कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१५६ | कथासरित्सागर
१५६ | कथासरित्सागर
जातिस्मरोऽहं नृपते नवतिं च नवाधिकाम्।
जन्मानि स्वशिरो दत्तं मया जन्मनि जन्मनि ॥४७॥
इदं शततमं जन्म शिरोदानाय मे प्रभो।
तन्मा स्म वोध किञ्चित्त्वं विमुखोऽर्थी न याति मे ॥४८॥
तदिदानीं ददाम्यस्मै त्वत्पुत्राय निजं शिरः।
त्वन्मुखालोकनायैव विलम्बो हि कृतो मया ॥४९॥
इत्युक्त्वाश्लिष्य तं भूपं मूर्धनामाघ्राय कोपतः।
प्रक्षिप्तद्राजपुत्रस्य कृपाणं तेन तस्य सः ॥५०॥
तत्कृपाणप्रहारञ्च सोऽथ शस्य नृपात्मजः।
नागार्जुनस्य चिच्छेद शिरो मालादिवाम्बुजम् ॥५१॥
अथोत्थिते महाक्रन्दे प्राणत्यागोन्मुखे नृपे।
इत्युच्चचार गगनादशरीराश्च भारती ॥५२॥
अकार्यं मा कृथा राजंश्चान्धो ह्येष ते सुतः।
नागार्जुनोऽपुनर्जन्मा गतो बुद्धसमां गतिम् ॥५३॥
एतच्छ्रुत्वा स विरतश्चिरायुर्मेरणाद्भूपः।
दत्तवान् शुचा त्यक्तराज्यो वनमथिश्रियत् ॥५४॥
तत्र कालेन तपसा स प्राप परमां गतिम्।
तत्पुत्रोऽप्यचिरत्स्तौ साम्राज्यं जीवहरोऽत्र सः ॥५५॥
प्राप्तराज्यश्च मचिराद्राष्ट्रमेव विधाय सः।
हतो नागार्जुनसुतैः स्मरद्भिरुस्तद्वधं पितुः ॥५६॥
तच्छोकाच्च तन्मातुस्तस्या हृदयमस्फुटत्।
वनार्यजुष्टेन पथा प्रवृत्तानां शिवं कुतः ॥५७॥
राज्ये च राज्ञामन्यस्यां जातस्तस्य चिरायुषः।
बातायुर्नाम पुत्रस्तैर्मन्त्रिमुख्यैर्न्यवेश्यत ॥५८॥
एव नागार्जुनारब्धं मर्त्यानां मृत्युनाशनम्।
न सोढुं दैवतैर्यत्सोऽपि मृत्युवशं गतः ॥५९॥
तस्माद्विधातुविहितोऽयमनित्य एव
दुर्व्वारदुःखबहुलो मनु जीवलोकः।
दाढ्यं न कर्तुमपि यत्नशतैस्तवत्र
कनापि किञ्चिदपि मेच्छति यद्विधाता ॥६०॥
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हे राजन् ! मैं पूर्वजन्म का स्मरण करने वाला हूँ। मैंने निन्यानब्बे बार प्रत्येक जन्म में
अपना सिर दान किया है। यह सौवां मेरा जन्म भी सिर देने के लिए ही हुआ है। इसलिए, तुम
कुछ न बोलो। मेरे याचक को विमुख न होना चाहिए ॥४७-४८॥
तो अब मैं तुम्हारे पुत्र को अपना सिर देता हूँ। केवल तुम्हारा मुंह देखने के लिए ही मैंने
इतना विलम्ब किया है ॥४९॥
ऐसा कहकर राजा से आलिङ्गन कर और औषधालय से एक चूर्ण मँगाकर राजकुमार की
तलवार पर उसने लेप कर दिया ॥५०॥
तब उस तलवार के प्रहार से मन्त्री की गर्दन इस प्रकार कट गई जैसे नाल से कमल
कटकर अलग हो जाता है ॥५१॥
तदनन्तर रोने और चिल्लाने का बड़ा कोलाहल उठने पर और राजा के प्राण-त्याग के
लिए उद्यत होने पर आकाश से अशरीरी वाणी हुई—॥५२॥
'राजन् ! आत्महत्या का यह अकार्य न करो। यह तुम्हारा मित्र नागार्जुन शोचनीय
नहीं है। उसका जन्म अब न होगा। वह बुद्ध के समान गति को प्राप्त हो गया' ॥५३॥
यह सुनकर राजा चिरायु मार्ग से विमुख हुआ और शोक में सब कुछ दान
देकर और राज्य का त्याग करके वन में चला गया ॥५४॥
वन में रहता हुआ वह कुछ समय बाद तप से परमगति को प्राप्त हुआ और उसका
पुत्र जीवहर राज्य पर बैठा ॥५५॥
उसके राज्य प्राप्त करने पर पिता के वध से असन्तुष्ट नागार्जुन के पुत्रों ने राष्ट्र-विप्लव
कराकर शीघ्र ही उसका नाश करा दिया ॥५६॥
उसके शोक से उसकी माता धनपरा का हृदय फट गया और वह भी मर गई। सच है
अनार्य (अनुचित) पथ से चलनेवालों का कल्याण कैसे हो सकता है ? ॥५७॥
तब राजा के मुख्यमन्त्रियों ने दूसरी रानी के गर्भ से उत्पन्न शतायु नामक पुत्र को
राजगद्दी पर बैठाकर राज-कार्य का संचालन किया ॥५८॥
इस प्रकार नागार्जुन के द्वारा मनुष्यों की मृत्यु को दूर करनेवाले प्रयत्न को देवताओं ने
सहन नहीं किया और वह नागार्जुन भी मर गया ॥५९॥
इस प्रकार, अनिवार्य दुःखों से भरा हुआ यह संसार अनित्य है। इसमें जो कुछ विधाता
को इच्छित नहीं है, उसे सैकड़ों यत्नों से भी नहीं किया जा सकता ॥६०॥
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर
इत्याख्याय कथां किल विरत मरुभूतिके सम सचिवः ।
नरवाहनदत्तो निजमुत्थाय चकार दिवसकसम्म्यम् ॥६१॥
इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके
सप्तमस्तरङ्गः।
अष्टमस्तरङ्गः
कर्पूरिकाकथा
ततोऽह्नि परे प्राप्त सोक्ता रत्नप्रभां प्रियाम्।
शीघ्र प्रत्यागमिष्यामीत्याश्वास्याखेटकाय सः ॥१॥
वत्सशेन समं पित्रा वयस्यैश्चाटवीं ययौ।
नरवाहनदत्तास्तैर्गजैश्च परिवारितः ॥२॥
सत्र मिन्नैभकुम्भानां नखोदग्रपरिच्युतैः।
सिंहानां हतसुप्तानामुक्तबीजव मौक्तिकैः ॥३॥
व्याघ्राणां भल्लशूनानां दंष्ट्राभिः साङ्कुरेव च।
सपल्लवेव क्षतजैर्हरिणानां परिप्लुतैः ॥४॥
निमग्नकङ्कपत्रैस्तु क्रोडे स्तबकितेव च।
