लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०५ भावार्थः—इस शब्द के सुं, अम् तथा सुप् में नौ नौ, भ्याम् भिस् आदि छः भकारादियों में छः छः, जस् शस् में तीन-तीन तथा शेष दसों में चार-चार रूप होते हैं। (यहां चकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन होता है।) —:: o ::— [लघु०] शकृत् । शकृती । शकृन्ति ॥ व्याख्या- शकृत् (विष्ठा) । उच्चारावस्करौ शमलं शकृत् इत्यमरः । शकृत् + सुं । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व प्रक्रिया करने से—शकृत्, शकृद् । शकृत् + औ = शकृत् + शी = शकृती । - शकृत् + जस् = शकृत् + शि । झलन्त होने से नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुँम् आगम, अनुस्वार और परसवर्ण करने पर—शकृन्ति । रूपमाला यथा— प्र० शकृत्-द् शकृती शकृन्ति | प० शकृतः शकृद्भ्याम् शकृद्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, शकृतोः शकृताम् तृ० शकृता शकृद्भ्याम् शकृद्भिः | स० शकृति ,, शकृत्सु च० शकृते ,, शकृद्भ्यः | सं० हे शकृत्-द्! हे शकृती! हे शकृन्ति! इसी प्रकार—यकृत् (जिगर) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं।¹ [लघु०] ददत् । ददती ॥ व्याख्या- ददत् (देता हुआ कुल आदि) । शत्रन्तोऽयम् । ददत् + सुं । सुं का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व-प्रक्रिया से—ददत्, ददद् । ददत् + औ = ददत् + शी = ददती । ददत् + जस् = ददत् + शि = ददत् + इ । यहां उगिदचां० (२८६) सूत्र द्वारा अथवा नपुंसकस्य झलचः (२३६) सूत्र द्वारा नित्य नुँम् का आगम प्राप्त होता है, परन्तु उसे अभ्यस्तम् (३४४) से अभ्यस्तसञ्ज्ञा होकर नाभ्यस्ताच्छतुः (३४५) द्वारा उस का निषेध हो जाता है। अब वैकल्पिक नुँम् करने के लिये अग्रिम- सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(३६४) वा नपुंसकस्य ।७।१।७६॥ अभ्यस्तात् परो यः शता तदन्तस्य क्लीबस्य वा नुँम् सर्वनामस्थाने । ददन्ति, ददति ॥ अर्थः—अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे जो शतृँ प्रत्यय तदन्त नपुंसकलिङ्ग को सर्व- नामस्थान परे होने पर विकल्प से नुँम् का आगम हो जाता है । १. पद्-दन्-नो-मास्-हृत्-निश्र्-असन्-यूषन्-दोषन्-यकन्-शकन्-उदन्-आसन् शस्प्रभृ- तिषु (६.१.६१) सूत्रद्वारा शस् आदि विभक्तियों में यकृत् को यकन् तथा शकृत् को शकन् ये वैकल्पिक आदेश भी हो जाते हैं। इन का विवेचन सिद्धान्त-कौमुदी में देखें ।
व्याख्या—अभ्यस्तात् ।५।१। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। नपुंसकस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। नुँम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से)। अर्थ—(अभ्य- स्तात्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे (शतुः) जो शतृँ प्रत्यय, तदन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प कर के (नुँम्) नुँम् हो जाता है (सर्वनाम- स्थाने) सर्वनामस्थान परे हो तो। ददत् + इ। यहां 'शि' यह सर्वनामस्थान परे है, अभ्यस्त होने से'नाभ्यस्ताच्छतुः (३४५) से नुँम्निषेध प्राप्त था, पर नपुंसकत्व में प्रवृत्तसूत्र से विकल्प से नुँम् का आगम होकर अनुस्वार-परसवर्ण करने से—'ददन्ति, ददति' ये दो रूप बनते हैं। नपुं- सक में 'ददत्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ददत्,-द् ददती ददन्ति,ददति पं० ददतः ददद्भ्याम् ददद्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, ष० ,, ददतोः ददताम् तृ० ददता ददद्भ्याम् ददद्भिः स० ददति ,, ददत्सु च० ददते ,, ददद्भ्यः सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है। [लघु०] तुदन् ॥ व्याख्या—तुदत् (दुःख देता हुआ कुल आदि)। शत्रन्त। तुदँ व्यथने (तुदा० उभं०) धातु से शतृँ प्रत्यय, उस की सार्वधातुकसञ्ज्ञा, तुदादिभ्यः शः (६५१) से श प्रत्यय, अनुबन्धलोप और अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने से—'तुदत्' शब्द निष्पन्न होता है। तुदत्+सुँ। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् होकर जश्त्व-चर्त्व करने से—तुदत्, तुदद्। तुदत्+औ=तुदत्+ई (शी)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधिसूत्रम्—(३६५) आच्छीनद्योर्नुम् ।७।१।८०॥ अवर्णान्तादङ्गात्परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नुँम् वा शीनद्योः। तुदन्ती, तुदती। तुदन्ति॥ अर्थः—अवर्णान्त अङ्ग से परे जो शतृँ प्रत्यय का अवयव तदन्त अङ्ग को विकल्प करके नुँम् का आगम हो जाता है शी या नदी परे हो तो। व्याख्या—आत् ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति- विपरिणाम हो जाता है)। शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से)। अङ्गस्य ।६।१। (अधि- कृत है)। वा इत्यव्ययपदम्। (वा नपुंसकस्य से)। नुँम् ।१।१। शीनद्योः ।७।२। 'आत्' यह 'अङ्गात्' का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि हो कर 'अवर्णान्तात्' बन जाता है। अर्थः—(आत्=अवर्णान्तात्) अवर्णान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (शतुः) जो शतृँ- प्रत्यय का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (वा) विकल्प करके (नुँम्) नुँम् हो जाता है (शीनद्योः) शी और नदी परे हो तो। 'नदी' से यहां ङीप् आदि इष्ट हैं।
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०७ तुदत् + ई । यहां 'तुद्' यह अवर्णान्त अङ्ग है, इस से परे 'त्' यह शतृँ का अवयव है । तदन्त अङ्ग 'तुदत्' है । इस से परे शी के रहने से विकल्प कर के नुँम् का आगम हो जाता है । नुँम्-पक्ष में अनुस्वार परसवर्ण प्रक्रिया करने पर—तुदन्ती । नुँम् के अभाव में—तुदती । तुदत् + जस् = तुदत् + शि । सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर झलन्त होने से नपुंस- कस्य झलचः (२३६) ने नुँम् का आगम हो कर अनुस्वार-परसवर्ण-प्रक्रिया करने से—'तुदन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० तुदत्-द् तुदन्ती,तुदती तुदन्ति | प० तुदतः तुदद्भ्याम् तुदद्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, तुदतोः तुदताम् तृ० तुदता तुदद्भ्याम् तुदद्भिः | स० तुदति ,, तुदत्सु च० तुदते ,, तुदद्भ्यः | सं० सम्बोधन प्रथमावत् होता है । प्रकृतसूत्र से भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि शत्रन्त तथा अदादिगण की 'या, पा' आदि आकारान्त शत्रन्त धातुओं से तथा स्य के आगे शतृँ प्रत्यय होने पर नपुं- सक के द्विवचन शी में अङ्ग को वैकल्पिक नुँम् का आगम प्राप्त होता है । इस पर भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्त धातुओं को अग्रिमसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६६) शप्श्यनोर्नित्यम् ७।