महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वह महाराज पृषतकी पौत्री सती-साध्वी कृष्णा तुमलोगोंकी पत्नी नियत की गयी है; अतः महाबली वीरो! अब तुम पांचालनगरमें जाकर रहो। द्रौपदीको पाकर तुम सब लोग सुखी होओगे, इसमें संशय नहीं है ।। १५ ।।
एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान् स पितामहः ।
पार्थानमन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ।। १६ ।।
महान् सौभाग्यशाली और महातपस्वी पितामह व्यासजी पाण्डवोंसे ऐसा कहकर उन सबसे और कुन्तीसे विदा ले वहाँसे चल दिये ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीजन्मान्तरकथने
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीजन्मान्तरकथनविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६८ ।।
१६९-
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंकी पंचाल-यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता
वैशम्पायन उवाच
गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः ।
ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् व्यासके चले जानेपर पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव प्रसन्नचित्त हो अपनी माताको आगे करके वहाँसे पंचालदेशकी ओर चल दिये ॥ १ ॥
आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्यानुमान्य च ।
समैरुदङ्मुखैर्मार्गैर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ॥ २ ॥
परंतप! कुन्तीकुमारोंने पहले ही अपने आश्रयदाता ब्राह्मणसे पूछकर जानेकी आज्ञा ले ली थी और चलते समय बड़े आदरके साथ उन्हें प्रणाम किया। वे सब लोग उत्तर दिशाकी ओर जानेवाले सीधे मार्गोंद्वारा उत्तराभिमुख हो अपने अभीष्ट स्थान पंचालदेशकी ओर बढ़ने लगे ॥ २ ॥
ते त्वगच्छन्नहोरात्रात् तीर्थं सोमाश्रयायणम् ।
आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ॥ ३ ॥
एक दिन और एक रात चलकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव गंगाजीके तटपर सोमाश्रयायण नामक तीर्थमें जा पहुँचे ॥ ३ ॥
उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः ।
प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः ॥ ४ ॥
उस समय उनके आगे-आगे महारथी अर्जुन उजाला तथा रक्षा करनेके लिये जलती हुई मशाल उठाये चल रहे थे ॥ ४ ॥
तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः ।
ईर्ष्युर्गन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः ॥ ५ ॥
उस तीर्थकी गंगाके रमणीय तथा एकान्त जलमें गन्धर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था। वह बड़ा ही ईर्ष्यालु था और जलक्रीड़ा करनेके लिये ही वहाँ आया था ॥ ५ ॥
शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् ।
तेन शब्देन चाविष्टश्चुक्रोध बलवद् बली ॥ ६ ॥
उसने गंगाजीकी ओर बढ़ते हुए पाण्डवोंके पैरोंकी धमक सुनी। उस शब्दको सुनते ही वह बलवान् गन्धर्व क्रोधके आवेशमें आकर बड़े जोरसे कुपित हो उठा ।। ६ ।। स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् । विस्फारयन् धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ।। ७ ।। परंतप पाण्डवोंको अपनी माताके साथ वहाँ देख वह अपने भयानक धनुषको टंकारता हुआ इस प्रकार बोला- ।। ७ ।। संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या । अशीतिभिर्लवैर्हीनं तन्मुहूर्तं प्रचक्षते ।। ८ ।। विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ।। ९ ।। 'रात्रि प्रारम्भ होनेके पहले जो पश्चिम दिशामें भयंकर संध्याकी लाली छा जाती है, उस समय अस्सी लवको छोड़कर सारा मुहूर्त इच्छानुसार विचरनेवाले यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसोंके लिये निश्चित बताया जाता है। शेष दिनका सब समय मनुष्योंके कार्यवश विचरनेके लिये माना गया है ।। ८-९ ।। लोभात् प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् । उपक्रान्तानि गृह्लीमो राक्षसैः सह बालिशान् ।। १० ।। 'जो मनुष्य लोभवश हमलोगोंकी वेलामें इधर घूमते हुए आ जाते हैं, उन मूर्खोंको हम गन्धर्व और राक्षस कैद कर लेते हैं ।। १० ।। अतो रात्रौ प्राप्नुवन्तो जलं ब्रह्मविदो जनाः । गर्हयन्ति नरान् सर्वान् बलस्थान् नृपतीनपि ।। ११ ।। 'इसीलिये वेदवेत्ता पुरुष रातके समय जलमें प्रवेश करनेवाले सम्पूर्ण मनुष्यों और बलवान् राजाओंकी भी निन्दा करते हैं ।। ११ ।। आरात् तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत । कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ।। १२ ।। अङ्गारपर्णं गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् । अहं हि मानी चेर्ष्युश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ।। १३ ।। 'अरे, ओ मनुष्यो! दूर ही खड़े रहो। मेरे समीप न आना। तुम्हें ज्ञात कैसे नहीं हुआ कि मैं गन्धर्वराज अंगारपर्ण गंगाजीके जलमें उतरा हुआ हूँ। तुमलोग मुझे (अच्छी तरह) जान लो, मैं अपने ही बलका भरोसा करनेवाला स्वाभिमानी, ईर्ष्यालु तथा कुबेरका प्रिय मित्र हूँ ।। १२-१३ ।। अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम । अनुगङ्गं चरन् कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ।। १४ ।।
'मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है। मैं गङ्गाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ।। १४।। न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः। इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ।। १५ ।। 'मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य—कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो?' ।। १५ ।।
अर्जुन उवाच
समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते। रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ।। १६ ।। **अर्जुन बोले—**दुर्मते! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ।। १६ ।। भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर। न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ।। १७ ।। आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें। इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ।। १७ ।। वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम। अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ।। १८ ।। अरे, ओ क्रूर! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं। असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं। जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ।। १८ ।। पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता। गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।। १९ ।। गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम्। रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ।। २० ।। अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये। इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ।। २१ ।। देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम्। तथा पितॄन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः। गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २२ ।। प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं। जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी—इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल
नष्ट हो जाते हैं। ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं। एकमात्र आकाश ही इनका तट है। गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं। ये ही वैतरणी होकर पितृलोकमें बहती हैं। वहाँ पापियोंके लिये इनके पार जाना अत्यन्त कठिन होता है। इस लोकमें आकर इनका नाम गंगा होता है। यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका कथन है॥ १९—२२॥
असम्बाधा देवनदी स्वर्गसम्पादनी शुभा ।
कथमिच्छसि तां रोद्धुं नैष धर्मः सनातनः ॥ २३ ॥
ये कल्याणमयी देवनदी सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे रहित एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं। तुम उन्हीं गंगाजीपर किसलिये रोक लगाना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है॥ २३॥
अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् ।
न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ॥ २४ ॥
जिसे कोई रोक नहीं सकता, जहाँ पहुँचनेमें कोई बाधा नहीं है, भागीरथीके उस पावन जलका तुम्हारे कहनेसे हम अपने इच्छानुसार स्पर्श क्यों न करें?॥ २४॥
वैशम्पायन उवाच
अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् ।
मुमोच बाणान् निशितान्हीनाशीविषानिव ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनकी वह बात सुनकर अंगारपर्ण क्रोधित हो गया और धनुष नवाकर विषैले साँपोंकी भाँति तीखे बाण छोड़ने लगा॥ २५॥
उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् ।
व्यपोहत् शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः ॥ २६ ॥
यह देख पाण्डुनन्दन धनंजयने तुरंत ही मशाल घुमाकर और उत्तम ढालसे रोककर उसके सभी बाण व्यर्थ कर दिये॥ २६॥
अर्जुन उवाच
बिभीषिका वै गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते ।
अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत् प्रविलीयते ॥ २७ ॥
**अर्जुनने कहा—**गन्धर्व! जो अस्त्र-विद्याके विद्वान् हैं, उनपर तुम्हारी यह घुड़की नहीं चल सकती। अस्त्र-विद्याके मर्मज्ञोंपर फैलायी हुई तुम्हारी यह माया फेनकी तरह विलीन हो जायगी ॥ २७ ॥
मानुषानतिगन्धर्वान् सर्वान् गन्धर्व लक्षये ।
तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ॥ २८ ॥
गन्धर्व! मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गन्धर्व मनुष्योंसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, इसलिये मैं तुम्हारे साथ मायासे नहीं, दिव्यास्त्रसे युद्ध करूँगा ॥ २८ ॥
पुरास्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात् किल बृहस्पतिः ।
भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतक्रतोः ॥ २९ ॥
