लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७७ समास के कारण गो-शब्द से परे 'आम्' सुँप् का सुँपो धातु-प्रातिपदिकयोः (७२१) सूत्र से लुक् हुआ २ है, तथापि प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र की सहायता से यहां सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा इस की पद-सञ्ज्ञा अक्षुण्ण है; अतः गो शब्द के अन्त में पदान्त एड् वर्त्तमान है; इस के आगे 'अग्र' शब्द का आदि अत् भी मौजूद है। तो यहां गो-शब्द प्रकृति मे अर्थात् अपने स्वरूप में सन्धि-कार्य से रहित वैसे का वैसा विकल्प से रहेगा। जहां प्रकृतिभाव होगा वहां विभक्ति लाने मे—'गोअग्रम्' प्रयोग सिद्ध होगा। ध्यान रहे कि यहां प्रथम एडः पदान्तादति (४३) से पूर्व-रूप प्राप्त था। पुनः उस का बाध कर अवङ् स्फोटायनस्य (४७) से वैकल्पिक अवङ् प्राप्त होता था। यह सूत्र उस का अपवाद समझना चाहिये। जहां प्रकृति-भाव नहीं होगा वहां अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त होगा¹। यहां 'एङन्त' कहने का यह प्रयोजन है कि ओदन्त गो शब्द को ही प्रकृति भाव हो, उकारान्त गोशब्द को न हो। यद्यपि गोशब्द स्वयम् ओदन्त है उकारान्त नहीं; तथापि समास में गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य (६५२) सूत्र से ह्रस्व करने पर उका- रान्त हो जाया करता है। उदाहरण यथा—'चित्रगु+अग्र' [चित्रा गावो यस्य स चित्रगुः, बहुव्रीहि-समासः। चित्रगोरग्रम् इति षष्ठी-तत्पुरुष-समासे सुँब्लुकि रूपमिदम्] यहां गोशब्द के एङन्त न होने से सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से प्रकृतिभाव नहीं होता; इको यणचि (१५) से उकार को वकार हो कर विभक्ति लाने पर 'चित्रग्वग्रम्' प्रयोग बन जाता है²। यहां गोशब्द को पदान्त में प्रकृतिभाव इसलिये कहा गया है कि अपदान्त में प्रकृतिभाव न हो जाये। यथा—'गो+अस्' (यहां गोशब्द से ङसिं वा ङस् प्रत्यय किया गया है) यहां पदान्त न होने से यह सूत्र प्रवृत्त नहीं होता, ङसि-ङसोश्च (१७३) सूत्र से पूर्वरूप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से 'गोः' प्रयोग बन जाता है। इस की विशेषतया सिद्धि 'अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरण' में 'गो' शब्द पर देखें³। १. यहां कई लोग विकल्प-पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप कर 'गोऽग्रम्' ऐसा मूल में पाठ लिखते हैं; यह उन की भूल है क्योंकि यह सूत्र अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र का अपवाद है, एडः पदान्तादति (४३) सूत्र का नहीं; अतः इस के प्रवृत्त हो चुकने पर पक्ष में उसी की प्रवृत्ति करनी योग्य है। हां जब वह प्रवृत्त हो चुकेगा तब वैकल्पिक होने से पक्ष में एडः पदान्तादति (४३) सूत्र भी प्रवृत्त हो जायेगा। २. ध्यान रहे कि यदि किसी अवयवी का एक अवयव विकृत हो जाये तो भी वह वही रहता है अन्य नहीं हो जाता; यथा—यदि किसी कुत्ते की पूंछ कट जाए तो भी वह कुत्ता ही रहता है अन्य नहीं हो जाता। इसी प्रकार यहां यद्यपि गो शब्द का अवयव ओकार विकृत हो कर उकार बन गया है; तथापि वह गो शब्द ही रहता है—एकदेशविकृतमनन्यवत् (परिभाषा)। ३. 'हे चित्रगोऽग्रम्' में भी प्रकृतिभाव न होगा, क्योंकि यहां एड् लाक्षणिक (कृत्रिम)
७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अब प्रकृतिभाव के अभाव पक्ष में अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र प्रवृत्त करने के लिये दो परिभाषाएं लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४५) अनेकाल् शित् सर्वस्य ।१।१।५४॥ [ अनेकाल् य आदेश शिश्च, स सर्वस्य षष्ठी-निर्दिष्टस्य स्थाने स्यात् ।] इति प्राप्ते— (यहां पर वृत्ति हम ने जोड़ी है, ग्रन्थकार ने स्पष्ट होने से नहीं लिखी) अर्थ —जिस आदेश में अनेक अल् (वर्ण) हों तथा जिस का शकार इत्सञ्ज्ञक हो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है । इस परिभाषा के प्राप्त होने पर [अग्रिम परिभाषा प्रवृत्त हो जाती है] । व्याख्या—अनेकाल् ।१।१। शित् ।१।१। सर्वस्य ।६।१। समास —न एक = अनेक, नञ्तत्पुरुष । अनेकोऽल् यस्य स =अनेकाल् बहुव्रीहि-समास । श् (शकार ) इत् यस्य स शित् बहुव्रीहि-समास । अर्थ —(अनेकाल्) अनेक अलों वाला तथा (शित्) शकार इत् वाला आदेश (सर्वस्य) सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होता है । 'अल्' प्रत्याहार में सम्पूर्ण वर्ण आ जाते हैं, अत अल् या वर्ण पर्याय अर्थात् एकार्थ-वाची शब्द हैं। जिस आदेश में एक से अधिक अल् या वर्ण हों अथवा जिस आदेश के शकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो तो वह आदेश सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होगा। अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र कहता है कि आदेश स्थानीय के अन्त्य अल् को हो, परन्तु यह सूत्र अनेकाल् तथा शित् आदेशों को सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर होना बतलाता है। अत यह सूत्र अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र का अपवाद है ।१ अनेकाल् आदेश का उदाहरण यथा—रामै । यहां 'भिस्' स्थानीय के सम्पूर्ण स्थान पर अतो भिस ऐस् (१४२) से ऐस् आदेश होता है । ऐस् में दो अल् हैं अत यह अनेकाल् है । यह सूत्र न होता तो अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा भिस् के अन्त्य सकार को फिर उस के बाधक आदेः परस्य (७२) से आदि को 'ऐस्' हो जाता । शित् आदेश का उदाहरण यथा—इत । यहां 'इदम्' स्थानीय के सम्पूर्ण स्थान पर इदम इश् (११६७) से इश् आदेश होता है । इश् शित् है। यह सूत्र न होता तो अलोऽन्त्यस्य (२१) द्वारा इदम् के अन्त्य मकार को इश् हो जाता । शङ्का—जितने 'इश्' आदि शित् आदेश हैं वे सब अनेक अलों वाले हैं, अनेकाल् होने के कारण ही वे सब सम्पूर्ण स्थानीय के स्थान पर हो सकते हैं । पुन सूत्र में 'शित्' के लिये विशेष यत्न क्या किया गया है ? समाधान—इस प्रकार शित् ग्रहण के बिना भी कार्य के सिद्ध हो जाने से महामुनि पाणिनि यह परिभाषा जतलाना चाहते हैं कि नानुबन्धकृतमनेकाल्त्वम् है प्रतिपदोक्त (स्वाभाविक) नहीं—लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणम् (प०) । १ इसी प्रकार आदेः परस्य (७२) सूत्र का भी यह अपवाद समझना चाहिये ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ७६ अर्थात् अनुबन्धों के कारण किसी को अनेकाल् नहीं मान लेना चाहिये जब तक कि उस के अन्य अल् अनेक न हों । जिस की इत्सञ्ज्ञा होती है उसे अनुबन्ध कहते हैं । ‘इश्’ आदि में शकार आदि की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः शकार आदि अनुबन्ध हैं । अब यदि ‘इश्’ में अनुबन्ध शकार को छोड़ दें तो केवल ‘इ’ रह जाता है । तब यह अनेकाल् नहीं रहता; अतः यह सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर प्राप्त नहीं हो सकता । इस लिये ‘शित्’ ग्रहण आवश्यक है । [लघु०] परिभाषा-सूत्रम्—(४६) ङिच्च ।१।१।५२॥ ङिदनेकालप्यन्त्यस्यैव स्यात् ॥ अर्थः—ङित् आदेश चाहे अनेकाल् भी क्यों न हो अन्त्य अल् के स्थान पर ही होता है । व्याख्या—ङित् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अन्त्यस्य ।६।१।(अलोऽन्त्यस्य से)। समासः—ङ् (ङकारः) इत् यस्य स ङित्, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः—(ङित्) ङकार इत् वाला आदेश (अन्त्यस्य) अन्त्य (अलः) अल् के स्थान पर होता है । यह सूत्र अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) सूत्र का अपवाद है । जिस आदेश के ङकार की इत्सञ्ज्ञा होती हो फिर वह चाहे अनेक अलों वाला भी क्यों न हो सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर न होकर अन्त्य अल् के स्थान पर ही होगा । इस सूत्र का उदाहरण अग्रिम सूत्र पर देखें । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४७) अवङ् स्फोटायनस्य ।६।१।१२६॥ पदान्ते एङन्तस्य गोरवङ् वा स्यादचि । गवाग्रम् । गोऽग्रम् । पदान्ते किम् ? गवि ॥ अर्थः—पदान्त में जो एङ्, तदन्त गो-शब्द को अच् परे होने पर विकल्प कर के अवङ् आदेश हो जाता है । व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है । इस का सप्तमी विभक्ति में भी विपरिणाम हो सकता है जैसा कि ग्रन्थकार ने किया है) । एङः ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम कर के प्राप्त होता है; यह ‘गोः’ पद का विशेषण है, अतः इस से तदन्त-विधि हो कर ‘एङन्तस्य’ बन जाता है)। गोः ।६।१। (सर्वत्र विभाषा गोः से)। अचि ।७।१। (इको यणचि से) । अवङ् ।१।१। स्फोटायनस्य ।६।१। (यहां ‘स्फोटायन’ ग्रहण उस के सत्कार के लिये है, क्योंकि ‘विभाषा’ पद तो पीछे से आ ही जाता है) । अर्थः—(पदान्तस्य ) पद के अन्त वाला (एङन्तस्य) जो एङ्, तदन्त (गोः) गो-शब्द के स्थान पर (अचि) अच् परे रहते (अवङ्) अवङ् आदेश हो जाता है (स्फोटायनस्य) स्फोटायन आचार्य के मत में । ‘स्फोटायन’ पाणिनि से पूर्ववर्त्ती व्याकरण के आचार्य हो चुके हैं; कहते हैं कि ये वैयाकरणों में प्रसिद्ध स्फोटतत्त्व के उपज्ञाता थे । इस सूत्र में पाणिनि ने उन
८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् के मत का उल्लेख किया है । यह 'अवङ्' आदेश स्फोटायन आचार्य के मत में होता है, अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता । हमें सब आचार्य प्रमाण हैं, अतः अवङ् आदेश विकल्प से होगा¹ । उदाहरण यथा— 'गो + अग्र' यहां समास में षष्ठी के बहुवचन 'आम्' का लुक् हुआ है; अतः प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) द्वारा सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'गो' की पद- सञ्ज्ञा है । इस के अन्त में पदान्त एङ् = ओ वर्त्तमान है । इस से परे 'अग्र' शब्द का आदि अकार अच् भी वर्त्तमान है । अतः इस सूत्र से 'गो' को अवङ् आदेश प्राप्त होता है । अलोऽन्त्यस्य (२१) से इस आदेश की अन्त्य अल् = ओकार के स्थान पर प्राप्ति होती है, परन्तु अनेक अलों वाला होने के कारण अनेकाल् शित् सर्वस्य (४५) द्वारा सम्पूर्ण 'गो' के स्थान पर प्राप्त होता है । पुनः ङिच्च (४६) सूत्र की सहायता से अन्त्य अल् 'ओ' को अवङ् आदेश हो कर —'ग् अवङ् + अग्र' हो जाता है । अब ङकार की हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्ण दीर्घ एकादेश करने पर—'गवाग्र' बना । अब विभक्ति लाने से— 'गवाग्रम्' प्रयोग सिद्ध होता है । जिस पक्ष में अवङ् आदेश नहीं होता वहां एङः पदान्तादति (४३) से पूर्व रूप हो कर 'गोऽग्रम्' प्रयोग बन जाता है । इस प्रकार प्रकृतिभाव वाले रूप सहित कुल तीन रूप हो जाते हैं । प्रकृतिभाव के पक्ष में— (१) गोअग्रम् । [सर्वत्र विभाषा गोः] । प्रकृतिभाव के अभाव में— { (२) गवाग्रम् । [अवङ् स्फोटायनस्य] । { (३) गोऽग्रम् । [एङः पदान्तादति] । यहां पदान्त ग्रहण इस लिये किया है कि अपदान्त एङन्त 'गो' को अवङ् न हो । यथा—गो + ङि = गवि । यहां गो-शब्द से परे सप्तमी का एकवचन 'ङि' प्रत्यय किया गया है, अतः यहां गो शब्द पदान्त नहीं । इस लिये अवङ् आदेश न हो कर एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो जाता है । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— १ गवेश, गधीश । २ गवेश्वर, गवीश्वर । ३ गोऽधिप, गवाधिप, गोडधिप । ४ गवेच्छा, गविच्छा । ५ गवोदय, गवूदय । ६ गर्वाद्ध, गवूद्धि । ७ गवोढ, गवूढ । ८ गवानृतम् । ६ गवाक्ष । १० गवादनी । ध्यान रहे कि अवङ् आदेश में केवल ङकार की ही इत्सञ्ज्ञा होती है । १ वैयाकरण इस विभाषा अर्थात् विकल्प को क्वचित् व्यवस्थितविभाषा मानते हैं । जो विकल्प व्यवस्थित अर्थात् निश्चितरूप से कहीं नित्य प्रवृत्त हो और कहीं बिल्कुल नहीं उसे व्यवस्थितविभाषा कहते हैं। यह अवङ् आदेश गवाक्ष (झरोखा), गवादनी (चरगाह) आदि प्रयोगों में नित्य प्रवृत्त होता है, वहां इसके 'गोअक्ष, गोऽक्ष' आदि रूप नहीं बनते । परन्तु इसे सर्वत्र व्यवस्थितविभाषा भी नहीं समझना चाहिये जैसा कि मूलोक्त उदाहरण में इसे व्यवस्थितविभाषा नहीं माना गया ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८१ वकारोत्तर अकार अनुनासिक नहीं, अतः उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से उस की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती। यदि इस की भी इत्सञ्ज्ञा हो जाती तो लोप हो जाने से 'गवाग्रम्, गवाधिपः' आदि में सवर्णदीर्घ तथा 'गवेश्वरः, गवद्धिः' आदि में गुण न हो सकता । इस में प्रमाण है आचार्य पाणिनि का सूत्र—गवाश्वप्रभृतीनि च (२.४.११)। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४८) इन्द्रे च ।६।१।१२०॥ गोरवङ् स्याद् इन्द्रे । गवेन्द्रः ॥ अर्थः—इन्द्र शब्द परे होने पर (एडन्त) गो शब्द को अवङ् आदेश हो । व्याख्या—एङः ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति-विपरिणाम द्वारा । यह 'गोः' पद का विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि हो कर 'एडन्तस्य' बन जाता है) । गोः ।६।१। (सर्वत्र विभाषा गोः से) । इन्द्रे ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अवङ् ।१।१। (अवङ् स्फोटायनस्य मे) । अर्थः—(एङः) एडन्त (गोः) गो शब्द के स्थान पर (अवङ्) अवङ् आदेश हो जाता है (इन्द्रे) इन्द्र शब्द परे होने पर । यह सूत्र अवङ् स्फोटायनस्य (४७) सूत्र का अपवाद है । उस से यहां विकल्प कर के अवङ् प्राप्त था; इस सूत्र से नित्य हो जाता है । उदाहरण यथा— गवेन्द्रः (श्रेष्ठ वा बड़ा बैल) । गो + इन्द्र (गवां गोपु वा इन्द्रः = श्रेष्ठः) = ग् अवङ् + इन्द्र = गव + इन्द्र = गवेन्द्रः [आद् गुणः (२७)]। 'एडन्त' इस लिये कहा है कि चित्रगु + इन्द्र (चित्रगूनामिन्द्रः = स्वामी, षष्ठी- तत्पुरुषः) = चित्रग्विन्द्रः । यहां एडन्त न होने से अवङ् आदेश न हो कर इको यणचि (१५) से यण् = वकार हो जाता है। ध्यान रहे कि सूत्र की वृत्ति में 'एडन्त' कहना ग्रन्थकार से छूट गया है। यहां 'पदान्त' की अनुवृत्ति लाने की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि अपदान्त में एडन्त गो से परे इन्द्र शब्द कभी आ ही नहीं सकता । नोट—काशिकाकार जयादित्य ने इस सूत्र से अगले प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (६.१.१२१) सूत्र में 'नित्यम्' पद का ग्रहण नहीं किया, किन्तु इसी इन्द्रे च (६.१.१२०) सूत्र में ही 'नित्यम्' पद का ग्रहण किया है । पर ऐसा मानना ठीक प्रतीत नहीं होता; क्योंकि यहां 'नित्यम्' पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । यदि यह कहा जाये कि—यहां 'नित्यम्' पद ग्रहण न करने से इन्द्रे च (४८) सूत्र विकल्प से अवङ् करता, क्योंकि सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से 'विभाषा' पद की अनु- वृत्ति आ रही है—तो यह ठीक नहीं; क्योंकि इन्द्रे च (४८) सूत्र तो आरम्भ-सामर्थ्य से ही नित्य हो जायेगा, उस के लिये 'नित्यम्' पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(४६) दूराद् धूते च ।८।२।८४॥ दूरात् सम्बोधने वाक्यस्य टेः प्लुतो वा स्यात् ॥ अर्थः—दूर से सम्यग्बोध कराने में प्रयुक्त जो वाक्य उस की टि को विकल्प कर के प्लुत हो जाता है । व्याख्या—दूरात् ।५।१। हूते ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । वाक्यस्य ।६।१। टेः ।६।१। ल० प्र० (६)