१।८१॥ शप्श्यनोरात् परो यः शतुरवयवस्तदन्तस्य नित्यं नुँम् शीनद्योः । पचन्ती । पचन्ति । दीव्यत् । दीव्यन्ती । दीव्यन्ति ॥ अर्थः– शप् वा श्यन् के अवर्ण से परे जो शतृँप्रत्यय का अवयव (त्), तदन्त अङ्ग को नित्य नुँम् का आगम हो जाता है शी अथवा नदी¹ परे हो तो । व्याख्या—शप्श्यनोः ।६।२। आत् ।५।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । शतुः ।६।१। (नाभ्यस्ताच्छतुः से) । अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । नित्यम् ।२।१। (क्रिया- विशेषणम्) । नुँम् ।१।१। (आच्छीनद्योर्नुम् से) । अर्थः–(शप्श्यनोः) शप् वा श्यन् के (आत्) अवर्ण से परे (शतुः) जो शतृँ का अवयव, तदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग का अवयव (नित्यम्) नित्य (नुँम्) नुँम् हो जाता है (शीनद्योः) शी अथवा नदी परे हो तो । भ्वादि और चुरादिगण में शप् तथा दिवादिगण में श्यन् विकरण हुआ करता है। भ्वादि, चुरादि तथा दिवादिगणीय शत्रन्तों की इस सूत्र से शी या नदी (ङीप् आदि) परे होने पर नित्य नुँम् का आगम हो जाता है । पचत् (पकाता हुआ कुल आदि) । पच् (डुपचँष् पाके) यह भ्वादिगणीय उभयपदी धातु है । इस से परे लँट् को शतृँप्रत्यय तथा शप् विकरण हो कर—पच् शप् १. नदी के उदाहरण 'भवन्ती, दीव्यन्ती' आदि हैं ।
५०८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
शतृँ = पच् अ अत् । अब यहां यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् (१३३) सूत्र द्वारा पच् + अ = 'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा होकर अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने से 'पचत्' शब्द निष्पन्न होता है । पचत् + औ = पचत् + ई (शी) । यहां अन्तादिवच्च (४१) की सहायता से 'पच' की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है । इस से परे 'त्' यह शतृँ-प्रत्यय का अवयव है, तदन्त अङ्ग 'पचत्' है । इस से परे 'शी' के रहने से प्रकृतसूत्र द्वारा नित्य नुँम् का आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया हो जाती है—पचन्ती । पचत् + जस् = पचत् + शि । झलन्त होने से नुँम् का आगम और पूर्ववत् अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—'पचन्ति' प्रयोग सिद्ध होता है । 'पचत्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा— प्र० पचत्-द् पचन्ती पचन्ति । प० पचतः पचद्भ्याम् पचद्भ्यः द्वि० „ „ „ । ष० „ पचतोः पचताम् तृ० पचता पचद्भ्याम् पचद्भिः । स० पचति „ पचत्सु घ० पचते „ पचद्भ्यः । सं० हे पचत्-द् ! पचन्ती ! पचन्ति ! इसी प्रकार—गच्छत् (जाता हुआ), चलत् (चलता हुआ), भवत् (होता हुआ), नयत् (ले जाता हुआ), नमत् (नमस्कार करता हुआ), वदत् (बोलता हुआ) इत्यादि भ्वादिगणीय तथा चोरयत् (चुराता हुआ) प्रभृति चुरादिगणीय धातुओं के रूप भी समझ लेने चाहियें । दीव्यत् (खेलता हुआ वा चमकता हुआ कुल आदि) दिवुँ क्रीडाविजिगीषा० (दिवा० प०) धातु से लँट्, शतृँ प्रत्यय तथा श्यन् विकरण होकर—दिव् + श्यन् + शतृँ = दिव् य अत् । अब हलि च (६१२) से उपधादीर्घ तथा अतो गुणे (२७४) से पररूप एकादेश करने पर 'दीव्यत्' शब्द निष्पन्न होता है । दीव्यत् + औ = दीव्यत् + ई (शी) । यहां श्यन् के यकारोत्तर अवर्ण से परे शतृँ का अवयव तकार विद्यमान है, अतः तदन्त 'दीव्यत्' को शी परे होने पर नित्य नुँम् का आगम होकर अनुस्वारपरसवर्णप्रक्रिया करने से—दीव्यन्ती । जस् में पूर्ववत्—दीव्यन्ति । 'दीव्यत्' की नपुंसक में रूपमाला यथा-- प्र० दीव्यत्-द् दीव्यन्ती दीव्यन्ति । प० दीव्यतः दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भ्यः द्वि० „ „ „ । ष० „ दीव्यतोः दीव्यताम् तृ० दीव्यता दीव्यद्भ्याम् दीव्यद्भिः । स० दीव्यति „ दीव्यत्सु च० दीव्यते „ दीव्यद्भ्यः । सं० हे दीव्यत्-द् ! दीव्यन्ती ! दीव्यन्ति ! इसी प्रकार—सीव्यत् (सीता हुआ), अस्यत् (फेंकता हुआ), कुप्यत् (क्रोध करता हुआ), शुष्यत् (शुद्ध होता हुआ) इत्यादि दिवादिगणीय शत्रन्तों के रूप होते हैं । शत्नन्तों पर विशेष स्मरणीय— (१) अभ्यस्तसञ्ज्ञक शब्द। इस श्रेणी में ददत्, दधत्, जुह्वत्, बिभ्यत्,
हलन्त-नपुंसकालिङ्ग-प्रकरणम् ५०६ जाग्रत्, जक्षत्, दरिद्रत् प्रभृति शब्द आते हैं। इन शब्दों को 'शी' में नुम् का आगम प्राप्त नहीं होता । 'शि' में वा नपुंसकस्य (३६४) से विकल्प कर के नुम् हो जाता है। (२) शप् वा श्यन् विकरण के शत्रन्त । भ्वादि और चुरादिगणीय धातुओं से शप्-विकरण तथा दिवादिगणीय धातुओं से श्यन्विकरण हुआ करता है। इन के शत्रन्तों को शी तथा शि दोनों में नित्य नुम् का आगम हो जाता है। यथा - भवत्, भवन्ती, भवन्ति । चोरयत्, चोरयन्ती, चोरयन्ति । दीव्यत्, दीव्यन्ती, दीव्यन्ति । (३) तुदादि, आकारान्त अदादि तथा लुटः सद्वा (८३५) के शत्रन्त । इन से शी में आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) द्वारा वैकल्पिक तथा शि में नपुंसकस्य झलचः (३६६) से नित्य नुम् का आगम हो जाता है। यथा - तुदत्, तुदन्ती-तुदती, तुदन्ति । यान्ती-याती, यान्ति । भविष्यत्, भविष्यन्ती-भविष्यती, भविष्यन्ति । (४) उपर्युक्त गणों से भिन्नगणीय धातुओं के शत्रन्त । इस श्रेणी में 'शी' परे नुम् आगम बिलकुल नहीं होता । 'शि' में झलन्तत्वात् नित्य नुम् होता है। (स्वादिगणीय) मुष्णत्, मुष्णती, मुष्णन्ति । (तनादिगणीय) कुर्वत्, कुर्वती, कुर्वन्ति । श्यन्त शप्तन्त शब्द उगित् हुआ करते हैं; अतः स्त्रीत्व की विवक्षा में उगितश्च (१०५) सूत्र से ङीप् प्रत्यय होता है। ङीप् के अनुबन्धों का लोप होकर 'ई' अवशिष्ट रह जाता है। यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से 'ई' की नदीसञ्ज्ञा है। तब 'शी' में जैसे २ नित्य वा वैकल्पिक नुम् होता है। वैसे २ नित्य वा वैकल्पिक नुम् 'ई' परे होने पर भी हो आता है। यथा-शप् और श्यन् विकरणीय धातुओं से शी में नित्य नुम् होता है, तो नदीसञ्ज्ञक 'ई' में भी नित्य नुम् हो जायेगा। तथाहि— (नपुंसक 'शी' (औ) में) (नदीसञ्ज्ञक 'ई' अर्थात् स्त्रीलिङ्ग में) श्यन्विकरणीय वा शब्विकरणीय { १ भवन्ती भवन्ती, भवन्त्यौ, भवन्त्यः । नदीवत् २ नमन्ती नमन्ती, नमन्त्यौ, नमन्त्यः । " ३ पतन्ती पतन्ती, पतन्त्यौ, पतन्त्यः । " ४ चोरयन्ती चोरयन्ती, चोरयन्त्यौ, चोरयन्त्यः । " ५ गणयन्ती गणयन्ती, गणयन्त्यौ, गणयन्त्यः । " ६ दीव्यन्ती दीव्यन्ती, दीव्यन्त्यौ, दीव्यन्त्यः । " ७ अस्यन्ती अस्यन्ती, अस्यन्त्यौ, अस्यन्त्यः । " ८ श्राम्यन्ती श्राम्यन्ती, श्राम्यन्त्यौ, श्राम्यन्त्यः । " तुदादिगणीय, आकारान्त अदादिगणीय तथा लुटः सद्वा (८३५) वाले शत्रन्तों से 'शी' में वैकल्पिक नुम् होता है तो 'ई' में भी वैकल्पिक नुम् होगा । तथाहि — तुदादि० { १. तुदन्ती, तुदती { तुदन्ती, तुदन्त्यौ, तुदन्त्यः । नदीवत् { तुदती, तुदत्यौ, तुदत्यः । " { २. लिखन्ती, लिखती { लिखन्ती, लिखन्त्यौ, लिखन्त्यः । " { लिखती, लिखत्यौ, लिखत्यः । "