गन्धर्व! यह आग्नेय अस्त्र पूर्वकालमें इन्द्रके माननीय गुरु बृहस्पतिजीने भरद्वाज मुनिको दिया था ॥ २९ ॥
भरद्वाजादग्निवेश्य अग्निवेश्याद् गुरुर्मम ।
साध्विदं मह्यमददद् द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ३० ॥
भरद्वाजसे इसे अग्निवेश्यने और अग्निवेश्यसे मेरे गुरु द्रोणाचार्यने प्राप्त किया है। फिर विप्रवर द्रोणाचार्यने यह उत्तम अस्त्र मुझे प्रदान किया ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ॥ ३१ ॥ विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः । अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ॥ ३२ ॥ शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः । भ्रातॄन् प्रति चकर्षार्थ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ॥ ३३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो गन्धर्वपर वह प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र चला दिया। उस अस्त्रने गन्धर्वके रथको जलाकर भस्म कर दिया। वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल हो गया और अस्त्रके तेजसे मूढ़ होकर नीचे मुँह किये गिरने लगा। महाबली अर्जुनने उसके फूलकी मालाओंसे सुशोभित केश पकड़ लिये और घसीटकर अपने भाइयोंके पास ले आये। अस्त्रके आघातसे वह गन्धर्व अचेत हो गया था ॥ ३१-३३ ॥
युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी । नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ॥ ३४ ॥ उस गन्धर्वकी पत्नीका नाम कुम्भीनसी था। उसने अपने पतिके जीवनकी रक्षाके लिये महाराज युधिष्ठिरकी शरण ली ॥ ३४ ॥
गन्धर्व्युवाच
त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ॥ ३५ ॥ **गन्धर्वी बोली—**महाभाग! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे इन पतिदेवको आप छोड़ दीजिये। प्रभो! मैं गन्धर्वपत्नी कुम्भीनसी आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् । को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ॥ ३६ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**तात! शत्रुसूदन अर्जुन! यह गन्धर्व युद्धमें हार गया और अपना यश खो चुका। अब स्त्री इसकी रक्षिका बनकर आयी है। यह स्वयं कोई पराक्रम नहीं कर सकता। ऐसे दीन-हीन शत्रुको कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो ॥ ३६ ॥
अर्जुन उवाच
जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥ **अर्जुन बोले—**गन्धर्व! जीवन धारण करो। जाओ, अब शोक न करो। इस समय कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान दे रहे हैं ॥ ३७ ॥
गन्धर्व उवाच
जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् । न च श्लाघे बलेनाङ्ग न नाम्ना जनसंसदि ॥ ३८ ॥ **गन्धर्वने कहा—**अर्जुन! मैं परास्त हो गया, अतः अपने पहले नाम अंगारपर्णको छोड़ देता हूँ। अब मैं जनसमुदायमें अपने बलकी श्लाघा नहीं करूँगा और न इस नामसे अपना परिचय ही दूँगा ॥ ३८ ॥ साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ॥ ३९ ॥ (आजकी पराजयसे) मुझे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने दिव्यास्त्रधारी अर्जुनको (मित्ररूपमें) प्राप्त किया है और अब मैं इन्हें गन्धर्वोंकी मायासे संयुक्त करना चाहता हूँ ॥ ३९ ॥ अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ॥ ४० ॥ इनके दिव्यास्त्रकी अग्निसे मेरा यह विचित्र एवं उत्तम रथ दग्ध हो गया है। पहले मैं विचित्र रथके कारण 'चित्ररथ' कहलाता था; परंतु अब मेरा नाम 'दग्धरथ' हो गया ॥ ४० ॥ सम्भृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा । निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ॥ ४१ ॥ मैंने पूर्वकालमें यहाँ तपस्याद्वारा जो यह विद्या प्राप्त की है, उसे आज अपने प्राणदाता महात्मा मित्रको अर्पित करूँगा ॥ ४१ ॥ संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् । यो रिपुं योजयेत् प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ॥ ४२ ॥ जिन्होंने अपने वेगसे शत्रु की शक्तिको कुण्ठित करके उसपर विजय पायी और फिर जब वह शत्रु शरणमें आ गया, तब जो उसे प्राणदान दे रहे हैं, वे किस कल्याणकी प्राप्तिके अधिकारी नहीं हैं? ॥ ४२ ॥ चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ॥ ४३ ॥
