भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

फिर उन्हें दोनों भुजाओंसे खींचकर हृदयसे लगाया और प्रसन्नचित्त हो वृषके चिह्नसे अंकितध्वजा धारण करनेवाले भगवान् रुद्रने पुनः कुन्तीकुमारको सान्त्वना देते हुए कहा॥ ८४॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महादेवजीकी स्तुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥

अध्याय (पृष्ठ 313)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् शंकरका अर्जुनको वरदान देकर अपने धामको प्रस्थान

देवदेव उवाच

नरस्त्वं पूर्वदेहे वै नारायणसहायवान् ।
बदर्यां तप्तवानुग्रं तपो वर्षायुतान् बहून् ॥ १ ॥
देवदेव महादेवजी बोले— अर्जुन! तुम पूर्व-शरीरमें 'नर' नामक सुप्रसिद्ध ऋषि थे। नारायण तुम्हारे सखा हैं। तुमने बदरिकाश्रममें अनेक सहस्र वर्षोंतक उग्र तपस्या की है ॥ १ ॥

त्वयि वा परमं तेजो विष्णौ वा पुरुषोत्तमे ।
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तेजसा धार्यते जगत् ॥ २ ॥
तुममें अथवा पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुमें उत्कृष्ट तेज है। तुम दोनों पुरुषरत्नोंने अपने तेजसे इस सम्पूर्ण जगत्‌को धारण कर रखा है ॥ २ ॥

शक्राभिषेके सुमहद्धनुर्जलदनिःस्वनम् ।
प्रगृह्य दानवाः शस्तास्त्वया कृष्णेन च प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! तुमने और श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिषेकके समय मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले महान् धनुषको हाथमें लेकर बहुत-से दानवोंका वध किया था ॥ ३ ॥

तदेतदेव गाण्डीवं तव पार्थ करोचितम् ।
मायामास्थाय यद् ग्रस्तं मया पुरुषसत्तम ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर पार्थ! तुम्हारे हाथमें रहनेयोग्य यही वह गाण्डीव धनुष है, जिसे मैंने मायाका आश्रय लेकर अपनेमें विलीन कर लिया था ॥ ४ ॥

तूणौ चाप्यक्षयौ भूयस्तव पार्थ यथोचितौ ।
भविष्यति शरीरं च नीरुजं कुरुनन्दन ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! और ये रहे तुम्हारे दोनों अक्षय तूणीर, जो सर्वथा तुम्हारे ही योग्य हैं। कुन्तीकुमार! तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, वह सब दूर होकर तुम नीरोग हो जाओगे ॥ ५ ॥

प्रीतिमानस्मि ते पार्थ भवान् सत्यपराक्रमः ।
गृहाण वरमस्मतः काङ्क्षितं पुरुषोत्तम ॥ ६ ॥
पार्थ! तुम्हारा पराक्रम यथार्थ है, इसलिये मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। पुरुषोत्तम! तुम मुझसे मनोवांछित वर ग्रहण करो ॥ ६ ॥

न त्वया पुरुषः कश्चित् पुमान् मर्त्येषु मानद ।
दिवि वा वर्तते क्षत्रं त्वत्प्रधानमरिंदम ॥ ७ ॥
मानद! मर्त्यलोक अथवा स्वर्गलोकमें भी कोई पुरुष तुम्हारे समान नहीं है। शत्रुदमन! क्षत्रिय-जातिमें तुम्हीं सबसे श्रेष्ठ हो ॥ ७ ॥

अर्जुन उवाच

भगवन् ददासि चेन्मह्यं कामं प्रीत्या वृषध्वज ।
कामये दिव्यमस्त्रं तद् घोरं पाशुपतं प्रभो ॥ ८ ॥
अर्जुन बोले— भगवन्! वृषध्वज! यदि आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे इच्छानुसार वर देते हैं तो प्रभो! मैं उस भयंकर दिव्यास्त्र पाशुपतको प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
यत् तद् ब्रह्मशिरो नाम रौद्रं भीमपराक्रमम् ।
युगान्ते दारुणे प्राप्ते कृत्स्नं संहरते जगत् ॥ ९ ॥
जिसका नाम ब्रह्मशिर है, आप भगवान् रुद्र ही जिसके देवता हैं, जो भयानक पराक्रम प्रकट करनेवाला तथा दारुण प्रलयकालमें सम्पूर्ण जगत्‌का संहारक है ॥ ९ ॥
कर्णभीष्मकृपद्रोणैर्भविता तु महाहवः ।
त्वत्प्रसादान्महादेव जयेयं तान् यथा युधि ॥ १० ॥
महादेव! कर्ण, भीष्म, कृप, द्रोणाचार्य आदिके साथ मेरा महान् युद्ध होनेवाला है, उस युद्धमें मैं आपकी कृपासे उन सबपर विजय पा सकूँ, इसीके लिये दिव्यास्त्र चाहता हूँ ॥ १० ॥
दहेयं येन संग्रामे दानवान् राक्षसांस्तथा ।
भूतानि च पिशाचांश्च गन्धर्वानथ पन्नगान् ॥ ११ ॥
यस्मिञ्छूलसहस्राणि गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ।
शराश्चाशीविषाकाराः सम्भवन्त्यनुमन्त्रिते ॥ १२ ॥
मुझे वह अस्त्र प्रदान कीजिये, जिससे संग्राममें दानवों, राक्षसों, भूतों, पिशाचों, गन्धर्वों तथा नागोंको भस्म कर सकूँ। जिस अस्त्रके अभिमन्त्रित करते ही सहस्रों शूल, देखनेमें भयंकर गदाएँ और विषैले सर्पोंके समान बाण प्रकट हों ॥ ११-१२ ॥
युध्येयं येन भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।
सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ॥ १३ ॥
उस अस्त्रको पाकर मैं भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य तथा सदा कटु भाषण करनेवाले सूतपुत्र कर्णके साथ भी युद्धमें लड़ सकूँ ॥ १३ ॥
एष मे प्रथमः कामो भगवन् भगनेत्रहन् ।
त्वत्प्रसादाद् विनिर्वृत्तः समर्थः स्यामहं यथा ॥ १४ ॥

