भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक १८५

सप्तम लम्बक १८५ एक बार पिता परित्यागसेन को निवेदन करके इन्दीवरसेन अपने छोटे भाई के साथ पुनः दिग्विजय के लिए चला ॥१९१॥ उस महाबली इन्दीवरसेन ने देवी के खड्ग के प्रभाव से सारी पृथ्वी का विजय करके और भाई के साथ पुनः राजधानी में आकर अपने पिता और माता अधिकप्रभा को आनन्दित किया ॥१९२-१९३॥ राजधानी में आकर अनुजीवी राजाओं का सम्मान-सत्कार आदि करके अपनी पत्नियों के साथ उसने वह दिन आनन्द से व्यतीत किया ॥१९४॥ एक दिन उस राजपुत्र ने कर के द्वारा सारी पृथ्वी का राज्य पिता को सौंपकर अकस्मात् अपने पूर्व जन्म का स्मरण किया ॥१९५-१९६॥ तब सन्ध्या जाकर उत्त हुआ वह राजकुमार इन्दीवरसेन अपने पिता से बोला— हे पिता ! मैंने अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर लिया है। कहता हूँ सुनो—॥१९७॥ हिमालय के शिखर पर मुक्ता पुर नाम का एक नगर है। वहाँ पर मरुद्गत नाम का विद्याधरों का राजा है। कनकवती नाम की उसकी रानी से पद्मसेन और रूपसेन नाम के दो गुणवान् पुत्र हुए। उन दोनों में से पद्मसेन नामक बड़े कुमार को आदित्यप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने स्वयं वरण कर लिया ॥१९८-२००॥ यह देखकर आदित्यप्रभा की छोटी कनकप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने भी प्रसन्न होकर रूपसेन को वर लिया ॥२०१॥ इस प्रकार दो पत्नियोंवाला पद्मसेन गौड़ के द्वार कनकवती उस आदित्यप्रभा के साथ रमण करने लगा ॥२०२॥ उस पत्नी के कलह से दुःखी होकर पद्मसेन ने पिता मरुद्गत से आग्रहपूर्वक कहा कि पिताजी ! मैं इस कन्या को पत्नीत्व के लिए स्वीकार ले जाता हूँ। इस बीचका बात का रहस्य नहीं खुला। उस समय विद्याधर कन्या ने ॥२०३-२०४॥ यह सुनकर बड़े भाई पद्मसेन ने पिता से आग्रहपूर्वक पूछा और छोटे भाई के लिए विदा होकर उस कन्या का स्वयं वरण करके भाई को दे दूँगा ॥२०५॥

१८६ कथासरित्सागर

१८६ कथासरित्सागर तत्रैषा कलहासक्ता भार्यादित्यप्रभा तव। राक्षसी योनिमासाद्य त्वद्भार्यैव भविष्यति॥२०६॥ द्वितीया चन्द्रवत्येषा त्वयि रक्तातिवल्लभा। राजस्त्री राक्षसी भूत्वा भूमौ त्वां प्राप्स्यति प्रियम्॥२०७॥ सामिलाषोऽनुसर्तुं त्वां ज्येष्ठ यल्लङ्घितो मया। तन्मेष रूपसेनोऽपि भावी भ्रातैव तत्र ते॥२०८॥ द्विभार्यलंकृतं किञ्चिद्दुःखं तत्राप्यवाप्स्यसि। एवमुक्त्वा विरम्यत्य शापान्तमकरोत्स नः॥२०९॥ राजपुत्रो भुव जित्वा पृथ्वीं पित्रोः प्रदास्यसि। यदा तदा सहामीभिर्जातिं स्मृत्वा विमोक्ष्यसे॥२१०॥ इति पित्रोदितस्तन पद्मसेनो निजेन सः। तत्कालं सह तरन्यै मर्त्यलोकमवातरत्॥२११॥ स पद्मसेनस्तातायमहं जातः सुतस्तव। नाम्नेन्दीवरसेनोऽत्र कर्त्तव्य च कृत मया॥२१२॥ योऽपरो रूपसेनश्च विद्याधरकुमारकः। अनिच्छासेन इत्येष जातः सोऽनुज एव म॥२१३॥ या सादित्यप्रभा भार्या या च चन्द्रावतीति मे। विद्धि ते द्वे इमे खड्गदंष्ट्रामदनदंष्ट्रिके॥२१४॥ इदानीं चायमवधि प्राप्तः शापस्य सोऽप्य नः। तद्व्रजामो वय तात निजं वैद्याधरं पदम्॥२१५॥ इत्युक्त्वा स समं भार्याभ्रातृभिः स्पृष्टमात्रिभिः। त्यक्त्वैव मानुषीं मूर्ति भूत्वा विद्याधराकृतिः॥२१६॥ प्रणम्य पित्रोश्चरणौ कृत्वाङ्के दयिताद्वयम्। सानुजः प्रययौ व्योम्ना निज विद्याधर पुरम्॥२१७॥ तत्राभिनन्दितः पित्रा मुक्तसेनेन सन्मतिः। मातृनेत्रोत्सवो भ्रात्रा रूपसेनेन सङ्गतः॥२१८॥ उवास पद्मसेनोऽसौ भूयो नाविष्कृतेर्ष्यया। आदित्यप्रभया चन्द्रवत्या च सह निभृतः॥२१९॥

