कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
१८८ कथासरित्सागर
१८८ कथासरित्सागर प्राप्तं तं तत्र बुद्ध्वा सा श्रुताश्वजर्यरथस्वना ॥ दमयन्ती जहर्षान्तः सम्भावितनलागमा ॥ ३९० ॥ विससर्जाथ सा तन्मन्वेष्टुं चेटिकां निजाम् । सा चान्विष्यागता चेटी तामुवाच प्रियोत्सुकाम् ॥ ३९१ ॥ देवि गत्वा मयान्विष्टमेष यः कोशलेश्वरः । स्वयंवरप्रवादं तं मिथ्या श्रुत्वा किलागतः ॥ ३९२ ॥ आनीतो रथवाहेन सूदेन ह्रस्वबाहुना । एकेनैव दिनेनाश्व रथविज्ञानशालिना ॥ ३९३ ॥ स च तत्सूपशालायां गत्वा सूदो मयेक्षितः । कृप्णवर्णो निरुपमश्च प्रभावः कोऽपि तस्य तु ॥ ३९४ ॥ विक्षिप्तमेव यत्तस्य पानीयं परपूरितम् । काष्ठान्यनर्पिताग्नीनि स्वयं प्रज्वलितानि च ॥ ३९५ ॥ क्षणाच्च भोजनैस्तैस्तन्निष्पन्नं दिव्यमेव च । एतद्बुद्ध्वा महाश्चर्यं ततस्त्वहमिहागता ॥ ३९६ ॥ एतच्चेटीमुखाच्छ्रुत्वा दमयन्ती व्यचिन्तयत् । वश्याग्निवरुणः सूदो रथविद्यारहस्यवित् ॥ ३९७ ॥ आर्यपुत्रो भवेत्येष गतो वैरुप्यमन्यथा । जाने मद्धिप्रयोगात्तं जिज्ञासुरुह रूप्यमूमू ॥ ३९८ ॥ इति सङ्कल्प्य युक्त्वा स्त्रीं राहू चेट्या तयैव सा । तस्यान्तिकं दर्शयितुं प्राहिणोद्दारकावुभौ ॥ ३९९ ॥ स तौ निजशिशू बुद्ध्वा कृत्वा धाङ्क तरुश्चिरम् । गलद्वाराप्रवाहेण तूष्णीमरुददक्षुणा ॥ ४०० ॥ ईदृशावेव मे बालो मातामहगृहे स्थितौ । जातं मे तत्स्मृतैर्वृत्तभित्युवाच स चेटिकाम् ॥ ४०१ ॥ सा धिच्या सहो गत्वा चेटी सर्वं शशंस तत् । दमयन्त्यै ततः सापि जातास्था सुतरामभूत् ॥ ४०२ ॥ अपरेद्युस्ततः सा प्रात स्वचेटीमादिदेश सा । गत्वा तमृतुपर्णस्य सूतं मद्वचनाद्वद ॥ ४०३ ॥ श्रुतं मया यदुद्भ्रान्तो सूदो नान्यतोऽस्ति सूपकृत् । तन्ममार्थ स्वयागत्य व्यञ्जनं साध्यतामिति ॥ ४०४ ॥
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आश्चर्यजनक रथ की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती हृदय से प्रसन्न हुई ॥३९०॥ तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली—॥३९१॥ हे देवि मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर आया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारथी एक दिन में ही यहाँ ले आया है। क्योंकि वह रथ-संचालन-विज्ञान का विशेषज्ञ है॥३९२-३९३॥ तो मैंने रसोईघर में जाकर उस रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का कोई व्यक्ति है॥३९४॥ उसका चमत्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था किन्तु उसमें स्वयं पानी आ गया लकड़ियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥ दासी के मुँह से यह सब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी— अग्नि और जल जिसके वश में हों और जो रथ-विद्या के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नल) इतना विकल कैसे हो गया। मैं समझती हूँ मेरे वियोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती हूँ ॥३९७-३९८॥ ऐसा सोचकर दमयन्ती ने उस दासी के साथ आने वाले बच्चों को नल के पास भेजा ॥३९९॥ उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में रखकर बहुत समय तक धारा प्रवाह आँसू बहाते हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥ कुछ समय बाद वह चेटी (दासी) से बोला—ऐसे ही मेरे दो बच्चे अपने नाना के घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ॥४०१॥ तब उस दासी ने उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया। तब दमयन्ती का भी पूर्ण विश्वास हो गया ॥४०२॥ दूसरे दिन प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए से कह दे—॥४०३॥ कि मैंने सुना है तेरे समान दूसरा कोई रसोइया नहीं है अतः आज तू मेरे यहाँ आकर भोजन बना ॥४०४॥ ८२
