कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
७६८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवाँ अधिकरण
(१) उभयतो हेतुमानर्थः संशयः–‘क्षीणलुब्धप्रकृतिमपचरितप्रकृतिं वा’ (अधि० ७. अध्या० ५) इति । (२) प्रकरणान्तरेण समानोऽर्थः प्रसङ्गः–‘कृषिकर्मप्रदिष्टायां भूमाविति समानं पूर्वेण’ ( अधि १. अध्या० ११ ) इति । (३) प्रतिलोमेन साधनं विपर्ययः–‘विपरीतमतुष्टस्य’ ( अधि० १. अ० १६ ) इति । (४) येन वाक्यं समाप्यते, स वाक्यशेषः–‘छिन्नपक्षस्येव राज्ञश्चेष्टानाशश्चेति’ ( अधि० ८. अध्या० १) । तत्र शकुनेरिति वाक्यशेषः । (५) परवाक्यमप्रतिषिद्धमनुमतम्–‘पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः’ (अधि० १०. अध्या० ६) इति । (६) अतिशयवर्णना व्याख्यानम्–‘विशेषतश्च सङ्घानां सङ्घधर्मिणां च राजकुलानां द्यूतनिमित्तो भेदः तन्निमित्तो विनाश इत्यसत्प्रग्रहः पापिष्ठतमो व्यसनानां तन्त्रदौर्बल्यात्’ (अधि० ८. अध्या० ३) इति । (७) गुणतः शब्दनिष्पत्तिर्निर्वचनम्–‘व्यस्यत्येनं श्रेयस इति व्यसनम्’ (अधि० ८. अध्या० १) इति ।
( १ ) एक ही बात जब दोनों विरोधी पक्षों की ओर से समान लगे तो उसे संशय कहते हैं; जैसे : क्षीण-क्षुब्ध-प्रकृति और अपचरित प्रकृति, इन दोनों राजाओं में से पहिले किस राजा पर आक्रमण करना चाहिए ?
( २ ) दूसरे प्रकरण के साथ अर्थ की समानता होना प्रसंग कहलाता है, जैसे : खेती के लिए निर्दिष्ट भूमि के संबंध में पूर्ववत् नियम समझना चाहिए ।
( ३ ) विपरीत बातों से किसी वस्तु का निर्देश करना विपर्यय कहलाता है, जैसे : इससे विपरीत भाव होने पर उसको अपने से प्रसन्न समझे ।
( ४ ) जिससे वाक्य की समाप्ति हो उसे वाक्यशेष कहते हैं; जैसे : पंख-कटे पक्षी की तरह राजा की समस्त चेष्टायें नष्ट हो जाती हैं । यहाँ पर ‘पक्षी’ ( शकुनि ) पद वाक्यशेष है ।
( ५ ) प्रतिषेध न किया हुआ दूसरे का वाक्य अनुमत कहलाता है, जैसे : पक्ष, उरस्य और प्रतिग्रह इस प्रकार का व्यूह-विभाग उशना आचार्य ने किया है ।
( ६ ) सिद्ध अर्थ का अनेक युक्तियों के द्वारा समर्थन करना व्याख्यान कहलाता है, जैसे : और विशेषतः एकमत होकर एक साथ रहने वाले राजकुलों का द्यूत के कारण मतभेद हो जाने से दोनों का नाश हो जाता है । दुर्जन लोगों का साथ या सत्कार तथा मद्यपान अन्य सभी व्यसनों से बड़ा व्यसन है; क्योंकि उससे राजा का सारा शासनतन्त्र दुर्बल हो जाता है ।
( ७ ) अर्थान्वयपूर्वक किसी शब्द की सिद्धि करना निर्वचन कहलाता है; जैसे :
प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७६९
(१) दृष्टान्तो दृष्टान्तयुक्तो निदर्शनम्–‘विगृहीतो हि ज्यायसा हस्तिना पादयुद्धमिवाभ्युपैति’ (अधि० ७. अध्या० ३) इति । (२) अभिप्लुतव्यपकर्षणमपवर्गः–‘नित्यमासन्नमरिबले वासयेदन्य-त्राभ्यन्तरकोपशङ्कायाः’ ( अधि० ९. अध्या० २) इति । (३) परैरसंमितः शब्दः स्वसंज्ञा–प्रथमा प्रकृतिस्तस्य भूम्यनन्तरा द्वितीया भूम्येकान्तरा तृतीया (अधि० ६. अध्या० २) इति । (४) प्रतिषेद्धव्यं वाक्यं पूर्वपक्षः–‘स्वाम्यमात्यव्यसनयोरमात्यव्यसनं गरीयः’ (अधि० ८. अध्या० १) इति । (५) तस्य निर्णयनवाक्यमुत्तरपक्षः–‘तदायत्तत्वात्, तत्कूटस्थानीयो हि स्वामी’ (अधि० ८. अध्या० १)। (६) सर्वत्रायतमेकान्तः–‘तस्मादुत्थानमात्मनः कुर्वीत’ (अधि० १. अध्या १९) इति ।
व्यसन शब्द का अर्थ ही यह है कि जो कल्याण मार्ग से भ्रष्ट कर दे—व्यस्यति एनं श्रेयसः इति व्यसनम् ।
( १ ) दृष्टांत देकर किसी बात का स्पष्टीकरण करना निदर्शन कहलाता है । जैसे : किसी शक्तिशाली से लड़ना ऐसा ही है, जैसे हाथी पर चढ़े हुए व्यक्ति से जमीन पर खड़े होकर युद्ध करना ।
( २ ) किसी नियम का सामान्यतया व्यापक निरूपण करते हुए उसके विषय को संकुचित बना देना अपवर्ग कहलाता है, जैसे अपने राज्य के सीमांत प्रदेश में शत्रु-सेना को रहने दिया जाय, किन्तु यदि राज्य-क्रांति होने की संभावना हो तो उसको कदापि न टिकने दिया जाय ।
( ३ ) दूसरों के द्वारा संकेत न किये गये शब्द-प्रयोग को स्वसंज्ञा कहते हैं, जैसे : विजिगीषु के राष्ट्र के समीप जो राष्ट्र हो उसे प्रथमा प्रकृति, उसके बाद जो राष्ट्र हो उसे द्वितीया प्रकृति और उसके बाद भी जो राष्ट्र हो उसे तृतीया प्रकृति कहते हैं।
( ४ ) प्रतिषेध किया जाने वाला वाक्य पूर्वपक्ष कहलाता है, जैसे : स्वामी और अमात्य-संबंधी विपत्ति में अमात्य संबंधी विपत्ति अधिक अनिष्टकर है ।
( ५ ) पूर्वपक्ष का निषेध करने वाला वाक्य उत्तरपक्ष कहलाता है, जैसे : अमात्य आदि प्रकृतियों का उत्थान-पतन राजा पर ही निर्भर होता है, क्योंकि सातों प्रकार की प्रकृतियों में राजा ही प्रधान ( कूटस्थानीय ) होता है ।
( ६ ) जो अर्थ किसी भी देश-काल में न छोड़ा जा सके उसको एकांत कहते हैं, जैसे राजा को चाहिए कि वह सदा अपने को उन्नतिशील बनाने का यत्न करता रहे ।
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७७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पन्द्रहवां अधिकरण
(१) पश्चादेवं विहितमित्यनागतावेक्षणम्—‘तुलाप्रतिमानं पौतवाध्यक्षे वक्ष्यामः’ (अधि० २. अध्या० १३) इति ।
(२) पुरस्तादेवं विहितमित्यतिक्रान्तावेक्षणम्—‘अमात्यसम्पदुक्ता पुरस्तात्’ (अधि० ६. अध्या० १) इति ।
(३) एवं नान्यथेति नियोगः—‘तस्माद् धर्ममर्थं चास्योपदिशेन्नाधर्ममनर्थं च’ (अधि० १. अध्या० १७) इति ।
(४) अनेन वानेन वेति विकल्पः—‘दुहितरो वा धर्मिष्ठेषु विवाहेषु जाताः’ (अधि० ३. अध्या० ५) इति ।
(५) अनेन चानेन चेति समुच्चयः—‘स्वसञ्जातः पितृबन्धूनां च दायादः’ (अधि० ३. अध्या० ७) इति ।
(६) अनुक्तकरणमूह्यम्—‘यथावद् दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां, तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः’ (अधि० ३. अध्या० १६) इति ।
(७) एवं शास्त्रमिदं युक्तमेताभिस्तन्त्रयुक्तिभिः । अवाप्तौ पालने चोक्तं लोकस्यास्य परस्य च ॥
(१) ‘पीछे से इस प्रकार का विधान किया जायेगा’, इस प्रकार कहना अनागतावेक्षण कहलाता है; जैसे तौलने के तरीकों का निरूपण आगे पौतवाध्यक्ष प्रकरण में किया जायेगा ।
(२) ‘इस का निरूपण पहिले किया जा चुका है’ ऐसा कहना अतिक्रांतावेक्षण कहलाता है; जैसे : अमात्यों के गुणों का निरूपण पहिले किया जा चुका है ।
(३) ‘अमुक कार्य इस ढंग से करना चाहिये, अन्यथा नहीं’ ऐसा कहना नियोग कहलाता है; जैसे : इसलिये सरल बुद्धि बालकों को सदा धर्म और अर्थ का ही उपदेश करना चाहिए; अधर्म और अनर्थ का कदापि नहीं ।
(४) ‘अमुक कार्य इस तरह से किया जाना चाहिए अथवा इस तरह से ?,’ ऐसा कहना विकल्प कहलाता है; जैसे : उस सम्पत्ति के अधिकारी उसके पुत्र हों अथवा वे लड़कियाँ, जो धार्मिक विवाहों से पैदा हुई हैं ?
