महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तदनन्तर सारथि इन्द्रसेन राजकुमारी सुभद्राके वस्त्र, आभूषण, धायों तथा दासियोंको लेकर तुरंत ही रथके द्वारा द्वारकापुरीको चल दिया ।। ४ ।। ततः कुरुश्रेष्ठमुपेत्य पौराः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः । तं ब्राह्मणाश्चाभ्यवदन् प्रसन्ना मुख्याश्च सर्वे कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ५ ॥ इसके बाद उदार हृदयवाले पुरवासियोंने कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उनकी परिक्रमा की। कुरुजांगलदेशके ब्राह्मणों तथा सभी प्रमुख लोगोंने उनसे प्रसन्नतापूर्वक बातचीत की ।। ५ ।। स चापि तानभ्यवदत् प्रसन्नः सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः । तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ॥ ६ ॥ अपने भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने भी प्रसन्न होकर उन सबसे वार्तालाप किया। कुरुजांगलदेशके उस जनसमुदायको देखकर महात्मा राजा युधिष्ठिर थोड़ी देरके लिये वहाँ ठहर गये ।। ६ ।। पितेव पुत्रेषु स तेषु भावं चक्रे कुरूणामृषभो महात्मा । ते चापि तस्मिन् भरतप्रबर्हे तदा बभूवुः पितरीव पुत्राः ॥ ७ ॥ जैसे पिताका अपने पुत्रोंपर वात्सल्यभाव होता है, उसी प्रकार कुरुश्रेष्ठ महात्मा युधिष्ठिरने उन सबके प्रति अपने आन्तरिक स्नेहका परिचय दिया। वे भी उन भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिरके प्रति वैसे ही अनुरक्त थे, जैसे पुत्र अपने पितापर ।। ७ ।। ततस्तमासाद्य महाजनौघाः कुरुप्रवीरं परिवार्य तस्थुः । हा नाथ हा धर्म इति ब्रुवाणा भीताश्च सर्वेऽश्रुमुखाश्च राजन् ॥ ८ ॥ वरः कुरूणामधिपः प्रजानां पितेव पुत्रानपहाय चास्मान् । पौरानिमाञ्जानपदांश्च सर्वान् हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ॥ ९ ॥ उस महान् जनसमुदाय (प्रजा)-के लोग कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरके पास जा उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। राजन्! उस समय उन सबके मुखपर आँसुओंकी
धारा बह रही थी और वे वियोगके भयसे भीत हो हा नाथ! हा धर्म! इस प्रकार पुकारते हुए कह रहे थे—‘कुरुवंशके श्रेष्ठ अधिपति, प्रजाजनोंपर पिताका-सा स्नेह रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर हम सब पुत्रों, पुरवासियों तथा समस्त देशवासियोंको छोड़कर अब कहाँ चले जा रहे हैं? ।। ८-९ ।।
धिग् धार्तराष्ट्रं सुनृशंसबुद्धिं धिक् सौबलं पापमतिं च कर्णम् । अनर्थमिच्छन्ति नरेन्द्र पापा ये धर्मनित्यस्य सतस्तवैवम् ।। १० ।। ‘क्रूरबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धिक्कार है। सुबलपुत्र शकुनि तथा पापपूर्ण विचार रखनेवाले कर्णको भी धिक्कार है, जो पापी सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले आपका इस प्रकार अनर्थ करना चाहते हैं ।। १० ।।
स्वयं निवेश्याप्रतिमं महात्मा पुरं महादेवपुरप्रकाशम् । शतक्रतुप्रस्थममेयकर्मा हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। ११ ।। ‘जिन महात्माने स्वयं ही पुरुषार्थ करके महादेवजीके नगर कैलासकी-सी सुषमावाले अनुपम इन्द्रप्रस्थ नामक नगरको बसाया था, वे अचिन्त्यकर्मा धर्मराज युधिष्ठिर अपनी उस पुरीको छोड़कर अब कहाँ जा रहे हैं? ।। ११ ।।
चकार यामप्रतिमां महात्मा सभां मयो देवसभाप्रकाशाम् । तां देवगुप्तामिव देवमायां हित्वा प्रयातः क्व नु धर्मराजः ।। १२ ।। ‘महामना मयदानवने देवताओंकी सभाके समान सुशोभित होनेवाली जिस अनुपम सभाका निर्माण किया था, देवताओंद्वारा रक्षित देवमायाके समान उस सभाका परित्याग करके धर्मराज युधिष्ठिर कहाँ चले जा रहे हैं?’ ।। १२ ।।
तान् धर्मकामार्थविदुत्तमौजा बीभत्सुरुच्चैः सहितानुवाच । आदास्यते वासमिमं निरुष्य वनेषु राजा द्विषतां यशांसि ।। १३ ।। धर्म, अर्थ और कामके ज्ञाता उत्तम पराक्रमी अर्जुनने उन सब प्रजाजनोंको सम्बोधित करके उच्च स्वरसे कहा—‘राजा युधिष्ठिर इस वनवासकी अवधि पूर्ण करके शत्रुओंका यश छीन लेंगे ।। १३ ।।
द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक् च
भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च ।
प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या
यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ॥ १४ ॥