सप्तम लम्बक १८७

सप्तम लम्बक १८७ यहाँ मर्त्यलोक में भी यह कलहकारिणी तुम्हारी भार्या आदित्यप्रभा राक्षस-योनि में उत्पन्न होकर तुम्हारी ही पत्नी होगी। यह दूसरी तुम्हारी प्यारी चन्द्रावती भी राक्षसी और राजा की रानी होकर तुम्हें ही पति के रूप में प्राप्त करेगी ॥२६२-७॥ तुम्हारा साथ देने की इच्छा करनेवाला यह तुम्हारा भाई रूपशग भी मर्त्यलोक में तुम्हारा भाई ही बनेगा ॥२८॥ मर्त्यलोक में भी दो पत्नियों के होने का दुःख कष्ट भी प्राप्त कराग ! ऐसा कहकर और कुछ क्षण रुककर हमारे पिता ने शाप का अन्त इस प्रकार किया—॥२९॥ 'तुम राजपुत्र होकर, पृथ्वी को जीतकर जब पिता को पृथ्वी प्रदान करोगे तब इन सब (पत्नियों और भाई) के साथ पूर्वजन्म का स्मरण करके शाप से छूट जाओगे' ॥२१०॥ अपने पिता से इस प्रकार कहा गया पद्मसेन उन पत्नियो और भाई के साथ उसी समय पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ ॥२११॥ अतः हे पिता ! वह पद्मसेन मैं इन्दीवरसेन नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ और जो करना था किया। यह दूसरा विद्याधर-कुमार रूपशेग है जो यह अनिष्ठासेन के नाम से तुम्हारा दूसरा पुत्र हुआ जो मेरा पूर्वजन्म का छोटा भाई ही है। आदित्यप्रभा और चन्द्रावती नामवाली ये दोना मेरी पत्नियां ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा हैं। अब हम सब लोगों के शाप की अवधि समाप्त हो गई है। अब हम अपने विद्याधर-नगर को जाते हैं॥२१२-२१५॥ ऐसा कहकर वह इन्दीवरसेन अपने पूर्वजन्म का स्मरण करती हुई पत्नियों और छोटे भाई के साथ मानव-शरीर को छोड़कर और विद्याधर-शरीर धारण कर, माता-पिता के चरणों में प्रणाम करके और दोनों पत्नियों को गोद में उठाकर छोटे भाई के साथ अपने विद्याधर स्थान को चला गया ॥२१६-२१७॥ वहाँ विद्याधर-नगर में पिता मुक्तसेन से अभिनन्दन किया गया माता की आँखों का तारा रूपसेन से युक्त वह पद्मसेन ईर्ष्या रहित आदित्यप्रभा और चन्द्रावती के साथ सुख से रहने लगा ॥२१८-२१९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर इत्येतां गोमुखो रम्यां कथयित्वा कथां पथि। नरवाहनदत्तं समुवाच सचिवः पुनः ॥२२०॥ इत्थं स्यान्महतामेव महाक्लेशस्तथोदयः। अन्येषां तु कियान्देवे क्लेशो वाप्युदयोऽपि वा ॥२२१॥ त्वं तु रत्नप्रभादेवीविद्याशक्त्यानुपालितः। कर्पूरिकां राजसुतामक्लेशात्तामवाप्स्यसि ॥२२२॥ इति नरवाहनदत्तः श्रुत्वा सुमुखस्य गोमुखस्य मुखात्। प्राप्तश्रमत्पथि सस्मिन्नसावपरिक्षमं स तत्सहितः ॥२२३॥ गच्छंश्च तत्र कलकूजितराजहंसमच्छं सुधासरसशीतलभूरिवारि। चाम्रावलीपनसदाडिमरम्यरोधः सायं सरो विकचवारिजमाससाद ॥२२४॥ तस्मिन्स्नात्वा हिमगिरिसुताकान्तमभ्यर्च्य भक्त्या। कृत्वाहारी सुरभिमधुरास्वादहृद्यैः फलैस्तैः। सख्या सार्धं मृदुकिसलयास्तीर्णशय्याप्रसुप्त- स्त्तत्तीरे तां रजनिमनयत्सोऽत्र वत्सेशसूनुः ॥२२५॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके अष्टमस्तरङ्गः। नवमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तस्य स्वप्नदर्शनम् अथ प्रातः सरस्तीरात्तस्मादुत्थाय मन्त्रिणम्। नरवाहनदत्तस्तं गोमुखं प्रस्थितोऽब्रवीत् ॥१॥ वयस्य जाने काप्यद्य रात्र्यन्ते धवलाम्बरा। कुमारी दिव्यरूपी मामेत्य स्वप्नेऽभ्यभाषिदम् ॥२॥ निश्चिन्तो भव वत्स त्वमितः शीघ्रमवाप्स्यसि। अम्भोस्तीरे वनान्तं स्यमाश्चर्यं नगरं महत् ॥३॥ विश्रान्तस्तत्र चाश्वेयात्ताप्य कर्पूरसम्भवम्। पुरं कर्पूरिकां प्राप्स्यस्यथ तां राजकन्यकाम् ॥४॥ इत्युक्त्वा सा तिरोऽभूत्सा प्रबुद्धश्चास्मि तत्क्षणम्। एव तमुक्तवन्तं च प्रीतः प्रोवाच गोमुखः ॥५॥ देवैरनुगृहीतस्त्वं देव किं तेऽस्ति दुष्करम्। तन्निश्चितमाह्लादेन चैव सेत्स्यत्यभीप्सितम् ॥६॥

सप्तम लम्बक १८१

सप्तम लम्बक १८१ मार्ग में जाते हुए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त से यह कथा सुनाई और कहा--'इस प्रकार महान् व्यक्तियों को महान् कष्ट प्राप्त होते हैं। दूसरे साधारण व्यक्तियों का तो कितने ही बार उत्थान और पतन होते हैं ॥२२०-२२१॥ तुम तो रानी रत्नप्रभा की विद्या-शक्ति से रक्षित हो इसलिए राजकुमारी कर्पूरिका को बिना कष्ट ही प्राप्त करोगे ॥२२२॥ इस प्रकार, नरवाहनदत्त ने सुमुख गोमुख के मुंह से कथा सुनकर रास्ते की थकावट का अनुभव नहीं किया ॥२२३॥ जाते हुए उसने सायंकाल एक सुन्दर सरोवर को देखा जो सुन्दर शब्द करते हुए हंसों के स्वर से मुखरित हो रहा था जिसका जल अमृत के समान मधुर और तृप्तिकारक था और आम अनार एवं कटहल के वृक्षों से उसके किनारे रमणीय हो रहे थे ॥२२४॥ उस सरोवर में स्नान करके भक्ति-भाव से शिव की पूजा करके सुगन्धित मीठे और पुष्टिकारक फलों से आहार करके उस नरवाहनदत्त ने कोमल पत्तों की शय्या पर अपने मित्र के साथ उसके किनारे पर सोकर उस रात को बिताया ॥२२५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का अष्टम तरंग समाप्त नवम तरंग नरवाहनदत्त का साहस तब प्रातःकाल उस तालाब के किनारे से उठकर आगे के लिए प्रस्थान करते हुए नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख से कहा--॥१॥ "मित्र ! आज रात को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण किये हुई, कोई दिव्यरूपा एक कुमारी ने मुझसे कहा--॥२॥ 'बेटा ! निश्चिन्त रहो। यहाँ से शीघ्र ही तुम समुद्र-तट के जंगलों में स्थित आश्चर्यमय बड़े नगर को जाओगे ॥३॥ वहाँ विश्राम करके बिना कष्ट के ही कर्पूरसम्भव द्वीप (टापू) में पहुँचोगे और वहाँ कर्पूरिका नाम की राजकुमारी को प्राप्त करोगे' ॥४॥ ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गई और मैं भी उसी समय जाग उठा" ॥५॥ ऐसा कहते हुए युवराज से प्रसन्न गोमुख ने कहा-'महाराज ! तुम्हारे ऊपर देवताओं की कृपा है। अतः अवश्य ही तुम्हारा मनोरथ शीघ्र सफल होगा' ॥६॥