(५) ‘अमुक कार्य इस तरह भी हो सकता है, और इस तरह भी’ ऐसा कहना समुच्चय कहलाता है; जैसे : पिता या उसके बान्धवों से उत्पन्न किया हुआ बालक उन दोनों की सम्पत्ति का दायभागी होता है ।
(६) न कही हुई बात को कर लेना ऊह्य कहलाता है; जैसे : निपुण धर्मस्थ व्यक्तियों को उचित है कि वे अनुरूप ( दान ) का इस प्रकार निर्णय करें, जिससे देने और लेने वाले, दोनों को कोई हानि न पहुँचे ।
(७) इस प्रकार इस शास्त्र में बत्तीस तन्त्र-युक्तियों का निरूपण किया गया
प्र० १८० : अ० १ ] अर्थशास्त्र की युक्तियाँ ७७१
(१) धर्ममर्थं च कामं च प्रवर्तयति पाति च ।
अधर्मानर्थ विद्वेषानिदं शास्त्रं निहन्ति च ॥
(२) येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः ।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥
(३) दृष्ट्वा विप्रतिपत्तिं बहुधा शास्त्रेषु भाष्यकाराणाम् ।
स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रं च भाष्यं च ॥इति कौटिलीये अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तौ पञ्चदशाधिकरणे तन्त्रयुक्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितश्चतुःशदुत्तरशततमः ।
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एतावता कौटिलीयस्यार्थशास्त्रस्य तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकरणं समाप्तम्
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है। इस लोक और परलोक की प्राप्ति तथा रक्षा करने में यही शास्त्र सहायक बताया गया है ।
( १ ) यही अर्थशास्त्र धर्म, अर्थ तथा काम में प्रवृत्त करता है, उनकी रक्षा करता है और अर्थ के विरोधी अधर्मों को नष्ट करता है ।
( २ ) जिसने शास्त्र, शस्त्र और नन्दराजा के अधीनस्थ भूमि का शीघ्र उद्धार अपने क्रोध किया है, उसी विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थ की रचना की है ।
( ३ ) प्राचीन अर्थ-शास्त्रों में बहुधा भाष्यकारों के मतभेदों को देखकर स्वयं ही विष्णुगुप्त कौटिल्य ने इस अर्थशास्त्र के सूत्रों और उनके भाष्य का निर्माण किया है ।
तन्त्रयुक्ति नामक पन्द्रहवें अधिकरण में तन्त्रयुक्ति नामक पहला अध्याय समाप्त
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१७०
... (१) ... ... (२) ... ... (३) ...
... (१)
... (२)
... (३)
चाणक्य-प्रणीत सूत्र
रस भक्ति-आख्यान
चाणक्य-प्रणीत सूत्र
सुखस्य मूलं धर्मः ॥ १ ॥ धर्मस्य मूलमर्थः ॥ २ ॥ अर्थस्य मूलं राज्यम् ॥ ३ ॥ राज्यमूलमिन्द्रियजयः ॥ ४ ॥ इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः ॥ ५ ॥ विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा ॥ ६ ॥ वृद्धसेवाया विज्ञानम् ॥ ७ ॥ विज्ञानेनात्मानं सम्पादयेत् ॥ ८ ॥ सम्पादितात्मा जितात्मा भवति ॥ ९ ॥ जितात्मा सर्वार्थैः संयुज्येत ॥ १० ॥ अर्थसम्पत्प्रकृतिसम्पदं करोति ॥११॥ प्रकृतिसम्पदा ह्यनायकमपि राज्यं नीयते ॥ १२ ॥ प्रकृतिकोपः सर्वकोपेभ्यो गरीयान् ॥ १३ ॥
अविनीतस्वामिलाभादस्वामिलाभः श्रेयान् ॥ १४ ॥ सम्पाद्यात्मानमन्विच्छेत् सहायवान् ॥ १५ ॥ नासहायस्य मन्त्रनिश्चयः ॥ १६ ॥ नैकं चक्रं परिभ्रमयति ॥ १७ ॥ सहायः समसुखदुःखः ॥ १८ ॥
मानी प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् ॥ १९ ॥ अविनीतं स्नेहमात्रेण न मन्त्रे कुर्वीत ॥ २० ॥ श्रुतवन्तमुपधाशुद्धं मन्त्रिणं कुर्वीत ॥ २१ ॥ मन्त्रमूलाः सर्वारम्भाः ॥ २२ ॥ मन्त्ररक्षणे कार्यसिद्धिर्भवति
सुख का मूल धर्म है ॥ १ ॥ धर्म का मूल अर्थ है ॥ २ ॥ अर्थ का मूल राज्य है ॥ ३ ॥ राज्य का मूल इन्द्रियजय है ॥ ४ ॥ इन्द्रियजय का मूल विनय ( नम्रता ) है ॥ ५ ॥ विनय का मूल वृद्धों की सेवा है ॥ ६ ॥ वृद्धों की सेवा का मूल विज्ञान है ॥ ७ ॥ इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को विज्ञान से सम्पन्न बनाए ( आत्मोन्नति करे ) ॥ ८ ॥ जो पुरुष विज्ञान से सम्पन्न होता है वह स्वयं को भी जीत सकता है ॥ ९ ॥ अपने ऊपर काबू पाने वाला मनुष्य समस्त अर्थों से सम्पन्न होता है ॥ १० ॥ अर्थ-सम्पत्ति अमात्य आदि प्रकृति सम्पत्ति को देने वाली होती है ॥ ११ ॥ प्रकृति-सम्पत्ति, के द्वारा नेता-रहित राज्य का भी संचालन किया जा सकता है ॥ १२ ॥ अमात्य आदि का कोप सब कोपों में बड़ा होता है ॥ १३ ॥
अविनीत स्वामी के प्राप्त होने की अपेक्षा, स्वामी का न मिलना श्रेयस्कर है ॥ १४ ॥ अपने आपको सर्व-सम्पन्न बना लेने के बाद ही सहायकों की इच्छा करनी चाहिए ॥ १५ ॥ सहायकहीन व्यक्ति के विचार अनिश्चित होते हैं ॥ १६ ॥ एक पहिये से गाड़ी को नहीं चलाया जा सकता ॥ १७ ॥ सहायक वही है, जो अपने सुख-दुःख में सदा साथ रहे ॥ १८ ॥
मनस्वी राजा को चाहिए कि वह, अपने समान दूसरे मनस्वी व्यक्ति को ही अपना सलाहकार नियुक्त करे ॥ १९ ॥ विनयहीन व्यक्ति को, एकमात्र स्नेह के कारण, कभी भी सलाह के समय सम्मिलित नहीं करना चाहिए ॥ २० ॥ बहुश्रुत एवं सब तरह से परीक्षित व्यक्ति को ही मन्त्री नियुक्त करना चाहिए ॥ २१ ॥ समस्त
७७६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