८२ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
प्लुत १।१।२। (वाक्यस्य टे प्लुत उदात्त यह अधिकार आ रहा है)। वा इत्यव्ययपदम्। [भाष्यकार ने सम्पूर्ण प्लुत के प्रकरण को विकल्प कर दिया है, अत यहाँ पर 'वा' प्राप्त हो जाता है]। ह्वेञ् स्पर्धायां शब्दे च (भ्वा० उ०) धातु से भाव में 'क्त' प्रत्यय करने पर 'हूत' शब्द सिद्ध होता है। इस का अर्थ 'बुलाना' है। परन्तु यहाँ इस से 'सम्बोधन = अच्छी तरह से जनाना' अर्थ अभिप्रेत है। अर्थ — (दूरात्) दूर से (हूते) सम्यग्बोध कराने में प्रयुक्त (वाक्यस्य) जो वाक्य उस की (टे) टि के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (प्लुत) प्लुत हो जाता है। जिस देश में ठहरे हुए का वाक्य सम्बोध्यमान [सम्यक् जनाया जाता हुआ] साधारण प्रयत्न से न सुन सके किन्तु विशेष प्रयत्न से सुन सकता हो उस देश को 'दूर' कहते हैं। उस दूर देश से किसी को कुछ जनाने या बुलाने के लिये जो वाक्य प्रयुक्त किया जाता है उस की टि को विकल्प कर के प्लुत होता है। उदाहरण यथा—हम से देवदत्त ऐसे स्थान पर ठहरा हुआ है जहा हम उस साधारण प्रयत्न से बोल कर कुछ बोध नहीं करा सकते, तो अब हमारा स्थान 'दूर' हुआ। इस दूर स्थान से हम ने जो 'एहि देवदत्त !' 'सक्तून् पिब देवदत्त !' इत्यादि वाक्य प्रयुक्त किये उन वाक्यो की टि को विकल्प कर के प्लुत होगा। (प्लुत-पक्ष मे) (प्लुताभाव-पक्ष मे) (१) एहि देवदत्त ३ ! (१) एहि देवदत्त ! (२) सक्तून् पिब देवदत्त ३ ! (२) सक्तून् पिब देवदत्त ! यहा यह ध्यान म रखना चाहिये कि जिस वाक्य मे हूयमान (सम्यग् जनाया जाता हुआ) अन्त म होगा उसी वाक्य की टि को प्लुत होगा, जहा हूयमान अन्त मे न होगा उस वाक्य की टि को प्लुत न होगा। यथा—'देवदत्त ! एहि', 'देवदत्त ! सक्तून् पिब' यहा हूयमान = देवदत्त अन्त मे नही है, अत वाक्य की टि को प्लुत न होगा। किञ्च वाक्य की टि को होने वाला यह प्लुत हलन्त टि के अच् के स्थान पर ही होता है क्योकि प्लुत अचों का ही धर्म माना गया है। यथा—सक्तून् पिब यक्ष- वर्मन्३ । यहा 'अन्' टि के अकार को ही प्लुत हुआ है। इस प्रकार प्लुत का विधान कर अब उस का यहा उपयोग दिखाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(५०) प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम्। ६।१।१२५॥ एतेऽचि प्रकृत्या स्युः । आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति ॥ अर्थ —प्लुत और प्रगृह्य-सञ्ज्ञक अच् परे होने पर प्रकृति से रहते हैं। व्याख्या—प्लुत प्रगृह्या १।२। अचि ७।१। नित्यम् १।२। (क्रियाविशेषण- मेतत्) । प्रकृत्या ३।१। (प्रकृत्यान्तःपादम् स) । समास —प्लुताश्च प्रगृह्याश्च = प्लुत-प्रगृह्या, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(प्लुत प्रगृह्या ) प्लुत और प्रगृह्य-सञ्ज्ञक (अचि) अच् परे होने पर (नित्यम्) नित्य (प्रकृत्या) प्रकृति से = स्वभाव से = वैसे के वैसे अर्थात् सन्धि-कार्य से रहित रहते हैं। उदाहरण यथा—'आगच्छ कृष्ण ३
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८३ अत्र गौश्चरति' (आओ कृष्ण ! यहां गौ चर रही है)। यहां 'आगच्छ कृष्ण' यह एक वाक्य है। इस की टि = णकारोत्तर अकार को दूराद् धूते च (४६) से वैकल्पिक प्लुत होता है। जिस पक्ष में प्लुत होता है वहां प्रकृतिभाव हो जाने से णकारोत्तर प्लुत अकार तथा 'अत्र' शब्द के आदि अकार के स्थान पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ नहीं होता; वैसे का वैसा अर्थात् 'आगच्छ कृष्ण ३ ! अत्र गौश्चरति' ही रहता है। जिस पक्ष में प्लुत नहीं होता वहां प्रकृतिभाव न होने से सवर्णदीर्घ हो जाता है—आगच्छ कृष्णात्र गौश्चरति । इस के अन्य उदाहरण यथा— प्रकृतिभावपक्षे प्रकृतिभावाद्भावे (१) आगच्छ हरे ३ ! अत्र क्रीडेम । (१) आगच्छ हरेऽत्र क्रीडेम । (२) कार्यं कुरु राम ३ ! एष आगतः । (२) कार्यं कुरु रामैष आगतः । (३) आगच्छ राम ३ ! अत्रास्ति सीता । (३) आगच्छ रामात्रास्ति सीता । (४) सक्तून् पिव भीम ३ ! अहं गच्छामि । (४) सक्तून् पिव भीमाहं गच्छामि । इस सूत्र में 'नित्यम्' पद के ग्रहण का प्रयोजन इकोऽसवर्णै० (५६) पर देखें । अब प्रगृह्य के उदाहरणों के लिये प्रगृह्य-सञ्ज्ञा करने वाले सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्--(५१) ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् ।१।१।११॥ ईदूदेदन्तं द्विवचनं प्रगृह्यं स्यात्। हरी एतौ। विष्णू इमौ। गङ्गे अमू॥ अर्थः—ईदन्त उदन्त तथा एदन्त द्विवचन प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—ईदूदेत् ।१।१। द्विवचनम् ।१।१। प्रगृह्यम् ।१।१। समासः—ईच्च ऊच्च एच्च = ईदूदेत्, समाहारद्वन्द्वः । तपरकरणमसन्देहार्थम् । 'ईदूदेत्' यह पद 'द्वि- वचनम्' पद का विशेषण है; अतः येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा इस से तदन्त-विधि हो जाती है। अर्थः—(ईदूदेत्) ईदन्त, उदन्त तथा एदन्त (द्विवचनम्) द्विवचन (प्रगृह्यम्) प्रगृह्यसञ्ज्ञक हों । उदाहरण यथा— 'हरी एतौ' (ये दो हरि अर्थात् घोडे वा बन्दर हैं) यहां रेफोत्तर ईकार ईदन्त द्विवचन है¹ । इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होती है। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्लुत- प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है; अतः एकार=अच् परे होने पर भी इको यणचि (१५) से ईकार को यण् नहीं होता । 'विष्णू इमौ' (ये दो विष्णु हैं) यहां णकारोत्तर ऊकार उदन्त द्विवचन है; इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होती है । प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है । अतः अच् परे होने पर भी इको यणचि (१५) से ऊकार को यण् नहीं होता । १. हरि शब्द से प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से रेफोत्तर इकार तथा औ के स्थान पर पूर्व-सवर्ण-दीर्घ ईकार हो कर 'हरी' सिद्ध होता है। यहां 'ई' यह एकादेश परादिवद्भाव (अन्तादिवच्च) से द्वि- वचन तथा व्यपदेशिवद्भाव से ईदन्त है। इसी प्रकार 'विष्णू' में 'ऊ' को जानें ।
८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'गङ्गे अमू' (ये दो गङ्गाएं हैं) यहां गकारोत्तर एकार एदन्त द्विवचन है¹। इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है । प्रगृह्या-सञ्ज्ञा होने से प्लुत-प्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) सूत्र द्वारा प्रकृतिभाव हो जाता है । अतः यहां एङः पदान्तादति (४३) सूत्र से पूर्वरूप एकादेश नहीं होता । नोट—यहां कई विद्यार्थी 'हरी', 'विष्णू', 'गङ्गे' आदि पदों को ही ईद्वन्त, ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन माना करते हैं, यह उन की भूल हुआ करती है । इस भूल से सावधान रहना चाहिये । यहां ईकार, ऊकार तथा एकार ही ईद्वन्त, ऊदन्त तथा एदन्त द्विवचन हैं । प्रक्रिया ऊपर लिख दी है, आगे सुबन्तों में स्पष्ट हो जायेगी । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५२) अदसो मात् ।१।१।१२॥ अस्मात् परावीदूतो प्रगृह्यौ स्तः । अमी ईशाः । रामकृष्णवामू आसाते । मात् किम् ? अमुकेऽत्र ॥ अर्थः—अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—अदसः ६।१। [अवयव-षष्ठी] । मात् ।५।१। [दिग्योगे पञ्चमी] । ईदूत् ।१।