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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

(तब) भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! आपका यह विचार सर्वथा उत्तम तथा कौरवोंका यश बढ़ानेवाला है। राजेन्द्र! आपने जैसा कहा है, उसे आज ही जितना शीघ्र सम्भाव हो सके, पूर्ण कर डालिये।

वैशम्पायन उवाच

इत्येवमुक्त्वा वार्ष्णेयस्त्वरयामास तं तदा ।
यथोक्तं धृतराष्ट्रस्य कारयामास कौरवः ॥
तस्मिन् क्षणे महाराज कृष्णद्वैपायनस्तदा ।
आगत्य कुरुभिः सर्वैः पूजितः स सुहृद्गणैः ॥
मूर्धावसिक्तैः सहितो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
कारयामास विधिवत् केशवानुमते तदा ॥
कृपो द्रोणश्च भीष्मश्च धौम्यश्च व्यासकेशवौ ।
बाह्लीकः सोमदत्तश्च चातुर्वेद्यपुरस्कृताः ॥
अभिषेकं तदा चक्रुर्भद्रपीठे सुसंयतम् ।
जित्वा तु पृथिवीं कृत्स्नां वशे कृत्वा नरर्षभान् ॥
राजसूयादिभिर्यज्ञैः ऋतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
स्नात्वा ह्यवभृथस्नानं मोदतां बान्धवैः सह ॥
एवमुक्त्वा तु ते सर्वे आशीर्भिरभिपूजयन् ।
मूर्धाभिषिक्तः कौरव्य सर्वाभरणभूषितः ॥
जयेति संस्तुतो राजा प्रददौ धनमक्षयम् ।
सर्वमूर्धावसिक्तैश्च पूजितः कुरुनन्दनः ॥
औपवाह्यमथारुह्य श्वेतच्छत्रेण शोभितः ।
रराजानुगतो राजा महेन्द्र इव दैवतैः ॥
ततः प्रदक्षिणीकृत्य नगरं नागसाह्वयम् ।
प्रविवेश ततो राजा नागरैः पूजितो भृशम् ॥
मूर्धाभिषिक्तं कौन्तेयमभ्यनन्दन्त बान्धवाः ।
गान्धारिपुत्राः शोचन्तः सर्वे ते सह बान्धवैः ॥
ज्ञात्वा शोकं तु पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्नृपम् ।
समक्षं वासुदेवस्य कुरूणां च समक्षतः ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें जल्दी करनेकी प्रेरणा दी। विदुरजीने धृतराष्ट्रके कथनानुसार सब कार्य पूर्ण कर दिया। उसी समय, राजन्! वहाँ महर्षि कृष्णद्वैपायन पधारे। समस्त कौरवोंने अपने सुहृदोंके साथ आकर उनकी पूजा की। तब वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणों तथा मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके साथ मिलकर भगवान्

श्रीकृष्णकी सम्मतिके अनुसार व्यासजीने विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य सम्पन्न किया। कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, भीष्म, धौम्य, व्यास, श्रीकृष्ण, बाह्लीक और सोमदत्तने चारों वेदोंके विद्वानोंको आगे रखकर भद्रपीठपर संयमपूर्वक बैठे हुए युधिष्ठिरका उस समय अभिषेक किया और सबने यह आशीर्वाद दिया कि 'राजन्! तुम सारी पृथ्वीको जीतकर सम्पूर्ण नरेशोंको अपने अधीन करके प्रचुर दक्षिणासे युक्त राजसूय आदि यज्ञ-याग पूर्ण करनेके पश्चात् अवभृथ-स्नान करके बन्धु-बान्धवोंके साथ सुखी रहो।' जनमेजय! यों कहकर उन सबने अपने आशीर्वादोंद्वारा युधिष्ठिरका सम्मान किया। समस्त आभूषणोंसे विभूषित, मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरने अक्षय धनका दान किया। उस समय सब लोगोंने जय-जयकारपूर्वक उनकी स्तुति की। समस्त मूर्धाभिषिक्त राजाओंने भी कुरुनन्दन युधिष्ठिरका पूजन किया। फिर वे राजोचित गजराजपर आरूढ़ हो श्वेत छत्रसे सुशोभित हुए। उनके पीछे-पीछे बहुत-से मनुष्य चल रहे थे। उस समय देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। समस्त हस्तिनापुर नगरकी परिक्रमा करके राजाने पुनः राजधानीमें प्रवेश किया। उस समय नागरिकोंने उनका विशेष समादर किया। बन्धु-बान्धवोंने भी मूर्धाभिषिक्त राजा युधिष्ठिरका सादर अभिनन्दन किया। यह सब देखकर वे गान्धारीके दुर्योधन आदि सभी पुत्र अपने भाइयोंके साथ शोकातुर हो रहे थे। अपने पुत्रोंको शोक हुआ जानकर धृतराष्ट्रने भगवान् श्रीकृष्ण तथा कौरवोंके समक्ष राजा युधिष्ठिरसे (इस प्रकार) कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

अभिषेकं त्वया प्राप्तं दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।
गच्छ त्वमद्यैव नृप कृतकृत्योऽसि कौरव ॥
आयुः पुरूरवा राजन् नहुषश्च ययातिना ।
तत्रैव निवसन्ति स्म खाण्डवाह्वे नृपोत्तम ॥
राजधानी तु सर्वेषां पौरवाणां महाभुज ।
विनाशितं मुनिगणैर्लोभाद् बुधसुतस्य च ॥
तस्मात् त्वं खाण्डवप्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय ।
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च कृतनिश्चयाः ॥
त्वद्भक्त्या जन्तवश्चान्ये भजन्त्वेव पुरं शुभम् ।
पुरं राष्ट्रं समृद्धं वै धनधान्यैः समावृतम् ॥
तस्माद् गच्छस्व कौन्तेय भ्रातृभिः सहितोऽनघ ।)

धृतराष्ट्र बोले— कुरुनन्दन! तुमने वह राज्याभिषेक प्राप्त किया है, जो अजितात्मा पुरुषोंके लिये दुर्लभ है। राजन्! तुम राज्य पाकर कृतार्थ हो गये। अतः आज ही खाण्डवप्रस्थ चले जाओ। नृपश्रेष्ठ! पुरूरवा, आयु, नहुष तथा ययाति खाण्डवप्रस्थमें ही

