किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
अष्टादशः सर्गः
अष्टादशः सर्गः ४२१
‘धनुःशब्दोपपदं वेदम्’ । ‘धनुर्वेदमित्यर्थः । अभ्यादिदेश ददौ । अध्यापयामासेत्यर्थः । ‘धनुरुपपदवेदम्’ इत्यत्र धनुरुपपदत्वं ‘वेद’ शब्दस्य न तु संज्ञिनस्तदर्थस्येति संज्ञायाः संज्ञिगतत्वाभावादवाच्यवचनदोषमाहुरालंकारिकाः । तदुक्तम्—‘यदेवावाच्यवचनमवाच्यवचनं हि तत्’ । इति । समाधानं तु धनुःशब्दविशेषितेन ‘वेद’ शब्देन शब्दरत्नेनेत्यर्थः । पत्रोपदेशयोग्यो धनुर्वेदो लक्ष्यत इति कथंचित्संपाद्यम् ॥
हिन्दी—ऊंचे स्वरसे ऐसा कहते हुए प्रणाम करनेवाले इन्द्रपुत्र अर्जुनको शिवजीने आदरपूर्वक सान्त्वना देकर उनको जलते हुए तेजसे व्याप्त रुद्र देवतावाले पाशुपत अस्त्रको धारण करते हुए धनुर्वेदको पढ़ाया ॥ ४४ ॥
स पिङ्गाक्षः श्रीमान् भुवनमहनीयेन महसा
तनुं भीमां बिभ्रत्त्रिगुणपरिवारप्रहरणः ।
परीत्येशानं त्रिः स्तुतिभिरुपगीतः सुरगणैः
सुतं पाण्डोर्वीरं जलदमिव भास्वानभिययौ ॥ ४५ ॥
मल्लि०—स इति । पिङ्गाक्षः पिङ्गलाक्षः श्रीमान् शोभावान् भुवनमहनीयेन लोकपूज्येन महसा तेजसा भीमां तनुं बिभ्रत् । त्रिगुणस्त्रिशिखः परिवारः आकारो यस्य तत् त्रिगुणपरिवारं त्रिशूलं तदेव प्रहरणमायुधं यस्य स तथोक्तः । 'सूर्यपक्षे तु-गुणत्रयपरिवारस्त्रय्यात्मक इति योज्यम् । स धनुर्वेदः सुरगणैः स्तुतिभिरुपगीतः सन् । ईशानं शिवं त्रिस्त्रिवारम् । ‘द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच्’ इति सुच्प्रत्ययः । परीत्य प्रदक्षिणीकृत्य वीरं पाण्डोः सुतमर्जुनम् । भास्वान् सूर्यो जलदमिव । अभिययौ । शिखरिणी वृत्तम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी—पीले नेत्रोंवाले, शोभासम्पन्न, लोकमें पूजनीय तेजसे भयङ्कर शरीर को धारण करते हुए, त्रिशूलरूप बायुध लिए हुए, (सूर्य पक्षमें वेदत्रयीरूप), वह धनुर्वेद देवसमूहसे स्तुतिसे गाया जाता हुआ शिवजीको तीन वार प्रदक्षिणा कर वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके जैसे सूर्य मेघके पास जाते हैं उसी तरह सम्मुख गया ॥ ४५ ॥
अथ शशधरमौलेरभ्यनुज्ञामवाप्य
त्रिदशपतिपुरोगाः पूर्णकामाय तस्मै ।
अवितथफलमाशीर्वादमारोपयन्तो
विजपि विविधमस्त्रं लोकपाला वितेरुः ॥ ४६ ॥
४२२ किरातार्जुनीयम्
मल्लि०—अथेति। अथ शशधरमौलिवरप्रदानान्तरं त्रिदशपतिपुरोगा इन्द्रादयो लोकपालाः शशधरमौलेः शम्भोः अभ्यनुज्ञामवाप्य पूर्णकामाय तस्मै पाण्डवाय अवितथफलममोघफलम् आशीर्वादमारोपयन्तः प्रयुञ्जाना विजयि जयशीलं विविधं नानाविधम् अस्त्रमैन्द्रादिकं वितेरुर्ददुः। मालिनीवृत्तम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी—तब शिवजीके अर्जुनको वर देनेके अनन्तर इन्द्र आदि लोकपालोंने शिवजीकी आज्ञा पाकर पूर्ण कामनासे युक्त अर्जुनको अमोघ फलवाला आशीर्वाद देकर जयशील और अनेक प्रकारके इन्द्राऽस्त्र आदिका वितरण किया ॥ ४६ ॥
असंहायोत्साहं जयिनमुदयं प्राप्य तरसा
धुरं गुर्वीं वोढुं स्थितमनवसादाय जगतः ।
स्वधाम्ना लोकानां तमुपरि कृतस्थानममरा-
स्तपोलक्ष्म्या दीप्तं दिनकृतमिवोच्चैरुपजगुः ॥ ४७ ॥
मल्लि०—असंहायोत्साहमिति। तरसा बलेन वेगेन च जयिनं जयशीलमुदयमस्त्रलाभरूपमभ्युदयम्। अन्यत्र,—उदयाद्रिं च प्राप्य, असंहायोत्साहं संहर्तुमशक्यमुद्योगं जगतोऽनवसादाय क्षेमाय गुर्वी धुरं दुष्टनिग्रहभरं तमोपसंहाररूपं च भारं वोढुं स्थितम्। स्वधाम्ना स्वतेजसा लोकानामुपरि कृतस्थानं कृतपदम्। अन्यत्र, उपरि वर्तमानम्। तपोलक्ष्म्या दीप्तं तं पाण्डवम्। अमरा इन्द्रादयो दिनकृतं सूर्यमिबोच्चैरुपजगुः साधु महाभाग्योऽसीति तुष्टुवुः। शिखरिणी वृत्तम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी—बलसे और वेगसे भी जयशील उदय अस्त्र-लाभरूप अभ्युदय, (सूर्यपक्षमें उदयपर्वत) को प्राप्त कर संहार करनेके लिए अशक्य उद्योगको लोकके कल्याणके लिए गौरवपूर्ण (सूर्यपक्षमें अन्धकार निवारणरूप गौरवपूर्ण) भारको वहन करनेके लिए स्थित, अपने तेजसे लोकोंके ऊपर स्थान किये हुए (सूर्यपक्षमें ऊपर रहे हुए) तपस्या सम्पत्तिसे प्रदीप्त अर्जुनकी इन्द्र आदि देवताओंने सूर्यके समान स्तुति की ॥ ४७ ॥
व्रज जय रिपुलोकं पादपद्मानतः सन्
गदित इति शिवेन श्लाघितो देवसंघैः ।
निजगृहमथ गत्वा सादरं पाण्डुपुत्रो
धृतगुरुजयलक्ष्मीर्धर्मसूनुं ननाम ॥ ४८ ॥
इति भारविकृतौ महाकाव्ये किरातार्जुनीयेऽष्टादशः सर्गः ।
अष्टादशः सर्गः | ४२३
अष्टादशः सर्गः | ४२३
मल्लि०—व्रजेति । शिवेन व्रज स्वपुरं गच्छ, रिपुलोकं जयेति गदित उक्तः । यतः पादपद्मानतः शिवपादपङ्कजानतः सन्, तथा देवसंघैः श्लाघितः स्तुतोऽत एव धृता गुर्वी जयलक्ष्मीर्येन स पाण्डुपुत्रोऽर्जुनो निजगृहं स्वाश्रमं गत्वा प्राप्य, अथ सादरं यथा तथा धर्मसूनुं युधिष्ठिरं ननाम नमश्चक्रे ॥ ४८ ॥