शरीरे शरभाणां च पतिते फलितेव च ॥५॥
बभूव तस्य निपतद्द्बनधम्बशिलीमुखा।
प्रीतये मृगयालीलाकृता शोभितकानना ॥६॥
शनैः श्रान्तः स विश्रम्य प्रविवेश वनान्तरम्।
हयारूढः सहैकेन गोमुखेनाश्वसादिना ॥७॥
तत्रारेभे च गुलिकाक्रीडां कामपि तत्क्षणम्।
तावच्च तापसी कापि पथा तेन किलाययौ ॥८॥
तस्यास्तस्य कराद् भ्रष्टा गुलिका मूर्ध्नि चापतत्।
ततो विहस्य किञ्चित्सा तापसी तमभाषत ॥९॥
एवमेव मदोदग्रः चेतद्य तद्यद्यवाप्स्यसि।
धातु कर्पूरिकां भार्यां तत्तै कीदृग्भविष्यति ॥१०॥
एतच्छ्रुत्वावसह्यैव तुरगाच्चरणानतः।
नरवाहनदत्तस्तां तापसीं निजगाद सः ॥११॥
सप्तम लम्बक १५९
सप्तम लम्बक १५९
इस प्रकार, कथा कहकर मरुभूति के मौन हो जाने पर नरवाहनदत्त अपने मन्त्रियों के
साथ उठकर दैनिक कार्यों में लग गया ॥६१॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का
सप्तम तरंग समाप्त
अष्टम तरंग
कर्पूरिका की कथा
किसी एक दिन नरवाहनदत्त अपनी उत्कण्ठिता प्यारी रत्नप्रभा को 'शीघ्र ही आऊँगा'—
ऐसा आश्वासन देकर, पिता बलराज तथा अन्य मित्रों के साथ हाथी-घोड़ों की सेना लेकर
शिकार खेलने के लिए जंगलों में गया ॥१—२॥
वह मृगया-क्रीड़ा-रूप लता नरवाहनदत्त के लिए प्रसन्नता का कारण बन गई।
वह मृगया-भूमि बड़े-बड़े हाथियों के कुम्भस्थलों को फाड़नेवाले मारे हुए सिंहों के
नखों से गिरे हुए मोतियों से ऐसी मालूम हो रही थी मानो उसमें बीज बोय गये हैं।
भालों से मारे गये बाघों के बिखरे हुए दाढ़ों से अंकुरित हुई के समान मालूम होती थी।
मारे हुए हरिणों के शरीर से निकलकर फैले हुए रक्त से मानो लाल पल्लवों से युक्त मालूम
हो रही थी। बाणों से बींध गये सूअर के मुखों व भालों मुच्छों से भरीहुई और शरभों १ के गिरे
हुए शरीरों से मानों फलवाली मालूम हो रही थी। उस भूमिमें भयंकर सनसनाहट के
साथ बाण छूट रहे थे। तभी वह जंगली मृगया-भूमि (शिकारगाह) विचित्र शोभा धारण कर
रही थी ॥३—६॥
कुछ देर बाद थककर विश्राम करके नरवाहनदत्त घोड़े पर सवार एकमात्र गोमुख के
साथ दूसरे जंगल में प्रवेश कर गया ॥७॥
वहाँ जाकर उसने गोफन से गोली फेंकने का खेल प्रारम्भ किया। इतने में ही उस मार्ग
में कोई तपस्विनी आ गयी। नरवाहनदत्त के हाथ से छूटी हुई एक गोली उस तपस्विनी के
सिर में जा लगी। तब वह तपस्विनी कुछ रोष करके बोली—॥८-९॥
'अभी मुझमें ऐसी मस्ती है तो जब कर्पूरिका को पत्नी बना लोग तब न जाने
कितना अधिक मद बढ़ जाएगा' ॥१०॥
यह सुनकर और घोड़े से उतरकर नरवाहनदत्त तपस्विनी के पैरों पर गिरकर
बोला—॥११॥
१ यह पशु (मृग विशेष) आठ पैर वाला होता है। आजकल यह नहीं मिलता।—अनु
१६ कथासरित्सागर
१६ कथासरित्सागर
त्वं न दृष्टा मया देवाद् गुटिका चात्र मे गता।
प्रसीद तद्भगवति क्षमस्व स्खलितं मम ॥१२॥
तच्छ्रुत्वा नास्ति मे पुत्र कोप इत्यभिधाय च।
तापसी सा जितक्रोधा तमाशीर्भिरसान्त्वयत् ॥१३॥
ततश्च वशिनीं मत्वा प्रबुद्धो सत्यतापसीम्।
नरवाहनदत्तस्तां पप्रच्छ विनयेन सः ॥१४॥
कैषा कर्पूरिका नाम भगवत्युदिता त्वया।
एतदादिश तुष्टासि मयि चेत्कौतुकं हि मे ॥१५॥
इत्युक्तवन्तं प्रणतं तापसी तं जगाद सा।
अस्ति पारेऽम्बुधि परं नाम्ना कर्पूरसम्भवम् ॥१६॥
अन्वर्थसंज्ञस्तत्र राजास्ति कर्पूरक इति श्रुतः।
तस्य कर्पूरिका नाम सुतास्ति वरकन्यका ॥१७॥
एकां विलोक्य कमलां निर्मथ्यापहृतां सुरैः।
या द्वितीयेव निक्षिप्य तत्र गोपायिताम्बुना ॥१८॥
पुरुषद्वेषिणी सा च विवाहे नाभिवाञ्छति।
त्वमुपेत्य यदि परं भविष्यति त्वद्वशिनी ॥१९॥
तत्तत्र गच्छ पुत्र त्वं तां च प्राप्स्यसि सुन्दरीम्।
गच्छतश्चात्र वोऽटव्यां महाक्लेशो भविष्यति ॥२० ॥
मोहस्तत्र न कार्यस्ते सर्वं स्वन्तं हि भावि सत्।
इत्युक्त्वैव समुत्पत्य तापसी सा तिरोदधे ॥२१॥
नरवाहनदत्तोऽथ तद्वाणीमदनाज्ञया।
आकृष्टः स समाहूय स्म गोमुखं पार्श्ववर्तिनम् ॥२२॥
एहि कर्पूरिकार्थं पुरं कर्पूरसम्भवम्।
गच्छावस्तामदृष्ट्वा हि न क्षणं स्थातुमुत्सहे ॥२३॥
तच्छ्रुत्वा गोमुखोऽब्रवीत् न्वार्य साहसेन त।
क्व त्वं क्वास्य पुरं तत् क्व क्व सोढ्या वन्यवाघव मा ॥२४॥
नाम्नि श्रुते विनेष्यारी त्यक्तदिव्याङ्गनाजनः।
निरभिप्रायसन्दिग्धामभिधावसि मानुषीम् ॥२५॥
एवं स गोमुखेनोक्तो वत्सराजसुतस्तदा।
अब्रवीन् मिष्ठतागम्या न तस्या वचनं मृषा ॥२६॥
सप्तम लम्बक १९१
सप्तम लम्बक १९१
'हे माता ! मैंने तुमको देखा नहीं। दैवसंयोग से ही गोली तुम्हें लगी। दया करो।
मेरी उद्दण्डता को क्षमा करो' ॥१२॥
यह सुनकर तपस्विनी बोली—'बेटा ! मुझे क्रोध नहीं है। ऐसा कहकर वह नरवाहनदत्त
को आशीर्वाद देकर सान्त्वना देने लगी ॥१३॥
