भारतकोश
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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

मसक हूँ कहै, 'भार मेरे मेरु हालिहैं' ॥ तुलसी यही कुभाँति घने घर घालि आई, घने घर घालति हैं, घने घर घालिहैं। देखत-सुनत-समुझतहू न सूझै सोई, कबहुँ कह्यो न कालहू को कालु कालि हैं ॥१२०॥ कुचाली लोग कहते हैं—मुझे कल ही तरुण शरीर प्राप्त हो जायगा, कल ही भूमि और धन प्राप्त हो जायेंगे और कल ही मैं युद्धमें विजय प्राप्त कर लूँगा, कल ही मैं अपने सारे कार्य सिद्ध कर लूँगा और कल ही मैं राज-समाज जोड़ दूँगा। मच्छरके समान होकर भी वे कहते हैं, मेरे बोझसे मेरु पर्वत भी हिल जायगा। तुलसीदासजी कहते हैं—इस कुप्रवृत्तिके कारण बहुत-से घर नष्ट हो गये हैं, इस समय भी नष्ट होते हैं तथा आगे भी होंगे। परन्तु यह सब देख, सुन और समझकर भी वह कुप्रवृत्ति लोगोंको दीख नहीं पड़ती और न किसीने कभी यह कहा कि काल (आयु) का भी काल (अन्त) कल ही है।

रामभक्तिकी याचना भयो न त्रिकाल तिहुँ लोक तुलसी-सो मंद निंदैं सब साधु, सुनि मानौं न सकोचु हौं। जानत न जोगु, हियँ हानि मानैं जानकीसु, काहे को परेखो, पापी प्रपंची पोचु हौं॥ पेट भरिबेके काज महाराज-को कहायौ महाराजहूँ कह्यो है प्रनत-बिमोचु हौं।

कवितावली १८० निज अघजाल, कलिकालकी करालता बिलोकि होत व्याकुल, करत सोई सोचु हौं ॥१२१॥ भूत, भविष्यत् और वर्तमान, तीनों कालोंमें त्रिलोकीमें तुलसीदासके समान नीच कोई नहीं हुआ। सभी साधुजन इसकी निन्दा करते हैं, परन्तु मैं सुनकर भी संकोच नहीं मानता। जानकीनाथ भगवान् राम भी इसे योग्य नहीं समझते, इसीसे मुझे अपनानेमें उन्हें अपने चित्तमें हानि जान पड़ती है। मुझे इस बात- की शिकायत भी क्यों होनी चाहिये; क्योंकि वास्तवमें ही मैं बड़ा पापी, पाखण्डी और नीच हूँ। मैं पेट भरनेके लिये ही महाराजका कहलाया और महाराजने भी कहा है कि मैं अपने शरणागतका उद्धार कर देता हूँ। किन्तु अपनी पापराशि और कलिकालकी कुटिलता देखकर मैं व्याकुल हो जाता हूँ और उसी (अपने उद्धारके ही) विषयमें चिन्ता करने लगता हूँ। धर्मकें सेतु जगमंगलके हेतु भूमि- भारु हरिवेको अवतारु लिये नरको। नीति औ प्रतीति-प्रीतिपाल चालि प्रभु, मानु लोक-वेद राखिवेको पनु रघुबरको ॥ बानर-बिभीषनकी ओर के कनावड़े हैं, सो प्रसंगु सुनैं अंगु जरै अनुचरको। राखे रीति आपनी जो होइ सोई कीजै, बलि, तुलसी तिहारो घर जायऊ है घरको ॥१२२॥

१८१ उत्तरकाण्ड धर्मके सेतु भगवान् संसारका कल्याण करनेके लिये और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही मनुष्यके रूपमें अवतीर्ण हुए; नीति, प्रतीति और प्रीतिका पालन करना प्रभुका स्वभाव ही है तथा लोक और वेदकी मर्यादा रखना यह भी श्रीरघुवीरका प्रण है । आप सुग्रीव और विभीषणके ऋणी हैं, यह बात सुनकर दासका अङ्ग-अङ्ग जलता है [कि मुझपर ऐसी कृपा क्यों नहीं करते ?] । अतः मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ, अपने प्रणकी रक्षा करके आपसे जो बने वही कीजिये । यह तुलसीदास तो आपके घरका घर-जाया (पुस्तैनी) सेवक है। नाम महाराजके निबाह नीको कीजै उर सबही सोहात, मैं न लोगनि सोहात हौं । कीजै राम ! बार यहि मेरी ओर चष-कोर, ताहि लागि रंक ज्यों सनेहको ललात हौं ॥ तुलसी बिलोकि कलिकालकी करालता कृपालको सुभाउ समुझत सकुचात हौं । लोक एक भाँतिको, त्रिलोकनाथ लोकवस आपनो न सोचु, स्वामी-सोचहीं सुखात हौं ॥१२३॥ महाराजके नामके साथ अच्छी प्रकार निर्वाह करनेवाला (अर्थात् राम-नाम जपनेवाला) मनसे सबको अच्छा लगता है, परन्तु मैं लोगोंको अच्छा नहीं लगता । अतः हे राम ! इस बार आप मेरी ओर कृपादृष्टि कीजिये, आपके कृपाकटाक्षके लिये मैं लालयित हूँ। जिस प्रकार दरिद्र स्नेहके लिये अथवा स्नेहयुक्त पदार्थों (पकवानों) के लिये लालयित रहता है । तुलसीदासजी कहते हैं—मैं कलिकालकी करालता और कृपालु प्रभुके स्वभावको