इति मल्लिनाथकृतव्याख्यायां घण्टापथसमाख्यायामष्टादशः सर्गः समाप्तः ।
•
हिन्दी—शिवजीसे—'जाओ और शत्रुसमूहको जीत लो' ऐसा कहे गये तथा शिवजीके चरणकमलोंमें प्रणाम करते हुए और देवसमूहसे स्तुतिके विषय होकर एवम् महती जयलक्ष्मीका धारण किये हुए अर्जुनने अपने आश्रममें पहुँचकर धर्म-पुत्र युधिष्ठिरको आदरपूर्वक प्रणाम किया ॥ ४८ ॥
किरातार्जुनीय महाकाव्यमें अठारहवें सर्गका अनुवाद समाप्त हुआ ।
नमो भगवते सूर्यनारायणाय नमो नमः ।
•
पञ्चदशसर्गे स्थितानां चित्रबन्धानामुद्धारः
गोमूत्रिकाबन्धः ( १२ श्लोकः )
ना सु रो य न क्ष मा गो ध र सं स्थो न रा क्ष सः
ना सु खो यं न वा भो गो ध र णि स्थो वि रा ज सः
सर्वतोभद्रः ( २५ श्लोकः )
| दे | वा | का | नि | नि | का | वा | दे |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | हि | का | स्व | स्व | वा | हि | का |
| का | का | रे | भ | भ | रे | का | का |
| नि | स्व | भ | व्य | व्य | भ | स्व | नि |
| नि | स्व | भ | व्य | व्य | भ | स्व | नि |
| का | का | रे | भ | भ | रे | का | का |
| वा | हि | का | स्व | स्व | का | हि | वा |
| दे | वा | का | नि | नि | का | वा | दे |
अर्धभ्रमकः ( २७ श्लोकः )
| स | स | त्य | र | ति | दे | नि | यं |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | द | रा | म | र्षं | ना | शि | नी |
| त्व | रा | धि | क | क | सं | ना | दे |
| र | म | क | त्व | म | क | बं | ति |
परिशिष्ट
किरातार्जुनीय में अलङ्कार-स्थापना
| १ अतिशयोक्ति—द्वि० सर्ग २४, ३१, तृ० २१, पं० २, १९, ४३, ष० ४२, स० ११, १२, १६, अष्ट० २०, ४६, नव० ४, दश० १, २४, ३४, द्वाद० ७, त्रयो० १६, २१, २३।<br>२ अनुप्रास—अष्ट० २ छेकानुप्रास और वृत्त्यनुप्रास।<br>३ अनुमान—त्रयो० ३०।<br>४ अपह्नुति—द्वाद० १५।<br>५ अर्थत्रयवाचिन्—पञ्च० ४५।<br>६ अर्थान्तरन्यास—प्र० २, ५, ८, २३, २५, ३०, ४५, द्वि० १५, १८, २०, २१, ३०, तृ० १३, ३१, ५३, चतु० ४, २०, २३, पं० ४१, ५१, ष० ३०, ४१, ४०, ४५, सप्त० १३, १५, अष्ट० ४, ७, नव० ३३, ३५, ४९, ५८, ६४, दश० २५, ३५, ३७, ५८, ६२, एका० ५५, ७६, द्वाद० २९, त्रयो० ८, ६६, चतु० १, ११, २२, षो० ६१।<br>७ अर्थापत्ति—सप्त० २७।<br>८ अर्धभ्रमक—पञ्चद० २७।<br>९ उत्प्रेक्षा—द्वि० ५४, तृ० १, ३, ४३, ४७, ४८, ४९, चतु० ७, ११, १३, | २६, २७, ३०, ३१, पं० १, ३, ७, ८, १५, १७, ३०, ३२, ३४, ३५, ४८, ष० १०, ११, १२, १७, २५, २६, २७, ३३, ४१; स० ६, १४, २३, ३१; अष्ट० १०, ११, २१; २६, २७, २८, ३२, ३३, ३४, ३८, ५०, ५५; नव० १, ३, ५, ९, १२, १४, २१, २३, २६, ३२, ५३, ५५, ६१, ७२; ७४, ७५, ७६; दश० ३, ११, २१, ३२, ३३, ४३; द्वाद० १३, १४, २४, ४५; त्रयो० ५, ८, २२, ३३, ३४; चतु० २९, ३०, ३२, ३३, ३४, ४८, ५०, ५३, ५४; पञ्चद० ९; षो० ३, ३५, ३८, ४५, ४६, ६२, सप्तद० ८, २७, ४७; अष्टा० १८, १९ हेतूत्प्रेक्षा।<br>१० उदात्त—प्र० १६; त्रयो० ५५।<br>११ उपमा—प्र० २१; द्वि० ५०; तृ० ३२, ३६, ४३, ४६; च० १, ६, १५, १७, १९, २८, ३६, प० १८, २६, ४१, ४५, ष० २, २३, ४०, ४९, न० ८, १०, १२, १४, १५, १८, २७, २९, ३२, ६३, ६ |
पञ्चदशसर्गे स्थितानां चित्रबन्धानामुद्धारः
गोमूत्रिकाबन्धः ( १२ श्लोकः )
ना सु रो य न त्रा ता गो ध र सं स्थो न रा क्ष सः
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मा सु खो यं न वा भो गो ध र णि स्थो हि रा ज सः
सर्वतोभद्रः ( २५ श्लोकः )
| दे | वा | का | नि | नि | का | वा | दे |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वा | हि | का | स्व | स्व | वा | हि | का |
| का | का | रे | भ | भ | रे | का | का |
| नि | स्व | भ | व्य | व्य | भ | स्व | नि |
| नि | स्व | भ | व्य | व्य | भ | स्व | नि |
| का | का | रे | भ | भ | रे | का | का |
| वा | हि | का | स्व | स्व | का | हि | वा |
| दे | वा | का | नि | नि | का | वा | दे |
अर्धभ्रमकः ( २७ श्लोकः )
| स | स | त्य | र | ति | दे | नि | यं |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | द | रा | म | र्षं | ना | शि | नी |
| त्व | रा | धि | क | क | सं | ना | दे |
| र | म | क | त्व | म | क | षं | ति |
परिशिष्ट
किरातार्जुनीय में अलङ्कार-स्थापना
१ अतिशयोक्ति—द्वि० सर्ग २४, ३१, तृ० २१, पं० २,१९,४३, ष० ४२, स० ११, १२, १६, अष्ट० २०,४६, नव० ४, दश० १, २४,३४, द्वाद० ७, त्रयो० १६, २१, २३।
२ अनुप्रास—अष्ट० २ छेकानुप्रास और वृत्यनुप्रास।
३ अनुमान—त्रयो० ३७।
४ अपह्नुति—द्वाद० १५।
५ अर्थत्रयवाचिन्—पञ्च० ४५।