१। प्रगृह्यम् ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से) । अर्थ - (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (मात्) मकार से परे (ईदूत्) ईत् और ऊत् (प्रगृह्यम्) प्रगृह्य- सञ्ज्ञक होते हैं । 'अदस्' शब्द सर्वनाम है । इसका प्रयोग दूरस्थ पदार्थ के निर्देश में होता है । यथा—असौ बालः (वह बालक है) । इस की तीनों लिङ्गों में रूपमाला यथा— (पुल्लिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमी । द्वि०—अमुम्, अमू, अमून् । तृ०— अमुना, अमूभ्याम्, अमीभिः । च०—अमुष्मै, अमूभ्याम्, अमीभ्यः । प०—अमुष्मात्, अमूभ्याम्, अमीभ्यः । ष०—अमुष्य, अमुयोः, अमीषाम् । स०—अमुष्मिन्, अमुयोः, अमीषु । (स्त्रीलिङ्ग में) प्र०—असौ, अमू, अमूः । द्वि०—अमूम्, अमू, अमूः । तृ०— अमुया, अमूभ्याम्, अमूभिः । च०—अमुष्यै, अमूभ्याम्, अमूभ्यः । प०—अमुष्याः, अमूभ्याम्, अमूभ्यः । ष०—अमुष्याः, अमुयोः, अमूषाम् । स०-अमुष्याम्, अमुयोः, अमूषु । (नपुंसक में) प्र०—अदः, अमू, अमूनि । द्वि०—अदः, अमू अमूनि । आगे पुंवत् । अदस् शब्द के मकार से परे ईत् और ऊत् पुल्लिङ्ग में प्रथमा के बहुवचन तथा प्रथमा द्वितीया के द्विवचन में और स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा द्वितीया के १ गङ्गा शब्द से प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर औङ आपः (२१६) से उसे शी = ई आदेश हो कर आद् गुणः (२७) से गुण हो जाता है । यहां 'ए' यह एकादेश परादिवद्भाव से द्विवचन तथा व्यपदेशिवद्भाव से एदन्त है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८५ द्विवचन में ही उपलब्ध होते हैं¹। इन में से स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग वाले इस सूत्र के उदाहरण नहीं होते, क्योंकि वहां पूर्वले ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) सूत्र से ही प्रगृह्य-सञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। केवल पुल्ँलिङ्ग के 'अमू, अमी' इन दो रूपों के लिये ही यह सूत्र बनाया गया है। उदाहरण यथा— अमी ईशाः (ये स्वामी हैं)। यहां पुल्ँलिङ्ग में 'अदस्' शब्द से प्रथमा का बहुवचन 'जस्' करने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, जस् को शी आदेश तथा गुण हो कर 'अदे' बन जाता है। अब एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र से 'ए' को 'ई' तथा दकार को मकार करने से 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है। इस के आगे 'ईशाः' पद लाने से अकः सवर्णे दीर्घः (४२) द्वारा सवर्ण-दीर्घ प्राप्त होता है जो अब इस सूत्र से प्रगृह्य- सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण नहीं होता। नोट—यहां ईदूदेद्० (१.१.११) की दृष्टि में 'अमी' के स्थान पर 'अदे' है क्योंकि एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र त्रिपादीस्थ होने से उस की दृष्टि में असिद्ध है। 'अदे' एदन्त तो है परन्तु द्विवचन नहीं, बहुवचन है; अतः पूर्व-सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता, इसलिये यह सूत्र बनाना पड़ा। यदि इस सूत्र (१.१.१२) की दृष्टि में भी एत ईद् बहुवचने (८.२.८१) सूत्र असिद्ध होने से 'अमी' के स्थान पर 'अदे' माना जाए तो यह सूत्र व्यर्थ हो जायेगा; क्योंकि तब इसे अदस् के मकार से परे ईत् ऊत् कहीं नहीं मिल सकेगा [अदस् शब्द में मकार का आना तथा उस से आगे ईत्, ऊत् का होना एत ईद् बहुवचने (३५७) तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) सूत्रों की ही कृपा का फल है जो दोनों असिद्ध हैं]। अतः इस की दृष्टि में 'अमी' असिद्ध नहीं होता; मकार से परे ईकार की प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है। द्वितीय उदाहरण यथा—राम-कृष्णावमू आसाते (वे दोनों बलराम और कृष्ण बैठे हैं)। यहां 'रामकृष्णौ+अमू' में एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो जाता है। 'रामकृष्णौ' पद इस बात को जतलाने के लिये लिखा गया है कि 'अमू' पुल्ँलिङ्ग का है, स्त्रीलिङ्ग या नपुंसकलिङ्ग का नहीं। स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग का 'अमू' इस सूत्र का उदाहरण नहीं होता²। 'अमू+आसाते' यहां 'अमू' की प्रगृह्यसञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण इको यणचि (१५) से यण् नहीं होता। १. यद्यपि अदस् शब्द के मकार से परे 'अमीभ्यः, अमूभ्यः, अमीषाम्' इत्यादियों में भी ईत्, ऊत् पाये जाते हैं; तथापि यहां इन का कुछ उपयोग नहीं। क्योंकि प्रगृह्य- संज्ञा स्वरसन्धि के निषेध के लिये ही करनी होती है। इन में 'भ्यः, भ्याम्' आदियों का व्यवधान पड़ने से स्वरसन्धि प्राप्त ही नहीं होती। अतः इस सूत्र के उपयोगी 'अमू' और 'अमी' ये दो ही शब्द हैं। २. स्त्रीलिङ्ग में 'अदस्' शब्द से परे प्रथमा या द्वितीया का द्विवचन 'औ' आने पर अत्व, पररूप, टाप्, औङ आपः (२१६) से शी तथा आद् गुणः (२७) से गुण हो कर 'अदे' हुआ। पुनः अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से मत्व और ऊत्व करने
८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट- 'अदस्' शब्द से 'औ' विभक्ति लाने पर मकार को अकारादेश, पररूप तथा वृद्धि एकादेश हो कर - 'अदौ' हुआ। अब अदसोऽसेर्दादु दो म (८.२.८०) से दकार को मकार तथा औकार को ऊकार करने से अमू' सिद्ध होता है। यद्यपि 'अमू' मे ऊदन्त द्विवचन होने के कारण पूर्व-सूत्र से प्रगृह्यसञ्ज्ञा सिद्ध हो सकती थी, तथापि अदसोऽसेर्दादु दो म (८ २ ८०) से किये मत्व और ऊत्व के असिद्ध होने से उस की दृष्टि में 'अदौ' रहता था, अत यह सूत्र बनाया गया है। इस की दृष्टि में तो आरम्भ- सामर्थ्य से ही असिद्ध नही होता, यह पहले कह चुके हैं। मात् किम्? अब यहा यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि सूत्र मे 'मात्' अर्थात् 'म्' से परे' ऐसा क्यो कहा गया है ? क्योकि मकार के अतिरिक्त अन्य किसी वर्ण से परे ईत् व ऊत् अदस् के तीनों लिङ्गों के रूपो मे कही नही पाए जाते, अत 'मात्' ग्रहण न करने से भी 'अमू, अमी' शब्दो की ही प्रगृह्यसञ्ज्ञा होगी। इस का उत्तर है- अमुकेऽत्र । अर्थात् 'मात्' का ग्रहण न करने से 'अमुकेऽत्र' प्रयोग मे दोष आयेगा । तथाहि-- 'अदस्' शब्द से परे अव्यय-सर्वनाम्नामकच् प्राक्टे. (१२२६) सूत्र द्वारा 'अकच्' प्रत्यय हो कर 'अदकम्' बनने पर अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) से मुत्व हो- 'अमुकम्' शब्द निष्पन्न होता है। अब इस में प्रथमा या बहुवचन 'जस्' प्रत्यय लाने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, जस शी (१५२) से शी आदेश तथा आद् गुण (२७) से गुण एकादेश हो कर 'अमुके' प्रयोग सिद्ध होता है। अब इस के आगे 'अत्र' पद लाने