निवास करते थे। महाबाहो! वहीं समस्त पौरव नरेशोंकी राजधानी थी। आगे चलकर मुनियोंने बुधपुत्रके लोभसे खाण्डवप्रस्थको नष्ट कर दिया था। इसलिये तुम खाण्डवप्रस्थ नगरको पुनः बसाओ और अपने राष्ट्रकी वृद्धि करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सबने तुम्हारे साथ वहाँ जानेका निश्चय किया है। तुममें भक्ति रखनेके कारण दूसरे लोग भी उस सुन्दर नगरका आश्रय लेंगे। निष्पाप कुन्तीकुमार! वह नगर तथा राष्ट्र समृद्धिशाली और धन-धान्यसे सम्पन्न है। अतः तुम भाइयोंसहित वहीं जाओ।

वैशम्पायन उवाच

प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च ॥ २६ ॥
प्रतस्थिरे ततो घोरं वनं तन्मनुजर्षभाः ।
अर्धं राज्यस्य सम्प्राप्य खाण्डवप्रस्थमाविशन् ॥ २७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रकी बात मानकर पाण्डवोंने उन्हें प्रणाम किया और आधा राज्य पाकर वे खाण्डवप्रस्थकी ओर चल दिये, जो भयंकर वनके रूपमें था। धीरे-धीरे वे खाण्डवप्रस्थमें जा पहुँचे ॥ २६-२७ ॥
ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः ।
मण्डयांचक्रिरे तद् वै परं स्वर्गवदच्युताः ॥ २८ ॥
तदनन्तर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले पाण्डवोंने श्रीकृष्णसहित वहाँ जाकर उस स्थानको उत्तम स्वर्गलोककी भाँति शोभायमान कर दिया ॥ २८ ॥
(वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम् ।
महेन्द्रश्चिन्तितो राजन् विश्वकर्माणमादिशत् ॥
फिर जगदीश्वर भगवान् वासुदेवने देवराज इन्द्रका चिन्तन किया। राजन्! उनके चिन्तन करनेपर इन्द्रदेवने (उनके मनकी बात जानकर) विश्वकर्माको इस प्रकार आज्ञा दी।

महेन्द्र उवाच

विश्वकर्मन् महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत् पुरम् ।
इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं रम्यं भविष्यति ॥
**इन्द्र बोले—**विश्वकर्मन्! महामते! (आप जाकर खाण्डवप्रस्थ नगरका निर्माण करें।) आजसे वह दिव्य और रमणीय नगर इन्द्रप्रस्थके नामसे विख्यात होगा।

वैशम्पायन उवाच

महेन्द्रशासनाद् गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम् ।
प्रणम्य प्रणिपातार्हं किं करोमीत्यभाषत ॥
वासुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान् ।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! महेन्द्रकी आज्ञासे विश्वकर्माने खाण्डवप्रस्थमें जाकर वन्दनीय भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम करके कहा—मेरे लिये क्या आज्ञा है? उनकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा।

वासुदेव उवाच कुरुष्व कुरुराजाय महेन्द्रपुरसंनिभम् । इन्द्रेण कृतनामानमिन्द्रप्रस्थं महापुरम् ॥ **श्रीकृष्ण बोले—**विश्वकर्मन्! तुम कुरुराज युधिष्ठिरके लिये महेन्द्रपुरीके समान एक महानगरका निर्माण करो। इन्द्रके निश्चय किये हुए नामके अनुसार वह इन्द्रप्रस्थ कहलायेगा।

ततः पुण्ये शिवे देशे शान्तिं कृत्वा महारथाः । नगरं मापयामासुर्द्वैपायनपुरोगमाः ॥ २९ ॥ तत्पश्चात् पवित्र एवं कल्याणमय प्रदेशमें शान्तिकर्म कराके महारथी पाण्डवोंने वेदव्यासजीको अगुआ बनाकर नगर बसानेके लिये जमीनका नाप करवाया ॥ २९ ॥

सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलंकृतम् । प्राकारेण च सम्पन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता ॥ ३० ॥ पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च । शुशुभे तत् पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥ ३१ ॥ उसके चारों ओर समुद्रकी भाँति विस्तृत एवं अगाध जलसे भरी हुई खाइयाँ बनी थीं, जो उस नगरकी शोभा बढ़ा रही थीं। श्वेत बादलों तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल चहारदीवारी शोभा दे रही थी, जो अपनी ऊँचाईसे आकाशमण्डलको व्याप्त करके खड़ी थी। जैसे नागोंसे भोगवती सुशोभित होती है, उसी प्रकार उस चहारदीवारीसे खाईसहित वह श्रेष्ठ नगर सुशोभित हो रहा था ॥ ३०-३१ ॥

द्विपक्षगरुडप्रख्यैर्द्वारैः सौधैश्च शोभितम् । गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमैः ॥ ३२ ॥ उस नगरके दरवाजे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दो पाँख फैलाये गरुड़ हों। ऐसे अनेक बड़े-बड़े फाटक और अट्टालिकाएँ उस नगरकी श्रीवृद्धि कर रही थीं। मेघोंकी घटाके समान सुशोभित तथा मन्दराचलके समान ऊँचे गोपुरोंद्वारा वह नगर सब ओरसे सुरक्षित था ॥ ३२ ॥

विविधैरपि निर्विद्धैः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः । शक्तिभिश्चावृतं तद्धि द्विजिह्वैरिव पन्नगैः ॥ ३३ ॥ नाना प्रकारके अभेद्य तथा सब ओरसे घिरे हुए शस्त्रागारोंमें शस्त्र संग्रह करके रखे गये थे। नगरके चारों ओर हाथसे चलायी जानेवाली लोहेकी शक्तियाँ तैयार करके रखी गयी थीं,