६ अर्थान्तरन्यास—प्र० २,५,८, २३, २५, ३०, ४५, द्वि० १५,१८,२०, २१, ३०, तृ० १३,३१,५३, चतु० ४, २०, २३, पं०४१,५१,ष०२७, ४१, ४४, ४५, सप्त० १३, १५, अष्ट० ४, ७, नव० ३२, ३५, ४९, ५८, ६४, दश० २५, ३५, ३७, ५८, ६२, एका० ५५, ७६, द्वाद० २९, त्रयो० ८, १६, चतु० १, ११, २२, षो० ६१।
७ अर्थापत्ति--सप्त० २७।
८ अर्धभ्रमक--पञ्चद० २७।
९ उत्प्रेक्षा--द्वि० ५४, तृ० १, ३,४३, ४७, ४८, ४९, चतु० ७, ११, १३, २६, २७, ३०, ३१, पं० १, ३, ७, ८, १५, १७, ३०, ३२, ३४, ३५, ४८, ष० १०, ११, १२, १७, २५, २६, २७, ३३, ४१; स० ६, १४, २३, ३१; अष्ट० १०, ११, २१; २६, २७, २८, ३२, ३३,३४, ३८, ५०, ५५; नव० १, ३, ५, ९, १२, १४, २१, २३, २६, ३२, ५३, ५५, ६१, ७२; ७४, ७५, ७६; दश० ३, ११, २१, ३२, ३३, ४३; द्वा० १३, १४, २४, ४५; त्र० ५, ८, २२, ३३, ३४; चतु० २९, ३०, ३२, ३३, ३४, ४८, ५०, ५३, ५४; पञ्चद० ९; षो० ३, ३५, ३८, ४५, ४६, ६२, सप्तद० ८, ३७, ४७, अष्टा० १८, १९ हेतूत्प्रेक्षा।
१० उदात्त—प्र० १६; त्रयो० ५५।
११ उपमा—प्र० २१; द्वि० ५०; तृ० ३२, ३६, ४३, ४६; च० १, ६, १५,१७, १९, २८, ३६, प० १८, २६, ४१, ४६, ष० २, २१, ४०, ४९, स० ८, १०, १२, १४, १७, १८, २७, २९, ३२, ६३, ६७,
४२६ | किरातार्जुनीयम्
| ७८, द० ८, २४, ३४, ४२, एका० ३३, ५५, ५९, ६४, द्दा० १७, २०, २२, त्रयो० १४, १५, १७, २२, २८, ५३, ६६, चतुर्द० ७, ३५, ४०, ५२, षो० २६, ६०, सप्तद० ४ पूर्णोपमा, मालोपमा, श्लिष्टोपमा। | ९, द० २७, एका० १९, षो० २१, ४१, ६२, सप्तद० ४६। |
| १२ ऊर्जस्वल - द०५१, ५७। | २४ निरोष्ठ्य - पञ्चद० ७, २१। |
| १३ एकव्यञ्जन - पञ्चद० १४। | २५ परिकर -- प्र० १९, ष० ४०, स० ४, एका० ४५। |
| १४ एकावली -- प्र० १२, द्वि० ३२, द० १३। | २६ परिणाम -- च० २। |
| १५ कारणमाला - द्वि० १४, ४०, सप्तदश १७ | २७ परिवृत्ति - द्वि० १९ संपरिवृत्ति। |
| १६ काव्यलिङ्ग - प्र० ७, द्वि० २९, ३९ ४०, ४४, तृ० ४२, प० २०, २३, २६, ४०, ४४, ष० २८, स० २६, अष्ट० ३, १२, १८, ४४, न० ५५, ५७, ६२, ६३, द० १५, एका० १, ७८; चतुर्द० २९। | २८ पर्याय -- द० ३७। |
| १७ गोमूत्रिका बन्ध - पञ्चद० १२। | २९ पर्यायोक्ति -- प० ४१। |
| १८ छेकानुप्रास - अष्ट० १। | ३० पूर्णोपमा -- प्र० ४६, तृ० ४३। |
| १९ तद्गुण - ष० ८, स० २३, द्दा० २३। | ३१ प्रतिलोम - पञ्चद० २३। |
| २० तुल्ययोगिता - न० ५१, एका० ५४। | ३२ प्रतिलोमानुलोमपाद - पञ्चद० २० |
| २१ दृष्टान्त - द्वि० ५१, पञ्चद० २५। | ३३ प्रेय - प० ५१। |
| २२ द्व्यक्षर - पञ्चद० ३८। | ३४ भाविक - प्र० २९, ३३। |
| २३ निदर्शना - द्वि० ५१, प० ३९, ष० ४, स० ३, १७,४०, ५७, न० | ३५ भ्रान्तिमत् - प० २६, ३१, ४२, ष० ८, स० २२, ३१, अष्ट० ७, द० ४, ४२, अष्टाद० २१। |
| ३६ माला - अष्टाद० ४६। | |
| ३७ मालोपमा - त्रयो० २९, चतुर्द० ६३, सप्तद० ११। | |
| ३८ मीलन - अष्ट० ४६, ४८। | |
| ३९ यथासंख्य - अष्ट०४२, पञ्चद० १६ | |
| ४० यमक - प० १८, २० २३, पञ्चद० १, ३, १६, ३१, शृङ्खला यमक। | |
| ४१ रसवत - द० ५१। | |
| ४२ रूपक - तृ० ४१, च० २४, प० २८, ष० ४१, स० ५, ११, १५, न० ३, २७, ५७, ६२, द० ३२, चतुर्द० १२, पञ्चद० ३८। |
| अलङ्कारस्थापना | ४२७ |
|---|---|
| ४३ वस्तुध्वनि — त्रयो० २३, २७। | ५८ संसृष्टि — द्वि० ५०, तृ० ४६, च० १७, प० १८, २० २३, सप्त० १२ अष्ट० १, ७, १०, ४६, न० ६३, ६४, द० ३२, पञ्चद० १६, सप्तद० ४६। |
| ४४ वास्तव — च० २२। | ५९ संदेह — च० ५, पं० १२, ३६, ष० १२, अष्ट० १५, ३५, ३६, ५३, न० ७, १५, ९२, ९४। |
| ४५ विभावना — प० २६, अष्ट० ४०, न० २५। | ६० सम — द० २५। |
| ४६ विरोध — द० १४। | ६१ समपरिवृत्ति — स० ३५। |
| ४७ विरोधाभास — न० ६३, ६४, एका० ३५, द्वा० १६, अष्टाद० ४१। | ६२ समासोक्ति — प्र० १८, तृ० ४४, ६०, प० २७, अष्ट० ६, न० ५, ११, द० ३१, चतुर्द० ३। |
| ४८ विशेषोक्ति — तृ० ८। | ६३ समाहित — द० ५१। |
| ४९ विषम — अष्ट० ४१, द० ३८। | ६४ समुच्चय — पञ्चद० १, षो० ३५। |
| ५० वृत्त्यनुप्रास — प्र० १। | ६५ सर्वतोभद्र — पञ्चद० १५। |
| ५१ व्यतिरेक — प० ४४, एका० ६३, द्वा० १४, त्रयो० ५१, ५३। | ६६ सहोक्ति — प्र० ३९, द० ३९, ४८। |
| ५२ शृङ्खला यमक — पञ्चद० ४२। | ६७ सामान्य — अष्ट० ४२। |
| ५३ श्लिष्टोपमा — न० १८। | ६८ स्मरण — च० ३८, प० २४, ष० १२। |
| ५४ श्लेष — अष्ट० २, द० २४, ३४, एका० ५९, त्रयो० १४, १५, चतुर्द ५२, सप्तद० २७। | ६९ स्वभावोक्ति — च० १०, १३, १६ १७, १८, २९, ष० १५, सप्त० १२, १९, अष्ट० १७, १८, २२ २६, ४५, ४९, द्वा० ४२, त्रयो० १८, २२, ३०, ३१, चतुर्द० १६। |
| ५५ संशय — न० ६९। | ७० हेतूत्प्रेक्षा — द्वि० १०, अष्ट २०। |