५१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अब बालकों के अभ्यासार्थ नीचे कुछ शतृन्त अपने श्रेणीबोधक अङ्कसहित लिखे जाते हैं— १ चलत् (२), २ बिन्दत् (३), ३ जाग्रत् (१), ४ पठन् (२), ५ विशत् (३) ६ शासत् (१), ७ लिखत् (३), ८ विश्राम्यत् (२), ६ विध्यत् (१), १० ध्रुवत् (४), ११ दण्डयत् (२), १२ सृजत् (३), १३ दधत् (१), १४ मुञ्चत् (३), १५ कुर्वत् (४), १६ कथयत (२) १७ नृत्यत् (२), १८ जुह्वत् (१), १६ सिञ्चत (३), २० यात् (३) २१ करिष्यन् (३) ॥ (यहाँ तकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] धनुः । धनुषी । मान्त० (३४२) इति दीर्घ । नुम्विसर्जनी० (३५२) इति ष । धनूंषि । धनुषा । धनुर्भ्याम् । एवम्—चक्षुर्हविरादयः। पचताम् व्याख्या— धन धान्ये (जुहो० प०) अथवा धन शब्दे (भ्वा० पचतुम् अपठित) धातु से अति-पॄ-वपि यजि तनि धनि-तपिभ्यो नित् (उणा० पचन्ती ! पचन्ति ! औणादिक उस प्रत्यय होकर आदेशप्रत्यययोः (१५०) से प्रत्यय षे [L14_right] १, भवत् (होना करने से 'धनुष्' (कमान) शब्द निष्पन्न होता है। [L15_right] (बोलता हुआ) आकारान्त अदा० { ३ यान्ती, याती { यान्ती, यान्त्यौ, यान्त्य । [L16_right] धातुओं के [L17_left] { ४ पान्ती, पाती { पान्ती, पान्त्यौ, पान्त्य । [L17_right] शीपा० [L18_left] { पाती, पात्यौ, पात्य । [L18_right] " लुट्. सङ्घा { ५ करिष्यन्ती, करिष्यन्ती { करिष्यन्ती, करिष्यन्त्यौ, करिष्यन्त्य } " उपयुक्त गणों से भिन्नगणीय शतृन्त धातुओं के 'शी' में नुम् नहीं होता अत नदीसञ्ज्ञक 'ई' मे भी नुंम् न होगा । तथाहि— क्रया० { १ अश्नती । अश्नती, अश्नत्यौ, अश्नत्य । } नदीवत् { २ मुष्णती । मुष्णती, मुष्णत्यौ, मुष्णत्य । } " अदा० { ३ अदती । अदती, अदत्यौ, अदत्य । } " { ४ घ्नती । घ्नती, घ्नत्यौ, घ्नत्य । } " जुहो० { ५ जुह्वती । जुह्वती, जुह्वत्यौ, जुह्वत्य । } " { ६ ददती । ददती, ददत्यौ, ददत्य । } " स्वा० { ७ प्राप्नुवती । प्राप्नुवती, प्राप्नुवत्यौ, प्राप्नुवत्य । } " { ८ शृण्वती । शृण्वती, शृण्वत्यौ, शृण्वत्य । } " तना० { ९ कुर्वती । कुर्वती, कुर्वत्यौ, कुर्वत्य । } " { १० तन्वती । तन्वती, तन्वत्यौ, तन्वत्य । } " रुधा० { ११ जानती । जानती, जानत्यौ, जानत्य. । } " { १२ रुन्धती । रुन्धती, रुन्धत्यौ, रुन्धत्य । } "
हलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५११ धनुष् + स् (सुँ) । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक् हो कर आदेश- प्रत्यययोः (८.३.५६) द्वारा किये गये षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर ससजुषो रुः (८.२.६६) से रुँ तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'धनुः' प्रयोग सिद्ध होता है । धनुष् + औ । नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप करने से—धनुष् + ई = धनुषी । धनुष् + जस् = धनुष् + इ (शि) । नपुंसकस्य झलचः (२३६) द्वारा नुँम् का आगम और सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) से सान्त संयोग के नकार की उपधा को दीर्घ कर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से षकार को सकार हो कर—धनून्स्
- इ । अब नश्चाऽपदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार तथा उनके व्यवधान में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२) द्वारा सकार को पुनः षत्व हो कर 'धनूंषि' प्रयोग सिद्ध होता है । भ्याम्, भिस्, भ्यस् में षत्व के असिद्ध होने से ससजुषो रुः (१०५ से रुँत्व हो कर रेफ का ऊर्ध्वगमन करने पर—धनुर्भ्याम्, धनुर्भिः, धनुर्भ्यः । धनुष् + सु (सुप्) । यहां षत्व के असिद्ध होने से उसे सकार समझ कर ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व हो जाता है । अब रेफ को विसर्ग आदेश हो कर वा शरि (१०४) से एक पक्ष में वैकल्पिक विसर्ग आदेश और दूसरे पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश हो जाता है—'धनुः सु, धनुस् सु' । अब प्रथम रूप में विसर्ग के व्यवधान में तथा दूसरे रूप में शर्-सकार के व्यवधान में नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि (३५२) सूत्र द्वारा प्रत्यय के सकार को षकार हो कर—धनुःषु, धनुस्सु । अब सकार- पक्ष में ष्टुना ष्टुः (६४) से ष्टुत्वद्वारा प्रथम सकार को भी षकार करने से—'धनुःषु, धनुष्षु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं । 'धनुष्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० धनुः धनुषी धनूंषि | प० धनुषः धनुर्भ्याम् धनुर्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | प० ,, धनुषोः धनुषाम् तृ० धनुषा धनुर्भ्याम् धनुर्भिः | स० धनुषि ,, धनुःषु,-ष्षु च० धनुषे ,, धनुर्भ्यः | सं० हे धनुः ! हे धनुषी ! हे धनूंषि ! इसी प्रकार—१. वपुष् = शरीर । २. हविष् = होम में प्रक्षेप्य घृतादि । ३. चक्षुष् = नेत्र । ४. जनुष् = जन्म । ५. यजुष् = यजुर्वेद । ६. ज्योतिष् = नक्षत्र । ७. आयुष् = आयु । ८. अरुष् = मर्म । ६. अर्चिष् = प्रकाश । १०. सर्पिष् = घृत । ११. तनुष् = शरीर । इत्यादि शब्दों के रूप होते हैं ।¹ १. कई वैयाकरण इन धनुष् आदि शब्दों को सकारान्त मान कर ही स्वादिप्रत्यय लाते हैं और बाद में जहां-जहां सूत्रप्रवृत्ति हो सके षत्व कर लेते हैं । उन का कथन है कि यदि इन को षकारान्त मान कर स्वादि प्रत्ययों की उत्पत्ति मानेंगे तो उणा- दयोऽव्युत्पन्नानि प्रातिपदिकानि (परिभाषा)—इस अव्युत्पत्तिपक्ष में ससजुषो रुः