भगदेवताकी आँखें नष्ट करनेवाले भगवन्! आपके समक्ष यह मेरा सबसे पहला मनोरथ है, जो आपहीके कृपाप्रसादसे पूर्ण हो सकता है। आप ऐसा करें, जिससे मैं सर्वथा शत्रुओंको परास्त करनेमें समर्थ हो सकूँ॥ १४॥

भव उवाच

ददामि तेऽस्त्रं दयितमहं पाशुपतं विभो ।
समर्थो धारणे मोक्षे संहारे चासि पाण्डव ॥ १५ ॥
**महादेवजीने कहा—**पराक्रमशाली पाण्डुकुमार! मैं अपना परम प्रिय पाशुपतास्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ। तुम इसके धारण, प्रयोग और उपसंहारमें समर्थ हो॥ १५॥
नैतद् वेद महेन्द्रोऽपि न यमो न च यक्षराट् ।
वरुणोऽप्यथवा वायुः कुतो वेत्स्यन्ति मानवाः ॥ १६ ॥
इसे देवराज इन्द्र, यम, यक्षराज कुबेर, वरुण अथवा वायुदेवता भी नहीं जानते। फिर साधारण मानव तो जान ही कैसे सकेंगे?॥ १६॥
न त्वेतत् सहसा पार्थ मोक्तव्यं पुरुषे क्वचित् ।
जगद् विनाशयेत् सर्वमल्पतेजसि पातितम् ॥ १७ ॥
परंतु कुन्तीकुमार! तुम सहसा किसी पुरुषपर इसका प्रयोग न करना। यदि किसी अल्पशक्ति योद्धापर इसका प्रयोग किया गया तो यह सम्पूर्ण जगत्‌का नाश कर डालेगा॥ १७॥
अवध्यो नाम नास्त्यत्र त्रैलोक्ये सचराचरे ।
मनसा चक्षुषा वाचा धनुषा च निपातयेत् ॥ १८ ॥
चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो इस अस्त्रद्वारा मारा न जा सके। इसका प्रयोग करनेवाला पुरुष अपने मानसिक संकल्पसे, दृष्टिसे, वाणीसे तथा धनुष-बाणद्वारा भी शत्रुओंको नष्ट कर सकता है॥ १८॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा त्वरितः पार्थः शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
उपसंगम्य विश्वेशमधीष्वेत्यथ सोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुन तुरंत ही पवित्र एवं एकाग्रचित्त हो शिष्यभावसे भगवान् विश्वेश्वरकी शरण गये और बोले—'भगवन्! मुझे इस पाशुपतास्त्रका उपदेश कीजिये'॥ १९॥
ततस्त्वध्यापयामास सरहस्यनिवर्तनम् ।
तदस्त्रं पाण्डवश्रेष्ठं मूर्तिमन्तमिवान्तकम् ॥ २० ॥
उपतस्थे च तत् पार्थं यथा त्र्यक्षमुमापतिम् ।
प्रतिजग्राह तच्चापि प्रीतिमानर्जुनस्तदा ॥ २१ ॥

तब भगवान् शिवने रहस्य और उपसंहारसहित पाशुपतास्त्रका उन्हें उपदेश दिया। उस समय वह अस्त्र जैसे पहले त्रिनेत्रधारी उमापति शिवकी सेवामें उपस्थित हुआ था, उसी प्रकार मूर्तिमान् यमराजतुल्य पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनके पास आ गया। तब अर्जुनने बहुत प्रसन्न होकर उसे ग्रहण किया ॥ २०-२१ ॥

ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा ।
ससागरवनोद्देशा सग्रामनगराकरा ॥ २२ ॥
अर्जुनके पाशुपतास्त्र ग्रहण करते ही पर्वत, वन, वृक्ष, समुद्र, वनस्थली, ग्राम, नगर तथा आकरों (खानों) सहित सारी पृथ्वी काँप उठी ॥ २२ ॥

शङ्खदुन्दुभिघोषाश्च भेरीणां च सहस्रशः ।
तस्मिन् मुहूर्ते सम्प्राप्ते निर्घातश्च महानभूत् ॥ २३ ॥
उस शुभ मुहूर्त्तके आते ही शंख और दुन्दुभियोंके शब्द होने लगे। सहस्रों भेरियाँ बज उठीं। आकाशमें वायुके टकरानेका महान् शब्द होने लगा ॥ २३ ॥

अथास्त्रं जाज्वलद् घोरं पाण्डवस्यामितौजसः ।
मूर्तिमद् वै स्थितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ॥ २४ ॥
तदनन्तर वह भयंकर अस्त्र मूर्तिमान् हो अग्निके समान प्रज्वलित तेजस्वीरूपसे अमित पराक्रमी पाण्डुनन्दन अर्जुनके पार्श्वभागमें खड़ा हो गया। यह बात देवताओं और दानवोंने प्रत्यक्ष देखी ॥ २४ ॥

स्पृष्टस्य त्र्यम्बकेनाथ फाल्गुनस्यामितौजसः ।
यत् किंचिदशुभं देहे तत् सर्वं नाशमीयिवत् ॥ २५ ॥
भगवान् शंकरके स्पर्श करनेसे अमित तेजस्वी अर्जुनके शरीरमें जो कुछ भी अशुभ था, वह नष्ट हो गया ॥ २५ ॥

स्वर्गं गच्छेत्यनुज्ञातस्त्र्यम्बकेण तदार्जुनः ।
प्रणम्य शिरसा राजन् प्राञ्जलिर्देवमैक्षत ॥ २६ ॥
उस समय भगवान् त्रिलोचनने अर्जुनको यह आज्ञा दी कि 'तुम स्वर्गलोकको जाओ।' राजन्! तब अर्जुनने भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी ओर देखने लगे ॥ २६ ॥