| ५६ सङ्कर — च० ३४, प० २६, ष० २, ८, ४० ४१, स० २३, २५, अष्ट० ६, ११, १५, १८, ४२; न० ३, ५, १२, १४, २७, ३२, ५५, ५७, ६२, द० २४, २५, ३४, ३६, द्वा० १४, त्रयो० २१, ५३, ६६, चतुर्द० २९, षो० ३५। | |
| ५७ संसर्ग — अष्ट० २। |
किरातार्जुनीयव्याख्यायां प्रमाणत्वेन समुपन्यस्तानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणां च नामानि ।
| ग्रन्थ / ग्रन्थकार | ग्रन्थ / ग्रन्थकार |
|---|---|
| अगस्त्यः १२।४० | मनुः १।१७, २।६, १४।६ इत्यादि |
| अमरः १।१, १।२, १।७, इत्यादि | माघः ५।३, ८।४९. |
| आगमः १।४६, ३।३७, ९।३ इत्यादि. | मातङ्गः ४।३३. |
| आलङ्कारिकाः १।१, १८।४८. | मार्तण्डः ८।१५. |
| कामन्दकः १।३१, २।६, २।१० इत्यादि | यादवः १।३४, ३।११, ७।४ इत्यादि. |
| काव्यप्रकाशः १।८, १।१२, १।३९ इ० | रघुवंशन् ८।४९. |
| काशिका १।३, १।६, २।११ इत्यादि. | रघुवंशसञ्जीविनी ११।७६. |
| केशवः २।२१, ८।२४, ९।११ इत्यादि | रसरत्नाकरः ९।७२. |
| कैयटः १।१, १।१०, ८।११ इत्यादि. | रसिकाः १२।४०. |
| क्षीरस्वामी १।९, १।२१, १०।३. | रामायणम् १।९. |
| गणव्याख्यानम् २।१७, २।३०, ३।६ | रुद्रटः ५।८. |
| दण्डी १।४६, ८।४४. | वाग्भटः ५।८. |
| दशरूपकम् ८।१३, ९।२६ ९।४५. | वात्स्यायनः ९।४७. |
| धन्वन्तरिः ४।२८. | वामनः २।२७, २।३७, ४।२४ इत्यादि. |
| नारदः १।१३. | विद्याधरः ४।३८. |
| निरुक्तम् ७।१०. | विश्वः १।८, १।९, १।२४ इत्यादि. |
| नीतिवाक्यामृतम् १।२, १।४, १।२६. इत्यादि. | वैजयन्ती १।१३, २।८, ४।३६ इत्यादि. |
| नृत्यविलासः ८।५३. | वैद्यकम् ५।११. |
| नैषधम् ८।४९. | व्यक्तिविवेकः ३।२१. |
| न्यायः १।२४, २।५. | शब्दार्णवः ८।३१. |
| न्यायोद्द्योतः २।१७. | शाकटायनः ३।३५. |
| पाण्डुकाव्यम् ७।८. | शाश्वतः २।२२, ३।५, ७।२७ इत्यादि. |
| पुराणम् २।२६. | सज्जनः १३।४५, १४।२७, १६।५९. |
| प्रकाशवर्ष ४।१०. | सर्वस्वकारः २।१८, ९।१५. |
| भारतम् ५।३०, १३।१०, १४।१०. | सामुद्रिकाः ६।१. |
| भाष्यकारः १।१, १।१०, ८।११ इत्यादि | स्मरणम् (स्मृतिः) १।१३, ६।२९ इत्या- |
| हलायुधः २।३, ४।१८, ७।१३. | |
| हैमः १।२९, ५।४९, १०।३. |
श्लोकानामकाराद्यनुक्रमणिका
अ
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अकृत्रिमप्रेमरसाभिरामं | ३ | ३७ | अथ शशधरमौलेरस्य | १८ | ४६ |
| अखण्डमाखण्डल | १ | २९ | अथ स्फुरन्मोनविधूत | ८ | २७ |
| अखिलमिदममुष्य | ५ | २१ | अथ स्वमायाकृतमन्दिरो | ८ | ८ |
| अगूढहासस्फुटदन्त | ८ | ३६ | अथ हिमशुचिभस्म | १८ | १५ |
| अग्रमानुषु नितान्त | ९ | ७ | अथाग्रे द्रुनता मार्वि | १५ | ७ |
| अचक्रमत सपह्लवां | १० | ४९ | अथापदामुद्धरणक्षमेषु | १७ | १ |
| अचित्ततायामपि | १७ | ४७ | अथामिपश्यन्निव | ३ | ५६ |
| अचिरेण परस्य | २ | ९ | अथामयस्मिन्मशचिच | ११ | १ |
| अजन्मा पुरुषस्तावत् | ११ | ७० | अथारुवन्नैरासनतः | २ | ५७ |
| अजस्रमोजिह्मममोघ | १४ | ५७ | अथो शरस्तेन मदर्थं | १४ | १७ |
| अणीयसे विश्वविधा | १८ | ४१ | अथोष्णमासेव सुरेह | ३ | ३२ |
| अणुरप्युपहन्ति | २ | ५१ | अशोषितं वैद्युतजातवेदसा | ४ | २१ |
| अतिपातितकाल | २ | ४२ | अथ क्रिया कामदुघाः | ३ | ६ |
| अतिशयितवनान्तर | १० | ८ | अधरीचकार च विवेक | ६ | २१ |
| अतीतसंख्या विहिता | १४ | १० | अधिगक्य गुह्यकादिति | ६ | ३८ |
| अत्यर्थं दुरुपसदानुपेत्य | ५ | ९ | अधिरुह्य पुष्पभरनम्रशिखैः | ६ | १७ |
| अथ कृतकविलोभनं | १० | १७ | अनादरोपात्तघृतैक | १४ | ३६ |
| अथ क्षमामेव | १ | ४४ | अनाप्तपुण्योपचये | ३ | ५ |
| अथ चंदवभिः | २ | १६ | अनामृशन्तावक्वचिदेव | १७ | ३३ |
| अथ जयाय नु प्रेहमयी | ५ | १ | अनायुधे सत्त्वजिघांसिते | १४ | १६ |
| अथ दीपितवारिवाह० | १३ | २० | अनारतं तेन पदेषु | १ | १५ |
| अथ दीर्घतमं तमः | १३ | ३० | अनारतं यो मणिपीठ | १ | ४० |
| अथ भूतभव्यभवदीश | १२ | १९ | अनिर्जयेन द्विषतां | ११ | ७१ |
| अथ भूतानि वार्त्रघ्न | १५ | १ | अनुकूलपातिनमचण्ड | ६ | २५ |
| अथ वासवस्य वचनेन | १२ | १ | अनुकूलमस्य च विचिन्त्य | १२ | ४३ |
| अथ विहितविषेयै | १६ | ६२ | अनुचरेण धनाधिपतेरथ | ५ | १६ |
| अथ वैष कृतज्ञयेव पूर्वं | १३ | ५ | अनुजगु रथ दिव्यं | ३ | १० |
| अनुजानुमण्यमवसक्त | १२ | २२ |
४३०
किरातार्जुनीयम्
| प्रतीक | स० | श्लो० | प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अनुद्धताकारतया | ३ | ३ | अभिमुनि सहसा | १० | ४५ |
| अनुपालयता मवे | २ | १० | अभियोग इमान | २ | ४६ |
| अनुभाववतावुरु | १३ | १५ | अभिरश्मिमालि | १२ | २ |
| अनुशासतमित्यना | २ | ५४ | अभिलषत उपायं | १७ | ६४ |
| अनुसानु पुष्पितलता | ६ | १ | अभिवर्षति योऽनु | २ | ३१ |
| अनुहेमवप्रमरुणैः सयतां | ६ | ८ | अमूतमामज्य विरुद्ध | १४ | १९ |