‘आपलोग एक साथ या अलग-अलग श्रेष्ठ ब्राह्मणों, तपस्वियों तथा धर्म-अर्थके ज्ञाता महापुरुषोंको प्रसन्न करके उन सबसे यह प्रार्थना करें, जिससे हमलोगोंके अभीष्ट मनोरथकी उत्तम सिद्धि हो’ ॥ १४ ॥
इत्येवमुक्ते वचनेऽर्जुनेन
ते ब्राह्मणाः सर्ववर्णाश्च राजन् ।
मुदाभ्यनन्दन् सहिताश्च चक्रुः
प्रदक्षिणं धर्मभृतां वरिष्ठम् ॥ १५ ॥
राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणों तथा अन्य सब वर्णके लोगोंने एक स्वरसे प्रसन्नतापूर्वक उनकी बातका अभिनन्दन किया तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरकी परिक्रमा की ॥ १५ ॥
आमन्त्र्य पार्थं च वृकोदरं च
धनंजयं याज्ञसेनीं यमौ च ।
प्रतस्थिरे राष्ट्रमपेतहर्षा
युधिष्ठिरेणानुमता यथास्वम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर सब लोग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, द्रौपदी तथा नकुल-सहदेवसे विदा ले एवं युधिष्ठिरकी अनुमति प्राप्त करके उदास होकर अपने राष्ट्रको प्रस्थित हुए ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 193)
चतुर्विंशोऽध्यायः
पाण्डवोंका द्वैतवनमें जाना
वैशम्पायन उवाच
ततस्तेषु प्रयातेषु कौन्तेयः सत्यसंगरः ।
अभ्यभाषत धर्मात्मा भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर प्रजाजनोंके चले जानेपर सत्यप्रतिज्ञ एवं धर्मात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा— ॥ १ ॥
द्वादशेमानि वर्षाणि वस्तव्यं निर्जने वने ।
समीक्षध्वं महारण्ये देशं बहुमृगद्विजम् ॥ २ ॥
‘हमलोगोंको इन आगामी बारह वर्षोंतक निर्जन वनमें निवास करना है, अतः इस महान् वनमें कोई ऐसा स्थान ढूँढ़ो, जहाँ बहुत-से पशु-पक्षी निवास करते हों ॥ २ ॥
बहुपुष्पफलं रम्यं शिवं पुण्यजनावृतम् ।
यत्रेमाः शरदः सर्वाः सुखं प्रतिवसेमहि ॥ ३ ॥
‘जहाँ फल-फूलोंकी अधिकता हो, जो देखनेमें रमणीय एवं कल्याणकारी हो तथा जहाँ बहुत-से पुण्यात्मा पुरुष रहते हों। वह स्थान इस योग्य होना चाहिये, जहाँ हम सब लोग इन बारह वर्षोंतक सुखपूर्वक रह सकें’ ॥ ३ ॥
एवमुक्ते प्रत्युवाच धर्मराजं धनंजयः ।
गुरुवन्मानवगुरुं मानयित्वा मनस्विनम् ॥ ४ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन मनस्वी मानवगुरु युधिष्ठिरका गुरुतुल्य सम्मान करके उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता ।
अज्ञातं मानुषे लोके भवतो नास्ति किंचन ॥ ५ ॥
**अर्जुन बोले—**आर्य! आप स्वयं ही बड़े-बड़े ऋषियों तथा वृद्ध पुरुषोंका संग करनेवाले हैं। इस मनुष्यलोकमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो ॥ ५ ॥
त्वया ह्युपासिता नित्यं ब्राह्मणा भरतर्षभ ।
द्वैपायनप्रभृतयो नारदश्च महातपाः ॥ ६ ॥
भरतश्रेष्ठ! आपने सदा द्वैपायन आदि बहुत-से ब्राह्मणों तथा महातपस्वी नारदजीकी उपासना की है ॥ ६ ॥
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं संचरते वशी ।
देवलोकाद् ब्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ॥ ७ ॥ जो मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर सदा सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते रहते हैं। देवलोकसे लेकर ब्रह्मलोक तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंमें भी उनकी पहुँच है ॥ ७ ॥
अनुभावांश्च जानासि ब्राह्मणानां न संशयः । प्रभावांश्चैव वेत्थ त्वं सर्वेषामेव पार्थिव ॥ ८ ॥ राजन्! आप सभी ब्राह्मणोंके अनुभव और प्रभावको जानते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
त्वमेव राजन् जानासि श्रेयःकारणमेव च । यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ॥ ९ ॥ राजन्! आप ही श्रेय (मोक्ष)-के कारणका ज्ञान रखते हैं। महाराज! आपकी जहाँ इच्छा हो वहीं हमलोग निवास करेंगे ॥ ९ ॥
इदं द्वैतवनं नाम सरः पुण्यजलोचितम् । बहुपुष्पफलं रम्यं नानाद्विजनिषेवितम् ॥ १० ॥ यह जो पवित्र जलसे भरा हुआ सरोवर है, इसका नाम द्वैतवन है। यहाँ फल और फूलोंकी बहुलता है। देखनेमें यह स्थान रमणीय तथा अनेक ब्राह्मणोंसे सेवित है ॥ १० ॥
अत्रेमा द्वादश समा विहरेमेति रोचये । यदि तेऽनुमतं राजन् किमन्यन्मन्यते भवान् ॥ ११ ॥ मेरी इच्छा है कि यहीं हमलोग इन बारह वर्षोंतक निवास करें। राजन्! यदि आपकी अनुमति हो तो द्वैतवनके समीप रहा जाय। अथवा आप दूसरे किस स्थानको उत्तम मानते हैं ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
