कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० ६४ : अ० ८ ] वास्तुक ( १ ) २६७
(१) त्रिपदीप्रतिक्रान्तमध्यर्धमरत्निं वा प्रवेश्य गाढप्रसृतमुदकमार्गं प्रस्रवणप्रपातं वा कारयेत् । तस्यातिक्रमे चतुष्पञ्चाशतपणो दण्डः । (२) एकपदीप्रतिक्रान्तमरत्निं वा चक्रिचतुष्पदस्थानमग्निष्ठमुदञ्जर-स्थानं रोचनीं कुट्टनीं वा कारयेत् । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । (३) सर्ववास्तुकयोः प्राक्षिप्तयोर्वा शालयोः किष्कुरन्तरिका त्रिपदी वा । तयोश्चतुरङ्गुलं नीप्रान्तरं समारूढकं वा । किष्कुमात्रमाणिद्वारमन्त-रिकायां खण्डफुल्लार्थमसम्पातं कारयेत् । प्रकाशार्थमल्पमूर्ध्वं वातायनं कारयेत् । सम्भूय वा गृहस्वामिनो यथेष्टं कारयेयुरनिष्टं वारयेयुः । (४) वानलटचाञ्चोर्ध्वमावार्यभागं कटप्रच्छन्नमवमर्शिभिन्ति वा कारयेद् वर्षबाधभयात् । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डः । (५) प्रतिलोमद्वारवातायनबाधायां च, अन्यत्र राजमार्गरथ्याभ्यः । (६) खातसोपानप्रणालीनिश्श्रेण्यवस्करभागैर्बहिर्बाधायां भोगनिग्रहे च ।
( १ ) प्रत्येक मकान पर सवा फुट ( तीन पद ) का गहरा, प्लेन तथा साफ-सुथरा पतनाला पानी के बहने के लिए दीवार के साथ-साथ अथवा दीवार से अलग बनवाया जाय । इस नियम का उल्लंघन करने वाले पर पचास पण दण्ड किया जाय ।
( २ ) घर के बाहर एक तरफ चार खम्भों से सज्जत एक यज्ञशाला बनवाई जाय, जिसमें एक पद गहरा पानी बाहर निकलने की नाली हो; यज्ञशाला की दूसरी ओर आटा पीसने की चक्की और अनाज कूटने के लिए ओखली बनवाई जाँय । ऐसा प्रबन्ध न करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) साधारणतया दो मकानों के बीच में एक हाथ ( तीन पद ) का फासला होना चाहिए; छज्जे वाले या उसारे वाले मकानों में भी इतना फासला अवश्य रहना चाहिए । प्रत्येक दो मकानों की छतों में चार अंगुल का अन्तर हो या वे आपस में मिली भी रहें । गली की ओर एक हाथ ( एक किष्कु ) नाप की खिड़की बनाई जाय, जो मजबूत हो और जिसको यथावसर खोला जा सके । रोशनी आने के लिए खिड़की में ऊपर छोटे-छोटे रोशनदान बनवाये जाँय । अन्तिम मकान के रोशनदान पर छाया के लिए टिन आदि लगवा देना चाहिए । अथवा पास-पड़ोस के रहने वाले आपसी समझौते से अपनी इच्छानुसार मकान बनवा लें, जिससे एक-दूसरे को कोई कष्ट न हो ।
( ४ ) वर्षा ऋतु के लिए स्थायी रूप से घास-फूस की एक छत बनवा लेनी चाहिए । ऐसा न करने पर पूर्व साहस दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति बाहर की ओर दरवाजा या खिड़की बनवाकर पड़ोसियों को कोई तकलीफ दे उसको भी पूर्व साहस दण्ड दिया जाय । यदि वे दरवाजे या खिड़कियाँ शाही सड़क या बाजार की ओर खुलें तो कोई हर्ज नहीं है ।
( ६ ) गड्ढा, जीना, सीढ़ी और पाखाना आदि के द्वारा जो मकान मालिक
२८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) परकुड्यमुदकेनोपघ्नतो द्वादशपणो दण्डः। मूत्रपुरीषोपघाते द्विगुणः। (२) प्रणालीमोक्षो वर्षति, अन्यथा द्वादशपणो दण्डः। (३) प्रतिषिद्धस्य च वसतः। निरस्यतश्चावक्रयणम्, अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससङ्ग्रहणमिथ्याभोगेभ्यः। स्वयमभिप्रस्थितो वर्षावक्रयशेषं दद्यात्। (४) सामान्ये वेश्मनि साहाय्यमप्रयच्छतः सामान्यमुपरुन्धतो भोगं च गृहे द्वादशपणो दण्डः, विनाशयतस्तद्द्विगुणः। (५) कोष्ठकाङ्गणवर्जनामग्निकुट्टनशालयोः । विवृतानां च सर्वेषां सामान्यो भोग इष्यते ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके गृहवास्तुकं नाम अष्टमोऽध्यायः, आदितश्चतुष्षष्टितमः।
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अपने पड़ोसियों को कष्ट पहुँचावे, सहन को रोके और पानी निकालने का ठीक प्रबन्ध न करे तो वह भी पूर्व साहस दण्ड का भागीदार है।
(१) पानी आदि से जो दूसरे की दीवाल को नुकसान पहुँचाये उसे बारह पण दण्ड दिया जाय। पेशाब और पाखाने की रुकावट करने वाले को चौबीस पण दण्ड दिया जाय।
(२) कूड़ा-करकट बहने के लिये वर्षा-ऋतु में हरेक नाली खुली रहनी चाहिए; अन्यथा उसको बारह पण दण्ड दिया जाय।
(३) मालिक मकान के मना करने पर भी जो किरायादार मकान खाली न करे और किराया देने पर भी जो मकान मालिक किरायेदार को निकाले, उन्हें बारह पण दण्ड दिया जाय; बशर्ते कि उनके सम्बन्ध में कठोर भाषण, चोरी, डाका, व्यभिचार तथा धोखाधड़ी का कोई मामला न हो। यदि किरायेदार स्वेच्छा से मकान को छोड़ दे तो साल भर का किराया मालिक को अदा करे।
(४) धर्मशाला आदि पंचायती घरों में सहायता न देने वाले व्यक्ति को तथा उन घरों का उपयोग करने में बाधा डालने वाले व्यक्ति को बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई उन पञ्चायती घरों की क्षति करे तो उस पर चौबीस पण जुर्माना किया जाय।
(५) कोठा और आँगन को छोड़कर अग्निशाला, कुट्टनशाला (ओखली) तथा दूसरे सभी खुले स्थानों का सब लोग उपयोग कर सकते हैं।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में आठवाँ अध्याय समाप्त।
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| प्रकरण ६५ | # वास्तुके वास्तुविक्रयः |
|---|---|
| अध्याय ९ |
(१) ज्ञातिसामन्तधनिकाः क्रमेण भूमिपरिग्रहान् क्रेतुमभ्याभवेयुः । ततोऽन्ये बाह्याः ।
(२) सामन्तचत्वारिंशत्कुल्या गृहप्रतिमुखे वेश्म श्रावयेयुः । सामन्त-ग्रामवृद्धेषु क्षेत्रमारामं सेतुबन्धं तटाकमाधारं वा मर्यादासु यथासेतुभोगम् । 'अनेनार्घेण कः क्रेता' इति त्रिराघुषितमव्याहतं क्रेता क्रेतुं लभेत ।
(३) स्पर्धया वा मूल्यवर्धने मूल्यवृद्धिः सशुल्का कोशं गच्छेत् । विक्रय-प्रतिक्रोष्टा शुल्कं दद्यात् ।
(४) अस्वामिप्रतिक्रोशे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सप्तरात्रादूर्ध्वमनभि-