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर तथेति स तदा गत्वा नलशङ्कया तयार्थितः । ऋतुपर्णमनुज्ञाप्य दमयन्तीमुपाययौ ॥४०५॥ सत्यं ब्रूहि नलो राजा यदि त्वं सूदरूपभृत् । चिन्ताब्धिमग्नां पारं मां प्रापयाश्वेत्युवाच सा ॥४०६॥ तच्छ्रुत्वा स नलः स्नेहहर्षदुःखप्रपाकुलः । अवाङ्मुखः प्राप्तकालं सामुवाचाथगद्गदम् ॥४०७॥ स एवास्मि नलः सत्यं पापः कुलिशकर्कशः । त्वां संतापयता येन व्यामोहादनलायितम् ॥४०८॥ इत्युक्तवान्स पृष्टोऽभूद्दमयन्त्या तया नलः । यद्येवं तद्वैरूप्यत्वं कथं प्राप्तो भवानिति ॥४०९॥ ततः स तस्यै स्वोदन्तं नलः कृत्स्नमवर्णयत् । कार्कोटकस्यादारभ्य कलिंनिर्गमनावधिम् ॥४१०॥ तदैव चाग्निशौचं तद्दत्तं कार्कोटकेन सः । प्रावृत्य वस्त्रयुगलं रूपं स्वं प्रत्यपद्यत ॥४११॥ दृष्ट्वा नलं पुनरवाप्तनिजाभिरामरूपं तमाशु विकसद्वदनारविन्दा । मत्राश्रुभिः शमितदुःखदवानलेव हर्षं कमप्यनुपमं दमयन्त्यवाप ॥४१२॥ बुद्धा च तत्परिजनात्प्रमदप्रवृत्तावागत्य तत्र सहसा स विदर्भराजः । भीमो नलं समभिनन्द्य कृतानुम्पूजं महोत्सवमयं स्वपुरं चकार ॥४१३॥ हृष्टता हृदि भीमभूपुजा कृतसत्कृत्युपचारसत्क्रियः । ऋतुपर्णनृपोऽपि तं नलं प्रतिपूज्याथ जगाम कोशलान् ॥४१४॥ अथ निषधनरेश्वरो निजं कलिघोरात्म्यविजृम्भितं नलः । श्वशुराय स तत्र वर्णयन्नवसत् प्राप्तसमासक्तं सुखम् ॥४१५॥ गत्वाल्पैरेव दिनैस्ततः स निषधान्सैन्यैः सह स्वाशुरै- रद्यामानजितं विधाय विनतं तं पुष्कराख्यं पुनः । धर्मात्मा धृतसंविभागमगुजं देहाद् गतद्वापरं राज्यं स्वं दमयन्त्यवाप्तिसुखितो भेजे यथावन्नलः ॥४१६॥ इति स व्याख्याय कथां नगरे तारापुरे द्विजः सुमनाः । राजसुतां बन्धुमतीं प्रोषितपतिकांमुवाच तां भूयः ॥४१७॥ एवं भुवि महान्तो विपद्य दुःखं भजन्ति कल्याणम् । अनुभूयास्तमनं किल दिनकृत्प्रमुखा व्रजन्त्युदयम् ॥४१८॥
नवम लम्बक १६१
नवम लम्बक १६१ 'ठीक है' ऐसा कहकर दासी द्वारा प्रार्थित किया गया पाचक, ऋतुपर्ण से आज्ञा लेकर दमयन्ती के पास आया ॥४५॥ तब उसे देखकर दमयन्ती बोली-रसोईए का रूप धारण किये हुए तुम यदि राजा नल हो, तो चिन्ता-समुद्र में डूबी हुई मुझे आज पार लगाओ' ॥४०६॥ यह सुनकर स्नेह दुःख और लज्जा से व्याकुल राजा नल नीचे मुंह किये हुए आँसुओं से दबे गले से अन्दर की बात बोला—॥४०७॥ 'हाँ मैं वही वज्र-सा कठोर पापी नल हूँ। तुम्हें सन्तप्त करते हुए मैंने नल होकर भी अनल (अग्नि) का काम किया है'॥४०८॥ इस प्रकार कहते हुए नल से दमयन्ती ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो तुम इतने कुरूप कैसे हो गये ? ॥४०९॥ इस प्रकार पूछती हुई दमयन्ती को नल ने अपना पिछला सारा समाचार-कार्कोटक को आग से निकालने से लेकर कलियुग के शरीर से निकलने तक का-सुना डाला ॥४१०॥ और, उसी समय कार्कोटक के दिये हुए अग्नि से शुद्ध वस्त्रों को पहनकर वह नल फिर से अपने पुराने और वास्तविक रूप में आ गया ॥४११॥ पुनः अपने सच्चे रूप में आये हुये सुन्दर नल को देखकर खिले हुए कमल के समान मुख वाली दमयन्ती ने आँखों के आँसुओं से दुःख-दावानल के शान्त हो जाने पर अवर्णनीय आनन्द का अनुभव किया ॥४१२॥ नल के मिल जाने से अत्यन्त प्रसन्न सेवक-सेविकाओं द्वारा नल का सहसा प्रकट हो जाना जानकर, उस विदर्भराज भीम ने वहाँ आकर नल का समुचित अभिनन्दन और समुचित आदर सत्कार करके अपने नगर को महोत्ससमय बना दिया ॥४१३॥ तदनन्तर, मन-ही-मन हँसते हुए राजा भीम के द्वारा समुचित रूप से सत्कृत राजा ऋतुपर्ण भी नल को बधाई देकर कोशल देश को चला गया ॥४१४॥ इसके पश्चात् निषध देश के राजा नल ने कलियुग की दुष्टता के कारण होनेवाले उपद्रव को, राजा भीम को सुनाकर, अपनी प्राणप्यारी दमयन्ती के साथ वहीं सुखपूर्वक निवास किया ॥४१५॥ कुछ ही दिनों के अनन्तर धर्मात्मा राजा नल ने अपने श्वशुर की सेनाओं के साथ निषध देश में जाकर और अपने भाई पुष्कर को पाशों के विज्ञान से जीतकर उसे आज्ञाकारी बना लिया। देह से द्वापर के निकल जाने पर, पाश्चात हुए छोटे भाई पुष्कर को उसका अपना भाग देकर नल अपनी प्राणप्रिया दमयन्ती के साथ अपने राज्य का पुनः विधिवत् शासन करने लगा ॥४१६॥ तारापुर नगर में इस प्रकार कथा सुना कर ब्राह्मण सुमन ने प्रोषितपतिका राजकुमारी बन्धुमती से फिर कहा—॥४१७॥ 'हे राजपुत्री बड़े-बड़े लोग भी इस प्रकार का असह्य कष्ट भोगकर पुनः कल्याण प्राप्त करते हैं। सूर्य के समान प्रचंड तेजस्वी भी अस्त का अनुभव करके फिर उदय होते हैं ॥४१८॥
५९९ कथासरित्सागर
