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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सूर्यप्रभ द्वारा सम्मानिता जया इतना कहकर अन्तर्हित हो गई। सुमेरु ने भी उसी दिन शीघ्रता पूर्वक लग्न का निश्चय किया और वहीं पर उत्तुंग महामूल्य रत्नों के स्तम्भों तथा छतों से युक्त सुन्दर वेदी बनवाई। रत्नों की चमकीली लाल किरणों से मानों वेदी सब ओर से अग्नि द्वारा छाई हुई-सी लग रही थी ॥१२९-३१ ॥ वहीं उसने अपनी सुन्दरी कन्या कामचूड़ामणि को बुलवाया जिसके लावण्य को चंचल होकर देवता और असुर सभी अपने नेत्रों से पी रहे थे ॥१३२॥ उमा हिमालय से उत्पन्न हुई थी और यह सुमेरु से। मानो इसीलिए वह पार्वती के समान सुन्दरी थी ॥१३३॥ तदनन्तर, विवाह-वेश में सजी हुई कन्या को सुमेरु ने वेदी पर बैठाकर उसे सूर्यप्रभ को प्रदान कर दिया ॥१३४॥ सूर्यप्रभ ने भी तन्तु आदि के द्वारा बाँधे गये कामचूड़ामणि के हाथ को ग्रहण किया ॥१३५॥ पहले लाजा-होम के समय उसी क्षण आई हुई और पार्वती द्वारा भेजी गई जया ने मन्दरो नाम की दिव्य माला उसे प्रदान की। सुमेरु ने भी अनन्त और अमूल्य रत्न उस अवसर पर प्रदान किए और ऐरावत से उत्पन्न सुन्दर हाथी भी प्रदान किया ॥१३६-१३६॥ दूसरे लाजा-होम के समय जया ने एक रत्नों की माला भेंट की जिसके गले में रहने पर मृत्यु, भूख और प्यास का कष्ट नहीं होता था ॥१३७॥ सुमेरु ने भी पहले से अधिक धनराशि और उच्चैश्रवा से उत्पन्न घोड़े का बच्चा प्रदान किया ॥१३८॥ तीसरे लाजा-हवन के समय जया ने मोतियों की एक लड़ीवाली माला दी। जिसके गले में रहने से यौवन का क्षय नहीं होता था ॥१३९॥ और, सुमेरु ने भी तिगुनी धनराशि और सब प्रकार की सिद्धियों के उपयोग में आनेवाली एक अँगूठी दी ॥१४० ॥ इस प्रकार, विवाह-संस्कार पूर्ण होने पर सुमेरु ने सुरों असुरों विद्याधरों और दैवमाताओं से इस प्रकार निवेदन किया ॥१४१॥ आज आप लोगों को मेरे घर पर भोजन करना चाहिए और मुझ पर कृपा करनी चाहिए। मैं सिर पर अंजलि बाँधकर आप लोगों से निवेदन करता हूँ ॥१४२॥ उन सब ने जब भोजन करना न चाहा, तब शिवजी का नन्दी वहाँ आकर उपस्थित हुआ ॥१४३॥

४४० कथासरित्सागर

४४० कथासरित्सागर स तानवादीद्व्रजतानादिष्टं वस्त्रिशूलिना। गृहे सुमेरोर्भोक्तव्यमेष ह्यात्मपरिग्रहः ॥१४४॥ एतदङ्गेषु भुक्तेषु तृप्तिः स्याच्छाश्वती च वः। इति तन्वियुक्ताञ्छ्रुत्वा सर्वे तत्प्रतिपेदिरे ॥१४५॥ ततोऽत्राजग्मुरमिताः शङ्करप्रहिता गणाः। विनायकमहाकालवीरभद्राद्यधिष्ठिताः ॥१४६॥ ते च भोजनसज्जां तां वेदिं कृत्वा यथाक्रमम्। तानुप्रावेशयन्देवद्युचरासुरमानुषान् ॥१४७॥ उपाहरन्त तेभ्यश्च विद्याकल्पान्सुमेरुणा। आहाराञ्छङ्करादिष्टकामधेनूद्भवांस्तथा ॥१४८॥ एकैकस्य यथार्हं च तत्स्फुरिच्छाविधायिनः। वीरभद्रमहाकालभृङ्गिप्रभृतयः सुराः ॥१४९॥ पदे पदे च सन्तोषमिलद्वधूपरचारणम्। तथा सङ्गीतकमभूद्दिव्यस्त्रीनृत्यसुन्दरम् ॥१५०॥ आहारान्ते च सर्वेषां तेषां नन्दीश्वरादयः। ददुर्दिव्यानि माल्यानि वस्त्राण्याभरणानि च ॥१५१॥ एवं सम्मान्य देवादीन्नन्दिप्रभृतयोऽखिलाः। गणेश्वरा गणैः सर्वैः सह जग्मुर्यथागतम् ॥१५२॥ ततो देवासुरा सर्वे सार्धं तन्मातरो ययुः। श्रुतशर्मादयस्ते चाप्यामन्त्र्य स्वं स्वमास्पदम् ॥१५३॥ सूर्यप्रभः सभार्यश्च सवयस्यवधूयुतः। विमानेन ययावाद्य तत्सुमेस्तपोवनम् ॥१५४॥ प्रेषयामास हर्षं च स्ववयस्य महीभृताम्। रत्नप्रभस्य च भ्रातुराख्यातुमुदयं निजम् ॥१५५॥ दिनान्ते च स सद्रत्नपर्यङ्के साधुनिर्मितम्। कामचूडामणेर्बध्वा वासवेश्म विवेश तत् ॥१५६॥ तत्रैतां च वनाश्लेषवदानच्छत्रसञ्ज्नने। त्याजयित्वा शनैर्लज्जां नवोढासुलभां क्रमात् ॥१५७॥ अनिर्वाच्यं मवं मुग्धविदग्धमधुरं रतम्। अनास्वादितमन्यान्यं सिषेवे स तया सह॥१५८॥