वास्तुक
मकान बेचना, सीमाविवाद, खेतों की सीमाएँ, मिश्रित विवाद, कर की छूट
(१) मकान बेचना—यदि मकान बेचना हो तो मकान मालिक को चाहिए कि क्रमशः वह अपने कुटुम्बी, गाँव का मुखिया और धनाढ्य से पूछे । यदि वे खरीदने से इनकार कर दें तब बाहर के लोगों से बातचीत चलायी जाय ।
(२) दूसरे गाँवों के मुखिया तथा उनके चालीस कुल तक के पुरुषों को, मकान के सामने ही मकान की कीमत सुनाई जाय । गाँव के मुखिया तथा अन्य वृद्ध पुरुषों के सामने खेत, बाग, सीमबन्ध, तालाब और हौज आदि की मर्यादा के अनुसार कीमत निर्धारित करे 'इस मकान की इतनी कीमत है; इसको कौन खरीदना चाहता है ?' इस प्रकार तीन बार आवाज लगाने पर जो भी खरीदार बोली बोले, उसको बेरोक-टोक मकान बेच देना चाहिए ।
(३) खरीददारों की होड़ के कारण बोली बढ़ जाय तो वह बढ़ा हुआ मूल्य शुल्क सहित सरकारी खजाने में जमा किया जाय । बेचने वाले से वह शुल्क वसूल किया जाय ।
(४) मकान मालिक की अनुपस्थिति में उसके मकान का नीलाम करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । सूचना देने पर भी सात दिन के भीतर यदि
१९ कौ०
२९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
सरतः प्रतिक्रुष्टो विक्रीणीत । प्रतिक्रुष्टातिक्रमे वास्तुनि द्विशतो दण्डः, अन्यत्र चतुर्विंशतिपणो दण्डः । इति वास्तुविक्रयः । (१) सीमविवादं ग्रामयोरुभयोः सामन्ता पञ्चग्रामी दशग्रामी वा सेतुभिः स्थावरैः कृत्रिमैर्वा कुर्यात् । (२) कर्षकगोपालवृद्धकाः पूर्वभुक्तिका वा, अबाह्याः सेतुनामभिज्ञा बहव एको वा निर्दिश्य सीमसेतून् विपरीतवेषाः सीमानं नयेयुः । उद्दिष्टानां सेतुनामदर्शने सहस्रदण्डः । तदेव नीते सीमापहारिणां सेतुच्छिदां च कुर्यात् । (३) प्रनष्टसेतुभोगं वा सीमानं राजा यथोपकारं विभजेत् । (४) क्षेत्रविवादं सामन्तग्रामवृद्धाः कुर्युः । तेषां द्वैधीभावे यतो बहवः शुचयोऽनुमता वा ततो नियच्छेयुः । मध्यं वा गृह्णीयुः । तदुभयं परोक्तं वास्तु राजा हरेत् प्रनष्टस्वामिकं च । यथोपकारं वा विभजेत् ।
मकान मालिक उपस्थित न हो तो उसकी अनुपस्थिति में ही नीलाम करने वाला मकान बेच दे । बोली बोल देने के बाद यदि कोई व्यक्ति मकान लेने से मुकर जाय तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । मकान के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं के सम्बन्ध में चौबीस पण दण्ड किया जाय । यहाँ तक मकान बेचने के सम्बन्ध में कहा गया ।
( १ ) सीमा-विवाद—दो गाँवों के झगड़ों को उन गाँवों के मुखिया या आस-पास के पाँच-पाँच, दस-दस गाँवों के मुखिया आपस में मिलकर निबटायें; दो गाँवों के बीच वे स्थायी या अस्थायी हदबन्दी कायम कर दें ।
( २ ) गाँव के किसान, ग्वाले, वृद्ध तथा बाहर के अन्य अनुभवी, एक या अनेक पुरुष, जो शरहद की ठयेबन्दी से परिचित न हों, अपना वेश बदल कर वे सीमा के चिह्नों का पता लगायें और तब सीमाएँ निर्धारित करें । निर्णय किये हुए या बताये गए सीमा-चिह्नों के न देखे जाने पर अपराधी पर एक हजार पण दण्ड किया जाय । जो सीमा की भूमि का अपहरण करे या उसके चिह्नों को काटे, उसे भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जहाँ पर कि सीमा के चिह्न सर्वथा मिट गए हों और निर्णय के लिए कोई आधार नजर न आये, वहाँ पर राजा स्वयं इस प्रकार का सीमा-विभाग करे, जिससे कि किसी भी ग्रामवासी को कोई हानि न उठानी पड़े ।
( ४ ) खेतों की सीमाएँ—खेतों के झगड़े का निबटारा गाँव के मुखिया तथा वृद्ध पुरुष करें । यदि उनका आपस में मतभेद हो जाय तो वे धार्मिक पुरुष उसका निर्णय करें, जिनको प्रजा स्वीकार करती हो या किसी दूसरे को मध्यस्थ बना कर निर्णय किया जाय । यदि इन दोनों अवस्थाओं में भी कुछ निर्णय न हो सके तो उन विवादग्रस्त खेतों को राजा अपने कब्जे में ले ले और उस सम्पत्ति को भी राजा ले
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(१) प्रसह्यादाने वास्तुनि स्तेयदण्डः । कारणादाने प्रयासमाजीवं च परिसङ्ख्याय बन्धं दद्यात् । मर्यादापहरणे पूर्वः साहसदण्डः । मर्यादाभेदे चतुर्विंशतिपणः ।
(२) तेन तपोवनविवीतमहापथश्मशानदेवकुलयजनपुण्यस्थानविवादा व्याख्याताः । इति मर्यादास्थापनम् ।
(३) सर्व एव विवादाः सामन्तप्रत्ययाः । विवीतस्थलकेदारषण्डखल-वेश्मवाहनकोष्ठानं पूर्वं पूर्वमाबाधं सहेत ।
(४) ब्रह्मसोमारण्यदेवयजनपुण्यस्थानवर्जः स्थलप्रदेशः ।
(५) आधारपरिवाहकेदारोपभोगैः परक्षेत्रकृष्टबीजहिंसायां यथोपघातं मूल्यं दद्युः । केदारारामसेतुबन्धानां परस्परहिंसायां हिंसाद्विगुणो दण्डः ।
ले, जिसका कोई वारिस न हो । या जनता की लाभ की दृष्टि से उनका यथोचित विभाग कर दे ।
( १ ) जो व्यक्ति मकान, भूमि आदि अचल सम्पत्ति पर नाजायज कब्जा करे उसे चोरी का दण्ड किया जाय । किन्तु, यदि ऋण आदि के बदले कब्जा करे तो कब्जेदार को चाहिए कि वह सम्पत्ति के मालिक के शारीरिक श्रम का फल और कर्जे की अपेक्षा सम्पत्ति का जो अधिक मूल्य बैठे, उसका हिसाब मालिक को अदा कर दे । सीमाबन्दी को सरकाने पर प्रथम साहस दण्ड और सीमा-चिह्नों को मिटाने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) इसी प्रकार तपोवन, चारागाह, बड़ी सड़कें, श्मशान, देवालय, यज्ञस्थान और दूसरे पुण्यस्थानों के विवादास्पद विषयों का भी निर्णय करना चाहिए । यहाँ तक सीमाविषयक विवाद पर निर्णय का विधान वर्णन किया गया ।
( ३ ) मिश्रित विवाद—सब तरह के विवादों का निर्णय मुखिया ( सामन्त ) लोगों को करना चाहिए । चरागाह, खेती योग्य जमीन, खलिहान, मकान और घुड़साल, इनके सम्बन्ध में विवाद उपस्थित होने पर क्रमशः पहिले को प्रधानता देते हुए निर्णय किया जाय ।
( ४ ) ब्रह्मारण्य, सोमारण्य, देवस्थान, यज्ञस्थान और अन्य पुण्यस्थानों को छोड़कर आवश्यकता होने पर सभी जगह खेती करायी जा सकती है ।