५१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] पयः। पयसी। पयांसि। पयसा। पयोभ्याम् ॥ व्याख्या—पयस् (जल वा दूध)। पयः क्षीरं पयोऽम्बु च इत्यमरः। पयस् + सुँ। सुंलुक् होकर रुत्व विसर्ग करने से—पयः। पयस् + औ—पयस् + शी = पयस् + ई = पयसी। पयस् + जस् - पयस् + इ (शि)। नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुँम् का आगम, सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) से उपधादीर्घ तथा नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से अनुस्वार होकर — पयांसि। पयस् + भ्याम्। यहां ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—पयोभ्याम्। रूपमाला यथा— प्र० पयः पयसी पयांसि पं० पयसः पयोभ्याम् पयोभ्यः द्वि० ,, ,, ,, ष० ,, पयसोः पयसाम् तृ० पयसा पयोभ्याम् पयोभिः स० पयसि ,, पयस्सु,-स्सु च० पयसे ,, पयोभ्यः सं० हे पयः ! हे पयसी ! हे पयांसि ! । इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप होते हैं— शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ अनस् = छकड़ा छन्दस् = छन्द रहस् = एकान्त अम्भस् = जल तपस् = तप रहस् = वेग अयस् = लोहा तमस् = अन्धकार रेतस् = वीर्य अर्णस् = जल तरस् = वेग रोधस् = तट अर्शस् = बवासीर तेजस् = तेज वक्षस् = छाती आगस् = अपराध नभस् = आकाश वचस् = वचन उरस् = छाती पाथस् = जल वर्चस् = तेज ऋक्षस् = चहूँटा मनस् = मन वयस् = आयु, पक्षी एधस् = ईंधन महस् = तेज वासस् = कपड़ा एनस् = पाप मदस् = चर्बी शिरस् = सिर ओकस् १ = घर यशस् = यश श्रवस् = कान ओजस् = बल, तेज यादस् = जलजन्तु सरस् = तालाब अहस् = पाप रक्षस् = राक्षस स्रोतस् = झरना चेतस् = चित्त रजस् = धूल सहस् = बल (१०५) की प्रवृत्ति न हो सकेगी क्योंकि वहां सकार तो होगा नहीं षकार होगा। अन्य लोगों का कथन है कि उणादयो बहुलम् (८४८) में 'बहुलम्' ग्रहण के कारण सर्वप्रकार के व्यभिचारों की निवृत्ति हो जाती है कोई दोष नहीं आता। अन्यथा षकारान्त मान कर भी अव्युत्पत्तिपक्ष में 'धनुषा, यजुषा' आदि में प्रत्यय का अवयव न होने से आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व न हो सकेगा। १ इसी का कूट प्रश्न पूछा जाता है—कदापुरोकसो भवन्तः ? । 'कदा-अगुः, ओकसो भवन्' यह छेद है (आप घर में कब गये ?)।
ये ही शब्द जब बहुव्रीहि में किसी के विशेषण बन जायें, तब नपुंसकलिङ्ग में तो उच्चारण इसी प्रकार होगा। परन्तु पुंल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग में 'वेधस्' के समान उच्चारण होगा— प्रसन्नमनाः पुरुषः, प्रसन्नमनाः स्त्री। प्रसन्नमनसः पुमांसः स्त्रियो वा। प्रसन्नमनसं पुमांसं स्त्रियं वा। [लघु०] सुपुम्। सुपुंसी। सुपुमांसि ॥ व्याख्या—शोभनाः पुमांसो यस्मिन् तत् सुपुम् (कुलम्)। जिस कुल या नगर आदि में सुन्दर या अच्छे पुरुष हों उस कुल या नगर आदि को 'सुपुंस्' कहते हैं। सुपुंस्+सुँ। यहां सुँ का लुक् होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) द्वारा सकार का भी लोप हो जाता है। अब निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः द्वारा अनुस्वार अपने पूर्व वाले रूप मकार में परिणत हो जाता है—सुपुम्। सुपुंस्+औ = सुपुंस्+शी = सुपुंस्+ई = सुपुंसी। सुपुंस्+जस्। यहां जस् के स्थान पर भावी 'शि' सर्वनामस्थान की विवक्षा में पुंसोऽसुङ् (३५४) द्वारा असुङ् आदेश हो कर—सुपुमस्+जस्। पुनः 'शि' आदेश, झलन्तलक्षण नुँम्, सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ तथा नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से अनुस्वार होकर—सुपुमांसि। 'सुपुंस्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा— प्र० सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि | प० सुपुंसः सुपुम्भ्याम् सुपुम्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, सुपुंसोः सुपुंसाम् तृ० सुपुंसा सुपुम्भ्याम् सुपुम्भिः | स० सुपुंसि ,, सुपुंसु च० सुपुंसे ,, सुपुम्भ्यः | सं० हे सुपुम्! हे सुपुंसी! हे सुपुमांसि ! नोट—वस्वन्त नपुंसकों का उच्चारण—विद्वत्-द्, विदुषी, विद्वांसि। उपे- यिवत्, उपेयुषी, उपेयिवांसि। उपेयिवद्भ्याम्। उपेयिवत्सु। इस प्रकार होगा। अन्य सकारान्तों का नपुंसक में—ज्यायः, ज्यायसी, ज्यायांसि आदि। [लघु०] अदः। विभक्तिकार्यम्। उत्व-मत्वे। अमू। अमूनि। शेषं पुंवत् ॥ व्याख्या—अब 'अदस्' शब्द के नपुंसक में रूप सिद्ध किये जाते हैं— अदस्+सुँ। सुँलुक् होकर रुँत्व विसर्ग करने से—अदः¹। अदस्+औ=अदस्+ई (शी)। उत्व-मत्व के असिद्ध होने से प्रथम त्यदा- द्यत्व, पररूप, और गुण एकादेश होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) सूत्र से एकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—अमू। अदस्+जस्=अदस्+शि। त्यदाद्यत्व, पररूप, नुँम् आगम तथा उपधादीर्घ (१७७) होकर—अदानि। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः(३५६) सूत्र से उत्व-मत्व करने से—अमूनि। १. यहां अदस् शब्द के सान्त होने से अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) द्वारा उत्व-मत्व नहीं होता। विभक्ति परे न होने के कारण त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से अत्व भी नहीं हो सकता। ल० प्र० (३३)
५१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् द्वितीया में भी इसी तरह प्रयोग बनते हैं। शेष प्रक्रिया पुंवत् होती है। नपुंसक में 'अदस्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० अद अमू अमूनि | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० अमुष्य अमुयोः अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभिः | स० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्यः | सम्बोधन नहीं होता। (यहाँ सकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) अभ्यास (४८) (१) 'ऊर्जि' पर नश्छान्तां संयोग लिखने की क्या आवश्यकता थी ? (२) नपुंसक में भसञ्ज्ञा और सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा कहाँ २ होती है ? (३) हलन्तनपुंसक में ऐसा कौन सा शब्द है जिसके सुँ और अम् के रूपों में भेद होता है ? (उत्तर—अन्वादेश में 'इदम्' शब्द) । (४) गविपक्ष के 'गवाक्षु' में चयो द्वितीया० क्या प्रवृत्त नहीं होता ? (५) धनुस् को सान्त मानें या षान्त ? विवेचन करें। (६) 'अद' प्रयोग में त्यदाद्यत्व तथा उत्व-मत्व क्यों नहीं होते ? (७) 'इदम्' के नपुंसक के अन्वादेश में 'एनत्' क्यों विधान किया गया है, क्या 'एन' आदेश से काम नहीं चल सकता था ? (८) नपुंसक में शवन्त शब्द चार प्रकार के होते हैं—स्पष्ट करें। (६) वारि, ददति, तुदति, पचति, दीव्यति, दीव्यन्ति, ये, इमे, ते, ये, एते— प्रयोग क्या अन्यशब्द वा धातु की वा अन्य विभक्ति की भ्रान्ति तो उत्पन्न नहीं कराते ? स्पष्ट करें। (१०) 'गो शब्द्' शब्द के १०६ रूपों की सङ्क्षिप्तरीत्या सिद्धि करें। (११) गवाक्शब्द के १०६ रूपों की सङ्ख्या पर आपत्ति उठाते हुए उन का समाधान करें। (१२) तत्, यत्, एनत्—में तदोः सः० द्वारा सकारादेश क्यों न हो ? (१३) 'वार्षु' में शर् परे होने पर रेफ को विसर्ग आदेश क्यों नहीं होता ? (१४) ऊर्जि, चत्वारि, सुपुमांसि, धनूंषि, पयोभिः, धनुष्षु, तपांसि, हे दण्डि, सुपन्थानि, अह्री, इमे, श्वनडुत्, अमूनि—इन प्रयोगों की सूत्रनिर्देश- पूर्वक सिद्धि करें। [लघु०] इति हलन्ता नपुंसकलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ.—यहाँ हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों का प्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—षड्लिङ्गप्रकरण भी यहाँ समाप्त समझना चाहिये। -: ० :- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यां हलन्त-नपुंसकलिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ [समाप्ता चात्र षड्लिङ्गी बोध्या ॥]