यह चाक्षुषी नामक विद्या है, जिसे मनुने सोमको दिया। सोमने विश्वावसुको दिया और विश्वावसुने मुझे प्रदान किया है ।। ४३ ।। सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति । आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ।। ४४ ।। यह गुरुकी दी हुई विद्या यदि किसी कायरको मिल गयी तो नष्ट हो जाती है। (इस प्रकार) मैंने इसके उपदेशकी परम्पराका वर्णन किया है। अब इसका बल भी मुझसे सुन लीजिये ।। ४४ ।। यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन । तत् पश्येद् यादृशं चेच्छेत् तादृशं द्रष्टुमर्हति ।। ४५ ।। तीनों लोकोंमें जो कोई भी वस्तु है, उसमेंसे जिस वस्तुको आँखसे देखनेकी इच्छा हो, उसे इस विद्याके प्रभावसे कोई भी देख सकता है और जिस रूपमें देखना चाहे, उसी रूपमें देख सकता है ।। ४५ ।। एकपादेन षण्मासान् स्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रतेऽकृते ।। ४६ ।। जो एक पैरसे छः महीनेतक खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्याको पा सकता है। परंतु आपको इस व्रतका पालन या तपस्या किये बिना ही मैं स्वयं उक्त विद्याकी प्राप्ति कराऊँगा ।। ४६ ।। विद्यया ह्यनया राजन् वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानाम नुभावप्रदर्शिनः ।। ४७ ।। राजन्! इस विद्याके बलसे ही हमलोग मनुष्योंसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओंके तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं ।। ४७ ।। गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम । भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ।। ४८ ।। पुरुषशिरोमणे! मैं आपको और आपके भाइयोंको अलग-अलग गन्धर्वलोकके सौ-सौ घोड़े भेंट करता हूँ ।। ४८ ।। देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः । क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ।। ४९ ।। वे घोड़े देवताओं और गन्धर्वोंके वाहन हैं। उनके शरीरकी कान्ति दिव्य है। वे मनके समान वेगशाली और आवश्यकताके अनुसार दुबले-मोटे होते हैं; किंतु उनका वेग कभी कम नहीं होता ।। ४९ ।। पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिबर्हणम् । दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ।। ५० ।।
पूर्वकालमें वृत्रासुरका संहार करनेके निमित्त इन्द्रके लिये जिस वज्रका निर्माण किया गया था, वृत्रासुरके मस्तकपर पड़ते ही उसके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये ॥ ५० ॥ ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते । लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनुः स्मृता ॥ ५१ ॥ तबसे अनेक भागोंमें बँटे हुए उस वज्रके प्रत्येक भागकी देवतालोग उपासना करते हैं। लोकमें उत्कृष्ट धन और यश आदि जो कुछ भी वस्तु है, उसे वज्रका स्वरूप माना गया है ॥ ५१ ॥ वज्रपाणिर्ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ॥ ५२ ॥ (अग्निमें आहुति देनेके कारण) ब्राह्मणका दाहिना हाथ वज्र है। क्षत्रियका रथ वज्र है। वैश्यलोग जो दान करते हैं, वह भी वज्र है और शूद्रलोग जो सेवाकार्य करते हैं, उसे भी वज्र ही समझना चाहिये ॥ ५२ ॥ क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्गं वडवा सूते शूरांश्चाश्वेषु ये मताः ॥ ५३ ॥ क्षत्रियके रथरूपी वज्रका एक विशिष्ट अंग होनेसे घोड़ोंको अवध्य बताया गया है। गन्धर्वदेशकी घोड़ी रथको वहन करनेवाले रथांगस्वरूप (वज्रस्वरूप) घोड़ेको जन्म देती है। वे घोड़े सब अश्वोंमें शूरवीर माने जाते हैं ॥ ५३ ॥ कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ॥ ५४ ॥ गन्धर्व-देशके घोड़ोंकी यह विशेषता है कि वे इच्छानुसार अपना रंग बदल लेते हैं। सवारकी इच्छाके अनुसार अपने वेगको घटा-बढ़ा सकते हैं। जब आवश्यकता या इच्छा हो, तभी वे उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे गन्धर्वदेशीय घोड़े आपकी इच्छापूर्ण करते रहेंगे ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्याधनं श्रुतं वापि न तद् गन्धर्व रोचये ॥ ५५ ॥ **अर्जुनने कहा—**गन्धर्व! यदि तुमने प्रसन्न होकर अथवा प्राणसंकटसे बचानेके कारण मुझे विद्या, धन अथवा शास्त्र प्रदान किया है तो मैं इस तरहका दान लेना पसंद नहीं करता ॥ ५५ ॥
गन्धर्व उवाच संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते ।
जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ।। ५६ ।।
**गन्धर्व बोला—**महापुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह प्रीतिका बढ़ानेवाला होता है—ऐसा देखनेमें आता है। आपने मुझे जीवनदान दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं आपको चाक्षुषी विद्या भेंट करता हूँ ।। ५६ ।।
त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् ।
तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ।। ५७ ।।
साथ ही आपसे भी मैं उत्तम आग्नेयास्त्र ग्रहण करूँगा। भरतकुलभूषण अर्जुन! ऐसा करनेसे ही हम दोनोंमें दीर्घकालतक समुचित सौहार्द बना रहेगा ।। ५७ ।।
अर्जुन उवाच
त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान् संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ ।
सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद् भयं भवेत् ।। ५८ ।।
**अर्जुनने कहा—**ठीक है, मैं यह अस्त्र-विद्या देकर तुमसे घोड़े ले लूँगा। हम दोनोंकी मैत्री सदा बनी रहे। सखे गन्धर्वराज! बताओ तो सही, तुमलोगोंसे हम मनुष्योंको क्यों भय प्राप्त होता है? ।। ५८ ।।
कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद् येन स्म धर्षिताः ।
यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिंदमाः ।। ५९ ।। गन्धर्व! हम सब लोग वेदवेत्ता हैं और शत्रुओंका दमन करनेकी शक्ति रखते हैं; फिर भी रातमें यात्रा करते समय जो तुमने हमलोगोंपर आक्रमण किया है, इसका क्या कारण है? इसपर भी प्रकाश डालो ।। ५९ ।।