( ५ ) जलाशय, क्यारी तथा नाली बनाते समय यदि किसी के बीज बोये खेत का नुकसान हो जाय तो हानि के अनुसार उसका मूल्य चुका देना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति खेत, बाग-बगीचा और सीमाबन्ध आदि को एक-दूसरे के बदले में नुकसान पहुँचायें तो उन्हें नुकसान का दुगुना दण्ड देना चाहिए ।
| २९२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) पश्चान्निविष्टमधरतटाकं नोपरितटाकस्य केदारमुदकेनाप्लावयेत् । उपरि निविष्टं नाधरतटाकस्य पूरस्स्रावं वारयेद् अन्यत्र त्रिवर्षोपरतकर्मणः । तस्यातिक्रमे पूर्वः साहसदण्डस्तटाकवामनं च । (२) पञ्चवर्षोपरतकर्मणः सेतुबन्धस्य स्वाम्यं लुप्येतान्यत्रापद्भ्यः । (३) तटाकसेतुबन्धानां नवप्रवर्तने पाञ्चवार्षिकः परिहारः । भग्नोत्सृष्टानां चातुर्वार्षिकः समुपारूढानां त्रैवार्षिकः । स्थलस्य द्वैवार्षिकः । स्वातमाधाने विक्रये च । (४) खातप्रावृत्तिमन्नदीनिबन्धायतनतटाककेदारारामषण्डवापानां सस्यवर्णभागोत्तरिकम्, अन्येभ्यो वा यथोपकारं दद्युः । (५) प्रक्रयाविक्रयाधिभागभोगनिसृष्टोपभोक्तारश्चैषां प्रतिकुर्युः । अप्रतीकारे हीनद्विगुणो दण्डः ।
( १ ) बाद में बने हुए नीचे के तालाब से सींचे जाने वाले खेत को ऊपर के तालाब के पानी से न सींचा जाय । नीचे के तालाब में आते हुए ऊपर के तालाब का पानी तब तक न रोका जाय, यदि नीचे का तालाब तीन वर्ष तक बेकार न पड़ा हो । इस नियम का उल्लंघन करने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय और उसके तालाब का पानी निकलवा दिया जाय ।
( २ ) पाँच वर्ष तक यदि जल आदि का कोई सीमाबन्ध बेकार रहे उस दशा में उस पर उसके स्वामी का हक नहीं रहता है; किन्तु विपत्तियों के कारण यदि उसको उपयोग में न लाया गया हो तो कोई बात नहीं ।
( ३ ) कर की छूट—नये शिरे से तालाब और सीमाबन्ध बनवाने वाले व्यक्ति पर पाँच वर्ष तक सरकारी टैक्स न लगाया जाय । यदि वह जीर्णोद्धार कराये तो चार वर्ष तक; यदि उनको बढ़ाये तो तीन वर्ष तक सरकारी टैक्स न लिया जाय । इसी प्रकार भूमि को गिरवी रखने और बेचने पर दो वर्ष तक सरकारी टैक्स न लिया जाय ।
( ४ ) जिन तालाबों में नदी का पानी न आता हो और किसान रहट आदि लगाकर अपने खेतों, बगीचों तथा फुलवाड़ियों में से पानी देते हों उनकी उपज पर सरकार उतना ही कर लगाये जितने से उन लोगों को कोई कष्ट न हो ।
( ५ ) जिन किसानों के तालाब नहीं हैं वे भी कीमत देकर, कुछ बंधी हुई रकम देकर, अपनी उपज का कुछ हिस्सा देकर अथवा मालिक की आज्ञा से दूसरे तालाबों से पानी ले सकते हैं । किन्तु उनके लिए यह आवश्यक है कि वे तालाब, रहट आदि की बराबर मरम्मत करते रहें । मरम्मत न करने पर जो नुकसान होगा उसका दुगुना जुर्म उन्हें भुगतना पड़ेगा ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वास्तुविक्रय नामक
प्र० ६५ : अ० ९ ] वास्तुक ( २ ) २९३
(१) सेतुभ्यो मुञ्चतस्तोयमवारे षट्पणो दमः । वारे वा तोयमन्येषां प्रमादेनोपरुन्धतः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके वास्तुविक्रयो नाम नवमोऽध्यायः, आदितः पञ्चषष्टितमः ।
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( १ ) अपनी बारी न होने पर जो पानी ले उसको छह पण का दण्ड दिया जाय, और उसको भी यही दण्ड दिया जाय तो प्रमाद से, अपनी बारी पर पानी लेते हुए दूसरे का पानी रोक दे ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वास्तुविक्रय नामक नौवां अध्याय समाप्त
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| प्रकरण ६६ | वास्तुके विवीतक्षेत्रपथहिंसा |
|---|---|
| अध्याय १० | समयस्यानपाकर्म च |
(१) कर्मोदकमार्गमुचितं रुन्धतः कुर्वतोऽनुचितं वा पूर्वः साहसदण्डः । (२) सेतुकूपपुण्यस्थानचैत्यदेवायतनानि च परभूमौ निवेशयतः पूर्वा- नुवृत्तं धर्मसेतुमाधानं विक्रयं वा नयतो नाययतो वा मध्यमः साहसदण्डः श्रोतॄणामुत्तमः अन्यत्र भग्नोत्सृष्टात् । (३) स्वाम्यभावे ग्रामाः पुण्यशीला वा प्रतिकुर्युः । (४) पथिप्रमाणं दुर्गनिवेशे व्याख्यातम् । क्षुद्रपशुमनुष्यपथं रुन्धतो द्वादशपणो दण्डः । महापशुपथं चतुर्विंशतिपणः । हस्तिक्षेत्रपथं चतुष्पञ्चा- शत्पणः । सेतुवनपथं षट्छतः । श्मशानग्रामपथं द्विशतः । द्रोणमुखपथं पञ्चशतः । स्थानीयराष्ट्रविवीतपथं साहस्रः । अतिकर्षणे चैषां दण्डचतुर्था दण्डाः । कर्षंणे पूर्वोक्ताः ।
वास्तुक
रास्तों का रोकना; गावों का बन्दोबस्त; चरागाहों का प्रबन्ध;
सामूहिक कार्यों में शामिल न होने का मुआवजा
( १ ) जो लोग खेती की सिंचाई के लिए पानी के उचित रास्तों को रोकें और अनुचित रास्तों से जल को ले जायें उन्हें प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( २ ) जो लोग दूसरे की जमीन में सीमा, पुण्यस्थान, चैत्य और देवालय बनवायें अथवा पहिले से धर्मार्थ बने हुए स्थानों को गिरबी रखें, बेचें या बिकवायें उन्हें मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । जो लोग इन कार्यों में सहायक या साक्षी बनें उन्हें उत्तम साहस दण्ड दिया जाय; किन्तु, यदि मकान टूट-फूट गया हो और उसको मालिक ने छोड़ दिया हो तो उसको बेचने, गिरबी रखने में कोई हानि नहीं है ।
( ३ ) मकान मालिक के न होने पर ग्रामवासी तथा अन्य धार्मिक लोग उस टूटे-फूटे धर्मार्थ मकान की मरम्मत कर सकते हैं ।
( ४ ) **रास्तों का रोकना—**आने-जाने के लिए रास्ता कितना चौड़ा होना चाहिए, इसका निरूपण 'दुर्ग-निवेश' प्रकरण में कर दिया गया है । जो भी व्यक्ति छोटे-छोटे जानवरों और मनुष्यों के रास्ते को रोके उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । बड़े-बड़े पशुओं का मार्ग रोकने पर चौबीस पण; हाथी का तथा खेतों का रास्ता रोकने पर चौवन पण; सेतु एवं जङ्गल का रास्ता रोकने पर छह-सौ पण; श्मशान तथा गांव का रास्ता रोकने पर दो-सौ पण; द्रोणमुख का रास्ता रोकने पर