अथाऽव्यय-प्रकरणम् संस्कृतसाहित्य में दो प्रकार के शब्द पाये जाते हैं। १. विकारी, २. अवि- कारी। जो शब्द विभक्तिवचनवशात् विकार को प्राप्त होते हैं वे 'विकारी' कहाते हैं। इस कोटि में सुंबन्त¹ और तिङन्त शब्द आते हैं। जो शब्द सदा सब विभक्तियों में विकाररहित अर्थात् एकसमान रहते हैं वे 'अविकारी' कहाते हैं। यथा—च, न, यदि, अपि, नाना, विना आदि । व्याकरण में अविकारी शब्दों को 'अव्यय' कहते हैं। अब यहां उन अव्ययों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३६७) स्वरादिनिपातमव्ययम् । १।१।३६॥ स्वरादयो निपाताश्चाव्ययसञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थः—स्वर् आदि शब्द तथा निपात अव्ययसञ्ज्ञक हों। व्याख्या —स्वरादिनिपातम् ।१।१। अव्ययम् ।१।१। समासः—'स्वर्' शब्द आदिर्येषान्ते स्वरादयः । स्वरादयश्च निपाताश्च = स्वरादिनिपातम् । समाहारद्वन्द्वः । अर्थः—(स्वरादिनिपातम्) स्वर् आदि शब्द तथा निपात (अव्ययम्) अव्ययसञ्ज्ञक होते हैं। स्वरादि शब्द पाणिनिमुनिविरचित 'गणपाठ' में पढ़े गये हैं। निपात— अष्टा- ध्यायी के प्रथमाध्याय के चतुर्थपादान्तर्गत प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधि- कार में पढ़े गये हैं। अव्ययसञ्ज्ञा का प्रयोजन सुंल्लुक् आदि आगे मूल में ही स्पष्ट हो जायेगा । अब मूलगत स्वरादिगण—अर्थ, उदाहरण तथा विस्तृत टिप्पण सहित नीचे दिया जा रहा है। इस गण में बालोपयोगी अत्यन्त प्रसिद्ध शब्दों पर चिह्न () कर दिया गया है। स्वरादि-गण [१] स्वर् ॥ स्वर्गे परे च लोके स्वः—इत्यमरः । १. स्वर्ग-लोक—पुण्यकर्माणः स्वर्गच्छन्ति । देवाः स्वस्तिष्ठन्ति । २. परलोक—स्वर्गतस्य क्रिया कार्या पुत्रैः परमभक्तितः (उद्धृत)। ३. सुखविशेष—यन्न दुःखेन सम्भिन्नं न च ग्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीतं च तत्सुखं स्वःपदास्पदम् (तन्त्रवार्त्तिक) । [२] अन्तर्* ॥ १. में, अन्दर, भीतर, मध्य आदि—अप्स्र्वन्तरमृतम् अप्सु भेषजम् (ऋ० १. २३.१६), जल में अमृत है जल में औषध है। अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्ति- रस्क्रियां लभते । निवसन्नन्तर्दहने लङ्घ्यो वह्निर्न तु ज्वलितः (पञ्च० १. ३२) । अन्तर्यश्च मुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मृग्यते (विक्रमो०), निरुद्धप्राण मुमुक्षुओं से वह १. यहां सुंवन्त से तात्पर्य अव्ययभिन्न सुंवन्तों से है।
५१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
भगवान् अन्दर अर्थात् अपने हृदय में खोजा जाता है। इन अर्थों में इस अव्यय के साथ प्रायः सप्तम्यन्त पद का प्रयोग होता है पर कहीं-कहीं षष्ठ्यन्त वा द्वितीयान्त का भी प्रयोग देखा जाता है। यथा—त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि साक्षिवत् (याज्ञ० ७।१०४)। अन्तर्देवान् मर्त्यांश्च (ऋ० ८।२।४), देवों और मर्त्यो के बीच में। २ पकड़ना—अन्तर्हत्वा मूषिकां श्येनो गतः (काशिका १।४।६५), बाज चुहिया को मार कर पकड़ ले गया। [३] प्रातर्* ॥ १ प्रातःकाल, सुबह, सवेरे—प्रातर्द्यूतप्रसङ्गेन मध्याह्ने स्त्रीप्रसङ्गतः। रात्रौ चौरप्रसङ्गेन कालो गच्छति धीमताम् (सुभाषित)। द्यूतप्रसङ्ग =महाभारतम्, स्त्री- प्रसङ्ग =रामायणम्, चौरप्रसङ्ग =भागवतम्। [४] पुनर्* ॥ १ फिर, दोबारा—न पुनरेव प्रवर्त्तितव्यम् (शाकुन्तल० ६)। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ?। गच्छतु भवान् पुनर्दर्शनाय (स्वप्न० १)। २ 'तु' के अर्थ में—पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्रिणः (कुमार० ५।४)। पुनः- पुनः—वार-वार—विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्य- जन्ति (मुद्रा० २।१७)। किं पुनः = कहना ही क्या—मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्य- थावृत्ति चेतः। कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे (मेघ० १।३)। पुनरपि = पुनः पुनः =वार-वार—पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्। इह संसारे खलु दुस्तारे कृपया पारे पाहि मुरारे (चर्पट० ८)। [५] सनुतर् ॥ १ छिपना—सनुतश्चोरो गच्छति (गणरत्न०)। इस अव्यय का प्रयोग लोक में नहीं पाया जाता। अमरकोष आदि लौकिक कोषों में इस का कहीं उल्लेख नहीं। वेद में इस के प्रयोग मिलते हैं।१ नोट—उपर्युक्त पांचों अव्यय रेफान्त हैं अतः रुँ का रेफ़ न होने से हशि च (१०७) आदि द्वारा उत्व आदि कार्य नहीं होते। यथा—स्वर्गतः, प्रातर्गच्छ, पुनरथ, १ निघण्टु में यह 'निर्णीतान्तर्हित' अर्थ में पढ़ा गया है। निर्णीतं च तद् अन्तर्हितं चेति कर्मधारयः (स्कन्दमाहेश्वरकृत निरुक्तभाष्यटीका)। जो छिपा हुआ पर निर्णीत हो उसे 'सनुतर्' कहते हैं। श्रीसायण अपने वेदभाष्य में सर्वत्र इस का अर्थ 'छिपा हुआ' करते हैं—सनुतश्चरन्तम्—निगूढं चरन्तम् (ऋ० ५।२।४ सायणभाष्य)। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपने अष्टाध्यायीभाष्य तथा वेदा- ङ्गप्रकाश के 'अव्ययार्थ' में 'सनुत' का 'सदा' अर्थ लिखा है। सनुतः पुरुषार्थे प्रयतेरन्—यह उन्होंने उदाहरण भी दिया है। इस प्रकार आरे द्वेषांसि सनुतर्व्य- धाम (ऋ० ५।४५।५) इस ऋचा का अर्थ होगा—हम सदा शत्रुओं को दूर रखें। यह अर्थ भी सुसङ्गत प्रतीत होता है।