५९९ कथासरित्सागर तस्मात्त्वमपि तमाप्स्यसि पतिमनेधे प्रोषितागत मचिरात् । कुरु धृतिमरति परिहर विहर च पतिकामनातामे ॥४१९॥ इति त द्विजमुखतमुक्तवाक्य बहुनामभ्यर्च्य धनेन सवॄगुभ सा । अवलम्ब्य धृति प्रतीक्षमाणा दयित व धुमती स्वमन्न तस्थौ ॥४२०॥ अल्पैरेव च तस्या दिनै स पतिरामयो महीपालः । देशान्तरे स्थितां ता जननीमादाय पितृसहित ॥४२१॥ आगत्य द्यामृतांशु पार्वण इव वारिराशिजलस्थलमीम् । जननमहोत्सबदायी बन्धुमतीं नन्दयामास ॥४२२॥ अथ तत्र तया सहितस्तत्पित्रा पूवदत्तराज्यधुरः । स महीपालो बुभुजे राजा सञ्चीप्सितान् भोगान् ॥४२३॥ इत्यारममन्त्रिणरुभूतिमुखात्निशम्य चित्रां कथामनुपमामनुरागरम्याम् । रामासक्त स नरवाहनदत्तदेवो वत्सेश्वरस्य तनयो भृशमभ्यतुष्यत् ॥४२४॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीसम्बके षष्ठस्तरङ्गः । समाप्तश्चायमलङ्कारवतीसम्बको नवमः ।
नवम लम्बक ६१३
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इसलिए हे सदाचारिणी तू भी यात्रा से लौटने पर अपने पति को अवश्य प्राप्त करेगी। धैर्य रख उद्विग्नता छोड़। और, पति-प्राप्ति की कामना पूर्ण होने से आनन्द प्राप्त कर ॥४१९॥ इस प्रकार, कहते हुए उस ब्राह्मण को बहुत धन वस्त्र आदि से सत्कृत कर वह सद्गुणोपेता वसुमती धैर्य-धारण करके अपने पति के आगमन की प्रतीक्षा में पिता के घर में निवास करती थी ॥४२०॥ कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति महीपाल दूसरे देश में रहनेवाली अपनी माता को साथ लेकर पिता-सहित पुनः अपनी राजधानी (तारापुर) में लौट आया ॥४२१॥ प्रजा के नेत्रों को आनन्द देनेवाला महीपाल ने अपनी पत्नी वसुमती को इस प्रकार आनन्दित किया जैसे पूर्णिमा का चन्द्र समुद्र की लक्ष्मी को आनन्दित करता है॥४२२॥ तदनन्तर महीपाल वसुमती के साथ उसके पिता द्वारा दिये गये राज्य के भार को वहन करता हुआ और अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता हुआ अपनी पृथ्वी का शासन करने लगा ॥४२३॥ वत्सेश्वर उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त अपनी पत्नियों के साथ मन्त्री मरुभूति के मुँह से इस विचित्र और राग-मनोहर कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ ॥४२४॥
महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती-लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त नवम अलंकारवती-लम्बक समाप्त
शक्तियशो नाम दशमो लम्बकः
शक्तियशो नाम दशमो लम्बकः १५ गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमम्बरास्योत्सना स्फुरा किस कृपामृत हरमुखाभ्युषरुद्गतम्। प्रसङ्ग रसयन्ति ये विगतविघ्नरूढ्यर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं मूर्ध्नि भवप्रसादेन ते ॥ प्रथमस्तरङ्गः मङ्गलाचरणम् अवारणीय¹ रिपुभिर्वारणीयं करं नुमः। हेरम्बस्य ससिन्दूरमसि दूरमपच्छिदम् ॥१॥ पायाद्वः पुरदाहाय शम्भोः सन्नद्धतं शरम्। समं व्यग्रेषु नेत्रेषु तृतीयमधिकं स्फुरत् ॥२॥ रक्तारुणा नृसिंहस्य कुटिला विद्रिषो वधे। नखश्रेणी च दृष्टिश्च निहन्तु दुरितानि वः ॥३॥ नरवाहनदत्तकथा (पूर्वानुवृत्ता) एवं वत्सेश्वरसुतः कौशाम्ब्यां सचिवैः सह। नरवाहनदत्तः स तस्थौ भार्यासखः सुखी ॥४॥ एकदा चास्थिते तस्मिन्नास्थानस्थस्य तत्पितुः। वत्सेश्वरस्य विज्ञप्त्यै तत्रासीद् वणिगागमौ ॥५॥ स रत्नदत्तनामा तं प्रतीहारनिवेदितः। प्रविश्य नत्वा राजानं वणिगेव व्यजिज्ञपत् ॥६॥ अत्र मङ्गले विरोधाभासोऽलङ्कारः। यथा—अ-वारणीयम् वारणीयम् स-सिन्दूरम् मसिदूरम्—इति। अत्र वारणस्य = गजस्येदं वारणीयम्=गजसम्बन्धि। न वारणीयम् अवारणीयम् अप्रतिरोध्यम्। सिन्दूरेण सहितं ससिन्दूरम्—सिन्दूरलिप्तम् असि-ऋत दूरं = दूरे इत्यर्थः, ईदृशं करं—शुण्डादण्डं नुमः=नमामि ।
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६१६ कथासरित्सागर