प्र० ६६ : अ० १० ] वास्तुक ( ३ ) २९५
(१) क्षेत्रिकस्याक्षिपतः क्षेत्रमुपवास्य वा त्यजतो बीजकाले द्वादशपणो दण्डः। अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः। (२) करदाः करदेष्वाधानं विक्रयं वा कुर्युः। ब्रह्मदेयिका ब्रह्मदेयिकेषु, अन्यथा पूर्वः साहसदण्डः; करदस्य वाऽकरदग्रामं प्रविशतः। (३) करदं तु प्रविशतः सर्वद्रव्येषु प्राकाम्यं स्यादन्यत्रागारात्। तदप्यस्मै दद्यात्। (४) अनादेयमकृषतोऽन्यः पंचवर्षाण्युपभुज्य प्रयासनिष्क्रयेण दद्यात्। (५) अकरदाः परत्र वसन्तो भोगमुपजीवेयुः।
पाँच-सौ पण और स्थानीय, राष्ट्र तथा चरागाह का रास्ता रोकने पर एक हजार का दण्ड दिया जाय। यदि कोई व्यक्ति इन रास्तों को खोदने या जोतने के अलावा कोई हानि पहुँचाये तो उस पर ऊपर बताये गये दण्डों का चौथाई दण्ड दिया जाय। खोदने या जोतने पर पूर्वोक्त सभी दण्ड दिये जाने चाहिए।
(१) गांव में रहने वाला किसान यदि बीज बोने के समय बीज न बोये या खेत को ही छोड़ दे, तो उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; किन्तु खेत के किसी दोष के कारण या किसी आकस्मिक आपत्ति के कारण अथवा असमर्थ होने के कारण यदि वह ऐसा करता है तो वह अदण्ड्य है।
(२) गाँवों का बन्दोबस्त—लगान देने वाले किसान, लगान देने वालों के यहाँ ही अपनी जमीन गिरवी रख सकते हैं अथवा बेच सकते हैं। जिनको बिना लगान की धर्मार्थ भूमि दी गई है, वे अपने समान लोगों के ही हाथ अपनी जमीन गिरवी रख सकते हैं या बेच सकते हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय। यही दण्ड उस व्यक्ति को भी दिया जाय, जो लगान देने वाले गाँव के निवास को छोड़कर लगान न देने वाले गाँव में बस जाने की इच्छा से प्रवेश करे।
(३) यदि वह पुनः लगान देने वाले गाँव में ही बसने लगे, तो उसे मकान के अलावा सभी बातों की छूट दी जाय। अथवा उचित हो तो मकान भी उसको दे दिया जाय।
(४) जो किसान अपनी जमीन को नहीं जोते उसको दूसरा किसान बिना लगान दिये ही जोत सकता है और वह पांच वर्ष तक उसका उपयोग कर उस जमीन को उसके मालिक को सौंप दे; किन्तु उस जमीन को ठीक करने में उसका जो खर्चा और मेहनत लगी हो, उसका मूल्य वह मालिक से वसूल कर ले।
(५) जिनके पास बिना लगान की धर्मार्थ जमीन है, दूसरी जगह रहते हुए भी, वे अपनी उस जमीन के पूरे अधिकारी हैं।
२९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) ग्रामार्थेन ग्रामिकं व्रजन्तमुपवासाः पर्यायेणानुगच्छेयुः । अननुगच्छन्तः पणार्धपणिकं योजनं दद्युः । (२) ग्रामिकस्य ग्रामादस्तेनपारदारिकं निरस्यतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । ग्रामस्योत्तमः । (३) निरस्तस्य प्रवेशो ह्यधिगमेन व्याख्यातः । (४) स्तम्भैः समन्ततो ग्रामाद्धनुःशतापकृष्टमुपसालं कारयेत् । (५) पशुप्रचारार्थं विवीतमालवनेनोपजीवयेयुः । (६) विवीतं भक्षयित्वापसृतानामुष्ट्रमहिषाणां पादिकं रूपं गृह्णीयुः । गवाश्वखराणां चार्थपादिकम् । क्षुद्रपशूनां षोडशभागिकम् । (७) भक्षयित्वा निष्षण्णानामेत एव द्विगुणा दण्डाः । परिवसतां चतुर्गुणाः । ग्रामदेववृषा वा अनिर्दशाहा वा धेनुरुक्षाणो गोवृषाश्चादण्ड्याः ।
( १ ) जब गाँव का मुखिया गाँव के किसी कार्य से बाहर जाये तो अपनी पारी के अनुसार गाँव वाले उसके साथ रहें। जो अपनी पारी पर न जायें उन पर योजन के हिसाब से डेढ़ पण जुर्माना किया जाय ।
( २ ) यदि गाँव का मुखिया, चोर या व्यभिचारी के अतिरिक्त किसी दूसरे को गाँव से निकाल दे तो उस मुखिया पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । यदि सारा गाँव मिल कर ऐसे निरपराधी व्यक्ति को गाँव से निकाले तो सारे गाँव पर उत्तम साहस दण्ड किया जाय ।
( ३ ) इसी प्रकार यदि गाँव से बाहर गया हुआ कोई व्यक्ति पुनः गाँव में बसना चाहे और मुखिया तथा गाँव वाले उसको न बसने दें तो मुखिया पर चौबीस पण दण्ड और गाँव वालों पर उत्तम साहस दण्ड किया जाय ।
( ४ ) गाँव से चार-सौ हाथ की दूरी पर पशुओं के आरामदेह के लिए चारों ओर खम्भों से घिरा हुआ एक बाड़ा बनवाया जाय ।
( ५ ) चरागाहों का प्रबन्ध—पशुओं के घूमने और चरने-फिरने के लिए जंगल में चरागाह बनवाये जाँय ।
( ६ ) ऊँट और भैंस आदि बड़े पशुओं को यदि उनके मालिक चरागाह में चराकर अपने घर बाँधने के लिए ले जाँय, तो उनसे चराई का १/४ पण कर लिया जाय । गाय, घोड़े और गधे आदि मध्यम श्रेणी के पशुओं की चराई १/८ पण; इसी प्रकार भेड़, बकरी आदि छोटे पशुओं की चराई १/१६ पण कर रूप में उनके मालिकों से वसूल कर लिया जाय ।
( ७ ) जो जानवर चरकर चरागाह में ही रहें उनके मालिकों से पूर्वोक्त राशि से दुगुना कर लिया जाय । जो बराबर चरागाह में ही रहें उनके मालिकों से चौगुना कर लिया जाय । ग्रामदेवता के नाम से छोड़े गए साड़ों, दस दिन की ब्याई हुई गायों और गायों के साथ रहने वाले बछड़ों पर कोई कर न लिया जाय ।
प्र० ६६ : अ० १० ] वास्तुक ( ३ ) २९७
(१) सस्यभक्षणे सस्योपघातं निष्पत्तितः परिसंख्याय द्विगुणं दापयेत् । (२) स्वामिनश्चानिवेद्य चारयतो द्वादशपणो दण्डः । प्रमुञ्चतश्चतुर्विंशतिपणः । पालिनामर्धदण्डः । तदेव षण्डभक्षणे कुर्यात् । वाटभेदे द्विगुणः । वेश्मखलवलयगतानां च धान्यानां भक्षणे । हिंसाप्रतीकारं कुर्यात् । (३) अभयवनमृगाः परिगृहीता वा भक्षयन्तः स्वामिनो निवेद्य यथाऽवध्यास्तथा प्रतिषेद्धव्याः । (४) पशवो रश्मिप्रतोदाभ्यां वारयितव्याः । तेषामन्यथा हिंसायां दण्डपारुष्यदण्डाः । प्रार्थयमाना दृष्टापराधा वा सर्वोपायैर्नियन्तव्याः । इति क्षेत्रपथहिंसा । (५) कर्षकस्य ग्राममभ्युपेत्याकुर्वतो ग्राम एवात्ययं हरेत् । कर्माकरणे कर्मवेतनाद् द्विगुणं, हिरण्यादाने प्रत्यंशद्विगुणं, भक्ष्यपेयादाने च प्रहवणेषु द्विगुणमंशं दद्यात् ।