ततः प्रभुस्त्रिदिवनिवासिनां वशी
महामतिर्गिरिश उमापतिः शिवः ।
धनुर्महद् दितिजपिशाचसूदनं
ददौ भवः पुरुषवराय गाण्डिवम् ॥ २७ ॥
तत्पश्चात् देवताओंके स्वामी, जितेन्द्रिय एवं परम बुद्धिमान् कैलासवासी उमावल्लभ भगवान् शिवने पुरुषप्रवर अर्जुनको वह महान् गाण्डीवधनुष दे दिया, जो दैत्यों और पिशाचोंका संहार करनेवाला था ॥ २७ ॥

ततः शुभं गिरिवरमीश्वरस्तदा सहोमया सिततटसानुकन्दरम् । विहाय तं पतगमहर्षिसेवितं जगाम खं पुरुषवरस्य पश्यतः ॥ २८ ॥

जिसके तट, शिखर और कन्दराएँ हिमाच्छादित होनेके कारण श्वेत दिखायी देती हैं, पक्षी और महर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, उस मंगलमय गिरिश्रेष्ठ इन्द्रकीलको छोड़कर भगवान् शंकर भगवती उमादेवीके साथ अर्जुनके देखते-देखते आकाशमार्गसे चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि शिवप्रस्थाने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें शिवप्रस्थानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥

अध्याय (पृष्ठ 318)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकचत्वारिंशोऽध्यायः

अर्जुनके पास दिक्पालोंका आगमन एवं उन्हें दिव्यास्त्र-प्रदान तथा इन्द्रका उन्हें स्वर्गमें चलनेका आदेश देना

वैशम्पायन उवाच

तस्य सम्पश्यतस्त्वेव पिनाकी वृषभध्वजः ।
जगामादर्शनं भानुर्लोकस्येवास्तमीयिवान् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनके देखते-देखते पिनाकधारी भगवान् वृषभध्वज अदृश्य हो गये, मानो भुवनभास्कर भगवान् सूर्य अस्त हो गये हों ॥ १ ॥

ततोऽर्जुनः परं चक्रे विस्मयं परवीरहा ।
मया साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ॥ २ ॥
भारत! तदनन्तर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको यह सोचकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आज मुझे महादेवजीका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ २ ॥

धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मया त्र्यम्बको हरः ।
पिनाकी वरदो रूपी दृष्टः स्पृष्टश्च पाणिना ॥ ३ ॥
मैं धन्य हूँ! भगवान्‌का मुझपर बड़ा अनुग्रह है कि त्रिनेत्रधारी, सर्वपापहारी एवं अभीष्ट वर देनेवाले पिनाक-पाणि भगवान् शंकरने मूर्तिमान् होकर मुझे दर्शन दिया और अपने करकमलोंसे मेरे अंगोंका स्पर्श किया ॥ ३ ॥

कृतार्थं चावगच्छामि परमात्मानमाहवे ।
शत्रूंश्च विजितान् सर्वान् निर्वृत्तं च प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
आज मैं अपने-आपको परम कृतार्थ मानता हूँ, साथ ही यह विश्वास करता हूँ कि महासमरमें अपने समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त करूँगा। अब मेरा अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध हो गया ॥ ४ ॥

इत्येवं चिन्तयानस्य पार्थस्यामिततेजसः ।
ततो वैडूर्यवर्णाभो भासयन् सर्वतो दिशः ।
यादोगणवृतः श्रीमानाजगाम जलेश्वरः ॥ ५ ॥
इस प्रकार चिन्तन करते हुए अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनके पास जलके स्वामी श्रीमान् वरुणदेव जल-जन्तुओंसे घिरे हुए आ पहुँचे। उनकी अंगकान्ति वैदूर्यमणिके समान थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे ॥ ५ ॥

नागैर्नदैर्नदीभिश्च दैत्यैः साध्यैश्च दैवतैः ।
वरुणो यादसां भर्ता वशी तं देशमागमत् ॥ ६ ॥

नागों, नद और नदियोंके देवताओं, दैत्यों तथा साध्यदेवताओंके साथ जल-जन्तुओंके स्वामी जितेन्द्रिय वरुणदेवने उस स्थानको अपने शुभागमनसे सुशोभित किया ।। ६ ।।
अथ जाम्बूनदवपुर्विमानेन महार्षिषा ।
कुबेरः समनुप्राप्तो यक्षैरनुगतः प्रभुः ॥ ७ ॥
तदनन्तर स्वर्णके समान शरीरवाले भगवान् कुबेर महातेजस्वी विमानद्वारा वहाँ आये। उनके साथ बहुत-से यक्ष भी थे ।। ७ ।।
विद्योतयन्निवाकाशमद्भुतोपमदर्शनः ।
धनानामीश्वरः श्रीमानर्जुनं द्रष्टुमागतः ॥ ८ ॥
वे अपने तेजसे आकाशमण्डलको प्रकाशित-से कर रहे थे। उनका दर्शन अद्भुत एवं अनुपम था। परम सुन्दर श्रीमान् धनाध्यक्ष कुबेर अर्जुनको देखनेके लिये वहाँ पधारे थे ।। ८ ।।
तथा लोकान्तकृच्छ्रीमान् यमः साक्षात् प्रतापवान् ।
मर्त्यमूर्तिधरैः सार्धं पितृभिर्लोकभावनैः ॥ ९ ॥
इसी प्रकार समस्त जगत्का अन्त करनेवाले श्रीमान् प्रतापी यमराजने प्रत्यक्षरूपमें वहाँ दर्शन दिया। उनके साथ मानव-शरीरधारी विश्वभावन पितृगण भी थे ।। ९ ।।
दण्डपाणिरचिन्त्यात्मा सर्वभूतविनाशकृत् ।
वैवस्वतो धर्मराजो विमानेनावभासयन् ॥ १० ॥
त्रींल्लोकान् गुह्यकांश्चैव गन्धर्वांश्च सपन्नगान् ।
द्वितीय इव मार्तण्डो युगान्ते समुपस्थिते ॥ ११ ॥
उनके हाथमें दण्ड शोभा पा रहा था। सम्पूर्ण भूतोंका विनाश करनेवाले अचिन्त्यात्मा सूर्यपुत्र धर्मराज अपने (तेजस्वी) विमानसे तीनों लोकों, गुह्यकों, गन्धर्वों तथा नागोंको प्रकाशित कर रहे थे। प्रलयकाल उपस्थित होनेपर दिखायी देनेवाले द्वितीय सूर्यकी भाँति उनकी अद्भुत शोभा हो रही थी ।। १०-११ ।।
ते भानुमन्ति चित्राणि शिखराणि महागिरेः ।
समास्थायार्जुनं तत्र ददृशुस्तपसान्वितम् ॥ १२ ॥
उन सब देवताओंने उस महापर्वतके विचित्र एवं तेजस्वी शिखरोंपर पहुँचकर वहाँ तपस्वी अर्जुनको देखा ।।
ततो मुहूर्ताद् भगवानैरावतशिरोगतः ।
आजगाम सहेन्द्राण्या शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ १३ ॥
तत्पश्चात् दो ही घड़ीके बाद भगवान् इन्द्र इन्द्राणीके साथ ऐरावतकी पीठपर बैठकर वहाँ आये। देवताओंके समुदायने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।।
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
शुशुभे तारकराजः सितमभ्रमिव स्थितः ॥ १४ ॥