ममाप्येतन्मतं पार्थ त्वया यत् समुदाहृतम् । गच्छामः पुण्यविख्यातं महद् द्वैतवनं सरः ॥ १२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—पार्थ! तुमने जैसा बताया है, वही मेरा भी मत है। हमलोग पवित्र जलके कारण प्रसिद्ध द्वैतवन नामक विशाल सरोवरके समीप चलें ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते प्रययुः सर्वे पाण्डवा धर्मचारिणः । ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्धं पुण्यं द्वैतवनं सरः ॥ १३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वे सभी धर्मात्मा पाण्डव बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र द्वैतवन नामक सरोवरको चले गये ॥ १३ ॥
ब्राह्मणाः साग्निहोत्राश्च तथैव च निरग्नयः ।
स्वाध्यायिनो भिक्षवश्च तथैव वनवासिनः ॥ १४ ॥ बहवो ब्राह्मणास्तत्र परिवव्रुर्युधिष्ठिरम् । तपःसिद्धा महात्मानः शतशः संशितव्रताः ॥ १५ ॥ वहाँ बहुत-से अग्निहोत्री ब्राह्मणों, निरग्निकों, स्वाध्यायपरायण ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों, संन्यासियों, सैकड़ों कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपःसिद्ध महात्माओं तथा अन्य अनेक ब्राह्मणोंने महाराज युधिष्ठिरको घेर लिया ॥ १४-१५ ॥ ते यात्वा पाण्डवास्तत्र ब्राह्मणैर्बहुभिः सह । पुण्यं द्वैतवनं रम्यं विविशुर्भरतर्षभाः ॥ १६ ॥ वहाँ पहुँचकर भरतश्रेष्ठ पाण्डवोंने बहुत-से ब्राह्मणोंके साथ पवित्र एवं रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥ तमालतालाम्रमधूकनीप- कदम्बसर्जार्जुनकर्णिकारैः । तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १७ ॥ राष्ट्रपति युधिष्ठिरने देखा, वह महान् वन तमाल, ताल, आम, महुआ, नीप, कदम्ब, साल, अर्जुन और कनेर आदि वृक्षोंसे, जो ग्रीष्म-ऋतु बीतनेपर फूल धारण करते हैं, सम्पन्न है ॥ १७ ॥ महाद्रुमाणां शिखरेषु तस्थु- र्मनोरमां वाचमुदीरयन्तः । मयूरदात्यूहचकोरसङ्घा- स्तस्मिन् वने बर्हिणकोकिलाश्च ॥ १८ ॥ उस वनमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी ऊँची शाखाओं-पर मयूर, चातक, चकोर, बर्हिण तथा कोकिल आदि पक्षी मनको भानेवाली मीठी बोली बोलते हुए बैठे थे ॥ १८ ॥ करेणुयूथैः सह यूथपानां मदोत्कटानामचलप्रभाणाम् । महान्ति यूथानि महाद्विपानां तस्मिन् वने राष्ट्रपतिर्ददर्श ॥ १९ ॥ राष्ट्रपति युधिष्ठिरको उस वनमें पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले मदोन्मत्त गजराजोंके, जो एक-एक यूथके अधिपति थे, हथिनियोंके साथ विचरनेवाले कितने ही भारी-भारी झुंड दिखायी दिये ॥ १९ ॥ मनोरमां भोगवतीमुपेत्य पूतात्मनां चीरजटाधराणाम् । तस्मिन् वने धर्मभृतां निवासे
ददर्श सिद्धर्षिगणानेकान् ॥ २० ॥ मनोरम भोगवती (सरस्वती) नदीमें स्नान करके जिनके अन्तःकरण पवित्र हो गये हैं, जो वल्कल और जटा धारण करते हैं, ऐसे धर्मात्माओंके निवासभूत उस वनमें राजाने सिद्धमहर्षियोंके अनेक समुदाय देखे ॥ २० ॥
ततः स यानादवरुह्य राजा सभ्रातृकः सजनः काननं तत् । विवेश धर्मात्मवतां वरिष्ठ- स्त्रिविष्टपं शक्र इवामितौजाः ॥ २१ ॥ तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ एवं अमित तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकों और भाइयोंसहित रथसे उतरकर स्वर्गमें इन्द्रके समान उस वनमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥
तं सत्यसंधं सहसाभिपेतु- र्दिदृक्षवश्चारणसिद्धसङ्घाः । वनौकसश्चापि नरेन्द्रसिंहं मनस्विनं तं परिवार्य तस्थुः ॥ २२ ॥ उस समय उन सत्यप्रतिज्ञ मनस्वी राजसिंह युधिष्ठिरको देखनेकी इच्छासे सहसा बहुत-से चारण, सिद्ध एवं वनवासी महर्षि आये और उन्हें घेरकर खड़े हो गये ॥ २२ ॥
स तत्र सिद्धानभिवाद्य सर्वान् प्रत्यर्चितो राजवद् देववच्च । विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्र्यैः कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ २३ ॥ वहाँ आये हुए समस्त सिद्धोंको प्रणाम करके धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर उनके द्वारा भी राजा तथा देवताके समान पूजित हुए एवं दोनों हाथ जोड़कर उन्होंने उन समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ वनके भीतर पदार्पण किया ॥ २३ ॥
स पुण्यशीलः पितृवन्महात्मा तपस्विभिर्धर्मपरैरुपैत्य । प्रत्यर्चितः पुष्पधरस्य मूले महाद्रुमस्योपविवेश राजा ॥ २४ ॥ उस वनमें रहनेवाले धर्मपरायण तपस्वियोंने उन पुण्यशील महात्मा राजाके पास जाकर उनका पिताकी भाँति सम्मान किया। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर फूलोंसे लदे हुए एक महान् वृक्षके नीचे उसकी जड़के समीप बैठे ॥ २४ ॥