(१) यदि किसी का जानवर किसी की खड़ी खेती को चर जाय तो अन्न के नुकसान का दुगुना दाम खेत के मालिक को दिलाया जाय ।
(२) लुका-छिपा कर यदि कोई अपने पशु से दूसरे का खेत चरवाये उसको बारह पण दण्ड दिया जाय । जो अपने पशु को किसी के खेत में चरने के लिए छोड़ दे उसे चौबीस पण दण्ड दिया जाय । इस प्रकार खेतों का नुकसान होने पर खेतों के रखवालों को पूर्वोक्त दण्डों का आधा दण्ड दिया जाय । यदि खेत को कोई साँड़ चर जाय तब भी रखवाले पर इतना ही जुर्माना किया जाय । खेत की बाड़ टूट जाने पर रखवाले पर दुगुना दण्ड किया जाय । घर, खलिहान और बाड़ी हुई जगहों का अन्न यदि पशु खा जाँय तो हानि के बराबर मूल्य देना चाहिए ।
(३) यदि आश्रमों के मृग खेतों को चरते हुए पकड़े जाँय तो रखवाला इसकी खबर अपने मालिक को कर दे और उन मृगों को इस प्रकार खेतों से बाहर करे, जिससे उन पर कोई चोट न लगे या वे मरने न पावें ।
(४) पशुओं को रस्सी या कोड़े से हटाना चाहिए । यदि उनको कोई अनुचित ढङ्ग से मारे या हटाये तो उसे 'दण्डपारुष्य' प्रकरण के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए । किन्तु जो हटाने वालों का मुकाबला करें या पहिले कभी किसी को मारते हुए देखे गये हों उनको अनुचित ढङ्ग से भी मारा या हटाया जा सकता है । यहाँ तक खेतों और रास्तों के नुकसान के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
(५) सामूहिक कार्यों में सामिल न होने का मुआवजा—यदि कोई किसान गाँव में आकर पञ्चायती या खेती आदि का कार्य न करे तो गाँव उससे यथोचित जुर्माना वसूल कर ले । यदि कोई व्यक्ति कार्य न करे तो कार्य के वेतन से दुगुना; पञ्चायती कार्यों में चन्दा न दे तो चन्दे का दुगुना और सामुहिक खान-पान के अवसर पर शरीक न हो तो उसका दुगुना; दण्ड उससे वसूल किया जाय ।
२९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रेक्षायामनंशदः सस्वजनो न प्रेक्षेत । प्रच्छन्नश्रवणेक्षणे च सर्वहिते च कर्मणि निग्रहेण द्विगुणमंशं दद्यात् ।
(२) सर्वहितमेकस्य ब्रुवतः कुर्युराज्ञाम् । अकरणे द्वादशपणो दण्डः । तं चेत्सम्भूय वा हन्युः पृथगेषामपराधद्विगुणो दण्डः । उपहन्तृषु विशिष्टः ।
(३) ब्राह्मणतश्चैषां ज्यैष्ठ्यं नियम्येत । प्रवहणेषु चैषां ब्राह्मणेना-कामाः कुर्युः । अंशं च लभेरन् ।
(४) तेन देशजातिकुलसंघानां समयस्यानपाकर्म व्याख्यातम् ।
(५) राजा देशहितान् सेतून् कुर्वतां पथि संक्रमान् ।
ग्रामशोभांश्च रक्षांश्च तेषां प्रियहितं चरेत् ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वास्तुके प्रकरणे दशमोऽध्यायः,
आदितः षट्षष्टितमः ।
—: ० :—
(१) यदि कोई ग्रामवासी गांव के सार्वजनिक मनोरंजन के कार्यों में अपने हिस्से का चन्दा न दे तो सपरिवार उसको उत्सव में प्रवेश न करने दिया जाय । यदि वे छिपकर तमाशा देखें या सुनें; और जो गाँव के सार्वजनिक हितकारी कार्यों में भाग न ले उससे दुगुना हिस्सा वसूल किया जाय ।
(२) जो व्यक्ति सार्वजनिक कल्याण का सुझाव दे उसकी बात को सभी ग्राम-वासी मानें । उसका तिरस्कार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि गांव के लोग मिलकर उस व्यक्ति को मारें-पीटें तो प्रत्येक ग्रामीण पर अपराध से दुगना दण्ड वसूल किया जाय । जो लोग घातक प्रहार करें उन पर विशेष दण्ड किया जाय ।
(३) उन मारने वालों में यदि ब्राह्मण या उससे भी प्रतिष्ठित कोई व्यक्ति हो तो उसे सबसे अधिक दण्डित किया जाय । यदि किसी सार्वजनिक कार्य में ब्राह्मण सामिल न हो सके तो गाँव के लोग ही उसके अभाव को पूरा कर दें; किन्तु अनु-पस्थित रहने का जो मुआवजा ब्राह्मण की ओर निकले, उसे गाँव वाले अवश्य वसूल कर लें ।
(४) इसी प्रकार देश, जाति, कुल और दूसरे समुदायों की व्यवस्था को समझ लेना चाहिये ।
(५) जो लोग मिलकर जनता के आराम के लिए रास्तों पर मकान बनाते हैं; जो व्यक्ति गांवों को सजाने-सुधारने और उनकी रक्षा करने के लिए यत्नशील रहते हैं उनके सहयोग और कल्याण की ओर राजा का ध्यान रहना चाहिए ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ६७ | ऋणादानम् |
|---|---|
| अध्याय ११ |
(१) सपादपणा धर्म्या मासवृद्धिः पणशतस्य । पञ्चपणा व्यावहारिकी । दशपणा कान्तारगाणाम् । विंशतिपणा सामुद्राणाम् । (२) ततः परं कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डः । (३) राजन्ययोगक्षेमवहे तु धनिकारणिकयोश्चरित्रमवेक्षेत । (४) धान्यवृद्धिः सस्यनिष्पत्तावुपार्धा, परं मूल्यकृता वर्धेत । प्रक्षेपवृद्धिुरुदयादर्धम् । सन्निधानसन्ना वार्षिकी देया । (५) चिरप्रवासः संस्तम्भप्रविष्टो वा मूल्यद्विगुणं दद्यात् । अकृत्वा वृद्धिं साधयतो वर्धयतो वा मूल्यं वा वृद्धिमरोप्य श्रावयतो बन्धचतुर्गुणो
ऋण लेना
(१) व्याज के नियम—सामान्यतया सौ-पण पर सवा-पण व्याज प्रतिमास लिया जाना चाहिए । इसी सौ-पण पर व्यापारी लोगों से पांच पण, जंगल में रहने या वहाँ व्यापार करने वालों से दस पण और समुद्र के व्यापारियों से बीस पण व्याज लेना चाहिए ।
(२) इससे अधिक व्याज लेने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उसमें जिन्होंने गवाही भरी हो उन्हें आधा दण्ड दिया जाय ।
(३) यदि ऋण देने वाले ( धनिक ) और ऋण लेने वाले ( धारणि ) के आपसी सौदे पर राज्य की भलाई होती हो तो सरकार को उनके चरित्र पर निगरानी रखनी चाहिए ।
(४) यदि अन्नसम्बन्धी व्याज फसल के समय पर चुकता करना हो तो वह मूलधन की आधा रकम से अधिक न होना चाहिए । गोदाम के इकट्ठे बेचे हुए माल पर उसके लाभ का आधा व्याज होना चाहिए । इस प्रकार के लेन-देन का हिसाब-किताब वर्ष में एक बार अवश्य करना चाहिए ।