कवितावली १८२

समझकर सकुचाता हूँ। इस समय सारा संसार एक-सा हो रहा है [सभी मेरी निन्दा करनेवाले हैं] और आप त्रिलोकीनाथ होकर भी लोकके अधीन हैं। किन्तु मुझे अपनी चिन्ता नहीं है, मैं तो प्रभुके सोचने हीं सूखा जाता हूँ [कि कहीं लोग यह न कहने लगें कि रामजी भी कलियुगमें अपना स्वभाव छोड़कर करुणारहित हो गये]।

प्रभुकी महत्ता और दयालुता

तौलौं लोभ लोलुप ललात लालची लवार, बार-बार लालचु धरनि-धन-धामको। तवलौं वियोग-रोग-सोग, भोग जातनाको जुग सम लागत जीवनु जाम-जामको॥ तौलौं दुख-दारिद दहत अति नित तनु तुलसी हैं किंकरु बिमोह-कोह-कामको। सब दुख आपने, निरापने सकल सुख, जौलौं जनु भयो न बजाइ राजा रामको ॥१२४॥

जबतक तुलसीदास राजा रामका खुल्लमखुल्ला दास नहीं हो जाता तभीतक वह लोभके कारण लोलुप, लालची और वाचाल बना हुआ टुकड़े-टुकड़ेके लिये लालायित रहता है; और पृथ्वी, धन एवं गृह आदिके लिये बार-बार ललचाता रहता है, तभीतक उसे वियोग और रोगका शोक रहता है, तभीतक उसे यातना भोगनी पड़ती है और तभीतक उसे पल-पलका जीवन युगके समान जान पड़ता है; तभीतक उसका शरीर दुःख और दरिद्रताके कारण सर्वदा अत्यन्त जलता रहता है और तभीतक वह मोह, क्रोध और कामका

उत्तरकाण्ड १८३ गुलाम है; और तभीतक सारे दुःख तो उसके हिस्सेमें हैं और सारे सुख दूसरोंके हैं। तौलौं मलीन, हीन, दीन, सुख सपनेँ न, जहाँ-तहाँ दुखी जनु भाजनु कलेसको। तौलौं उबेने पाय फिरत पेटौ खलाय बाय मुह सहत पराभौ देस-देसको॥ तवलौं दयावनो दुसह दुख दारिदको, साथरीको सोइवो, ओढ़िवो झूने खेसको। जवलौं न भजै जीहैं जानकीजीवन रामु, राजनको राजा सो तौ साहेबु महेसको ॥१२५॥ जो राजाओंके राजा और महेश्वरके भी ईश्वर हैं उन प्राणनाथका जबतक जिह्वासे भजन नहीं करता तभीतक जीव दीन हीन और मलिन रहता है, उसे स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता, और जहाँ-तहाँ वह दुखी मनुष्य क्लेशका पात्र होता है; तभीतक वह नंगे पैर पेट खलाये और मुँह बाये देश-देशका तिरस्कार सहन करता फिरता है तथा तभीतक उसे दरिद्रताका दयावह और दुःसह दुःख घास-फूसकी शय्यापर सोना और झीने खेसका ओढ़ना रहता है। ईसनके ईस, महाराजके महाराज, देवनके देव, देव ! प्रानहुके प्रान हौ। कालहूके काल, महाभूतनके महाभूत, कर्महूके करम, निदानके निदान हौ॥ निगमको अगम, सुगम तुलसीहू-सेको