पर 'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। यहा पूर्व-सूत्र (५१) की दृष्टि म 'अदे' होने मे एदन्त द्विवचन है, अत इस की उस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो सकती है। इस के लिये इस सूत्र (५२) के बनाने की कोई आवश्यकता नही। इसी प्रकार नपुंसक- लिङ्ग में 'औ' आने पर त्यदाद्यत्व, पररूप, नपुंसकाच्च (२३५) से शी आदेश तथा आद् गुण' (२७) से गुण हो कर 'अदे' हुआ। पुन अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) से मत्व और ऊत्व करने पर 'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। यहाँ पर भी पूर्व-सूत्र की दृष्टि में 'अदे' होने से एदन्त द्विवचन है, अत प्रगृह्य-सञ्ज्ञा सिद्ध है। इस के लिये भी इस सूत्र के रचने की कोई आवश्यकता नही। इस से सिद्ध होता है कि-केवल पुल्लिङ्ग के 'अमू, अमी' शब्दो के लिये ही यह सूत्र बनाया गया है। ['बाले अमू आसाते' इत्यादिस्त्रीलिङ्गप्रयोगे 'कुले अमू उत्प्रेष्टे' इत्या- दिक्लीबप्रयोगे च ईदूदेद्० (५१) इत्यनेनैव प्रगृह्यता। न च 'रामकृष्णावमू आसाते' इत्यादिपुल्लिङ्गप्रयोगवद् अत्राप्यारम्भसामर्थ्याद् अदसो मात् (५२) इत्यनेनैव प्रगृह्यता किन्न स्यात् ? इति वाच्यम्; यत पुसि 'अमू आसाते' इत्यत्र तु पूर्वेण प्रगृह्यता न सम्भवतीति युक्तम् अदसो मात् (५२) इतिसूत्रे आरम्भ- सामर्थ्यम्, परतस्त्वत्र स्त्रिया क्लीवे तु पूर्वेण सिद्धाया प्रगृह्यसञ्ज्ञाया नास्त्यारम्भ- सामर्थ्यम्, अत स्त्रिया क्लीवे च ईदूदेद्० (५१) इत्यनेनैव प्रगृह्यता, पुसि अदसो मात् (५२) इत्यनेनैवेति शम् ] ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८७ से एडः पदान्तादति (४३) द्वारा पूर्वरूप करने पर 'अमुकेऽत्र' (वे यहां हैं) बन जाता है। यदि सूत्र में 'मात्' ग्रहण न करते तो यहां ककार से परे भी¹ प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता; इस से एडः पदान्तादति (४३) सूत्र प्रवृत्त न हो सकता, अतः 'मात्' ग्रहण किया गया है। शङ्का -- यह आप का प्रत्युदाहरण ठीक नहीं; क्योंकि यहां 'ईत्' अथवा 'ऊत्' नहीं। आप को तो अपने प्रत्युदाहरण में मकार से भिन्न किसी अन्य वर्ण से परे 'ईत्' या 'ऊत्' ही दिखाने चाहियें थे। आप के प्रत्युदाहरण में तो ककार से परे 'एत्' दिखाया गया है। समाधान--ईदूदेद्० (५१) इस पूर्व-सूत्र से यहां 'ईत्, ऊत्, एत्' इन तीनों की अनुवृत्ति आ रही थी; परन्तु इस सूत्र में 'मात्' ग्रहण के सामर्थ्य से 'एत्' का अनु- वर्त्तन नहीं किया जाता, क्योंकि म् से परे अदस् शब्द में कहीं 'एत्' नहीं पाया जाता। अब यदि यहां 'मात्' का ग्रहण नहीं करेंगे तो 'एत्' की भी अनुवृत्ति आ जाने से 'अमुकेऽत्र' यहां प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण सन्धि न हो सकेगी; अतः 'एत्' की अनुवृत्ति रोकने के लिये 'मात्' पद का ग्रहण करना अत्यावश्यक है। असति माद्ग्रहणे एकारोऽप्यनुवर्तेत [सि० कौ०] । अभ्यास (१२) (१) व्याकरणशास्त्र में प्रकृतिभाव का क्या अभिप्राय है ? स्पष्ट करें। (२) इन्द्रे च सूत्र की वृत्ति में किस बात की कमी रह गई है ? स्पष्ट करें। (३) सर्वत्र विभाषा गोः में 'सर्वत्र' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (४) दूराद् धूते च सूत्र के अर्थ में 'विकल्प' कहां से आ जाता है ? (५) 'देवदत्त एहि' इस वाक्य की टि को प्लुत क्यों नहीं होता ? (६) 'आगच्छ कृष्ण३ात्र गौश्चरति' क्या यह शुद्ध है ? (७) इन्द्रे च सूत्र बनाने की क्या आवश्यकता थी ? क्या पूर्व-सूत्र से 'गवेन्द्रः' सिद्ध नहीं हो सकता था ? (८) अनेकाल् शित् सर्वस्य सूत्र में 'शित्' ग्रहण पर प्रकाश डालें। (६) स्त्रीलिङ्ग वा नपुंसकलिङ्ग के 'अमू' में अदसो मात् क्यों नहीं लगता ? (१०) निम्नस्थ रूपों में सन्धि करें अथवा सन्धि न करने का कारण बताएं। १. कवी अत्र । २. योगी अत्र । ३. वायू अत्र । ४. रामे अत्र । ५. माले अत्र । ६. कुले इमे उत्कृष्टे एधेते अधुना । ७. धनुषी एते अस्य । ८. घने इमे । ६. वर्धेते अस्मिन् । १०. ऋतू अतीतौ । ११. पाणी उत्क्षिपत्ति । १२. हस्ती उत्क्षिपत्ति । १३. बालिके अधीयाते । १४. नेत्रे आमृशति । १५. वटू उत्कूर्दते अत्र । १६. अमी अश्नन्ति । १. क्योंकि तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते (प०) इस परिभाषा से 'अदकस्' भी 'अदस्' शब्द माना जाता है।
८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् १७ बालावभू अश्नीत । १८ कुमार्यावभू अश्नीत । १६ ते अत्र । २० कन्ये आसाते । २१ अमू इन्द्र प्रस्थे दृष्टौ । २२ कवी आगच्छत । (११) ‘मात् किम् ? अमुवेऽत्र’ इस अंश की व्याख्या करते हुए प्रत्युदाहरण में दोष की उद्भावना कर के उस का समाधान करें । (१२) ‘हरी एतौ’ में कौन ईदन्त द्विवचन है, सप्रमाण स्पष्ट करें । (१३) ‘गवाक्ष’ प्रयोग के अन्य विकल्प ‘गोअक्ष, गोऽक्ष’ क्यों नहीं बनते ? (१४) अलोऽन्त्यस्य, अनेकाल् शित् सर्वस्य, ङिच्च—इन तीन परिभाषाओं में कौन उत्सर्ग और कौन अपवाद है ? प्रत्येक का उदाहरण-प्रदर्शन- पूर्वक स्पष्टीकरण करें । अब निपातों की प्रगृह्य-सञ्ज्ञा के लिये निपात-विधायक सूत्र लिखते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५३) चादयोऽसत्त्वे । १ । ४ । ५७ ॥ अद्रव्यार्थाश्चादयो निपाता स्युः ॥ अर्थः—यदि चादियों का द्रव्य अर्थ न हो तो उन की निपात-सञ्ज्ञा होती है । व्याख्या—चादयः ।१।३। असत्त्वे ।७।१। निपाता ।१।३। (प्राग्रीश्वरान्निपाताः यह अधिकृत है) । समास — च = च-शब्द आदिर्येषान्ते चादयः, तद्गुणसंविज्ञान- बहुव्रीहि-समास । न सत्त्वम्=असत्त्वम्, तस्मिन्=असत्त्वे, नञ्-तत्पुरुष । यह प्रसज्य-प्रतिषेध है, यदि पर्युदास प्रतिषेध मानें तो अनर्थक चादियों की निपात-सञ्ज्ञा न हो सकेगी । अर्थ — (असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर (चादयः) ‘च’ आदि शब्द (निपाता ) निपात-सञ्ज्ञक होते हैं । जिस में सङ्ख्या पाई जाए या जिस के लिये सर्वनाम का प्रयोग हो सके, उसे ‘द्रव्य’ कहते हैं । चादि-गण आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में आ जायेगा । उदाहरण यथा— ‘लोधं नयन्ति पशु मन्यमाना’ यहां ‘पशु’ शब्द का अर्थ ‘सम्यक् = ठीक प्रकार से’ ऐसा है । अतः यह अद्रव्यवाची होने से निपात संज्ञक होता है । यदि ‘पशु’ का अर्थ ‘जान- वर’ होगा, तो वह द्रव्यवाची होने से निपात-सञ्ज्ञक न होगा । यथा—पशुं नयन्ति । निपात सञ्ज्ञा होने से (३६७) सूत्र द्वारा ‘अव्यय’ सञ्ज्ञा हो जाती है, इस से विभक्ति का लुक् हो जाता है, यह सब आगे ‘अव्यय-प्रकरण’ में सविस्तर लिखेंगे । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५४) प्रादयः । १ । ४ । ५८ ॥ एतेऽपि तथा ॥ अर्थ —अद्रव्यार्थक प्रादि भी निपात-सञ्ज्ञक होते हैं । व्याख्या—असत्त्वे ।७।१। (चादयोऽसत्त्वे से)। प्रादयः ।१।३। निपाता ।१।३। (प्राग्रीश्वरान्निपाताः यह अधिकृत है) । अर्थ —(असत्त्वे) द्रव्य अर्थ न होने पर (प्रादयः) ‘प्र’ आदि शब्द (निपाता ) निपात संज्ञक होते हैं । प्रादि-गण पीछे (३५) सूत्र पर मूल में ही आ चुका है ।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ८६ प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) सूत्र से अष्टाध्यायी में निपातों का अधिकार आरम्भ किया जाता है; अर्थात् इस सूत्र से ले कर अधिरीश्वरे (१.४.९६) सूत्र- पर्यन्त निपात-सञ्ज्ञक कहे गये हैं। इसी अधिकार में पाणिनि ने प्रादय उपसर्गाः क्रिया- योगे ऐसा एक सूत्र पढ़ा है। इस का अर्थ यह है—'प्र' आदि वाईस शब्द क्रियायोग में निपात-सञ्ज्ञक होते हुए उपसर्ग-सञ्ज्ञक होते हैं। अब इस अर्थ से यह दोष उत्पन्न होता है कि जहां क्रिया-योग नहीं, वहां निपात-सञ्ज्ञा नहीं हो सकती। परन्तु हमें तो क्रियायोग में उपसर्ग-सञ्ज्ञा के साथ साथ तथा क्रियायोगाभाव में भी निपात-सञ्ज्ञा करनी इष्ट है। भाष्यकार भगवान् पतञ्जलि ने इस एक सूत्र से ये दोनों कार्य न होते देख कर इस के दो विभाग कर दिये हैं। (१) प्रादयः। (२) उपसर्गाः क्रिया- योगे। तो अब प्रथम सूत्र से क्रियायोगाभाव में तथा दूसरे सूत्र से क्रियायोग में निपात- सञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। क्रियायोगाभाव में निपात-सञ्ज्ञा करने का प्रयोजन— 'यज्ञदत्तोऽपि मूर्खः' इत्यादि में 'अपि' से परे सुँब्लुक् आदि कार्य करना है। क्रियायोग में निपात-सञ्ज्ञा करने का प्रयोजन—'प्राच्छति' आदि में अव्ययसंज्ञा करके विभक्ति का लुक् करना है। द्रव्य अर्थ में प्रादियों की निपात-सञ्ज्ञा नहीं होती। यथा प्रादियों में 'वि' शब्द पढ़ा गया है; यदि इस का अर्थ पक्षी होगा तो द्रव्यार्थक होने से इस की निपात- सञ्ज्ञा न होगी। निपात न होने से यह अव्यय न होगा और तब इस से परे सुँप् का लुक् भी न होगा—विः = पक्षी, विं पश्य, विना तुल्यं वायुयानम् । अब अग्रिम सूत्र द्वारा निपातों की प्रगृह्य-संज्ञा विधान करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(५५) निपात एकाजनाङ् ।