गन्धर्व उवाच
अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः । यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ।। ६० ।। **गन्धर्व बोला—**पाण्डुकुमारो! आपलोग (विवाहित न होनेके कारण) त्रिविध अग्नियोंकी सेवा नहीं करते। (अध्ययन पूरा करके समावर्तन संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं, अतः) प्रतिदिन अग्निको आहुति भी नहीं देते। आपके आगे कोई ब्राह्मण पुरोहित भी नहीं है। इन्हीं कारणोंसे मैंने आपपर आक्रमण किया है ।। ६० ।।
(जानता च मया तस्मात् तेजश्चाभिजनं च वः । इयं मतिमतां श्रेष्ठ धर्षितुं वै कृता मतिः ।। को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद् यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ।।) यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः । विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ।। ६१ ।। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इसीलिये मैंने आपलोगोंके तेज और कुलोचित प्रभावको जानते हुए भी आपपर आक्रमण करनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ! आपलोग महान् तेजस्वी हैं। आपने अपने गुणोंसे जिस शोभाशाली श्रेष्ठ यशका विस्तार किया है, उसे तीनों लोकोंमें कौन नहीं जानता। बुद्धिमान् यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव कुरुकुलकी यशोगाथाका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं ।। ६१ ।।
नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् । गुणान् कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ।। ६२ ।। वीर! नारद आदि देवर्षियोंके मुखसे भी मैंने आपके बुद्धिमान् पूर्वजोंका गुणगान सुना है ।। ६२ ।।
स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ।। ६३ ।। तथा समुद्रसे घिरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए मैंने स्वयं भी आपके उत्तम कुलका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है ।। ६३ ।।
वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ।। ६४ ।।
अर्जुन! तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्वी भरद्वाजनन्दन द्रोणको भी, जो आपके वेद और धनुर्वेदके आचार्य रहे हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ ६४॥ धर्मं वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा। पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान् कुरुवर्धनम्। पितॄनेतामहं पार्थ देवमानुषसत्तमान्॥ ६५॥ कुरुश्रेष्ठ! धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार तथा महाराज पाण्डु—ये छः महापुरुष कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। पार्थ! ये देवताओं तथा मनुष्योंके सिरमौर छहों व्यक्ति आपलोगोंके पिता हैं। मैं इन सबको जानता हूँ॥ ६५॥ दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः। भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः॥ ६६॥ आप सब भाई देवस्वरूप, महात्मा, समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर हैं तथा आपलोगोंने ब्रह्मचर्यव्रतका भलीभाँति पालन किया है॥ ६६॥ उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम्। जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम्॥ ६७॥ आपलोगोंका अन्तःकरण शुद्ध है, मन और बुद्धि भी उत्तम है। पार्थ! आपके विषयमें यह सब कुछ जानते हुए भी मैंने यहाँ आक्रमण किया था॥ ६७॥ स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान् क्षन्तुमर्हति। धर्षणामात्मनः पश्यन् बाहुद्रविणमाश्रितः॥ ६८॥ कुरूनन्दन! इसका कारण यह है कि अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाला कोई भी पुरुष जब स्त्रीके समीप अपना तिरस्कार होता देखता है, तब उसे सहन नहीं कर पाता॥ ६८॥ नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते। यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत्॥ ६९॥ कुन्तीनन्दन! इसके सिवा एक बात यह भी है कि रातके समय हमलोगोंका बल बहुत बढ़ जाता है। इसीसे स्त्रीके साथ रहनेके कारण मुझमें क्रोधका आवेश हो गया था॥ ६९॥ सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन। येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ७०॥ तपतीके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आपने जिस कारण युद्धमें मुझे पराजित किया है, उसे (भी) बतलाता हूँ; सुनिये॥ ७०॥ ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि। यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया॥ ७१॥
ब्रह्मचर्य! सबसे बड़ा धर्म है और वह तुममें निश्चितरूपसे विद्यमान है। कुन्तीनन्दन! इसीलिये युद्धमें मैं तुमसे हार गया हूँ ।। ७१ ।।
यस्तु स्यात् क्षत्रियः कश्चित् कामवृत्तः परंतप ।
नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत् कथंचन ।। ७२ ।।
शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! यदि दूसरा कोई कामासक्त क्षत्रिय रातमें मुझसे युद्ध करने आता तो किसी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था ।। ७२ ।।
यस्तु स्यात् कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः ।
जयेन्नक्तंचरान् सर्वान् स पुरोहितधूर्गतः ।। ७३ ।।
किंतु कुन्तीकुमार! कामासक्त होनेपर भी यदि कोई पुरुष किसी ब्राह्मणको आगे करके चले तो वह समस्त निशाचरोंपर विजय पा सकता है; क्योंकि उस दशामें उसका सारा भार पुरोहितपर होता है ।। ७३ ।।
तस्मात् तापत्य यत्किंचिन्नृणां श्रेय इहेप्सितम् ।
तस्मिन् कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ।। ७४ ।।
अतः तपतीनन्दन! मनुष्योंको इस लोकमें जो भी कल्याणकारी कार्य करना अभीष्ट हो, उसमें वह मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरोहितोंको नियुक्त करे ।। ७४ ।।
वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।
धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ।। ७५ ।।
जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ।। ७५ ।।
जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् ।
यस्य स्याद् धर्मविद् वाग्मी पुरोधाः शीलवान् शुचिः ।। ७६ ।।
जिसके यहाँ धर्मज्ञ, वक्ता, शीलवान् और ईमानदार ब्राह्मण पुरोहित हो, उस राजाको इस लोकमें निश्चय ही विजय प्राप्त होती है और मरनेके बाद उसे स्वर्गलोक मिलता है ।। ७६ ।।
लाभं लब्धुमलब्धं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् ।
पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ।। ७७ ।।
राजाको किसी अप्राप्त वस्तु या धनको प्राप्त करने अथवा उपलब्ध धन आदिकी रक्षा करनेके लिये गुणवान् ब्राह्मणको पुरोहित बनाना चाहिये ।। ७७ ।।
पुरोहितमते तिष्ठेद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।
प्राप्तुं वसुमतीं सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ।। ७८ ।।
जो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार चाहे या अपने लिये ऐश्वर्य पाना चाहे, उसे पुरोहितकी आज्ञाके अधीन रहना चाहिये ।। ७८ ।।
न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च ।
जयेदब्राह्मणः कश्चिद् भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ॥ ७९ ॥
तपतीनन्दन! कोई भी राजा कहीं भी पुरोहितकी सहायताके बिना केवल अपने बल अथवा कुलीनताके भरोसे भूमिपर विजय नहीं पाता ॥ ७९ ॥
तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन ।
ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम् ॥ ८० ॥
अतः कौरवोंके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आप यह जान लें कि जहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंकी प्रधानता हो, उसी राज्यकी दीर्घकालतक रक्षा की जा सकती है ॥ ८० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि गन्धर्वपराभवे
एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें गन्धर्वपराभवविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ८२ श्लोक हैं)
१७०-
सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना
अर्जुन उवाच
तापत्य इति यद् वाक्यमुक्तवानसि मामिह ।
तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा— गन्धर्व! तुमने ‘तपतीनन्दन’ कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्यका निश्चित अर्थ क्या है? ॥ १ ॥
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् ।
कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ २ ॥
साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपनेको कुन्तीका पुत्र समझते हैं। अतः ‘तापत्य’ का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उनके यों कहनेपर गन्धर्वने कुन्तीनन्दन धनंजयको वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ ३ ॥
गन्धर्व उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् ।
यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर ॥ ४ ॥
गन्धर्व बोला— समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! इस विषयमें एक बहुत मनोरम कथा है, जिसे मैं यथार्थ एवं पूर्णरूपसे आपको सुनाऊँगा ॥ ४ ॥
उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद् वचः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव ॥ ५ ॥
मैंने जिस कारण अपने वक्तव्यमें तुम्हें ‘तापत्य’ कहा है, वह बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ५ ॥
य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा ।
एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता ॥ ६ ॥
विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो ।
विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ॥ ७ ॥
ये जो आकाशमें उदित हो अपने तेजोमण्डलके द्वारा यहाँसे स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहे हैं, इन्हीं भगवान् सूर्यदेवके तपती नामकी एक पुत्री हुई, जो पिताके अनुरूप ही थी। प्रभो! वह सावित्रीदेवीकी छोटी बहिन थी। वह तपस्यामें संलग्न रहनेके कारण तीनों लोकोंमें तपती नामसे विख्यात हुई ।। ६-७ ।।