कवितावली १८४ एते मान सीलसिंधु, करुनानिधान हौ। महिमा अपार, काहू बोल को न वारापार, बड़ी साहबीमें नाथ ! बड़े सावधान हौ ॥१२६॥ हे नाथ ! आप ब्रह्मा आदि ईश्वरोंके भी ईश्वर, महाराजोंके महाराज, देवोंके देव और प्राणोंके भी प्राण हैं; आप कालके भी काल, महाभूतोंके भी महाभूत, कर्मके भी कर्म और कारणके भी कारण हैं। किन्तु वेदके लिये अगम होनेपर भी आप तुलसीदास-जैसे साधारण पुरुषके लिये सुलभ हैं। इतने महान् होनेपर भी आप शीलके समुद्र और करुणाके भण्डार हैं। आपकी महिमा अपार है। आपकी किसी भी वाणी (वेद-पुराण आदि) का वारापार नहीं है। किन्तु इतना बड़ा प्रभुत्व रहते हुए भी आप बड़े ही सावधान हैं [इसीसे यदि कोई अत्यन्त तुच्छ प्राणी भी आपके अनन्य शरणागत हो जाता है तो आप उसकी पूरी-पूरी चिन्ता रखते हैं]। आरतपाल कृपालु जो रामु जेहीं सुमिरे तेहि को तहँ ठाढ़े। नाम-प्रताप-महामहिमा अँकरे किये खोटेउ, छोटेउ बाढ़े॥ सेवक एकतँ एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न डाढ़े। प्रेम बदौँ प्रहलादहिकों, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढ़े ॥१२७॥ भगवान् राम दीन-दुखियोंके रक्षक एवं दयामय हैं। उनको जिसने जहाँ स्मरण किया उनके लिये वे वहीं खड़े हो जाते हैं। उनके नामके प्रभावकी बड़ी ही महिमा है, जिसने खोटोंको बहुमूल्य और छोटोंको बड़ा कर दिया। उनके एक-से-एक बढ़कर अनेकों सेवक हुए, जिनमेंसे कोई भी आध्यात्मिकादि त्रितापोंसे

१८९ उत्तरकाण्ड प्रसन्न नहीं हुए। परन्तु प्रेम तो मैं प्रह्लादका ही मानता हूँ जिसने पत्थरमेंसे भगवान्‌को प्रकट कर दिया । काढ़ि कृपान, कृपा न कहूँ, पितु काल कराल विलोकि न भागे। ‘राम कहाँ?’ ‘सब ठाउँ हैं’, ‘खंभमें ?’ ‘हाँ’ सुनि हाँक नृकेहरि जागे वैरि विदारि भए विकराल, कहैं प्रहलादहिकें अनुरागे। प्रीति-प्रतीति बढ़ी तुलसी, तबतें सब पाहन पूजन लागे ॥१२८॥ (हिरण्यकशिपुने प्रह्लादजीको मारनेके लिये) तलवार निकाल ली, उसके मनमें कहीं तनिक भी दया न थी; किन्तु कालके समान भयङ्कर पिताको देखकर भी प्रह्लादजी भागे नहीं। और जब उसने कहा - 'बता तेरा राम कहाँ है ?' तो बोले— 'सर्वत्र हैं।' इसपर उसने पूछा—'क्या इस खंभमें भी हैं।' तो प्रह्लादजीने कहा—'हाँ'। उनकी इस हाँकको सुनते ही नृसिंहजी प्रकट हो गये और शत्रुको नाश कर क्रोधवश बड़े भयङ्कर बन गये। फिर वे प्रह्लादजीके प्रार्थना करनेपर ही शान्त हुए। तुलसीदासजी कहते हैं—इससे भगवान्‌के प्रति लोगोंका प्रेम और विश्वास बढ़ गया और तभीसे लोग पाषाण (पाषाणमयी प्रतिमाओंका) पूजन करने लगे। अंतरजामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं रामु, जे नाम लियेतें। धावत धेनु पेन्हाइ लवाई ज्यौं बालक-बोलनि कान कियेतें ॥ आपनि बूझि कहै तुलसी, कहिवेकी न बावरि बात बियेतें। पैज परें प्रहलादहुको प्रगटे प्रभु पाहनतें, न हियेतें ॥१२९॥ बहिर्गत सगुणरूप भगवान् राम अन्तर्यामी निराकार ईश्वरसे भी बड़े हैं, क्योंकि जिस प्रकार हालकी व्यायी गौ अपने बच्चेका शब्द सुनते ही स्तनोंमें दूध उतार दौड़ी आती है उसी प्रकार वें

भी [अपना नाम सुनकर] दौड़े आते हैं। तुलसीदास तो अपनी समझकी बात कहता है, ऐसी दावकी बातें दूसरे लोगोंसे कहे जाने योग्य नहीं हुआ करतीं। प्रह्लादके प्रतिज्ञा करनेपर उनके लिये प्रभु पत्थरसे ही प्रकट हो गये, हृदयसे नहीं। बालकु बोलि दियो बलि कालको, कायर कोटि कुचालि चलाई। पापी है बाप, बड़े परितापनें आपनि ओरतें खोरि न लाई ॥ भूरि दईं बिषमूरि, भईं प्रहलाद-सुधाई सुधार्की मलाई। रामकृपाँ तुलसी जनको जग होत भलेको भलाई भलाई ॥१३०॥ कायर हिरण्यकशिपुने करोड़ों कुचालें कीं और बालक प्रह्लादको बुलाकर कालको बलि दिया। पिता हिरण्यकशिपु बड़ा ही पापी था, उस दुष्टने प्रह्लादजीको कष्ट देनेमें अपनी ओरसे कोई कसर नहीं रक्खी। उसने बहुत-सी विषमूलें दीं, किन्तु प्रह्लादजीकी साधुतासे वे अमृतकी मलाई बन गयीं। तुलसी- दासजी कहते हैं—भगवान् रामकी कृपासे संसारमें उनके साधु सेवककी सब प्रकार भलाई ही होती है। कंस करी बृजबासिन पै करतूति कुभाँति, चली न चलाई। पंडुके पूत सपूत, कपूत सुजोधन भो कलि छोटो छलाई ॥ कान्ह कृपाल बड़े नतपाल, गए खल खेचर खीस खलाई। ठीक प्रतीति कहै तुलसी, जग होइ भलेको भलाई मलाई ॥१३१॥ कंसने ब्रजवासियोंके प्रति बहुत बुरी तरहसे कुचाल की, परन्तु उसकी एक भी चाल न चली। पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिरादि बड़े साधु थे; उनके लिये कुपूत दुर्योधन छलनेमें छोटे कलियुगके समान हो गया [अर्थात् उसने भी उन्हें छलकर पददलित-