अष्टम लम्बक ४४१

अष्टम लम्बक ४४१ वह प्रणाम करते हुए उन सब से कहने लगा-'शिवजी ने आप लोगों को आदेश दिया है कि आप लोगों को सुमेरु के घर पर भोजन करना ही चाहिए, क्योंकि वह हमारा आत्मीय व्यक्ति है ।।१४४।। उसके तृप्त होने पर आप लोगों को शाश्वत तृप्ति होगी। नन्दी के मुख से यह सुनकर सबने भोजन करना स्वीकार किया ।।१४५।। तदनन्तर विनायक, महाकाल और वीरभद्र की प्रमुखता में अनन्त गण वहाँ आ गये ।।१४६।। उन सबों ने भोजन तैयार करके देव, दैत्य, विद्याधर और मनुष्य एवं अतिथियों को सम्मान-सहित क्रम से बैठाया ।।१४७।। और सुमेरु द्वारा विद्या-बल से तैयार किये गये तथा शिवजी के आदेश से कामधेनु द्वारा उत्पन्न किये गये विविध प्रकार के भोजन उनके सामने परोसे गये ।।१४८।। और, एक-एक अतिथि के लिए उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार सेवा के निमित्त वीरभद्र, महाकाल, भृङ्गी प्रभृति देवता संलग्न हो गये ।।१४९।। बीच-बीच में प्रेम और सन्तोष से मिलते हुए आकाशचारियों के चारणों के गान और विद्याधरियों के नृत्य उनका मनोरंजन करते रहे ।।१५०।। भोजन के अनन्तर नन्दीश्वर आदि गणों ने उन्हें दिव्य मालाएँ, वस्त्र और आभूषण आदि प्रदान किये ।।१५१।। तब नन्दी आदि गणों ने सभी देवताओं का सम्मान किया। वे सभी अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर जहाँ से आये थे, वहीं लौट गये ।।१५२।। और सभी असुर तथा विद्याधर भी सूर्यप्रभ से आज्ञा पाकर अपने-अपने स्थानों को गये ।।१५३।। सूर्यप्रभ भी अपने मित्रों तथा नववधू के साथ सुमेरु के प्राचीन आश्रम में लौट आया ।।१५४।। तदनन्तर, उसने अपने मित्र दृढ़ को राजाओं तथा अपने भाई रत्नप्रभ के पास अपनी स्थिति का समाचार देने के लिए भेजा ।।१५५।। और, सायंकाल के अनन्तर वह सूर्यप्रभ सुन्दर रत्नों के पर्यङ्क से सजे हुए और सुन्दर बने हुए कामचूड़ामणि के वास भवन में प्रविष्ट हुआ ।।१५६।। वहाँ पर गाढ़ आलिङ्गन, चुम्बन और मर्दन आदि से उसकी नई-नई लज्जा को क्रमशः दूर कराकर उस नवोढ़ा काम-कला-वित् के साथ अनिर्वचनीय नवीन तथा दूसरी पत्नियों से अनास्वादित आनन्द-उपभोग में उसने रात्रि व्यतीत की ।।१५७-१५८।। ५६

इदानीं बहिरन्यासां निवेशो हृदयेऽस्तु मे। अन्तः पुनस्त्ववैकस्या इति तां चान्वरञ्जयत् ॥१५९॥ ततो रतान्तसुप्तस्य प्रियाश्लेषसुखावहा। शनैः समाप्तिमगमन्निशा निद्रा च तस्य सा ॥१६०॥ प्रभाते च स उत्थाय गत्वा सूर्यप्रभस्ततः। आद्यास्ता रञ्जयामास निजभार्याः सह स्थिताः ॥१६१॥ तास्तं नववधूरक्तं यावत्परिहसन्ति च। सनर्मवक्रमधुरस्निग्धमुग्धैर्वचःक्रमैः ॥१६२॥ द्वाःस्थेनावेदितस्तावदागत्य प्रणिपत्य च। विद्याधरः सुषेणाख्यः कृतिनः स व्यजिज्ञपत् ॥१६३॥ देव त्रिकूटनाथाद्यैः सर्वैर्विद्याधरेश्वरैः। प्रेषितोऽस्मीहैवं च देव विज्ञापयन्ति ते ॥१६४॥ ऋष्यमाद्रौ तृतीयेऽह्नि ह्यभिषेकः शुभस्तव। संपाद्यतां तत्सर्वेषामुद्यमोऽत्र विधीयताम् ॥१६५॥ तच्छ्रुत्वा प्रत्यवोचत्तं दूतं सूर्यप्रभस्तदा। गच्छ त्रिकूटाधिपतिप्रभृतीन्ब्रूहि मद्गिरा ॥१६६॥ भवन्त एव कुर्वन्तु समारम्भं वदन्तु च। आत्मनश्च परं सज्जा वयमत्र स्थिताः पुनः ॥१६७॥ संपादनं तु सर्वेषां करिष्यामो यथायथम्। इत्यात्तप्रतिसन्देशः सुषेणः स ततो ययौ ॥१६८॥ सूर्यप्रभोऽपि चैकैकं प्रभासप्रभृतीन्सखीन्। देवानां याज्ञवल्क्यादिमुनीनां भूभृतां तथा ॥१६९॥ विद्याधरासुराणां च विससर्ज पृथक्पृथक्। निमन्त्रणाय सर्वेषां स्वाभिषेकमहोत्सवे ॥१७०॥ स्वयं जगाम चैकाकी कैलासं पर्वतोत्तमम्। हरस्य चाम्बिकायाश्च निमन्त्रणकृतोद्यमः ॥१७१॥ आरोहंश्च तमद्राक्षीच्छुभ्रभूतिसितं गिरिम्। सेव्यं श्वर्षिसिद्धानां द्वितीयमिव शङ्करम् ॥१७२॥ मर्यादधिश्वमार्गश्च दुरारोहं छत परम्। स तं पश्यन्ददर्शाथ वैद्रुमं द्वारमेकतः ॥१७३॥