१९० कथासरित्सागर

१९० कथासरित्सागर एवमुक्तवता तेन गोमुखेन समं पथि। नरवाहनदत्तोऽत्र स प्रायात्सत्वरस्ततः ॥७॥ क्रमात्प्रापच्च जलधेरुपकण्ठगतं स तत्। अद्रिकूटनिभाट्टालप्रतोलीगोपुरान्वितम् ॥८॥ मेर्वाभसर्वसौवर्णराजमन्दिरराजितम् । नगरं विपुलाभोगं भूमण्डलमिवापरम् ॥९॥ प्रविश्य तत्र विपणीमार्गेण स ददर्श च। काष्ठयन्त्रमयं सर्वं चेष्टमानं सजीववत् ॥१०॥ वणिग्विलासिनीपौरजनं जनितविस्मयम्। म्रियामानं निर्जीवं इति वाग्विरहात्परम् ॥११॥ क्रमाच्च गोमुखसखः सोऽन्तिकं राजवेश्मनः। प्राप तादृशमेवात्र हस्त्यश्वादि विलोकयन् ॥१२॥ विवेश चास्य सौवर्णपुरमस्तकक्षोभिनः। अभ्यन्तरं ससचिवः साश्चर्यो राजसद्मनः ॥१३॥ तत्र यन्त्रप्रतीहारवारनारीपरिवृतम्। जडानां स्पन्दने हेतुं तेषां चेतनमेककम् ॥१४॥ इन्द्रियाणामिवात्मानमधिष्ठातृतया स्थितम्। रत्नसिंहासनासीनं भव्यं पुरुषमैक्षत ॥१५॥ सोऽपि तं पुरुषो दृष्ट्वा चोत्तमाकृतिमुत्थितः। विधाय स्वागतं स्वस्मिन्नुपावेशयदासनं ॥१६॥ पप्रच्छ चोपविष्टाय्रे क्क कथं किममानुषाम्। इमामारमनां द्वितीयः सन्निमां प्राप्तो भवानिति ॥१७॥ ततः सोऽपि स्ववृत्तान्तं निवेद्य तमशेषतः। नरवाहनदत्तस्तं प्रह्वं पप्रच्छ पूरुषम् ॥१८॥ कस्त्वं किं चेदमाश्चर्यं पुरं ते भद्र कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा स पुमान्वक्तुं स्वोदन्तमपचक्रमे ॥१९॥ राज्यधरनरवाहनाय कथा अस्ति काञ्चीति नगरी गरीयोगुणगुम्फिता। काञ्चीव वसुधावध्वा गलद्रत्नरुचिस्ततो गता ॥२०॥

सप्तम लम्बक १९१

सप्तम लम्बक १९१ गोमुख से इस प्रकार प्रोत्साहित नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जल्दी-जल्दी रास्ता चलने लगा ॥७॥ और, चलते-चलते क्रमश समुद्र तट पर स्थित पर्वताकार अट्टालिकाओं गलियों एवं नगर-द्वारों तथा सुमेरु के समान सात के राजभवनों से युक्त विशाल विस्तारवाले भू-मण्डल के समान नगर में पहुँचा ॥८ ९॥ उस नगर में बाजार के रास्ते से मुड़कर जाते हुए उसने सब कुछ लकड़ी का बना हुआ और सजीव प्राणी के समान चेष्टा करता हुआ देखा ॥१०॥ बनिया वेश्याएँ, नागरिक आदि सभी आश्चर्यकारक थे। वे करते सब कुछ थे किन्तु बोल न सकने के कारण निर्जीव मालूम पड़ते थे ॥११॥ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ हाथी घोड़े आदि देखता हुआ क्रमशः उस नगर के राजभवन के समीप जा पहुँचा ॥१२॥ और, उस सुवर्णमय नगर के मस्तक के समान शोभित उस राजभवन में अत्यधिक आश्चर्य के साथ अन्दर गया ॥१३॥ जिसमें यन्त्र के बने हुए पहरेदार, वेश्याएँ आदि यथावश्यक भरे हुए थे और उनके मध्य इन्द्रियों का संचालन करनेवाले आत्मा के समान उन सभी जड़ पदार्थों का संचालन करनेवाले सबके अधिष्ठाता के रूप में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए भव्य पुरुष को देखा ॥१४ १५॥ उस पुरुष ने भी अच्छी आकृति देखकर नरवाहन दत्त उच्चकोटि का पुरुष समझा और स्वागत करके आसन पर बिठाया ॥१६॥ और सामने बैठकर पूछा कि 'तुम कौन हो और एक व्यक्ति के साथ मनुष्यों से अगम्य इस भूमि में कैसे पहुँचे ? ॥१७॥ तब नरवाहनदत्त ने भी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उस पुरुष से नम्रतापूर्वक पूछा—॥१८॥ तुम कौन हो ? और यह आश्चर्यमय तुम्हारा नगर कैसा है ? यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया ॥१ ॥ राज्यधर बढ़ई की कथा बड़े अच्छे गुणों से चुनी गई और वसुधा-वधू की काची (करधनी) के समान अलंकार-रूप काची नाम की एक नगरी है ॥२ ॥

१९२ कथासरित्सागर

१९२ कथासरित्सागर तस्यां बाहुबलाख्योऽस्ति काञ्च्यां ख्यातो महीपतिः। कोपे यद्वा कृता येन खलापि श्रीर्भुजार्जिता ॥२१॥ तस्य राष्ट्रे नृपस्यावां तक्षाणौ भ्रातरावुभौ। मयप्रणीतदार्व्वादिमायायन्त्रविचक्षणौ ॥२२॥ ज्येष्ठ प्राणधरो नाम वेश्याव्यसनविप्लवः। अह कनिष्ठस्तद्भक्तो नाम्ना राज्यधरः प्रभो ॥२३॥ तत भुक्त्वा धन पित्र्य मद्वभर्त्रा म्व च किञ्चन। गुप्त मदर्पितमपि स्नेहाद्रक्षापितं मया ॥२४॥ ततोऽपि सोऽतिव्यसनो वेश्यार्थर्धिजिहीर्षया। रज्जुयन्त्रवहं दारुमय हंसयुग व्यधात् ॥२५॥ सपक्षयुगल रज्जुघट्टनप्रेरित निशि। राज्ञो बाहुबलस्यात्र कोशाद्यन्त्रप्रयोगतः ॥२६॥ गवाक्षेण प्रविश्यान्तश्छत्त्वा पटलक स्थितम्। आदायाभरण तस्य मद्भ्रातुर्गृहमागमत् ॥२७॥ तच्च विक्रीर्य सोऽभुङ्क्त मज्ज्येष्ठः सह वेश्यया। तथैवाहर्निश कोषममुष्णात् स च भूपतेः ॥२८॥ वार्यमाणोऽपि च मया नाकार्याद्व्यरमत्ततः। को हि मार्गममार्ग वा व्यसनान्धो निरीक्षते ॥२९॥ तथा च मुष्यमानेऽपि रात्रिष्वञ्चितार्गले। निर्मूषके राजगञ्जे दिनानि कतिचित् भयात् ॥३०॥ बिभिन्वन् प्रत्यह तूष्णीं परितप्तोऽधिकाधिकम्। तद्भाण्डागारिको गत्वा स्फुट राजे न्यवेदयत् ॥३१॥ राजापि च तदाग्यांश्च रक्षकान् जाग्रतो निशि। कोषान्त स्थापयामास तत्र तत्त्वमवेक्षितुम् ॥३२॥ ते निशीथे प्रविष्टौ तौ गवाक्षेणात्र रक्षकाः। मद्भ्रातृयन्त्रहंसौ द्वावपश्यन् रज्जुघट्टितौ ॥३३॥ यन्त्रयुक्तिपरिभ्रान्तौ चञ्चूपात्तविभूषणौ। छिन्नरज्जू जगृहुश्च राज्ञे दर्शयितु प्रगे ॥३४॥ तत्काल च स मद्भ्राता ज्येष्ठोऽब्रवीत् ससम्भ्रम । भ्रातर्गृहीतौ हंसौ द्वौ मदीयो गञ्जरक्षिभिः ॥३५॥