६१६ कथासरित्सागर भारवाहककथा नाम्ना वसुधरो देव दरिद्रोऽस्तीह भारिकः। अकस्माच्च ददर्शायन्निषण्णश्च स दृष्टवान् ॥७॥ कौतुकाच्च गृहं नीत्वा यथेष्टं पानभोजनम्। दत्त्वा स क्षीवतां नीत्वा मया पृष्टोऽब्रवीदिदम् ॥८॥ लब्धं राजकुलद्वारात् सरत्नं कटकं मया। उत्पाद्य रत्नमेकं च ततो विक्रीतवानहम् ॥९॥ तच्च दीनारलक्षण मूल्येन वणिजो मया। दत्तं हिरण्यगुप्तस्य तेनाद्याहं सुखं स्थितः ॥१०॥ इत्युक्त्वा दर्शितं तेन देवनामाङ्कितं मम। कटकं यत्ततो देव विज्ञाप्तोऽद्य मया प्रभुः ॥११॥ एतच्छ्रुत्वा स वत्सेशस्तत्रानाययति स्म तौ। भारिकं तं सबलयं सरत्नं वणिजं च तम् ॥१२॥ हन्त स्मृतं प्रकोष्ठान्मे भ्रष्टमेतत्पुरभ्रमे। इति तत्कटकं दृष्ट्वा स राजाभिदधे स्वयम् ॥१३॥ निघृष्टं राजनामाङ्कं लब्ध्वा किं कटकं त्वया। इति पृष्टोऽथ सम्यक् स राजाग्रे भारिकोऽभ्यधात् ॥१४॥ भारजीवी कुतो वेद्मि राजनामाक्षराण्यहम्। दारिद्र्यमुद्गवेनेदं सम्भ्रमात् स्वीकृतं मया ॥१५॥ इत्युक्तं तेन रत्नार्थमाक्षिप्तः सोऽब्रवीद् वणिक्। प्रसह्य१ मूल्येन मया गृहीतं रत्नमापणे ॥१६॥ न चास्य राजाभिज्ञानमस्ति तन्मयमुच्यत३। मूल्यात् पञ्चसहस्री तु नीतानेन परं स्थितम् ॥१७॥ एतद्धिरण्यगुप्तस्य वचो यौगन्धरायणः। श्रुत्वा तत्र स्थितोऽवादीन्नात्र दोषोऽस्ति कस्यचित् ॥१८॥ दरिद्रस्यालिपिज्ञस्य भव्यतां भारिकस्य विभो। दारिद्र्यात् क्रियते चौर्यं सर्व्वं केनोज्झितं पुनः ॥१९॥ १ 'मूल्येना प्रसह्य मया' —इति पुस्तकान्तरपाठः । २ 'न चास्ति' इति पुस्तकान्तरपाठः । ३ 'तदयमुच्यते' —इति पुस्तकान्तरपाठः ।
दशम लम्बक १९७
दशम लम्बक १९७ एक भारवाहक (मजदूर) की कथा महाराज इस नगरी में वसुंधर नाम का एक दरिद्र भारवाहक है। आज वह अकस्मात् ही लेता-देता और खाता-पीता दीखता है॥७॥ एक बार उसकी इस स्थिति को जानने की इच्छा से मैंने उसे खूब खिला पिलाकर और नशे में मस्त बनाकर पूछा तो उसने यह बताया—॥८॥ 'मैंने राजभवन के द्वार पर रत्नों से भरा एक कंकण (हाथ का आभूषण) पाया और उसमें से एक रत्न निकालकर मैंने बेच दिया ॥९॥ उस रत्न को मैंने हिरण्यगुप्त नामक जौहरी के पास एक लाख दीनार मूल्य पर बेचा। इसी कारण मैं आनन्द कर रहा हूँ ॥१० ॥ ऐसा कहकर उसने आपके नाम से अंकित उस कंकण को मुझे दिखाया इसीलिए मैंने महाराज से निवेदन किया है॥११॥ यह सुनकर मलयराज ने कड़े के साथ उस भारवाहक (मजदूर) को और रत्न के साथ साथ हिरण्यगुप्त वैश्य को वहाँ बुलवाया ॥१२॥ और, उस कंकण को देखकर राजा ने अपने-आप ही कहा— ओह ! अब स्मरण आ गया वह कंकण मेरे नगर भ्रमण करते समय हाथ से निकलकर गिर गया था' ॥१३॥ तब सभासदों ने उस भारवाहक से राजा के सामने ही पूछा कि 'राजा के नाम खुदे हुए इस कंकण को तूने कहाँ से चुराया ? तब वह बोला— बोझा ढोकर जीवन निर्वाह करनेवाला मैं राजा के नाम के अक्षर को कैसे जान सकता हूँ? दरिद्रता के दुःख से जले हुए मैंने इस ल लिया ॥१४ १५।। भारवाहक के ऐसा कहने पर, रत्न खरीदने के अपराधी हिरण्यगुप्त ने कहा 'मैंने बाजार में बिना जोर दबाव के अधिक मूल्य देकर इस रत्न को इससे खरीदा है' ॥१६॥ इस रत्न पर राजा का कोई चिह्न नहीं है। इसलिए, मैंने खरीदा और इसके मूल्य के रूप में पाँच हजार रुपये मुझमें लिये ॥१७॥ हिरण्यगुप्त का यह वचन सुनकर वहीं बैठा हुआ राजमंत्री पीताम्बरायण बोला— 'इस विषय में किसी का दोष नहीं है। दरिद्र और निरक्षर भारवाहक का क्या कहा जा सकता है? दरिद्रता के कारण ही चोरी की जाती है। फिर मिले हुए धन को किसने छोड़ा है ? ॥१८ १९॥ ८८
१०८ कथासरित्सागर
१०८ कथासरित्सागर मुख्येन रत्नग्राही च न वाच्यो वणिगप्यसौ। एतन्महामन्त्रिवचो वत्सराजो व्यधत्त तत्॥२०॥ गत्वा पञ्चमदर्शी च भारिकेषु व्यचीचतत्। हिरण्यगुप्ताद्वणिजो रत्नं तस्मात् स्वमानयत्॥२१॥ भारिष्वेकापरोन्मुक्तं गृहीत्वा कटकं निजम्। मुखाद्व्यपगते प्रीतो गम्भीरो गोप्यवाद् गुहम्॥२२॥ विन्ध्यस्थानी पापायमिति चानन्दितोऽभवत्। राज्ञस्तं च वणिजं भार्यार्थं तममानयत्॥२३॥ गगनस्थे तु राजान्नगतायाणगत्वा। अहो स्वामिनिष्ठानां प्राणोऽप्यर्थः परात्मनः॥२४॥ मयूरकथा अभून् मयूरस्तन् नगरे भारिकस्य यत्। गथादि वहिनान्गोष्प्रासुर पारमित्रतवे॥१॥ राज्ञस्तं च सभार्या च प्रत्यहं याज्ञभारकम्। वनगत्याय विप्राय गुणानि म्य कुटुम्बकम्॥ २॥ तस्य पाशा दूरे वनं दण्डारण्या गते। तत्पाश्चानुग मयान् न्चिामरुरागम् ॥ ३॥ ते भीताः पा य तं प्रीत्या सर्वे गृहीत्वा यथायथम्। ददृशा दन्दिनगद्वणो तथा प्रभाविते॥ ४॥ राज्जनस्य तद विप्र प्र- वयस्तः प्रधान्। अत्त तं मुनिशेषं पण्डिताया ददौ नृपः॥ ५॥ इत्येतदाख्यानम् ... इति ... च कृतज्ञः सतां भवतः ॥६॥ स राजा ते सभाग्यान् पश्यान् प्रादूत ततः। अथावदन्महामात्यो यौगन्धरायणः ॥७॥ स राजा स मुदे वाच्यं स्वार्थेऽप्युपेयते। लब्धः कथं महाराज मन्त्रिभिः कृतनिश्चयैः ॥८॥