मध्यम लम्बक ४४३

मध्यम लम्बक ४४३ सूर्यप्रभ ने कामचूड़ामणि से कहा- अब अन्य स्त्रियों का स्थान हृदय के बाहर रहेगा किन्तु हृदय के भीतर तो केवल तुम्हारा ही स्थान है। इस प्रकार की बातें करते हुए सूर्यप्रभ ने उसे प्रसन्न किया ॥१५९॥ तदनन्तर प्रिया के आलिंगन से सुख देनेवाली उसकी नींद और रात्रि दोनों साथ ही समाप्त हुईं ॥१६०॥ प्रातःकाल उठकर सूर्यप्रभ ने आकर एक साथ बैठी हुई पहले की स्त्रियों से मिलकर वार्तालाप आदि से उन्हें प्रसन्न किया ॥१६१॥ वे रानियाँ व्यंग्योक्तियों चुटकियों तथा हास्यपूर्ण वचनों से नववधू के प्रति अनुरक्त सूर्यप्रभ को जब विविध प्रकार से बना रही थीं, इतने में ही द्वारपाल द्वारा आकर और प्रणाम करके सूर्यप्रभ सूचित किया गया और सुषेण नाम के विद्याधर ने सफल हुए सूर्यप्रभ से कहा- 'महाराज त्रिकूटनाथ आदि सभी विद्याधर-राजाओं ने मुझे आपके समीप भेजा है। वे लोग आपसे निवेदन करते हैं-॥१६२-१६४॥ 'कि आज से तीसरे दिन ऋषभ पर्वत पर आपका अभिषेक शुभ है। इसकी सबको सूचना दीजिए और उसके लिए तैयारी कीजिए' ॥१६५॥ यह सुनकर सूर्यप्रभ ने दूत से कहा-'जाओ त्रिकूटदेवों को मेरी ओर से कहो कि इस उत्सव का आयोजन आप लोग ही करें। और, लोगों को भी आप ही सूचित करें। हम स्वयं तैयार होकर बैठे हैं॥१६६-१६७॥ यथावकाश हम भी सबको सूचित करेंगे ही। इस प्रकार, प्रतिसन्देश लेकर दूत सुषेण चला गया ॥१६८॥ सूर्यप्रभ ने भी प्रभास आदि एक-एक मित्र को देवताओं को याज्ञवल्क्य मुनि को राजाओं को विद्याधरों को और असुरों को पृथक्-पृथक् सूचना देकर अपने अभिषेक-महोत्सव में निमन्त्रित कराया ॥१६९-७०॥ और, स्वयं अकेला शिव और पार्वती को निमन्त्रण देने के लिए कैलास पर्वत पर गया ॥१७१॥ सूर्यप्रभ ने देव ऋषि सिद्ध आदि से सेवित उस कैलाश पर्वत पर जाते हुए दूसरे शंकर के समान स्वच्छ और शुभ कैलासपति को देखा ॥१७२॥ आधे से अधिक चढ़ने पर उसने पर्वत के शिखर पर जाना कठिन समझा और सामने ही एक ओर विद्रुम मणि से बने हुए द्वार को देखा ॥१७३॥

४४४ कथासरित्सागर

४४४ कथासरित्सागर यदा प्रवेशं नैवात्र सिद्धिमानप्यवाप सः। तदैकाग्रेण मनसा स्तौति स्म शशिशेखरम्॥१७४॥ ततस्तद्द्वारमुद्घाट्य पुमान्गजमुखोऽब्रवीत्। एहि प्रविश तुष्टस्ते हेरम्बो भगवानिति॥१७५॥ ततः सूर्यप्रभस्तत्र प्रविश्यान्तं सविस्मयः। उपविष्टे महाभोगे ज्योतिरत्नसिंहासने॥१७६॥ द्वादशादित्यसंकाशमेकदंष्ट्रं गजाननम्। लम्बोदरं त्रिनेत्रं च ज्वलत्परशुमुद्गरम्॥१७७॥ विनायकं परिवृतं नानाप्राणिमुखैर्गणैः। ददर्श च ववन्दे च पादयोः प्रणिपत्य तम्॥१७८॥ सोऽपि तं विघ्नजित्प्रीतः पृष्ट्वागमनकारणम्। आरोहानेन मार्गेणेत्यवोचत्स्निग्धया गिरा॥१७९॥ ततः सूर्यप्रभः सोऽन्यामारूढः पञ्चयोजनीम्। पद्मरागमयं द्वारमपश्यदपरं महत्॥१८०॥ अनवाप्तप्रवेशश्च तत्रापि स पिनाकिनम्। देवं नामसहस्रेण तुष्टावानन्यमानसः॥१८१॥ ततः कुमारपुत्रेण स्वयं द्वारं विवृत्य तत्। उक्तात्मना विधातास्यनान्तः प्रावेश्यतात्र सः॥१८२॥ प्रविष्टश्च ददर्शात्र स्कन्दं ज्वालामहद्युतिम्। युक्तं शाखविशाखाद्यैः सदृशैः पञ्चभिः सुतैः॥१८३॥ स जातमात्रप्रतीवृष्टप्रहृष्टिशिशुग्रहैः। वृतं तं कोटिसंख्याकैर्गजैश्चेश्वरजानतैः॥१८४॥ सेनापि परितुष्टेन पृष्ट्वा कारणमागमे। तस्यारोहणमार्गोऽत्र व्यादिष्टः सरलात्मना॥१८५॥ एवं क्रमेण चान्यानि रत्नद्वाराणि पञ्च सः। सभैरवमहाकालवीरभद्रैः स नन्दिना॥१८६॥ भृङ्गिणा चामुरैः साकं निरुद्धानि यथाक्रमम्। अतीत्य प्राप पृष्ठेऽग्रे स्फाटिकं द्वारमुत्तमम्॥१८७॥ ततः स्तुवन्देवदेवं रुद्रेणैकेन सादरम्। प्रवेशितस्तदद्राक्षीच्छम्भोः स्वर्गाधिकं पदम्॥१८८॥

अष्टम लम्बक ४४५

अष्टम लम्बक ४४५ जब सिद्धि-सम्पन्न सूर्यप्रभ भी द्वार में प्रवेश नहीं प्राप्त कर सका तो वह एकाग्र चित्त से शिवजी की स्तुति करने लगा ॥१७४॥ तब द्वार को खोलकर हाथी के मुखवाले एक पुरुष ने उससे कहा—'आओ प्रवेश करो। तुम पर भगवान् हेरम्ब प्रसन्न हैं'॥१७५॥ उस द्वार में प्रवेश करते हुए आश्चर्य-चकित सूर्यप्रभ ने अति विस्तृत ज्योतिर्मय शिला पर बैठे हुए, बारह सूर्यों के समान चमकते हुए, एक दंतवाले लम्बे पेटवाले और तीन नेत्रोंवाले गणेशजी को देखा जिनके हाथ में परशु, कुल्हाड़ा और गदा चमक रहे थे ॥१७६-१७७॥ वे विनायक भिन्न-भिन्न मुखोंवाले गणेशों से घिरे हुए थे। सूर्यप्रभ ने उन्हें देखा और उनके चरणों में नम्र होकर प्रणाम किया ॥१७८॥ विनायक ने भी सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछा और स्नेहपूर्ण वाणी से कहा कि 'इस मार्ग से चढ़ो। सूर्यप्रभ उनके बताये हुए मार्ग से पाँच योजन (बीस कोस) और ऊपर चढ़ गया तथा उसने पद्मराग मणि के दूसरे बड़े द्वार को देखा। वहाँ भी उसने प्रवेश न पा सकने के कारण एकाग्रचित होकर और अनन्य भाव से पिनाकपाणि महादेव की शिवसहस्रनाम से स्तुति की ॥१७९-१८१॥ स्वामी कार्तिक के विशाख नामक पुत्र ने स्वयं द्वार खोला और अपना परिचय देकर उसे भीतर प्रवेश कराया। भीतर जाकर उसने अग्नि की स्वाहा के समान दमकते हुए विशाख शाख आदि पाँच पुत्रों से युक्त उत्पन्न होते ही नम्र दुष्ट ग्रहों तथा बालग्रहों से चरणों पर प्रणाम करते हुए करोड़ों गणेशों से सेवित कुमार स्वामी को देखा ॥१८२-१८४॥ उन्होंने सूर्यप्रभ से आने का कारण पूछकर उसे ऊपर चढ़ने का मार्ग बता दिया ॥१८५॥ इसी प्रकार महाकाल वीरभद्र नन्दी और भृंगी गणों से रक्षित अन्य पाँच रत्नों के द्वार को पार करते हुए स्फटिक मणि के विशाल द्वार को उसने देखा ॥१८६-१८७॥ वहाँ पर देवदेव महादेव की स्तुति करते हुए उसे एकादश रुद्रों में से एक रुद्र ने द्वार खोलकर आदर के साथ भीतर प्रवेश कराया और उसने स्वर्ग से भी अधिक सुन्दर शिवधाम का दर्शन किया ॥१८८॥

