होओ॥१११॥ तदनन्तर पवित्र मानव-शरीर को छोड़कर मैं तुरन्त शिवजी का गण बन गया। इस प्रकार स्वयं शिवजी ने मेरा नाम माल्यवान् रखा था ॥११२॥ मैं पार्वती के शाप से इस मर्त्यलोक में पुनः मनुष्यत्व को प्राप्त हुआ। हे काणभूत ! अब तुम शिवजी की कही हुई उस कथा को कहो, जिससे मेरी और तुम्हारी—दोनों की शापावस्था समाप्त हो ॥११३॥ महाकवि श्री सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त

अष्टम तरंग

इस प्रकार गुणाढ्य के अनुरोधसे काणभूति ने अपनी पिशाच-भाषा में सात विद्याधरोंवाली वह दिव्य कथा सुनाई जो उसने पुष्पदन्त (वररुचि) से सुनी थी ॥१॥ गुणाढ्य ने सात वर्षों में—सात लाख छन्दों में—पैशाची भाषा में कही गई कथा को लिखा ॥२॥ इस कथा को कहीं विद्याधर हरण न कर लें और घोर जङ्गल में स्याही न मिलने के कारण महाबुद्धिमान् गुणाढ्य ने उसे अपने रक्त से लिखा ॥३॥ इस कथा का सुनने के लिए आये हुए सिद्ध विद्याधर आदि से भरा हुआ आकाश ऐसा मालूम होता था जैसे चँदोवा टँगा हो ॥४॥ गुणाढ्य द्वारा उस समस्त महाकथा के लिख जाने पर उसे देखकर काणभूति शापमुक्त होकर अपनी पूर्वगति को प्राप्त हुआ अर्थात् यक्ष हो गया ॥५॥ काणभूति के साथ जो उनके साथी पिशाच इस दिव्य कथा को सुन रहे थे, वे भी इसे सुनकर स्वर्ग चले गये ॥६॥ तदनन्तर महाकवि गुणाढ्य ने यह सोचा कि इस बात को अन्य बताते हुए पार्वती ने मुझसे कहा था कि पृथ्वी पर इस कथा का प्रचार करना। सो अब मैं इसका प्रचार कैसे करूँ और इसे किसे समर्पित करूँ जो इसका प्रचार कर सके ॥७-८॥

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११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर अथैको गुणदेवाख्यो नन्दिदेवाभिधः परः । तमूचतुरुपाध्याय शिष्यावनुगतावुभौ ॥९॥ तत्काव्यस्यार्पणस्थानमेकः श्रीसातवाहनः । रसिको हि वहेत्काव्यं पुष्पामोदमिवानिलः ॥१०॥ एवमस्त्विति तौ शिष्यावन्तिकं तस्य भूपतेः । प्राहिणोत्पुस्तकं दत्वा गुणाढ्यो गुणशालिनौ ॥११॥ स्वयं च गत्वा तत्रैव प्रतिष्ठानपुराद् बहिः । कृतसङ्केत उद्याने तस्थौ देवीविनिर्मिते ॥१२॥ तच्छिष्याभ्यां च गत्वा तत्सातवाहनभूपतेः । गुणाढ्यकृतिरेषेति दर्शितं काव्यपुस्तकम् ॥१३॥ पिशाचभाषां तां श्रुत्वा तौ च दृष्ट्वा तदाकृती । विद्यामदेन सासूयः स राजन्यमभाषत ॥१४॥ प्रमाणं सप्तलक्षाणि पैशाचं नीरसं वचः । शोणितेनाक्षरन्यासो धिक्पिशाचकथामिमाम् ॥१५॥ ततः पुस्तकमादाय गत्वा ताभ्यां यथागतम् । शिष्याभ्यां तद्गुणाढ्याय यथावृत्तमकथ्यत ॥१६॥ गुणाढ्योऽपि तदाकर्ण्य सद्यः खेदवशोऽभवत् । तत्त्वज्ञेन कृतावज्ञः को नामास्तं न तप्यते ॥१७॥ सशिष्यश्च ततो गत्वा नातिदूरं शिलोच्चयम् । विविक्तरम्यभूभागमग्निकुण्डं व्यधात्पुरः ॥१८॥ तत्राग्नौ पत्रमेकैकं शिष्याभ्यां साश्रु वीक्षितः । वाचयित्वा स चिक्षेप श्रावयन्मृगपक्षिणः ॥१९॥ नरवाहनदत्तस्य चरितं शिष्ययोः कृते । ग्रन्थलक्षं कथामेकां वर्जयित्वा सदीप्सिताम् ॥२०॥ तस्मिंश्च तां कथां दिव्यां पठत्यपि दहत्यपि । परित्यक्ततृणाहाराः शृण्वन्तः साश्रुलोचनाः ॥२१॥ आसन्नभ्येत्य तत्रैव निश्चला बद्धमण्डलाः । निर्जिताः पशवः सारङ्गवराहमहिषादयः ॥२२॥ अत्रान्तरे च राजाभूदस्वस्थः सातवाहनः । दोषं चास्यावदन् वैद्या दुष्कमांसोपभोगजम् ॥२३॥