॥ २३ ॥ मन्त्रविस्रावी कार्यं नाशयति ॥ २४ ॥ प्रमादाद् द्विषता वशमुप- यास्यति ॥ २५ ॥ सर्वद्वारेभ्यो मन्त्रो रक्षितव्यः ॥ २६ ॥ मन्त्रसम्पदा राज्यं वर्धते ॥ २७ ॥ श्रेष्ठतमां मन्त्रगुप्तिमाहुः ॥ २८ ॥ कार्यान्धस्य प्रदीपो मन्त्रः ॥ २९ ॥ मन्त्रचक्षुषा परिच्छिद्राण्यवलोकयन्ति ॥ ३० ॥ मन्त्रकाले न मत्सरः कर्तव्यः ॥ ३१ ॥ त्रयाणामेकवाक्ये सम्प्रत्ययः ॥ ३२ ॥ कार्याकार्यतत्त्वार्थदर्शिनो मन्त्रिणः ॥ ३३ ॥ षट्कर्णाद् भिद्यते मन्त्रः ॥ ३४ ॥ आपत्सु स्नेहसंयुक्तं मित्रम् ॥ ३५ ॥ मित्रसंग्रहणे बलं संपद्यते ॥३६॥ बलवानलब्धलाभे प्रयतते ॥ ३७ ॥ अलब्धलाभो नालसस्य ॥ ३८ ॥ अलसस्य लब्धमपि रक्षितुं न शक्यते ॥ ३९ ॥ न चालसस्य रक्षितं विवर्धते ॥ ४० ॥ न भृत्यान् प्रेषयति ॥ ४१ ॥ अलब्धलाभादिचतुष्टयं राज्यतन्त्रम् ॥ ४२ ॥ राज्यतन्त्रायतं नीति- शास्त्रम् ॥ ४३ ॥ राज्यतन्त्रेष्ववायत्तौ तन्त्रावापौ ॥ ४४ ॥ तन्त्रं स्वविषय- कृत्येष्ववायत्तम् ॥ ४५ ॥ आवापो मण्डलनिविष्टः ॥ ४६ ॥ सन्धिविग्रह-
कार्य-व्यापार मन्त्र पर ही निर्भर है ॥ २२ ॥ मन्त्र की रक्षा करने से ही कार्य की सिद्धि होती है ॥ २३ ॥ मन्त्र का भेद खोल देने वाला व्यक्ति कार्य को नष्ट कर देता है ॥ २४ ॥ प्रमाद करने से ( व्यक्ति ) शत्रु के वश में चला जाता है ॥ २५ ॥ इस-लिए सभी प्रकार से मन्त्र की रक्षा करनी चाहिए ॥ २६ ॥ मन्त्र की सुरक्षा से राज्य की संवृद्धि होती है ॥ २७ ॥ मन्त्र को गुप्त रखना बड़े महत्त्व की बात है ॥ २८ ॥ कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित राजा के लिए मन्त्र दीपक के तुल्य है ॥ २९ ॥ मन्त्ररूपी आंखों से राजा अपने शत्रु के दोषों को देख लेता है ॥ ३० ॥
मन्त्र के समय ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए ॥ ३१ ॥ तीन व्यक्तियों की एक राय होने पर किसी विषय का निश्चय किया जा सकता है ॥ ३२ ॥ कार्य और अकार्य की वास्तविकता को देखने वाले मन्त्री होते हैं ॥ ३३ ॥ छह कानों में जाते ही मन्त्र का भेद प्रकट हो जाता है ॥ ३४ ॥
जो व्यक्ति आपत्ति के समय, स्नेह से अपने साथ बना रहे, वही मित्र है ॥ ३५ ॥ अधिक मित्रों के बना लेने से अपना बल बढ़ जाता है ॥ ३६ ॥
बलवान् व्यक्ति अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लिए यत्न करता है ॥ ३७ ॥ आलसी व्यक्ति अप्राप्त वस्तु को प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ ३८ ॥ यदि कदाचित् उसको प्राप्त हो जाये तो वह उसकी रक्षा नहीं कर पाता ॥ ३९ ॥ उसके द्वारा रक्षित वस्तु बढ़ती नहीं है ॥ ४० ॥ न वह अपने भृत्यवर्ग को ही वितरित करता है ॥ ४१ ॥
अप्राप्त की प्राप्त, प्राप्ति का संरक्षण, संरक्षित का संवर्द्धन और संवर्द्धित का वितरण—ये चार ही राज्य के सर्वस्व हैं ॥ ४२ ॥ राज्यतन्त्र ( राजस्थिति ) का आधार नीतिशास्त्र है ॥ ४३ ॥ तन्त्र और आवाप राज्यतन्त्र के अधीन होते हैं
चाणक्य-प्रणीत सूत्र — ७७७
योनिर्मण्डलः ॥ ४७ ॥ नीतिशास्त्रानुगो राजा ॥४८॥ अनन्तरप्रकृतिः शत्रुः ॥ ४९ ॥ एकान्तरितं मित्रमिष्यते ॥ ५० ॥ हेतुतः शत्रुमित्रे भविष्यतः ॥ ५१ ॥ हीयमानः सन्धिं कुर्वीत ॥ ५२ ॥ तेजो हि सन्धानहेतुस्तदर्थिनाम् ॥ ५३ ॥ नातप्तलोहो लोहेन संधीयते ॥ ५४ ॥
बलवान् हीनेन विगृह्णीयात् ॥ ५५ ॥ न ज्यायसा समेन वा ॥ ५६ ॥ गजपाद्युद्धमिव बलवद्विग्रहः ॥ ५७ ॥ आमपात्रमामेन सह विनश्यति ॥ ५८ ॥ अरिप्रयत्नमभिसमीक्षेत ॥ ५९ ॥ सन्ध्यायैकतो वा ॥ ६० ॥
अमित्रविरोधादात्मरक्षामवासेत् ॥ ६१ ॥
शक्तिहीनो बलवन्तमाश्रयेत् ॥ ६२ ॥ दुर्बलाश्रयो दुःखमावहति ॥ ६३॥ अग्निवद्राजानमाश्रयेत् ॥ ६४ ॥ राज्ञः प्रतिकूलं नाचरेत् ॥ ६५ ॥ उद्धतवेषधरो न भवेत् ॥ ६६ ॥ न देवचरितं चरेत् ॥ ६७ ॥
॥ ४४ ॥ अपने देश में सामदामादि उपायों का प्रयोग ही 'आयत्त' कहलाता है ॥ ४५ ॥ बाहरी राज्यमण्डल में प्रयुक्त सामदामादि उपायों को ही 'आवाप' कहते हैं ॥ ४६ ॥ सन्धि और विग्रह का निर्णय मण्डल पर निर्भर होता है ॥ ४७ ॥ राजा उसको कहते हैं, जो नीति शास्त्र के अनुसार राज्य का संचालन करे ॥ ४८ ॥ अपने देश से जुड़ी हुई राज्य-सीमा का राजा अपना शत्रु है ॥ ४९ ॥ एक राज्य के बाद अगला राजा अपना मित्र है ॥ ५० ॥ किसी कारणवश ही कोई राजा शत्रु या मित्र बनता है ॥ ५१ ॥ कमजोर को सन्धि कर लेनी चाहिए ॥ ५२ ॥ तेज से ही कार्य-सिद्धि होती है ॥ ५३ ॥ ठंडा लोहा गरम लोहे से नहीं जुड़ता है ॥ ५४ ॥
बलवान् राजा को चाहिए कि वह दुर्बल राजा से झगड़ा कर ले ॥ ५५ ॥ अपने से बड़े या बराबर वाले के साथ झगड़ा न करे ॥ ५६ ॥ बलवान् के साथ किया गया विग्रह वैसा ही होता है, जैसे गज-सैन्य से पदाति-सैन्य का मुकाबला ॥ ५७ ॥ कच्चा बर्तन, कच्चे बर्तन के साथ भिड़कर टूट जाता है । इसलिए बराबर वाले के साथ भी लड़ाई नहीं करनी चाहिए ॥ ५८ ॥ शत्रु के प्रयत्न का सदा भलीभांति निरीक्षण करते रहना चाहिए ॥ ५९ ॥ अनेक शत्रु होने पर एक शत्रु से संधि कर लेनी चाहिए ॥ ६० ॥
शत्रु के विरोध को भली प्रकार तजबीजना चाहिए; या तो अनेक शत्रु होने पर, एक शत्रु से सन्धि कर लेनी चाहिए । शत्रु के द्वारा किये जाने वाले विरोध से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥ ६१ ॥
शक्तिहीन राजा को चाहिये कि वह बलवान् का आश्रय ले ले ॥ ६२ ॥ दुर्बल का आश्रय लेने वाला राजा सदा दुःख उठाता है ॥ ६३ ॥ आश्रयी राजा के समीप उसी प्रकार रहना चाहिए, जैसे आग के समीप रहा जाता है ॥ ६४ ॥ राजा के प्रतिकूल कभी भी आचरण न करे ॥ ६५ ॥ उद्धत वेश धारण न करे ॥ ६६ ॥ देवताओं के चरित्र की नकल न करे ॥ ६७ ॥
७७८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