१।१।१४॥ एकोऽच् निपात आङ्वर्जः¹ प्रगृह्यः स्यात् । इ इन्द्रः । उ उमेशः । वाक्य-स्मरणयोरङित् । आ एवं नु मन्यसे । आ एवं किल तत् । अन्यत्र ङित् —ईषदष्णम् = ओष्णम् ।। अर्थः—आङ् को छोड़ कर एक अच् मात्र निपात प्रगृह्यसञ्ज्ञक हो । व्याख्या—निपातः ।१।१। एकाज् ।१।१। अनाङ् ।१।१। प्रगृह्यः ।१।१।(ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से)। समासः—एकश्चासावच् = एकाच्, कर्मधारय-समासो न तु बहुव्रीहिः। न आङ् = अनाङ्, नञ्तत्पुरुषः। अर्थः—(अनाङ्)आङ् से भिन्न (एकाज्) एक अच् रूप (निपातः) निपात (प्रगृह्यः) प्रगृह्य-संज्ञक होता है। उदाहरण यथा— इ इन्द्रः [ओह ! यह इन्द्र है] । उ उमेशः [जान पड़ता है कि यह महादेव है]। यहां 'इ' और 'उ' एक अच्-रूप तथा अद्रव्यार्थक होने से चादयोऽसत्त्वे (५३) द्वारा निपात संज्ञक हैं;अतः इस सूत्र से इन की प्रगृह्य-संज्ञा हो कर प्लुतप्रगृह्या अचि० (५०) द्वारा प्रकृतिभाव के कारण अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से प्राप्त सवर्ण-दीर्घ १. वर्ज्यते = त्यज्यत इति वर्जः, कर्मणि घञ्-प्रत्ययः । आङा वर्जः—आङ्वर्जः, तृतीया- तत्पुरुषः । आङ्भिन्न इत्यर्थः ।
६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नही होता। यहा 'इ' निपात आश्चर्य करने मे तथा 'उ' निपात वितर्क करने मे प्रयुक्त हुआ है। 'एकाच्' यहा 'एकश्चासावच् = एकाच्' [एक भी हो और वह अच् भी हो] इस प्रकार कर्मधारय-समास करना ही उचित है। यदि 'एकोऽच् यस्मिन् स एकाच्' [एक अच् जिस मे हो वह] इस प्रकार बहुव्रीहि-समास करेंगे तो-'च + अस्ति = चास्ति' मे सवर्ण-दीर्घ न हो सकेगा, क्योकि तब 'च' की भी प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जायेगी क्योकि वह भी एक अच् वाला है। चादिगण मे 'आ' तथा प्रादिगण मे 'आङ्' इस प्रकार दो निपात पढे गये हैं। इन मे से प्रथम 'आ' की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है पर दूसरे 'आङ्' की इस सूत्र मे 'अनाङ्' कहने के कारण प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि आ और आङ् ये दोनों प्रयोग मे तो 'आ' के रूप में ही मिलते हैं क्योकि हलन्त्यम् (१) द्वारा आङ् का ङकार इत् हो कर लुप्त हो जाता है, ऐसी दशा मे यह कैसे विदित हो कि यह आ है, और यह आङ् ? इस के उत्तर के लिये भाष्यकार ने यह व्यवस्था की है— ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् ॥ अर्थात्-अल्प (थोडा) अर्थ मे, क्रिया के योग मे, मर्यादा और अभिविधि अर्थ में जो आकार हो उसे ङित्—आङ् समझना चाहिये। पूर्व कही बात को अन्यथा करने के लिये प्रयुक्त वाक्य मे तथा स्मरण अर्थ मे अङित्—'आ' समझना चाहिये। (१) ईषदर्थे यथा-आ + उष्ण = ओष्णम् । [यहा प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमाया वार्त्तिक से नित्य-समास होता है। नित्य-समासो का स्वपद-विग्रह नही हुआ करता, मूल मे इसी लिये 'ईषदुष्णम्' ऐसा अस्वपद-विग्रह दिखाया गया है। 'ओष्णम्' का अर्थ है-थोडा गरम]। यहा 'आङ्' होने से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती; अतः प्रकृति- भाव न होने के कारण आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश हो जाता है। (२) क्रिया-योगे यथा-आ + इहि=एहि (आओ), आ + इतः=एत (वे दो आते हैं)। यहा इण् गतौ इस अदादिगणीय क्रिया का योग है; अतः 'आङ्' होने से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नही होती। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने से प्रकृतिभाव भी नही होता; आद् गुणः (२७) से गुण हो जाता है। (३) मर्यादाया' यथा- आ + अलवरात् = आलवराद् वृष्टो मेघ (अलवर १. तेन विनेति मर्यादा, तेन सहेत्यभिविधि । मर्यादा और अभिविधि में यह भेद होता है कि मर्यादा मे अवधि का ग्रहण नही होता और अभिविधि मे ग्रहण होता है। यथा-'अलवर तक मेघ बरसा' यहा मेघ बरसने की अवधि 'अलवर' है। मर्यादा में इस अवधि का ग्रहण न होने से यह तात्पर्य होगा कि अलवर देश को
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६१ देश तक परन्तु अलवर देश को छोड़ कर मेघ बरसा)। यहां मर्यादा अर्थ होने से 'आ' ङित् अर्थात् 'आङ्' है अतः प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने के कारण प्रकृतिभाव नहीं होता, अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो जाता है। (४) अभिविधौ यथा—आ+अलवराद्=आलवराद् वृष्टो मेघः (अलवर देश तक अर्थात् अलवर देश में भी मेघ बरसा)। यहां अभिविधि अर्थ होने से 'आ' ङित् अर्थात् 'आङ्' है अतः प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने के कारण प्रकृतिभाव नहीं होता; सवर्णदीर्घ हो जाता है। अब 'आ' के उदाहरण-- (१) वाक्ये यथा—आ एवं नु मन्यसे (अब तू ऐसा मानता है, अर्थात् पहले तू ऐसा नहीं मानता था अब मानने लगा है)। यहां 'आ' के अङित् होने से प्रगृह्य-संज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है। वृद्धिरेचि (३३) सूत्र से वृद्धि एकादेश नहीं होता। (२) स्मरणे यथा—आ एवं किल तत् (हां वह ऐसा ही है)। यहां 'आ' के अङित् होने से प्रगृह्य-संज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है। वृद्धिरेचि (३३) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५६) ओत् ।१।१।१५॥ ओदन्तो निपातः प्रगृह्यः स्यात्। अहो ईशाः॥ अर्थः—ओकार अन्त वाला निपात प्रगृह्य-सञ्ज्ञक हो। व्याख्या - ओत् ।१।१। निपातः ।१।१। (निपात एकाजनाङ् से)। प्रगृह्यः ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से)। 'ओत्' यह 'निपातः' पद का विशेषण है, अतः इस से तदन्त-विधि होती है। अर्थः- (ओत् = ओदन्तः) ओदन्त (निपातः) निपात (प्रगृह्यः) प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है। यथा- अहो ईशाः (अहो ! ये स्वामी हैं)। यहां अद्रव्यवाची होने से चादयोऽसत्त्वे (५३) द्वारा 'अहो' निपात-सञ्ज्ञक है; इस की इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो जाती है। प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण एचो- ऽयवायावः (२२) द्वारा प्राप्त अवादेश नहीं होता। इसीप्रकार अथो, नो, आहो, उताहो आदि अन्य ओदन्त निपातों में भी समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे कि यहां एक अच् रूप निपात न होने से पूर्वसूत्र द्वारा प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न हो सकती थी अतः यह सूत्र बनाया गया है। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(५७) सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावना ॥१।१।१६॥ सम्बुद्धि-निमित्तक ओकारो वा प्रगृह्योऽवैदिक इतौ परे। विष्णो इति। विष्ण इति। विष्णविति ॥ छोड़ कर उस तक मेघ बरसा। अभिविधि में इस अवधि का ग्रहण होने से यह तात्पर्य होगा कि अलवर देश सहित उस तक मेघ बरसा। अन्य उदाहरण यथा— आ पाटलिपुत्राद् वृष्टो मेघः, आ कुमारं यशः पाणिनेः, ओदकान्तात् प्रियोऽनु- गन्तव्यः। यहां द्वितीय उदाहरण में अभिविधि तथा तृतीय में मर्यादा अर्थ है।