सप्तम लम्बक १९३

सप्तम लम्बक १९३ उस काँची में बाहुबल नाम का प्रसिद्ध राजा है, जिसने अपनी भुजाओं के बल से उपार्जित चंचला लक्ष्मी को भी अपने कोष (खजाने) में बाँध रखा है ॥२१॥ उस राजा के राज्य में मयदानव से आविष्कृत यंत्रों के निर्माण में कुशल हम दो बढ़ई भाई रहते थे ॥२२॥ प्राणधर नाम का बड़ा भाई वेश्या-व्यसन में प्रसिद्ध था। उसका भक्त छोटा भाई मैं राज्यधर नाम से प्रसिद्ध हूँ ॥२३॥ मेरे बड़े भाई ने अपनी कमाई के तथा पिता के धन को खा डाला और कुछ मेरे द्वारा स्नेह से दिये गये धन को भी उड़ा दिया ॥२४॥ तो भी अत्यन्त व्यसनी उसने वेश्या के लिए धन हरण करने के लिए रस्सी से बँधे हुए काठ के हंसों की जोड़ी बनाई ॥२५॥ वे हंस रस्सी के हिलाने से रात को राजा के खजाने में रोशनदान से अन्दर घुसकर अपनी चोंच में पेटियों में रखे हुए आभूषणों को यन्त्र के द्वारा अपने मालिक (मेरे भाई) के पास ले आते थे ॥२६-२७॥ मेरा बड़ा भाई उन आभूषणों को बेचकर उस धन को वेश्या के साथ भोगता था ॥२८॥ मेरे बहुत मना करने पर भी वह इस अनुचित कार्य से रुका नहीं। व्यसनों में अन्धा कौन भले या बुरे मार्ग को देखता है ॥२९॥ इस प्रकार रात में दृढ़ता से बन्द किये गये और चूहा से रहित उस गोदाम में चोरी होने के कारण कुछ दिनों के अनन्तर भाण्डार का अधिकारी भय से सर्वदा इस चोरी का पता लगाने की चिन्ता में अत्यन्त सन्तप्त और दुःखी हो गया और उसने राजा के समीप जाकर स्पष्ट रूप से निवेदन कर दिया ॥३०-३१॥ राजा ने भाण्डारी तथा अन्यान्य सिपाहियों को रात में चोरी का पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया। उन रखवालों ने रात को यन्त्र से बने हुए और रस्सी से बँधे हंसों को रोशनदान से घुसते हुए और माल उठाते हुए देख लिया और उन्हें पकड़ लिया। रस्सारूप यंत्र की युक्ति से घूमनेवाला काठों से गढ़ा हंसद्वय हुए और टूटी हुई रस्सी वाले उन हंसों को प्रातः काल राजा को दिखाने के लिए पकड़ रखा ॥३२-३४॥ उसी समय मेरे भाई ने घबड़ाये हुए आकर मुझसे कहा कि गोदाम के रखवालों ने मेरे हंसों को पकड़ लिया है ॥३५॥ २५

१९४ कथासरित्सागर

१९४ कथासरित्सागर रज्जुर्हि शिथिलीभूता यन्त्रे स्रस्ता च कीलिका। तस्मादितोपसर्तव्यमधुनैवावयोर्द्वयोः ॥३६॥ चौराविति निगृह्णीयात् प्रातर्बुद्ध्वा नृपो हि नौ। आवामत्र हि विख्यातौ मायायन्त्रविदावुभौ ॥३७॥ मातयन्त्रविमानं च तन्ममास्तीह मञ्जु यत्। योजनाष्टशतीं याति सकृत् प्रहतकीलिकम् ॥३८॥ तेन दूरं व्रजावोऽद्य विदेशमपि सुखदम्। पापे कर्मण्यवज्ञातं हितवाक्ये कुतः सुखम् ॥३९॥ यन्मया न कृतं वाक्यं तव दुष्कृतबुद्धिना। तस्यैष पाकः प्रसृतो योऽद्य खमप्यपापिनि ॥४०॥ एवमुक्त्वा समारोहद्विमानं व्योमगामि तत्। स मे प्राणधरो भ्राता तदैव सकुटुम्बकः ॥४१॥ अहमुक्तोऽपि तेनात्र नारोहं यन्निर्वृतेः। ततस्तेन समुत्पत्य स प्रायात् क्वापि दूरतः ॥४२॥ गते प्राणधरे तस्मिन्नहमन्वेषनामनि। प्रभाते माऽवि सम्भाव्य राजतो भयमेककः ॥४३॥ आरुह्य स्वकृतेऽन्यस्मिन् धाव्यन्त्रविमानके। द्रुतं ततो गतोऽभूवं योजनानां शतद्वयम् ॥४४॥ प्रेरितेन पुनस्तेन विमानेन खगामिना। ततोऽपि योजनशतद्वयमप्यदगामहम् ॥४५॥ ततः समुद्रेनैकट्याच्छास्त्रत्यक्तविमानकः। पद्भ्यां व्रजन्निह प्राप्तः शून्यं पुरमिदं क्रमात् ॥४६॥ कौतुकाच्च प्रविष्टोऽहं वैभवं राजमन्दिरम्। वस्त्रामरणशय्यादिराजोपकरणान्वितम् ॥४७॥ सायं सोद्यानवाप्याम्भः स्नातो भुक्त्वा फलान्यहम्। राजशय्यागतो रात्रावेकाकी समचिन्तयम् ॥४८॥ निर्जनं किं करोमीह तत् प्रातर्यत्र कुत्रचित्। व्रजामीतो गतं न हि भयं बाहुबलान्नृपात् ॥४९॥ इति सञ्चिन्त्य संसुप्तं नितान्तं दिव्यमप्यधृत्। पुरुषो बर्हिणारूढः स्वप्ने मामवमभ्यधात् ॥५०॥