जो दो जीभोंवाले साँपोंके समान जान पड़ती थीं। इन सबके द्वारा उस नगरकी सुरक्षा की गयी थी ॥ ३३ ॥
तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम् ।
तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम् ॥ ३४ ॥
जिनमें अस्त्र-शस्त्रोंका अभ्यास किया जाता था, ऐसी अनेक अट्टालिकाओंसे युक्त और योद्धाओंसे सुरक्षित उस नगरकी शोभा देखते ही बनती थी। तीखे अंकुशों (बर्छों), शतघ्नियों (तोपों) और अन्यान्य युद्धसम्बन्धी यन्त्रोंके जालसे वह नगर शोभा पा रहा था ॥ ३४ ॥
आयसैश्च महाचक्रैः शुशुभे तत् पुरोत्तमम् ।
सुविभक्तमहारथ्यं देवताबाधवर्जितम् ॥ ३५ ॥
लोहेके बने हुए महान् चक्रोंद्वारा उस उत्तम नगरकी अवर्णनीय शोभा हो रही थी। वहाँ विभागपूर्वक विभिन्न स्थानोंमें जानेके लिये विशाल एवं चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं। उस नगरमें दैवी आपत्तिका नाम नहीं था ॥ ३५ ॥
विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैर्भवनोत्तमैः ।
तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥ ३६ ॥
अनेक प्रकारके श्रेष्ठ एवं शुभ्र सदनोंसे शोभित वह नगर स्वर्गलोकके समान प्रकाशित हो रहा था। उसका नाम था इन्द्रप्रस्थ ॥ ३६ ॥
मेघवृन्दमिवाकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम् ।
तत्र रम्ये शिवे देशे कौरव्यस्य निवेशनम् ॥ ३७ ॥
इन्द्रप्रस्थके रमणीय एवं शुभ प्रदेशमें कुरुराज युधिष्ठिरका सुन्दर राजभवन बना हुआ था, जो आकाशमें विद्युत्की प्रभासे व्याप्त मेघमण्डलकी भाँति देदीप्यमान था ॥ ३७ ॥
शुशुभे धनसम्पूर्णं धनाध्यक्षक्षयोपमम् ।
तत्रागच्छन् द्विजा राजन् सर्ववेदविदां वराः ॥ ३८ ॥
निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा ।
वणिजश्चाप्ययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः ॥ ३९ ॥
अनन्त धनराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह भवन धनाध्यक्ष कुबेरके निवासस्थानकी समानता करता था। राजन्! सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण उस नगरमें निवास करनेके लिये आये, जो सम्पूर्ण भाषाओंके जानकार थे। उन सबको वहाँका रहना बहुत पसंद आया। अनेक दिशाओंसे धनोपार्जनकी इच्छावाले वणिक् भी उस नगरमें आये ॥ ३८-३९ ॥
सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा ।
उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः ॥ ४० ॥

सब प्रकारकी शिल्पकलाके जानकार मनुष्य भी उन दिनों इन्द्रप्रस्थमें निवास करनेके लिये आ गये थे। नगरके चारों ओर रमणीय उद्यान थे ॥ ४० ॥ आम्रैराम्रातकैर्नीपैरशोकैश्चम्पकैस्तथा । पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा ॥ ४१ ॥ शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः । मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः ॥ ४२ ॥ जो आम, आमड़ा, कदम्ब, अशोक, चम्पा, पुन्नाग, नागपुष्प, लकुच, कटहल, साल, ताल, तमाल, मौलसिरी और केवड़ा आदि सुन्दर फूलोंसे भरे और फलोंके भारसे झुके हुए मनोहर वृक्षोंसे सुशोभित थे ॥ ४१-४२ ॥ प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपुष्पितैः । जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः ॥ ४३ ॥ करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः । नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः ॥ ४४ ॥ प्राचीन आँवले, लोध्र, खिले हुए अंकोल, जामुन, पाटल, कुब्जक, अतिमुक्तक लता, करवीर, पारिजात तथा अन्य नाना प्रकारके वृक्ष, जिनमें सदा फल और फूल लगे रहते थे और जिनके ऊपर भाँति-भाँतिके सहस्रों पक्षी कलरव करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४३-४४ ॥ मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदैः । गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः ॥ ४५ ॥ मतवाले मयूरोंके केकारव तथा सदा उन्मत्त रहनेवाली कोकिलोंकी काकली वहाँ गूँजती रहती थी। उन उद्यानोंमें दर्पणके समान स्वच्छ क्रीड़ाभवन तथा नाना प्रकारके लतामण्डप बनाये गये थे ॥ ४५ ॥ मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथाजगतिपर्वतैः । वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा ॥ ४६ ॥ सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः । हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः ॥ ४७ ॥ मनोहर चित्रशालाओं तथा राजाओंकी विहारयात्राके लिये निर्मित हुए कृत्रिम पर्वतोंसे भी वे उद्यान बड़ी शोभा पा रहे थे। उत्तम जलसे भरी हुई अनेक प्रकारकी बावलियाँ तथा कमल और उत्पलकी सुगन्धसे वासित अत्यन्त रमणीय सरोवर जहाँ हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षी निवास करते थे, उन उद्यानोंकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः । तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च ॥ ४८ ॥

वहाँ वनसे घिरी हुई भाँति-भाँतिकी रमणीय पुष्करिणियाँ और सुरम्य एवं विशाल बहुसंख्यक तड़ाग बड़े सुन्दर जान पड़ते थे ॥ ४८ ॥ (चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णं मान्यैः शिल्पिभिरावृतम् । उपयोगसमर्थैश्च सर्वद्रव्यैः समावृतम् ॥ नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम् । मत्तवारणसम्पूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः ॥ सर्वदाभिगतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा । तत् त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत ॥ पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा । पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ कृतमङ्गलसत्कारो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्यानुमते स्थितः ॥ भ्रातृभिः सहितो राजन् केशवेन सहाभिभूः । तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्वारसंयुतम् ॥ वर्धमानपुरद्वारं प्रविवेश महाद्युतिः । शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम् ॥ जयेति ब्राह्मणगिरः श्रूयन्ते च सहस्रशः । संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च । कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम् ॥ प्रविश्य भवनं राजा सत्कारैरभिपूजितः । पूजयामास विप्रेन्द्रान् केशवेन यथाक्रमम् ॥ ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम् । गोधनैश्च समाकीर्णं सस्यवृद्धिस्तदाभवत् ॥) वह नगर चारों वर्णोंके लोगोंसे ठसाठस भरा था। माननीय शिल्पी वहाँ निवास करते थे। वह पुरी उपभोगमें आनेवाली समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न थी। वहाँ सदा श्रेष्ठ पुरुष रहा करते थे। असंख्य नर-नारी उस नगरकी शोभा बढ़ाते थे। वहाँ मतवाले हाथी, ऊँट, गायें, बैल, गदहे और बकरे आदि पशु भी सदा मौजूद रहते थे। विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई उस पुरीमें सदा साधु-महात्माओंका समागम होता था। वह इन्द्रप्रस्थ नगर स्वर्गके समान शोभा पाता था। राजन्! कौरवराज महातेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा मंगल-कृत्य कराकर द्वैपायन व्यासको आगे करके धौम्य मुनिकी सम्मतिके अनुसार भाइयों तथा भगवान् श्रीकृष्णके साथ बत्तीस दरवाजोंसे युक्त तोरणद्वारके सामने आकर वर्धमान नामक नगरद्वारमें प्रवेश किया। उस समय शंख और नगारोंकी आवाज बड़े