६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अर्थ —सम्बुद्धि-निमित्तक ओकार—अवैदिक अर्थात् वेद में न पाये जाने वाले 'इति' शब्द के परे होने पर विकल्प कर के प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है । व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। [निमित्त-सप्तम्येषा] । ओत् ।१।१। (ओत् से) । अनार्षे ।७।१। इतौ ।७।१। प्रगृह्य ।१।१। (ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् से) । शाकल्यस्य ।६।१। समास —ऋषिर्वेदः, उक्तञ्च मेदिनीकोषे—ऋषिर्वेदे वसिष्ठादौ दीधितौ च पुमानयम् । ऋषौ (वेदे) भव =आर्षं, तत्र भव. (१०८६) इत्यण्, न आर्षं = अनार्षंस्तस्मिन् =अनार्षे, नञ्तत्पुरुषः । 'अवैदिके' इत्यर्थः । अर्थ — (अनार्षे) वेद में न पाये जाने वाले (इतौ) इति शब्द के परे होने पर (सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि को निमित्त मान कर पैदा हुआ (ओत्) ओकार (प्रगृह्य) प्रगृह्य-सञ्ज्ञक होता है (शाकल्यस्य) शाकल्य के मत में । अन्य आचार्यों के मत में प्रगृह्य-सञ्ज्ञा नहीं होती, परन्तु हमें सब आचार्य प्रमाण हैं, यत विकल्प से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होगी । उदाहरण यथा — विष्णो इति ( 'विष्णो' यह शब्द) । विष्णु शब्द से परे सम्बुद्धि [सम्बोधन के एकवचन को सम्बुद्धि कहते हैं। देखो—एकवचनं सम्बुद्धिः (१३२)] करने पर ह्रस्वस्य गुण (१६६) सूत्र से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर गुण हो कर—विष्णो+स् । अब एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धे (१३४) सूत्र से सुकार का लोप करने पर 'विष्णो' पद सिद्ध हो जाता है । इस के आगे 'इति' पद लाने से एचोऽयवायाव. (२२) द्वारा ओकार को अव् आदेश प्राप्त होना था जो अब इस सूत्र से प्रगृह्य-सञ्ज्ञा होने से प्रकृतिभाव के कारण नहीं होता । अन्य आचार्यों के मत में प्रगृह्य-सञ्ज्ञा न होने से अव् आदेश हो कर 'विष्णव् इति' बना । अब इस दशा में पदान्त वकार का लोप शाकल्यस्य (३०) सूत्र से वैकल्पिक लोप हो जाता है । लोपपक्ष में 'विष्ण इति' (वकारलोप के असिद्ध होने से गुण नहीं होता) और लोपाभावपक्ष में 'विष्णविति' इस प्रकार कुल मिला कर तीन रूप सिद्ध होते हैं : यह उदाहरण वेद का नहीं, वेद में तो 'इति' शब्द परे होने पर प्रगृह्य- सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु अव् आदेश हो जाता है । यथा—एता गा ब्रह्मबन्ध्व इत्यब्रवीत् [यह काठकसंहिता (१० ६) का वचन है] । नोट—वस्तुत अन्य आचार्यों के मत में 'विष्णविति' ही रूप होता है, 'विष्ण इति' नहीं । क्योकि जब शाकल्य आचार्य के मत में ओ को अव् ही नहीं होता तो पुनः उन के मत में लोप शाकल्यस्य (३०) से वकार का लोप कैसे सम्भव हो सकता है ? काशिका आदि प्राचीन ग्रन्थों में सर्वत्र इस सूत्र पर दो ही उदाहरण लिखे मिलते हैं, लोप वाला रूप कहीं नहीं देखा जाता ।¹ १ इस सूत्र पर कई मनीषियों का विचार है कि यह सूत्र वैदिकपदपाठविषयक ही है । सर्वप्रथम आचार्य शाकल्य ने ऋग्वेद के अपने पदपाठ में वायो, विष्णो आदि ओदन्त सम्बुद्ध्यन्त पदों के आगे 'इति' शब्द लगा कर उन को निर्दिष्ट किया तथा उन के मध्य स्पष्टप्रतिपत्ति के लिये सन्धि भी नहीं की । तदनन्तर अन्य
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६३ [लघु०] विधि-सूत्रम्- (५८) मय उञो वो वा ।८।३।३३॥ मयः परस्य उञो वो वा स्यादचि । किम्वुक्तम् । किमु उक्तम् ॥ अर्थः- मय् प्रत्याहार से परे उञ् निपात को विकल्प कर के 'व्' आदेश हो जाता है अच् परे हो तो । व्याख्या- मयः ।५।१। उञः ।६।१। वः ।१।१। वकारादकार उच्चारणार्थः । वा इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् से) । अर्थः-- (मयः) मय् प्रत्याहार से परे (उञः) उञ् के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (वः) व् आदेश होता है (अचि) अच् परे हो तो । मय् प्रत्याहार में लकार को छोड़ कर अन्य सब वर्गस्य वर्ण आ जाते हैं । उदाहरण यथा- किम् उ उक्तम् (क्या कहा ?) । यहां उञ् के एक अच् रूप निपात होने से निपात एकाजनाङ् (५५) सूत्र प्राप्त होता है । इस का बाध कर इस सूत्र से वैकल्पिक वकार हो जाता है । जहां वकार आदेश होता है वहां- 'किम्वुक्तम्' प्रयोग सिद्ध होता है । वकारादेश के अभाव में यथाप्राप्त प्रगृह्य-सञ्ज्ञा हो कर प्रकृतिभाव के कारण सवर्णदीर्घ नहीं होता- किम् उ उक्तम् । इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं । नोट-यह सूत्र मोऽनुस्वारः (८.३.२३) सूत्र की दृष्टि में पर त्रिपादी होने से असिद्ध है; अतः 'किम्वुक्तम्' यहां हल् = वकार परे होने पर भी मोऽनुस्वारः (७७) से मकार को अनुस्वार नहीं होता । तथा हि- त्रैपादीये वकारे तु नानुस्वारः प्रवर्त्तते । ध्यान रहे कि उञ् का ञकार हलन्त्यम् (१) से इत्सञ्ज्ञक हो कर तस्य लोपः (३) से लुप्त हो जाता है । इस प्रकार 'उ' मात्र शेष रहता है । अभ्यास (१३) (१) अधोलिखित प्रयोगों में ससूत्र सन्धि या सन्ध्यभाव दर्शाएं- १. भानविति । २. शम्बोस्तु वेदिः । ३. वाय इति । ४. अहो आश्चर्यम् । ५. तद्द्यस्य परेः । ६ शम्भो इति । ७. अथो इति । ८. उ उत्तिष्ठ । ६. नो इदानीम् । १०. ओदकान्तात् प्रियो जनोऽनुगन्तव्यः । ११. अहो अद्य महोष्णता । १२. इ इन्द्रं पश्य । १३. किमिदं सत्यम् उताहो असत्यम् । १४. किमु आवपन्तम् । (२) कहां २ 'आ' ङित् और कहां २ अङित् होता है ? सोदाहरण स्पष्ट करें । पदपाठकारों ने भी शाकल्य के इस नियम का अनुसरण किया । शाकल्यग्रहण को काशिकाकार ने विभाषार्थ माना है। इस विभाषा को व्यवस्थितविभाषा ही समझना चाहिये । तैत्तिरीयपदपाठ को छोड़ अन्य पदपाठों में प्रगृह्यसंज्ञा नित्य होती है । तैत्तिरीयपदपाठ में सन्धि उपलब्ध होती है । अत एव हरदत्तमिश्र ने यहां पदमञ्जरी में लिखा है- तत्र बह्वृचाः प्रगृह्यमेवाधीयते, तैत्तिरीयास्त्वप्रगृह्यम् ।
६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (३) प्रादय उपसर्गाः क्रियायोगे सूत्र का योगविभाग क्यों किया जाता है ? (४) 'किम्बुक्तम्' यहां मोऽनुस्वार (७७) सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ? (५) निपात एकाजनाङ् के 'एकाच्' पद में क्यों बहुव्रीहिसमास नहीं मानते ? (६) 'वस्तुत विष्ण इति' रूप नहीं बनता—इस कथन की व्याख्या करें। (७) उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक मर्यादा और अभिविधि का परस्पर भेद बताए। (८) पदपाठ की दृष्टि से सम्बुद्धौ शाकल्यस्येता० सूत्र की व्याख्या करें। ० [लघु०] विधि-सूत्रम्—(५६) इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ।६।१।१२३।। पदान्ता इको ह्रस्वा वा स्युरसवर्णेऽचि । ह्रस्वविधिसामर्थ्यान्न स्वर- सन्धि । चक्रि अत्र । चक्र्यत्र । पदान्ता इति किम् ? गौर्यौ ॥ अर्थ —असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् विकल्प कर के ह्रस्व हो जाते हैं। ह्रस्वविधि०—ह्रस्वविधान करने के सामर्थ्य से स्वर सन्धि नहीं होनी । व्याख्या—पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति में विभक्तिविपरिणाम करके)। इक् ।६।