अव्यय-प्रकरणम् ५२७ अन्तर्गृहे, सनुतर्घे हि तं ततः (ऋ० ८.६७.३)। प्रातोऽत्र, पुनरोऽपि लिखने वाले विद्यार्थी सावधान रहें। [६] उच्चैस्* ॥ १. महान्—किं पुनर्यस्तयोच्चैः (मेघ० १.१७) । २. ऊँचे पर, ऊँचे में— पश्चादुच्चैर्भुजतरुवन० (मेघ० १.३६) । विपद्युच्चैः धैर्यम् (नीति० ५६) । उच्चैरु- दात्तः (१.२.२६) । ३. जोरदार आवाज में—उच्चैर्विहस्य (रघु० २.१२) । ४. अत्यधिक—विदधति भयमुच्चैर्वीक्ष्यमाणा वनान्ताः (ऋतु० १.२२) । [७] नीचैस्* ॥ १. मन्द आवाज से (प्रायः क्रियाविशेषण)—नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे प्राणेश्वरः श्रोष्यति (अमरु० ६८) । २. नीचे, नीचे की ओर—नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण (मेघ० २.४६) । ३. धीरे से, मन्दगति से—नीचैर्वाति समीरणः (व्या० च०) । ४. विनीत, नम्र—तयापि नीचैर्विनयाददृश्यत (रघु० ३.३४) । [८] शनैस्* ॥ १. धीरे से (क्रियाविशेषण)—शनैर्यति पिपीलिका (व्या० च०) । धर्मं शनैः सञ्चिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः (मनु० ४.२३८) । कुरु पदानि घनोह! शनैः शनैः (वेणी० २.२१) । शनैश्चरः । शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम् (सुभा- षित०) । [९] ऋधक् ॥ १. सत्य—ऋधग्वदन्ति विद्वांसः (गणरत्न०) । गणरत्नमहोदधि में इस के कुछ अन्य अर्थ भी लिखे हैं—वियोग-शीघ्र-सामीप्य-लाघवेष्वित्यन्ये । लौकिककोषों में इस का प्रायः उल्लेख नहीं मिलता पर वेद में इस के प्रचुर प्रयोग हैं—किं स ऋधक् कृणवद् (ऋ० ४.१८.४) । [१०] ऋते* ॥ १. विना, वगैर—ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः (सुप्रसिद्ध), ज्ञान के विना मुक्ति नहीं। ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः क्षपा-तमस्काण्ड-मलीमसं नभः (माघ० १.३८), सूर्य के विना रात्रि के अन्धकार से मलिन आकाश को कौन धो कर निर्मल बना सकता है ? नोट—‘ऋते’ के योग में अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२. ३.२६) सूत्र से पञ्चमी विभक्ति का विधान किया गया है। जैसा कि उपर्युक्त उदा- हरणों में स्पष्ट है। लोक में इस के योग में कहीं कहीं द्वितीया का प्रयोग भी देखा जाता है। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे (गीता० ११.३२)। चान्द्रव्याकरण में इस के योग में द्वितीया का विधायकसूत्र भी पढ़ा गया है—ऋते द्वितीया च (चान्द्र० २.१.८४)। पाणिनीय वैयाकरण इस का समाधान—ततोऽन्यत्रापि दृश्यते इस वार्ति- कांश से करते हैं।
५१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [११] युगपत्* ॥ १ एक साथ, एक ही समय मे— सहस्रमक्ष्णा युगपत् पपात (कुमार० ३ १)। युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्मनसो लिङ्गम् (न्यायदर्शन १.१.१६) । [१२] आरात्* ॥ आराद् दूरसमीपयोरित्यमरः । १ दूर—आराद् दुष्टात् सदा वसेत् । दुष्ट से सदा दूर रहे । २ समीप, निकट—तमर्च्यम् आराद् अभिवर्त्तमानम् (रघु० २ १०) । ग्रामादारादारामः—गांव के पास बगीचा है । नोट—'आरात्' के योग में अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२. ३ २६) सूत्र से पञ्चमी विभक्ति का विधान है । [१३] पृथक्* ॥ १ अलग, भिन्न—शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् (गीता० १ १८) । साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः (गीता० ५ ४) । २ विना, बगैर—राम पृथग् नहि सुखम् । नोट—'विना' अर्थ वाले पृथक् के योग में पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्य- तरस्याम् (२.३.३२) सूत्र से द्वितीया, तृतीया तथा पञ्चमी विभक्ति का विधान है । [१४] ह्यस्* ॥ १. बीत चुका पिछला दिन (Yesterday)—ह्योऽस्माकं परीक्षामभूत् । ह्यो भवम्—ह्यस्त्यं ह्यस्तनं वा । ऐषमोऽह्यःश्वसोऽन्यतरस्याम् (४ २ १०४) सूत्र से पाक्षिक त्यप् हो जाता है । तदभाव में सायं-चिर-प्राह्णे-प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्ठुलौ तुट् च (४.३ २३) से ट्युप्रत्यय हो कर उसे तुँट् का आगम हो जाता है । ह्यस्त्यम्=अतीत कल से सम्बन्ध रखने वाला कार्य आदि । [१५] श्वस्*॥ १. Tomorrow आने वाला कल—श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापरा- ह्निकम् । नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् (महाभारत० १२.३२१.७३) । वरमद्य कपोत श्वोमयूरत्—नौ नकद न तेरह उधार । [१६] दिवा*॥ १. दिन—दिवा च रात्रिश्च दिवारात्रम्, दिन और रात । निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः (भागवत० १ १६.६) । २ दिन मे—पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते (लोकोक्ति) । [१७] रात्रौ ॥ १. रात मे—रात्रौ वृत्तं तु द्रक्ष्यति । रात्रौचरः । ये दोनों उदाहरण गणरत्न- महोदधि के हैं । 'रात्रौ' को अव्यय मानना हमारे विचार मे युक्त प्रतीत नहीं होता । 'रात्रि' शब्द से ही काम चल सकता है । यदि इसे अव्यय मानना ही अभीष्ट है तो 'रात्रौ' को विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय माना जा सकता है ।
अव्ययं-प्रकरणम् ५१६ [१८] सायम्*॥ १. सायङ्काल, शाम का समय—प्रयता प्रातरन्वेतु सायं प्रत्युद्व्रजेदपि (रघु० १.६०)। सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम्। नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् (महाभारत० १२.१६३.१०)। नोट—इसी अर्थ में घञन्त 'साय' शब्द का भी प्रयोग देखा जाता है। वह घञन्त होने से पुंलिङ्ग माना जाता है। संख्या-वि-सायपूर्वस्या-ह्नस्यान्यतरस्यां ङौ (६.३.१०६) सूत्र में इसी का ग्रहण होता है—सायाह्नि, सायाहनि, सायाह्ने । इस विषय में सायं॑चिरंप्राह्णे प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्त्युलो तुट् च (४.३.२३) सूत्र की काशिका- वृत्ति भी द्रष्टव्य है। [१९] चिरम्*॥ १. देर तक—मुहूर्त्तं ज्वलितं श्रेयो न च धूमायितं चिरम् (महाभारत ५.१३३. १५); देर तक धूंआ देने की अपेक्षा थोड़ी देर तक प्रज्वलित होना श्रेष्ठ है। चिरं जीवतु मे भर्ता। नोट—दीर्घकालवर्त्ती पदार्थ में त्रिलिङ्गी चिर शब्द बहुधा प्रयुक्त होता है। इसी से ही चिरजीविन्, चिरायुष्, चिरक्रिय, चिरकारिन् आदि शब्द निष्पन्न होते हैं। 'चिरं जीवतु मे भर्ता' आदि 'चिरम्' अव्यय के उदाहरण भी चिरशब्द से क्रियाविशे- षणत्वेन निष्पन्न हो सकते हैं। इस अव्यय का फल 'चिरञ्जीवी, चिरञ्जीवकः' प्रभृति कतिपय शब्दों में ही देखा जाता है। 'चिरन्तनः' भी चिरशब्द से निष्पन्न हो सकता है। देखें—सायंचिरंप्राह्णे० (४.३.२३) सूत्र पर काशिकावृत्ति । [२०] मनाक्*॥ १. जरा, थोड़ा-सा—कुतूहलाक्रान्तमना मनागभूत् (नैषध० १.११६)। रे पान्थ विह्वलमना न मनागपि स्याः (भामिनी० १.३६) । [२१] ईषत्*॥ १. थोड़ा, स्वल्प, कुछ—ईषदोपचुम्बितानि भ्रमरैः (शाकुन्तल० १ ४)। ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः (पञ्च० १.१५२) । २. आसानी से, विना कठिनाई से—ईषत्करः कटो भवता; (८७६) सूत्र पर इस व्याख्या में इस उदाहरण का विवेचन देखें । [२२] जोपम्*॥ तूष्णीमर्थे सुखे जोपम् इत्यमरः। १. चुप, शान्त—जोपमाप न विशिष्य वभाषे (नैषध० ५.७८)। किमिति जोपमास्यते ? (शाकुन्तल० ५)। २. सुखपूर्वक—जोपमास्ते जितेन्द्रियः; जितेन्द्रिय पुरुष सुख से रहता है। [२३] तूष्णीम्*॥ मौने तु तूष्णीम् इत्यमरः। चुप्प—न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह (गीता० २.६) ।