सप्तम लम्बक १९५

सप्तम लम्बक १९५ क्योंकि रस्सी ढीली हो गई है और यन्त्र की कील भी खिसक गई इसलिए अब हम दोनों को अभी ही यहाँ से हट जाना चाहिए ॥३६॥ क्योंकि प्रातःकाल राजा हम दोनों को चोर समझकर मरवा डालेगा इसलिए कि हम दोनों ही यहाँ ऐसे कूटयन्त्रों को बनानेवाले और जाननेवाले प्रसिद्ध कारीगर हैं॥३७॥ मेरे पास जो मायामय यन्त्रवाला विमान (आकाश-यान) है, वह एक बार चाभी देने से बत्तीस कोस तक जाता है॥३८॥ उसके द्वारा हम लोग सुखदायी विदेश में भी जा सकते हैं। बुरे काम में हितैषी के हित वाक्य न मानने से सुख कहाँ मिल सकता है? उस मेरा हित चाहनेवाले तुम्हारे बहुत मना करने पर भी पापबुद्धि मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी उसी पाप का यह फल निष्पाप तुम्हें भी भोगना पड़ा ॥३९-४०॥ ऐसा कहकर मेरा बड़ा भाई प्राणधर अपने कुटुम्ब के साथ दूर जानेवाले विमान पर चढ़ गया ॥४१॥ उसके कहने पर भी बहुत लोगों से भरे हुए उस विमान पर मैं नहीं बैठा। इस आशंका से कि वह विमान आकाश में उड़कर कहीं दूर न चला जाय ॥४२॥ यथार्थ नामवाले उस प्राणधर के चले जाने पर एकाकी मैं भी प्रातःकाल ही में अपने बनाये हुए वायुयन्त्रवाले विमान से शीघ्र ही आठ सौ कोस दूर राजा से भय भागा ॥४३-४४॥ उस आकाश-यान में पुनः पानी भरकर मैं और भी दो कोस दूर चला आया ॥४५॥ तब समुद्र की समीपता की शंका से विमान को छोड़कर पैरों से चलता-चलता इस सूने नगर में आ गया ॥४६॥ देखते-देखते मैं बहुमूल्य आभूषण शय्या आदि साज-सामान से भरे हुए उस राजमन्दिर में आया। नागरत्न नाम की ओषधीय लगाकर और पहरे को लांघकर राजा के पलंग पर सोता हुआ अकेला मैं सोचने लगा—॥४७-४८॥ कि मैं इस निर्जन नगर में क्या करूँगा। प्रातःकाल उठकर कहीं इधर उधर देखूँगा। अब राजा के बाहुबल से तो मुझे भय नहीं रहा ॥४९॥ ऐसा सोचकर काटे हुए भुजाये प्रातःकाल के समय खाट पर चढ़े हुए किसी पुरुष से इस प्रकार कहा—॥५०॥

१९६ कथासरित्सागर

१९६ कथासरित्सागर

इहैव भद्र वस्तव्यं गन्तव्यं नान्यतस्त्वया। आहारकाले चारुह्य स्थातव्यं मध्यमे पुरे ॥५१॥ इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन् प्रबुद्धोऽहमचिन्तयम्। दुष्पारनिर्मितमिदं दिव्यस्थानं सुनिश्चितम् ॥५२॥ कृतश्च तेन मे स्वप्ने पुष्पपुण्यैरनुग्रहः। उत्थितोऽस्मीह नूनं हि क्षेमोऽस्ति वसतोऽद्य मे ॥५३॥ इति बद्धासनमुत्थाय कृत्याह्निकमहं स्थितः। आरुह्य यावदाहारकालेऽस्मिन् मध्यमे पुरे ॥५४॥ तावद्धिरण्मयेष्वग्रेपात्रेषूपनतेषु मे। अपतत् स्वादुघृतक्षीरसालिमक्तादिभोजनम् ॥५५॥ चिन्तितं चिन्तितं चान्यन्मम भोज्यमुपागमत्। तद्भुक्त्वा चाहमभवं देवात्तीवेह निर्वृतः ॥५६॥ ततो गृहीतैव मया स्थितिरस्मिन् पुरे प्रभो। चिन्तितोपनमद्राज्यभोगेन प्रतिवासरम् ॥५७॥ भार्या परिच्छदो वा मे चिन्तितस्तु न तिष्ठति। तेन यन्त्रमयोऽत्राप्यं जनः सर्वः कृतो मया ॥५८॥ इतीहागत्य तत्रापि दैवैकाकी करोम्यहम्। राज्ञो लीलामितुः राज्यधरो नाम विधेर्वशात् ॥५९॥ तद्बन्निमितेऽमुष्मिन् भवन्तोऽद्य पुरे दिनम्। विधाम्यन्तु यथाशक्ति परिचर्यापरे मयि ॥६०॥ इत्युक्त्या तत्पुरोद्यानं तेन राज्यधरेण सः। [L22: नरवाहनदत्तोऽत्र नीयते स्म स गोमुखः ॥६१॥ तत्र वापीजलस्नातो वारिजार्चितधूर्जटिः। तां मध्यमपुराहारभूमिं च प्रापितोऽभवत् ॥६२॥ बुभुजे तत्र चाहारान् ध्यातोपस्थापिताञ्छुभान्। तेन राज्यधरेणाप्रस्थितेन स समन्वितः ॥६३॥ ततः केनाप्यदृष्टेन प्रमृष्टाहारभूमिकः। अनु ताम्बूलभोगं स तस्थौ पीठासनः सुखम् ॥६४॥ अथ चिन्तामणिप्रख्यपुरमाहात्म्यविस्मितः। भुक्ते राज्यधरे नक्तं स भेजे शयनोत्तमम् ॥६५॥

सप्तम लम्बक १९७

सप्तम लम्बक १९७ 'हे भद्र ! तुम्हें यहीं रहना चाहिए और भोजन के समय राजभवन के मध्यम (बिचले) खंड में जाना चाहिए' ॥५१॥ ऐसा कहकर उनके अन्तर्धान होने पर मैंने सोचा कि निश्चय ही यह दिव्य स्थान कार्तिकेय स्वामी का बनाया हुआ है ॥५२॥ मेरे पूर्वजन्म के पुण्य प्रभाव से उन्होंने स्वप्न में मुझ पर कृपा की है। अतः यहाँ रहने से अवश्य ही मेरा कल्याण है ॥५३॥ ऐसा विश्वास रखकर मैं उठा और दैनिक कृत्यों से निबटकर बैठा और भोजन के समय फिर गया ॥५४॥ इसी प्रकार, मैं बिचले खंड में चढ़ा। वहाँ जाते ही सोने के बरतनों में आकाश से दूध-भात आदि दिव्य जो-जो भी भोजन सोचता था वह-वह भोजन मुझे प्राप्त हो जाता था। महाराज ! मैं उस भोजन को खाकर अत्यन्त सुखी हो गया ॥५५-५६॥ हे प्रभु ! तभी से मैं इस भवन में इच्छा करते ही प्राप्त होनेवाले स्त्री परिवार चाकर और राजकीय भोगों से सुखी रहकर निवास करने लगा ॥५७-५८॥ हे महाराज ! इस प्रकार मैं बढ़ई होकर भी दैववश राज्यधर नाम धारण करके राजाओं की-सी लीला कर रहा हूँ ॥५९॥ इसलिए हे महाराज ! आज दिन आप लोग मेरे निमित्त इस नगर में विश्राम करें मैं यथाशक्ति आपकी सेवा में तत्पर हूँ ॥६०॥ ऐसा कहकर वह राज्यधर नामक मन्त्री के साथ नरवाहनदत्त को उस नगर के उद्यान में ले गया ॥६१॥ वहाँ पर बावली के जल से स्नान करके और शिव की पूजा करके उस नरवाहनदत्त को उस भवन के बिचले खण्ड में पहुँचा दिया गया और वहाँ बैठकर नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख के साथ ध्यान करते ही तुरन्त उपस्थित होनेवाले आहार से तृप्ति प्राप्त की। राज्यधर भी साथ ही उपस्थित था ॥६२॥ तदनन्तर दिव्य सन्तान व्यक्ति द्वारा उस स्थान के स्वच्छ किये जाने पर नरवाहनदत्त मद्य पान करके और पान चबाकर आराम करने लगा ॥६३॥ तदनन्तर राज्यधर के भोजन कर लेने पर उस विन्ध्याटवीनगर की कन्या के बारे में नरवाहनदत्त ने चिन्ता की ॥६४॥ कलिङ्गसेना की पुत्री की उत्सुकता के कारण निद्रा न आने से हर्षित नरवाहनदत्त को देखकर राज्यधर ने कथा आरम्भ किया—॥६५॥