द्वयोरपीर्ष्यतोर्द्वैधीभावं कुर्वीत ॥ ६८ ॥
न व्यसनपरस्य कार्यावाप्तिः ॥ ६९ ॥ इन्द्रियवशवर्ती चतुरङ्गवानपि विनश्यति ॥ ७० ॥ नास्ति कार्यं द्यूतप्रवृत्तस्य ॥ ७१ ॥ मृगयापरस्य धर्मार्थौ विनश्यतः ॥ ७२ ॥ अर्थैषणा न व्यसनेषु गण्यते ॥ ७३ ॥ न कामासक्तस्य कार्यानुष्ठानम् ॥ ७४ ॥ अग्निदाहादपि विशिष्टं वाक्पारुष्यम् ॥ ७५ ॥ दण्डपारुष्यात् सर्वजनद्वेष्यो भवति ॥ ७६ ॥ अर्थतोषिणं श्रीः परित्यजति ॥ ७७ ॥
अमित्रो दण्डनीत्यामायत्तः ॥ ७८ ॥ दण्डनीतिमधितिष्ठन् प्रजाः संरक्षति ॥ ७९ ॥ दण्डः सम्पदा योजयति ॥ ८० ॥ दण्डाभावे मन्त्रिवर्गाभावः ॥ ८१ ॥ न दण्डादकार्याणि कुर्वन्ति ॥ ८२ ॥ दण्डनीत्यामायत्तमात्मरक्षणम् ॥ ८३ ॥ आत्मनि रक्षिते सर्वं रक्षितं भवति ॥ ८४ ॥ आत्मायत्तौ वृद्धि-विनाशौ ॥ ८५ ॥ दण्डो हि विज्ञाने प्रणीयते ॥ ८६ ॥ दुर्बलोऽपि राजा नावमन्तव्यः ॥ ८७ ॥ नास्त्यग्नेर्दौर्बल्यम् ॥ ८८ ॥
दण्डे प्रतीयते वृत्तिः ॥ ८९ ॥ वृत्तिमूलमर्थलाभः ॥ ९० ॥ अर्थमूलौ
अपने से वैर रखने वाले दो राजाओं के बीच फूट डाल दे ॥ ६८ ॥
व्यसनों के चंगुल में पड़े हुए राजा की कभी भी कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ ६९ ॥ इन्द्रयों के वश में पड़ा हुआ राजा, चतुरंग सेना के होने पर भी, विनष्ट हो जाता है ॥ ७० ॥ जुये में फँसे हुए राजा की कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ ७१ ॥ शिकार में व्यसन रखने वाले राजा के धर्म और अर्थ दोनों नष्ट हो जाते हैं ॥ ७२ ॥ अर्थ की अभिलाषा को व्यसन में नहीं गिना जाता ॥ ७३ ॥ कामासक्त राजा का कोई कार्य नहीं बन पाता ॥ ७४ ॥ वाणी की कठोरता अग्निदाह से भी बढ़ कर होती है ॥ ७५ ॥ कठोर दण्ड वाला राजा समस्त प्रजा का शत्रु हो जाता है ॥ ७६ ॥ अर्थतोषी राजा को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ ७७ ॥
शत्रु को वश में करना दण्डनीति पर निर्भर है ॥ ७८ ॥ दण्डनीति का आश्रय लेता हुआ राजा समस्त प्रजा की रक्षा करता है ॥ ७९ ॥ दण्ड से सम्पत्ति बढ़ती है ॥ ८० ॥ दण्डशक्ति के अभाव में मन्त्रिसमूह विच्छिन्न हो जाता है ॥ ८१ ॥ दण्डशक्ति के कारण वे लोग न करने योग्य कार्यों को नहीं करते हैं ॥ ८२ ॥ अपनी सुरक्षा भी दण्डनीति पर निर्भर है ॥ ८३ ॥ अपनी सुरक्षा किये जाने के बाद ही दूसरे की रक्षा की जा सकती है ॥ ८४ ॥ उत्थान और विनाश, दोनों अपने ही हाथों में हैं ॥ ८५ ॥ भली-भांति सोच-विचार करके दण्ड का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ ८६ ॥ किसी राजा को दुर्बल समझ कर उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ॥ ८७ ॥ अग्नि को कौन दुर्बल कह सकता है ॥ ८८ ॥
दण्ड के आधार पर ही व्यवहार का ज्ञान होता है ॥ ८९ ॥ अर्थ की प्राप्ति
चाणक्य-प्रणीत सूत्र
७७९
धर्मकामौ ॥ ९१ ॥ अर्थमूलं कार्यम् ॥ ९२ ॥ यदल्पप्रयत्नात् कार्यसिद्धि-र्भवति ॥ ९३ ॥ उपायपूर्वं न दुष्करं स्यात् ॥ ९४ ॥ अनुपायपूर्वं कार्यं कृतमपि नश्यति ॥ ९५ ॥ कार्यार्थिनामुपाय एव सहायः ॥ ९६ ॥ कार्यं पुरुषकारेण लक्ष्यं सम्पद्यते ॥ ९७ ॥ पुरुषकारमनुवर्तते दैवम् ॥ ९८ ॥ दैवं विनाऽतिप्रयत्नं करोति यत् तद् विफलम् ॥ ९९ ॥ असमाहितस्य वृत्तिर्न विद्यते ॥ १०० ॥
पूर्वं निश्चित्य पश्चात् कार्यमारभेत ॥ १०१ ॥ कार्यान्तरे दीर्घसूत्रता न कर्तव्या ॥ १०२ ॥ न चलचित्तस्य कार्यावाप्तिः ॥ १०३ ॥ हस्तगतावमाननात् कार्यव्यतिक्रमो भवति ॥ १०४ ॥ दोषवर्जितानि कार्याणि दुर्ल-भानि ॥ १०५ ॥ दुरनुबन्धं कार्यं नारभेत ॥ १०६ ॥
कालवित् कार्यं साधयेत् ॥ १०७ ॥ कालातिक्रमात् काल एव फलं पिबति ॥ १०८ ॥ क्षणं प्रति कालविक्षेपं न कुर्यात् सर्वकृत्येषु ॥ १०९ ॥ देशफलविभागौ ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥ ११० ॥ दैवहीनं कार्यं सुसाधमपि दुःसाधं भवति ॥ १११ ॥
नीतिज्ञो देशकालौ परीक्षेत ॥ ११२ ॥ परीक्ष्यकारिणि श्रीश्चिरं
व्यवहारमूलक है ॥ ९० ॥ धर्म और काम अर्थमूलक होते हैं ॥ ९१ ॥ कार्य ही अर्थ का मूल है ॥ ९२ ॥ इसी से थोड़ा भी प्रयत्न करने पर कार्य की सिद्धि हो जाती है ॥ ९३ ॥ उपाय से किया जाने वाला कोई भी कार्य कठिन नहीं होता ॥९४॥ जो कार्य उपाय से नहीं किया जाता वह किया कराया भी नष्ट हो जाता है ॥ ९५ ॥ कार्य-सिद्धि चाहने वाले लोगों के लिए उपाय ही परम सहायक है ॥९६॥ पुरुषार्थ से कार्य को लक्ष्य बनाया जा सकता है ॥ ९७ ॥ भाग्य भी पुरुषार्थ का अनुगमन करता है ॥ ९८ ॥ भाग्य के बिना, बड़े प्रयत्न से किया गया कार्य भी विफल हो जाता है ॥ ९९ ॥ असावधान व्यक्ति में व्यवहारकुशलता नहीं होती ॥ १०० ॥
निश्चय करने के बाद ही कार्य को आरम्भ करे ॥ १०१ ॥ एक के बाद दूसरे कार्य को करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए ॥ १०२ ॥ चंचल चित्त वाले व्यक्ति की कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ १०३ ॥ हाथ में आयी हुई वस्तु का तिरस्कार कर देने पर काम बिगड़ जाता है ॥१०४॥ विरले ही ऐसे कार्य हैं, जो दोषरहित हों ॥१०५॥ दुःखपूर्ण तथा कष्टसाध्य कार्यों को आरम्भ ही नहीं करना चाहिए ॥ १०६ ॥
समय की गति-विधि जानने वाला व्यक्ति कार्य को सिद्ध करे ॥ १०७ ॥ कार्य की अवधि बीत जाने पर काल ही उस कार्य के फल को पी जाता है ॥ १०८ ॥ अतः किसी भी कार्य में क्षण-भर का विलम्ब न करे ॥ १०६ ॥ देश और फल का विवेचन करके ही कार्य का आरंभ करे ॥ ११० ॥ दैव के विपरीत होने पर सरल कार्य भी कठिन हो जाता है ॥ १११ ॥