१८७ उत्तरकाण्ड करनेमें कोई कसर नहीं छोड़ी; परन्तु कृपालु श्रीरामचन्द्र बड़े ही शरणागतरक्षक हैं, अतः अन्तमें दुःखोंके कारण वे दुष्ट बकासुर आदि राक्षस स्वयं नष्ट हो गये। तुलसीदास अपने सच्चे विश्वासकी बात कहता है कि संसारमें भक्तोंकी भलाई- ही-भलाई होती है। अवनीस अनेक भए अवनीं, जिनके डरतें सुर सोच सुखाहीं। मानव-दानव-देव सतावन रावन घाटि रच्यो जग माहीं ॥ ते मिलये धरि धूरि सुजोधनु, जे चलते बहु छत्रकी छाहीं। वेद-पुरान कहें, जगु जान, गुमान गोविंदहि भावन नाहीं ॥१३२॥ इस पृथ्वीपर ऐसे अनेकों राजा हो गये हैं जिनके भयके कारण देवता लोग चिन्तामें ही सूखे जाते थे। मनुष्य, राक्षस और देवताओंको सतानेके लिये एक रावण ही क्या संसारमें किसीसे कम रचा गया था ? वे सब और दुर्योधन भी जो कि अनेकों छत्रोंकी छायामें चलते थे, पृथ्वीकी धूलिमें मिल गये। वेद-पुराण कहते हैं और सारा संसार भी जानता है कि श्रीगोविन्दको अभिमान अच्छा नहीं लगता। गोपियोंका अनन्य प्रेम* जब नैनन प्रीति ठई ठग स्याम सों, स्यानी सखी हठि हौं बरजी। नहि जानो वियोगु-सो रोगु है आगे झुकी तब हौं तेहिसों तरजी ॥ अब देह भई पट नेहके घाले सों, ब्योंत करै विरहा-दरजी। ब्रजराजकुमार बिना सुनु भृंग ! अनंगु भयो जियको गरजी १३३

  • यहाँ प्रसङ्ग न होनेपर भी गोपियोंका अनन्य प्रेम प्रदर्शित करनेके लिये ही श्रीगोसाईंजीने आगेके कवित्त कहे हैं।

कवितावली १८८ [ श्रीकृष्णचन्द्रके मथुरा पधार जानेपर उनकी वियोग- व्यथासे पीड़ित कोई व्रजबाला योग सिखाने आये हुए भगवान्‌के प्रिय सखा उद्धवजीको भ्रमरके व्याजसे कहती है—] हे भ्रमर ! जिस समय मेरे नेत्रोंने इस ठगिया श्यामसुन्दरसे प्रीति जोड़ी थी उसी समय एक चतुर सखीने मुझे बलपूर्वक रोका था। किन्तु मैं नहीं जानती थी कि आगे इसमें वियोग-जैसा रोग निकलेगा; इसलिये उस समय मैं उसपर नाराज हुई और उसका तिरस्कार किया । अब नेह लगानेसे मेरी देह मानो वस्त्र हो गयी है, उसे विरहरूपी दर्जी ब्योंत रहा है और हे भृंग ! सुन, उस व्रजराजदुलारेके बिना काम मेरे जीका ग्राहक हो गया है। जोग-कथा पठई व्रजको, सब सो सठ चेरीकी चाल चलाकी । ऊधौ जू ! क्यों न करै कुबरी, जो बरी नटनागर हेरि हलाकी ॥ जाहि लगै परि जाने सोई, तुलसी सो सोहागिनि नंदउलाकी । जानी है जानपनी हरिकी, अब बाँधियैगी कठु मोटि कऊाकी १३४ हे उद्धवजी ! व्रजको जो यह योगका सन्देश भेजा गया है वह सब उस दुष्ट दासीकी चालाकीभरी चाल है । अब भला, कुबड़ी ऐसा क्यों न करेगी, जिसे घातक श्रीकृष्णने खोजकर वरण किया है । विरहकी आग कैसी होती है यह तो वही जान सकती है जिसे वह लगती है; आज कुब्जा तो नन्दनन्दनकी सुहागिन बनी हुई है [ उसे हमारी पीरका क्या पता ? ] किन्तु इससे हमें श्यामसुन्दरकी बुद्धिमानीका पता लग गया [ उन्हें कूबड़ बहुत पसंद है, इसलिये ] अब हम भी पीठपर बनावटी मोटरी बाँधा करेंगी [ जिससे कुबड़ी दिखायी दिया करें ] ।