न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी ।
नाप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन ।। ८ ।।
उस समय देवता, असुर, यक्ष एवं राक्षस जातिकी स्त्री, कोई अप्सरा तथा गंधर्वपत्नी भी उसके समान रूपवती न थी ।। ८ ।।
सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना ।
स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ।। ९ ।।
न तस्याः सदृशं कंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ।
भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ।। १० ।।
उसके शरीरका एक-एक अवयव बहुत सुन्दर, सुविभक्त और निर्दोष था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और कजरारी थीं। वह सुन्दरी सदाचार, साधु-स्वभाव और मनोहर वेशसे सुशोभित थी। भारत! भगवान् सूर्यने तीनों लोकोंमें किसी भी पुरुषको ऐसा नहीं पाया, जो रूप, शील, गुण और शास्त्रज्ञानकी दृष्टिसे उसका पति होनेयोग्य हो ।। ९-१० ।।
सम्प्राप्तयौवनां पश्यन् देयां दुहितरं तु ताम् ।
नोपलेभे ततः शान्तिं सम्प्रदानं विचिन्तयन् ।। ११ ।।
वह युवावस्थाको प्राप्त हो गयी। अब उसका किसीके साथ विवाह कर देना आवश्यक था। उसे उस अवस्थामें देखकर भगवान् सूर्य इस चिन्तामें पड़े कि इसका विवाह किसके साथ किया जाय। यही सोचकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ।। ११ ।।
अथर्क्षपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृषभो बली ।
सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा ।। १२ ।।
कुन्तीनन्दन! उन्हीं दिनों महाराज ऋक्षके पुत्र राजा संवरण कुरुकुलके श्रेष्ठ एवं बलवान् पुरुष थे। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधना प्रारम्भ की ।। १२ ।।
अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः ।
नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ।। १३ ।।
शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन ।
अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ।। १४ ।।
पौरवनन्दन! वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पवित्र हो अर्घ्य, पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य आदि सामग्रियोंसे तथा भाँति-भाँतिके नियम, व्रत एवं तपस्याओंद्वारा बड़े भक्तिभावसे उदय होते हुए सूर्यकी पूजा करते थे। उनके हृदयमें सेवाका भाव था। वे शुद्ध तथा अहंकारशून्य थे ।। १३-१४ ।।
ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि । तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥ १५ ॥ रूपमें इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था। वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे। अतः सूर्यदेवने राजा संवरणको ही तपतीके योग्य पति माना ॥ १५ ॥
दातुमैच्छत् ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् । नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च ॥ १६ ॥ कुरुनन्दन! उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरणको, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात था, अपनी कन्या देनेकी इच्छा की ॥ १६ ॥
यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा । तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ॥ १७ ॥ जैसे आकाशमें उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित थे ॥ १७ ॥
यथार्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः । तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ॥ १८ ॥ पार्थ! जैसे ब्रह्मवादी महर्षि उगते हुए सूर्यकी आराधना करते हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य आदि प्रजाएँ महाराज संवरणकी उपासना करती थीं ॥ १८ ॥
स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा । बभूव नृपतिः श्रीमान् सुहृदां दुर्हृदामपि ॥ १९ ॥ वे अपनी कमनीय कान्तिसे चन्द्रमाको और तेजसे सूर्यदेवको भी तिरस्कृत करते थे। राजा संवरण मित्रों तथा शत्रुओंकी मण्डलीमें भी अपनी दिव्य शोभासे प्रकाशित होते थे ॥ १९ ॥
एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव । तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ॥ २० ॥ कुरुनन्दन! ऐसे उत्तम गुणोंसे विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार-व्यवहारसे युक्त राजा संवरणको भगवान् सूर्यने स्वयं ही अपनी पुत्री तपतीको देनेका निश्चय कर लिया ॥ २० ॥
स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः । चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ॥ २१ ॥ कुन्तीनन्दन! एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें हिंसक पशुओंका शिकार कर रहे थे ॥ २१ ॥
चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः । ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ॥ २२ ॥ स मृताश्वश्चरन् पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः । ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ॥ २३ ॥