संस्तूयमानो गन्धर्वैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः । शृङ्गं गिरेः समासाद्य तस्थौ सूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥ उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे शुभ्र वर्णके मेघखण्डसे आच्छादित चन्द्रमाके समान सुशोभित हो रहे थे। बहुत-से तपस्वी-ऋषि तथा गन्धर्वगण उनकी स्तुति करते थे। वे उस पर्वतके शिखरपर आकर ठहर गये, मानो वहाँ सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ १४-१५ ॥

अथ मेघस्वनो धीमान् व्याजहार शुभां गिरम् । यमः परमधर्मज्ञो दक्षिणां दिशमास्थितः ॥ १६ ॥ तदनन्तर मेघके समान गम्भीर स्वरवाले परम धर्मज्ञ एवं बुद्धिमान् यमराज दक्षिण दिशामें स्थित हो यह शुभ वचन बोले— ॥ १६ ॥

अर्जुनार्जुन पश्यास्माँल्लोकपालान् समागतान् । दृष्टिं ते वितरामोऽद्य भवानर्हति दर्शनम् ॥ १७ ॥ पूर्वर्षिरमितात्मा त्वं नरो नाम महाबलः । नियोगाद् ब्रह्मणस्तात मर्त्यतां समुपागतः ॥ १८ ॥ अर्जुन! हम सब लोकपाल यहाँ आये हुए हैं। तुम हमें देखो। हम तुम्हें दिव्य दृष्टि देते हैं। तुम हमारे दर्शनके अधिकारी हो। तुम महामना एवं महाबली पुरातन महर्षि नर हो। तात! ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुमने मानव-शरीर ग्रहण किया है ॥ १७-१८ ॥

त्वया च वसुसम्भूतो महावीर्यः पितामहः । भीष्मः परमधर्मात्मा संसाध्यश्च रणेऽनघ ॥ १९ ॥ क्षत्रं चाग्निसमस्पर्शं भारद्वाजेन रक्षितम् । दानवाश्च महावीर्या ये मनुष्यत्वमागताः ॥ २० ॥ निवातकवचाश्चैव दानवाः कुरुनन्दन । पितुर्मांशो देवस्य सर्वलोकप्रतापिनः ॥ २१ ॥ कर्णश्च सुमहावीर्यस्त्वया वध्यो धनंजय । 'अनघ! वसुओंके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी और परम धर्मात्मा पितामह भीष्मको तुम संग्राममें जीत लोगे। भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्यके द्वारा सुरक्षित क्षत्रिय-समुदाय भी, जिसका स्पर्श अग्निके समान भयंकर है, तुम्हारे द्वारा पराजित होगा। कुरुनन्दन! मानव-शरीरमें उत्पन्न हुए महाबली दानव तथा निवातकवच नामक दैत्य भी तुम्हारे हाथसे मारे जायँगे। धनंजय! सम्पूर्ण जगत्‌को उष्णता प्रदान करनेवाले मेरे पिता भगवान् सूर्यदेवके अंशसे उत्पन्न महापराक्रमी कर्ण भी तुम्हारा वध्य होगा ॥ १९—२१½ ॥

अंशाश्च क्षितिसम्प्राप्ता देवदानवरक्षसाम् ॥ २२ ॥ त्वया निपातिता युद्धे स्वकर्मफलनिर्जिताम् । गतिं प्राप्स्यन्ति कौन्तेय यथास्वमरिकर्षण ॥ २३ ॥