नीतिज्ञ व्यक्ति को चाहिये कि वह देश-काल का भलीभांति विचार कर
७८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र
तिष्ठति ॥ ११३ ॥ सर्वाश्च सम्पदः सर्वोपायेन परिग्रहेत् ॥ ११४ ॥ भाग्यवन्तमपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥ ११५ ॥ ज्ञानानुमानैश्च परीक्षा कर्तव्या ॥ ११६ ॥ यो यस्मिन् कर्मणि कुशलस्तं तस्मिन्नेव योजयेत् ॥ ११७ ॥ दुःसाधमपि सुसाधं करोत्युपायज्ञः ॥ ११८ ॥ अज्ञानिना कृतमपि न बहु मन्तव्यम् ॥ ११९ ॥ यादृच्छिकत्वात् कृमिरपि रूपान्तराणि करोति ॥१२०॥ सिद्धस्यैव कार्यस्य प्रकाशनं कर्तव्यम् ॥ १२१ ॥ ज्ञानवतामपि दैवमानुषदोषात् कार्याणि दुष्यन्ति ॥ १२२ ॥ दैवं शान्तिकर्मणा प्रतिषेद्धव्यम् ॥ १२३ ॥ मानुषीं कार्यविपत्तिं कौशलेन विनिवारयेत् ॥ १२४ ॥ कार्यविपत्तौ दोषान् वर्णयन्ति बालिशाः ॥ १२५ ॥ कार्यार्थिना दाक्षिण्यं न कर्तव्यम् ॥ १२६ ॥ क्षीरार्थी वत्सो मातुरूधः प्रतिहन्ति ॥ १२७ ॥ अप्रयत्नात् कार्यविपत्तिर्भवेत् ॥ १२८ ॥ न दैवप्रमाणानां कार्यसिद्धिः ॥ १२९ ॥ कार्यबाह्यो न पोषयत्याश्रितान् ॥१३०॥ यः कार्यं न पश्यति सोऽन्धः ॥ १३१ ॥ प्रत्यक्षपरोक्षानुमानैः कार्याणि परीक्षेत ॥ १३२ ॥ अपरीक्ष्यकारिणं श्रीः परित्यजति ॥ १३३ ॥ परीक्ष्य
ले ॥ ११२ ॥ विचारशील व्यक्ति के पास लक्ष्मी चिरकाल तक बनी रहती है ॥११३॥ सामदामादि सब उपायों के द्वारा सभी प्रकार की सम्पत्ति का संचय करे ॥ ११४ ॥ भाग्यशाली होने पर भी अविचारशील व्यक्ति को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ ११५ ॥ प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा प्रत्येक वस्तु की परीक्षा करनी चाहिए ॥ ११६ ॥
जो जिस कार्य को करने में निपुण हो उसको उसी कार्य में नियुक्त करना चाहिए ॥ ११७ ॥ उपायों को जानने वाला व्यक्ति कठिन कार्य को भी सहज बना देता है ॥ ११८ ॥ अज्ञानी व्यक्ति के द्वारा किये गये कार्य को अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए ॥११९॥ कभी-कभी एक साधारण कीड़ा भी रूप बदल लेता है ॥१२०॥ जो कार्य संपन्न हो गया हो उसको ही प्रमाणित किया जाना चाहिए ॥ १२१ ॥
विज्ञ पुरुषों के भी कार्य दैवदोष तथा मानुषदोषों से दूषित ( असफल ) हो जाते हैं ॥१२२॥ शांति-कर्मों के अनुष्ठान द्वारा दैव का प्रतीकार करना चाहिए ॥१२३॥ मानुष-विपत्तियों का निवारण अपने कौशल से करना चाहिए ॥ १२४ ॥ किसी कार्य में विपत्ति के आ जाने पर मूर्ख व्यक्ति उसमें दोष दिखाते हैं ॥ १२५ ॥
कार्यसिद्धि के आकांक्षी व्यक्ति को चाहिए कि वह भोला भाला न बना रहे ॥ १२६ ॥ बछड़ा भी दूध के लिए माता के अयनों ( दूध ) पर आघात करता है ॥ १२७ ॥ प्रयत्न न करने पर निश्चित ही कार्यों में विपत्ति आ जाती है ॥ १२८ ॥ दैव को प्रमाण मानने वाले की कभी भी कार्यसिद्धि नहीं होती ॥ १२९ ॥ कार्य से पृथक् रहने वाला व्यक्ति अपने आश्रितों का पोषण नहीं कर सकता ॥ १३० ॥ जो जो अपने कार्यों को नहीं देखता वह अंधा है ॥ १३१ ॥ प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमान
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८१
तार्या विपत्तिः ॥ १३४ ॥ स्वशक्तिं ज्ञात्वा कार्यमारभेत ॥ १३५ ॥ स्वजनं तर्पयित्वा यः शेषभोजी सोऽमृतभोजी ॥ १३६ ॥ सर्वानुष्ठानादायमुखानि वर्धन्ते ॥ १३७ ॥ नास्ति भीरोः कार्यचिन्ता ॥ १३८ ॥ स्वामिनः शीलं ज्ञात्वा कार्यार्थी कार्यं साधयेत् ॥१३९॥ धेनोः शीलज्ञः क्षीरं भुङ्क्ते ॥ १४० ॥ क्षुद्रे गुह्यप्रकाशनमात्मवान् न कुर्यात् ॥ १४१ ॥ आश्रितैरप्यवमन्यते मृदुस्वभावः ॥ १४२ ॥ तीक्ष्णदण्डः सर्वैरुद्वेजनीयो भवति ॥ १४३ ॥ यथार्हदण्डकारी स्यात् ॥ १४४ ॥ अल्पसारं श्रुतवन्तमपि न बहु मन्यते लोकः ॥ १४५ ॥ अतिभारः पुरुषमवसादयति ॥ १४६ ॥ यः संसदि परदोषं शंसति स स्वदोषं प्रख्यापयति ॥ १४७ ॥ आत्मानमेव नाशयत्यनात्मवतां कोपः ॥ १४८ ॥ नास्त्यप्राप्यं सत्यवताम् ॥ १४९ ॥ साहसेन न कार्यसिद्धिर्भवति
प्रमाणों से कार्यों की परीक्षा करनी चाहिए ॥ १३२ ॥ बिना विचारे कार्य करने वाले पुरुष को लक्ष्मी छोड़ देती है ॥ १३३ ॥ भली-भांति विचार करके विपत्ति को दूर करना चाहिए ॥ १३४ ॥ अपनी शक्ति का अन्दाजा लगा कर ही किसी कार्य को आरम्भ करना चाहिए ॥ १३५ ॥ स्वजनों ( पारिवारिक तथा भृत्य ) को भर पेट भोजन कराके जो अवशिष्ट अन्न को खाता है वह अमृत को खाता है ॥ १३६ ॥ सब तरह के कार्यों को करने से आमदनी के रास्ते खुल जाते हैं ॥ १३७ ॥
कामचोर या अनुद्यमी व्यक्ति को अपने कार्यों की कोई चिन्ता नहीं होती ॥ १३८ ॥
कार्यार्थी को चाहिए कि वह अपने स्वामी के स्वभाव को जान कर ही कार्य को सफल बनाये ॥ १३९ ॥ जो व्यक्ति गाय के स्वभाव से परिचित होता है, वही उसके दूध का उपभोग करता है ॥ १४० ॥
विचारवान् व्यक्ति को चाहिए कि वह क्षुद्र विचार के व्यक्तियों पर अपनी गुह्य बातों को प्रकट न करे ॥ १४१ ॥ सरल स्वभाव के राजा का उसके आश्रित व्यक्ति ही तिरस्कार कर देते हैं ॥ १४२ ॥ तीव्र स्वभाव के राजा से सभी व्यक्ति बेचैन रहते हैं ॥ १४३ ॥ अतः राजा ऐसा होना चाहिए, जो उचित दण्ड का निर्धारण करे ॥ १४४ ॥ शास्त्रज्ञ, किन्तु दुर्बल राजा का प्रजा अधिक सम्मान नहीं करती ॥ १४५ ॥ अधिक भार पुरुष को खिन्न कर देता है ॥ १४६ ॥