भीमश्च कृष्णा च धनंजयश्च
यमौ च ते चानुचरा नरेन्द्रम्।
विमुच्य वाहानवशाश्च सर्वे
तत्रोपतस्थुर्भरतप्रबर्हाः॥ २५॥
तदनन्तर पराधीन-दशामें पड़े हुए भीम, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सेवकगण सवारी छोड़कर उतर गये। वे सभी भरतश्रेष्ठ वीर महाराज युधिष्ठिरके समीप जा बैठे॥ २५॥
लतावतानावनतः स पाण्डवै-
र्महाद्रुमः पञ्चभिरेव धन्विभिः।
बभौ निवासोपगतैर्महात्मभि-
र्महागिरिर्वारणयूथपैरिव॥ २६॥
जैसे महान् पर्वत यूथपति गजराजोंसे सुशोभित होता है, उसी प्रकार, लतासमूहसे झुका हुआ वह महान् वृक्ष वहाँ निवासके लिये आये हुए पाँच धनुर्धर महात्मा पाण्डवोंद्वारा शोभा पाने लगा॥ २६॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे चतुर्विंशोऽध्यायः ।। २४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 199)
पञ्चविंशोऽध्यायः
महर्षि मार्कण्डेयका पाण्डवोंको धर्मका आदेश देकर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
तत् काननं प्राप्य नरेन्द्रपुत्राः
सुखोचिता वासमुपेत्य कृच्छ्रम् ।
विजहुरिन्द्रप्रतिमाः शिवेषु
सरस्वतीशालवनेषु तेषु ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सुख भोगनेके योग्य राजकुमार पाण्डव इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे वनवासके संकटमें पड़कर द्वैतवनमें प्रवेश करके वहाँ सरस्वतीतटवर्ती सुखद शालवनोंमें विहार करने लगे ॥ १ ॥
यतींश्च राजा स मुनींश्च सर्वां-
स्तस्मिन् वने मूलफलैरुदग्रैः ।
द्विजातिमुख्यानृषभः कुरूणां
संतर्पयामास महानुभावः ॥ २ ॥
इष्टीश्च पित्र्याणि तथा क्रियाश्च
महावने वसतां पाण्डवानाम् ।
पुरोहितस्तत्र समृद्धतेजा-
श्चकार धौम्यः पितृवन्नृपाणाम् ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ महानुभाव राजा युधिष्ठिरने उस वनमें रहनेवाले सम्पूर्ण यतियों, मुनियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उत्तम फल-मूलोंके द्वारा तृप्त किया। अत्यन्त तेजस्वी पुरोहित धौम्य पिताकी भाँति उस महावनमें रहनेवाले राजकुमार पाण्डवोंके यज्ञ-याग, पितृ-श्राद्ध तथा अन्य सत्कर्म करते-कराते रहते थे ॥ २-३ ॥
अपेत्य राष्ट्राद् वसतां तु तेषा-
मृषिः पुराणोऽतिथिराजगाम ।
तमाश्रमं तीव्रसमृद्धतेजा
मार्कण्डेयः श्रीमतां पाण्डवानाम् ॥ ४ ॥
राज्यसे दूर होकर वनमें निवास करनेवाले श्रीमान् पाण्डवोंके उस आश्रमपर उद्दीप्त तेजस्वी पुरातन महर्षि मार्कण्डेयजी अतिथिके रूपमें आये ॥ ४ ॥
तमागतं ज्वलितहुताशनप्रभं
महामनाः कुरुवृषभो युधिष्ठिरः । अपूजयत् सुरऋषिमानवार्चितं महामुनिं ह्यनुपमसत्त्ववीर्यवान् ॥ ५ ॥ उनकी अंग-कान्ति प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रही थी। देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंद्वारा पूजित महामुनि मार्कण्डेयको आया देख अनुपम धैर्य और पराक्रमसे सम्पन्न महामनस्वी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उनकी यथावत् पूजा की ॥ ५ ॥
स सर्वविद् द्रौपदीं वीक्ष्य कृष्णां युधिष्ठिरं भीमसेनार्जुनौ च । संस्मृत्य रामं मनसा महात्मा तपस्विमध्येऽस्मयतामितौजाः ॥ ६ ॥ अमित तेजस्वी तथा सर्वज्ञ महात्मा मार्कण्डेयजी द्रुपदकुमारी कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन (और नकुल-सहदेव)-को देखकर मन-ही-मन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके तपस्वियोंके बीचमें मुसकराने लगे ॥ ६ ॥
तं धर्मराजो विमना इवाब्रवीत् सर्वे ह्रिया सन्ति तपस्विनोऽमी । भवानिदं किं स्मयतीव हृष्ट- स्तपस्विनां पश्यतां मामुदीक्ष्य ॥ ७ ॥ तब धर्मराज युधिष्ठिरने उदासीन-से होकर पूछा—‘मुने! ये सब तपस्वी तो मेरी अवस्था देखकर कुछ संकुचित-से हो रहे हैं, परंतु क्या कारण है कि आप इन सब महात्माओंके सामने मेरी ओर देखकर प्रसन्नतापूर्वक यों मुसकराते-से दिखायी देते हैं?’ ॥ ७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
न तात हृष्यामि न च स्मयामि प्रहर्षजो मां भजते न दर्पः । तवापदं त्वद्य समीक्ष्य रामं सत्यव्रतं दाशरथिं स्मरामि ॥ ८ ॥ **मार्कण्डेयजी बोले—**तात! न तो मैं हर्षित होता हूँ और न मुसकराता ही हूँ। हर्षजनित अभिमान कभी मेरा स्पर्श नहीं कर सकता। आज तुम्हारी यह विपत्ति देखकर मुझे सत्यप्रतिज्ञ दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण हो आया ॥ ८ ॥