४४६ कथासरित्सागर

४४६ कथासरित्सागर विष्वग्गन्धवहुद्धात सदापुष्पफलद्रुमम्। गन्धर्वरूपसङ्गीतमप्सरोनृत्तोत्सवम् ॥१८९॥ तमेकदेशे स्फटिकमयसिंहासने स्थितम्। त्रिलोचनं शूलपाणिं स्वच्छस्फटिकसन्निभम् ॥१९०॥ बद्धपिङ्गटाजूटं चारुचन्द्रार्धशेखरम्। पार्श्वस्थया गिरिजया भगवत्योपसेवितम् ॥१९१॥ सूर्यप्रभः स सानन्दं पश्यति स्म महेश्वरम्। उपेत्य चापतत्तस्य सप्रतीकस्य पादयोः ॥१९२॥ ततः पृष्ठे करं दत्त्वा समुत्थाप्योपवेश्य च। किमर्थमागतोऽसीति पप्रच्छ भगवान्हरः ॥१९३॥ प्रत्यासन्नोऽभिषेको मे सन्निधानं तदर्हथ। प्रभोस्तत्रेति तं सूर्यप्रभः प्रत्यब्रवीच्च सः ॥१९४॥ ततः शम्भुरुवाचेममियान्क्लिष्टोऽसि तद्धि किम्। सन्निधानाय किं पुत्र तत एवास्मि न स्मृतः ॥१९५॥ तवस्तु सन्निधास्याहमित्युक्त्वा भक्तवत्सलः। सोऽन्तिकस्थितमाहूय गणमेकं समादिशत् ॥१९६॥ गच्छैतमभिषेकार्थमृषभं पर्वतं नय। महाभिषेकस्थानं हि तद्देशां चक्रवर्तिनाम् ॥१९७॥ इत्यादिष्टो भगवता स तं सूर्यप्रभं गणः। प्रदक्षिणीकृतेशामनुत्सङ्गे व्रजतोऽग्रहीत् ॥१९८॥ नीत्वा संस्थापयामास तस्मिन्नृषभपर्वते। स्वसिद्ध्या रत्नशृङ्गेनैव ययौ चादर्शनं ततः ॥१९९॥ सूर्यप्रभस्य चात्रस्थाः समाययुः स्ववयस्यकाः। कामचूडामणिमुखा भार्या विद्याधराधिपाः ॥२००॥ सेन्द्राश्च देवा असुराः समयाता महर्षयः। श्रुतधर्मा सुमेरुश्च स सुवासकुमारकः ॥२०१॥ सूर्यप्रभश्च सर्वांस्तान्यथोचितममानयत्। उक्तप्रहादिवृतान्तमभ्यनन्दंश्च तेऽपि तम् ॥२०२॥ अथ विविधौषधिसहितं नवीनवान्भोधिदीर्घसम्भूतम्। मणिकनकमयैः कुम्भैः स्वयमानिन्युर्जलं प्रभासाद्याः ॥२०३॥

अष्टम लम्बक ४४७

अष्टम लम्बक ४४७ जिस धाम में दिव्य पुरुषों के झुंड वृक्षों पर झूल रहे थे और वृक्ष पुष्पों से लदे हुए थे। वहाँ गन्धर्व गान कर रहे थे और अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं॥१८६॥ वहीं एक ओर सूर्यप्रभ ने स्फटिक के सिंहासन पर बैठे हुए, तीन नेत्रोंवाले हाथ में शूल लिये हुए, चमकते हुए स्फटिक के समान स्वच्छ पीली जटाओं को बाँधे हुए, सुन्दर अर्धचन्द्र से शोभित मस्तक वाले और पार्श्व में बैठी हुई भगवती गौरी से शोभित महादेव को देखा उनके समीप जाकर गौरी और शंकर के चरणों में वह नतमस्तक हुआ ॥ १८९-१९१॥ तब पीठ को हाथ से थपथपाकर और उठाकर बैठाये गये सूर्यप्रभ से शिवजी ने पूछा— 'किसलिए आये हो ? ॥१९२॥ सूर्यप्रभ ने कहा—'प्रभो मेरा अभिषेक शीघ्र ही होनेवाला है। अतः, आपके वहाँ पधारने की प्रार्थना है॥१९३॥ तब शिवजी ने उससे कहा—'बेटे, तो तुमने इतना कष्ट क्यों उठाया? मुझे आने के लिए यहीं स्मरण क्यों नहीं कर लिया ?॥१९४॥ तो ठीक है, मैं आऊँगा ऐसा कहकर भक्तवत्सल भगवान् ने पास बैठे हुए एक गण को बुलाकर कहा—'जाओ इसे (सूर्यप्रभ को) अभिषेक के लिए ऋषभ पर्वत पर ले जाओ। वह ऋषभ पर्वत विद्याधर चक्रवर्तियों का अभिषेक-स्थान है। भगवान् से आज्ञापित गण ने प्रदक्षिणा और प्रणाम किये हुए सूर्यप्रभ को नम्रता-पूर्वक गोद में उठा लिया और उसे ले जाकर ऋषभ पर्वत पर बैठा दिया। अपनी सिद्धि के प्रभाव से वह उसी क्षण वहाँ से अदृश्य हो गया ॥१९५—१९९॥ सूर्यप्रभ जब ऋषभ पर्वत पर ही था तब उसके सभी मित्र मन्त्री कामचूड़ामणि आदि सभी पत्नियां सभी विद्याधरों के राजा इन्द्र-सहित सभी देवता मय आदि सभी असुर, याज्ञवल्क्य आदि सभी ऋषिगण तथा श्रुतदेव और सुबाहुकुमार आदि वहाँ एकत्र हुए। सूर्यप्रभ ने भी सभी का स्वागत करके उनका यथोचित सम्मान किया और शिवजी के निमन्त्रण का वृत्तान्त सुनकर सभी को प्रसन्न किया। उन सब ने भी उसे इस बात पर बधाई दी ॥२००-२०२॥ तब सूर्यप्रभ के प्रभास आदि मन्त्री मित्र मणियों और सोने के विविध कलशों में नाना प्रकार की ओषधियों से युक्त समस्त नदियों, नदों, समुद्रों और तीर्थों का जल ले स्वयं जाकर लाय ॥२०३॥