तब नरवाहनदत्त ने उस तपस्विनी को सत्यवादिनी ज्ञानवती और सच्ची तपस्विनी
समझकर नम्रता से पूछा—॥१४॥
'हे भगवती ! तुमने यह कर्पूरिका नाम किसका कहा। यदि मुझ पर प्रसन्न हो
तो उसे बताओ। उसे जानने के लिए मुझे बहुत कौतुक है' ॥१५॥
ऐसा कहते हुए और प्रणाम करते हुए उससे तापसी ने कहा—'समुद्र के पार कर्पूर
संभव¹ नाम का द्वीप है॥१६॥
वहाँ नाम के समान गुणोंवाला कर्पूरक नाम का राजा है। उसकी कर्पूरिका नाम की
सुन्दरी कन्या है ॥ १७॥
वह कन्या इतनी सुन्दरी है कि समुद्र ने अपनी पहली कन्या (लक्ष्मी) के देवताओं द्वारा
अपहरण कर लिये जाने के कारण उसकी इस दूसरी बहन को मानों इस द्वीप में छिपाकर
रखा है ॥१८॥
पुरुषों से द्वेष रखनेवाली वह कन्या विवाह करना नहीं चाहती किन्तु तुम्हारे जाने पर
वह तुम्हारी कामना पूरी करेगी ॥१९॥
इसलिए, बेटा ! तुम वहाँ जाओ तो उस सुन्दरी को प्राप्त करोगे किन्तु जाते हुए तुम्हें
मार्ग में अनेक असह्य कष्ट होंगे ॥२ ० ॥
किन्तु तुम उन कष्टों से घबराना नहीं। उनका परिणाम अच्छा ही होगा। ऐसा
कहकर वह तपस्विनी अदृश्य हो गई ॥२१॥
तदनन्तर नरवाहनदत्त उसकी वाणी से उत्पन्न मदन की आशा से आकृष्ट होकर अपने
साथी गोमुख से बोला—'सखा कर्पूरसम्भव नगर में कर्पूरिका के पास चलें। उसे बिना देखे
मैं एक क्षण भी नहीं रह सकता' ॥२२ २३॥
यह सुनकर गोमुख बोला—'स्वामी ! अधिक साहस न करो। कहाँ समुद्र ! कहाँ वह
नगर ! कहाँ इतना लम्बा रास्ता और कहाँ वह कन्या ! ॥२४॥
एकमात्र नाम सुनकर ही दिव्य स्त्रीजनों को छोड़कर बिना प्रयोजन से सन्देहजनक उस
समुद्र-कन्या के पीछे दौड़ रहे हो ? ॥२५॥
गोमुख से इस प्रकार कहा गया वह वत्सराज का पुत्र बोला—'उस तपस्विनी का कथन
झूठा नहीं हो सकता ॥२६॥
१ अरेबियन नाइट्स सिन्दबाद जहाजी की कहानी में कपूर के टापू का नाम
आया है।—अनु.
२५
१६२ कथासरित्सागर
१६२ कथासरित्सागर
तन्मयावश्यगन्तव्यं प्राप्तुं तां राजकन्यकाम्।
इत्युक्त्वा स हयारूढः प्रतस्थे तत्क्षणं ततः ॥२७॥
अन्वगात् स च तं तूष्णीमनिच्छन्नपि गोमुखः।
अकुर्वन् वचनं भृत्योनुगम्यः परं प्रभुः ॥२८॥
तावद्वत्सेश्वरोऽप्यागात् कृताखेटो निजां पुरीम्।
मन्वानः स तमायान्तं सुतं स्वबलमध्यगम् ॥२९॥
स्वबलं तच्च तस्यागात् मरुभूत्यादिभिः सह।
पुरीं तामेव मत्वा तं सैन्यमध्यस्थितं प्रभुम् ॥३०॥
तत्र प्राप्ता विचिन्वन्तस्ते बुद्ध्वा तमनागतम्।
वत्सेश्वरादयो जग्मुः सर्वे रत्नप्रभान्तिकम् ॥३१॥
सा चादौ तच्छ्रुतवार्ता ध्यात्वा निजविद्यया।
आख्यातमितोदन्ता खिन्नं श्वशुरमब्रवीत् ॥३२॥
कर्पूरिकां राजसुतां तापस्या कथितां वने।
आर्यपुत्रो गतः प्राप्तुं पुरं कर्पूरसम्भवम् ॥३३॥
शीघ्रं च कृतकार्यं सन्निहैष्यति सगोमुखः।
तदलं चिन्तयैतद्धि विद्यातोऽधिगतं मया ॥३४॥
इत्युक्त्वाऽश्वासयत्सा तं वत्सेशं सपरिच्छदम्।
रत्नप्रभा या विद्यां च भर्तुः प्रायुङ्क्त तस्य सा ॥३५॥
नरवाहनदत्तस्य पथि क्लेशोपशान्तये।
नेर्ष्या भर्तृहितैषिण्यो गणयन्ति हि सुस्त्रियः ॥३६॥
तावच्च दूरमध्वानं स ययौ वाजिपृष्ठगः।
नरवाहनदत्तोऽस्यामटव्यां गोमुखान्वितः ॥३७॥
अथाकस्मादुपेतयात्र कुमारी पथ्युवाच तम्।
अहं मायावती नाम विद्या रत्नप्रभेरिता ॥३८॥
रक्षाम्यदृश्या मार्गे त्वां निश्चिन्तस्तद्व्रजाधुना।
इत्युक्त्वा रूपिणी विद्या तिरोऽभूत् साऽस्य पश्यतः ॥३९॥
तत्प्रभावात् ततः शान्तक्षुत्तृष्णः पथि स व्रजन्।
नरवाहनदत्तस्तां स्तुवन् रत्नप्रभां प्रियाम् ॥४०॥
सायं स्वच्छसरः प्राप्य वने स्वादुतरैः फलैः।
जलैश्चाहारपानादि स्नातश्चक्रे सगोमुखः ॥४१॥
इसलिए, मुझे उसे प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना पड़ेगा। ऐसा कहकर घोड़े पर चढ़
कर युवराज आगे चल पड़ा ॥२७॥
वह गोमुख न चाहता हुआ भी उसके पीछे चल पड़ा। कहना न माननेवाले स्वामी का
भी सेवकों को विवश होकर अनुगमन करना ही चाहिए ॥२८॥
उधर वत्सराज भी शिकार खेलकर अपनी नगरी को लौटा। वह समझ रहा था कि सेना
आदि के मध्य युवराज भी आया होगा। नगरी में पहुँचकर महल पर जब युवराज का पता
नहीं चला। तब वे उदयन आदि सब रत्नप्रभा के समीप गये ॥ २९॥
पहले तो रत्नप्रभा भी व्याकुल हुई किन्तु अपनी विद्या में ध्यान देकर उसके द्वारा अपने
प्रिय का समाचार जानकर व्याकुल श्वशुर से बोली ॥३०॥
वन में किसी तपस्विनी द्वारा कर्पूरिका नाम की राजकुमारी का पता पाकर आर्यपुत्र
उसे प्राप्त करने के लिए कर्पूरसम्भव नामक नगर में गये हैं, इसलिए आप लोग चिन्ता न
करें। यह मैंने अपनी विद्या के प्रभाव से जाना है ॥३१-३४॥
ऐसा कहकर रत्नप्रभा ने परिवार-सहित वत्सराज को शान्ति प्रदान