१८९ उत्तरकाण्ड पठयो है छपदु छबीलै कान्ह कैहूँ कहूँ खोजि कै खवासु स्वामो कूबरी-सी बालको। ग्यानको गढ़ैया, बिनु गिराको पढ़ैया, बार- खारुको कढ़ैया, सो बढ़ैया उर-सालको॥ प्रीतिको बधिक, रस-रीतिको अधिक, नीति- निपुन, विवेकु है, निदेसु देस-कालको। तुलसी कहैं न बनै, सहैं ही बनैगी सब, जोगु भयो जोगको वियोगु नंदलालको ॥१३५॥ छबीले श्यामसुन्दरने कहाँसे जैसे-तैसे ढूँढ़कर कुबड़ी-जैसी बालाका यह भ्रमररूप बड़ा उत्तम सेवक भेजा है। यह बड़ी ज्ञानकी बातें गढ़नेवाला, बिना जिह्वाके ही बोलनेवाला, बालकी खाल खींचनेवाला और हृदयकी पीड़ाको बढ़ानेवाला है। यह प्रीतिका वध करनेवाला, विशेषतया रसरीतिको नष्ट करनेवाला और बड़ा नीतिकुशल एवं विवेकी है। सो इसमें इसका कोई दोष नहीं, देश-कालका ऐसा ही विधान है। तुलसीदासजी कहते हैं, अब कहनेसे कुछ प्रयोजन सिद्ध थोड़े ही होगा, अब तो सब कुछ सहना ही पड़ेगा; क्योंकि जब नन्दनन्दनसे वियोग हो गया तब योगके लिये अवसर आ ही गया। विनय हनूमान ! है कृपाल, लाडिले लखनलाल ! भावते भरत ! कीजै सेवक-सहाय जू । विनती करत दीन दूबरो दयावनो सो

कवितावली १३० विगरतैं आपु ही सुधारि लीजै भाय जू ॥ मेरी साहिबिनी सदा सीसपर बिलसति देवि क्यों न दासको देखाइयत पाय जू । खीझहूमैं रीझिबेकी बानि, सदा रीझत हैं, रीझे ह्वैहैं, रामकी दोहाई, रघुराय जू ॥ १३६ ॥ हे श्रीहनुमान्‌जी ! हे लड़िले लखनलाल ! हे मनभावन भरतजी ! तनिक कृपाकर इस सेवककी सहायता कीजिये। यह दीन, दुर्बल और दयापात्र दास आपसे विनय करता है; इससे यदि कोई भाव बिगड़ जाय तो आप ही सुधार लें। मेरी स्वामिनी सदा मेरे मस्तकपर विराजमान रहती हैं; सो हे देवि ! आप भी इस दासको अपने चरणोंका दर्शन क्यों नहीं करातीं ? हमारे प्रभुका तो खीझनेमें भी रीझनेका स्वभाव है; वे तो सदा ही प्रसन्न रहते हैं। अतः रामकी दुहाई, इस समय भी श्रीरघुनाथजी अवश्य रीझे होंगे। बेषु विरागको, राग भरो मनु, माय ! कहौं सतिभाव हौं तोसों । तेरे ही नाथको नामु लै वेचि हों पातकी पाँवर प्राननि पोसों ॥ एते बड़े अपराधी अघी कहूँ, तैं कहु, अंब ! कि मेरो तूँ, मोसों । स्वारथको परमारथको परिपूरन भो, फिरि घाटि न होसों ॥ माताजी ! मैं तुमसे ठीक-ठीक कहता हूँ, मेरा वेष तो वैराग्यका-सा है किन्तु मन रागसे भरा हुआ है। तुम्हारे ही स्वामी- का नाम बेचकर (अर्थात् रामके नामपर भीख माँगकर) मैं इन पापी पामर प्राणोंका पोषण करता हूँ। इतने बड़े अपराधी और पापीसे, हे मातः ! तू यह कह दे कि 'तू मेरा है और मुझसे