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षष्ठ लम्बक १९९
षष्ठ लम्बक १९९
मूल्य देकर रत्न खरीदनेवाले वैश्य का भी इसमें क्या अपराध है। राजा उदयन ने मन्त्री की बातों का समर्थन किया ॥२०॥ और, भारवाहकद्वारा व्यय कर दिये गये पाँच हजार रुपया वैश्य को देकर उससे रत्न ले लिया और पाँच हजार रुपये खा जानेवाले मजदूर से कंकण लेकर राजा ने उसे मुक्त कर दिया। वह मजदूर भी अपने घर गया ॥२१ २२॥ यह रत्नदत्त—'विश्वासघाती और दुष्ट है' मन में इस प्रकार समझते हुए भी राजा ने प्रयोजनवश उसका सम्मान किया ॥२३॥ उन सब के चले जाने पर राजा के सम्मुख बैठा हुआ वसन्तक बोला—'ओह ! भाग्य से मारे हुए व्यक्तियों से मिला हुआ धन भी नष्ट हो जाता है' ॥२४॥ इस विषय में भद्रघट की भी इस भारवाहक के ही समान स्थिति हुई। सुनिए— भद्रघट की कथा पाटलिपुत्र नामक नगर में शुभदत्त नाम का एक लकड़हारा था। वह जंगल से लकड़ी काट कर लाता और उसे बेचकर अपने परिवार का पालन करता था ॥२५-२६॥ एकबार वह जंगल में दूर तक चला गया और उसने वैभवोप से वहाँ रहनेवाले और दिव्य वस्त्राभंकार धारण किये हुए चार यक्षों को देखा ॥२७॥ उन्हें देखकर डरे हुए शुभदत्त को उन (यक्षों) ने ऐसा-वैसा ही दरिद्र समझकर दया करके कहा—॥२८॥ हे भद्र तू यहाँ हमलोगों के पास सेवक होकर रह। हमलोग बिना किसी कष्ट के तेरे घर का निर्वाह करेंगे ॥२९॥ उनके इस प्रकार कहने पर शुभदत्त ने स्वीकार कर लिया और स्नान आदि कराने के कार्य से उनकी सेवा करने लगा ॥३०॥ तब भोजन का समय आने पर, भोजन के लिए बैठे हुए यक्षों ने उससे कहा कि इस सामने रखे भद्रघट से हमको भोजन थामो ॥३१॥ उस घट को अन्दर से सूना देखकर वह चुप खड़ा हुआ कुछ विस्मय करने लगा। तब वे यक्ष मुस्कराते हुए फिर उससे बोले—॥३२॥
शुभदत्त न वत्सि त्वं क्षिप हस्तं घटान्तरे । यथेष्टं लप्स्यसे सर्वं घटः कामप्रदो ह्यसौ ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा प्रक्षिपत्यन्तं पाणिं यावद् घटान्तरे । तावदाहारपानादि कामितं दृष्टवानसौ ॥३४॥ १ शुभदत्तो ददौ तेभ्यो बुभुजे च स्वयं सह ॥३५॥ एवं परिचरन् यक्षान् भक्त्या भीत्या च सोऽन्वहम् । तस्थौ कुटुम्बचिन्तान्नः शुभदत्तस्तदन्तिके ॥३६॥ तत्कुटुम्बं च क्षुत्तार्तं स्वप्नादेशेन गुह्यकैः । आश्वासितं तत्प्रसादान्नभोते स्म ततश्च सः ॥३७॥ मासमात्रेण यक्षास्ते शुभदत्तं तमब्रुवन् । तुष्टाः स्मस्तेऽनया भक्त्या ब्रूहि किञ्चिद्ददाम ते ॥३८॥ तच्छ्रुत्वा स जगावैतांस्तुष्ट्रा स्वं यदि सत्यतः । एष भद्रघटस्ते मे युष्माभिर्दीयतामिति ॥३९॥ ततस्तमूचुर्यक्षास्ते नैनं शक्ष्यसि रक्षितुम् । भग्नः पलायते ह्येष तद्गृणीष्वापरं वरम् ॥४०॥ इत्युक्तोऽपि स यक्षैस्तैः शुभदत्तोऽपरं यदा । वरं नैच्छत्तदा तस्मै ते तं भद्रघटं ददुः ॥४१॥ ततः प्रणम्य तान् हृष्टो घटमादाय तं जगात् । गृहं स शुभदत्तः स्वं प्रापं तन्वितबान्धवः ॥४२॥ तत्र तस्माद्घटात्सर्व्वा भोज्यादि निवेश्य तत् । गुप्यर्थमश्मभाण्डेषु सोऽभुङ्क्त स्वजनैः सह ॥४३॥ भारमुक्तो भजत्भोगान्वानमत्तोऽथ जातु सः । कुतस्त्वैषा भोगश्रीरित्युपृच्छ्यत बन्धुभिः ॥४४॥ स व्यक्तमब्रुवन् मूढो गर्वोपस्तितकामदम् । गृहीत्वा घटकं स्कन्धे प्रारेभे यत् नतितुम् ॥४५॥ नत्यतस्तस्य च स्कन्धान्मदोद्रक्तस्खलद्गतः । स भद्रघटका यातः पतित्वा भुवि खण्डशः ॥४६॥ १ एतत्पद्यार्धं मूलपुस्तके त्रुटितमस्ति । २ मद्यमदमत्ततया स्खलितचरणस्येत्यर्थः ।
द्वादश लम्बक ७०१
द्वादश लम्बक ७०१ 'शुभदत्त ! तुझे मालूम नहीं है। घड़े के अन्दर हाथ डालोगे तो जो चाहोगे इच्छा नुसार मिलेगा क्योंकि यह घड़ा इच्छित भाजन-वस्तु देनेवाला है ॥३३॥ यह सुनकर शुभदत्त ने जैसे ही घड़े के अन्दर हाथ डाला इच्छित अन्न पान आदि उसे प्राप्त हुए। उसे उसने उन चार यक्षस्वामियों को खिलाया और उसी से निकालकर स्वयं भी उसने खाया ॥३४-३५॥ इस प्रकार, भक्ति और भय से यक्षों की सेवा करता हुआ शुभदत्त केवल अपने कुटुम्ब के लिए ही चिन्तित रहता था ॥३६॥ उसके दुःखित परिवार को भी यक्षों ने स्वप्न में आदेश देकर निश्चिन्त कर दिया इसलिए शुभदत्त और भी मग्न रहने लगा ॥