जोर-जोरसे सुनायी देती थी। सहस्रों ब्राह्मणोंके मुखसे निकले हुए जयघोषका श्रवण होता था। मुनि तथा सूत, मागध और बन्दीजन राजाकी स्तुति कर रहे थे। राजा युधिष्ठिर हाथीपर बैठे हुए थे। उन्होंने राजमार्गको पार करके एक उत्तम भवनमें प्रवेश किया, जहाँ मांगलिक कृत्य सम्पन्न किया गया था। उस भवनमें प्रवेश करके भाँति-भाँतिके सत्कारोंसे सम्मानित हो राजा युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रमशः सभी शेष ब्राह्मणोंका पूजन किया। तदनन्तर अगणित नर-नारियोंसे सुशोभित वह राष्ट्र और नगर गोधनसे सम्पन्न हो गया और दिनोंदिन खेतीकी वृद्धि होने लगी। तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत् । पाण्डवानां महाराज शश्वत् प्रीतिरवर्धत ॥ ४९ ॥ महाराज ! पुण्यात्मा मनुष्योंसे भरे हुए उस महान् राष्ट्रमें प्रवेश करनेके बाद पाण्डवोंकी प्रसन्नता निरन्तर बढ़ती गयी ॥ ४९ ॥ तत्र भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयने कृते । पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः ॥ ५० ॥ भीष्म तथा राजा धृतराष्ट्रके द्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको आधा राज्य देकर वहाँसे विदा कर देनेपर समस्त पाण्डव खाण्डवप्रस्थके निवासी हो गये ॥ ५० ॥ पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समन्वितम् । शुशुभे तत् पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा ॥ ५१ ॥ इन्द्रके समान शक्तिशाली और महान् धनुर्धर पाँचों पाण्डवोंके द्वारा वह श्रेष्ठ इन्द्रप्रस्थ नगर नागोंसे युक्त भोगवतीपुरीकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ५१ ॥ (ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च । द्वैपायनं च सम्पूज्य विसृज्य च नराधिप । वार्ष्णेयमब्रवीद् राजा गन्तुकामं कृतक्षणम् ॥ तदनन्तर विश्वकर्माका पूजन करके राजाने उन्हें विदा कर दिया। फिर व्यासजीको सम्मानपूर्वक विदा देकर राजा युधिष्ठिरने जानेके लिये उद्यत हुए भगवान् श्रीकृष्णसे कहा।

युधिष्ठिर उवाच

तव प्रसादाद् वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयानघ । प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम् ॥ तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च महामते । गतिस्त्वमन्तकाले च पाण्डवानां तु माधव ॥ मातास्माकं पिता देवो न पाण्डुं विद्म वै वयम् । ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान् हि नः । यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयानघ ॥

युधिष्ठिर बोले—निष्पाप वृष्णिनन्दन! आपकी ही कृपासे मैंने राज्य प्राप्त किया है। वीर! आपके ही प्रसादसे यह अत्यन्त दुर्गम एवं निर्जन प्रदेश आज धन-धान्यसे सम्पन्न राष्ट्र बन गया। महामते! आपकी ही दयासे हमलोग राज्यसिंहासनपर आसीन हुए हैं। माधव! अन्तकालमें भी आप ही हम पाण्डवोंकी गति हैं। आप ही हमारे माता-पिता और इष्टदेव हैं। हम पाण्डुको नहीं जानते। अनघ! आप स्वयं समझकर जो करनेयोग्य कार्य हो, वह हमसे करायें। पाण्डवोंके लिये जो अभीष्ट हो, उसी कार्यको करनेके लिये आप हमें अनुमति दें।

श्रीवासुदेव उवाच

त्वत्प्रभावान्महाभाग राज्यं प्राप्तं स्वधर्मतः ।
पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात् तव प्रभो ॥
धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान् ।
यथेष्टं पालय महीं सदा धर्मधुरं वह ॥
धर्मोपदेशं संक्षेपाद् ब्राह्मणान् भज कौरव ।
अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः ।
आदृत्य तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै ॥

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग! आपको अपने ही प्रभावसे अपने ही धर्मके फलस्वरूप राज्य प्राप्त हुआ है। प्रभो! जो राज्य आपके बाप-दादोंका ही है, वह आपको कैसे नहीं मिलता। धृतराष्ट्रके पुत्र दुराचारी हैं। वे पाण्डवोंका क्या कर लेंगे? आप इच्छानुसार पृथ्वीका पालन कीजिये और सदा धर्ममर्यादाकी धुरी धारण करिये। कुरुनन्दन! संक्षेपमें आपके लिये धर्मका उपदेश इतना ही है कि ब्राह्मणोंकी सेवा करिये। आज ही बड़ी जल्दीमें आपके यहाँ श्रीनारदजी पधारेंगे, उनका आदर-सत्कार करके उनकी बातें सुनिये और उनकी आज्ञाका पालन कीजिये।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः ।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोऽस्तु ते ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण कुन्तीदेवीके पास गये और उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणीमें बोले—'बुआजी! नमस्कार। अब मैं जाऊँगा (आज्ञा दीजिये)।'

कुन्त्युवाच

जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं च केशव ।
आर्येण चापि न ज्ञातं कुन्तिभोजेन चानघ ॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम् ।

त्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः ॥
सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम ।
स्मरस्वैनान् महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः ॥
**कुन्ती बोली—**केशव! लाक्षागृहमें जाकर मैंने जो कष्ट भोगा है, उसे मेरे पूज्य पिता कुन्तिभोज भी नहीं जान सके हैं। गोविन्द! तुम्हारी सहायतासे ही मैं इस महान् दुःख-समुद्रसे पार हुई हूँ। प्रभो! तुम अनाथोंके, विशेषतः दीन-दुःखियोंके नाथ (रक्षक) हो। तुम्हारे दर्शनसे हमारे सारे दुःख दूर हो जाते हैं। महामते! इन पाण्डवोंको सदा याद रखना। ये तुम्हारे शुभ चिन्तनसे ही जीवन धारण करते हैं।