‘शत्रुओंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार! देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके जो अंश पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं, वे युद्धमें तुम्हारे द्वारा मारे जाकर अपने कर्मफलके अनुसार यथोचित गति प्राप्त करेंगे ॥ २२-२३ ॥ अक्षया तव कीर्तिश्च लोके स्थास्यति फाल्गुन । त्वया साक्षान्महादेवस्तोपितो हि महामृधे ॥ २४ ॥ ‘फाल्गुन! संसारमें तुम्हारी अक्षय कीर्ति स्थापित होगी। तुमने यहाँ महासमरमें साक्षात् महादेवजीको संतुष्ट किया है ॥ २४ ॥ लघ्वी वसुमती चापि कर्तव्या विष्णुना सह । गृहाणास्त्रं महाबाहो दण्डमप्रतिवारणम् । अनेनास्त्रेण सुमहत् त्वं हि कर्म करिष्यसि ॥ २५ ॥ ‘महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णके साथ मिलकर तुम्हें इस पृथ्वीका भार भी हलका करना है, अतः यह मेरा दण्डास्त्र ग्रहण करो। इसका वेग कहीं भी कुण्ठित नहीं होता। इसी अस्त्रके द्वारा तुम बड़े-बड़े कार्य सिद्ध करोगे’ ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्रतिजग्राह तत् पार्थो विधिवत् कुरुनन्दनः । समन्त्रं सोपचारं च समोक्षविनिवर्तनम् ॥ २६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुनने विधिपूर्वक मन्त्र, उपचार, प्रयोग और उपसंहारसहित उस अस्त्रको ग्रहण किया ॥ २६ ॥ ततो जलधरश्यामो वरुणो यादसां पतिः । पश्चिमां दिशमास्थाय गिरमुच्चारयन् प्रभुः ॥ २७ ॥ इसके बाद जल-जन्तुओंके स्वामी मेघके समान श्यामकान्तिवाले प्रभावशाली वरुण पश्चिम दिशामें खड़े हो इस प्रकार बोले— ॥ २७ ॥ पार्थ क्षत्रियमुख्यस्त्वं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः । पश्य मां पृथुताम्राक्ष वरुणोऽस्मि जलेश्वरः ॥ २८ ॥ ‘पार्थ! तुम क्षत्रियोंमें प्रधान एवं क्षत्रिय-धर्ममें स्थित हो। विशाल तथा लाल नेत्रोंवाले अर्जुन! मेरी ओर देखो। मैं जलका स्वामी वरुण हूँ ॥ २८ ॥ मया समुद्यतान् पाशान् वारुणाननिवारितान् । प्रतिगृह्णीष्व कौन्तेय सरहस्यनिवर्तनम् ॥ २९ ॥ ‘कुन्तीकुमार! मेरे दिये हुए इन वरुण-पाशोंको रहस्य और उपसंहारसहित ग्रहण करो। इनके वेगको कोई भी रोक नहीं सकता ॥ २९ ॥ एभिस्तदा मया वीर संग्रामे तारकामये । दैतेयानां सहस्राणि संयतानि महात्मनाम् ॥ ३० ॥

‘वीर! मैंने इन पाशोंद्वारा तारकामय संग्राममें सहस्रों महाकाय दैत्योंको बाँध लिया था ।। ३० ।। तस्मादिमान् महासत्त्व मत्प्रसादसमुत्थितान् । गृहाण न हि ते मुच्येद्यन्तकोऽप्यातातयिनः ।। ३१ ।। ‘अतः महाबली पार्थ! मेरे कृपाप्रसादसे प्रकट हुए इन पाशोंको तुम ग्रहण करो। इनके द्वारा आक्रमण करनेपर मृत्यु भी तुम्हारे हाथसे नहीं छूट सकती ।। ३१ ।। अनेन त्वं यदास्त्रेण संग्रामे विचरिष्यसि । तदा निःक्षत्रिया भूमिर्भविष्यति न संशयः ।। ३२ ।। ‘इस अस्त्रके द्वारा जब तुम संग्रामभूमिमें विचरण करोगे, उस समय यह सारी वसुन्धरा क्षत्रियोंसे शून्य हो जायगी, इसमें संशय नहीं है’ ।। ३२ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः कैलासनिलयो धनाध्यक्षोऽभ्यभाषत । दत्तेष्वस्त्रेषु दिव्येषु वरुणेन यमेन च ।। ३३ ।। प्रीतोऽहमपि ते प्राज्ञ पाण्डवेय महाबल । त्वया सह समागम्य अजितेन तथैव च ।। ३४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वरुण और यमके दिव्यास्त्र प्रदान कर चुकनेपर कैलासनिवासी धनाध्यक्ष कुबेरने कहा—‘महाबली बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन! मैं भी तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम अपराजित वीर हो। तुमसे मिलकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है’ ।। ३३-३४ ।। सव्यसाचिन् महाबाहो पूर्वदेव सनातन । सहास्माभिर्भवाञ्छ्रान्तः पुराकल्पेषु नित्यशः ।। ३५ ।। दर्शनात् ते त्विदं दिव्यं प्रदिशामि नरर्षभ । अमनुष्यान् महाबाहो दुर्जयानपि जेष्यसि ।। ३६ ।। ‘सव्यसाचिन्! महाबाहो! पुरातन देव! सनातनपुरुष! पूर्वकल्पोंमें मेरे साथ तुमने सदा तपके द्वारा परिश्रम उठाया है। नरश्रेष्ठ! आज तुम्हें देखकर यह दिव्यास्त्र प्रदान करता हूँ। महाबाहो! इसके द्वारा तुम दुर्जय मानवेतर प्राणियोंको भी जीत लोगे ।। ३५-३६ ।। मत्तश्चैव भवानाशु गृह्णात्वस्त्रमनुत्तमम् । अनेन त्वमनीकानि धार्तराष्ट्रस्य धक्ष्यसि ।। ३७ ।। ‘तुम मुझसे शीघ्र ही इस अत्युत्तम अस्त्रको ग्रहण कर लो। तुम इसके द्वारा दुर्योधनकी सारी सेनाओंको जलाकर भस्म कर डालोगे ।। ३७ ।। तदिदं प्रतिगृह्णीष्व अन्तर्धानं प्रियं मम । ओजस्तेजोद्युतिकरं प्रस्वापनमरातिनुत् ।। ३८ ।।

'यह मेरा परम प्रिय अन्तर्धान नामक अस्त्र है। इसे ग्रहण करो। यह ओज, तेज और कान्ति प्रदान करनेवाला, शत्रुसेनाको सुला देनेवाला और समस्त वैरियोंका विनाश करनेवाला है ।। ३८ ।।

महात्मना शङ्करेण त्रिपुरं निहतं यदा । तदैतदस्त्रं निर्मुक्तं येन दग्धा महासुराः ।। ३९ ।।

'परमात्मा शंकरने जब त्रिपुरासुरके तीनों नगरोंका विनाश किया था, उस समय इस अस्त्रका उनके द्वारा प्रयोग किया गया था; जिससे बड़े-बड़े असुर दग्ध हो गये थे ।। ३९ ।।

त्वदर्थमुद्यतं चेदं मया सत्यपराक्रम । त्वमर्हो धारणे चास्य मेरुप्रतिमगौरव ।। ४० ।।