३७॥ एक मास के पश्चात् उन यक्षों ने उससे कहा-'हमलोग तेरी सेवा से सन्तुष्ट हैं बोल तुझ क्या दें' ॥३८॥ यह सुनकर वह यक्षों से बोला-'यदि आपलोग मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे आपलोग भद्र घट दे दें' ॥३९॥ तब उसे यक्षों ने कहा-'तू इसे रख न सकेगा क्योंकि टूट जाने पर यह भाग जाता है, इसलिए दूसरा वर माँग' ॥४०॥ यक्षों के इस प्रकार कहने पर भी जब शुभदत्त न नहीं माना तब उनलोगों ने उसे भद्र घट दे दिया ॥४१॥ तब वह प्रसन्न शुभदत्त उन लोगों को प्रणाम करके और घड़े को उठाकर मैत्री के साथ अपने घर आया और अपने कुटुम्ब को आश्वासित किया ॥४२॥ वहाँ घर पर निरन्तर वह उस घड़े से भोजन-सामग्री निकालकर दूसरों को खिलाता था और स्वयं अपने कुलस्त्रियों के साथ खाता था ॥४३॥ घास ढोने के भार से मुक्त और विविध प्रकार के भोगों को भोगता हुआ वह एक बार जब मदपान करके नशे में चूर हो रहा था तभी उसके बन्धुओं ने उससे पूछा कि सुख भोगने के लिए यह सामग्री कहाँ से मिली ? ॥४४॥ वह मुख में कुछ रख न सका और अभिमान के मारे न बच सका। फल देनेवाले उस घट को ही कन्धे पर लेकर नाचने लगा ॥४५॥ नशे में लड़खड़ाते और नाचते हुए उसके पैर फिसल जाने के कारण कन्धे से पृथ्वी पर गिर कर वह घड़ा टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया ॥४६॥
७२ कथासरित्सागर
७२ कथासरित्सागर तदेव चाक्षतीभूय स जगाम यथागतम्। पूर्ववस्थां च स प्राप क्षुमदत्तो विषादवान् ॥४७॥ तदेव पानदोषानिप्रमादाहृतबुद्धयः। अभव्या प्राप्तमप्यर्थं नैव जानन्ति रक्षितुम् ॥४८॥ इति मद्रघटाख्यानहास श्रुत्वा वसन्तकात्। उत्थाय चक्रे वत्सेशः स्नानाहारादिकाः क्रियाः ॥४९॥ नरवाहनदत्तोऽपि स्नात्वा भुक्त्वान्तिके पितुः। दिनान्ते सखिभिः साकं जगाम भवनं निजम् ॥५०॥ तत्र रात्रावनिद्रं स शयनीयगतं सुहृत्। शृण्वत्सु सचिवेष्वेतेष्वबोचन् मरुभूतिकः ॥५१॥ दासीसङ्गच्छया देव ज्ञान मान्तःपुरं त्वया। आहूत सापि नाहूता तेन निद्राद्य नास्ति ते ॥५२॥ तत्किंमद्यापि वेश्यासु जानन्नप्यनुरज्यसे। नह्यासां चास्ति सद्भावस्तथा चैतां कथां शृणु ॥५३॥ मालतीकथा अस्तीह चित्रकूटारख्यमग्रिमन्नगरं महत्। तत्राभद्रत्नवर्माख्या महाधनपतिर्वणिक् ॥५४॥ ईश्वराराधनादेकस्तस्य सूनुरजायत। अन्तश्छेदेवरवर्माणं नाम्ना चक्रे स तं सुतम् ॥५५॥ अधीतविद्यमासन्नयौवनं वीक्ष्य तं च तम्। एकपुत्रो वणिङ्मुख्यो रत्नवर्मा व्यचिन्तयत् ॥५६॥ रूपिणी कुसृतिः सृष्टा धनप्राणापहारिणी। आद्याना यौवनान्धानां वेश्या नामेह वेधसा ॥५७॥ तदपय्यामि दृष्ट्याय कस्याश्चिद्वमुमारभम्। यन्त्राध्याजापणिगाष यत ताभिर्न गम्यत ॥५८॥ १ मासाप्ररुकवचितायवः। २ पुराकाले वेश्याभ्यासमितार्यं वणिग्पुत्रा कुटुम्बिभिः शिष्यन्ते स्म। तद्यथा वन्ते— वैश्याङ्गे वणिदवित्रताश्च वाराङ्गुना राजसमाश्रयज्ञाः। अनेकशस्त्राणि विनोदितानि चातुर्यमूलानि भवन्ति वञ्च ॥
दशम लम्बक ७०३
दशम लम्बक ७०३ तदनन्तर वह घड़ा फूटने पर भी फिर उसी तरह का होकर उन यक्षों के पास ही पहुँच गया और वह गुप्तदत्त फिर विषाद युक्त होकर अपनी (साहूकारे की) स्थिति में आ गया ॥४७॥ इस प्रकार मद्यपान करने की बुरी आदतों के प्रभाव ग्रसित अच्छी सम्पत्ति पाकर भी उस पर नहीं मरते ॥४८॥ राजा उदयन इस प्रकार वत्सेश्वर से भद्रघट की हास्यपूर्ण कहानी सुनकर स्नान आहार आदि क्रिया में लग गया ॥४९॥ नरवाहनदत्त भी स्नान करके और पिता के समीप ही भोजन करके वहीं रह गया। सायंकाल में अपने मित्रों मन्त्रियों के साथ अपने महल को गया ॥५०॥ अपने महल में रात्रि के समय पर्यंक पर पड़ा हुआ निद्रा रहित नरवाहनदत्त को उसका मित्र मरुभूति अन्य सभी मन्त्रियों को सुनाते हुए बोला- स्वामिन् ऐसा प्रतीत होता है कि आज छापी (वेश्या) से संगम करने की इच्छा से तुमने मदिरा को नहीं छकाया और न उस दासी को ही बुलाया इसीलिए तुम्हें नींद नहीं आ रही है ॥५१ ५२॥ गुण गए कुछ समझते हुए भी वेश्याओं का साथ क्यों नहीं छोड़ते? वेश्याओं के हृदय में सद्भाव नहीं रहता। इस सम्बन्ध में एक कथा सुनो—॥५३॥ मानप्राण की कथा इस पृथ्वी पर विश्वस्त नाम का खण्ड धन-सम्पन्न नगर है। वहीं राजवर्मा नाम का एक बड़ा ही यशस्वी वीर था ॥५४॥ [L19: ईश्वर की आराधना से उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ इसलिए उसने उसका नाम ईश्वर- वर्मा रख दिया ॥५५॥ बहुमित्र और असाधी से घेरे हुए उस पुत्र को देखकर राजवर्मा ने सोचा— ॥५६॥ 'वेश्या ने इस गमार के यौवन से अंध समझकर के लिए वरुणा को धन और प्राणों का हरण करनेवाला मुख्य संसारी तत्त्व बना दिया है ॥५७॥ दुर्भाग्य इस पुत्र का साम्प्रत यह कष्टप्रद संताप के लिए किसी कुट्टनी को सौं- पूँगा जिससे कि वह वेश्याओं द्वारा ठगा न जा सके ॥५८॥