स चापि राजा सह लक्ष्मणेन वने निवासं पितुरेव शासनात् । धन्वी चरन् पार्थ मयैव दृष्टो
गिरेः पुरा ऋष्यमूकस्य सानौ ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालकी बात है राजा रामचन्द्रजी भी अपने पिताकी आज्ञासे ही केवल धनुष हाथमें लिये लक्ष्मणके साथ वनमें निवास एवं भ्रमण करते थे। उस समय ऋष्यमूकपर्वतके शिखरपर मैंने ही उनका भी दर्शन किया था ॥ ९ ॥ सहस्रनेत्रप्रतिमो महात्मा यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता । पितुर्निदेशादनघः स्वधर्मं वासं वने दाशरथिश्चकार ॥ १० ॥ दशरथनन्दन श्रीराम सर्वथा निष्पाप थे। इन्द्र उनके दूसरे स्वरूप थे। वे यमराजके भी नियन्ता और नमुचि-जैसे दानवोंके नाशक थे, तो भी उन महात्माने पिताकी आज्ञासे अपना धर्म समझकर वनमें निवास किया ॥ १० ॥ स चापि शक्रस्य समप्रभावो महानुभावः समरेष्वजेयः । विहाय भोगानचरद् वनेषु नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ ११ ॥ जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनका अनुभव महान् था तथा जो युद्धमें सर्वदा अजेय थे, उन्होंने भी सम्पूर्ण भोगोंका परित्याग करके वनमें निवास किया था। इसलिये अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥ भूपाश्च नाभागभगीरथादयो महीमिमां सागरान्तां विजित्य । सत्येन तेऽप्यजयंस्तात लोकान् नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १२ ॥ नाभाग और भगीरथ आदि राजाओंने भी समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको जीतकर सत्यके द्वारा उत्तम लोकोंपर विजय पायी। इसलिये तात! अपनेको बलका स्वामी मानकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ अलर्कमाहुर्नरवर्य सन्तं सत्यव्रतं काशिकरूषराजम् । विहाय राज्यानि वसूनि चैव नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १३ ॥ नरश्रेष्ठ! काशी और करूषदेशके राजा अलर्कको सत्यप्रतिज्ञ संत बताया गया है। उन्होंने राज्य और धन त्यागकर धर्मका आश्रय लिया है। अतः अपनेको अधिक शक्तिशाली समझकर अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ धात्रा विधिर्यो विहितः पुराणे-
स्तं पूजयन्तो नरवर्य सन्तः । सप्तर्षयः पार्थ दिवि प्रभान्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १४ ॥ मनुष्योंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! विधाताने पुरातन वेदवाक्योंद्वारा जो अग्निहोत्र आदि कर्मोंका विधान किया है, उसका समादर करनेके कारण ही साधु सप्तर्षिगण देवलोकमें प्रकाशित हो रहे हैं। अतः अपनेको शक्तिशाली मानकर कभी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥
महाबलान् पर्वतकूटमात्रान् विषाणिनः पश्य गजान् नरेन्द्र । स्थितान् निदेशे नरवर्य धातु- र्नैशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १५ ॥ कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! पर्वतशिखरके समान ऊँचे और बड़े-बड़े दाँतोंवाले इन महाबली गजराजोंकी ओर तो देखो। ये भी विधाताके आदेशका पालन करनेमें लगे हैं। इसलिये मैं शक्तिका स्वामी हूँ ऐसा समझकर कभी अधर्माचरण न करे ॥ १५ ॥
सर्वाणि भूतानि नरेन्द्र पश्य तथा यथावद् विहितं विधात्रा । स्वयोनितः कर्म सदा चरन्ति नेशे बलस्येति चरेदधर्मम् ॥ १६ ॥ नरेन्द्र! देखो, ये समस्त प्राणी विधाताके विधानके अनुसार अपनी योनिके अनुरूप सदा कार्य करते रहते हैं, अतः अपनेको बलका स्वामी समझकर अधर्म न करे ॥ १६ ॥
सत्येन धर्मेण यथार्हवृत्त्या ह्रिया तथा सर्वभूतान्यतीत्य । यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! तुम अपने सत्य, धर्म, यथायोग्य बर्ताव तथा लज्जा आदि सद्गुणोंके कारण समस्त प्राणियोंसे ऊँचे उठे हुए हो। तुम्हारा यश और तेज अग्नि तथा सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १७ ॥
यथाप्रतिज्ञं च महानुभाव कृच्छ्रं वने वासमिमं निरुष्य । ततः श्रियं तेजसा तेन दीप्ता- मादास्यसे पार्थिव कौरवेभ्यः ॥ १८ ॥ महानुभाव नरेश! तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार इस कष्टसाध्य वनवासकी अवधि पूरी करके कौरवोंके हाथसे अपनी तेजस्विनी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लोगे ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