प्रथम लम्बक ११५

प्रथम लम्बक ११५ तदनन्तर गुणदेव और नन्दिदेव नामक गुणाढ्य के दो शिष्यों ने गुरु गुणाढ्य से कहा ॥९॥ इस काव्य के समर्पण का एकमात्र स्थान राजा सातवाहन है। वह रसिक है। वह, फूलों की सुगन्ध को वायु जिस प्रकार फैला देती है उसी प्रकार इसका प्रसार और प्रचार कर सकता है ॥१० ॥ 'यही ठीक है'—ऐसा कहकर गुणाढ्य ने पुस्तक देकर उन दोनों गुणी शिष्यों को राजा सातवाहन के पास भेज दिया ॥११॥ और स्वयं प्रतिष्ठान-नगर के बाहर देवी-उद्यान में मिलने का संकेत करके ठहर गया ॥१२॥ गुणाढ्य के दोनों शिष्यों ने राजा सातवाहन के पास जाकर 'यह गुणाढ्य की रचना है' ऐसा कहकर वह उत्तम काव्य दिखाया ॥१३॥ उस पिशाच-भाषा को सुनकर और उन दोनों शिष्यों को पिशाचाकार देखकर विद्या- मदान्ध राजा ने द्वेष के साथ कहा—सात लाख छन्द, नीरस पिशाच-भाषा और रक्त से अक्षरों का लेखन—ऐसी इस पिशाच-कथा को धिक्कार है ! ॥१४-१५॥ तब उन शिष्यों ने पुस्तक ले जाकर, जो कुछ हुआ था सब उस गुणाढ्य को सुना दिया ॥१६॥ यह सब सुनकर गुणाढ्य को अत्यन्त खेद हुआ। तत्वज्ञ गुणग्राही व्यक्ति के द्वारा अपमान होने पर किसका हृदय संतप्त नहीं होता ॥१७॥ गुणाढ्य भी शिष्यों को साथ लेकर समीपवर्ती पर्वत पर चला गया और एक साफ़-सुथरे एकान्त स्थान में उसने एक अग्निकुण्ड बनाया ॥१८॥ गुणाढ्य बृहत्कथा के एक-एक पत्र को पढ़कर और मृग-पक्षियों को सुनाकर उसे आग में बहा देता था। शिष्य आँखों से आँसू बहाकर उसकी ओर देखते थे ॥१९॥ शिष्यों के अनुरोध से नरवाहनदत्त-चरित नामक एक भाग को उसने बचा लिया जो एक लाख श्लोकों में था ॥२०॥ जब गुणाढ्य उस दिव्य कथा के एक-एक पत्र को पढ़ रहा और जला रहा था उस समय जंगल के सभी पशु-हिरन सूअर, भैंसे आदि—झुंड में निश्चल होकर और घास चरना छोड़ कर आँसू बहाते हुए कथा को सुन रहे थे ॥२१-२२॥ इसी बीच राजा सातवाहन अस्वस्थ हो गया। वैद्यों ने बताया कि इसका कारण सूखे मांस का भोजन है ॥२३॥