४४८ कथासरित्सागरं

४४८ कथासरित्सागरं

तावद् गौरीसहितो भगवानथाययौ पुरारातिः। देवासुरविद्याधरनृपतिमहर्षिप्रणम्यमानाङ्घ्रिः ॥२०४॥ सर्वेषु सेषु सुरदानवेश्वरेषु । पुण्याहघोषमुखरेष्वखिलेर्जलेस्तैः ॥ सूर्यप्रभं तमृपयो धुचराधिराज्ये। सिंहासने समुपवेशितमम्यपिञ्चन् ॥२०५॥ बबन्ध पट्टं मुकुटं च तस्य स प्रत्यूष्य विज्ञानमयो मयासुरः। ननाद तूर्यैः सह देवदुन्दुभिर्वराप्सरोनृत्तपुरःसरो दिवि ॥२०६॥ तां च महर्षिसमूहः स कामचूडामणि समभिषिच्य। सूर्यप्रभस्य विदधे तस्य समुचितां महादेवीम् ॥२०७॥ ततो गतेषु त्रिदशासुरेषु सूर्यप्रभो बन्धुसुहृद्वयस्यः। सहात्र विद्याधरचक्रवर्ती महाभिषेकोत्सवमाततान ॥२०८॥ विन्देश्च वेधश्चक्रमूत्तरं तद्दत्वा हरोक्ते श्रुतशर्मणे सः। अथाः प्रियाः प्राप्य समं वयस्यैर्भेजे चिरं खेचरराज्यलक्ष्मीम् ॥२०९॥ एवं हरप्रसादप्रभावात् प्रापि मानुषेणापि। सूर्यप्रभेण पूर्वं विद्याधरचक्रवर्तित्वम् ॥२१ ॥ इति विद्याधरधुर्यो व्याख्याय कथां स वत्सराजाग्रे। वज्रप्रभः प्रणम्य च नरवाहनदत्तमुद्ययौ गगनम् ॥२११॥ तस्मिन्गते च नरवाहनदत्तदेवो दृष्ट्वा स्वभा भवनमम्बुकन्या समेतः। वत्सेश्वरस्य पितुरास्त गृहे स धीरो विद्याधरेन्द्रपदलाभमुदीक्षमाणः ॥२१२॥

इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे सूर्यप्रभलम्बके सप्तमस्तरङ्गः। समाप्तश्चायं सूर्यप्रभलम्बकोऽष्टमः।

अष्टम लम्बक ४४९

[Header] अष्टम लम्बक ४४९

उसी अवसर पर भगवती गौरी के साथ शंकर भी वहाँ उपस्थित हुए और सभी देव असुर, दानव तथा विद्याधर आदि राजाओं ने उनके चरणों में सादर प्रणाम किया ॥२४॥ तदनन्तर, सभी देव दानव और विद्याधरों के पुण्याहवाचन का पाठ करने पर समस्त ऋषिगण तथा प्रभास आदि से लाये गये जलों से विधिपूर्वक सिंहासन पर बैठे हुए सूर्यप्रभ का विद्याधर चक्रवर्ती पद पर अभिषेक किया मुकुट और पट्ट-बन्धन किया। उस समय आकाश में वाद्यों के साथ देवताओं की दुन्दुभियां बज उठीं और सुन्दरी अप्सराएं नाचने लगीं॥२५-२६॥ तब महर्षियों के समूह ने कामचूड़ामणि का भी अभिषेक किया और उसे सूर्यप्रभ की महिषी (वैमानिक महारानी) बनाया ॥२७॥ अभिषेक-महोत्सव के सम्पन्न होने के पश्चात् देवताओं और असुरों ने अपने-अपने स्थानों को लौट जाने पर सूर्यप्रभ ने अपने बन्धुओं और मित्रों के साथ और कुछ दिनों तक अभिषेकोत्सव को बढ़ाया ॥२८॥ तदुपरान्त कुछ दिनों के पश्चात् उत्तर की वेदी का आधा राज्य शिवजी के आज्ञानुसार श्रुतशर्मा को देकर तथा अन्य पत्नियों को प्राप्त कर सूर्यप्रभ ने अपने मित्रों के साथ चिरकाल तक विद्याधर राज्य की लक्ष्मी का उपभोग किया ॥२९॥ इस प्रकार शिवजी की कृपा से मनुष्य होते हुए भी सूर्यप्रभ ने विद्याधरों की राज्य लक्ष्मी प्राप्त की ॥३०॥ इस क्रम से विद्याधर-श्रेष्ठ वयत्रज वत्सराज के सम्मुख सूर्यप्रभ की कथा सुनाकर और नरवाहनदत्त को प्रणाम करके आकाश में उड़ गया ॥३१॥ उसके चले जाने पर युवराज नरवाहनदत्त अपनी पटरानी मदनमञ्चुका के साथ विद्या धर चक्रवर्ती बनने की उत्सुकता लिये हुए पिता वत्सराज के गृह में निवास करने लगा ॥३२॥

सूर्यप्रभ लम्बक का सप्तम तरंग समाप्त। सूर्यप्रभ नामक अष्टम लम्बक भी समाप्त इति महाकविश्रीयोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर में

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अलङ्कारवती नाम नवमो लम्बकः

अलङ्कारवती नाम नवमो लम्बकः इव गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखाम्बुधेरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नसम्वर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते॥ प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम् निष्कम्पमरुतोर्वीश्वसिताः पर्वता अपि। यं नमन्तीव नृत्यन्तं नमामस्तं विनायकम्॥१॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एव वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां भवने पितुः। वसन्विद्याधराधीशैरावासेव कृतानतिः॥२॥ नरवाहनदत्त' स कदाचिन्मृगयागतः। विवेश गोमुखसखो मुक्तसैन्यो महद्वनम्॥३॥ स तत्र दक्षिणेनाक्ष्णा स्फुरतोक्तशुभागमः। दिव्यवीणानिनादमिश्रमशृणोत् गीतनिःस्वनम्॥४॥ गत्वा तदनुसारेण नातिदूरं ददर्श सः। स्वयम्ब्वायतनं शम्भोः सपताश्वो विवेश च॥५॥ तत्रोपवीणयन्तीं च देवेशं देवकन्यकाम्। अपश्यद् वरकन्याभिर्बह्वीभिः परिवारिताम्॥६॥ सा दृष्टा तस्य हृदयं प्रसरत्कान्तिनिर्भरा। इन्दुमूर्तिरिवाम्भोघेः क्षोभयामास तत्क्षणम्॥७॥