जो व्यक्ति सभास्थल पर किसी दूसरे व्यक्ति के अवगुणों का प्रख्यापन करने की चेष्टा करता है वह प्रकारान्तर से अपनी ही अयोग्यता का परिचय देता है ॥ १४७ ॥ स्वयं को वश में न रखने वाले क्रोधी पुरुष को उसका क्रोध ही नष्ट कर डालता है ॥ १४८ ॥
सत्य का आचरण करने वाले व्यक्ति के लिए दुर्लभ कुछ नहीं है ॥ १४९ ॥
७८२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
॥ १५० ॥ व्यसनार्तो विस्मरत्यप्रवेशेन ॥ १५१ ॥ नास्त्यनन्तरायः काल- विक्षेपे ॥ १५२ ॥ असंशयविनाशात् संशयविनाशः श्रेयान् ॥ १५३ ॥ परधनानि निक्षेप्तुः केवलं स्वार्थम् ॥ १५४ ॥ दानं धर्मः ॥ १५५ ॥ नार्यागतोऽर्थवद् विपरीतोऽनर्थभावः ॥ १५६ ॥ यो धर्मार्थौ न विवर्धयति स कामः ॥१५७॥ तद्विपरीतोऽनर्थसेवी ॥१५८॥ ऋजुस्वभावपरो जनेषु दुर्लभः ॥ १५९ ॥ अवमानेनागतमैश्वर्यमव- मन्यते साधुः ॥ १६० ॥ बहूनपि गुणानैको दोषो ग्रसति ॥ १६१ ॥ महा- त्मना परेण साहसं न कर्तव्यम् ॥ १६२ ॥ कदाचिदपि चरित्रं न लङ्घयेत् ॥ १६३ ॥ क्षुधार्तो न तृणं चरति सिंहः ॥ १६४ ॥ प्राणादपि प्रत्ययो रक्षितव्यः ॥ १६५ ॥ पिशुनः श्रोता पुत्रदारैरपि त्यज्यते ॥ १६६ ॥ बालादप्यर्थजातं शृणुयात् ॥१६७॥ सत्यमप्यश्रद्धेयं न वदेत् ॥१६८॥ नाल्पदोषाद् बहुगुणास्त्यज्यन्ते ॥ १६९ ॥ विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः ॥ १७० ॥ नास्ति रत्नमखण्डितम् ॥ १७१ ॥ मर्यादातीतं न कदाचिदपि
केवल साहस से कार्य सिद्ध नहीं होते ॥ १५०॥ विपत्तियों के टल जाने पर विपद्ग्रस्त पुरुष विपत्तियों को भूल जाता है ॥ १५१ ॥ अवसर चूक जाने पर कार्यों में अवश्य ही बाधा उपस्थित हो जाती है ॥ १५२ ॥ अवश्यंभावी (असंशय) विनाश की अपेक्षा संदिग्ध (संशययुक्त) विनाश अच्छा है ॥ १५३ ॥
किसी स्वार्थवश ही दूसरे के धन को अमानत पर रखा जाता है ॥ १५४ ॥
दान करना धर्म है ॥ १५५ ॥ वैश्य वृत्ति से किया हुआ यह धर्म (दान देना) सफल नहीं होता। मनुष्य के लिए दान धर्म का न करना सर्वथा अनर्थकारी है ॥ १५६ ॥ जो, धर्म और अर्थ का अपकर्ष नहीं करता उसी को 'काम' कहा जाता है ॥ १५७ ॥ धर्म और अर्थ के अपकर्षक काम के आसेवन से निश्चित ही अनर्थ होता है ॥ १५८ ॥
मनुष्यों में ऐसा पुरुष दुर्लभ होता है, जो सर्वथा सरल स्वभाव का हो ॥१५९॥ तिरस्कार से उपलब्ध ऐश्वर्य को, सत्पुरुष, ठुकरा देते हैं ॥ १६० ॥ अनेक गुणों को एक ही दोष ग्रसित कर लेता है ॥ १६१ ॥ श्रेष्ठ धर्मात्मा शत्रु के साथ युद्ध नहीं करना चाहिए ॥ १६२ ॥ सदाचार का उल्लंघन न करना चाहिए ॥ १६३ ॥ यद्यपि सिंह भूखा हो तब भी तिनके नहीं खाता ॥ १६४ ॥ प्राणों की बलि देकर भी अपने विश्वास की रक्षा करनी चाहिए ॥ १६५ ॥ चुगली करने और सुनने वाले पुरुष को उसके स्त्री-पुत्र भी छोड़ देते हैं ॥ १६६ ॥
बालक की भी उचित बात को ग्रहण करना चाहिए ॥ १६७ ॥ ऐसी सच्चाई नहीं बरतनी चाहिए, जिसका विश्वास ही न किया जा सके ॥ १६८ ॥ थोड़े से दोष से बहुत सारे गुणों को नहीं छोड़ा जा सकता ॥ १६९ ॥ विद्वान् पुरुषों में भी दोष का हो जाना संभव है ॥ १७० ॥ (उसी प्रकार जैसे) कोई भी रत्न समूचा नहीं
चाणक्य-प्रणीत सूत्र
७८३
विश्वसेत् ॥ १७२ ॥ अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति ॥ १७३ ॥ नमन्त्यपि तुलाकोटिः कूपोदकक्षयं करोति ॥ १७४ ॥ सतां मतं नातिक्रमेत् ॥ १७५ ॥ गुणवदाश्रयान्निर्गुणोऽपि गुणी भवति ॥ १७६॥ क्षीराश्रितं जलं क्षीरमेव भवति ॥ १७७॥ मृत्पिण्डोऽपि पाटलिगन्धमुत्पादयति ॥ १७८ ॥ रजतं कनकस्सङ्गात् कनकं भवति ॥ १७९ ॥ उपकर्तर्यपकर्तुमिच्छत्यबुधः ॥ १८० ॥ न पापकर्मणामाक्रोशभयम् ॥ १८१ ॥ उत्साहवतां शत्रवोऽपि वशीभवन्ति ॥ १८२ ॥ विक्रमधना राजानः ॥ १८३ ॥ नास्त्यलसस्यैहिकामुष्मिकम् ॥ १८४ ॥ निरुत्साहाद् दैवं पतति ॥ १८५ ॥ मत्स्यार्थीव जलमुपयुज्यार्थं गृह्णीयात् ॥ १८६ ॥ अविश्वस्तेषु विश्वासो न कर्तव्यः ॥ १८७ ॥ विषं विषमेव सर्वकालम् ॥ १८८ ॥ अर्थसमादाने वैरिणां सङ्ग एव न कर्तव्यः ॥ १८९ ॥ अर्थसिद्धौ वैरिणं न विश्वसेत् ॥ १९० ॥ अर्थाधीन एव नियतसम्बन्धः ॥ १९१ ॥ शत्रोरपि सुतः सखा रक्षितव्यः ॥ १९२ ॥
होता ॥ १७१ ॥ मर्यादा से अधिक विश्वास कभी न करना चाहिए ॥ १७२ ॥ शत्रु संबंध में किया गया अच्छा कार्य, बुरा ही समझा जाता है ॥ १७३ ॥ झुकती हुई भी ढींकली की वल्ली कुएँ के जल को उलीच देती है ॥ १७४ ॥
श्रेष्ठ पुरुषों के अभिमत का अतिक्रमण न करना चाहिए ॥ १७५ ॥ गुणी पुरुष के आश्रय से गुणहीन भी गुणी हो जाता है ॥ १७६ ॥ दूध में मिला हुआ जल भी दूध ही हो जाता है ॥ १७७ ॥ मिट्टी का ढेला पाटलि पुष्प के संसर्ग से उसकी गंध को उत्पन्न करता है ॥ १७८ ॥ चांदी भी, सोने के साथ मिलकर सोना ही हो जाती है ॥ १७९ ॥
मूर्ख व्यक्ति उपकारक व्यक्ति का भी अपकार करना चाहता है ॥ १८० ॥ पापकर्म करने वाले को निन्दा-भय नहीं होता ॥ १८१ ॥ उत्साही पुरुषों के शत्रु भी वश में हो जाते हैं ॥ १८२ ॥ राजाओं का मुख्य धन है विक्रम (बल) ॥ १८३ ॥ आलसी व्यक्ति को न ऐहिक सुख प्राप्त होता है और न पारलौकिक ॥ १८४ ॥ उत्साहहीन होने पर भाग्य भी साथ नहीं देता ॥ १८५ ॥ उपयोग में आने योग्य अर्थ को उसी प्रकार ग्रहण करना चाहिए, जैसे मछियारा मछली को ॥१८६॥ अविश्वस्त पुरुष पर कभी विश्वास न करना चाहिए ॥ १८७ ॥ विष तो प्रत्येक अवस्था में विष ही रहता है ॥ १८८ ॥