५२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [२४] वहिस्*॥ १ बाहर, बाहर से—स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मण (मनु० २ १०३)। अन्तर्विषमया होता वहिश्चैव मनोहरा। गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषित (पञ्च० ४८७)। २ वाह्य—न खलु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते (उत्तर- राम० ६ १२)। [२५] अवस् ॥ १ बाहर, नीचे आदि-अवो गच्छति (गणरत्न०) । इस के प्रयोग अवे- ष्टव्य हैं। नोट—पञ्चम्यन्तात् सप्तम्यन्तात् प्रथमान्ताद्वा अवरशब्दात् पूर्वाधरावरा- णामसिं पुरधवश्चैषाम् (५३३६) इति असिंप्रत्यये अवरशब्दस्य च 'अव' इत्यादेशे तद्धितश्चाऽसर्वविभक्ति (३६८) इत्यनेनैवाव्ययत्वे सिद्धे स्वरादौ पाठश्चिन्त्य इति केचित् । [२६] अधस्*॥ १ नीचे—अध पश्यसि किं वृद्धे तव किं पतितं भुवि। रे रे मूढ न जानासि गत तारुण्यमौक्तिकम् (चाणक्य०)। अधोऽधः = नीचे और नीचे—अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते। उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति (हितोप० २.२)। [२७] समया*॥ १ समीप—ग्रामं समया रम्या पुष्पवाटिका। यि सिन्धवः समया सन्नुरद्रिम् (ऋ० १.७३.६); पर्वत के समीप नदियां बहती हैं। अमरकोष में इस का अर्थ 'मध्य' भी दिया गया है—समयाऽन्तिकमध्ययोरित्यमरः । इस अर्थ मे प्रयोग कम हैं। नोट—इस के योग मे द्वितीया का विधान है [देखें विभक्त्यर्थप्रकरणपरि- शिष्ट (११)]। [२८] निकषा*॥ १ समीप—विलङ्घ्य लङ्कां निकषा हनिष्यति (माघ० १.६८), क्या आप को याद है कि आप ने समुद्र पार कर के लङ्का के समीप रावण को मारा था ? अभिज्ञावचने लृट् (७६१) मे भूतकाल में लृट् का प्रयोग है। पूरा श्लोक सार्थ इस व्याख्या की लकारार्थप्रक्रिया में इसी सूत्र पर देखें। नोट—इस के योग मे भी पूर्ववत् द्वितीया विभक्ति का विधान है। [२६] स्वयम्*॥ १ आत्मना, अपने आप—इन्द्रोऽपि लघुता याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः (चाणक्य०) ।१ १. दो सहेलियां अपने-अपने पति का गुणबखान इस प्रकार करती हैं— चतुरः सखि मे भर्ता यल्लिखति च तत् परो न वाचयति । तस्मादप्यधिको मे स्वयमपि लिखितं स्वयं न वाचयति ॥ (समयोचित०)
अव्यय-प्रकरणम् ५२१ [३०] वृथा*॥ १. व्यर्थ, बेकार, निरर्थक-वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तस्य भोजनम् । वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीपो दिवाऽपि च (सुभाषित०) । [३१] नक्तम्*॥ रात्रि (में)—न नक्तं दधि भुञ्जीत (चरक सूत्र० ७.५८), रात में दही सेवन न करे। २. रात-नक्तं च दिवा च नक्तंदिवम् । अचतुर० (५.४.७७) सूत्र से निपातन होता है। नोट-संस्कृतसाहित्य मे 'नक्त' इस प्रकार का अजन्त नपुंसक शब्द भी रात्रि- वाचक विद्यमान है। इस से नक्तञ्चर, नक्तभोजिन्, नक्तान्ध, नक्तमाल प्रभृति शब्द बनते हैं। पर यहां मकारान्त अव्यय मानना भी परम आवश्यक है । अन्यथा-नक्त- ञ्चरः, नक्तञ्चारी, नक्तन्तनम्, नक्तन्दिनम्, नक्तन्दिवम् प्रभृति शब्द न बन सकेंगे। [३२]नञ्*॥ १. नहीं, प्रतिषेध-एकः स्वादु न भुञ्जीत, स्वार्थमेको न चिन्तयेत् । एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् (सुभाषितसुधा०) । प्रतिषेध दो प्रकार का होता है-पर्युदास और प्रसज्य । इस का विवेचन पीछे (१८) सूत्र पर कर चुके है । नोट- 'नञ्' के अन्त्य ञकार का लोप हो जाता है अतः प्रयोग मे 'न' ही आता है। यह अनुबन्ध इसलिये लगाया गया है कि नलोपो नञः (६४७) सूत्र में इसी नकार का ग्रहण हो अग्रिमपठित 'न' का न हो। अतः 'नैकधा' (नैषध० २.२) आदियों में उस सूत्र की प्रवृत्ति नही होती । इस नञ् के अनेक अर्थ होते हैं। यहां सरल साधारण प्रसिद्ध अर्थ लिख दिया है। 'ईषत्' अर्थ में भी यह कुछ २ प्रसिद्ध है-अनुदरा (अल्पोदरी) कन्या । नञ् के अर्थों का विशेष विस्तार वैयाकरणभूषणसार आदि उच्च ग्रन्थों में देखें । [३३] न*॥ १. नही, प्रतिषेध-योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति (गीता० ५.६)। न चिरेण = नचिरेण । सुप्सुपेति समासः । चित्रं चित्रं किमथ चरितं नैकभावाश्रयाणाम् । सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः (हितोप० २.१६०) । इसी प्रकार-नैकधा, नान्तरीयम्, गमिकर्मीकृतनैकनीवृता (नैषध० २.४०) आदियों में समझना चाहिये । [३४] हेतौ ॥ १. निमित्त (में)-हेतौ हृष्यति (गणरत्न०) । नोट-यह अव्यय हमें किसी ग्रन्थ में नहीं मिला । गणरत्नमहोदधि का यह उदाहरण भी सप्तम्यन्त हेतुशब्द से सिद्ध हो सकता है। अतः इस के प्रयोग अन्वे- ष्टव्य हैं। [३५] इद्धा ॥ १. प्रकट, जाहिर-समिद्धमिद्धेश महो ददासि (गणरत्न०) ।
५२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट—यह अव्यय हमें किसी ग्रन्थ में नहीं मिला। किसी कोषकार ने इस का उल्लेख नहीं किया। वैदिक साहित्य में भी इस का कहीं पता नहीं चला। उपर्युक्त उदाहरण गणरत्नमहोदधिकार श्रीवर्धमान (वैक्रम० ११६७) का है। अन्य सब व्याख्या- कारों ने इसे ही उद्धृत किया है। वाचस्पत्यकोषकार ने यह उदाहरण भागवत का माना है परन्तु हमें यह भागवत में नहीं मिला। [३६] अद्धा ॥ १ वस्तुतः, यथार्थतः—एष ह वा अनद्धा पुरुषो यो न देवानर्चति न पितॄन् न मनुष्यान् (शत० ब्रा० ८.३.१.२४), जो देवताओं, पितरों और मनुष्यों की पूजा नहीं करता वह वस्तुतः मनुष्य नहीं। को अद्धा वेद (ऋ० ३.५४.५); इस संसार को यथार्थतः कौन जान सकता है?। २ सचमुच, निस्सन्देह—अद्धा नकिरन्यस्त्वावान् (ऋ० १.४२.१३), हे प्रभो ! सचमुच तेरे जैसा कोई नहीं। यास्यत्यद्धाऽकुतोभयम् (भागवत० १.१२.२८), निस्सन्देह वह अमरपद को पायेगा। ३ साक्षात्—त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् । रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति (भागवत० १. ८.४२), हे मधुपते ! जैसे गङ्गा का प्रवाह निरन्तर समुद्र की ओर बढ़ता रहता है वैसे ही साक्षात् आप में मेरी सर्वदा अनन्यप्रीति हो। [३७] सामि*॥ १ आधा—सामिकृतम्, सामिभुक्तम् । सामिभुक्तविषया समागमा. (रघु० १६.१६)। अभिवीक्ष्य सामिकृतमण्डन यती (माघ० १३.३१) । सामि (२.१.२२) इति समास। २ निन्दित, आक्षेपयोग्य—उदाहरणमृग्यम् । [३८] वत्*। ब्राह्मणवत् । क्षत्रियवत् ॥ नोट—‘वत्’ यह प्रत्यय है। वतिँप्रत्ययान्त अव्यय हो—यह इस के ग्रहण का प्रयोजन है। यहां तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८), तत्र तस्येव (११४६), तदर्हम् (५.