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर इत्यालोच्य स पुत्रेण सहैवेश्वरवर्मणा । यमजिह्वाभिधानायाः कुट्टन्याः सदनं ययौ ॥५९॥ तत्र स्थूलहनुं दीर्घदशनां भुग्ननासिकाम् । शिक्षयन्तीं दुहितरं कुट्टनीं तां ददर्श स ॥६०॥ धनेन पूज्यते पुत्रि सर्वो वेश्या विशेषतः । तच्च नास्त्यनुरागिण्या रागं वेश्या त्यजेदत ॥६१॥ दोषाप्रदूतो रागो हि वेश्यापश्चिमसन्ध्ययोः । मिथ्यैव दर्शयेद्वेश्या तं नटीव सुशिक्षिता ॥६२॥ रञ्जयेत्तेन सा पूर्वं दुह्याद्रक्तं ततो धनम् । दुग्धार्थं च त्यजेदन्ते प्राप्तार्थं पुनराहरेत् ॥६३॥ समो यूनि शिशौ वृद्धे विरूपे रूपवत्यपि । वेश्याजनो यो मुनिवत्स चार्थं परमश्नुते ॥६४॥ इति ब्रुवाणां दुहितुस्तामुपागात्स कुट्टनीम् । रत्नवर्मा कृतातिथ्यस्तया च समुपविशत् ॥६५॥ अब्रवीत्ताञ्च पुत्रो मे त्वयार्य शिष्यतामयम् । वेश्योपचारकलां येन वैदग्ध्यं प्राप्नुयादसौ ॥६६॥ दीनाराणां सहस्रं च निष्क्रयं ते ददाम्यहम् । तच्छ्रुत्वा तस्य कामं स प्रतिपेदे तथेति सा ॥६७॥ ततो वितीर्य दीनारान् पुत्रं तस्यै समर्प्य च । स तमीश्वरवर्माणं रत्नवर्मा ययौ गृहम् ॥ ६८॥ अथात्रेश्वरवर्मा स यमजिह्वागृहे वसन् । वर्षेणैकेन शिक्षित्वा पितुस्तस्य गृहं ययौ ॥६९॥ प्राप्तषोडशवर्षश्च पितरं तमुवाच स । अर्थाद्धि धर्मकामौ न पूज्यार्थविधंत प्रजा ॥७० ॥ एवमुक्तवते तस्मै श्रद्धाम न तथेति तत् ! पञ्चानां द्रव्यकोटीनां भाण्डं¹ प्रीतो ददौ पिता ॥७१॥ तदादाय वणिक्पुत्रः ससार्थः स शुभेऽहनि । प्रायादीश्वरवर्माथ स्वर्णद्वीपाभिवाञ्छया ॥७२॥ १ अत्र किञ्चित्त्रुटितं नास्ति । २ विक्रेयद्रव्यम् । मुद्रितोऽयं पाठः ।
दशम लम्बक ७५
दशम लम्बक ७५ ऐसा सोचकर वह रत्नवर्मा अपने पुत्र ईश्वरवर्मा को साथ लेकर यमजिह्वा नाम की कुट्टनी के पास गया ॥५९॥ वहाँ उसने मोटी ठुड्डीवाली लम्बे दाँतोवाली बीच में बैठी हुई (चिपटी) नाक- वाली कुट्टनी को अपनी पुत्री को इस प्रकार की शिक्षा देते हुए देखा ॥६०॥ 'बेटी धन से ही सबकी पूजा होती है। विशेष करके वेश्या-प्रेमी व्यक्ति धन नहीं रख सकता। अतः, वेश्या को प्रेम से दूर रहना चाहिए। राग (प्रेम) वेश्या और सायंकालीन सन्ध्या के लिए दोषों का अग्रदूत है इसलिए सुशिक्षिता वेश्या को नटी के समान कृत्रिम प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए ॥६१-६२॥ पहले तो उसे अपने प्रति आसक्त व्यक्ति का मनोरंजन करना चाहिए, तब उसका रक्त और उसके बाद उसका धन दुहना चाहिए उसका धन दुह लेने पर उसे त्याग देना चाहिए और यदि उसे धन मिल जाय तो फिर उसे दुहना चाहिए ॥६३॥ जो वेश्या मुनियों के समान युवक में बालक में वृद्ध में कुरूप में और सुन्दर में समान भाव रखती है वह परम अर्थ (प्रचुर धन) प्राप्त करती है ॥६४॥ अपनी कन्या को इस प्रकार की शिक्षा देती हुई कुट्टनी के पास वह रत्नवर्मा गया और उसके स्वागत-सत्कार करने पर उसके पास जाकर बैठ गया ॥६५॥ और कहने लगा 'हे आर्ये मेरे इस पुत्र को वेश्याओं की कला सिखाओ। जिससे यह चतुर नागरिक बन सके। इसकी शिक्षा के मूल्य-रूप में एक सहस्र दीनार तुझे देता हूँ। यह सुनकर उसने वैश्य की बात स्वीकार कर ली ॥६६-६७॥ तदनन्तर, वह दीनार देकर और पुत्र ईश्वरवर्मा को उसे सौंपकर रत्नवर्मा अपने घर आ गया ॥६८॥ तत्पश्चात् ईश्वरवर्मा एक वर्ष तक यमजिह्वा के घर में रहकर शिक्षा ग्रहण करके सोलहवां वर्ष प्राप्त होने पर अपने पिता के घर लौट आया ॥६९॥ घर जाकर वह पिता से बोला 'धर्म और अर्थ'—ये दोनों पुरुषार्थ अर्थ से ही सिद्ध होते हैं। अर्थ की उपासना से बढ़कर दूसरी कोई उपासना नहीं है ॥७०॥ इस प्रकार कहते हुए पुत्र पर शिक्षित होने का विश्वास करके उसने उसे प्रसन्नतापूर्वक व्यापार के लिए पाँच करोड़ मुद्रा का कोष दिया ॥७१॥ उसे लेकर वह वैश्य का पुत्र व्यापारियों के दल के साथ शुभ दिन में स्वर्णद्वीप जाने की इच्छा से चला ॥७२॥ ८९