(५) यदि विदेश में चले जाने के कारण या जान-बूझकर खरीददार अपने माल को नहीं निकालता तो वह माल के मूलधन का दुगुना मूल्य बेचने वाले को अदा करे । अवधि से पहिले ही जो व्याज मांगे, अथवा व्याज को मूलधन के साथ जोड़कर उतना रुपया मांगे, उसे मांगे हुए धन का, चौगुना दण्ड देना चाहिए । थोड़ा धन
३०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
दण्डः । तुच्छश्रावणायामभूतचतुर्गुणः । तस्य त्रिभागमादाता दद्यात्, शेषं प्रदाता ।
(१) दीर्घसत्रव्याधिगुरुकुलोपरुद्धं बालमसारं वा नर्णमनु वर्धेत । मुच्यमानमृणमप्रतिगृह्णतो द्वादशपणो दण्डः । कारणापदेशेन निवृत्तवृद्धिकमन्यत्र तिष्ठेत् ।
(२) दशवर्षोपेक्षितमृणमप्रतिग्राह्यमन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराजविभ्रमेभ्यः ।
(३) प्रेतस्य पुत्राः कुसीदं दद्युः । दायादा वा रिक्थहराः सहग्राहिणः प्रतिभुवो वा । न प्रातिभाव्यमन्यत् । असारं बालप्रातिभाव्यम् । असंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा दायादा वा रिक्थं हरमाणा दद्युः ।
(४) जीवितविवाहभूमिप्रातिभाव्यमसंख्यातदेशकालं तु पुत्राः पौत्रा वा वहेयुः ।
को अधिक कहा जाय और जब गवाहियाँ ली जाँय, उस समय गवाह जितना धन बतायें, उसका चौगुना दण्ड अधमर्ण और उत्तमर्ण दोनों को दिया जाना चाहिए । उसमें से तीन भाग अधमर्ण ( ऋण लेने वाला ) और बाकी उत्तमर्ण ( ऋण देने वाला ) अदा करे ।
( १ ) लम्बी अवधि तक यज्ञकार्य में लगे हुए, व्याधिग्रस्त, गुरुकुल में अध्यन करने वाले, बालक और अशक्त आदि व्यक्तियों के ऋण पर ब्याज नहीं जोड़ा जाना चाहिए । यदि कर्जदार अपने कर्जे की अन्तिम रकम को अदा करें और धनिक उसको न ले तो, धनिक पर बारह पण का दण्ड दिया जाना चाहिए । यदि न लेने का कोई विशेष कारण हो तो वह रकम बिना सूद के कहीं और जमा कर दी जानी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई उत्तमर्ण दस वर्ष के अन्दर अपना कर्जा वसूल नहीं कर पाता तो उस धन पर उसका फिर कोई अधिकार नहीं रहता है । यदि वह कर्जे का धन बाल, बूढ़े, बीमार, आपद्ग्रस्त, प्रवासी, देशत्यागी या राजकाज से बाहर गए किसी व्यक्ति का हो तो वह दस वर्ष बाद भी उस धन का अधिकारी माना जायेगा ।
( ३ ) यदि ऋण लेने वाला ( अधमर्ण ) मर जाय तो उसका पुत्र ऋण को चुकता करे । अथवा उसके वारिस या उसके साथ काम करने वाले जामिन हिस्सेदार उसके ऋण को अदा करें । इनके अतिरिक्त ऐसे मृतक अधमर्ण के ऋण का जामिन दूसरा न माना जाय, बालक जामिन होने का अधिकारी नहीं है । जिस ऋण का स्थान तथा समय निश्चित नहीं है, उसको कर्जेदार के पुत्र, पौत्र या दूसरे दायभागी अदा करें ।
( ४ ) जो कर्जा आजीविका, विवाह और जमीन के लिए लिया गया हो उसको
प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋ॒ण सम्बन्धी नियम ३०१
(१) नानर्णसमवाये तु नैकं द्वौ युगपदभिवदेयाताम् अन्यत्र प्रतिष्ठ- मानात् । तत्रापि गृहीतानुपूर्व्या राजश्रोत्रियद्रव्यं वा पूर्वं प्रतिपादयेत् । (२) दम्पत्योः पितापुत्रयोर्भ्रातॄणां चाविभक्तानां परस्परकृतमृणम- साध्यम् । (३) अग्राह्याः कर्मकालेषु कर्षका राजपुरुषाश्च। स्त्री वाऽप्रतिश्राविणी पतिकृतमृणमन्यत्र गोपालकार्धसीतिकेभ्यः । (४) पतिस्तु ग्राह्यः स्त्रोकृतमृणमप्रतिविधाय प्रोषित इति । सम्प्रति- पत्तावुत्तमः । असम्प्रतिपत्तौ तु साक्षिणः प्रमाणम् । प्रात्ययिकाः शुचयोऽनु- मतो वा त्रयोऽवरास्त्र्यर्थाः । पक्षानुमतौ वा द्वौ ऋणं प्रति, न त्वेवैकः ।
तथा जामिन के द्वारा चुकता किये जाने योग्य ऋण को केवल उनके पुत्र, पौत्र ही अदा करें।
(१) एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा : यदि एक व्यक्ति पर अनेक व्यक्तियों का कर्जा हो तो उस पर एक साथ अनेक कर्जा देने वाले मुकदमा नहीं चला सकते हैं, किन्तु यदि वह कर्जदार कहीं विदेश को जा रहा हो तो उस पर एक साथ अनेक मुकदमे चलाये जा सकते हैं। मुकदमों का फैसला हो जाने के बाद ऋण का भुगतान उसी क्रम से होना चाहिए, जिस क्रम से उसको लिया गया है। यदि उसमें राजा या ब्राह्मण का कर्जा निकले तो उसका भुगतान सबसे पहिले होना चाहिए।
(२) भार्या, पति, पिता, पुत्र और एक साथ रहने वाले भाई परस्पर कर्जा लें-दें तो उनके कर्जे का मुकदमा अदालत में नहीं चलाया जा सकता ।
(३) कर्जा लेने वाले किसान और राज-कर्मचारी यदि काम पर लगे हों तो ऋण के सम्बन्ध में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। पति के कर्ज लिए हुए ऋण को यदि उसकी स्त्री चुकाना मंजूर नहीं करती तो उस पर किसी प्रकार का जोर-दबाव नहीं डाला जा सकता है; किन्तु ग्वाला आदि कार्यों की कमाई पर निर्भर रहने वाले लोगों की स्त्रियाँ अपने पति की अनुपस्थिति में अपने पति का कर्जा चुकता करने की जिम्मेदार हैं।
(४) साक्षियों की गवाह : यदि पत्नी कर्जा ले तो उसको अदा करने के लिए उसके पति को विवश किया जा सकता है। स्त्री के ऋण को न चुकाने की नौबत से बच कर या बहाना करके यदि कोई पुरुष विदेश चला जाय और उसकी यह बात सावित हो जाय तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। यदि कारण सिद्ध न हो सके तो साक्षियों की गवाही के अनुसार निर्णय किया जाय। दोनों पक्षों से अनुमत कम-से-कम तीन गवाह होने चाहिए। जो विश्वास योग्य और चरित्रवान् हों। अथवा दोनों पक्षों की राय से दो गवाह भी हो सकते हैं। किन्तु कर्जे के मामले में एक गवाह कदापि न होना चाहिए।