आक्षिप्तास्तन्निमित्तं च सूपकारा बभाषिरे। अस्माकमीदृशं मांसं ददते लुब्धका इति ॥२४॥ पृष्टाश्च लुब्धका ऊचुर्नातिदूरे गिरावितः। पठित्वा पत्रमेकैकं कोऽप्यग्नौ क्षिपति द्विजः ॥२५॥ तत्समेत्य निराहारा शृण्वन्ति प्राणिनोऽखिलाः। नान्यतो यान्ति तन्तेषां शुष्कं मांसमिदं क्षुधा ॥२६॥ इति व्याधवचः श्रुत्वा कृत्वा तानेव चाग्रतः। स्वयं स कौतुकाद्राजा गुणाढ्यस्यान्तिकं ययौ ॥२७॥ ददर्श स समाकीर्णं जटाभिरनवभासतः। प्रशान्तशेषदापाग्निधूमिकाभिरिवाभितः ॥२८॥ अथैनं प्रत्यभिज्ज्ञाय सवाष्पमृगमध्यगम्। नमस्कृत्य च पप्रच्छ तं वृत्तान्तं महीपतिः ॥२९॥ सोऽपि स्वं पुष्पदन्तस्य राज्ञे शापादिवेष्टितम्। ज्ञानी कथावतारं समाचख्यौ भूतभाषया ॥३०॥ ततो गणावतारं च मत्वा पादानतो नृपः॥ ययाचे तां कथां तस्माद्दिव्यां हरमुखोद्गताम् ॥३१॥ अथोवाच स तं भूपं गुणाढ्यः सातवाहनम्। राजन् षड्ग्रन्थलक्षानि मया दग्धानि षट् कथाः ॥३२॥ लक्षमेकमिदं त्वस्ति कथैका सैव गृह्यताम्। मच्छिष्यौ तव चात्रतौ व्याख्यातारौ भविष्यतः ॥३३॥ इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य त्यक्त्वा योगेन तां तनुम्। गुणाढ्यः शापनिर्मुक्तः प्राप दिव्यं निजं पदम् ॥३४॥ अथ तां गुणाढ्यदत्तामादाय कथां बृहत्कथां नाम्ना। नृपतिरगाद्निजनगरं नरवाहनदत्तचरितमयीम् ॥३५॥ गुणाढ्यनन्दिदेवौ तत्र च तौ तत्कथाकवेः शिष्यौ। स्थिति-कनक-वस्त्र-वाहन-भवन-धनैः सर्वभजत् सः ॥३६॥ ताभ्यां सह च कथां तामाश्वास्य च सातवाहनस्तस्याः। तद्भाषायावतारं वक्तुं पत्र प्रथापीठम् ॥३७॥ सा च चित्ररसनिर्भरा कथा विस्मृतामरकथा कुतूहलात्। तद्विधाय नगरे निरन्तरां ख्यातिमत्र भुवनत्रये गता ॥३८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथामुखलम्बके अष्टमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं कथामुखलम्बकः प्रथमः।