७४ कथासरित्सागर
७४ कथासरित्सागर गच्छन्क्रमात्पथि प्राप स काञ्चनपुरानिभम्। नगरं तत्र चासन्नबाह्योद्याने समावसत् ॥७३॥ स्नातभुक्तानुलिप्ताङ्गश्च प्रविश्य नगरेऽत्र स । युवा प्रेक्षणकं द्रष्टुमेकं देवकुलं ययौ ॥७४॥ तत्रापश्यच्च नृत्यन्तीं सुन्दरीं नाम लासिकीम्। तारुण्यवातोच्छलितां रूपाब्धेर्लहरीमिव ॥७५॥ दृष्ट्वैव तां तदा सोऽभूत्तदेकगतमानसः। क्वक्व कुट्टनीशिक्षा दूरे तस्यामबध्यत ॥७६॥ वयस्यं प्रेष्य नृत्तान्ते प्रार्थयामास तां च सः। धयास्मीति वदन्ती च प्रहृष्टा साप्यन्वमन्यत ॥७७॥ स्थापयित्वा निवासे स्वे निपुणान् भाण्डरक्षिणः। सस्या ईश्वरवर्मासौ सुन्दर्या वसतिं ययौ ॥७८॥ तस्मिन् मकरदंष्ट्राख्या तन्माता तमुपागतम्। अमानयद् गुहाचारैस्तैस्तैस्तत्समयोचितैः ॥७९॥ निशागमे वासगृहं स्फुरद्रत्नवितानकम्। न्यस्तपर्यङ्कचयनं प्रावेश्यत तया च सः॥८ ०॥ तत्रारमत सुन्दर्या तयानुमतया सह। विचित्रकरणे नृत्ते सुरते च विदग्धया ॥८१॥ गाढर्नाक्षतरागो तां पार्श्वादिनपगामिनीम्। दृष्ट्वा द्वितीयेऽह्नि ततो निर्गन्तुं नाशशञ्च सः ॥८२॥ ददौ च हेमरत्नाविलक्षाणां पञ्चविंशतिम्। तस्यै दिनद्वये तस्मिन्सुन्दर्यै स वणिक्सुतः॥८३॥ प्राप्तं मया धनं भूरि नाहं प्राप्ता भवादृशम्। स एष जन्मन्या प्राप्तः किं धनेन करोम्यहम् ॥८४॥ इत्यसत्यानुबन्धेन सुन्दरीं तदमुञ्चतीम्। माता मकरदंष्ट्रैवमेकान्त्यैव साह ताम् ॥८५॥ इदानीमस्मदीय यत्तत्सर्वं स्वकं धनम्। तन्मध्ये स्थापयित्वा तद्गृह्यतां पुत्रि का क्षतिः ॥८६॥ इत्युक्ता सुन्दरी मात्रा शुद्धादिव तदग्रहीत्। मेने श्वश्वरवर्मा तां मूढः सत्यानुरागिणीम् ॥८७॥
दशम लम्बक ७७
दशम लम्बक ७७ जाते हुए मार्ग में वह क्रमशः कांचनपुर नगर में पहुँचा और वहाँ पहुँचकर उसने नगर के बाहर एक उद्यान में डेरा डाला ॥७३॥ स्ना-नीकर और इत्र आदि लगाकर वह कांचनपुर नगर में गया और वहाँ नाटक देखने के लिए एक देवमन्दिर में प्रविष्ट हुआ ॥७४॥ वहाँ उसने सुन्दरी नाम की एक नर्त्तकी (वेश्या) को देखा जो तरुणता के तूफान से उछलती हुई लावण्य-सागर के तरंग के समान लग रही थी ॥७५॥ दूर से ही उसे देखकर वह हृदय से उस पर इस प्रकार आसक्त हो गया कि यमजिह्वा कुट्टनी की सारी शिक्षा उससे दूर हो गई ॥७६॥ और, नृत्य के समाप्त होने पर उस वैश्य के पुत्र ने अपने एक मित्र द्वारा उससे मिलने की प्रार्थना की। उसने भी 'मैं धन्य हूँ' ऐसा कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ॥७७॥ तब वह ईश्वरवर्मा अपने निवास-स्थान पर, चतुर और मितभाषी रक्षकों को नियुक्त करके उस वेश्या के निवासस्थान पर गया ॥७८॥ उसके वहाँ पहुँचते ही मकरकटी नाम की सुन्दरी वेश्या की माता उसके पास आई और उसने उस समय के योग्य उन-उन शिष्टाचारों से उसका स्वागत-सम्मान किया ॥७९॥ रात्रि के आगमन पर, लटकते हुए रत्नोंवाले चँदोवे से सजे हुए और सुन्दर बिछे हुए पलंगोंवाले शयनागार में उसका प्रवेश कराया ॥८०॥ उस शयनागार में वह ईश्वरवर्मा भिन्न-भिन्न प्रकार के आगतों, नृत्यों और सुरत-क्रीड़ाओं में विदिता एवं अत्यन्त अनुराग प्रदर्शित करती हुई उस सुन्दरी के साथ रमण करने लगा ॥८१॥ उससे गम्भीर प्रेम प्रकट करती हुई और पार्श्व से न हटती हुई उसे देखकर ईश्वरवर्मा दूसरे दिन भी उसके घर से न निकल सका और उस वेश्या को इन दो दिनों में उसने सोना, रत्न आदि पच्चीस लाख रुपया का सामान दिया ॥८२-८३॥ 'मैंने बहुत धन कमाया किन्तु आपके समान प्रेमी व्यक्ति न पाया। यदि प्रेमी ही आपके जैसा मिल गया तो इस धन से क्या करना ? ॥८४॥ इस प्रकार मिथ्या आग्रह से उस धन को नटती हुई सुन्दरी से उसकी माता मकरकटी ने कहा-'मेरी तो तू ही एक सन्तान है। अब तो जो भी मेरा धन है, वह सब इसी (ईश्वरवर्मा) का है। उसी में इसे भी सम्मिलित कर ला बेटी ! हानि क्या है?' ॥८५-८६॥ माता के इस प्रकार कहने पर सुन्दरी ने माना अत्यन्त वञ्चितता से उस धन को लिया। उसके इस प्रकार के कपट-वचनों से ईश्वरवर्मा ने उसे सच्चे प्रेमवाली समझ लिया ॥८७॥