| अनेकराजन्य रथाश्व | १ | १६ | अभ्यधानि मुनिचापलात् | १३ | ६३ |
| अनेन योगेन विवृद्ध | ३ | २८ | अभ्यायत: सन्ततधूम | १६ | ६ |
| अन्तः पर्यवस्थाता | ११ | १३ | अमविणां कृत्यमिव | १४ | ६३ |
| अन्तिकाऽन्तिकगतेन्दु | ९ | २१ | अमी पृथुस्तम्ब्रभृतः | ४ | २६ |
| अन्यदीयविशेखे न | १३ | ४६ | अमी समुद्भूतसरोज | ४ | १५ |
| अन्यदोपमिव स स्वकं | १४ | ४८ | अपयार्थक्रियारम्भैः | ११ | ५२ |
| अन्योन्यरक्तमनसा | ९ | ७४ | अयमच्युतश्च वचनेन | १२ | ३५ |
| अपनेयमुदेतुमिच्छता | २ | ३६ | अयमसौ भगवानुत | १८ | ९ |
| अपयन्धनुषः शिवान्तिक | १३ | २३ | अयमेव मृगऽस्वकाम | १३ | ९ |
| अपरा गसमीर णे | २ | ५० | अयं व. बलैड्यमापन्नाम् | १५ | १९ |
| अपवर्जितविप्लवे | २ | २६ | अलकाधिपभृत्यदर्शितं | ३ | ५१ |
| अपवादाभीतस्य | ११ | ५६ | अलकृतानाममृतो | १७ | २९ |
| अपश्यद्भिरिवेशानं | १५ | २ | अलङ्घ्य तत्तदुदीक्ष्य | १९ | ६० |
| अपहृष्येऽथवा सद्भिः | ११ | ६८ | अलङ्घयत्वाज्जनेः | ११ | ४० |
| अप्राकृतस्याहव | १६ | २४ | अलमेष विलोकितः | ५ | १७ |
| अभितस्तं पृथासूनुः | ११ | ८ | अलसपदमनेोरमं प्रकृत्या | १० | ६० |
| अभिद्रोहेण भूतानाम् | ११ | २१ | अवचयपरिभोगवन्ति | १० | ५ |
| अभिनयमनसः | १० | ४२ | अवद्यन्विशिखः शम्भोः | १५ | ३७ |
| अभिभवति मनः कदम्ब | १० | २३ | अवधूतपङ्कजपराग | ६ | ३ |
| अभिभवोदितमन्यु | १८ | ७ | अवधूयारिभिर्नीता | ११ | ५८ |
| अभिमानधनस्य | २ | १९ | अवन्ध्यकोपस्य | १ | ३३ |
| अभिमानवतो | २ | १३ | अवरुग्णतुङ्गसुरवा रु | ६ | ५ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३१
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| अवलीढसनाभिरश्वसेनः | १३ | ११ | अंसस्थले केचिद् | १६ | ३० |
| अवहितहृदयो विधाय | २ | ५८ | अंसाववहृद्वनतो | १६ | २१ |
| अविप्रहृष्याप्यनुलेन | १८ | ३३ | आ | ||
| अविज्ञातप्रबन्धस्य | ११ | ४३ | आकारमाशंसितभूरि | ३ | २७ |
| अवितृप्ततया तथापि | २ | २९ | आकीर्णं बलरजसा | ७ | ३६ |
| अविभावितनिष्क्रमं | १३ | २७ | आकीर्णा मुखनलिनेः | ७ | १८ |
| अविमृष्यमेतदभिलष्यति | ६ | ४४ | आकुमारमुपदेष्टु | १३ | ४३ |
| अविरतोजितवारि | ५ | ६ | आकुलभ्रलतस्त्रि | ९ | ८ |
| अविरलफलिनीवनं | १० | २८ | आसिसचापावरणेपु | १७ | ५९ |
| अविरलमलसेषु | १० | ४३ | आसिप्तसम्पातमपेत | १६ | ४१ |
| अविलङ्घ्यविकंपणम् | ३ | ५७ | आक्षिप्यमाणं रिपुभिः | ३ | ५० |
| अविवेकवृथाश्रमा | १३ | २९ | आघट्टयामास गता | १७ | ३८ |
| असकलनयनेक्षितानि | १० | ५९ | आघ्राय सद्यमतिवृप्य | ७ | ३४ |
| असजमाराधयतो | १ | ११ | आतपे धृतिमतो | ९ | ३० |
| असमापितकृत्य | २ | ४८ | आतिथेयीमथासाद्य | ११ | ९ |
| असावनास्थापरया | ४ | ३४ | आत्मनोनमुपतिष्ठते | १३ | ६९ |
| असिः शरा वर्म धनुश्च | १४ | २० | आत्मलामपरिणाम | १८ | ३४ |
| असङ्कदीनामपुत्रीप | १६ | १० | आदृता नलपदैः | ९ | ४१ |
| असंविदानस्य ममेश | १८ | ४२ | आत्राधामरणभया | १८ | ३९ |
| असंशयं न्यस्तमृषान्त | ८ | २८ | आपत्तभ्रमरकुला | ७ | १० |
| असंशयालोचितकार्य | ३ | ३३ | आमोदवासितचला | ९ | ७७ |
| असहायोत्साहं जयिनं | १८ | ४७ | आयस्तः सुरसरिदोध | ७ | ३२ |
| अस्त्रवेदमधिगम्य तत्त्वतः | १३ | ६२ | आरोढुः समवनतस्य | ७ | १३ |
| अस्त्रवेदविद्यं महो | १३ | ६७ | आशंसितापचिति | ६ | ४६ |
| अस्त्रैः समानामपि | १७ | ३६ | आशु कान्तमभिसारित | ९ | ३८ |
| अस्मिनगुह्यात् पिनाक | ५ | ३१ | आसक्तभरनीकाशै | ११ | ५ |
| अस्मिन्यशः पौरुष | १६ | ९ | आसक्ता धूरियं | ११ | ७७ |
| अंशुपाणिभिरतीव | ९ | ३ | आसन्नद्विपपदवीमदा | ७ | ३४ |
४३२ | किरातार्जुनीयम्
| श्लोकांश | स० | श्लो० | श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| आसादिता तत्प्रथमं | १६ | २७ | इदमीदृग्गुणोपेतं | ११ | ४१ |
| आसुरं लोकविश्राम | १५ | २८ | इमान्यमूनीत्यपवर्जिते | ८ | १० |
| आसेदुषां गोत्रभिदो | १८ | १८ | इमामदं वेद न तावकीं | १ | ३७ |
| आस्निग्व्यशब्दनभसः | १८ | ४३ | इयमिष्टगुणाय रोचतां | २ | ५ |
| आश्यामालाभ्य नीतेषु | १५ | ४ | इयं च दुर्वारमहारथानां | १६ | १७ |
| आस्थितः स्थगित | ९ | ९ | इयं शिवाया नियते | ४ | २१ |
| आहिते नु मधुना | ९ | ६६ | इह दुरधिगमः किञ्चिदेवा | ५ | १८ |
| इ | इह वीतभयास्तपोऽनुभावा | १३ | ४ | ||
| इच्छतां सह वधूभिः | ९ | १३ | इह सनियमयोः सुराप | ५ | ४० |
| इतरेतरानभिभवेन | ६ | ३४ | ई | ||
| इति कथयति तत्र | ४ | १७ | ईशार्थमम्भसि चिराप | ५ | १९ |
| इति गां विधाय विरतषु | १२ | ३२ | उ | ||
| इति चालयन्नचलसानु | १२ | ५२ | उच्चतां स वचनीय | १ | ३९ |