'सत्यपराक्रमी और मेरुके समान गौरवशाली पार्थ! तुम्हारे लिये यह अस्त्र मैंने उपस्थित किया है। तुम इसे धारण करनेके योग्य हो' ।। ४० ।।

ततोऽर्जुनो महाबाहुर्विधिवत् कुरुनन्दनः । कौबेरमधिजग्राह दिव्यमस्त्रं महाबलः ।। ४१ ।।

तब कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महाबाहु महाबली अर्जुनने कुबेरके उस 'अन्तर्धान' नामक दिव्य अस्त्रको ग्रहण किया ।। ४१ ।।

ततोऽब्रवीद् देवराजः पार्थमक्लिष्टकारिणम् । सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया वाचा मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ।। ४२ ।।

तदनन्तर देवराज इन्द्रने अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनको मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मेघ और दुन्दुभिके समान गम्भीर स्वरसे कहा— ।। ४२ ।।

कुन्तीमातर्महाबाहो त्वमीशानः पुरातनः । परां सिद्धिमनुप्राप्तः साक्षाद् देवगतिं गतः ।। ४३ ।।

'महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम पुरातन शासक हो। तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है। तुम साक्षात् देवगतिको प्राप्त हुए हो ।। ४३ ।।

देवकार्यं तु सुमहत् त्वया कार्यमरिंदम । आरोढव्यस्त्वया स्वर्गः सज्जीभव महाद्युते ।। ४४ ।।

'शत्रुदमन! तुम्हें देवताओंका बड़ा भारी कार्य सिद्ध करना है। महाद्युते! तैयार हो जाओ। तुम्हें स्वर्गलोकमें चलना है ।। ४४ ।।

रथो मातलिसंयुक्त आगन्ता त्वत्कृते महीम् । तत्र तेऽहं प्रदास्यामि दिव्यान्यस्त्राणि कौरव ।। ४५ ।।

'मातलिके द्वारा जोता हुआ दिव्य रथ तुम्हें लेनेके लिये पृथ्वीपर आनेवाला है। कुरुनन्दन! वहीं (स्वर्गमें) मैं तुम्हें दिव्यास्त्र प्रदान करूँगा' ।। ४५ ।।

तान् दृष्ट्वा लोकपालांस्तु समेतान् गिरिमूर्धनि । जगाम विस्मयं धीमान् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ४६ ।।

उस पर्वतशिखरपर एकत्र हुए उन सभी लोक-पालोंका दर्शन करके परम बुद्धिमान् धनंजयको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ४६ ॥
ततोऽर्जुनो महातेजा लोकपालान् समागतान् ।
पूजयामास विधिवद् वाग्भिरद्भिः फलैरपि ॥ ४७ ॥
तत्पश्चात् महातेजस्वी अर्जुनने वहाँ पधारे हुए लोकपालोंका मीठे वचन, जल और फलोंके द्वारा भी विधिपूर्वक पूजन किया ॥ ४७ ॥
ततः प्रतिययुर्देवाः प्रतिमान्य धनंजयम् ।
यथागतेन विबुधाः सर्वे काममनोजवाः ॥ ४८ ॥
इसके बाद इच्छानुसार मनके समान वेगवाले समस्त देवता अर्जुनके प्रति सम्मान प्रकट करके जैसे आये थे वैसे ही चले गये ॥ ४८ ॥
ततोऽर्जुनो मुदं लेभे लब्धास्त्रः पुरुषर्षभः ।
कृतार्थमथ चात्मानं स मेने पूर्णमानसम् ॥ ४९ ॥
तदनन्तर देवताओंसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके पुरुषोत्तम अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई; उन्होंने अपने-आपको कृतार्थ एवं पूर्णमनोरथ माना ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि देवप्रस्थाने एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें देवप्रस्थानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

(इन्द्रलोकाभिगमनपर्व)

⬅ विषय-सूची (TOC)

(इन्द्रलोकाभिगमनपर्व)

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

अर्जुनका हिमालयसे विदा होकर मातलिके साथ स्वर्गलोकको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

गतेषु लोकपालेषु पार्थः शत्रुनिबर्हणः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र देवराजरथं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! लोकपालोंके चले जानेपर शत्रुसंहारक अर्जुनने देवराज इन्द्रके रथका चिन्तन किया ॥ १ ॥

ततश्चिन्तयमानस्य गुडाकेशस्य धीमतः ।
रथो मातलिसंयुक्त आजगाम महाप्रभः ॥ २ ॥
निद्राविजयी बुद्धिमान् पार्थके चिन्तन करते ही मातलीसहित महातेजस्वी रथ वहाँ आ गया ॥ २ ॥

नभो वितिमिरं कुर्वञ्जलदान् पाटयन्निव ।
दिशः सम्पूरयन् नादैर्महामेघरवोपमैः ॥ ३ ॥
वह रथ आकाशको अन्धकारशून्य मेघोंकी घटाको विदीर्ण और महान् मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्दसे दिशाओंको परिपूर्ण-सा कर रहा था ॥ ३ ॥

असयः शक्तयो भीमा गदाश्चोग्रप्रदर्शनाः ।
दिव्यप्रभावाः प्रासाश्च विद्युतश्च महाप्रभाः ॥ ४ ॥
तथैवाशनयश्चैव चक्रयुक्तास्तुलागुडाः ।
वायुस्फोटाः सनिर्घाता महामेघस्वनास्तथा ॥ ५ ॥
उस रथमें तलवार, भयंकर शक्ति, उग्र गदा, दिव्य प्रभावशाली प्रास, अत्यन्त कान्तिमती विद्युत्, अशनि एवं चक्रयुक्त भारी वजनवाले प्रस्तरके गोले रखे हुए थे, जो चलाते समय हवामें सनसनाहट पैदा करते थे। तथा जिनसे वज्रगर्जन और महामेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान शब्द होते थे ॥ ४-५ ॥

तत्र नागा महाकाया ज्वलितास्याः सुदारुणाः ।
सिताभ्रकूटप्रतिमाः संहताश्च तथोपलाः ॥ ६ ॥