१९८ कथासरित्सागर

१९८ कथासरित्सागर कर्पूरिकानवीत्सुक्यविनिद्र भ्रात्र तत्कथाम्। पृच्छन्तमब्रवीद्राज्यधरोऽथ शयनस्थितः॥६६॥ किं न निद्रासि कल्याणिन्प्राप्स्यस्येवेप्सितां प्रियाम्। उदारसत्त्वं वृणुते स्वयं हि श्रीरिवाङ्गना॥६७॥ प्रत्यक्षदृष्टमत्रेदं तथा च शृणु वच्मि ते। यः स काञ्चीपतिर्बाहुबलो राजा मयोदितः॥६८॥ अर्थलोभस्य मानपरायाश्च कथा तस्यान्वयोऽर्थलोभाख्यः प्रतीहारोऽर्थवानभूत्। तस्य मानपरा नाम भार्याभूद्रूपशालिनी॥६९॥ सोऽर्थलाभा वणिग्धर्माल्लाभाद् भृत्येष्वविश्वसन्। वणिज्याव्यवहारेषु मध्ये भार्या न्ययुक्त ताम्॥७०॥ सानिच्छन्त्यपि तद्वश्या वणिग्भिः संव्यवाहरत्। मधुरेणाहृतजना रूपेण वचनेन च॥७१॥ गजाश्वरत्नवस्त्रादिविक्रयं च व्यधत्त सा। तं तं चोपजयं दृष्ट्वा सोऽर्थलोभोऽन्वमोदत॥७२॥ एकदा चात्र कौशाम्ब्याद् दूराद्देशान्तराद्वणिक्। महान्सुखधनो नाम प्रभूताश्वादिभाण्डधृत्॥७३॥ तं धृष्ट्वैवागतं भार्यामर्थलोभोऽब्रवीत्स ताम्। वणिक्सुखधनो नाम प्राप्तो देशान्तरादिह॥७४॥ प्रिये वाजिसहस्राणि तेनानीतानि विंशतिः। क्षौमवस्त्रसहस्रयुग्मान्यगणमानि च॥७५॥ शृङ्गाश्वाश्वसहस्राणि पञ्च तस्मादुपानय। क्रीत्वा सहस्रयुग्मानां सहस्राणि तथा दश॥७६॥ यावदश्वसहस्रैः स्वैस्तथा तैरपि पञ्चभिः। करोमि दर्शनं राज्ञो वणिज्यां विदधामि च॥७७॥ एवमुक्त्वाऽर्थलोभेन प्रेषिता तेन पाप्मना। आगाम्मानपरा तस्य पार्श्वं सुखधनस्य सा॥७८॥ मागति स्म च मूल्येन तान्वस्त्रसहितान्हयान्। उचितस्वागतात्तस्मात्प्रापूतकोचधुपः ॥७९॥ स च तां कामविवशां नीत्वैकान्तेऽब्रवीद्वणिक्। मूल्येन वस्त्रमर्कं ते हय वा म ददाम्यहम्॥८०॥

सप्तम लम्बक १९९

सप्तम लम्बक १९९ 'राजन् ! सोते क्यों नहीं ? आप अपनी ईप्सित प्रियतमा कर्पूरिका को अवश्य प्राप्त करायें। क्योंकि लक्ष्मी के समान स्त्री भी उदार हृदयवाले का वरण करती है॥६६ ९७॥ यह बात हमने स्वयं ही प्रत्यक्ष रूप से देखी है। जिसे मैं कहता हूँ सुनो— मानपरा और अर्थसोम की कथा कांची नगरी के बाहुबल नामक राजा जिसके विषय में मैंने तुमसे कहा है का अर्थसोम नाम का एक धनी दरबारी था। उसकी मानपरा नामकी सुन्दरी रूपवती स्त्री थी ॥६८ ६९॥ वह लोभी बनिया मुनीम या अन्य नौकरों को बीच में न रखकर व्यापार-वाणिज्य के कार्यों में अपनी स्त्री को ही रखता था ॥७०॥ उसकी पत्नी इस कार्य को न चाहती हुई भी उसकी इच्छा से विवश होकर अपने मधुर रूप, भाषण और व्यवहार से मनुष्यों को आकृष्ट कर उसका व्यापार चलाती थी ॥७१॥ वह सुन्दरी हाथी घोड़े रत्न आदि के विक्रय से प्रचुर धन कमाती थी और उसका पति उसकी प्रशंसा करता था ॥७२॥ एक बार, किसी दूर देश से मुगुधन नाम का एक बड़ा धनी व्यापारी घोड़े आदि माल लेकर कांची में बेचने के लिए आया ॥७३॥ उसे आया हुआ देखकर उस लोभी अर्थसोम ने कमाई के लोभ से अपनी पत्नी से कहा—मुगुधन नाम का बनिया दूर देश से यहाँ आया है ॥७४॥ हे प्यारी ! वह बीस हजार चीनी घोड़े और तरह-तरह के अनगिनत कीमती वस्त्र लाया है ॥७५॥ इसलिए, तू उसके पास जाकर पाँच हजार घोड़े और दस हजार कपड़ा ले लोई खरीद ले ॥७६॥ तब मैं उन हजारो घोड़ों और कपड़ों को लेकर राजा का दर्शन करके उससे व्यापार करूँ ॥७७॥ ऐसा कहकर उस पापी अर्थसोम के द्वारा भेजी गई मानपरा मुगुधन के पास पहुँची और उसने बीस हजार घोड़ों और कपड़ा की माँग की ॥७८॥ उस सुन्दरी देखकर कामातुर बनिया मुगुधन एकान्त म ले जाकर बोला—'दाम देकर तो मैं तुम्हें एक भी घोड़ा या एक भी वस्त्र न दूंगा ॥७९॥