कुन्तीपुत्र! शिकार खेलते समय ही राजाका अनुपम अश्व पर्वतपर भूख-प्याससे पीड़ित हो मर गया। पार्थ! घोड़ेकी मृत्यु हो जानेसे राजा संवरण पैदल ही उस पर्वत-शिखरपर विचरने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने एक विशाललोचना कन्या देखी, जिसकी समता करनेवाली स्त्री कहीं नहीं थी ।। २२-२३ ।।
स एक एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः ।
तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ।। २४ ।।
शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी। उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रोंसे उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये ।। २४ ।।
स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् ।
पुनः संतर्कयामास रवेर्भ्रष्टामिव प्रभाम् ।। २५ ।।
पहले तो उसका रूप देखकर नरेशने अनुमान किया कि हो-न-हो ये साक्षात् लक्ष्मी हैं; फिर उनके ध्यानमें यह बात आयी कि सम्भव है, भगवान् सूर्यकी प्रभा ही सूर्यमण्डलसे च्युत होकर इस कन्याके रूपमें आकाशसे पृथ्वीपर आ गयी हो ।। २५ ।।
वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः ।
प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम् ।। २६ ।।
शरीर और तेजसे वह आगकी ज्वाला-सी जान पड़ती थी। उसकी प्रसन्नता और कमनीय कान्तिसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह निर्मल चन्द्रकला हो ।। २६ ।।
गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन् स्थिता स्वसितलोचना ।
विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी ।। २७ ।।
सुन्दर कजरारे नेत्रोंवाली वह दिव्य कन्या जिस पर्वत-शिखरपर खड़ी थी, वहाँ वह सोनेकी चमकती हुई प्रतिमा-सी सुशोभित हो रही थी ।। २७ ।।
तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः ।
स सवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत् ।। २८ ।।
विशेषतः उसके रूप और वेशसे विभूषित हो वृक्ष, गुल्म और लताओंसहित वह पर्वत सुवर्णमय-सा जान पड़ता था ।। २८ ।।
अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः ।
अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलम् ।। २९ ।।
उसे देखकर राजा संवरणकी समस्त लोकोंकी सुन्दरी युवतियोंमें अनादर-बुद्धि हो गयी। राजा यह मानने लगे कि आज मुझे अपने नेत्रोंका फल मिल गया ।। २९ ।।
जन्मप्रभृति यत् किंचिद् दृष्टवान् स महीपतिः ।
रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन ।। ३० ।।
भूपाल संवरणने जन्मसे लेकर (उस दिनतक) जो कुछ देखा था, उसमें कोई भी रूप उन्हें उस (दिव्य किशोरी)-के सदृश नहीं प्रतीत हुआ ।। ३० ।। तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा । न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ।। ३१ ।। उस कन्याने उस समय अपने उत्तम गुणमय पाशोंसे राजाके मन और नेत्रोंको बाँध लिया। वे अपने स्थानसे हिल-डुलतक न सके। उन्हें किसी बातकी सुध-बुध (भी) न रही ।। ३१ ।। अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् । लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ।। ३२ ।। वे सोचने लगे, निश्चय ही ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंके सौन्दर्य-सिन्धुको मथकर इस विशाल नेत्रोंवाली किशोरीके इस मनोहर रूपका आविष्कार किया होगा ।। ३२ ।। एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसम्पदा । कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ।। ३३ ।। इस प्रकार उस समय उसकी रूप-सम्पत्तिसे राजा संवरणने यही अनुमान किया कि संसारमें इस दिव्य कन्याकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ।। ३३ ।। तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः । जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः ।। ३४ ।। कल्याणमय कुलमें उत्पन्न हुए वे नरेश उस कल्याणस्वरूपा कामिनीको देखते ही काम-बाणसे पीड़ित हो गये। उनके मनमें चिन्ताकी आग जल उठी ।। ३४ ।। दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना । अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ।। ३५ ।। तदनन्तर तीव्र कामाग्निसे जलते हुए राजा संवरणने लज्जारहित होकर उस लज्जाशीला एवं मनोहारिणी कन्यासे इस प्रकार पूछा— ।। ३५ ।। कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि । कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ।। ३६ ।। 'रम्भोरु! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किसलिये यहाँ खड़ी हो? पवित्र मुसकानवाली! तुम इस निर्जन वनमें अकेली कैसे विचर रही हो? ।। ३६ ।। त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता । विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ।। ३७ ।। 'तुम्हारे सभी अंग परम सुन्दर एवं निर्दोष हैं। तुम सब प्रकारके (दिव्य) आभूषणोंसे विभूषित हो। सुन्दरि! इन आभूषणोंसे तुम्हारी शोभा नहीं है, अपितु तुम स्वयं ही इन आभूषणोंकी शोभा बढ़ानेवाली अभीष्ट आभूषणके समान हो ।। ३७ ।।