उस स्थानमें अत्यन्त भयंकर तथा प्रज्वलित मुखवाले विशालकाय सर्प मौजूद थे। श्वेत बादलोंके समूहकी भाँति ढेर-के-ढेर युद्धमें फेंकनेयोग्य पत्थर भी रखे हुए थे ॥ ६ ॥ दशवाजिसहस्राणि हरीणां वातरंहसाम् । वहन्ति यं नेत्रमुषं दिव्यं मायामयं रथम् ॥ ७ ॥ वायुके समान वेगशाली दस हजार श्वेत-पीत रंगवाले घोड़े नेत्रोंमें चकाचौंध पैदा करनेवाले उस दिव्य मायामय रथको वहन करते थे ॥ ७ ॥ तत्रापश्यन्महानीलं वैजयन्तं महाप्रभम् । ध्वजमिन्दीवरश्यामं वंशं कनकभूषणम् ॥ ८ ॥ अर्जुनने उस रथपर अत्यन्त नीलवर्णवाले महातेजस्वी 'वैजयन्त' नामक इन्द्रध्वजको फहराता देखा। उसकी श्याम सुषमा नील कमलकी शोभाको तिरस्कृत कर रही थी। उस ध्वजके दण्डमें सुवर्ण मढ़ा हुआ था ॥ ८ ॥ तस्मिन् रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूषितम् । दृष्ट्वा पार्थो महाबाहुर्देवमेवान्वतर्कयत् ॥ ९ ॥ महाबाहु कुन्तीकुमारने उस रथपर बैठे हुए सारथिकी ओर देखा, जो तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित था। उसे देखकर उन्होंने कोई देवता ही समझा ॥ ९ ॥ तथा तर्कयतस्तस्य फाल्गुनस्याथ मातलिः । संनतः प्रस्थितो भूत्वा वाक्यमर्जुनमब्रवीत् ॥ १० ॥ इस प्रकार विचार करते हुए अर्जुनके सम्मुख उपस्थित हो मातलिने विनीतभावसे कहा ॥ १० ॥

मातलिरुवाच

भो भोः शक्रात्मज श्रीमाञ्छक्रस्त्वां द्रष्टुमिच्छति । आरोहतु भवाञ्छीघ्रं रथमिन्द्रस्य सम्मतम् ॥ ११ ॥ मातलि बोला— इन्द्रकुमार! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपको देखना चाहते हैं। यह उनका प्रिय रथ है। आप इसपर शीघ्र आरूढ़ होइये ॥ ११ ॥ आह माममरश्रेष्ठः पिता तव शतक्रतुः । कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालयाः ॥ १२ ॥ एष शक्रः परिवृतो देवैर्ऋषिगणैस्तथा । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च त्वां दिदृक्षुः प्रतीक्षते ॥ १३ ॥ आपके पिता देवेश्वर शतक्रतुने मुझसे कहा है कि 'तुम कुन्तीनन्दन अर्जुनको यहाँ ले आओ, जिससे सब देवता उन्हें देखें।' देवताओं, महर्षियों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे घिरे हुए इन्द्र आपको देखनेके लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ १२-१३ ॥ अस्माल्लोकाद् देवलोकं पाकशासनशासनात् ।

आरोह त्वं मया सार्धं लब्धास्त्रः पुनरेष्यसि ॥ १४ ॥
आप देवराजकी आज्ञासे इस लोकसे मेरे साथ देवलोकको चलिये। वहाँसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके लौट आइयेगा ॥ १४ ॥

अर्जुन उवाच

मातले गच्छ शीघ्रं त्वमारोहस्व रथोत्तमम् ।
राजसूयाश्वमेधानां शतैरपि सुदुर्लभम् ॥ १५ ॥
अर्जुनने कहा— मातले! आप जल्दी चलिये। अपने इस उत्तम रथपर पहले आप चढ़िये। यह सैकड़ों राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंद्वारा भी अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १५ ॥
पार्थिवैः सुमहाभाग्यैर्यज्वभिर्भूरिदक्षिणैः ।
दैवतैर्वा समारोढुं दानवैर्वा रथोत्तमम् ॥ १६ ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, महान् सौभाग्यशाली, यज्ञपरायण भूमिपालों, देवताओं अथवा दानवोंके लिये भी इस उत्तम रथपर आरूढ़ होना कठिन है ॥ १६ ॥
नातप्ततपसा शक्य एष दिव्यो महारथः ।
द्रष्टुं वाप्यथवा स्प्रष्टुमारोढुं कुत एव च ॥ १७ ॥
जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे इस महान् दिव्य रथका दर्शन या स्पर्श भी नहीं कर सकते, फिर इसपर आरूढ़ होनेकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥
त्वयि प्रतिष्ठिते साधो रथस्थे स्थिरवाजिनि ।
पश्चादहमथारोक्ष्ये सुकृती सत्पथं यथा ॥ १८ ॥
साधु सारथे! आप इस रथपर स्थिरतापूर्वक बैठकर जब घोड़ोंको काबूमें कर लें, तब जैसे पुण्यात्मा सन्मार्गपर आरूढ़ होता है, उसी प्रकार पीछे मैं भी इस रथपर आरूढ़ होऊँगा ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मातलिः शक्रसारथिः ।
आरुरोह रथं शीघ्रं हयान् येमे च रश्मिभिः ॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अर्जुनका यह वचन सुनकर इन्द्रसारथि मातलि शीघ्र ही रथपर जा बैठा और बागडोर खींचकर घोड़ोंको काबूमें किया ॥ १९ ॥
ततोऽर्जुनो हृष्टमना गङ्गायामाप्लुतः शुचिः ।
जजाप जप्यं कौन्तेयो विधिवत् कुरुनन्दनः ॥ २० ॥
तदनन्तर कुरुनन्दन कुन्तीकुमार अर्जुनने प्रसन्नमनसे गंगामें स्नान किया और पवित्र हो विधिपूर्वक जपने-योग्य मन्त्रका जप किया ॥ २० ॥
ततः पितॄन् यथान्यायं तर्पयित्वा यथाविधि ।
मन्दरं शैलराजं तमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २१ ॥