तमेवमुक्त्वा वचनं महर्षि- स्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः । आमन्त्र्य धौम्यं सहितांश्च पार्था- स्ततः प्रतस्थे दिशमुत्तरां सः ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तपस्वी महात्माओंके बीचमें अपने सुहृदोंके साथ बैठे हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे पूर्वोक्त बातें कहकर महर्षि मार्कण्डेय धौम्य एवं समस्त पाण्डवोंसे विदा ले उत्तर दिशाकी ओर चल दिये ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 204)
षड्विंशोऽध्यायः
दल्भपुत्र बकका युधिष्ठिरको ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाना
वैशम्पायन उवाच
वसत्सु वै द्वैतवने पाण्डवेषु महात्मसु ।
अनुकीर्णं महारण्यं ब्राह्मणैः समपद्यत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! द्वैतवनमें जब महात्मा पाण्डव निवास करने लगे, उस समय वह विशाल वन ब्राह्मणोंसे भर गया ॥ १ ॥
ईर्यमाणेण सततं ब्रह्मघोषेण सर्वशः ।
ब्रह्मलोकसमं पुण्यमासीद् द्वैतवनं सरः ॥ २ ॥
सरोवरसहित द्वैतवन सदा और सब ओर उच्चारित होनेवाले वेदमन्त्रोंके घोषसे ब्रह्मलोकके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
यजुषामृचां साम्नां च गद्यानां चैव सर्वशः ।
आसीदुच्चार्यमाणानां निःस्वनो हृदयङ्गमः ॥ ३ ॥
यजुर्वेद, ऋग्वेद और सामवेद तथा गद्य-भागके उच्चारणसे जो ध्वनि होती थी, वह हृदयको प्रिय जान पड़ती थी ॥ ३ ॥
ज्याघोषश्चैव पार्थानां ब्रह्मघोषश्च धीमताम् ।
संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं भूय एव व्यरोचत ॥ ४ ॥
कुन्तीपुत्रोंके धनुषकी प्रत्यंचाका टंकार-शब्द और बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके वेदमन्त्रोंका घोष दोनों मिलकर ऐसे प्रतीत होते थे, मानो ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्वका सुन्दर संयोग हो रहा था ॥ ४ ॥
अथाब्रवीद् बको दाल्भ्यो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
संध्यां कौन्तेयमासीनमृषिभिः परिवारितम् ॥ ५ ॥
एक दिन कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिर ऋषियोंसे घिरे हुए संध्योपासना कर रहे थे। उस समय दल्भके पुत्र बक नामक महर्षिने उनसे कहा— ॥ ५ ॥
पश्य द्वैतवने पार्थ ब्राह्मणानां तपस्विनाम् ।
होमवेलां कुरुश्रेष्ठ सम्प्रज्वलितपावकाम् ॥ ६ ॥
'कुरुश्रेष्ठ कुन्तीकुमार! देखो, द्वैतवनमें तपस्वी ब्राह्मणोंकी होमवेलाका कैसा सुन्दर दृश्य है। सब ओर वेदियोंपर अग्नि प्रज्वलित हो रही है ॥ ६ ॥
चरन्ति धर्मं पुण्येऽस्मिंस्त्वया गुप्ता धृतव्रताः ।
भृगवोऽङ्गिरसश्चैव वासिष्ठाः काश्यपैः सह ॥ ७ ॥
आगस्त्याश्च महाभागा आत्रेयाश्चोत्तमव्रताः ।
सर्वस्य जगतः श्रेष्ठा ब्राह्मणाः संगतास्त्वया ॥ ८ ॥ ‘आपके द्वारा सुरक्षित हो व्रत धारण करनेवाले ब्राह्मण इस पुण्य वनमें धर्मका अनुष्ठान कर रहे हैं। भार्गव, अंगिरस, वासिष्ठ, काश्यप, महान् सौभाग्यशाली अगस्त्य वंशी तथा श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले आत्रेय आदि सम्पूर्ण जगत्के श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ आकर तुमसे मिले हैं॥ ७-८॥
इदं तु वचनं पार्थ शृणुष्व गदतो मम । भ्रातृभिः सह कौन्तेय यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ॥ ९ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! भाइयोंसहित तुमसे मैं जो एक बात कह रहा हूँ, इसे ध्यान देकर सुनो॥ ९॥
ब्रह्म क्षत्रेण संसृष्टं क्षत्रं च ब्रह्मणा सह । उदीर्णे दहतः शत्रून् वनानीवाग्निमारुतौ ॥ १० ॥ ‘जब ब्राह्मण क्षत्रियसे और क्षत्रिय ब्राह्मणसे मिल जाय तो दोनों प्रचण्ड शक्तिशाली होकर उसी प्रकार अपने शत्रुओंको भस्म कर देते हैं, जैसे अग्नि और वायु मिलकर सारे वनको जला देते हैं॥ १०॥
नाब्राह्मणस्तात चिरं बुभूषे- दिच्छन्निमं लोकममुं च जेतुम् । विनीतधर्मार्थमपेतमोहं लब्ध्वा द्विजं नुदति नृपः सपत्नान् ॥ ११ ॥ ‘तात! इहलोक और परलोकपर विजय पानेकी इच्छा रखनेवाला राजा किसी ब्राह्मणको साथ लिये बिना अधिक कालतक न रहे। जिसे धर्म और अर्थकी शिक्षा मिली हो तथा जिसका मोह दूर हो गया हो, ऐसे ब्राह्मणको पाकर राजा अपने शत्रुओंका नाश कर देता है॥ ११॥
चरन् नैःश्रेयसं धर्मं प्रजापालनकारितम् । नाध्यगच्छद् बलिलोंके तीर्थमन्यत्र वै द्विजात् ॥ १२ ॥ ‘राजा बलिको प्रजापालनजनित कल्याणकारी धर्मका आचरण करनेके लिये ब्राह्मणका आश्रय लेनेके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं जान पड़ा था॥ १२॥