अर्थ-संग्रह करते समय शत्रु को कदापि भी साथ न रखना चाहिए ॥ १८९ ॥ अर्थसिद्ध हो जाने पर भी शत्रु का विश्वास न करना चाहिए ॥ १९० ॥ नियत सम्बन्ध अर्थ के ही अधीन होता है ॥ १९१ ॥ यदि शत्रु का भी पुत्र अपना मित्र हो तो उसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ १९२ ॥
७८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
यावच्छत्रोश्छिद्रं पश्यति तावद्धस्तेन वा स्कन्धेन वा बाह्यः ॥ १९३ ॥
शत्रुं छिद्रे प्रहरेत् ॥ १९४ ॥ आत्मच्छिद्रं न प्रकाशयेत् ॥ १९५ ॥
छिद्रप्रहारिणः शत्रवः ॥ १९६ ॥ हस्तगतमपि शत्रुं न विश्वसेत् ॥१९७॥
स्वजनस्य दुर्वृत्तं निवारयेत् ॥ १९८ ॥ स्वजनावमानोऽपि मनस्विनां दुःख-
मावहति ॥ १९९ ॥ एकाङ्गदोषः पुरुषमवसादयति ॥ २०० ॥
शत्रुं जयति सुवृत्तता ॥ २०१ ॥ निकृतिप्रिया नीचाः ॥ २०२ ॥
नीचस्य मतिर्न दातव्या ॥ २०३ ॥ तेषु विश्वासो न कर्तव्यः ॥ २०४ ॥
सुपूजितोऽपि दुर्जनः पीडयत्येव ॥ २०५ ॥ चन्दनादीनपि दावोऽग्निर्दह-
त्येव ॥ २०६ ॥
कदाऽपि पुरुषं नावमन्येत ॥ २०७ ॥ क्षन्तव्यमिति पुरुषं न बाधेत ॥ २०८ ॥
भर्त्राधिकं रहस्युक्तं वक्तुमिच्छन्त्यबुद्धयः ॥ २०९ ॥ अनुरागस्तु फलेन सूच्यते ॥ २१० ॥ आज्ञाफलमैश्वर्यम् ॥ २११ ॥ दातव्यमपि बालिशः परिक्लेशेन दास्यति ॥ २१२ ॥ महदैश्वर्यं प्राप्याप्यधृतिमान् विनश्यति ॥ २१३ ॥ नास्त्यधृतेरैहिकामुष्मिकम् ॥ २१४ ॥
जब तक शत्रु के दोष या निर्बलता (छिद्र) का पता नहीं लग जाता तब तक उसको हाथ-कंधों पर रखना चाहिए ॥ १९३ ॥
जहाँ भी शत्रु की दुर्बलता दिखायी दे वहीं उस पर प्रहार करना चाहिये ॥ १९४ ॥ अपने दोष या अपनी दुर्बलता को कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए ॥ ॥१९५॥ जो दोष या दुर्बलता पर प्रहार करते हैं उन्हें शत्रु समझना चाहिए ॥१९६॥ अपनी मुट्ठी में भी आये हुए शत्रु का विश्वास न करना चाहिए ॥ १९७ ॥ स्वजनों के दुर्व्यवहार को रोकना चाहिए ॥१९८॥ स्वजनों का अपमान भी श्रेष्ठ पुरुषों के लिए दुःखदायी होता है ॥ १९९ ॥ एक साधारण दोष भी पुरुष को नष्ट कर देता है ॥ २०० ॥
सद्व्यवहार से शत्रु को भी जीता जा सकता है ॥ २०१ ॥ नीच पुरुषों को अपमानित होना ही भला लगता है ॥ २०२ ॥ नीच पुरुष को कभी भी सुमति न देनी चाहिए ॥ २०३ ॥ उन पर विश्वास भी न करना चाहिए ॥ २०४ ॥ सत्कार किये जाने पर भी दुर्जन पीड़ा ही पहुँचाता है ॥ २०५ ॥ जंगल में लगी आग चन्दन आदि को भी जला ही लेती है ॥ २०६ ॥
किसी भी पुरुष का कभी भी तिरस्कार न करना चाहिए ॥ २०७ ॥ किसी भी पुरुष को कभी भी बाधित न करके क्षमा कर देना चाहिए ॥ २०८ ॥
एकान्त में कही गयी अपने मालिक की बात को, मूर्ख व्यक्ति, बढ़ा-चढ़ा कर कहता है ॥ २०९ ॥ प्रेम का परिचय उसके फल से सूचित होता है ॥ २१० ॥ बुद्धि का ही फल ऐश्वर्य है ॥ २११ ॥ देने योग्य वस्तु को भी मूर्ख पुरुष बड़े कष्ट से दे
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७४५
न दुर्जनैः सह संसर्गः कर्तव्यः ॥ २१५ ॥ शौण्डहस्तगतं पयोऽप्यवमन्येत ॥ २१६ ॥ कार्यसंकटेष्वर्थव्यवसायिनी बुद्धिः ॥ २१७ ॥ मितभोजनं स्वास्थ्यम् ॥ २१८ ॥ पथ्यमपथ्यं वाऽजीर्णे नाश्नीयात् ॥ २१९ ॥ जीर्णभोजिनं व्याधिर्नोपसर्पति ॥ २२० ॥ जीर्णशरीरे वर्धमानं व्याधि नोपेक्षेत ॥ २२१ ॥ अजीर्णे भोजनं दुःखम् ॥ २२२ ॥ शत्रोरपि विशिष्यते व्याधिः ॥ २२३ ॥ दानं निधानमनुगामि ॥ २२४ ॥ पटुतरे तृष्णापरे सुलभमतिसन्धानम् ॥ २२५ ॥ तृष्णया मतिश्छाद्यते ॥ २२६ ॥ कार्यबहुत्वे बहुफलमायतिकं कुर्यात् ॥ २२७ ॥ स्वयमेवावस्कन्नं कार्यं निरीक्षेत ॥ २२८ ॥ मूर्खेषु साहसं नियतम् ॥ २२९ ॥ मूर्खेषु विवादो न कर्तव्यः ॥२३०॥ मूर्खेषु मूर्खवत्कथयेत् ॥ २३१ ॥ आयसैरायसं छेद्यम् ॥ २३२ ॥ नास्त्यधीमतः सखा ॥ २३३ ॥
पाता है ॥ २१२ ॥ धैर्यहीन व्यक्ति महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करने पर भी नष्ट हो जाता है ॥ २१३ ॥ धैर्यहीन पुरुष को न तो ऐहिक सुख प्राप्त होता है और न पारलौकिक ॥ २१४ ॥
दुर्जन की संगति न करनी चाहिए ॥ २१५ ॥ कलाल के हाथ में यदि दूध भी हो तो उसकी कद्र नहीं होती ॥ २१६ ॥ कार्यों में संकट उपस्थित हो जाने पर जो बुद्धि अर्थ का निश्चय करती है, वही वास्तविक बुद्धि है ॥ २१७ ॥
परिमित भोजन करना ही स्वास्थ्य का लक्षण है ॥ २१८ ॥ अजीर्ण (बदहजमी) होने पर पथ्य या अपथ्य कुछ भी न खाना चाहिए ॥ २१९ ॥ एक बार का भोजन पच जाने के बाद जो भोजन करता है उसको कोई भी व्याधि नहीं लगती ॥ २२० ॥ वृद्ध शरीर में बढ़ती हुई व्याधि की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ॥ २२१ ॥ अजीर्णावस्था में भोजन करना दुःखदायी होता है ॥ २२२ ॥ व्याधि शत्रु से भी बढ़कर कष्टकर होती है ॥ २२३ ॥
जैसा कोष हो वैसा ही दान दिया जाना चाहिए ॥ २२४ ॥ अति तृष्णा वाले व्यक्ति को वश में कर लेना आसान होता है ॥ २२५ ॥ तृष्णा, बुद्धि को ढक लेती है ॥ २२६ ॥ अनेक कार्यों के उपस्थित हो जाने पर उसी कार्य को पहले करना चाहिए, जो भविष्य में अधिक फल देने वाला है ॥ २२७ ॥ आक्रमण आदि के कार्य का राजा को स्वयमेव निरीक्षण करना चाहिए ॥ २२८ ॥
मूर्खों में लड़ाई-झगड़ा करने का माद्दा ( साहस ) अवश्य होता है ॥ २२९ ॥ मूर्खों से विवाद न करना चाहिए ॥ २३० ॥ मूर्खों के साथ मूर्ख की तरह कहना चाहिए ॥ २३१ ॥ लोहे को लोहे से ही काटा जा सकता है ॥ २३२ ॥ बुद्धिहीन व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता ॥ २३३ ॥
५० कौ०
७८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र