राजा को सूखा मांस खिलाने के लिए डाँटे गये रसोईदारों ने कहा कि इसमें हमारा क्या अपराध है? बहेलिये जैसा मांस लाते हैं वही हम पकाते हैं ॥२४॥ शिकारी बहेलियों ने पूछने पर कहा कि यहाँ से समीप ही एक पहाड़ की चोटी पर कोई ब्राह्मण एक-एक पत्र पढ़कर अग्नि में फेंक रहा है ॥२५॥ इसलिए जंगल के समस्त प्राणी एकत्र होकर और निराहार रहकर उसे सुनते हैं। कहीं चरने के लिए नहीं जाते इसीलिए उनका मांस सूख गया है ॥२६॥ राजा व्याधों के इस प्रकार के वचन सुनकर और उन्हें ही आगे करके अत्यन्त कौतूहल के साथ गुणाढ्य के पास गया ॥२७॥ राजा ने वनवास के कारण बढ़ी हुई जटाओं से आवृत गुणाढ्य को इस प्रकार देखा मानों भस्मलेप धारण-रूपी अग्नि की पतली धूम-रेखाएँ लटक रही हैं ॥२८॥ आँसू बहाते हुए मृग-पक्षियों के मध्य बैठे हुए गुणाढ्य को पहचानकर राजा ने नमस्कार किया और सब समाचार पूछा। गुणाढ्य द्वारा बृहत्कथा का वृत्तान्त सुनकर और गुणाढ्य को माल्यवान् नामक शिव-गण का अवतार जानकर राजा पैरों पर गिर पड़ा और उसने शिवजी के मुख से निकली हुई वह दिव्य कथा उससे माँगी ॥३०-३१॥ गुणाढ्य ने राजा सातवाहन से कहा—'राजन्, छह लाख श्लोकों में लिखी गई छह कथाएँ मैंने जला दीं ॥३२॥ एक लाख श्लोक की एक कथा यह बची है—इसे ले लो। मेरे ये दोनों शिष्य इस कथा के व्याख्याता होंगे ॥३३॥ ऐसा कहकर और योग-समाधि द्वारा अपने मानव-शरीर का त्याग कर शाप-मुक्त गुणाढ्य ने अपने पूर्व पद को प्राप्त किया ॥३४॥ तदनन्तर राजा सातवाहन गुणाढ्य द्वारा दी गई नरवाहनदत्त-चरितमयी बृहत्कथा नामक वह कथा प्रसन्नतापूर्वक लेकर अपने नगर में आया ॥३८॥ राजा ने नगर में आकर, गुणाढ्य के शिष्य गुणदेव और नन्दिदेव को भूमि धन वस्त्र वाहन भवन धन आदि देकर उनकी सेवा की ॥३९॥ राजा सातवाहन ने उन दोनों शिष्यों की सहायता से उस कथा के प्रचार के लिए उसका देश-भाषा में अनुवाद कराकर कथापीठ की रचना की ॥४०॥ विचित्र रसों से परिपूर्ण एवं देव-कथाओं को भुला देनेवाली यह कथा नगर में निरन्तर प्रसिद्ध होती हुई क्रमशः सारे भूमण्डल में प्रसिद्ध हो गई ॥४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त कथासरित्सागर का प्रथम लम्बक समाप्त

कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः

कथामुख नाम द्वितीयो लम्भकः ५८ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धोदयं धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्गः सहस्रानीककथा गौरीनखपरिश्वङ्ग विमो स्वेदाम्बु पातु वः। नेत्रान्निमील्या कामेन बाणशास्त्रमिवाहितम्॥१॥ कैलासे धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्तं गणोत्तमम्। तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले॥२॥ काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्। यत्प्राप्तं शृणुतै तच्च विद्याधरकथाद्भुतम्॥३॥ अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोच्छ्रितश्रिये। स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ॥४॥ कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी। लक्ष्मीविलासवसतिर्भूतलस्येव कर्णिका॥५॥ तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः। जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः॥६॥ अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्याविपुष्टयोर्जुनः। त्रिपुरारि भुजस्तम्भ दृष्ट दोर्दण्डविक्रमः॥७॥ अभवद् भूरिभूतस्य राज्ञी विष्णुमती तथा। एका रत्नानि सुपुवे न तावदपरा सुतम्॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक (मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्धारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए) प्रथम तरङ्ग राजा सहस्रानीक की कथा पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानों कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर वारुणास्त्र छोड़ा हो¹॥१॥ कैलाश में शिवजी के मुख से पुष्पदन्त गण को, पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य दन्त से काणभूति को, काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२, ३॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा सची के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है॥४॥ उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका (कर्णभूषण) के समान है॥५॥ उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय का पुत्र, परीक्षित् का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था॥६-७॥ उस शतानीक की दो रानियां थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी, किन्तु दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया॥८॥ १ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः उनके संवग के समय उसने आप बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी वारुणास्त्र का रखना आवश्यक समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है। अतः, कवि ने उस पर जलमय वारुणास्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है। २ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं, ऐसी शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी महत्त्वपूर्व परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान् शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः

कथामुखं नाम द्वितीयो लम्बकः १५ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति य विगतविघ्नलब्धर्द्धय धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ये ॥

प्रथमस्तरङ्गः सहस्रानीककथा गौरीनवपरिष्वङ्गे विभो र्स्वेदाम्बु पातु वः। नेत्राग्निभीरुणा कामेन वारुणास्त्रमिवाहितम् ॥१॥ कैलास धूर्जटेर्वक्त्रात्पुष्पदन्त गणोत्तमम्। तस्माद् वररुचीभूतात् काणभूतिं च भूतले ॥२॥ काणभूतेर्गुणाढ्यं च गुणाढ्यात्सातवाहनम्। यत्प्राप्तं शृणुतेदं तच्च विद्याधरकथामृतम् ॥३॥ अस्ति वत्स इति ख्यातो देशो दर्पोपशाम्यये। स्वर्गस्य निर्मितो धात्रा प्रतिमल्ल इव क्षितौ ॥४॥ कौशाम्बी नाम तत्रास्ति मध्यभागे महापुरी। लक्ष्मीविलासकसतिर्भूतलस्येव कर्णिका ॥५॥ तस्यां राजा शतानीकः पाण्डवान्वयसम्भवः। जनमेजयपुत्रोऽभूत्पौत्रो राज्ञः परीक्षितः ॥६॥ अभिमन्युप्रपौत्रश्च यस्यादिपुरुषोऽर्जुनः। त्रिपुरारि भुजस्तम्भ धृष्ट दोर्दण्डविक्रमः ॥७॥ कलत्रं भूरभूत्तस्य राज्ञी विष्णुमती तथा। एका रहसि सुषुवे स तावदपरा सुतम् ॥८॥

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक

कथामुख नामक द्वितीय लम्बक (मङ्गल-श्लोक का अर्थ ग्रन्थारम्भ के प्रथम पृष्ठ पर देखना चाहिए) प्रथम तरंग राजा सहस्रानीक की कथा पार्वती के प्रथम आलिङ्गन के समय उत्पन्न शिवजी के स्वेद-कण आपकी रक्षा करें जो स्वेद-कण ऐसे मालूम होते हैं मानो कामदेव ने शिवजी के नेत्र की अग्नि के भय से उनपर बाणत्रास छोड़ा हो¹॥१॥ कैलास में शिवजी के मुख से पुण्यवन्त गण को पृथ्वी पर वररुचि के रूप में अवतीर्ण पुण्य गण से काणभूति को काणभूति से गुणाढ्य को और गुणाढ्य से राजा सातवाहन को क्रमशः प्राप्त इस विद्याधर-कथा² रूपी अमृत को सुनिए ॥२-३॥ स्वर्ग के अभिमान को दूर करने के लिए विधाता द्वारा उसी के समान पृथ्वी पर निर्माण किया गया वत्स नामक देश है ॥४॥ उस देश के मध्यभाग में अत्यन्त समृद्ध कौशाम्बी नाम की नगरी भूमि की कर्णिका (कर्णभूषण) के समान है॥५॥ उस नगरी में पाण्डव-वंश में उत्पन्न शतानीक नामक राजा राज्य करता था जो जनमेजय का पुत्र परीक्षित का पौत्र और अभिमन्यु का प्रपौत्र था। इस वंश का आदि पुरुष अर्जुन था जिसने शिवजी के स्तम्भ के समान बाहुदण्डों का पराक्रम देखा था ॥६-७॥ उस शतानीक की दो रानियाँ थीं। एक (पृथ्वी) रत्नों को उत्पन्न करती थी किन्तु दूसरी ने पुत्र को उत्पन्न नहीं किया ॥८॥ १ शिवजी के तृतीय नेत्र की अग्नि-ज्वाला से कामदेव भस्म हो गया था। अतः पुनः उनके संगम के समय उसने आग बुझाने के लिए अग्नि-विरोधी बाणशस्त्र का रचना आवश्यक समझा जो जलमय है। नववधू के नव समागम में स्वेद का अधिक मात्रा में होना स्वाभाविक है। अतः, कवि ने उस पर जलमय बाणशस्त्र की सुन्दर उत्प्रेक्षा की है। २ श्रद्धेय और प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा कही गई बातें आदरणीय होती हैं ऐसी शिष्ट-परम्परा है। उसी के अनुसार इस विद्याधर-कथा की प्रामाणिकता के लिए गुणाढ्य ने उसकी शृङ्खलापूर्ण परम्परा की सूचना दी है कि यह कथा मेरी कल्पित नहीं प्रत्युत इसका उद्गम भगवान् शिव के मुख से हुआ है।—अनु.