अनूनमासीदसुरस्य कामै- र्वैरोचनेः श्रीरपि चाक्षयाऽऽसीत् । लब्ध्वा महीं ब्राह्मणसम्प्रयोगात् तेष्वाचरन् दुष्टमथो व्यनश्यत् ॥ १३ ॥ ‘ब्राह्मणके सहयोगसे पृथ्वीका राज्य पाकर विरोचन-पुत्र बलि नामक असुरका जीवन सम्पूर्ण आवश्यक कामोपभोगकी सामग्रीसे सम्पन्न हो गया और अक्षय राज्यलक्ष्मी भी
प्राप्त हो गयी। परंतु वह उन ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करनेपर नष्ट हो गया—उसका राज्यलक्ष्मीसे वियोग हो गया* ॥ १३ ॥ नाब्राह्मणं भूमिरियं सभूति- वर्णं द्वितीयं भजते चिराय । समुद्रनेमिर्नमते तु तस्मै यं ब्राह्मणः शास्ति नयैर्विनीतम् ॥ १४ ॥ ‘जिसे ब्राह्मणका सहयोग नहीं प्राप्त है, ऐसे क्षत्रियके पास यह ऐश्वर्यपूर्ण भूमि दीर्घ कालतक नहीं रहती। जिस नीतिज्ञ राजाको श्रेष्ठ ब्राह्मणका उपदेश प्राप्त है, उसके सामने समुद्रपर्यन्त पृथिवी नतमस्तक होती है ॥ १४ ॥ कुञ्जरस्येव संग्रामे परिगृह्याङ्कुशग्रहम् । ब्राह्मणैर्विप्रहीणस्य क्षत्रस्य क्षीयते बलम् ॥ १५ ॥ ‘जैसे संग्राममें हाथीसे महावतको अलग कर देनेपर उसकी सारी शक्ति व्यर्थ हो जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मणरहित क्षत्रियका सारा बल क्षीण हो जाता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्रमप्रतिमं बलम् । तौ यदा चरतः सार्धं तदा लोकः प्रसीदति ॥ १६ ॥ ‘ब्राह्मणोंके पास अनुपम दृष्टि (विचारशक्ति) होती है और क्षत्रियके पास अनुपम बल होता है। ये दोनों जब साथ-साथ कार्य करते हैं, तब सारा जगत् सुखी होता है ॥ १६ ॥ यथा हि सुमहानग्निः कक्षं दहति सानिलः । तथा दहति राजन्यो ब्राह्मणेन समं रिपुम् ॥ १७ ॥ ‘जैसे प्रचण्ड अग्नि वायुका सहारा पाकर सूखे जंगलको जला डालती है, उसी प्रकार ब्राह्मणकी सहायतासे राजा अपने शत्रुको भस्म कर देता है ॥ १७ ॥ ब्राह्मणेष्वेव मेधावी बुद्धिपर्येषणं चरेत् । अलब्धस्य च लाभाय लब्धस्य परिवृद्धये ॥ १८ ॥ ‘बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी वृद्धिके लिये ब्राह्मणोंसे बुद्धि ग्रहण करे ॥ १८ ॥ अलब्धलाभाय च लब्धवृद्धये यथार्हतीर्थप्रतिपादनाय । यशस्विनं वेदविदं विपश्चितं बहुश्रुतं ब्राह्मणमेव वासय ॥ १९ ॥ ‘राजन्! अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी वृद्धिके लिये यथायोग्य उपाय बतानेके निमित्त तुम अपने यहाँ यशस्वी, बहुश्रुत एवं वेदज्ञ विद्वान् ब्राह्मणको बसाओ ॥ १९ ॥ ब्राह्मणेषूत्तमा वृत्तिस्तव नित्यं युधिष्ठिर । तेन ते सर्वलोकेषु दीप्यते प्रथितं यशः ॥ २० ॥
‘युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारे हृदयमें सदा उत्तम भाव है, इसीलिये सब लोकोंमें तुम्हारा यश विख्यात एवं प्रकाशित है’ ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे बकं दाल्भ्यमपूजयन् ।
युधिष्ठिरे स्तूयमाने भूयः सुमनसोऽभवन् ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर युधिष्ठिरकी बड़ाई करनेपर उन सब ब्राह्मणोंने बकका आदर-सत्कार किया और उन सब ब्राह्मणोंका चित्त प्रसन्न हो गया ।। २१ ।।
द्वैपायनो नारदश्च जामदग्न्यः पृथुश्रवाः ।
इन्द्रद्युम्नो भालुकिश्च कृतचेताः सहस्रपात् ॥ २२ ॥
कर्णश्रवाश्च मुञ्जश्च लवणाश्वश्च काश्यपः ।
हारीतः स्थूणकर्णश्च अग्निवेश्योऽथ शौनकः ॥ २३ ॥
कृतवाक् च सुवाक् चैव बृहदश्वो विभावसुः ।
ऊर्ध्व रेता वृषामित्रः सुहोत्रो होत्रवाहनः ॥ २४ ॥
एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।
अजातशत्रुमानर्चुः पुरंदरमिवर्षयः ॥ २५ ॥
द्वैपायन व्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इन्द्रद्युम्न, भालुकि, कृतचेता, सहस्रपात्, कर्णश्रवा, मुंज, लवणाश्व, काश्यप, हारीत, स्थूणकर्ण, अग्निवेश्य, शौनक, कृतवाक्, सुवाक्, बृहदश्व, विभावसु, ऊर्ध्वरेता, वृषामित्र, सुहोत्र तथा होत्रवाहन—ये सब ब्रह्मर्षि तथा राजर्षिगण और दूसरे कठोर व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से ब्राह्मण अजातशत्रु युधिष्ठिरका उसी प्रकार आदर करते थे, जैसे महर्षि लोग देवराज इन्द्रका ।। २२—२५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्वैतवनप्रवेशे षड्िंशोऽध्यायः ।। २६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वमें अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्वैतवनप्रवेशविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६ ।।