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४५२ कथासरित्सागर

४५२ कथासरित्सागर सापि तं सरसस्निग्धमुग्धेनालोक्य चक्षुषा। तदेकगतचित्ताभूद्विस्मृतस्वरधारणा ॥८॥ नरवाहनदत्तस्य चित्तज्ञो गोमुखस्ततः। केयं कस्य सुता चेति यावत्पृच्छति तत्सखी ॥९॥ तावच्च संमुखी तस्याः पूर्वं हेमारुणप्रभा। पश्चादवततारैका प्रौढा विद्याधरी दिवः ॥१०॥ सा चावतीर्य कन्यायास्तस्या पार्श्वे उपाविशत्। कन्याप्युत्थाय सा तस्याः पादयोरपतत्तदा ॥११॥ सर्वविद्याधराधीशं निर्विघ्नं पतिमाप्नुहि। इति प्रौढापि सा तस्यै कन्याया आशिषं ददौ ॥१२॥ नरवाहनदत्तोऽथ तामुपेत्य प्रणम्य च। दत्ताशिषं पर्यपृच्छत्सोम्यां विद्याधरीं शनैः ॥१३॥ केयं कन्या भवत्यम्ब त्वं का कथ्यतामिति। ततो विद्याधरी सा तमुवाच शृणु वच्म्यहम् ॥१४॥ अलङ्कारवती कथा अस्ति गौरीगुरोः शैले श्रीसुन्दरपुरं पुरम्। आस्तेऽलङ्कारशीलाख्यस्तत्र विद्याधरेश्वरः ॥१५॥ तस्योदारगुणन्यास्ति महिषी काञ्चनप्रभा। तस्यां तस्य च कालेन राज्ञः सूनुरजायत ॥१६॥ एष धर्मपरो भावीत्यादिष्टमुमया यया। स्वप्ने तदा धर्मशीलं नाम्ना तमकरोत्पिता ॥१७॥ क्रमेण यौवनप्राप्तं धर्मशीलं स तं सुतम्। राजा संयोज्य विद्याभिर्यौवराज्येऽभिषिक्तवान् ॥१८॥ ततः स यौवराज्यस्थो धर्मैकपरमो वशी। अरञ्जयद्धर्मशीलः पितुरप्यधिकं प्रजाः ॥१९॥ ततोऽलङ्कारशीलस्य राज्ञः सा काञ्चनप्रभा। अन्तर्वत्नी सती राज्ञी तस्य सूते स्म कन्यकाम् ॥२०॥ नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा चक्रवर्तिनः। कन्या भवित्रीति तदा दिव्या वागुदचोचयत् ॥२१॥

नवम लम्बक ४५३

नवम लम्बक ४५३ सरस और स्नेहपूर्ण आँखों से राजकुमार को देखती हुई वह दिव्यकुमारी भी स्वर संभाषण को भूलकर उसके प्रेम में मग्न हो गई ॥८॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाले उसके साथी गोमुख ने उस कन्या की सखियों से 'यह कौन है और किसकी कन्या है' आदि प्रश्न पूछने का जैसे ही विचार किया इतने में ही तपे हुए स्वर्ण के समान रक्तवर्णवाली एक प्रौढ़ा विद्याधरी आकाश से नीचे उतरी ॥९-१०॥ उतरकर वह उसी दिव्य कन्या के पास आकर बैठी। तब उस कन्या ने उठकर उसके चरणों में झुककर प्रणाम किया ॥११॥ तब उस प्रौढ़ा विद्याधरी ने आशीर्वाद दिया कि 'तू समस्त विद्याधरों के चक्रवर्ती को निर्विघ्न रूप से पति के रूप में प्राप्त कर' ॥१२॥ तब नरवाहनदत्त भी उसके पास जाकर और प्रणाम करके आशीर्वाद लेती हुई उस सौम्य विद्याधरी से पूछने लगा—॥१३॥ माता यह कन्या कौन है और तुम्हारी कौन होती है बताओ । तब वह विद्याधरी उससे कहने लगी—'सुनो मैं कहती हूँ ॥१४॥ अलंकारवती की कथा हिमालय पर्वत के ऊपर सुन्दरपुर नाम का एक नगर है। उस नगर में अलंकारशील नाम का विद्याधरों का राजा है॥१५॥ उदारगुणोंवाले उस राजा की कांचनप्रभा नाम की रानी है। समयानुसार उस रानी से राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥१६॥ उसके उत्पन्न होने पर पार्वती ने स्वप्न में उसे यह आदेश दिया कि यह पुत्र अत्यन्त धर्मशील होगा। तभी राजा ने तदनुसार उसका नाम धर्मशील रख दिया ॥१७॥ क्रमशः युवावस्था में पहुँचे हुए उस पुत्र को पिता ने अपनी विद्याएँ पढ़ाकर युवराज-पद पर बैठा दिया ॥१८॥ युवराज-पद पर रहकर, एकमात्र धर्मपरायण और जितेन्द्रिय उस धर्मशील ने पिता से भी बढ़कर प्रजा को प्रसन्न किया ॥१९॥ तदनन्तर, राजा अलंकारशील की महारानी कांचनप्रभा ने गर्भवती होकर एक कन्या को जन्म दिया ॥२०॥ उस कन्या के उत्पन्न होने पर आकाशवाणी हुई कि यह कन्या विद्याधर चक्रवर्ती नरवाहनदत्त की पत्नी होगी' ॥२१॥