उत्तरकाण्ड १९१ उत्पन्न हुआ है।' इससे मेरा स्वार्थ और परमार्थ दोनों सिद्ध हो जायँगे; फिर मेरे अंदर किसी प्रकार की कमी नहीं रह जायगी। सीतावट-वर्णन जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु 'मरा मरा' जपें सिख सुनि रिषि सातकी। सीयको निवास, लव-कुसको जनमथल तुलसी छुअत छाँह ताप गरै गातकी ॥ बिटपमहीप सुरसरित समीप सोहै, सीतावदु पेखत पुनीत होत पातकी। बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि, अंकित जो जानकी-चरन-जलजातकी ॥१३८॥ जहाँ सप्तर्षियोंका उपदेश सुनकर (राममन्त्रको उलटे क्रमसे) 'मरा-मरा' जपते हुए वाल्मीकिजी व्याधसे महामुनि साधु हो गये, जो श्रीसीताजीका निवासस्थान और कुश तथा लवका जन्मस्थान था, तुलसीदासजी कहते हैं जहाँकी छायाका स्पर्श होते ही शरीरका सारा ताप शान्त हो जाता है, वह वृक्ष-राज सीतावट श्रीगङ्गाजीके तटपर शोभायमान है । उसके दर्शन- मात्रसे पापी पुरुष भी पवित्र हो जाता है। यह स्थान बारिपुर और दिगपुर इन दो गाँवोंके बीचमें है* और श्रीजानकीजीके चरणकमलोंसे अङ्कित है। मरकतबरन परन, फल मानिक-से लसै जटाजूट जनु रूखवेष हरु है।

  • यह स्थान प्रयाग और काशीके बीचमें सीतामढ़ी नामसे प्रसिद्ध है।

कवितावली १९८ सुपमाको ढेरु कैधौं, सुकृत-सुमेरु कैधौं, संपदा सकल मुद-मंगलको घरु है॥ देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये प्रतीति मानि तुलसी, विचारि काको थरु है। सुरसरि निकट सुहावनी अवनि सोहै रामरवनीको बडु कलि कामतरु है ॥१३९॥ उसके पत्ते मरकतमणिके समान नीलवर्ण तथा फल माणिक्यके सदृश (हरे रंगके) हैं। अपनी जटाओंके कारण वह ऐसा शोभा देता है, मानो वृक्षरूपमें महादेवजी ही हों। वह मानो सुन्दरताका पुञ्ज है, अथवा सुकृतका सुमेरु है किंवा सब प्रकार- की सम्पत्ति, आनन्द और मंगलका घर है। यदि 'यह किसका स्थान है' [अर्थात् जानकीजीका निवासस्थल है] इसका विचार करके विश्वास और प्रीतिपूर्वक उसका सेवन किया जाय तो वह सब प्रकारके इच्छित फल देता है। वह सुन्दर भूमि श्रीगङ्गाजीके तटपर सुशोभित है; यह रामवल्लभा श्रीजानकीजीका वट कलियुगमें कल्पवृक्षके समान है। देवधुनि पास, मुनिबासु, श्रीनिवासु जहाँ, प्राकृतहूँ वट-बूट बसत पुरारि हैं। जोग-जप-जागको, बिरागको पुनीत पीठु रागिन पै सीठ उठि बाहरी निहारिहैं ॥ 'आयसु', 'आदेस', 'बाबू' भलो-भलो भावसिद्ध तुलसी विचारि जोगी कहत पुकारि हैं।

१९३ उत्तरकाण्ड रामभगतनको तौ कामतरुतें अधिक, सियबटु सेयें करतल फल चारि हैं ॥१४०॥ साधारण वटवृक्षमें भी श्रीमहादेवजीका निवास होता है, फिर इसके समीप तो गङ्गाजीका तट तथा मुनिवर वाल्मीकिजी- का आश्रम है, जहाँ श्रीसीताजीने निवास किया था [ अतः इसकी महिमाका तो वर्णन ही कौन कर सकता है ? ] यह योग, जप, यज्ञ और वैराग्यके लिये तो बड़ा पवित्र पीठ है; किन्तु रागी पुरुषोंको, जो इसे बाहरी दृष्टिसे देखेंगे, यह बड़ा रूखा जान पड़ता है । तुलसीदासजी कहते हैं कि यहाँके लोग विचारपूर्वक 'जो आज्ञा', 'आदेश', 'भैया' आदि शिष्ट शब्दोंका स्वभावसे ही प्रयोग करते हैं । यह सीतावट रामभक्तोंके लिये तो कल्पवृक्षसे भी अधिक है, क्योंकि इसका सेवन करनेसे [ अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ] चारों फल करतलगत हो जाते हैं [ जब कि कल्पवृक्षसे अर्थ, धर्म और काम केवल तीन ही फल मिलते हैं ] । चित्रकूट-वर्णन जहाँ बनु पावनो, सुहावने बिहंग-मृग, देखि अति लागत अनंदु खेत-खूँट-सो । सीता-राम-लखन-निवासु, बासु मुनिनको, सिद्ध-साधु-साधक सबै बिबेक-बूट-सो ॥ झरना झरत झारि सीतल पुनीत बारि, मंदाकिनि मंजुल महेसजटाजूट सो । तुलसी जौं रामसों सनेहु साँचो चाहिये तौ सेइये सनेहसों बिचित्र चित्रकूट सो ॥१४१॥ क० १३—