की ॥३५॥
और फिर, रत्नप्रभा ने दूसरी विद्या का प्रयोग किया कि मार्ग में नरवाहनदत्त को किसी
प्रकार का कष्ट न हो। पति का हित चाहनेवाली अच्छी स्त्रियाँ ईर्ष्या को हृदय में स्थान नहीं
देतीं ॥३६॥
इधर काठ की पीठ पर बैठा हुआ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जंगल का बहुत-सा
मार्ग पार कर गया ॥३७॥
तब अकस्मात् ही मार्ग में एक कुमारी ने आकर कहा—मैं मातङ्गी नाम
की विद्या हूँ। रत्नप्रभा द्वारा प्रेषित हूँ। मार्ग में अङ्गारक से तुम्हारी रक्षा करनी
है। तुम निश्चिन्त होकर जाओ। ऐसा कहकर वह विद्या उसके देखते-देखते ही अदृश्य
हो गई ॥३८-३९॥
तब उस विद्या के प्रभाव से अन्धकार में रविनगर के लिए चल पड़ा और रत्नप्रभा की
प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त आगे चला ॥४०॥
सायंकाल वन में एक निर्मल तालाब दिखा। वहाँ नरवाहनदत्त ने गोमुख के साथ
उतर कर आह्निक शौचेन्द्रादि का आहार कर सन्ध्यावन्दनादि किया ॥४१॥
१६४ कथासरित्सागर
१६४ कथासरित्सागर
नक्तं च तत्र संयम्य दत्तघासौ हयावुभौ ।
मन्त्रिद्वितीयो वासार्थमारुरोह महातरुम् ॥४२॥
तस्योरुशाखासविष्टो वित्रस्तहयहर्षिते ।
प्रबुद्धः सोऽन्तराधस्तादपश्यत् सिंहमागतम् ॥४३॥
दृष्ट्वा त्रातितितीर्षुं तमवतार्ये गोमुखोऽब्रवीत् ।
अहो देहानपेक्षं संभ्रमेणैव चेष्टसे ॥४४॥
शरीरमूला हि नृपा मन्त्रमूला च राजता ।
युयुत्ससे तत्तिर्यङ्मर्मखण्डदंष्ट्रायुधैः कथम् ॥४५॥
एतद्रक्षार्थमेवावामिहारूढौ हि सम्प्रति ।
इति गोमुखवागुढो युवराजः स सल्लम्रम् ॥४६॥
सिंहं तं तुरगं घ्नन्तं दृष्ट्वा छुरिकया द्रुतम् ।
आजघान नरो पृष्ठोत् क्षिपत्या स निमग्नया ॥४७॥
स तथा तेन विद्धोऽपि तं हत्वैव हयं बली ।
सिंहो व्यापादयामास द्वितीयमपि वाजिनम् ॥४८॥
ततो वत्सेश्वरसुतः खड्गमादाय गोमुखात् ।
तेन क्षिप्तेन मध्ये तं सिंहं द्वेधा चकार सः ॥४९॥
अवतीर्य च सगृह्य कृपाणीं सिंहदहृतः ।
खड्गं चारुह्य सोऽत्रैव वृक्षे रात्रिमथास ताम् ॥५०॥
प्रातस्ततोऽवतीर्णश्च प्रतस्थे गोमुखान्वितः ।
मरणाहनदत्तांस्तस्तां स कर्पूरिकां प्रति ॥५१॥
अथ पद्भ्यां प्रयान्तं तं सिंहेन हतवाहनम् ।
दृष्ट्वा विनोदयन्नेवमुवाच पथि गोमुखः ॥५२॥
इन्दीवरसेनानिच्छासेनयोः कथा
येव प्रासङ्गिकामेतां कथामान्यामि ते शृणु ।
अस्तीहैरावती नाम नगरी विजितालका ॥५३॥
तस्यामभूत् परित्यागसेनो नाम महीपतिः ।
बभूवतुश्च तस्य द्वे देव्यौ प्राणसमे प्रिये ॥५४॥
एका स्वर्मश्रिततया नाम्नोऽधिकसङ्गुमा ।
नाम्ना तु काव्यालङ्कारा द्वितीया राजलक्षण ॥५५॥
सप्तम लम्बक १६५
सप्तम लम्बक १६५
रात को वहाँ घोड़ों को घास देकर और वृक्ष के नीचे बाँधकर गोमुख के साथ सोने के
लिए बड़े पेड़ पर चढ़ा ॥४२॥
उसकी विशाल शाखा पर सोये हुए उसने डरे हुए घोड़ों की हिनहिनाहट से जागकर नीचे
आये हुए एक सिंह को देखा ॥४३॥
उसे देखकर घोड़ों की रक्षा के लिए नीचे उतरने को उद्यत युवराज को देखकर गोमुख
बोला- शरीर का ध्यान न करके और मुझसे सम्मति भी न करके तुम उतरने की चेष्टा कर
रहे हो। राजा का मूल शरीर है और वही राज्य का मूल मन्त्र है। तुम मनुष्य होकर नख और
दाँतोंवाले पशुओं से युद्ध करने के लिए क्यों तैयार हो रहे हो? इसी शरीर की रक्षा
के लिए हम दोनों इस समय वृक्ष पर चढ़े हुए हैं। गोमुख की इन बातों से युवराज रुक
गया ॥४४-४६॥
घोड़े को मारते हुए शेर पर उसने ऊपर से ही छुरी मारी और वह छुरी सिंह के
शरीर में धँस गई ॥४७॥
छुरी से मारे जाने पर भी सिंह ने उस घोड़े को मारकर दूसरे घोड़े को भी मार
डाला ॥४८॥
तब वत्सेश्वर-पुत्र युवराज ने गोमुख से तलवार लेकर उसे ऊपर से ही फेंककर शेर
के दो टुकड़े कर दिये। और नीचे उतरकर सिंह के शरीर से तलवार खींचकर और फिर वृक्ष
पर चढ़कर उसने वह रात बिताई ॥४९-५०॥
प्रातःकाल वृक्ष से उतरकर नरवाहनदत्त गोमुख के साथ कर्पूरिका की ओर चल
पड़ा ॥५१॥
शेर के द्वारा वाहनों के मारे जाने के कारण पैरों से ही चलते हुए नरवाहनदत्त का मनोरंजन
करने के लिए गोमुख ने मार्ग में कहा-॥५२॥
इन्दीवरसेन और अनिश्चयसेन की कथा
'स्वामी ! मैं इस समय के प्रसंग में तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। उसे सुनो इस पृथ्वी पर
अपने सौन्दर्य से अलका (कुबेरनगरी) को जीतनेवाली शरावती नाम की एक नगरी है।
उस नगरी में परितोषसेन नाम का राजा था उसकी प्राणों के समान प्यारी दो
रानियाँ थीं ॥५३-५४॥
उनमें से एक अधिकप्रभा नाम की राजा के मन्त्री की कन्या थी और दूसरी
सांध्यालङ्कारा किसी राजवंश की कुमारी थी ॥५५॥
१६६ कथासरित्सागरः