३०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रतिषिद्धाः स्यालसहायान्वर्थिधनिकधारणिकवैरिन्यङ्गधृतदण्डाः । पूर्वे चाव्यवहार्याः । राजश्रोत्रियग्रामभृतककुष्ठिव्रणिनः पतितचण्डालकुत्सितकर्माणोऽन्धबधिरमूकाहंवादिनः स्त्रीराजपुरुषाश्च । अन्यत्र स्ववर्गेभ्यः । (२) पारुष्यस्तेयसंग्रहणेषु तु वैरिस्यालसहायवर्ज्याः । रहस्यव्यवहारेष्वेका स्त्री पुरुष उपश्रोता उपद्रष्टा वा साक्षी स्याद्राजतापसवर्जम् । (३) स्वामिनो भृत्यानामृत्विगाचार्याः शिष्याणां मातापितरौ पुत्राणां चानिग्रहेण साक्ष्यं कुर्युः । तेषामितरे वा । परस्पराभियोगे चैषामुत्तमाः परोक्ता दशबन्धं दद्युरवराः पञ्चबन्धम् । इति साक्ष्यधिकारः । (४) ब्राह्मणोदकुम्भाग्निसकाशे साक्षिणः परिगृह्णीयात् । तत्र ब्राह्मणं ब्रूयात्—सत्यं ब्रूहीति । राजन्यं वैश्यं वा—मा तवेष्टापूर्तफलं, कपालहस्तः शत्रुकुलं भिक्षार्थी गच्छेरिति । शूद्रं—जन्ममरणान्तरे यद् वः पुण्यफलं तद्
( १ ) साला, सहायक, क्रीतदास ( अन्वर्थी ), ऋण देने वाला ( धनिक ), कर्जदार ( धारणिक ), दुश्मन, अंगहीन और राज्य से सजा पाये पुरुष गवाह नहीं हो सकते हैं । विश्वासी, चरित्रवान् और दोनों पक्षों से अनुमत व्यक्ति भी यदि व्यवहारकुशल न हों तो वे भी गवाह होने के योग्य नहीं हैं । राजा, वेदपाठी ब्राह्मण, गांव का मुखिया, कोढ़ी, दागयुक्त शरीर वाला, पतित, चाण्डाल, नीच कार्य करने वाला, अंधा, बहरा, गूँगा, घमण्डी, स्त्री और राजकर्मचारी ये सब अपने-अपने वर्गों को छोड़कर अन्यत्र गवाह नहीं हो सकते हैं ।
( २ ) परन्तु पारुष्य, चोरी और व्यभिचार के मामलों में शत्रु, साला और सहायक को छोड़कर पूर्वोक्त बाकी सभी लोग गवाह हो सकते हैं । गुप्त मामलों में स्त्री, राजा और तपस्वी को छोड़कर सुनने-देखने वाला अकेला व्यक्ति भी गवाह हो सकता है ।
( ३ ) नौकरों के मालिक, शिष्यों के आचार्य, पुत्रों के माता-पिता और मालिकों के नौकर आदि परस्पर खुले तौर पर गवाह हो सकते हैं । आपसी मुकदमों में यदि मालिक, आचार्य तथा माता-पिता पराजित हो जायें तो नौकर, शिष्य आदि को वे पराजय का दसवाँ भाग दें; यदि नौकर आदि हार जायें तो अपने स्वामी आदि को वे हारे हुए धन का पाचवाँ हिस्सा दण्ड रूप में दें । यहाँ तक साक्षी के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।
( ४ ) शपथ : पानी से भरे घड़े के पास या आग के पास ब्राह्मण को शपथ के लिए ले जाया जाय, यदि ब्राह्मण गवाह हो तो उसे 'सच बोलो' इतनी भर शपथ दिलाई जाय । यदि गवाही देने वाला क्षत्रिय और वैश्य हो तो उससे 'तुमको यज्ञ आदि इष्ट का और कुआँ, धर्मशाला आदि परोपकार का फल न मिले; तुम अपनी
प्र० ६७ : अ० ११ ] ऋण सम्बन्धी नियम ३०३
राजानं गच्छेत् । राज्ञश्च किल्विषं युष्मानन्यथावादे । दण्डश्चानुबन्धः । पश्चादपि ज्ञायेत यथादृष्टश्रुतम् । एकमन्त्राः सत्यमवहरतेति । (१) अनवहरतां सप्तरात्रादूर्ध्वं द्वादशपणो दण्डः त्रिपक्षादूर्ध्वमभियागं दद्युः । (२) साक्षिभेदे यतो बहवः शुचयोऽनुमता वा ततो नियच्छेयुः । मध्यं वा गृह्णीयुः । तद्वा द्रव्यं राजा हरेत् । साक्षिणश्चेदभियोगादूनं ब्रूयुरतिरिक्तस्याभियोक्ता बन्धं दद्यात् । अतिरिक्तं वा ब्रूयुस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् । बालिश्यादभियोक्तुर्वा दुःश्रुतं दुर्लिखितं प्रेताभिनिवेशं वा समीक्ष्य साक्षिप्रत्ययमेव स्यात् । (३) साक्षिबालिश्येष्वेव पृथगनुयोगे देशकालकार्याणां पूर्वमध्यमोत्तमा दण्डा इत्यौशनसाः ।
शत्रु-सेना को जीतकर भी हाथ में खप्पर लेकर भीख मांगते फिरो, यदि झूठ बोलो तो' इस प्रकार शपथ दिलाई जाय । यदि गवाह शूद्र हो तो उसके सम्मुख कहा जाय 'देखो यदि सच न बोलो तो जन्म-जन्मान्तर का तुम्हारा सारा पुण्य राजा को प्राप्त हो; यदि तुमने झूठ बोला तो तुम्हें निश्चित ही दण्ड मिलेगा; बाद में भी सुनकर-देखकर मामले की जाँच-पड़ताल की जायेगी; इसलिए तुम सब लोगों को मिलकर सही-सही कहना चाहिए' इस प्रकार कहा जाय ।
( १ ) इतना कहने पर भी सात दिन तक यदि वे सही-सही वारदात न बतायें तो उनमें प्रत्येक को बारह-बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि वे डेढ़ मास तक भी कुछ भेद न खोलें तो उनके विरुद्ध मुकदमे का फैसला किया जाय ।
( २ ) यदि किसी मुकदमे में गवाहों का आपसी मतभेद हो जाय तो उनमें जिस बात को बहुसंख्यक, चरित्रवान्, विश्वासी तथा अनुमत गवाह कहें, उसी के आधार पर फैसला कर दिया जाय अथवा किसी को मध्यस्थ बनाकर फैसला किया जाय । यदि किसी भी युक्ति से फैसला न हो सके तो उस विवादग्रस्त संपत्ति को राजा ले ले । कर्ज की जो रकम कर्जा देने वाले ने बताई है, गवाह यदि उससे कम रकम बताये तो अभियोक्ता उस अधिक बताई रकम का पांचवां हिस्सा राजा को दे दे । यदि गवाह अधिक बताये तो उस अधिक रकम को राजा ले ले । अभियोक्ता यदि मूर्ख हो, ठीक तरह न सुन पाये, ठीक न लिख सके, अथवा पागल हो, तो गवाहों के आधार पर ही ऐसे मामलों का फैसला दिया जाय ।
( ३ ) आचार्य उशना ( शुक्राचार्य ) के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'देश, काल और कार्यों के ठीक-ठीक बताये जाने के कारण अदालत में यदि गवाहों की मूर्खता सिद्ध हो जाय तो उनको उनके अपराध के अनुसार यथोचित प्रथम साहस, मध्यम साहस और उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।'
| ३०४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
|---|
(१) कूटसाक्षिणो यमर्थमभूतं वा कुर्युर्भूतं वा नाशयेयुस्तद्दशगुणं दण्डं दद्युरिति मानवाः।
(२) बालिश्याद्वा विसंवादयतां चित्रो घात इति बार्हस्पत्याः।
(३) नेति कौटिल्यः। ध्रुवा हि साक्षिणः श्रोतव्याः। अशृण्वतां चतुर्विंशतिपणो दण्डः, ततोऽर्धमध्रुवाणाम्।
(४)
देशकालाविदूरस्थान् साक्षिणः प्रतिपादयेत्।
दूरस्थानप्रसारान् वा स्वामिवाक्येन साधयेत्॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे ऋणग्रहणं नाम एकादशोऽध्यायः,
आदितोः सप्तषष्टितमः।
— : ० : —