२०० कथासरित्सागर

२०० कथासरित्सागर वत्स्यस्येकां निशां साकं मया चेत्तद्ददामि ते। शतानि वाजिनां पञ्च सहस्राणि च वाससाम् ॥८१॥ इत्युक्त्वा सोऽभिकेनापि तां प्रार्थयत सुन्दरीम्। स्त्रीष्वनर्गरुजष्टासु कस्येच्छा नोपजायते ॥८२॥ तत सा प्रत्यवोचत्समव पृच्छाम्यहं पतिम्। अत्रापि हि स जाने मां प्ररयवतिलोभतः ॥८३॥ इत्युक्त्वा स्वगृहं गत्वा पत्ये तस्मै सदब्रवीत्। यदुक्ता तन वणिजा रहः सुखधनन सा ॥८४॥ सोऽप्य पापोऽर्थलोभस्तां कीनाश पतिरब्रवीत्। प्रिये वस्त्रसहस्राणि पञ्च वाजिशतानि च ॥८५॥ एकया यदि लभ्यन्ते रात्र्या दोषस्तदत्र कः। तद्गच्छ पार्श्वं तस्याद्य प्रभात द्रुतमष्यसि ॥८६॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य भर्तुः कापुरुषस्य सा। हृदि मानपरा जातविचिकित्सा व्यचिन्तयत् ॥८७॥ दारविक्रयिणं पापं हीनसत्त्वं धिगस्त्विमम्। लोभभावनया नित्यं बत तन्मयतां गतम् ॥८८॥ वरं स एव भर्त्ता मे यो मामश्वशतैर्निशाम्। चीनपट्टसहस्रैश्च क्रीणात्येकामुदारधी ॥८९॥ इत्यालोच्य न मे दोष इत्यनुज्ञाप्य तं ततः। कुभर्त्तारमगात्तस्य गृहं सुखधनस्य सा ॥९०॥ स च तामागतां दृष्ट्वा पृष्ट्वा श्रुत्वा च तत्कथा। चित्रीयमाणस्तत्प्राप्तेरमन्तात्मनि धन्यताम् ॥९१॥ प्राहिणोच्चार्थलोभाय तस्मै तत्पतये द्रुतम्। तच्छुल्कमूतानश्वांश्च वस्त्राणि च यथोचितम् ॥९२॥ उवास च तया साकं पूर्णकामः स तां निशाम्। मूर्त्तयेव चिरप्राप्तनिजसम्पत्फलधिया ॥९३॥ प्रातश्चाह्वायका भृत्यानर्थलोभेन नित्रपम्। क्लीवेन तेन प्रहितात्साथ मानपराऽब्रवीत् ॥९४॥

दशम लम्बक २०१

दशम लम्बक २०१ यदि तू एक रात मेरे साथ रहे तो एक सौ घोड़े और पाँच हजार कपड़े बिना मूल्य भेंट कर दूँगा ॥८१॥ ऐसा कहकर उसे सकुचाती देखकर उसने और अधिक भी देने का आश्वासन दिया। क्योंकि स्वतन्त्र स्त्री की चेष्टा की ओर किसका आकर्षण नहीं होता ॥८२॥ तब वह सुन्दरी उससे बोली कि 'मैं अपने पति से पूछती हूँ। मैं समझती हूँ कि वह अत्यन्त लोभ के कारण यह मुझे इस कार्य के लिए भी प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रदान करेगा' । ॥८३॥ ऐसा कहकर और अपने घर जाकर उसने अपने पति से वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया जो सुखधन नामक बनिया ने उससे एकान्त में कहा था ॥८४॥ यह सुनकर अर्थलोभी पिशाच बोला—'प्रिये ! यदि एक रात में पाँच हजार वस्त्र और पाँच सौ चीनी घोड़े मिलते हैं, तो क्या दोष है ? तू उसके पास जा और सबेरे जल्दी ही आ जाना ॥८५-८६॥ अर्थपिशाच पुरुष पति के वचन सुनकर मानपरा सन्देह-मग्न होकर सोचने लगी— 'स्त्री को बेचनेवाले इस पापी नीच पति को धिक्कार है, जो लोभ की भावना से तन्मय हो गया ॥८७-८८॥ इससे तो वही मेरा समुचित पति है, जो पाँच सौ घोड़ों और पाँच हजार वस्त्र के जोड़ों से मुझे एक रात के लिए खरीद रहा है। इस कारण मेरा वास्तविक पति वही ठीक है'—ऐसा सोचकर और नीच पति की आज्ञा लेकर वह सुखधन के पास चली गई ॥८९ १ ॥ सुखधन भी उसे आई हुई देखकर और पूछकर चकित हुआ और उसके आगमन से उसने अपने-आप को धन्य माना ॥९१॥ सुखधन ने उसके आगमन से प्रसन्न होकर उसके पति के पास तुरन्त उस रमणी क शुल्क के रूप में बहुत-से घोड़े और वस्त्र भेज दिये जो देने के लिए कहे थे ॥९२॥ और, सारी रात सुख से उस स्त्री के साथ रहा मानों वह सुन्दरी उसकी सम्पत्ति के फल-रूप में मिली थी ॥९३॥ प्रातःकाल ही उस नपुंसक अर्थलोभ से उसे बुलाने के लिए भेजे गये नौकरों से मानपरा ने कहा—॥९४॥ २६

२०२ कथासरित्सागर

२०२ कथासरित्सागर विक्रिता सङ्गतान्येन मूर्खा तस्य कथं पुनः। भार्या भवामि निर्लज्ज स यथा किमहं तथा॥९५॥ यूयमेव मम ब्रूत यदेतच्छोभतेऽधुना। तद्धात् येन क्रीतास्मि स एव हि पतिर्मम ॥९६॥ इत्युक्तास्ते तया भृत्यास्ततो गत्वा तमैव तत्। अब्रुवन्नर्थलोभाय वाक्यं तस्या अधोमुखाः॥९७॥ स तच्छ्रुत्वा बलादेच्छादानेतुं तां नराधमः। ततो शूरबलो नाम वयस्यस्तमभाषत॥९८॥ न सा सुलधनात्तस्मादानेतुं शक्यते त्वया। प्रवीरस्य न तस्याग्रे तव पश्यामि धीरताम्॥९९॥ स हि त्यागानुरागिण्या नार्या शूरीकृतस्तया। बली च बलिभिर्जन्यैर्युक्तो मित्रैः सहागतैः॥१००॥ त्वं तु कार्पण्याक्रीतविविक्तदयिताज्झितः। अवमाननिरुत्साहो गर्हितः क्लीबतां गतः॥१०१॥ न च स्वतः बली तावृद्ध न च मित्रबलान्वितः। तत्कथं त्वं समर्थः स्यास्तस्य प्रत्यर्थिनो जये॥१०२॥ राजा च कुप्येद् बुद्ध्वा ते दारविक्रयदुष्कृतम्। तत्तूष्णीं भव भूयोऽपि मा कृथा हास्यविभ्रमम्॥१०३॥ इति सख्या निषिद्धोऽपि क्रोधाद् गत्वा ससैनिकः। यावद् रुणद्ध्यर्थलोभो गृहं सुलधनस्य स ॥१०४॥ तावत्तस्य समित्रस्य सैन्यैः सुलधनस्य तत्। सैन्यं तदीयं निर्गत्य कृत्स्नं भग्नमभूत्क्षणात् ॥१०५॥ ततः पलायितः प्रायात्सोऽर्थलोभो नृपान्तिकम्। दाराः सुलधनाख्येन वणिजा देव मे हृताः॥१०६॥ इति व्यजिज्ञपत्तत्र नृपं निहुतदुर्नयः। नृपोऽप्यैच्छदवष्टब्धुं स तं सुलधनं रुषा॥१०७॥ ततः सम्भाजनामा तं मन्त्री राजानमब्रवीत्। यथा तथा न शक्योऽसाववष्टब्धुं वणिक्प्रभो॥१०८॥ तस्यैकादशभिर्मित्रैः सहायातैर्युतस्य हि। सङ्खमभ्यधिकं देव वर्तते वरवाजिनाम् ॥१०९॥