धर्मेण धार्यते लोकः ॥ २३४ ॥ प्रेतमपि धर्माधर्मावनुगच्छतः ॥ २३५ ॥ दया धर्मस्य जन्मभूमिः ॥ २३६ ॥ धर्ममूले सत्यदाने ॥ २३७ ॥ धर्मेण जयति लोकान् ॥ २३८ ॥ मृत्युरपि धर्मिष्ठं रक्षति ॥ २३९ ॥ धर्माद्विपरीतं पापं यत्र प्रसज्यते तत्र धर्मावमतिर्महती प्रसज्यते ॥ २४० ॥ उपस्थितविनाशानां प्रकृत्या कारेण कार्येण लक्ष्यते ॥ २४१ ॥ आत्मविनाशं सूचयत्यधर्मबुद्धिः ॥ २४२ ॥ पिशुनवादिनो न रहस्यम् ॥ २४३ ॥ पररहस्यं नैव श्रोतव्यम् ॥ २४४ ॥ वल्लभस्य कारकत्वमधर्मयुक्तम् ॥ २४५ ॥ स्वजनेष्वतिक्रमो न कर्तव्यः ॥ २४६ ॥ माताऽपि दुष्टा त्याज्या ॥ २४७ ॥ स्वहस्तोऽपि विषदिग्धश्छेद्यः ॥ २४८ ॥ परोऽपि च हितो बन्धुः ॥ २४९ ॥ कक्षादप्यौषधं गृह्यते ॥ २५० ॥ नास्ति चौरेषु विश्वासः ॥ २५१ ॥ अप्रतीकारेष्वनादरो न कर्तव्यः ॥ २५२ ॥ व्यसनं मनागपि बाधते ॥ २५३ ॥ अमरवदर्थजातमर्जयेत् ॥ २५४ ॥ अर्थवान् सर्वलोकस्य बहुमतः ॥ २५५ ॥ महेन्द्रमप्यर्थहीनं न बहु मन्यते लोकः ॥ २५६ ॥ दारिद्र्यं खलु पुरुषस्य जीवितं मरणम् ॥ २५७ ॥ विरूपोऽर्थवान् सुरूपः ॥ २५८ ॥ अदातारमप्यर्थवन्तमर्थिनो न त्यजन्ति ॥ २५९ ॥ अकुलीनोऽपि धनी
धर्म ही संसार को धारण किये हुए है ॥ २३४ ॥ धर्म और अधर्म दोनों मृत पुरुष के साथ जाते हैं ॥ २३५ ॥ दया ही धर्म की जन्मभूमि है ॥ २३६ ॥ राज्य और दान धर्ममूलक होते हैं ॥ २३७ ॥ धर्म के द्वारा प्राणियों को जीता जा सकता है ॥ २३८ ॥ मृत्यु भी धर्मात्मा पुरुष की रक्षा करती है ॥ २३९ ॥ जहाँ-जहाँ धर्म के विरुद्ध पाप का प्रसार होता है वहाँ-वहाँ धर्म का बड़ा अपकार होता है ॥ २४० ॥ स्वभाव या कार्य से आसन्न विनाश की परिस्थिति को जाना जाता है ॥ २४१ ॥ अधर्मबुद्धि ही अधर्मात्मा के विनाश की सूचना दे देती है ॥ २४२ ॥ चुगलखोर व्यक्ति की बात छिपी नहीं रहती ॥ २४३ ॥ दूसरे की गुप्त बात को न सुनना चाहिए ॥ २४४ ॥ स्वामी का कठोर होना अधर्मयुक्त है ॥ २४५ ॥
स्वजनों का अतिक्रमण न करना चाहिए ॥ २४६ ॥ माता भी यदि दुष्ट हो तो उसको छोड़ देना चाहिए ॥ २४७ ॥ विष से भरा हुआ यदि अपना हाथ भी हो तो उसे काट देना चाहिए ॥ २४८ ॥ हित करने वाला बाहरी व्यक्ति भी अपना भाई है ॥ २४९ ॥ सूखे जंगल से भी औषधि को प्राप्त किया जा सकता है ॥ २५० ॥ चोरों पर विश्वास नहीं करना चाहिए ॥ २५१ ॥ बाधारहित कर्म के करने में उपेक्षा न करनी चाहिए ॥ २५२ ॥ थोड़ा भी व्यसन बड़ा कष्टकर होता है ॥ २५३ ॥
स्वयं को अमर समझ कर अर्थों का अर्जन करना चाहिए ॥ २५४ ॥ धनवान् व्यक्ति सबका मान्य होता है ॥ २५५ ॥ अर्थहीन इन्द्र को भी संसार बड़ा नहीं समझता ॥ २५६ ॥ पुरुष की दरिद्रता, जीवितावस्था में ही मृत्यु है ॥ २५७ ॥ कुरूप
चाणक्य-प्रणीत सूत्र ७८७
कुलीनाद्विशिष्टः ॥ २६० ॥ नास्त्यवमानभयमनार्यस्य ॥ २६१ ॥ न चेतन- वतां वृत्तिभयम् ॥ २६२ ॥ न जितेन्द्रियाणां विषयभयम् ॥ २६३ ॥ न कृतार्थानां मरणभयम् ॥ २६४ ॥ कस्यचिदर्थं स्वमिव मन्यते साधुः ॥ २६५ ॥ परविभवेष्वादरो न कर्तव्यः ॥ २६६ ॥ परविभवेष्वादरोऽपि नाशमूलम् ॥ २६७ ॥ पलालमपि परद्रव्यं न हर्तव्यम् ॥ २६८ ॥ परद्रव्यापहरणमात्मद्रव्यनाशहेतुः ॥ २६९ ॥ न चौर्यात्परं मृत्युपाशः ॥ २७० ॥ यवागुरपि प्राणधारणं करोति काले ॥ २७१ ॥ न मृतस्यौषधं प्रयोजनम् ॥ २७२ ॥ समकाले स्वयमपि प्रभु- त्वस्य प्रयोजनं भवति ॥ २७३ ॥ नीचस्य विद्याः पापकर्मणि योजयन्ति ॥ २७४ ॥ पयःपानमपि विष- वर्धनं भुजङ्गस्य नामृतं स्यात् ॥ २७५ ॥ न हि धान्यसमो ह्यर्थः ॥ २७६ ॥ न क्षुधासमः शत्रुः ॥ २७७ ॥ अकृतेर्नियता क्षुत् ॥ २७८ ॥ नास्त्यभक्ष्यं क्षुधितस्य ॥ २७९ ॥ इन्द्रियाणि जरावशं कुर्वन्ति ॥ २८० ॥ सानुक्रोशं भर्तारमाजीवेत्
धनवान् भी रूपवान् समझा जाता है ॥ २५८ ॥ न देने वाले धनवान् को भी याचक लोग नहीं छोड़ते ॥ २५९ ॥ निम्नकुल में पैदा हुआ भी धनी पुरुष उच्चकुलोत्पन्न पुरुष से बड़ा समझा जाता है ॥ २६० ॥ नीच पुरुष को अपने तिरस्कार का भय नहीं होता ॥ २६१ ॥ चतुर पुरुष को जीविका का भय नहीं होता ॥ २६२ ॥ जितेन्द्रिय पुरुष को विषयों का भय नहीं होता ॥ २६३ ॥ आत्मदर्शी पुरुष को मृत्यु का भय नहीं होता ॥ २६४ ॥
जो सज्जन पुरुष होता है वह पराये अर्थ को अपने ही अर्थ की भाँति मानता है ॥ २६५ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा न करनी चाहिए ॥ २६६ ॥ दूसरे के वैभव की लिप्सा करना भी नाश का कारण होता है ॥ २६७ ॥ पलालमात्र भी (थोड़ा भी) दूसरे के द्रव्य का अपहरण न करना चाहिए ॥ २६८ ॥ दूसरे के द्रव्य का अपहरण करना अपने द्रव्य का नाश करना है ॥ २६९ ॥ चोरी से बढ़कर कोई भी दुखदायी बन्धन नहीं है ॥ २७० ॥ उचित समय पर प्राप्त लपसी (यवागू) भी प्राणरक्षक होती है ॥ २७१ ॥ मृतक व्यक्ति का औषधि से कोई प्रयोजन नहीं होता ॥ २७२ ॥ समय आने पर ऐश्वर्य की आवश्यकता होती है ॥ २७३ ॥
नीच पुरुष की विद्यायें उसे पापकर्म में प्रवृत्त करती हैं ॥ २७४ ॥ सर्प को दूध पिलाने पर उसका विष ही बढ़ता है, वह अमृत नहीं बनता ॥ २७५ ॥ अन्न से बढ़कर दूसरा धन नहीं है ॥ २७६ ॥ भूख से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं है ॥ २७७ ॥ अकर्मण्य व्यक्ति को कभी-न-कभी भूख का कष्ट भोगना ही पड़ता है ॥ २७८ ॥ भूखे मनुष्य के लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं है ॥ २७९ ॥
इन्द्रियाँ मनुष्य को वृद्धावस्था में अपने वश में कर लेती हैं ॥ २८० ॥ कृपालु