१६६ कथासरित्सागरः
ताभ्यां समं च सोऽपुत्रो राजा पुत्रार्थमम्बिकाम्।
आराधयन्निराहारो दर्भशायी व्यधातपः॥५६॥
ततः सा तं तपस्तुष्टा स्वप्ने दत्त्वा फलद्वयम्।
दिव्यं समादिशत् साक्षाद् भवानी भक्तवत्सला ॥५७॥
उत्तिष्ठ देहि दारभ्यो मह्यमेतत्फलद्वयम्।
ततो राजन् प्रवीरो ते जनिष्येते सुतावुभौ ॥५८॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे गौरी प्रबुद्धः स च भूपतिः।
ननन्द प्रातरुत्थाय हस्ते पश्यञ्छुभे फले ॥५९॥
स्वप्नेन तेन जानन्त्य वर्मिसेन परिग्रहम्।
स्नातो मृडानीमभ्यर्च्य चकार व्रतपारणम् ॥६०॥
नक्तं चोपैत्य तां पूर्वं राज्ञीमधिकसङ्गमाम्।
फलमेकं ददौ तस्यै सा च तत् क्षुभुजे ततः॥६१॥
ततस्तन्मन्दिरे तस्यामुवास स नृपो निशि।
तत्पितुर्मन्त्रिमुरव्यस्य निजस्य किल गौरवात् ॥६२॥
तच्चात्र निषधे सम्प्रत्यात्मशय्याशिरोऽन्तिके।
द्वितीयस्याः कृते देव्याः द्वितीयं कल्पितं फलम् ॥६३॥
सुप्तस्याथ नृपस्याथ राज्ञी साधिकसङ्गमा।
उत्थायात्मन एव द्वाविच्छन्ती सदृशौ सुतौ ॥६४॥
धीरौत्साहाद् भक्षयामास द्वितीयमपि तत्फलम्।
निसर्गसिद्धा नारीणां सपत्नीषु हि मत्सरः॥६५॥
प्रातःश्चोत्थाय चिन्वान तत्फलं सं महीपतिम्।
मयैवं तत्फलं भुक्तं द्वितीयमिति साऽब्रवीत् ॥६६॥
तत श्च राजा विमना निर्गत्यातीत्य वासरम्।
मत्वा तस्या द्वितीयस्या देव्या वासगृहं ययौ ॥६७॥
तत्र तत्पृच्छते तां याजमानां च सोऽब्रवीत्।
भुजस्व म तन्त्यन्तात् सपत्नी ते छलारिति ॥६८॥
ततः सा तनयोत्पत्तिहेतुमप्राप्य तत्फलम्।
बभूव बाष्पसंरुरवा राज्ञी तूष्णीं गुरुश्रिया ॥६९॥
गच्छत्स्वेव दिनेष्वेव राज्ञी गार्भधुरोद्वहा।
गर्भाभूसुताव... का... द्वौ युगलौ सुतौ ॥७०॥
सप्तम लम्बक १५७
सप्तम लम्बक १५७
वह राजा उन दोनों रानियों के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की
आराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर
और दो फल देकर आज्ञा दी—'उठो ! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके
प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५७-५८॥
ऐसा कहकर गौरी अन्तर्हित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल
देखकर प्रसन्न हुआ । राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया
और स्नान पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ॥५९ १/२ ॥
रात को राजा ने अधिकसंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे
खा लिया ॥६१॥
राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उस रात को उसी
रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया ।
राजा के सोये रहने पर रानी अधिकसंयमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से
उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से खा लिया। स्त्रियों का सौतों के प्रति द्वेष स्वाभाविक
ही होता है ॥६२ १/२॥
सबेरे उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उसने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैंने
ही खा लिया' ॥६६॥
तब दुःखित मनवाला राजा उसके महल से निकलकर और राजकार्यों में दिन
बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥
वहाँ उस रानी के फल माँगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोय रहने पर तुम्हारी सौत
ने छल से उस फल को भी खा लिया ॥६८॥
तब वह रानी कान्तालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर
अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥
कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकसंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने
एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ॥७० ॥
१६६ कथासरित्सागर
१६६ कथासरित्सागर
ताभ्यां समं च सोऽपुत्रो राजा पुत्रार्थमम्बिकाम्।
भाराधयन्निराहारो धर्मशाली व्यषात्तपः ॥५६॥
तत सा च तपस्तुष्टा स्वप्ने दत्त्वा फलद्वयम्।
दिव्यं समादिशत् साक्षाद् भवानी भक्तवत्सला ॥५७॥
उत्तिष्ठ देहि दारेभ्यो भक्ष्यमेतत्फलद्वयम्।
ततो राजन् प्रवीरो त जनिष्येत सुतावुभौ ॥५८॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे गौरी प्रबुद्धः स च भूपतिः।
ननन्द प्रातरुत्थाय हस्ते पश्यञ्छुभे फले ॥५९॥
स्वप्नेन तेन चानन्दं वर्णितेन परिग्रहम्।
स्नातो मृडानीमभ्यर्च्य चकार व्रतपारणाम् ॥६०॥
नक्तं चोपेत्य तां पूर्वं राज्ञीमधिकसङ्गमाम्।
[L13: फलमेकं ददौ तस्यै सा च तद् बुभुजे तदा ॥६१॥
ततस्तन्मन्दिरे तस्यामुवास स नृपो निशि।
तत्पितुर्मन्त्रिमुल्यस्य निजस्य किल गौरवात् ॥६२॥