| इति तानुदारमनुनीय | १२ | ४० | उज्झतीशुचमिवाशु | ९ | १८ |
| इति तेन विचिन्त्य चाप | १३ | १८ | उज्झत्सु संहार इवा | १६ | १६ |
| इति दर्शितविक्रियं | २ | २५ | उत्फुल्लस्थलनालिनी | ५ | ३९ |
| इति निगदितवन्तं | १८ | ४४ | उत्सङ्गे मणिविषमे ममं | ७ | २१ |
| इति ब्रूवाणेन महेन्द्र | ३ | २० | उत्सृष्टवज्रकुशकङ्कटा | ७ | ३० |
| इति विविधमुदासे | १६ | ६३ | उदस्य धैर्यं दयितेन | ८ | ५० |
| इति विषमिवचक्षुषा | १० | ५६ | उदारकीर्तेरुदयं | १ | १८ |
| इति शासति सेनान्या | १५ | २९ | उदाहरणमाशीःषु | ११ | ६५ |
| इतीरयित्वा गिरमात्त | १ | २६ | उदितोपलस्खलन | ६ | ४ |
| इतीरिताकूतमनील | १४ | २४ | उदीरितां तामिति | ३ | ५५ |
| इत्थं विहृत्य वनिताभि | ८ | ५५ | उदूढवक्षःस्थगितैक | १४ | ११ |
| इत्युक्तवन्तं परिरम्य | ११ | ८० | उद्गतेन्दुमविभिन्न | ९ | २४ |
| इत्युक्तवन्तं व्रज साधये | ३ | २४ | उन्मज्जन्मकर इवा | १७ | ६३ |
| इत्युक्तवामुषितविशेष | ३ | १० | उपकार इवासति | १३ | ३३ |
| इत्युक्त्वा सपदि द्वितं | ५ | ५१ | उपकारकमाहते | २ | ४४ |
श्लोकानुक्रमणिका
<div align="right">४३३</div>| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| उपजापसहान्बिल | २ | ४७ | कच्छान्ते सुरसरितो | १२ | ५४ |
| उपपत्तिरुदाहृता | २ | २८ | कतिपयसहकारपुष्प | १० | ३० |
| उपलभ्य चञ्चलतरङ्ग | ६ | १४ | कथमिव तव सम्मति | १० | ४६ |
| प्लावितोद्धततरङ्ग | ६ | १० | कथं वादीयतामर्वाङ् | ११ | ७६ |
| उपाघत्त सपत्नेषु | ११ | ५० | कथाप्रसङ्गेन जनैः | १ | २४ |
| उपारताः पश्चिमरात्रि | ४ | १० | कपोलसंश्लेषि विलो | ४ | ९ |
| उपेयुषीणां बृहतीरधि | ८ | १२ | करणस्पृष्टङ्गलनिःसृतयोः | १८ | ११ |
| उपेयुषी बिभ्रतमन्तक | १४ | ३८ | करिष्यसे यत्र सुदुश्च | ३ | २९ |
| उपैति सस्यं परिणाम | ४ | २२ | करुणमभिहितं त्रपा | १० | ५८ |
| उपैत्यनन्तद्युतिरप्य | १६ | ६१ | करोति योऽक्षोपजनाति | ३ | ५१ |
| उपोढकल्याणफलो | १७ | ५४ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-पयस्यगाधे | ८ | ४८ |
| उमापति पाण्डुसुत | १७ | १२ | करो धुनाना नवपल्लवाकृति-वृथा कृता | ८ | ७ |
| उरसि शूलभृतः प्रहिता | १८ | ५ | कलत्रभारेण विलोल | ८ | १० |
| उरु सत्त्वमाहु विदरि | ६ | ३५ | कवचं स बिभ्रदुपवीत | १२ | ९ |
| ऊ | कषणकम्पनि रस्तघटा | ५ | ४७ | ||
| ऊर्ध्वं तिरश्चीनमधश्च | १६ | ५० | कान्तदूत्य इव कुङ्कुम | ९ | ६ |
| ऋ | कान्तवेश्म बहु सन्दिशती | ९ | ३७ | ||
| ऋषिवंशजः स यदि | ६ | ३६ | कान्तमङ्गमपराजित | ९ | ५२ |
| ए | कान्ताजनं सुरतखेद | ९ | ७६ | ||
| एकतामिव गतस्य | ९ | १२ | कान्तानां कृतपुलकः | ७ | ५ |
| एवं प्रतिद्वन्द्विषु तस्य | १७ | १८ | कि गतेन न हि युक्त | ९ | ४० |
| ओ | कि त्यक्तापास्तदेवन्व | १५ | २१ | ||
| ओजसापि खलु नून | ९ | ३३ | किमपेक्ष्य फलं | २ | २१ |
| ओष्ठपल्लवविदंश | ९ | ५७ | किमसामयिकं वित | २ | ४० |
| औ | कि मुपेक्षसे कथय | १२ | ३१ | ||
| औपसत्पमयादव | ९ | ११ | किरातसैन्यादुरुचाप | १४ | ४५ |
| क | |||||
| ककुदे वृषस्य कृत | १२ | २० |
२८ कि०
४३४ | किरातार्जुनीयम्
| पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद / श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| कुप्यताशुभ्रवतानत | ९ | ५३ | क्षीणयावकरसोऽप्यति | ९ | ६२ |
| कुररीगणः कृतरवस्तरवः | ५ | २५ | क्षुभितामिनिसुतः | १२ | ४५ |
| कुरु तन्मतिमेव | २ | २२ | क्षोभेण तेनाथ गणा | १७ | २२ |
| कुरु तात तपांस्यमार्ग | ११ | १३ | ख | ||
| कुसुमनगवनान्युपेत | १० | ३१ | खण्डिताशंशया तेषां | १५ | ३ |
| कुसुमितमवलम्ब्य | १० | ५३ | ग | ||
| कृतधृति परिवन्दिते | १८ | २१ | गणाधिपानामविधाय | १४ | ५४ |
| कृतप्रणामस्य महीं | १ | २ | गणयति नखलेखा | ९ | ७८ |
| कृतं पुरुषशब्देन | ११ | ७२ | गतान्पशूनां सहजन्म | ४ | १३ |
| कृतवानन्यदेहेषु | ११ | २६ | गतैः परेषामविभाव | १४ | ५२ |
| कृतानतिर्व्याहतसा | ४ | ४१ | गतैः सहावैः कलहंस | ८ | २९ |
| कृतान्तदुर्वृत्त इवा | १६ | २९ | गन्धमुद्धतरजःकण | ९ | ३१ |
| कृतारिषड्वर्गनयेन | १ | ९ | गभीररन्ध्रेषु भृशं मही | १४ | ४६ |
| कृतावधानं जितबर्हि | ४ | ३३ | गम्यतामुपगते नयनानां | ९ | ४ |
| कृतोर्मिरेखं शिथिलत्व | ४ | ६ | गुणसम्पदा समधिगम्य | ५ | २४ |
| कृष्णद्वैपायनादेशात् | ११ | ४६ | गुणानुरक्तामनुरक्त | १ | ३१ |
| को न्विमं हरितुरङ्ग | १३ | ५० | गुणापनादेन तदन्य | १४ | १२ |
| कोऽपवादः स्तुतिपदे | १२ | २५ | गृहक्रियारम्भफलं | १४ | ४२ |