कवितावली १९४ जहाँका वन अति पवित्र है, और पशु-पक्षी अत्यन्त सुहावने हैं तथा जिसे खेतके टुकड़ेके समान (हरा-भरा) देखकर बड़ा आनन्द होता है; जहाँ सीता, राम और लक्ष्मणका निवास था. जहाँ अनेकों मुनिजन रहते हैं तथा जो सिद्ध, साधु और साधकों- के लिये विवेकरूपी वृक्षके समान है; जहाँ सबा झरनोंसे अति शीतल और पवित्र जल झरता रहता है तथा मन्दाकिनी नदी श्रीमहादेवजीके जटाजूटके समान जान पड़ती है । तुलसीदासजी कहते हैं—यदि तुम्हें भगवान् रामके सच्चे स्नेहकी चाह है तो प्रेमपूर्वक अद्भुत चित्रकूटका सेवन करो । मोह-वन कलिमल-पल-पीन जानि जियँ साधु-गाइ-विप्रनके भयको नेवारिहै। दीन्ही है रजाइ राम, पाइ सो सहाइ लाल लखन समत्थ बीर हेरि हेरि मारिहै॥ मंदाकिनी मंजुल कमान असि, बान जहाँ धारि-धार धीर धरि सुकर सुधारिहै। चित्रकूट अचल अहेरि बैठ्यो घात मानो पातकके ब्रात घोर सावज सँघारिहै ॥१४२॥ मोहरूपी वनमें पापराशिरूप सावज (हिंस्र पशु) कलि- कल्मषरूप मांससे मोटे हो रहे हैं, ऐसा चित्तमें जानकर श्रीरघु- नाथजीने आज्ञा दी है; अतः समर्थ वीर लखनलालकी सहायता पा चित्रकूट अचल अहेरी होकर उनकी घातमें बैठे हुए हैं। वे उन्हें ढूँढ-ढूँढ़कर मारेंगे तथा इस प्रकार साधु, गौ और ब्राह्मणोंके भयको हटायेंगे । उसके लिये वे मन्दाकिनी-जैसी मनोहर कमान

१०९२ उत्तरकाण्ड नया उसके जलकी धारारूप बाणोंको अपने करकमलोंसे धैर्य- पूर्वक धारण करेंगे । लागि दवारि पहार ठर्हा, लहकी कपि लंक जथा खरखौंकी । चारु चुआ चहुँ ओर चलैं, लपटैं-झपटैं सो तमीचर तौंकी ॥ क्यौं कहि जात महासुषमा, उपमा तकि ताकत है कवि कौंकी । मानो लसी तुलसी हनुमान-हिएँ जगजीति जरायकी चौकी १४३ [ एक समय चित्रकूटमें दावाग्नि लगी; गोसाईंजी अब उसी- का वर्णन करते हैं—] इस समय चित्रकूटमें ठठकर दावानल लगी हुई है और इस प्रकार प्रज्वलित हो रही है जैसे हनुमान्- जी ने लङ्कामें आग लगायी थी । दावाग्निके तापसे तपकर सुन्दर पशु चारों ओरको इस तरह भागे जाते हैं जैसे लङ्कामें आगकी ज्वालाओंकी लपकसे त्राँसे हुए राक्षस लोग इधर-उधर भागे थे । उस समयकी महान् शोभाका वर्णन किस प्रकार किया जाय ? उसकी उपमाको विचारता हुआ कवि बड़ी देरसे ताकता रह गया है [ परन्तु उसे इसके अनुरूप कोई उपमा नहीं मिलती ] ऐसा जान पड़ता है मानो हनुमान्‌जीके वक्षःस्थलपर संसारको जीतनेका जड़ाऊ पदक ( तमगा ) सुशोभित हो । तीर्थराजसुषमा देव कहैं अपनी-अपना, अवलोकन तीरथराजु चलो रे । देखि मिटैं अपराध अगाध, निमज्जत साधु-समाजु मलो रे ॥ सोहै सितासितको मिलिबो, तुलसी हुलसै हिय हेरि हलोरे । मानो हरे तृन चारु चरैं बगरे सुरधेनुके धौल कलोरे ॥१४४॥ देवता लोग आपसमें कहते हैं—अरे ! तीर्थराज प्रयागका