तच्चात्र निदधे सम्प्रत्यात्मशय्याशिरोऽन्तिके।
द्वितीयायाः कृते देव्या द्वितीयं कल्पितं फलम् ॥६३॥
सुप्तस्याथ नृपस्याथ राज्ञी साधिकसङ्गमा।
उत्थायात्मन एव द्रागिच्छन्ती सदृशौ सुतौ ॥६४॥
धीपन्ताद् भक्षयामास द्वितीयमपि तत्फलम्।
निमग्नमिश्रा नारीणां सपत्नीषु हि मत्सरः ॥६५॥
प्रातश्चोत्थाय चिन्वानं तत्फलं तं महीपतिम्।
मयैव तत्फलं भुक्तं द्वितीयमिति साऽब्रवीत् ॥६६॥
ततः स राजा विमना निगत्यातीर्य वासरम्।
भक्त्या तस्या द्वितीयाया देव्या वासगृहं ययौ ॥६७॥
तत्र तत्फलवार्त्तां तां याचमानां च सोऽब्रवीत्।
सृजत्य मे सपत्न्यानात् सपत्नी त छलादिति ॥६८॥
मत मा तनयोत्पत्तिहेतुमप्राप्य तत्फलम्।
बभूव बाष्पसम्पूर्णा रात्री तूष्णीं मुदु स्थिता ॥६९॥
[L30: गच्छतात्यल्प निष्पन्न गर्भो मार्जधिवमद्भुता।
गर्भाभिमूद्भूताय कान्ते द्वौ युगपत् सुतौ ॥७०॥
सप्तम लम्बक १६७
सप्तम लम्बक १६७
वह राजा उन दोनों रानियों के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती अम्बिका की
आराधना करता हुआ निराहार रहकर और कुशा पर सोकर तपस्या करने लगा ॥५६॥
उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी ने उसे स्वप्न में स्वयं दर्शन देकर
और दो फल देकर आज्ञा दी—'उठो ! अपनी स्त्रियों को ये दो फल खाने के लिए दो। इसके
प्रभाव से हे राजन् ! उन दोनों के दो पुत्र उत्पन्न होंगे ॥५७-५८॥
ऐसा कहकर गौरी अन्तर्हित हो गई। राजा उठा और प्रातःकाल दोनों हाथों में दो फल
देखकर प्रसन्न हुआ। राजा ने स्वप्न के समाचार से उन दोनों रानियों को आनन्दित किया
और स्नान पूजन आदि करके व्रत का पारण किया ॥५९-६०॥
रात को राजा ने अधिकतुंगमा रानी के महल में जाकर उसे फल दिया और उसने उसे
खा लिया ॥६१॥
राजा के मुख्य मन्त्री की कन्या होने के गौरव के कारण राजा उस रात को उसी
रानी के पास रह गया और दूसरी रानी के लिए रखे हुए फल को सिरहाने रख दिया।
राजा के सोये रहने पर रानी अधिकतुंगमा ने उठकर एक साथ दो समान पुत्रों की इच्छा से
उस दूसरे फल को भी ऊपर के भाग के पास से खा लिया। स्त्रियों का सौत के प्रति द्वेष स्वाभाविक
ही होता है ॥६२ ६५॥
सबेरे उठकर उस फल को खोजते हुए राजा से उसने कहा कि 'वह दूसरा फल भी मैंने
ही खा लिया' ॥६६॥
तब दुःखित मनवाला राजा उसके भवन से निकलकर और राजकार्यों में दिन
बिताकर रात को दूसरी रानी के भवन में गया ॥६७॥
वहाँ उस रानी के फल माँगने पर राजा ने कहा कि 'मेरे सोये रहने पर तुम्हारी सौत
ने छल से उस फल को भी खा लिया' ॥६८॥
तब वह रानी काष्ठालंकारा पुत्र की उत्पत्ति के कारणभूत उस फलको न पाकर
अत्यन्त दुःखी होकर चुप रही ॥६९॥
कुछ समय व्यतीत होने पर वह रानी अधिकतुंगमा गर्भवती हुई और दसवें महीने उसने
एक साथ दो बालक उत्पन्न किये ॥७०॥
१६८ कथासरित्सागर
१६८ कथासरित्सागर
राजापि स तदुत्पत्तिफलितस्वमनोरथः ।
नन्दति स्म परित्यागसेनः कृतमहोत्सवः ॥७१॥
तयोश्च सुतयोर्ज्येष्ठमिन्दीवरनिभेक्षणम् ।
नाम्नेन्दीवरसेनं स नृपश्चक्रेऽमृताकृतिम् ॥७२॥
विषमेण कनीयांसमनिच्छासेनमाख्यया ।
तज्जनन्यै यतो भुक्तं फलं तत्तदनिच्छया ॥७३॥
अथात्र तस्य राज्ञी सा द्वितीया भूमिपस्य तत् ।
आलोक्य काष्र्ण्यालङ्कारा सामर्षं समचिन्तयत् ॥७४॥
अहो अहं सुतप्राप्तौ सपत्न्या वञ्चितैतया ।
तत्तस्या मयाऽवश्यं कार्या मन्युप्रतिक्रिया ॥७५॥
विनाश्यौ तनयावेतावेतदीयो स्वयुक्तितः ।
इति सञ्चिन्त्य सा तस्थौ तदुपायं विचिन्वती ॥७६॥
यथा यथा च तौ तत्र व्यवृधाते नृपात्मजौ ।
तथा तथास्या ववृधे हृदये वैरपादपः ॥७७॥
क्रमेण यौवनस्थौ च तौ विज्ञापयतः स्म तम् ।
राजपुत्रौ स्वपितरं जिगीषू भुजशालिनौ ॥७८॥
अस्त्रेषु शिक्षितौ तावद्यावां सम्प्राप्तयौवनौ ।
सद्भुजान् विफलानेतान् विभ्रतौ कथमस्वाहे ॥७९॥
क्षत्रियस्याजिगीषोस्य धिग्बाहुं धिक् च यौवनम् ।
अतोऽनुजानीह्यधुना तात दिग्विजय्याय नौ ॥८०॥
इति सून्वोर्वचः श्रुत्वा राजा हृष्टोऽनुमन्य सः ।
यात्रारम्भं परित्यागसेनो व्यदधे तयोः ॥८१॥
यच्चैतन्महद् जातं युवयोः स्यात्तदम्बिका ।
स्मर्तव्याऽर्तिहरा देवी तया दत्तौ हि मे युवाम् ॥८२॥
इत्युक्त्वा च स तौ राजा यात्रायै प्राहिणोत्सुतौ ।
युक्तौ सैन्यै रथामात्यैर्जनन्यै कृतमङ्गलौ ॥८३॥
निजं मन्त्रिप्रधानं च पश्चात्तातस्तयोस्तदा ।
प्रणामाहार्यं व्यसृजद्धाम्ना प्रथमसङ्गतम् ॥८४॥
अथ तौ राजपुत्रौ द्वौ सबलौ भ्रातरौ व्रजन्न् ।
गत्वा प्राचीं दिशं पूर्वं जिग्यतुः प्राज्यविक्रमौ ॥८५॥
सप्तम लम्बक १९९
सप्तम लम्बक १९९
राजा भी उनकी उत्पत्ति से सफलमनोरथ होकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने महान्