| क्रान्तानां ग्रहचरितात् | ७ | १२ | गुरुस्थिराणुत्तम | १६ | २८ |
| क्रामद्भिर्धनपदवोमनेक | ५ | ३४ | गुरून्कुर्वन्ति ते वंश्यान् | ११ | ६४ |
| क्रियासुयुक्तैर्नृप | १ | ४ | गूढोऽपि वपुषा राजन् | ११ | ६ |
| क्रोधान्धकारान्तरितो | १७ | ९ | ग्रसमानमिवोजांसि | ११ | ७३ |
| क्लान्तोऽपि त्रिदशवधू | ७ | २१ | ग्रहविमानगणानभितो | ५ | १४ |
| क्व चिराय परिग्रहः | २ | ३९ | घ | ||
| क्षत्रियस्तनयः पाण्डोः | ११ | ४५ | घनपोत्रविदीर्णशाल | १३ | ३ |
| क्षययुक्तमपि स्वभावजं | २ | ११ | घनं विदार्यार्जुन | १४ | ५० |
| क्षितिनभःसुरलोक | ५ | ४ | घनानि कामं कुसुमानि | ८ | ४ |
| क्षिपति योऽनुवनं | ५ | ४५ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| च | जलदजालघनैरुसिता | ५ | ४८ | ||
| चञ्चलं वसु नितान्त | १३ | ५३ | जलोवसंमूर्च्छनमूच्छित | १६ | ५९ |
| चतसृष्वपि ते विवेकिनी | २ | ६ | जहातु नैनं कथमर्थ | ३ | १४ |
| चमरीगणगंगबलस्य | १२ | ४७ | जहार चास्मादचिरेण | १७ | ४४ |
| चयानित्वाद्रीनिव | १६ | ५२ | जहिहि कठिनता | १० | ५० |
| चलनेऽवनिञ्चलति | १२ | २८ | जहीहि कोपं दयितो | ८ | ८ |
| चारुचुम्बिशरारेची | १५ | ३८ | जिह्वाशतान्युल्लस | १६ | ३७ |
| चिचीपतां जन्मवतां | ३ | ११ | जोयन्तां दुर्जया देहे | ११ | १२ |
| चित्तनिवृत्तिविधायि | ९ | ७१ | जेतुमेव भवता | १३ | ५४ |
| चित्तवानसि कल्याणी | ११ | १४ | ज्वलत्सुतव जात | २ | २४ |
| चित्रीयमाणानति | १७ | ३१ | ज्वलतोऽनलादनु | १२ | ७ |
| चिरनियमकृशोऽपि | १० | १४ | ज्वलितं न हिरण्य | २ | २० |
| चिरमपि कलितान्य | १० | ४८ | त | ||
| च्युते स तस्मिन्त्रिपुधो | १७ | ३७ | तत उदय इव द्विरदे | १८ | १ |
| छ | ततः किरातस्य वचो | १४ | १ | ||
| छायां विनिर्भूय तमोमयीं | १६ | ३२ | ततः किराताधिपते | १६ | १ |
| ज | ततः प्रनष्टे सममेव | १५ | ५४ | ||
| जगदीशरणे युक्तो | १५ | ४५ | ततः प्रत्यात्यस्तमदा | १७ | १७ |
| जगतप्रसूतिर्जगदेक | ४ | ३२ | ततः शरच्चन्द्रकरा | ३ | १ |
| जटानां कीर्ण्या केशैः | ११ | ३ | ततः सकूजत्कलहंस | ४ | १ |
| जनैरुपग्राममनिन्द्य | ४ | १९ | ततः सदपं प्रतनु | १४ | ३५ |
| जन्येष्वतपसां | १३ | ६४ | ततः स संप्रेक्ष्य शरदगुणं | ४ | २० |
| जन्मिनोऽस्य स्थिति | ११ | ३० | ततः सुपर्णव्रजपक्ष | १६ | ४४ |
| जपतः सदा जपमुपांशु | १२ | ८ | ततस्तपोवीर्यसमुद्धतस्य | १७ | ३५ |
| जयमत्रभवान्नूनं | ११ | १८ | ततोऽप्रभूमि व्यवसाय | १७ | ५५ |
| जयारवक्ष्वेडितनाद | १४ | २९ | ततो धरित्रीधरतुल्य | १६ | ५५ |
| जयेन कश्चिद्धिरमेद्यं | १४ | ६२ | ततोऽनुपूर्वायतवृत्त | १७ | ५० |
| जरतोमपि विद्वाण | ११ | ७ | ततोऽपवादेन पताकिनी | १४ | २७ |
| तत्तदीयविशिखा | १३ | ५७ |
४३६ किराताजुनीयम्
| पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० | पाद/श्लोकांश | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| तत्तितिक्षितमिदं | १३ | ६८ | तरसा भुवनानि यो | १८ | १० |
| तत्र कार्मुकभृतं | १४ | ३५ | तरसैव कोऽपि भुवनैक | १२ | २१ |
| तथा न पूर्वं कृतभूषणा | ८ | ४१ | तवोत्तरोयं करिषमं | १८ | ३२ |
| तथापि जिह्यः स | १ | ८ | तस्मै हि भारोद्धरणे | १७ | १८ |
| तथापि विघ्नं नृप | ३ | १२ | तस्यातियत्नादति | १७ | १२ |
| तदनघ धनुरस्तु | १० | ५० | तस्याहवायासविलोल | १७ | ८ |
| तदभूरिवासस्कृतं | ६ | २९ | त शम्भुराक्षिसमहैषु | १७ | ४१ |
| तदलं प्रतिपक्ष | २ | १५ | तान्मूरिधाम्नश्चतुरोऽपि | ३ | ३१ |
| तदा रम्याण्यरम्याणि | ११ | २८ | तापसोपि विभुता | १३ | ३१ |
| तदासु कर्तुं त्वयि | १ | २५ | तामैक्षन्त क्षणं सभ्या | ११ | ५१ |
| तदाशु कुर्वन्वचनं | ३ | ५४ | तावदाश्रियते लक्ष्म्या | ११ | ६१ |
| तदुपैक्ष्य विघ्नयत | ६ | ४३ | तिरोहितश्वभ्रनिकुञ्ज | १४ | ३१ |
| तद्गणा ददृशुर्भीमं | १५ | ३५ | तिरोहितान्यानि नितान्त | ८ | ४७ |
| तनुमवजितलोक | १० | १५ | तिरोहितेन्दोरथ | १६ | १६ |
| तनुवारभसो भास्वान | १५ | २३ | तिष्ठतां तपसि पुण्य | १६ | ४४ |
| तनूरलक्तारुणपाणि | ८ | ५ | तिष्ठद्भिः कथमपि | ७ | १ |
| तपनमण्डलदीपितमेक | ५ | २ | तीरान्तराणि मिथुनानि | ८ | ५१ |
| तपसा कृशं वपुरुवाह | १२ | ६ | तुतोष पश्यन्कलभस्य | ४ | ४ |
| तपसा तथा न मुदमस्य | १८ | १४ | तुल्यरूपमसितोत्पल | ९ | १६ |
| तपसा निपीडितकृश | १२ | ३९ | तुषारलेखाकुलितो | १ | ३१ |
| तपोबलेनैव विधाय | १४ | ६० | तेजः समाश्रित्यपरै | १७ | ३ |
| तप्तानामुपदधिरे विषाण | ७ | १३ | तेन व्यातेनिरे भीमा | १५ | ४६ |
| तमतनुबनराजिश्यामितो | ४ | ३८ | तेन भूरिरुपकारिता | १३ | ४० |