४५४ कथासरित्सागर

४५४ कथासरित्सागर

ततोऽत्र तेनालङ्कारवतीति कृतनामिका। पित्रा क्रमणावर्धिष्ट भासा शशिकलेव सा॥२२॥ कालेन यौवनस्था च प्राप्तविद्या निजात्पितुः। तत्तदायतनं शम्भोर्भक्त्या भ्रमितुमुद्यता॥२३॥ तावच्च धर्मशीलोऽस्य भ्राता शान्तो युवापि सन्। रहोऽलङ्कारशीलं तं पितरं स्वं व्यजिज्ञपत्॥२४॥ न मां भोगा इमे तात प्रीणन्ति क्षणभङ्गुराः। किं तदस्ति हि संसारे पर्यन्तविरसं न यत्॥२५॥ तथा चैतत्त्वया किं न श्रुतं व्यासमुनेर्वचः। सर्वे क्षयान्ता निचयाः पतनान्ताः समुच्छ्रयाः॥२६॥ संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम्। तदेषु का रतिस्तात नश्वरेषु मनस्विनाम्॥२७॥ परत्र न सहायान्ति न भोगा मार्त्ससञ्चयाः। एकस्तु बान्धवो धर्मो न जहाति पदात्पदम्॥२८॥ तस्माद्वनं गत्वाहं साधयाम्युत्तमं तपः। आसादयेयं तद्येन शाश्वतं परमं पदम्॥२९॥ इत्युक्तवन्तं तं पुत्रं धर्मशीलं सगाकुलम्। राजाऽलङ्कारशीलोऽथ वक्ति स्मोदश्रुलोचनः॥३०॥ [L19: बालस्येव तवाकाण्डे कोऽयं पुत्र मतिभ्रमः। उपयुक्ते हि तारुण्ये प्रशमः सद्भिरिष्यते॥३१॥ कृतदारस्य धर्मेण राज्यं पालयतस्तव। भोगा भोक्तुमयं कालो न वैराग्यस्य साम्प्रतम्॥३२॥ एतत्पितुर्वचः श्रुत्वा धर्मशीलोऽभ्यधात्पुनः। न शमाश्रमयोरेष नियमोऽस्ति वयःकृतः॥३३॥ ईश्वरानुगृहीतो हि कश्चिद्बालोऽपि शाम्यति। वृद्धोऽपि न शमं याति कश्चित्कापुरुषः पुनः॥३४॥ न च राज्ये रतिर्मेऽस्ति न वा दारपरिग्रहे। ममेतज्जीवितफलं यच्छिवारधनं तपः॥३५॥ इति ब्रुवाणं यत्नाप्यनिवार्यमवेक्ष्य तम्। पिताऽलङ्कारशीलोऽसौ विमुख्याप्यूच्यभाषत॥३६॥

नवम लम्बक ४५५

नवम लम्बक ४५५ तदनन्तर पिता ने उसका नाम अलंकारवती रखा और वह क्रमशः चन्द्रकला के समान बढ़ने लगी ॥२२॥ वह कन्या क्रमशः यौवनावस्था को प्राप्त कर, और पिता से विद्याओं को सीखकर, शिवभक्ति के कारण उन-उन शिव-मन्दिरों में भ्रमण करने लगी ॥२३॥ इसी अवसर पर इसके बड़े भाई धर्मशील ने युवा होने पर भी एक बार एकान्त में पिता से इस प्रकार निवेदन किया—॥२४॥ 'हे पिता ! ये क्षण-भंगुर सांसारिक भोग मुझे प्रसन्न नहीं करते। संसार में वह क्या है जो अन्त में नीरस नहीं हो जाता ॥२५॥ और, क्या तुमने व्यास मुनि का यह वचन नहीं सुना है कि जितनी भी वस्तुएँ हैं, उन सभी का अन्त विनाश है। और, जितनी उन्नति है, उस सभी का अन्त पतन है ॥२६॥ सभी संयोगों का अन्त वियोग है और जीवन का अन्त मरण है। इसलिए, हे पिता, निश्चित रूप से विनाशवान् इन पदार्थों में मनस्वी विद्वानों को क्या प्रेम ? ॥२७॥ सांसारिक भोग और धन का संग्रह परलोक में सहायक नहीं हो सकते। अर्थात्, ये यहीं नष्ट हो जाते हैं॥२८॥ इसलिए, मैं वन में जाकर सर्वोत्तम तप करता हूँ जिसके द्वारा परम पद (मोक्ष) को प्राप्त कर सकूँ' ॥२९॥ राजा अलंकारशील पुत्र धर्मशील को इस प्रकार कहते हुए सुनकर व्याकुल हो उठा और आँखों में आँसू भरकर बोला—॥३०॥ पुत्र इस समय (यौवनकाल) में ही तुम्हें यह क्या बुद्धि भ्रम हो गया ! विद्वान् लोग युवावस्था का उपभोग हो जाने पर ही वैराग्य की कामना करते हैं ॥३१॥ यह समय विवाह करके धर्मपूर्वक राज्य के पालन करने का है। यह तुम्हारे लिए सांसारिक भोगों के भोगने का समय है, वैराग्य का नहीं' ॥३२॥ पिता के इस प्रकार वचन सुनकर धर्मशील फिर कहने लगा-'भोग और विराग का नियम वयस्था पर निर्भर नहीं है। ईश्वर की कृपा से अनुगृहीत कोई बालक भी विरक्त हो जाता है, किन्तु कोई कुत्सित पुरुष वृद्ध होने पर भी विरक्त नहीं हो पाता ॥३३-३४॥ राज्य पर मेरा प्रेम नहीं है और न मैं विवाह ही करना चाहता हूँ। शिव की आराधना करके तप करना ही मेरे जीवन का मुख्य ध्येय है ॥३५॥ ऐसा कहते हुए और विविध प्रयत्नों से भी न मानते हुए पुत्र को पिता ने आँसू बहाते हुए कहा—॥३६॥

यदि यूनोऽपि ते पुत्र वैराग्यमिदमीदृशम् । नास्ति वृद्धस्य मे सक्तिर्महमप्याश्रये वनम् ॥३७॥ इत्युक्त्वा मर्त्यलोकं च गत्वा भारायुतं ददौ । ब्राह्मणेभ्यो दरिद्रेभ्यो रत्नानां काञ्चनस्य च ॥३८॥ एत्य च स्वपुरं भार्यामुवाचैतत्काञ्चनप्रभाम् । त्वया मदाज्ञयैहैव स्थातव्यं नगरे निजे ॥३९॥ रक्षालङ्कारवत्येषा कन्या पूर्णे च वत्सरे । अस्ति यैवाह्नोऽस्यास्तिष्याख्यतने शुभे ॥४०॥ नरवाहनदत्ताय दास्याम्येतामहं तदा । स चक्रवर्ती जामाता पास्यतीदं पुरं च नः ॥४१॥ इत्युक्त्वा दत्तशपथां भार्यां राजा निवर्त्य सः । ससुतां विलपन्तीं तां सपुत्रः शिश्रिये वनम् ॥४२॥ सा तु स्वपुरमभ्यास्त तत्र भार्या काञ्चनप्रभा । दुहित्रा सह साध्वी स्त्री भर्त्राज्ञां का हि लङ्घयेत् ॥४३॥ सस्नुता च तया मात्रा सह स्नेहानुयातया । अलङ्कारवती भ्रान्ता बहून्यायतनानि च ॥४४॥ एकदा तां च वक्ति स्म विद्या प्रज्ञप्तिसंज्ञिका । कश्मीरेषु स्वयम्भूणि गत्वा क्षेत्राणि पूजय ॥४५॥ नरवाहनदत्तं हि निर्विघ्नं त्वं पतिं ततः । सर्वविद्याधरेन्द्रैकचक्रवर्तिनमाप्स्यसि ॥४६॥ इत्युक्ता विद्यया गत्वा काश्मीरात्सा समातृका । अलङ्कारवती शम्भुं पुण्यक्षेत्रेष्वपूजयत् ॥४७॥ नन्दिक्षेत्रे महादेवगिरावमरपर्वते । सुरेश्वर्याद्रिषु तथा विजये कपटेश्वरे ॥४८॥ एवमादिषु सम्पूज्य क्षेत्रेषु गिरिजापतिम् । विद्याधरेन्द्रकन्या सा तन्माता चागते गुहाम् ॥४९॥ तामेतां विद्ध्यलङ्कारवतीं सुभग कन्यकाम् । तां च मातरमप्येतस्या विद्धि मां काञ्चनप्रभाम् ॥५०॥ अद्य चैषा ममानुक्त्वेवागतेमं शिवालयम् । तत प्रज्ञप्तिविद्यातो विज्ञाय्याहमिहागता ॥५१॥