वैशम्पायन उवाच

करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम् ।
गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीसे यह कहकर कि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा, प्रणाम करके, विदा ले सेवकोंसहित वहाँसे जानेका विचार किया।

तां निवेश्य ततो वीरो रामेण सह केशवः ।
ययौ द्वारवतीं राजन् पाण्डवानुमते तदा ॥ ५२ ॥
राजन्! इस प्रकार उस पुरीको बसाकर बलरामजीके साथ वीरवर श्रीकृष्ण पाण्डवोंकी अनुमति ले उस समय द्वारकापुरीको चले गये ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि पुरनिर्माणे षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें नगरनिर्माणविषयक दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९९ श्लोक मिलाकर कुल १५१ श्लोक हैं)

पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंके यहाँ नारदजीका आगमन और उनमें फूट न हो, इसके लिये कुछ नियम बनानेके लिये प्रेरणा करके सुन्द और उपसुन्दकी कथाको प्रस्तावित करना

जनमेजय उवाच

एवं सम्प्राप्य राज्यं तदिन्द्रप्रस्थं तपोधन ।
अत ऊर्ध्वं महात्मानः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—तपोधन! इस प्रकार इन्द्रप्रस्थका राज्य प्राप्त कर लेनेके पश्चात् महात्मा पाण्डवोंने कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥

सर्व एव महासत्त्वा मम पूर्वपितामहाः ।
द्रौपदी धर्मपत्नी च कथं तानन्ववर्तत ॥ २ ॥
मेरे पूर्वपितामह सभी पाण्डव महान् सत्त्व (मनोबल) से सम्पन्न थे। उनकी धर्मपत्नी द्रौपदीने किस प्रकार उन सबका अनुसरण किया? ॥ २ ॥

कथं च पञ्च कृष्णायामेकस्यां ते नराधिपाः ।
वर्तमाना महाभागा नाभिद्यन्त परस्परम् ॥ ३ ॥
वे महान् सौभाग्यशाली नरेश जब एक ही कृष्णाके प्रति अनुरक्त थे, तब उनमें आपसमें फूट कैसे नहीं हुई? ॥ ३ ॥

श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्वं विस्तरेण तपोधन ।
तेषां चेष्टितमन्योन्यं युक्तानां कृष्णया सह ॥ ४ ॥
तपोधन! द्रौपदीसे सम्बन्ध रखनेवाले उन पाण्डवोंका आपसमें कैसा बर्ताव था, यह सब मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञाताः कृष्णया सह पाण्डवाः ।
रेमिरे खाण्डवप्रस्थे प्राप्तराज्याः परंतपाः ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! धृतराष्ट्रकी आज्ञासे राज्य पाकर परंतप पाण्डव द्रौपदीके साथ खाण्डव-प्रस्थमें विहार करने लगे ॥ ५ ॥

प्राप्य राज्यं महातेजाः सत्यसंधो युधिष्ठिरः ।
पालयामास धर्मेण पृथिवीं भ्रातृभिः सह ॥ ६ ॥
सत्यप्रतिज्ञ महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर उस राज्यको पाकर अपने भाइयोंके साथ धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ६ ॥

जितारयो महाप्रज्ञाः सत्यधर्मपरायणाः ।
मुदं परमिकां प्राप्तास्तत्रोषुः पाण्डुनन्दनाः ॥ ७ ॥
वे सभी शत्रुओंपर विजय पा चुके थे, सभी महाबुद्धिमान् थे। सबने सत्यधर्मका आश्रय ले रखा था। इस प्रकार वे पाण्डव वहाँ बड़े आनन्दके साथ रहते थे ॥ ७ ॥
कुर्वाणाः पौरकार्याणि सर्वाणि पुरुषर्षभाः ।
आसांचक्रुर्महार्हेषु पार्थिवेष्वासनेषु च ॥ ८ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव नगरवासियोंके सम्पूर्ण कार्य करते हुए बहुमूल्य तथा राजोचित सिंहासनोंपर बैठा करते थे ॥ ८ ॥
अथ तेषूपविष्टेषु सर्वेष्वेव महात्मसु ।
नारदस्त्वथ देवर्षिराजगाम यदृच्छया ॥ ९ ॥
एक दिन जब वे सभी महामना पाण्डव अपने सिंहासनोंपर विराजमान थे, उसी समय देवर्षि नारद अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे ॥ ९ ॥
(पथा नक्षत्रजुष्टेन सुपर्णचरितेन च ॥
चन्द्रसूर्यप्रकाशेन सेवितेन महर्षिभिः ।
नभःस्थलेन दिव्येन दुर्लभेनातपस्विनाम् ॥
उनका आगमन आकाशमार्गसे हुआ, जिसका नक्षत्र सेवन करते हैं, जिसपर गरुड़ चलते हैं, जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश फैलता है और जो महर्षियोंसे सेवित है। जो लोग तपस्वी नहीं हैं, उनके लिये व्योममण्डलका वह दिव्य मार्ग दुर्लभ है।
भूतार्चितो भूतधरं राष्ट्रं नगरभूषितम् ।
अवेक्षमाणो द्युतिमानाजगाम महातपाः ॥
सर्ववेदान्तगो विप्रः सर्वविद्यासु पारगः ।
परेण तपसा युक्तो ब्राह्मेण तपसा वृतः ॥
नये नीतौ च निरतो विश्रुतश्च महामुनिः ।
सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा पूजित महान् तपस्वी एवं तेजस्वी देवर्षि नारद बड़े-बड़े नगरोंसे विभूषित और सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रयभूत राष्ट्रोंका अवलोकन करते हुए वहाँ आये। विप्रवर नारद सम्पूर्ण वेदान्तशास्त्रके ज्ञाता तथा समस्त विद्याओंके पारंगत पण्डित हैं। वे परमतपस्वी तथा ब्राह्मतेजसे सम्पन्न हैं; न्यायोचित बर्ताव तथा नीतिमें निरन्तर निरत रहनेवाले सुविख्यात महामुनि हैं।
परात् परतरं प्राप्तो धर्मात् समभिजग्मिवान् ॥
भावितात्मा गतरजाः शान्तो मृदुर्ऋजुर्द्विजः ।
धर्मेणाधिगतः सर्वैर्देवदानवमानुषैः ॥
अक्षीणवृत्तधर्मश्च संसारभयवर्जितः ।
सर्वथा कृतमर्यादो वेदेषु विविधेषु च ॥