उत्सव किया ॥७१॥
राजा ने उन दोनों में से कमल के समान नेत्रवाले तथा अद्भुत आकृतिवाले बड़े पुत्र का
नाम इन्दीवरसेन रखा ॥७२॥
और, दूसरे छोटे पुत्र का नाम अनिच्छासे न रखा क्योंकि उसके लिए उसकी माता ने
राजा की इच्छा के विरुद्ध फल खा लिया था ॥७३॥
तदनन्तर राजा की दूसरी रानी काव्यालङ्कारा यह देखकर क्रोध से भरी हुई सोचने
लगी—॥७४॥
ओह ! मेरी इस सौत ने मुझे पुत्र-प्राप्ति से वंचित कर दिया है। इसलिए, इस क्रोध
का बदला मुझे अवश्य लेना चाहिए ॥७५॥
अपनी युक्ति से इसके दोनो लड़कों का विनाश करना चाहिए। ऐसा सोचकर वह
अवसर की प्रतीक्षा में उपाय सोचती हुई चुप बैठी रही ॥७६॥
जैसे-जैसे राजा के वे दोनो बालक बढ़ते गए, वैसे ही वैसे उसका क्रोध-रूपी वृक्ष भी
बढ़ता रहा ॥७७॥
क्रमशः यौवन अवस्था में आये हुए बलशाली वे दोनों राजकुमार, दिग्विजय की इच्छा से
अपने पिता के पास आकर बोले—॥७८॥
महाराज ! हम लोग अस्त्र-शस्त्र विद्या में शिक्षित हो गये और युवावस्था में प्राप्त हो
गये तो हम इन निष्फल भुजाओं को लेकर व्यर्थ क्यों बैठें ? विजय की इच्छा न रखनेवाले
क्षत्रिय की भुजाओं को और उनके यौवन को धिक्कार है । इसलिए, पिताजी ! हम दोनों
को दिग्विजय-यात्रा के लिए आज्ञा प्रदान करें ॥७९-८०॥
कुमारों की बातों को सुनकर राजा प्रसन्न हुआ उसे स्वीकार किया और उनकी
दिग्विजय-यात्रा की तैयारी की और उनसे कहा कि 'तुम्हें जब कभी संकट का सामना करना
पड़े तब कष्टहारिणी माता अम्बिका का स्मरण करना। तुम दोनों उसी अम्बिका के दिये
हुए हो' ॥८१-८२॥
ऐसा कहकर राजा ने सेना सामन्त आदि के साथ उन दोनो को विजय-यात्रा
के लिए भेज दिया। अपने वृद्ध प्रधान मन्त्री और उन कुमारो के मामा प्रथममयस को भी
परामर्श आदि देने के लिए साथ भेज दिया। उनकी माता ने प्रस्थान के समय मंगलाचरण
किया ॥८३-८४॥
उन दोनों बलवान् भाइयों ने पहले पूर्व दिशा में जाकर दिग्विजय किया ॥८५॥
२२
१७० कथासरित्सागर
१७० कथासरित्सागर
ततोऽप्रतिहतौ वीरौ मिलितानेकपाथिवौ ।
जेतुं सिद्धप्रतापौ तौ जग्मतुर्दक्षिणां दिशम् ॥८६॥
तां च वार्तां तयोः श्रुत्वा पितरौ तौ ननन्दतुः ।
प्रज्वलापरमाता तु सान्तर्विद्वेषवह्निना ॥८७॥
एताभ्यां भुजदर्पेण पृथ्वीं जित्वा निहत्य माम् ।
राज्यं मदीयं स्वीकृतुं मत्पुत्राभ्यां विचिन्तितम् ॥८८॥
तद्यद्य मयि भक्ताश्चेदेतावत्र मत्सुतौ ।
अविचार्यैव युष्माभिनिहन्तव्यावुभावपि ॥८९॥
इति तत्कटकस्थेभ्यः सामन्तेभ्यस्ततः शठा ।
राजादेशं तथा रात्री तन्नाम्नेवाभिलिख्य सा ॥९०॥
सन्धिविग्रहकायस्थेनाहृतेनार्थसञ्चयैः ।
उपांशु काष्ठालङ्कारा व्यसृजल्लेखहारकम् ॥९१॥
स च गुप्तं तयोर्गत्वा कटकं राजपुत्रयोः ।
सामन्तेभ्यो ददौ तेभ्यस्तांल्लेखांल्लेखहारकः ॥९२॥
ते वाचयित्वा तान् सर्वे राजनीतिं सुकर्कशाम् ।
विचिन्त्य तां प्रभोराज्ञामनुलङ्घयामवेक्ष्य च ॥९३॥
रात्रौ मिलित्वा सम्मन्त्र्य निहन्तुं तौ नृपात्मजौ ।
विवक्षां निश्चयं चक्रुस्तद्गुणावर्जिता अपि ॥९४॥
तच्च बुद्ध्वैव तन्मध्यादेकस्य सुहृदो मुखात् ।
तौ स मातामहः मन्त्री राजपुत्रौ सह स्थितः ॥९५॥
बोधयित्वा यथातत्त्वमारोप्य वरवाजिनोः ।
अपसारितवान् गुप्तं तत्कालं कटकात्ततः ॥९६॥
तेनापसारितौ तौ च व्रजन्तौ निशि तद्रुतौ ।
विन्ध्याटवीं विविशतुर्मार्गाज्ञानान्नृपात्मजौ ॥९७॥
तत्र रात्रावतीतायां प्रभात् प्रत्यम्यतोस्तयोः ।
मध्याह्ने वितृषाशान्तौ हयी पञ्चत्वमापतुः ॥९८॥
स च मातामहो वृद्धः शुशुचाणुकवालुकः ।
व्यपद्यतातपक्लान्तो नान्तयोः पश्यतस्तयोः ॥९९॥
अनागसौ कथं पित्रा गमितौ स्वो दशांमिमाम् ।
गतामा कुर्वता शौ तौ दुष्टामपरमातरम् ॥१००॥
सप्तम लम्बक १७१
सप्तम लम्बक १७१
तब अप्रतिहत शक्तिवाले दोनों वीर अनेक राजाओं को मिलाकर अपने प्रताप और
अधिकार जमाकर दक्षिण दिशा को गये ॥८६॥
उनका विजय-समाचार सुनकर उनके माता-पिता अत्यन्त प्रसन्न हुए किन्तु दूसरी
माता काव्यालङ्कारा द्वेषाग्नि की ज्वाला से भीतर-ही-भीतर जल-भुन गई ॥८७॥
'इन मेरे दोनों लड़कों ने पृथ्वी को जीतकर और मुझे मारकर मेरे राज्य पर अधिकार
कर लेने का निश्चय किया है। इसलिए, यदि तुम लोग मेरे सच्चे स्नेही और भक्त हो तो बिना
विचारे इन दोनों को मार डालो। -इस प्रकार, सेना-अधिकारियों के नाम राजा का आज्ञापत्र
कायस्थ (मुंशी) से (घूस देकर) लिखवा लिया और धन देकर सन्देश ले जानेवाले दूत के
हाथ काव्यालंकारा ने गुप्त रूप से सेना के शिविर में भेज दिया। दूत ने शिविर में जाकर पत्र दे
दिया ॥८८-९२॥
सेनाधिकारियों ने पत्र लेकर और उसे बाँचकर राजनीति को अत्यन्त कठोर जानकर