'बेटा यदि तुम्हारी इस अवस्था में ही तुम्हें वैराग्य हुआ है तो क्या वह मुझ वृद्ध को नहीं होगा ? अतः मैं भी वन में जाऊँगा' ॥३७॥ ऐसा कहकर और मर्त्यलोक में जाकर राजा ने ब्राह्मणों को रत्नों और सुवर्णों के दस हजार भार दान में दे दिये ॥३८॥ और, अपने नगर में आकर पत्नी कांचनप्रभा से कहा कि 'तुम्हें मेरी आज्ञा से इसी नगर में रहना होगा ॥३९॥ यहाँ रहकर इस कन्या अलंकारवती की रक्षा करनी होगी और समय आने पर, एक वर्ष पूरा होने पर,—क्योंकि आज का दिन ही उसके विवाह के लिए शुभ है। यही दिन इसके विवाह के शुभ लग्नवाला है—इसी दिन मैं स्वयं आकर इसे जामाता नरवाहनदत्त के लिए दूँगा। वह चक्रवर्ती जामाता हमारे इस नगर की रक्षा करेगा' ॥४०-४१॥ ऐसा कहते हुए राजा रोती हुई पत्नी और पुत्री को धपय देकर और उन्हें अपने घर छोड़कर स्वयं पुत्र के साथ वन को चला गया ॥४२॥ तब वह रानी कांचनप्रभा अपनी कन्या के साथ अपने नगर में ही रहने लगी। सच है कौन पतिव्रता स्त्री पति की आज्ञा का उल्लंघन कर सकती है ॥४३॥ तब राजा मलंकारशील की वह कन्या अलंकारवती स्नेह के साथ तीर्थयात्रा करती हुई अपनी माता के संग बहुत-से शैव तीर्थों का भ्रमण करने लगी ॥४४॥ एक बार उस अलंकारवती को प्रज्ञप्ति नामकी विद्या ने कहा कि कश्मीर में बहुत से स्वयंभू तीर्थ हैं। उनमें जाकर तप पूजन आदि करो। तब तुम विद्याविष के सब विद्याधरों के चक्रवर्ती नरवाहनदत्त को पति-रूप में प्राप्त कर सकोगी ॥४५ ४६॥ विद्या के द्वारा ऐसा आदेश मिलने पर अलंकारवती ने माता के साथ कश्मीर जाकर अनेक पुण्यतीर्थों में शिव की पूजा की ॥४७॥ नन्दिक्षेत्र में महादेव पर्वत पर, अमर पर्वत पर, सुरेश्वरी पर्वत पर, विजय पर्वत तथा कपटेश्वर आदि क्षेत्रों में पार्वती-पति शिव की पूजा करके वह कन्या और उसकी माता अपने घर लौट आई ॥४८ ४९॥ हे सुभट, इस कन्या को तुम वही अलंकारवती समझो और मुझे उसकी माता कांचनप्रभा ॥५०॥ आज यह अलंकारवती मुझे बिना कहे ही यहाँ चली आई। मैंने भी प्रज्ञप्ति विद्या के प्रभाव से इसका यहाँ आना जानकर, यहाँ आ गई हूँ ॥५१॥ ५८

५८ कथासरित्सागर

५८ कथासरित्सागर समुत्खातेव च ज्ञातस्त्वमपीहागतो मया। तदेतां देवताविष्टामुपयच्छस्व मे सुताम्॥५२॥ प्रातश्च सोऽस्या पित्रोक्तः प्रातो वैवाहिकवासरः। तदद्य पुत्र कौशाम्बीं स्वामेव नगरीं व्रज॥५३॥ आवामितश्च गच्छावः प्रातरेत्य तपोवनात्। राजालङ्कारशीलस्ते दास्येतेां सुतां स्वयम्॥५४॥ एवं तयोस्तेऽलङ्कारस्यास्तस्याश्च तस्य च। नरवाहनदत्तस्य काप्यवस्था द्वयोरभूत्॥५५॥ अन्योन्यरजनीमात्रविश्लेषासहनात्मनो । चक्रवाक्योरिवासन्ने दिनान्ते साश्रुनेत्रयोः॥५६॥ दृष्ट्वा तौ तादृशौ द्वावप्यवादीत्काञ्चनप्रभा। किमेकरात्रिविश्लेषे ह्यधैर्यं युवयोरिदम्॥५७॥ अनिश्चितावधि धीराः सहन्ते विरहं चिरम्। श्रूयतां रामभद्रस्य सीतादेव्यास्तथा कथा॥५८॥ रामसीताकथा राज्ञो दशरथस्यासीदयोध्याधिपतेः सुतः। रामो भरतशत्रुघ्नलक्ष्मणानां पुराग्रजः॥५९॥ विष्णोरवतारांशो रावणोच्छेदनाय यः। सीता तस्याभवद् भार्या प्राणैष्टा जनकात्मजा॥६०॥ स पित्रा भरतन्यस्तराज्येन विधियोगतः। प्रेषितोऽभूद्वनं साकं सीतया लक्ष्मणेन च॥६१॥ तत्र तस्याहरत्सीतां मायया रावणः प्रियाम्। निनाय च पुरीं लङ्कां पथि हत्वा जटायुषम्॥६२॥ ततः स रामो मित्री सुग्रीवं वालिनो वधात्। स्वीकृत्य मारुतिं प्रेष्य तत्प्रवृत्तिमबुध्यत॥६३॥ गत्वा च सागरे सेतुं बद्ध्वा हत्वा च रावणम्। लङ्कां विभीषणे न्यस्य सीतां प्रत्याजहार सः॥६४॥ १ सुप्रसिद्धा रामकथा। उत्तरकथायामत्र किञ्चित्प्रसिद्धकथातो भेदो दृश्यते।