ऋक्सामयजुषां वेत्ता न्यायवृत्तान्तकोविदः ।। ऋजुरारोहवाञ्छुक्लो भूयिष्ठपथिकोऽनघः । श्लक्ष्णया शिखयोपेतः सम्पन्नः परमत्विषा ।। अवदाते च सूक्ष्मे च दिव्ये च रुचिरे शुभे । महेन्द्रदत्ते महती बिभ्रत् परमवाससी ।। प्राप्य दुष्प्रापमन्येन ब्रह्मवर्चसमुत्तमम् । भवने भूमिपालस्य बृहस्पतिरिवाप्लुतः ।।

उन्होंने धर्म-बलसे परात्पर परमात्माका ज्ञान प्राप्त कर लिया है। वे शुद्धात्मा, रजोगुणरहित, शान्त, मृदु तथा सरल स्वभावके ब्राह्मण हैं। वे देवता, दानव और मनुष्य सबको धर्मतः प्राप्त होते हैं। उनका धर्म और सदाचार कभी खण्डित नहीं हुआ है। वे संसारभयसे सर्वथा रहित हैं। उन्होंने सब प्रकारसे विविध वैदिक धर्मोंकी मर्यादा स्थापित की है। वे ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदके विद्वान् हैं। न्यायशास्त्रके पारंगत पण्डित हैं। वे सीधे और ऊँचे कदके तथा शुक्ल वर्णके हैं। वे निष्पाप नारद अधिकांश समय यात्रामें व्यतीत करते हैं। उनके मस्तकपर सुन्दर शिखा शोभित है। वे उत्तम कान्तिसे प्रकाशित होते हैं। वे देवराज इन्द्रके दिये हुए दो बहुमूल्य वस्त्र धारण करते हैं। उनके वे दोनों वस्त्र उज्ज्वल, महीन, दिव्य, सुन्दर और शुभ हैं। दूसरोंके लिये दुर्लभ एवं उत्तम ब्रह्मतेजसे युक्त वे बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् नारदजी राजा युधिष्ठिरके महलमें उतरे।

संहितायां च सर्वेषां स्थितस्योपस्थितस्य च । द्विपदस्य च धर्मस्य क्रमधर्मस्य पारगः ।। गाथासामानुधर्मज्ञः साम्नां परमवल्गुनाम् । आत्मना सर्वमोक्षिभ्यः कृतिमान् कृत्यवित् तथा ।। योक्ता धर्मे बहुविधे मनो मतिमतां वरः । विदितार्थः समग्रैश्च छेत्ता निगमसंशयान् ।। अर्थनिर्वचने नित्यं संशयच्छिदसंशयः । प्रकृत्या धर्मकुशलो नानाधर्मविशारदः ।। लोपेनागमधर्मेण संक्रमेण च वृत्तिषु । एकशब्दांश्च नानार्थानैकार्थांश्च पृथक्छुमतीन् ।। पृथगर्थाभिधानांश्च प्रयोगाणामवेक्षिता ।।

संहिताशास्त्रमें सबके लिये स्थित और उपस्थित मानवधर्म तथा क्रमप्राप्त धर्मके वे पारगामी विद्वान् हैं। वे गाथा और साममन्त्रोंमें कहे हुए आनुषंगिक धर्मोंके भी ज्ञाता हैं तथा अत्यन्त मधुर सामगानके पण्डित हैं। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले सब लोगोंके हितके लिये नारदजी स्वयं ही प्रयत्नशील रहते हैं। कब किसका क्या कर्तव्य है, इसका उन्हें पूर्ण ज्ञान है। वे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं और मनको नाना प्रकारके धर्ममें लगाये रखते हैं। उन्हें जानने

योग्य सभी अर्थोंका ज्ञान है। वे सबमें समभाव रखनेवाले हैं और वेदविषयक सम्पूर्ण संदेहोंका निवारण करनेवाले हैं। अर्थकी व्याख्याके समय सदा संशयोंका उच्छेद करते हैं। उनके हृदयमें संशयका लेश भी नहीं है। वे स्वभावतः धर्मनिपुण तथा नाना धर्मोंके विशेषज्ञ हैं। लोप, आगमधर्म तथा वृत्तिसंक्रमणके द्वारा प्रयोगमें आये हुए एक शब्दके अनेक अर्थोंको, पृथक्-पृथक् श्रवणगोचर होनेवाले अनेक शब्दोंके एक अर्थको तथा विभिन्न शब्दोंके भिन्न-भिन्न अर्थोंको वे पूर्णरूपसे देखते और समझते हैं।

प्रमाणभूतो लोकस्य सर्वाधिकरणेषु च ।
सर्ववर्णविकारेषु नित्यं सकलपूजितः ॥
स्वरेऽस्वरे च विविधे वृत्तेषु विविधेषु च ।
समस्थानेषु सर्वेषु समाम्नायेषु धातुषु ॥
उद्देश्यानां समाख्याता सर्वमाख्यातमुद्दिशन् ।
अभिसंधिषु तत्त्वज्ञः पदान्यङ्गान्यनुस्मरन् ॥
कालधर्मेण निर्दिष्टं यथार्थं च विचारयन् ।
चिकीर्षितं च यो वेत्ता यथा लोकेन संवृतम् ॥
विभाषितं च समयं भाषितं हृदयङ्गमम् ।
आत्मने च परस्मै च स्वरसंस्कारयोगवान् ॥
एषां स्वराणां वेत्ता च बोद्धा च वचनस्वरान् ।
विज्ञाता चोक्तवाक्यानामेकतां बहुतां तथा ॥
बोद्धा हि परमार्थंश्च विविधांश्च व्यतिक्रमान् ।
अभेदतश्च बहुशो बहुशश्चापि भेदतः ॥
वचनानां च विविधानादेशांश्च समीक्षिता ।
नानार्थकुशलस्तत्र तद्धितेषु च सर्वशः ॥
परिभूषयिता वाचां वर्णतः स्वरतोऽर्थतः ।
प्रत्ययांश्च समाख्याता नियतं प्रतिधातुकम् ॥
पञ्च चाक्षरजातानि स्वरसंज्ञानि यानि च ।)