| तमनतिशयनीयं सर्वतः | ५ | ५२ | तेनानिमित्तेन तथा | १७ | ४ |
| तमनिन्यवन्दिन इवेन्द्रः | ६ | २ | तेनानुजसहायेन | ११ | ४८ |
| तमाशुचक्षुःश्रवसां | १६ | ४२ | त्रयीमूतूनामिनिला | १४ | ४८ |
| तमुदीरितारुणजटांशु | १२ | १४ | त्रासजिह्मां यतश्चेष्टा | १५ | ३ |
| त्रिःसप्त कृत्वो जगती | १ | १८ |
श्लोकानुक्रमणिका
४३७
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| त्वमन्तकः स्याश्च | १८ | ३५ | द्युति वहन्ती वनिता | ८ | ९३ |
| त्वया माभू समारम्भि | ११ | १० | द्युवियद्गामिनो तार | १५ | ४३ |
| त्विषां ततिः पाटलिता | १६ | ३३ | द्योरुन्नतामेव दिशः | १६ | ३५ |
| द | द्रुतपदमभियातु | १० | २ | ||
| दक्षिणां प्रणतदक्षिणां | १८ | २७ | द्वारि चक्षुरधिपाणि | ९ | ४३ |
| ददृशेऽथ सबिस्मयं | १३ | १७ | द्विरदानिव द्विरिख | २ | २३ |
| दधत इव विलासशालि | ५ | ३२ | द्विषतः परासिसिपु | १२ | ३४ |
| दधतमाकरिभिः करिभिः | ५ | ७ | द्विषतामुदयः | २ | ८ |
| दधति क्षतोः परिणतः | ६ | ७ | द्विषतां विहितं | २ | १० |
| दनुजः स्विदयं क्षपाः | १३ | ८ | द्विषन्निमित्ता यदियं | १ | ४१ |
| दरीमुखैरासवराग | १६ | ४६ | द्विषां विघाताय | १ | ३ |
| दिङ्नागहस्ताकृति | १६ | ३८ | द्विषां क्षतोर्याः प्रथमे | १४ | ५५ |
| दिवः पृथिव्याः ककुभां | १४ | ५३ | ध | ||
| दिव्यस्त्रीणा सचरण | ५ | २३ | धनुः प्ररन्ध्रध्वनितं | १६ | २० |
| दिशः समूहन्निव | १४ | ५० | धर्मात्मजो धर्मनिवन्धि | ३ | ३४ |
| दीपयन्नथ नभः | ९ | २३ | धार्तराष्ट्रैः सह प्रीति | ११ | ५५ |
| दीपितस्त्वमनुभाव | १३ | ३८ | धाष्टर्यलङ्घितयथोचित | ९ | ७२ |
| दुरक्षाम्बोध्यता राज्ञा | ११ | ४७ | धूतानामभिमुखपातिभिः | ७ | ३ |
| दुरापदवनजयाया | ११ | ६३ | धृतिविसवलयावलि | १० | २४ |
| दुरासदानरीनूप्रान् | ११ | २३ | धृतिविसवलंय निधाय | १० | ४६ |
| दुर्वचं तदद्य मा स्म | १३ | ४९ | धूतहेतिरप्यधूतजिह्म | ६ | २४ |
| दुःशासनामर्षरजो | ३ | ४७ | धृतोत्पलापोड इव | १६ | १५ |
| दूनास्तेऽरिवलादूना | १५ | ३१ | धैर्याविसादेन हृतप्रसादा | ३ | ३८ |
| दृश्यतामयमनीकहा | १३ | ७० | धैर्येण विश्वास्यतया | ३ | १४ |
| दृष्टावदानाद्वयतेऽरि | १७ | १६ | ध्रुवं प्रणाशः प्रहितस्य | १४ | ९ |
| दृष्ट्वा दृश्यान्त्याचरणी | १८ | २८ | ध्वनिरगविवरेषु | १० | ४ |
| देवाकानिनि कावादे | १४ | २५ | ध्वंसेत हृदयं सद्यः | ११ | ५७ |
| द्यों निरून्धदतिनील | ९ | २० |
४३८ | किरातार्जुनीयम्
| न | स० | श्लो० | स० | श्लो० | |
|---|---|---|---|---|---|
| न ज्ञातं तात यत्तस्य | ११ | ४२ | निद्राविनोदितनितान्त | १ | ७५ |
| न तेन सज्यं क्वचिदु | १ | २१ | निपत्तिनेऽधिनिरोध | १८ | ६ |
| न ददाह मुहुर्वनानि | १२ | १६ | निष्पीयमानस्तबका | ८ | ६ |
| न दलति निचये | १० | ३९ | निबद्धनिश्वासविकम्पिता | ४ | १५ |
| ननु हो मथना राधो | १५ | २० | निमीलदाकेकरलोल | ८ | ५३ |
| न नोननुन्नो नुन्नोनो | १५ | २४ | निरञ्जनं साचिविलोकितं | ८ | ५२ |
| न पपात सन्निहित | १२ | ४ | निरत्ययं साम न दान | १ | १२ |
| न प्रसादमुचितं गमिता | १ | २५ | निरास्पदं प्रशनकुतूहलित्व | ३ | ९ |
| न मृगः खलु कोऽप्ययं | १३ | ६ | निरीक्ष्यमाणा इव | ४ | ३ |
| नयनादिव शूलिनः | १३ | २२ | निरीक्ष्यसंरम्भनिरस्त | ३ | ११ |
| न रागि चेतः परमा | १८ | ५१ | निर्याय विधाय दिनादि | ३ | २५ |
| नवपल्लवाञ्जलिभृतः | ६ | २६ | निवृत्तवृत्तोऽपयोधर | ८ | ७ |
| न वर्त्म कस्मैचिदपि | १४ | १४ | निशम्य सिद्धिं द्विषतां | १ | १७ |
| नवविनिद्रजपाकुसुम | ५ | ८ | निशातरोद्रेषु विकासतां | १४ | ३० |
| नवात्तपालोहितमाहितं | ४ | ८ | निशि तामिरितोऽभीको | १५ | २२ |
| न विरोधिनी रूपमियाय | १२ | ४६ | निःशेषं प्रशमितरेण | ७ | ३८ |
| न विसिस्मिये न विषसाद | १२ | ५ | निःशेषं शकलित | १७ | ६२ |
| न समयपरिरक्षणं | १ | ४५ | निःश्वासधूमैः स्थगितां | १६ | ११ |
| न सुखं प्रार्थये नार्थ | ११ | ६६ | निषण्णमापहप्रतिकार | १४ | ३७ |
| न सजो रुचिर | ९ | ३५ | विषादिसन्नाहमणि | १६ | १२ |
| नानारत्नज्योतिषां | ५ | ३६ | निसर्गदुर्बोधमबोध | १ | ६ |
| नाम्तरङ्गाः श्रियो जातु | ११ | २४ | निहते विडम्बित | १२ | ३८ |
| नाभियोक्तुमनुत | १३ | ५८ | निहितसरसयावकै | १० | ३ |
| नासुरोऽयं न वा नागो | १५ | १२ | नीतोच्छ्रायं मुहुरशिशिर | ५ | ३१ |
| निचायिनि लवली | १० | २९ | नीरन्ध्रं पयिषु रजो | ७ | २५ |
| निजह्निरे तस्य हरेषु | १७ | २६ | नीरन्ध्रं परिगमिते | १७ | ६ |
| निजेन नीतं विजितान्य | १४ | ३९ | नीलनौरजनिभेहिम | ९ | १९ |
| नुनोद तस्य स्थलपद्मिनी | ४ | ५ |