सप्तम लम्बक २०३

सप्तम लम्बक २०३ 'जब अर्थलाभ ने मुझे दूसरे के हाथ बेच दिया मूल्य देकर मुझे खरीद लिया गया तब मैं अब उस अर्थलोभ की भार्या कैसे हूँ? जैसा वह निर्लज्ज है क्या मैं भी वैसी ही निर्लज्ज हूँ? ॥५५॥ आपलोग ही मुझे कहिए कि क्या यह कोई अच्छी बात है? तो अब आप लोग जाइए। जिसने मुझे खरीदा है वही मेरा पति है' ॥५६॥ मानपरा से इस प्रकार कहे गये दूतों ने लौटकर अर्थलोभ से नीचा मुँह किये हुए सभी सन्देश उसी प्रकार सुना दिया ॥५७॥ यह सुनकर उस नराधम अर्थलाभ ने बलपूर्वक अपनी पत्नी को गुप्तधन के घर से लाने की इच्छा प्रकट की तब हरदत्त नामक उसके मित्र ने कहा—॥५८॥ 'गुप्तधन से छीनकर तुम अपनी स्त्री को नहीं ला सकते। उस वीर के आगे तुम्हारी वीरता मैं नहीं देखता ॥५९॥ उसे न्याय की अनुरागिणी तुम्हारी भार्या ने शूरवीर बना दिया है, वह बलवान् है और अनेक बलवान् मित्रों के साथ है। और तू तो कंजूसी के कारण बेच दी गई पत्नी से विरहित और अपमान से निरुत्साह होकर नपुंसक बन चुका है। न स्वयं उसके समान बलवान् है। और न तेरे मित्र ही बलवान् हैं। इसलिए उस पात्र को जीतने में तू कैसे समर्थ हो सकता है? ॥१०१-२॥ स्त्री-विक्रय-रूप तुम्हारे कुकृत्य को सुनकर राजा भी क्रोध करेगा। इसलिए चुप रहो। व्यर्थ हँसी का पात्र बनने का यत्न न करो ॥१०३॥ इस प्रकार, मित्र से रोका गया भी अर्थलाभ क्रोध से भरकर अपने सिपाहियों को लेकर गुप्तधन पर चढ़ाई कर दी और उसे घेर लिया ॥१०४॥ तब मित्रों के साथ गुप्तधन की सेना के सामने अर्थलोभ की सेना क्षण-भर में भाग खड़ी हुई ॥१०५॥ तब वह अर्थलाभ भागकर तुरन्त राजा के समीप जा पहुँचा और बोला—'महाराज! गुप्तधन नामक बनिया ने मेरी स्त्री का अपहरण कर लिया' ॥१०६॥ इस प्रकार, अपने कुकृत्यों को छिपाकर उसने राजा से निवेदन किया तो राजा ने क्रोध से गुप्तधन को पकड़वाने की इच्छा की ॥१०७॥ तब राजा का मघान नामक मन्त्री बोला—'स्वामी! उस बनिया को वैसे ही पकड़ा नहीं जा सकता। ग्यारह मित्रों के साथ आये हुए उसके पास एक लाख से अधिक अच्छे-अच्छे घोड़े हैं। और इस विषय का वास्तविक तत्त्व भी आपने नहीं जाना ॥१०८-१०९॥

२४ कथासरित्सागर

२४ कथासरित्सागर तत्त्वं च नाम विज्ञातं नह्येतत्स्यादकारणम्। तत्प्रेष्य दूतं प्रष्टव्यः किं साबत्सोऽत्र जल्पति ॥११०॥ इति मन्त्रिवचः श्रुत्वा राजा बाहुबलस्ततः। प्रष्टुं तत्ग्राहिणोद्दूतं तस्मै सुखधनाय सः ॥१११॥ स दूतस्तं तदादेशाद् गत्वा मावञ्च पृच्छति। तान्‍मानपरा सास्मै स्ववृत्तान्तं तमभ्यधात् ॥११२॥ श्रुत्वैव च तदाश्चर्यं रूपं तस्याश्च वीक्षितुम्। गृहे सुखधनस्यागात्सार्थलोमो महीपतिः ॥११३॥ तत्रापश्यत्सुखधने प्रह्वे मानपरां स ताम्। विधातुरपि लावण्यलक्ष्म्या विस्मयदायिनीम् ॥११४॥ पावानतायाः सोऽस्याश्च पृष्टायाश्च स्वयं मुखात्। अशृणोत्तद्यथावृत्तमर्थलोभस्य शुष्पतः ॥११५॥ श्रुत्वा च मत्वा सत्यं तदर्थलोमे निरुत्तरे। तामपृच्छत्स सुमुखीं किमिदानीं भवत्विति ॥११६॥ ततः सा निश्चितावादीद्देव येनास्म्यनापदि। विक्रीतान्यस्य निःसत्त्वं सुखं कथमुरैमि तम् ॥११७॥ एतच्छ्रुत्वा नृपे तस्मिन्साधूक्तमिति वादिनि। अवोचत्सोऽर्थलोमोऽत्र कामक्रोधमपाकुरु ॥११८॥ अयं सुखधनो राजन्नहं चानुचरैर्विना। युध्यावहे स्वसेन्याभ्यां सत्त्वासत्त्वमवेक्षताम् ॥११९॥ इत्यर्थलोमस्य वचः श्रुत्वा सुखधनोऽभ्यधात्। तर्हि युध्यावहे द्वावेव द्वावेव किमु सैनिकैः ॥१२० ॥ यः प्राप्स्यति जयं मानपरा तस्य भविष्यति। श्रुर्वरद् बाढमस्त्वेवमिति राजाऽप्यभाषत ॥१२१॥ ततो मानपरायां च राज्ञि चावेक्षमाणयोः। युद्धभूमिं नृपाख्यां साववातरतामुभौ ॥१२२॥ प्रवृत्ते चाहवे तत्र कुन्ताघातोत्पतद्धयम्। अर्थलोमं सुखधनः पर्यक्षिपदसुपातले ॥१२३॥ तमेव शरारेस्त्रीनन्यान्हत्वाश्च पतितः क्षितौ। वीर्य्यन्धम॑योधी स न्‍ ते सुखधनोऽब्रवीत् ॥१२४॥