एकदा मृगयासङ्गाद् भाग्यवशाच्चास्य भूपतेः । अभूच्छाण्डिल्यमुनिना समं परिचयो वने ॥९॥ सोऽप्य पुत्रार्थिनो राज्ञः कौशाम्बीमेत्य साक्षितम् । मन्त्रपूतं चरं राज्ञीं प्राधायन्मुनिसत्तमः ॥१०॥ सनस्तस्य सुतो जज्ञे सहस्रानीकसंज्ञकः । शुशुभे स पिता तेन विनयन गुणो यथा ॥११॥ यवराज्ञं क्रमात्कृत्वा शतानीकोऽथ तं सुतम् । सम्भोगैरैव राजाभून्न तु भूभारखिन्नधीः ॥१२॥ अथासुरैः समं युद्धे प्राप्ते साहाय्यकञ्च्छया । दूतमस्त्यं विमुञ्चोभूदिन्द्रो यत्प्रण मातलिः ॥१३॥ सतां युगन्धराख्यस्य हस्ते धूपम्य मन्त्रिणः । सुप्रतीकाभिधानस्य मुख्यमन्तान्तरस्य च ॥१४॥ समर्प्य पुत्रं राज्यं च निहन्तुममुरान् रणे । शक्रान्तिकं शतानीकः सह मातलिना ययौ ॥१५॥ अगुणन् यमदंष्ट्रानीन्यहन्प्रत्यति यागवे । हत्वा तत्रत्यं गत्वाशं प्राप भूत्युं स भूपतिः ॥१६॥ मातन्यानोयवेहं च देवी तं नृपमन्वगात् । राज्यलक्ष्मीश्च तत्पुत्रं सहस्रानीकमश्रयत् ॥१७॥ पित्र्यं तस्मिन्गतान्द्रे पित्र्यं सिंहासनं नृपः । भरन् शक्ता गजा दिक्षु भनिमाययुः ॥१८॥ सन्तं चरा गृह्णन्तु वियोगिप्रशयोगतम् । न्यस्य गङ्गाशनात्स विनाय प्रत्यं मातलिम् ॥१९॥ स तत्र मन्दनं दक्षान् क्रीडन् कामिनीगणान् । दृष्ट्वा वियोगिनिभार्यार्थी राजा शर्मविवाविन्दत् ॥२०॥ विद्याधामभिश्राय गन्धर्वाणां यागवे । गन्धर्वश्च विशाखः प्रादुर्बभूव तव योगतः ॥२१॥ उत्पन्ना किरिणो भार्या तुल्या सा पूर्वनिर्मिता । इयं च शृणु वृत्तान्तमथ स वक्तुमारभत् ॥२२॥ मृगावतीविवाहप्रबन्धः पुरं त्रिभुवने श्लाघ्यामलकाख्यं जगत्त्रयम् । रिपुभ्यो नाम यस्याश्च ममरूश्चाप्युपागमत् ॥२३॥