* बलिके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ दुर्व्यवहार करनेपर उसका राज्यलक्ष्मीसे वियोग होनेका प्रसंग शान्तिपर्वके २२५ वें अध्यायमें आता है।
उपविष्टाः कथाश्चक्रुर्दुःखशोकपरायणाः ॥ १ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
द्रौपदीका युधिष्ठिरसे उनके शत्रुविषयक क्रोधको उभाड़नेके लिये संतापपूर्ण वचन
वैशम्पायन उवाच
ततो वनगताः पार्थाः सायाह्ने सह कृष्णया ।
उपविष्टाः कथाश्चक्रुर्दुःखशोकपरायणाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर वनमें गये हुए पाण्डव एक दिन सायंकालमें द्रौपदीके साथ बैठकर दुःख और शोकमें मग्न हो कुछ बातचीत करने लगे ॥ १ ॥
प्रिया च दर्शनीया च पण्डिता च पतिव्रता ।
अथ कृष्णा धर्मराजमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पतिव्रता द्रौपदी पाण्डवोंकी प्रिया, दर्शनीया और विदुषी थी। उसने धर्मराजसे इस प्रकार कहा ॥ २ ॥
द्रौपद्युवाच
न नूनं तस्य पापस्य दुःखमस्मासु किंचन ।
विद्यते धार्तराष्ट्रस्य नृशंसस्य दुरात्मनः ॥ ३ ॥
द्रौपदी बोली—राजन्! मैं समझती हूँ, उस क्रूर स्वभाववाले दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्र पापी दुर्योधनके मनमें हमलोगोंके लिये तनिक भी दुःख नहीं हुआ होगा ॥ ३ ॥
यस्त्वां राजन् मया सार्धमजिनैः प्रतिवासितम् ।
वनं प्रस्थाप्य दुष्टात्मा नान्वतप्यत दुर्मतिः ॥ ४ ॥
महाराज! उस नीच बुद्धिवाले दुष्टात्माने आपको भी मृगछाला पहनाकर मेरे साथ वनमें भेज दिया; किंतु इसके लिये उसे थोड़ा भी पश्चात्ताप नहीं हुआ ॥ ४ ॥
आयसं हृदयं नूनं तस्य दुष्कृतकर्मणः ।
यस्त्वां धर्मपरं श्रेष्ठं रूक्षाण्यश्रावयत् तदा ॥ ५ ॥
अवश्य ही उस कुकर्मीका हृदय लोहेका बना है, क्योंकि उसने आप-जैसे धर्मपरायण श्रेष्ठ पुरुषको भी उस समय कटु वचन सुनाये थे ॥ ५ ॥
सुखोचितमदुःखार्हं दुरात्मा ससुहृद्गणः ।
ईदृशं दुःखमानीय मोदते पापपूरुषः ॥ ६ ॥
आप सुख भोगनेके योग्य हैं। दुःखके योग्य कदापि नहीं हैं, तो भी आपको ऐसे दुःखमें डालकर वह पापाचारी दुरात्मा अपने मित्रोंके साथ आनन्दित हो रहा है ॥ ६ ॥
चतुर्णामेव पापानामस्रं न पतितं तदा । त्वयि भारत निष्क्रान्ते वनायाजिनवाससि ॥ ७ ॥ भारत! जब आप वल्कल-वस्त्र धारण करके वनमें जानेके लिये निकले, उस समय केवल चार ही पापात्माओंके नेत्रोंसे आँसू नहीं गिरा था ॥ ७ ॥
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुर्भ्रातुस्तस्य चोग्रस्य राजन् दुःशासनस्य च ॥ ८ ॥ दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि तथा उग्र स्वभाव-वाले दुष्ट भ्राता दुःशासन—इन्हींकी आँखोंमें आँसू नहीं थे ॥ ८ ॥
इतरेषां तु सर्वेषां कुरूणां कुरुसत्तम । दुःखेनाभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ ९ ॥ कुरुश्रेष्ठ! अन्य सभी कुरुवंशी दुःखमें डूबे हुए थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुवर्षा हो रही थी ॥ ९ ॥
इदं च शयनं दृष्ट्वा यच्चासीत् ते पुरातनम् । शोचामि त्वां महाराज दुःखानर्हं सुखोचितम् ॥ १० ॥ महाराज! आज आपकी यह शय्या देखकर मुझे पहलेकी राजोचित शय्याका स्मरण हो आता है और मैं आपके लिये शोकमें मग्न हो जाती हूँ; क्योंकि आप दुःखके अयोग्य और सुखके ही योग्य हैं ॥ १० ॥
दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूषितम् । दृष्ट्वा कुशवृषीं चेमां शोको मां प्रदहत्ययम् ॥ ११ ॥ सभाभवनमें जो रत्नजटित हाथीदाँतका सिंहासन है, उसका स्मरण करके जब मैं इस कुशकी चटाईको देखती हूँ, तब शोक मुझे दग्ध किये देता है ॥ ११ ॥
यदपश्यं सभायां त्वां राजभिः परिवारितम् । तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥ १२ ॥ राजन्! मैं इन्द्रप्रस्थकी सभामें आपको राजाओंसे घिरा हुआ देख चुकी हूँ, अतः आज वैसी अवस्थामें आपको न देखकर मेरे हृदयको क्या शान्ति मिल सकती है? ॥ १२ ॥
या त्वाहं चन्दनादिग्धमपश्यं सूर्यवर्चसम् । सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारत ॥ १३ ॥ भारत! जो पहले आपको चन्दनचर्चित एवं सूर्यके समान तेजस्वी देखती रही हूँ, वही मैं आपको कीचड़ एवं मैलसे मलिन देखकर मोहके कारण दुःखित हो रही हूँ ॥ १३ ॥
या त्वाहं कौशिकैर्वस्त्रैः शुभ्रैराच्छादितं पुरा । दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र सा त्वां पश्यामि चीरिणम् ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! जो मैं पहले आपको उज्ज्वल रेशमी वस्त्रोंसे आच्छादित देख चुकी हूँ, वही आज वल्कल-वस्त्र पहने देखती हूँ ॥ १४ ॥