सभी अधिकरणों और समस्त वर्णोंके विकारोंमें निर्णय देनेके निमित्त वे सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत हैं। सदा सब लोग उनकी पूजा करते हैं। नाना प्रकारके स्वर, व्यंजन, भाँति-भाँतिके छन्द, समान स्थानवाले सभी वर्ण, समाम्नाय तथा धातु—इन सबके उद्देश्योंकी नारदजी बहुत अच्छी व्याख्या करते हैं। सम्पूर्ण आख्यात प्रकरण (धातुरूप तिङन्त आदि)-का प्रतिपादन कर सकते हैं। सब प्रकारकी संधियोंके सम्पूर्ण रहस्योंको जानते हैं। पदों और अंगोंका निरन्तर स्मरण रखते हैं, काल-धर्मसे निर्दिष्ट यथार्थ तत्त्वका विचार करनेवाले हैं तथा वे लोगोंके छिपे हुए मनोभावको—वे क्या करना चाहते हैं, इस बातको भी अच्छी तरह जानते हैं। विभाषित (वैकल्पिक), भाषित (निश्चयपूर्वक कथित)

और हृदयंगम किये हुए समयका उन्हें यथार्थ ज्ञान है। वे अपने तथा दूसरेके लिये स्वरसंस्कार तथा योगसाधनमें तत्पर रहते हैं। वे इन प्रत्यक्ष चलनेवाले स्वरोंको भी जानते हैं, वचन-स्वरोंका भी ज्ञान रखते हैं, कही हुई बातोंके मर्मको जानते और उनकी एकता तथा अनेकताको समझते हैं। उन्हें परमार्थका यथार्थ ज्ञान है। वे नाना प्रकारके व्यतिक्रमों (अपराधों)-को भी जानते हैं। अभेद और भेददृष्टिसे भी बारंबार तत्त्वविचार करते रहते हैं। वे शास्त्रीय वाक्योंके विविध आदेशोंकी भी समीक्षा करनेवाले तथा नाना प्रकारके अर्थज्ञानमें कुशल हैं, तद्धित प्रत्ययोंका उन्हें पूरा ज्ञान है। वे स्वर, वर्ण और अर्थ तीनोंसे ही वाणीको विभूषित करते हैं। प्रत्येक धातुके प्रत्ययोंका नियमपूर्वक प्रतिपादन करनेवाले हैं। पाँच प्रकारके जो अक्षरसमूह तथा स्वर हैं*, उनको भी वे यथार्थरूपसे जानते हैं।

तमागतमृषिं दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।
आसनं रुचिरं तस्मै प्रददौ स्वं युधिष्ठिरः ।
देवर्षेरुपविष्टस्य स्वयमर्घ्यं यथाविधि ॥ १० ॥
प्रादाद् युधिष्ठिरो धीमान् राज्यं तस्मै न्यवेदयत् ।
प्रतिगृह्य तु तां पूजामृषिः प्रीतमनास्तदा ॥ ११ ॥

उन्हें आया देख राजा युधिष्ठिरने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और अपना परम सुन्दर आसन उन्हें बैठनेके लिये दिया। जब देवर्षि उसपर बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उन्हें अर्घ्य निवेदन किया और उसीके साथ-साथ उन्हें अपना राज्य समर्पित कर दिया। उनकी यह पूजा ग्रहण करके देवर्षि उस समय मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ १०-११ ॥

आशीर्भिर्वर्धयित्वा च तमुवाचास्यतामिति ।
निषसादाभ्यनुज्ञातस्ततो राजा युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥
कथयामास कृष्णायै भगवन्तमुपस्थितम् ।
श्रुत्वैतद् द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता ॥ १३ ॥
जगाम तत्र यत्रास्ते नारदः पाण्डवैः सह ।
तस्याभिवाद्य चरणौ देवर्षेर्धर्मचारिणी ॥ १४ ॥
कृताञ्जलिः सुसंवीता स्थिताथ द्रुपदात्मजा ।
तस्याश्चापि स धर्मात्मा सत्यवागृषिसत्तमः ॥ १५ ॥
आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः ।
गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम् ॥ १६ ॥
गतायामथ कृष्णायां युधिष्ठिरपुरोगमान् ।
विविक्ते पाण्डवान् सर्वानुवाच भगवानृषिः ॥ १७ ॥

फिर आशीर्वादसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करके बोले—'तुम भी बैठो।' नारदकी आज्ञा पाकर राजा युधिष्ठिर बैठे और कृष्णाको कहला दिया कि स्वयं

भगवान् नारदजी पधारे हैं। यह सुनकर द्रौपदी भी पवित्र एवं एकाग्रचित हो उसी स्थानपर गयी, जहाँ पाण्डवोंके साथ नारदजी विराजमान थे। धर्मका आचरण करनेवाली कृष्णा देवर्षिके चरणोंमें प्रणाम करके अपने अंगोंको ढके हुए हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। धर्मात्मा एवं सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदने राजकुमारी द्रौपदीको नाना प्रकारके आशीर्वाद देकर उस सती-साध्वी देवीसे कहा, 'अब तुम भीतर जाओ।' कृष्णाके चले जानेपर भगवान् देवर्षिने एकान्तमें युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंसे कहा ॥ १२-१७ ॥

नारद उवाच

पाञ्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी । यथा वो नात्र भेदः स्यात् तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ १८ ॥ **नारदजी बोले—**पाण्डवो! यशस्विनी पांचाली तुम सब लोगोंकी एक ही धर्मपत्नी है; अतः तुमलोग ऐसी नीति बना लो, जिससे तुमलोगोंमें कभी परस्पर फूट न हो ॥ १८ ॥ सुन्दोपसुन्दौ हि पुरा भ्रातरौ सहितावुभौ । आस्तामवध्यावन्येषां त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ ॥ १९ ॥ पहलेकी बात है, सुन्द और उपसुन्द नामक दो असुर भाई-भाई थे। वे सदा साथ रहते थे एवं दूसरेके लिये अवध्य थे (केवल आपसमें ही लड़कर वे मर सकते थे)। उनकी तीनों लोकोंमें बड़ी ख्याति थी ॥ १९ ॥ एकराज्यावेकगृहावेकशय्यासनाशनौ । तिलोत्तमायास्तौ हेतोरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २० ॥ उनका एक ही राज्य था और एक ही घर। वे एक ही शय्यापर सोते, एक ही आसनपर बैठते और एक साथ ही भोजन करते थे। इस प्रकार आपसमें अटूट प्रेम होनेपर भी तिलोत्तमा अप्सराके लिये लड़कर उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला ॥ २० ॥

रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम् ।
यथा वो नात्र भेदः स्यात् तत् कुरुष्व युधिष्ठिर ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! इसलिये आपसकी प्रीतिका बढ़ानेवाले सौहार्दकी रक्षा करो और ऐसा कोई नियम बनाओ, जिससे यहाँ तुमलोगोंमें वैर-विरोध न हो ॥ २१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सुन्दोपसुन्दावसुरौ कस्य पुत्रौ महामुने ।
उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चान्योन्यमघ्नताम् ॥ २२ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! सुन्द और उपसुन्द नामक असुर किसके पुत्र थे? उनमें कैसे विरोध उत्पन्न हुआ और किस प्रकार उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला? ॥ २२ ॥

अप्सरा देवकन्या वा कस्य चैषा तिलोत्तमा ।
यस्याः कामेन सम्मत्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम् ॥ २३ ॥
यह तिलोत्तमा अप्सरा थी? किसी देवताकी कन्या थी? तथा वह किसके अधिकारमें थी, जिसकी कामनासे उन्मत्त होकर उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला ॥ २३ ॥

एतत् सर्वं यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन ।
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् परं कौतूहलं हि नः ॥ २४ ॥
तपोधन! यह सब वृत्तान्त जिस प्रकार घटित हुआ था, वह सब हम विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं। ब्रह्मन्! उसे सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि युधिष्ठिरनारदसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें युधिष्ठिर-नारद- संवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४९ १/३ श्लोक हैं)


* कण्ठ, तालू, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ—इन पाँच स्थानों अथवा पाँच आभ्यन्तर प्रयत्नोंके भेदसे पाँच प्रकारके अक्षरसमूह कहे गये हैं। अ इ उ ऋ ऌ ये पाँच ही मूल स्वर हैं, अन्य स्वर इन्हींके दीर्घ आदि भेद अथवा संधिज हैं।

२०८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव

नारद उवाच

शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम् ।
भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथावृत्तं युधिष्ठिर ॥ १ ॥
**नारदजीने कहा—**कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! यह वृत्तान्त जिस प्रकार संघटित हुआ था, वह प्राचीन इतिहास तुम मुझसे भाइयोंसहित विस्तारपूर्वक सुनो ॥ १ ॥

महासुरस्यान्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा ।
निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत् ॥ २ ॥
प्राचीनकालमें महान् दैत्य हिरण्यकशिपुके कुलमें निकुम्भ नामसे प्रसिद्ध एक दैत्यराज हो गया है, जो अत्यन्त तेजस्वी और बलवान् था ॥ २ ॥

तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ ।
सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणौ क्रूरमानसौ ॥ ३ ॥
उसके महाबली और भयानक पराक्रमी दो पुत्र हुए, जिनका नाम था सुन्द और उपसुन्द। वे दोनों दैत्यराज बड़े भयंकर और क्रूर हृदयके थे ॥ ३ ॥

तावेकनिश्चयो दैत्यावेककार्यार्थसम्मतौ ।
निरन्तरमवर्तेतां समदुःखसुखावुभौ ॥ ४ ॥
उनका एक ही निश्चय होता था और एक ही कार्यके लिये वे सदा सहमत रहते थे। उनके सुख और दुःख भी एक ही प्रकारके थे। वे दोनों सदा साथ रहते थे ॥ ४ ॥

विनान्योन्यं न भुञ्जाते विनान्योन्यं न जल्पतः ।
अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदौ ॥ ५ ॥
उनमेंसे एकके बिना दूसरा न तो खाता-पीता और न किसीसे कुछ बात-चीत ही करता था। वे दोनों एक-दूसरेका प्रिय करते और परस्पर मीठे वचन बोलते थे ॥ ५ ॥

एकशीलसमाचारौ द्विधैवैकोऽभवत् कृतः ।
तौ विवृद्धौ महावीर्यौ कार्येष्वप्येकनिश्चयौ ॥ ६ ॥
उनके शील और आचरण एक-से थे, मानो एक ही जीवात्मा दो शरीरोंमें विभक्त कर दिया गया हो। वे महापराक्रमी दैत्य साथ-साथ बढ़ने लगे। वे प्रत्येक कार्यमें एक ही निश्चयपर पहुँचते थे ॥ ६ ॥

त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायैकनिश्चयम् ।

दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥ ७ ॥ किसी समय वे तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छासे एकमत होकर गुरुसे दीक्षा ले विन्ध्य पर्वतपर आये और वहाँ कठोर तपस्या करने लगे ॥ ७ ॥ तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ ॥ ८ ॥ भूख और प्यासका कष्ट सहते हुए सिरपर जटा तथा शरीरपर वल्कल धारण किये वे दोनों भाई दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे ॥ ८ ॥ मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः । आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितौ । ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ॥ ९ ॥ उनके सम्पूर्ण अंगोंमें मैल जम गयी थी, वे हवा पीकर रहते थे और अपने ही शरीरके मांसखण्ड काट-काटकर अग्निमें आहुति देते थे। तदनन्तर बहुत समयतक पैरोंके अंगूठोंके अग्रभागके बलपर खड़े हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये एकटक दृष्टिसे देखते हुए वे दोनों व्रत धारण करके तपस्यामें संलग्न रहे ॥ ९ ॥ तयोस्तपःप्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः । धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १० ॥ उन दैत्योंकी तपस्याके प्रभावसे दीर्घकालतक संतप्त होनेके कारण विन्ध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १० ॥ ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः । तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे ॥ ११ ॥ उनकी उग्र तपस्या देखकर देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे देवतागण उनके तपको भंग करनेके लिये अनेक प्रकारके विघ्न डालने लगे ॥ ११ ॥ रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनः पुनः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १२ ॥ उन्होंने बार-बार रत्नोंके ढेर तथा सुन्दरी स्त्रियोंको भेज-भेजकर उन दोनोंको प्रलोभनमें डालनेकी चेष्टा की; किंतु उन महान् व्रतधारी दैत्योंने अपने तपको भंग नहीं किया ॥ १२ ॥ अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः । भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा ॥ १३ ॥ प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा । भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥ १४ ॥ अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १५ ॥