और राजा की आज्ञा को अनुलंघनीय समझकर दोनों राजकुमारों को मार डालने के लिए
रात्रि के समय सम्मति की और विवश होकर मारने का निश्चय किया ॥९३-९४॥
उन अधिकारियों में एक ने जो उन बालकों के नाना बूढ़े प्रधान मन्त्री का मित्र था इस
बात की सूचना उसे दी। सूचना पाकर बूढ़े प्रधान मन्त्री उन दोनों नातियों को सावधान करके
और अच्छे घोड़ों पर बैठकर उनके साथ रात में ही सेना-शिविर से भाग गया। जंगली मार्ग
न जानने के कारण भटकते हुए दोनों राजकुमार और उनका बूढ़ा नाना मध्याह्न की धूप
में विन्ध्य पर्वत के जंगल में भूख-प्यास से व्याकुल हो गये। उनके दोनों घोड़े प्यास से
मर गये और भूख-प्यास के क्लेश से बूढ़ा उनका नाना मन्त्री भी उनके देखते-देखते ही मर
गया ॥९५-९९॥
'पिता ने दुष्टा दूसरी माता को प्रसन्न करने के लिए निरपराध हम लोगों को वैसी दशा में
पहुँचा दिया'—॥१ ॥
१७२ कथासरित्सागर
१७२ कथासरित्सागर
इति तौ वन क्षोभन्तौ दुःखितौ भ्रातरौ वत।
प्राक् पित्रेवोपदिष्टां तां देवीं बध्यतुरम्बिकाम् ॥१०१॥
तस्या ध्यानप्रभावेण शरण्यायास्तदत्र तौ।
विगतक्षुत्क्लमतृषौ बलिनौ च बभूवतुः ॥१०२॥
ततस्तत्प्रत्ययाच्छ्रस्तावविश्वासपथध्मौ ।
तामेव ययतुर्दृष्टु विन्ध्यकान्तारवासिनीम् ॥१०३॥
तत्र प्राप्तौ तदग्रे च भ्रातरौ तावुभावपि।
प्रारभेतां निराहारौ तामाराधयितु तपः ॥१०४॥
अत्रान्तरे च ते तत्र सामन्ताः कटके स्थिताः ।
सम्भूय यावदायान्ति तयो पाप चिकीर्षवः ॥१०५॥
तावत् क्वचिन्न ददृशुर्विचिन्वन्तोऽपि सर्वतः ।
सौ समातामहो क्वापि राजपुत्रौ पलायितौ ॥१०६॥
ततश्चाशङ्क्य त मन्त्रभेद सर्वेऽपि ते भयात् ।
राज्ञस्तस्य परित्यागसेनस्यान्तिकमाययुः ॥१०७॥
प्रदर्श्य तस्मै सेखांश्च यथावृत्त तमब्रुवन्।
सोऽत्र बुद्ध्या सद्वृत्तान्त क्रुद्धस्तानेवमब्रवीत् ॥१०८॥
नैत मत्स्रहिता लेखा इन्द्रजाल किमप्यदः ।
यूय च न किमेतावदपि जानीथ बालिशाः ॥१ ९॥
यदनल्पतपःप्राप्तावह हन्मि कथ सुतौ।
युष्माभिस्तौ हतावेव सुहृत्त्वैस्तु रक्षितौ ॥११०॥
मातामहेन च तयोर्लक्षित मन्त्रिणाफलम्।
इत्युक्त्वा तान् स सामन्तान् कायस्थ कूटलेखकम् ॥१११॥
तं पलायितमप्याशु स्वशक्त्यानाय्य भूपतिः ।
सम्यक पृष्ट्वा यथावृत्तं यथावन्निगृहीतवान् ॥११२॥
भार्या च काम्यारूङ्काराम् तादृक् कार्यविधायिनीम्।
भूगृहे स निक्षिपेत पापां तां पुत्रघातिनीम् ॥११३॥
अविचार्य तु पर्यन्तमतिङ्गपान्थया धिया।
सहसा हि कृतं पापं कथ मा भूद्विपत्तये ॥११४॥
ये च त राजपुत्राभ्यां राह गत्वाभ्युपागताः ।
सामन्तास्तान्निवार्याग्यांस्त्वत्परं स मृगो व्यधात् ॥११५॥
सप्तम लम्बक १७३
सप्तम लम्बक १७३
ऐसा सोचते हुए उन दोनों दुःखित भाइयों ने पिता के पूर्व उपदेश का स्मरण करके
माता अम्बिका का ध्यान किया ॥१ १॥
भक्तों को शरण देनेवाली माता के स्मरण से वे दोनों भूख-प्यास से रहित और
बलवान् हो गये ॥१ २॥
इस प्रकार, माता के चमत्कार से कुछ आशा प्राप्त करके मार्ग न जानते हुए भी वे दोनों
विन्ध्यवासिनी देवी की ओर चल पड़े ॥१ ३॥
वहाँ पहुँचकर वे दोनों विन्ध्यवासिनी देवी को प्रसन्न करने के लिए उसके सन्मुख निराहार
रहकर कठोर तप करने लगे। उधर सेना के अधिकारी जब राजा के आज्ञानुसार राजकुमारों
को मारने के लिए एकत्र होकर आये तब उन्होंने बहुत खोजने पर भी उन राजकुमारों
को नहीं देखा और समझ गये कि वे दोनों अपने बूढ़े नाना के साथ शिबिर से कहीं भाग
गये ॥१ ४-१ ६॥
वे सब गुप्त वार्ता के प्रकट हो जाने के कारण घबराये हुए राजा परित्यागसेन के समीप
डरते-डरते आये ॥१ ७॥
और, राजा को उसके लेख दिखाकर सब समाचार सुना दिया। राजा यह सब सुनकर
और समझकर क्रोध करके उनसे बोला—'ये लेखपत्र आदि मेरे भेजे हुए नहीं हैं। यह क्या इन्द्रजाल
है? मूर्ख तुम क्या यह नहीं जानते थे कि कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त किए हुए बच्चों को मैं
स्वयं कैसे मारता? तुम लोगों ने तो उन्हें मार ही डाला था। केवल अपने पुण्य से वे बच गये हैं।
उनके नाना ने भी मन्त्री होने का फल दिखा दिया। ऐसा कहकर उसने उन सब अधिकारियों
तथा आये हुए भी उस मिथ्याचारी लेखक को पकड़वाकर बुलाया और सब को मरवा
डाला और ऐसे नीच कार्य करनेवाली पुत्रघातिनी पत्नी काव्यालंकारा को भी गड्ढे में डलवा
दिया ॥१ ८-११३॥
अत्यन्त द्वेष के कारण अन्धी बुद्धि से बिना विचारे जो पाप किया जाता है उससे विपत्ति
क्यों न आयगी ? ॥११४॥
राजा ने राजकुमारों के साथ गये हुए सभी अधिकारियों और नौकरों को हटाकर उनके
स्थान पर दूसरे व्यक्तियों की नियुक्ति की ॥११५॥