१.११६) इन तीन सूत्रों से विहित वतिँप्रत्यय का ही ग्रहण समझना चाहिये। ब्राह्मणवत्, क्षत्रियवत्—ये दो वतिँप्रत्ययान्त के उदाहरण दिये गये हैं। इसी प्रकार —नृपवत्, बालवत्, चौरवत् आदि अन्य वत्यन्त शब्द भी जान लेने चाहियें। यह वतिँप्रत्यय सादृश्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। यथा—ब्राह्मणवत् = ब्राह्मण के समान, क्षत्रियवत् = क्षत्रिय के समान इत्यादि। वस्तुतः इस अव्यय का पाठ यहां उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वतिँप्रत्ययान्तों की अव्ययसंज्ञा तो तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से ही सिद्ध है। [३६] सना ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—सना भुवन् द्युम्नानि मोत जारिषुः (ऋ० १.१३६. ८), धन नित्य रहें कभी नष्ट न हों। सना भव—सनातनो धर्मः, सायंचिरंप्राह्णे- प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलो तुँट् च (४.३.२३) इति ट्युप्रत्ययस्तस्य च तुँडागम । एष धर्मः सनातनः (उत्तरराम० ५.२२) ।
अव्यय-प्रकरणम् ५२३ [४०] सनत् ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—सनत्कुमारः (नित्य ब्रह्मचारी ब्रह्मपुत्र) । [४१] सनात् ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—अशत्रुर्जनुषा सनादसि (ऋ० १.१०२.८), हे इन्द्र! तू जन्म से ही सदा शत्रुरहित है । यह अव्यय वेद में ही देखा जाता है । [४२] उपधा ॥ नोट—इस अव्यय का प्रयोग हमें कही नही मिला । श्रीसभापतिशर्मोपाध्याय सिद्धान्तकौमुदी की 'लक्ष्मी' व्याख्या में इस अव्यय पर टिप्पण करते हुए उपधा धर्मा- द्यैर्यत्परीक्षणम् इस अमरकोषोक्त वचन की विवृति करने लगते हैं । यह ठीक नहीं । क्योंकि अमरकोषोक्त 'उपधा' आवन्त स्त्रीलिङ्ग है अव्यय नहीं । [४३] तिरस्*॥ १. टेढ़ा या तिरछा—स तिर्यङ् यस्तिरोऽञ्चति—इत्यमरः । तिरोदृष्ट्या समीक्षते । २. छिपना—इति व्याहृत्य विबुधान् विश्वयोनिस्तिरोदधे (कुमार० २.६२) । ३. अनादर—गोभिर्गुरूणां परुषाक्षराभिस्तिरस्कृता यान्ति नरा महत्त्वम् । अलब्ध- शाणोत्कषणा नृपाणां न जातु मौलौ मणयो वसन्ति (भामिनी० १.७२) ।¹ नोट—छिपना आदि अर्थों में तिरस् का प्रयोग प्रायः धातु के साथ ही पाया जाता है । तिरोऽन्तर्धौ (१.४.७०) सूत्र द्वारा छिपना अर्थ में तिरस् की गतिसंज्ञा हो जाती है । गतिसंज्ञा होने से कुगतिप्रादयः (६४६) द्वारा समास हो जाता है । समास होने के कारण समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् (८८४) से क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । यथा—तिरोभूय, तिरोधाय इत्यादि । परन्तु कृञ् धातु के योग में 'छिपना' अर्थ होने पर भी विभाषा कृञि (१.४.७१) सूत्रद्वारा 'तिरस्' की विकल्प से गतिसंज्ञा होती है । गतिपक्ष में कुगतिप्रादयः (६४६) से समास हो कर क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । यथा—तिरस्कृत्य । गतिसंज्ञा के अभाव में समास न होने से क्त्वा को ल्यप् नहीं होता । यथा—तिरः कृत्वा ।² [४४] अन्तरा*॥ १. अन्दर से—भवद्भिरन्तरा प्रोत्साह्य कोपितो वृषलः (मुद्रा० ३) ; आप १. वैदिक साहित्य में 'तिरस्' अव्यय का प्रयोग धातुयोग के बिना अकेले भी बहुत आता है यथा—तिर इव वै देवा मनुष्येभ्यः (शत० ब्रा० ३.१.१.८), देवता मनुष्यों से छिपे से रहते हैं । स्त्रियस्तिर इवैव पुंसो जिघत्सन्ति (शत० ब्रा० १.६. २.१२), स्त्रियां पुरुषों को मानो गुप्तरूप से खा जाती हैं । परन्तु लौकिक साहित्य में इस का प्रयोग प्रायः भू, धा, कृ धातुओं के योग में ही दृष्टिगोचर होता है । २. गतिपक्ष में तिरसोऽन्यतरस्याम् (८.३.४२) द्वारा विसर्ग को विकल्प से सकारा- देश हो जाता है । यथा—तिरस्कृत्य, तिरःकृत्य । परन्तु 'तिरःकृत्वा' में गतिसंज्ञा न होने से सकारादेश भी नही होता ।
५२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् लोगो ने अन्दर से भड़का कर चन्द्रगुप्त को कुपित कर दिया है। २ मध्य मे, बीच मे—त्रिशङ्कुरिव अन्तरा तिष्ठ (शाकुन्तल० २), त्रिशङ्कु की तरह मध्य मे लटके रहो। मैनम् अन्तरा प्रतिबघ्नध्व (शाकुन्तल० ६); इसे बीच मे मत टोको। नाश्नीयाच्चैव तयोरन्तरा (मनु० २ ५६) सवेरे-शाम दो भोजनो के मध्य मे कुछ न खाए। ३. अन्दर ही अन्दर —अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति (मनु० १० ७१), अयोग्य खेत मे डाला गया बीज अन्दर ही अन्दर नष्ट हो जाता है। ४ बिना, बगैर— न प्रयोजन- मन्तरा चाणक्य स्वप्नेऽपि चेष्टते (मुद्रा०), प्रयोजन के बिना चाणक्य स्वप्न मे भी चेष्टा नहीं करता। ५ मार्ग मे, रास्ते मे—अन्तरा चारणेभ्यस्त्वदीय जयोदाहरणं श्रुत्वा त्वामिहस्थमुपागता. (विक्रमो० १), मार्ग मे ही चारणो से तुम्हारी यशोगाथा सुनकर तुम्हारे पास यहा आये हैं। ६ सदृश—न द्रक्ष्याम. पुनर्जातु धार्मिकं रामम- न्तरा (रामायण० २ ५७ १३) राम सदृश धार्मिक पुरुष फिर हम कभी नही देखेगे। नोट—अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्रद्वारा अन्तरा के योग मे द्वितीया विभक्ति का विधान है। [४५] अन्तरेण*॥ १ बिना, बगैर—न राजापराधमन्तरेण प्रजास्वकालमृत्युश्चरति (उत्तरराम० २)। न चान्तरेण नाव तरीतु शक्येय सरित्। क्रियान्तरान्तरायमन्तरेण आर्यं द्रष्टु- मिच्छामि (मुद्रा० २), यदि किसी काम मे विघ्न न हो तो आप के दर्शन करना चाहता हू। २ मध्य मे, बीच मे, के विषय मे—त्वां माञ्चान्तरेण कमण्डलु. (महाभाष्य), तेरे और मेरे बीच कमण्डलु है। अथ भवन्तमन्तरेण कीदृशोऽस्या दृष्टिराग ? (शाकुन्तल० २), आप के विषय मे इस का चक्षूराग कैसा था? नोट—इस के योग मे भी पूर्ववत् द्वितीया का विधान है।¹ [४६] ज्योक् ॥ १ दीर्घ काल तक, लम्बे समय तक—ज्योक् च सूर्यं दृशे (ऋ० १ २३ २१)। सधैमापुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या (छान्दोग्योपनिषद् २.११.२)। नोट—यह अव्यय प्राय वैदिकसाहित्य मे प्रयुक्त देखा जाता है। [४७] कम् ॥ १. जल—कं (जले) जायत इति कञ्जम् (कमलम्)। कम् (जलम्) अल- करोतीति कमलम्। २ सुख—कम् =सुखम् अस्त्यस्येति कयु =सुखी। कशाभ्यां ष-भ-युस्-ति-तुन्त-यसः (५२१३८) इति मत्वर्थीयो युस्। सिति च (१.४.१६) इति पदत्वेनानुस्वारपरसवणौ। ३. सिर—क (शिरसि) जायन्त इति कञ्जा =केशा। १. अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्र के भाष्य मे भाष्यकार ने अन्तरा और अन्तरेण को निपात माना है। परन्तु निपातसज्ञा करने के लिये तब इन का पाठ चादियो मे मानना होगा। अतः यहाँ स्वरादयो मे इन का पाठ प्रक्षिप्त समझना चाहिये