कवितावली १९६ दर्शन करने चलो । उनके दर्शनमात्रसे बड़े-बड़े अपराध नष्ट हो जाते हैं; वहा अच्छे-अच्छे साधु स्नान किया करते हैं । तुलसीदासजी कहते हैं—वहाँ श्रीगङ्गा और यमुनाके शुक्ल एवं श्यामवर्ण जलका संगम बड़ा ही शोभायमान जान पड़ता है; उसकी तरङ्गोंको देखकर हृदय बड़ा हर्षित होता है; मानो इधर- उधर फैले हुए कामधेनुके शुक्लवर्ण मनोहर बछड़े हरी-हरी घास चर रहे हों । श्रीगङ्गा-माहात्म्य देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा, कुल कोटि उधारे । देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ बिमान सँवारे ॥ पूजाको साजु विरंचि रचैं तुलसी, जे महातम जाननिहारे । ओककी नींव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे ॥१४५॥ जिस मनुष्यने गङ्गास्नानके लिये मनमें जानेका विचारमात्र कर लिया उसके करोड़ों पीढ़ियोंका उद्धार हो गया । उसे चलता देखकर [ उसे वरण करनेके लिये ] देवाङ्गनाएँ आपसमें झगड़ने लगती हैं, देवराज इन्द्र उसके लिये विमान बनाकर सजाने लगते हैं; ब्रह्माजी, जो कि उसके माहात्म्यको जाननेवाले हैं, उसके पूजनकी सामग्री जुटाने लगते हैं और हे गङ्गाजी ! तुम्हारी तरङ्गोंका दर्शन होते ही विष्णुलोकमें ( उसके लिये ) घरकी नींव पड़ जाती है [ अर्थात् उसका विष्णुलोकमें जाना निश्चित हो जाता है ] । ब्रह्म जो ब्यापकु बेद कहैं, गम नाहिं गिरा गुन-ग्यान गुनीको । जो करता, भरता, हरता, सुर-साहेबु, साहेबु दीन-दुनीको ॥

१९७ उत्तरकाण्ड सोइ भयो द्रवरूप सही, जो है नाथु विरंचि महेस मुनी को । मानि प्रतीति सदा तुलसी जलु काहे न सेवत देवधुनीको ॥१४६॥ जिस परब्रह्म परमात्माको वेद सर्वव्यापी कहते हैं, जिसके गुण और ज्ञानकी थाह गुणीजन और शारदा भी नहीं पा सकते; जो संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करनेवाला, देवताओंका स्वामी तथा लोक-परलोकका प्रभु है; जो ब्रह्मा, शिव और मुनि- जनोंका भी स्वामी है, निश्चय वही जलरूप हो गया है । तुलसी- दासजी कहते हैं—अरे, विश्वास करके सर्वदा श्रीगङ्गाजलका ही सेवन क्यों नहीं करता ? बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसै पद पापु लहौंगो । ईसु ह्वै सीस धरौं पै डरौं, प्रभुकी समताँ बड़े दोष दहौंगो ॥ बरु बारहिं बार सरीर धरौं, रघुबीरको ह्वै तव तीर रहौंगो । भागीरथी ! बिनवौं कर जोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो १ ४७ हे गङ्गे ! तुम्हारे जलके दर्शनके प्रभावसे यदि मैं विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पाप लगेगा [ क्योंकि तुम्हारा जन्म विष्णुभगवान्के चरणोंसे है, और यदि मैं भी विष्णु हो गया तो अपने चरणोंसे तुम्हारा स्पर्श होनेके कारण मुझे पापका भागी होना पड़ेगा ]; और यदि महादेव हो गया तो सिरपर धारण करनेसे मुझे डर है कि इस प्रकार अपने प्रभु भगवान् शङ्करकी समता करनेके बड़े भारी अपराधसे दुःख पाऊँगा । इसलिये, भले ही मुझे बारंबार शरीर धारण करना पड़े, मैं तो श्रीरघुनाथजीका दास होकर ही तुम्हारे तीरपर रहूँगा । हे भागीरथि ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ—मैं वही बात कहूँगा जिससे फिर दोष न लगे ।

कवितावली १९८ अन्नपूर्णा-माहात्म्य लालची ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन, बदन मलीन, मन मिटै ना बिसूरना। ताकत सराध, कै विवाह, कै उछाह कछु, डोलै लोल, बूझत सबद ढोल-तूरना ॥ प्यासेहूँ न पावै वारि, भूखें न चनक चारि, चाहत अहारन पहार, दारि घूर ना। सोकको अगार, दुखभार भरो तौलौं जन जौलौं देवी द्रवै न भवानी अन्नपूरना ॥१४८॥ जबतक देवी अन्नपूर्णा कृपा नहीं करतीं तभीतक मनुष्य लालची होकर (टुकड़े-टुकड़ेके लिये) लालायित होता है और दीन और मलिनमुख हो द्वार-द्वारपर बिलबिलाता रहता है, परन्तु उसके मनकी चिन्ता दूर नहीं होती; कहीं श्राद्ध अथवा विवाह अथवा कोई उत्सव तो नहीं, इस बातकी टोहमें रहता है, चञ्चल होकर इधर-उधर घूमता है और यदि कहीं ढोल या तुरहीका शब्द होता है तो पूछता है [ कि यहाँ कोई उत्सव तो नहीं है ? ] । प्यास लगनेपर उसे जल नहीं मिलता, भूख होनेपर चार चने भी नहीं मिलते, पहाड़के समान भोजनकी इच्छा होती है, परन्तु घूरेपर पड़ी दाल भी नहीं मिलती। इस प्रकार वह शोकका आश्रयस्थान और दुःखके भारसे दबा रहता है। शङ्कर-स्तवन भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग हर। सीस गंग, गिरिजा अर्धंग, भूषन भुजंगबर ॥