१। असवर्णे ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। ह्रस्व ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थ —(असवर्णे) असवर्ण (अचि) अच् परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (इक्) इक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य) शाकल्य आचार्य के मत में। अन्य आचार्यों के मत में नहीं होता, हमें सब आचार्य प्रमाण हैं अतः ह्रस्व विकल्प से होगा। उदाहरण यथा— चक्री +अत्र (विष्णु यहां हैं) यहां पदान्त इक् ईकार है, इस से परे 'अ' यह असवर्ण अच् वर्त्तमान है अतः इक् को विकल्प करके ह्रस्व हो गया। जहां ह्रस्व हुआ वहां—'चक्रि अत्र'। जहां ह्रस्व न हुआ वहां इको यणचि (१५) से यण् होकर 'चक्यत्र' इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इस के अन्य उदाहरण यथा—१ मधु¹ अस्ति, मध्वस्ति। २ दधि अस्ति, दध्यस्ति। ३ वस्तु आनय, वस्त्वानय। ४ वारि अत्र, वार्यत्र। ५ योगि आग- च्छति, योग्यागच्छति। ६ घनि अवोचत्, घन्यवोचत्। ७ नदि एधते, नद्येधते। ८ जाह्नवि अवतरति, जाह्नव्यवतति। ९ बलि ऋक्ष , बल्यृक्ष । १० भवति एव, भवत्येव। ११ धातृ अत्र, धात्रत्र। अब जहां ह्रस्व करते हैं वहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि यहां इको यणचि (१५) सूत्र से यण् क्या न किया जाए ? इसका उत्तर यह है कि यदि वहां भी यण् हो जाए तो पुनः इस सूत्र से ह्रस्व करना व्यर्थ हो जायेगा, क्योंकि तब दोनों पक्षों में 'चक्यत्र' रूप समान हो जायेगा जो इस सूत्र के बिना भी इको यणचि (१५) सूत्र से सिद्ध हो सकता है। अतः इस सूत्र द्वारा ह्रस्व करने के सामर्थ्य से यहां सन्धि न १ यहां यह ध्यातव्य है कि ह्रस्वों को भी पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति न्याय से ह्रस्व हो जाया करता है। इस का फल सन्ध्यभाव स्पष्ट ही है। यह विषय इस सूत्र के भाष्य में अत्यन्त स्पष्ट है।
अच्-सन्धि-प्रकरणम् ६५ होगी। ध्यान रहे कि मूल में 'स्वरसन्धि' कथन इस लिये किया गया है कि यहां स्वर- सन्धि के अतिरिक्त अन्य कोई सन्धि प्राप्त ही नहीं हो सकती। इस सूत्र में 'असवर्ण' ग्रहण का यह प्रयोजन है कि 'योगी + इच्छति = योगीच्छति' 'कुमारी + ईहते = कुमारीहते' इत्यादियों में सवर्ण अच् परे होने पर ह्रस्व न हो। 'पदान्त' ग्रहण इस लिये किया गया है कि—'गौरी + औ' यहां अपदान्त इक् को ह्रस्व न हो जाए। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्यौ' बन जाए। ध्यान रहे कि प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) में 'नित्यम्' ग्रहण के कारण उस के विषय में इस सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। यथा—हरी एतौ, शिशू आक्रन्दतः। इन में प्रकृत ह्रस्वसमुच्चित प्रकृतिभाव न हो कर उस के द्वारा नित्य प्रकृतिभाव होता है। अब प्रसङ्गवश 'गौर्यौ' में द्वित्व करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (६०) अचो रहाभ्यां द्वे ।८।४।४५॥ अचः पराभ्यां रेफहकाराभ्यां परस्य यरो द्वे वा स्तः। गौर्य्यौ॥ अर्थः—अच् से परे जो रेफ या हकार उस से परे यर् को विकल्प से द्वित्व हो। व्याख्या—अचः ।५।१। रहाभ्याम् ।५।२। द्वे ।१।२। यरः ।६।१। वा इत्यव्यय- पदम्। (यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा से)। अर्थः—(अचः) अच् से परे (रहाभ्याम्) जो रेफ या हकार उस से परे (यरः) यर् के (द्वे) दो शब्दस्वरूप (वा) विकल्प कर के हो जाते हैं। उदाहरण यथा—'गौर् यौ' यहां अच् = 'औ' से परे रेफ है अतः उस से परे यर् यकार को विकल्प करके द्वित्व होकर द्वित्वपक्ष में 'गौर्य्यौ' तथा द्वित्वाभाव- पक्ष में 'गौर्यौ' इस प्रकार दो रूप बन जाते हैं। इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १. आर्य्यः, आर्यः। २. अर्क्कः, अर्कः। ३. कार्य्यम्, कार्यम्। ४. हर्य्यनुभवः, हर्य्नुभवः। ५. उर्व्वी, उर्वी। ६. आह्लादः, आह्लादः। ७. अर्ज्जुनः, अर्जुनः। ८. आर्त्तः, आर्तः। ६. आह्वयः, आह्वयः। १०. आर्द्रकम् आर्द्रकम्। ११. ब्रह्मा, ब्रह्मा। १२. अर्त्यः, अर्थः। १३. न ह्य्यस्ति, न ह्यस्ति। १४. गर्मः, गर्मः। १५. ऊर्द्धवम्, ऊर्ध्वम्। १६. दुर्गः, दुर्गः। १७. अर्घ्यः, अर्घ्यः। १८. मूर्च्छना, मूर्छना। १६. अपह्नुते, अपह्नुते। २०. मूर्खः, मूर्खः। २१. शर्म्या, शर्मा। २२. विसर्गः, विसर्गः। २३. प्राण्र्णम्, प्राण्र्णम्। २४. कर्म्म, कर्म। २५. निर्झरः, निर्भरः। १
१. गर्मः, निर्झरः, अर्घ्यः, ऊर्द्धवम् आदि में द्वित्व के बाद झलां जश्झशि (१६) से जश्त्व हो जाता है तथा 'मूर्खः, अर्त्यः, मूर्च्छना आदि में खरि च (७४) से चर्त्व। आर्पम्, अर्शः आदि में प्रकृतसूत्र के प्राप्त द्वित्व का शरोऽचि (२६६) से निषेध हो जाता है। 'मूर्च्छना' में तुक् आगम समझने की भूल से बचें।
६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
अब प्रसङ्गतः प्राप्त हुए द्वित्व को कह कर पुनः इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च (५६) सूत्र पर निषेधक वार्त्तिक लिखते हैं— [लघु०] वा०—(६) न समासे ॥ वाप्यश्व ॥ अर्थ —समास में असवर्ण अच् परे होने पर पदान्त इक् को ह्रस्व नहीं होता । व्याख्या—वापी+अश्व [वावडी में घोडा । वाप्यामश्व =वाप्यश्व, सह सुपा (६०६) इति समास ।] यहां समास में विभक्तियों का लुक् होने पर प्रत्यय- लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र द्वारा ईकार पदान्त हो जाता है, इसे असवर्ण अच् (अ) परे होने पर पूर्वसूत्र (५६) से ह्रस्व प्राप्त था जो अब इस वार्त्तिक के निषेध के कारण नहीं होता । इको यणचि (१५) से यण् हो कर विभक्ति लाने से—'वाप्यश्व' सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार— सुध्युपास्य मध्वरि गौर्यात्मज नद्युदय चार्वङ्गी, मात्राज्ञा वध्वागमनम्, लाकृति' प्रभृति समास में भी समझ लेना चाहिये । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(६१) ऋत्यकः ।६।१।१२४॥ ऋति परे पदान्ता अकः प्राग्वद् वा । ब्रह्म ऋषि । ब्रह्मर्षि । पदान्ता त्किम् ? आर्च्छत् ॥ अर्थ —ऋत् (ह्रस्व ऋकार) परे होने पर पदान्त अक् विकल्प से ह्रस्व हो । व्याख्या—ऋति ।७।१। पदान्तस्य ।६।१। (एङः पदान्तादति से विभक्ति- विपरिणाम द्वारा)। अकः ।६।१। ह्रस्वः ।१।१। शाकल्यस्य ।६।१। (इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च से )। अर्थ —(ऋति) ह्रस्व ऋवर्ण परे होने पर (पदान्तस्य) पदान्त (अकः) अक् के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है (शाकल्यस्य) शाकल्य आचार्य के मत में । अन्य आचार्यों के मत में न होने से विकल्प हो जायेगा । उदाहरण यथा— 'ब्रह्मा+ऋषि' यहां 'ऋषि' शब्द का आदि ऋत् परे है, अतः मकारोत्तर पदान्त आकार को विकल्प करके ह्रस्व होकर—'ब्रह्म ऋषि' तथा ह्रस्वाभावपक्ष में आद् गुणः (२७) से गुण, रपर होकर— ब्रह्मर्षि' बना । [अथवा 'ब्रह्म+ऋषि' ऐसे छेद में ह्रस्व को ह्रस्व होगा । ब्रह्मणः =वेदस्य ऋषिः —ब्रह्मर्षिरित्यादिविग्रह ] । पूर्व (५६) सूत्र सवर्ण परे होने पर प्रवृत्त नहीं होता था तथा अकार को ह्रस्व भी नहीं करता था, इन दोनों आवश्यकताओं के लिये यह सूत्र बनाया गया है । जैसा कि महाभाष्य में कहा है—सवर्णार्थम् अनिगन्तार्थञ्च । सवर्ण परे होने पर यथा— होतृ ऋद्धय, होतॄद्धय । यहां पूर्व-सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता था । अकार का उदाहरण—ब्रह्मऋषि, ब्रह्मर्षि । ध्यान रहे कि जहां २ ह्रस्व करेंगे वहां २ पूर्ववत् ह्रस्वविधान के सामर्थ्य से स्वर-सन्धि नहीं होगी । इस सूत्र में भी पूर्ववत् 'पदान्त' का ग्रहण होता है, अतः अपदान्त अक् को ह्रस्व नहीं होता । उदाहरण यथा—'आ+ऋच्छत्' [यह तौदादिक 'ऋच्छ' अथवा भौवादिक 'ऋ' धातु के लङ् लकार के प्रथम-पुरुष का एकवचन है । 'आ' यह यहां