(१) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'अकारण ही जो छली, प्रपञ्ची गवाह मुकदमा खड़ा करवा कर धन का नाश कराये, उन्हें उस नष्ट हुए धन का दस गुना दण्ड दिया जाय।'
(२) आचार्य बृहस्पति के मतानुयायी विद्वानों का अभिमत है कि 'अपनी मूर्खता से परस्पर विरुद्ध बोलने वाले गवाहों का, यातना देकर, वध किया जाय।'
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा कराना उचित नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि 'साक्षियों की सुनी हुई बात सभी ठीक होती है। जो साक्षी किसी बात को ठीक तरह से हृदयंगम न करके गवाही देने को खड़े हो जाते हैं उनको चौबीस पण दण्ड दिया जाय। इसका आधा दण्ड उन्हें दिया जाय जो गवाह मामले को ठीक-ठीक नहीं बता पाते।
(४) अभियोक्ता को चाहिए कि देश-काल के अनुसार अधिक पास रहने वाले व्यक्ति को ही गवाह बनाये। अथवा न्यायाधीश की आज्ञा प्राप्त कर वह सुगमता से न आ सकने वाले दूर-देशस्थ गवाहों को भी अदालत में हाजिर करे।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में ऋणग्रहण नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त।
— : ० : —
| प्रकरण ६८ | औपनिधिकम् |
|---|---|
| अध्याय १२ |
(१) उपनिधिः ऋणेन व्याख्यातः ।
(२) परचक्राटविकाभ्यां दुर्गराष्ट्रविलोपे वा, प्रतिरोधकैर्वा ग्रामसार्थव्रजविलोपे, चक्रयुक्ते नाशे वा, ग्राममध्याग्न्युदकाबाधे वा, किञ्चिदमोक्ष्यमाणे कुप्यमनिर्हार्यवर्जमेकदेशमुक्तद्रव्ये वा, ज्वालावेगोपरुद्धे वा, नावि निमग्नायां मुषितायां वा स्वयमुपरूढो नोपनिधिमभ्याभवेत् ।
(३) उपनिधिभोक्ता देशकालानुरूपं भोगवेतनं दद्यात् । द्वादशपणं च दण्डम् । उपभोगनिमित्तं नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत्, चतुर्विंशतिपणश्च दण्डः । अन्यथा वा निष्पतने । प्रेतं व्यसनगतं वा नोपनिधिमभ्यावहेत् ।
धरोहर सम्बन्धी नियम
( १ ) ऋण सम्बन्धी नियमों के अनुसार ही उपनिधि सम्बन्धी नियमों को भी समझना चाहिए ।
( २ ) धरोहर : शत्रु के षड्यंत्र और जंगलवासियों के आक्रमण से दुर्ग तथा राष्ट्र का नाश हो जाने पर; या डाकू-चोरों के द्वारा गाँव, व्यापारिक कम्पनियाँ तथा पशुओं का नाश हो जाने पर; या भीतरी षड्यन्त्रों के कारण नाश हो जाने पर; गाँव में आग लग जाने या बाढ़ के कारण नष्ट हो जाने पर, अग्नि या बाढ़ से नष्ट होने वाले ताँबा, लोहा आदि कुप्य वस्तुओं के शेष रह जाने पर; अग्नि से घिर जाने पर, नाव के डूब जाने पर, या नाव के माल की चोरी हो जाने पर, अपना बचाव हो जाने पर भी उपनिधि ( धरोहर ) पाने के लिए कोई व्यक्ति किसी पर मुकदमा नहीं चला सकता है ।
( ३ ) जो व्यक्ति उपनिधि को अपने उपयोग में लाये, देश-काल के अनुसार वह उपयोग का बदलां ( भोगवेतन ) चुका दे और दण्डरूप में बारह पण अदा करे । उपभोग के कारण उपनिधि को नष्ट कर देने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाया जाय, और चौबीस पण दण्ड किया जाय । किसी भी प्रकार से उपनिधि के नष्ट हो जाने पर यही नियम लागू किया जाय । यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को लेकर भाग जाय या विपत्ति में फँस जाय तो उस पर न तो अभियोग चलाया जा सकता है और न ही दण्ड किया जा सकता है ।
२० कौ०
३०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) आधानविक्रयापव्ययनेषु चास्य चतुर्गुणपञ्चबन्धो दण्डः। परिवर्तने निष्पातने वा मूल्यसमः। (२) तेन आधिप्रणाशोपभोगविक्रयाधानापहारा व्याख्याताः। (३) नाधिः सोपकारः सीदेत्। न चास्य मूल्यं वर्धेत। निरुपकारः सीदेन्मूल्यं चास्य वर्धेतान्यत्र निसर्गात्। (४) उपस्थितस्याधिमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः। प्रयोजकासन्निधाने वा ग्रामवृद्धेषु स्थापयित्वा निष्क्रयमाधिं प्रतिपद्येत। निवृत्तवृद्धिको वाधिस्तत्कालकृतमूल्यस्तत्रैवावतिष्ठेत, अनाशविनाशकरणाधिष्ठितो वा। धारणकसंन्निधाने वा विनाशभयादुद्गतार्थं धर्मस्थानुज्ञातो विक्रीणीत। आधिपालप्रत्ययो वा।
(१) यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को कहीं गिरवी रख दे, बेच दे या अन्य किसी तरह से उसका अपव्यय कर दे, उस पर उपनिधि का चौगुना पञ्चबन्ध दण्ड किया जाय। यदि कोई व्यक्ति उपनिधि को बदले या किसी भी प्रकार से नष्ट करे उससे उपनिधि की कीमत वसूल कर ली जाय।
(२) गिरवी : उपनिधि के समान ही आधि (गिरवी रखी हुई वस्तु) के नाश हो जाने, उपयोग में लाने, बेचने, गिरवी रखने और बदलने आदि के सम्बन्ध में भी नियम समझना चाहिए।
(३) यदि गिरवी रखी हुई वस्तु सोने चांदी के आभूषण (सोपकार) हों तो वे नष्ट नहीं होते और उन पर ब्याज नहीं लिया जाता है। इनके अतिरिक्त आधि के नष्ट हो जाने का भी व्यय रहता है और उस पर ब्याज भी लगता है।
(४) यदि गिरवी रखने वाला व्यक्ति अपनी वस्तु को लेना चाहे और ब्याज आदि के लोभ से उत्तमर्ण उसको देना न चाहे तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय। यदि अधमर्ण को उत्तमर्ण उसके स्थान पर न मिले, तो वह आधि के बदले में लिए धन को उस गाँव के वृद्ध पुरुषों के पास रखकर अपनी गिरवी रखी हुई वस्तु को वापिस ले सकता है। यदि अधमर्ण अपनी आधि को बेचकर अपना कर्जा चुकाना चाहे तो उसी समय उसकी लागत निश्चित करके उस वस्तु को उत्तमर्ण के पास रहने दिया जाय, उसके बाद उत्तमर्ण उस आधि पर ब्याज नहीं ले सकता है। आधि के रखने में उत्तमर्ण का लाभ हो रहा या हानि हो रही है, किन्तु निकट भविष्य में यदि उसके नष्ट हो जाने की आशंका हो, अथवा उसकी लागत से कर्जा की संख्या अधिक हो रही हो, ऐसी अवस्था में, अधमर्ण की अनुपस्थिति में भी, न्यायाधीश (धर्मस्थ) की आज्ञा लेकर उत्तमर्ण उस आधि को बेच दे। न्यायाधीश की अनुपस्थिति में आधिपाल (न्यायविभाग का अधिकारी) से आज्ञा ली जा सकती है।