फिर विधिपूर्वक न्यायोचित रीतिसे पितरोंका तर्पण करके विस्तृत शैलराज हिमालयसे विदा लेनेका उपक्रम किया ॥ २१ ॥

साधूनां पुण्यशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् ।
त्वं सदा संश्रयः शैल स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणाम् ॥ २२ ॥
'गिरिराज! तुम साधु-महात्माओं, पुण्यात्मा मुनियों तथा स्वर्गमार्गकी अभिलाषा रखनेवाले पुण्यकर्मा मनुष्योंके सदा शुभ आश्रय हो ॥ २२ ॥

त्वत्प्रसादात् सदा शैल ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः ।
स्वर्गं प्राप्ताश्चरन्ति स्म देवैः सह गतव्यथाः ॥ २३ ॥
'गिरिराज! तुम्हारे कृपाप्रसादसे सदा कितने ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य स्वर्गमें जाकर व्यथारहित हो देवताओंके साथ विचरते हैं ॥ २३ ॥

अद्रिराज महाशैल मुनिसंश्रय तीर्थवन् ।
गच्छाम्यामन्त्रयामि त्वां सुखमस्म्युषितस्त्वयि ॥ २४ ॥
'अद्रिराज! महाशैल! मुनियोंके निवासस्थान! तीर्थोंसे विभूषित हिमालय! मैं तुम्हारे शिखरपर सुखपूर्वक रहा हूँ, अतः तुमसे आज्ञा माँगकर यहाँसे जा रहा हूँ ॥ २४ ॥

तव सानूनि कुञ्जांश्च नद्यः प्रस्रवणानि च ।
तीर्थानि च सुपुण्यानि मया दृष्टान्यनेकशः ॥ २५ ॥
'तुम्हारे शिखर, कुंजवन, नदियाँ, झरने और परम पुण्यमय तीर्थस्थान मैंने अनेक बार देखे हैं ॥ २५ ॥

फलानि च सुगन्धीनि भक्षितानि ततस्ततः ।
सुसुगन्धाश्च वार्योघास्त्वच्छरीरविनिःसृताः ॥ २६ ॥
अमृतास्वादनीया मे पीताः प्रस्रवणोदकाः ।
'यहाँके विभिन्न स्थानोंसे सुगन्धित फल लेकर भोजन किये हैं। तुम्हारे शरीरसे प्रकट हुए परम सुगन्धित प्रचुर जलका सेवन किया है। तुम्हारे झरनेका अमृतके समान स्वादिष्ट जल मैंने प्रतिदिन पान किया है ॥ २६ १/२ ॥

शिशुर्यथा पितुरङ्के सुसुखं वर्तते नग ॥ २७ ॥
तथा तवाङ्के ललितं शैलराज मया प्रभो ।
'प्रभो नगराज! जैसे शिशु अपने पिताके अंकमें बड़े सुखसे रहता है, उसी प्रकार मैंने भी तुम्हारी गोदमें आमोदपूर्वक क्रीड़ाएँ की हैं ॥ २७ १/२ ॥

अप्सरोगणसंकीर्णे ब्रह्मघोषानुनादिते ॥ २८ ॥
सुखमस्म्युषितः शैल तव सानुषु नित्यदा ।
'शैलराज! अप्सराओंसे व्याप्त और वैदिक मन्त्रोंके उच्चघोषसे प्रतिध्वनित तुम्हारे शिखरोंपर मैंने प्रतिदिन बड़े सुखसे निवास किया है' ॥ २८ १/२ ॥

एवमुक्त्वाऽर्जुनः शैलमामन्त्र्य परवीरहा ॥ २९ ॥

आरुरोह रथं दिव्यं द्योतयन्निव भास्करः ।
ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन शैलराजसे आज्ञा माँगकर उस दिव्य रथको देदीप्यमान करते हुए-से उसपर आरूढ़ हो गये, मानो सूर्य सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित कर रहे हों ॥ २९ १/२ ॥

स तेनादित्यरूपेण दिव्येनाद्भुतकर्मणा ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वमाचक्रमे धीमान् प्रहृष्टः कुरुनन्दनः ।
सोऽदर्शनपथं यातो मर्त्यानां धर्मचारिणाम् ॥ ३१ ॥
परम बुद्धिमान् कुरुनन्दन अर्जुन बड़े प्रसन्न होकर उस अद्भुत चालसे चलनेवाले सूर्यस्वरूप दिव्य रथके द्वारा ऊपरकी ओर जाने लगे। धीरे-धीरे धर्मात्मा मनुष्योंके दृष्टिपथसे दूर हो गये ॥ ३०-३१ ॥

ददर्शाद्भुतरूपाणि विमानानि सहस्रशः ।
न तत्र सूर्यः सोमो वा द्योतते न च पावकः ॥ ३२ ॥
ऊपर जाकर उन्होंने सहस्रों अद्भुत विमान देखे। वहाँ न सूर्य प्रकाशित होते हैं, न चन्द्रमा। अग्निकी प्रभा भी वहाँ काम नहीं देती है ॥ ३२ ॥

स्वयैव प्रभया तत्र द्योतन्ते पुण्यलब्धया ।
तारारूपाणि यानीह दृश्यन्ते द्युतिमन्ति वै ॥ ३३ ॥
दीपवद् विप्रकृष्टत्वात् तनूनि सुमहान्त्यपि ।

तानि तत्र प्रभास्वन्ति रूपवन्ति च पाण्डवः ॥ ३४ ॥
ददर्श स्वेषु धिष्ण्येषु दीप्तिमन्तः स्वयार्चिषा ।
तत्र राजर्षयः सिद्धा वीराश्च निहता युधि ॥ ३५ ॥
वहाँ स्वर्गके निवासी अपने पुण्यकर्मोंसे प्राप्त हुई अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होते हैं। यहाँ प्रकाशमान तारोंके रूपमें जो दूर होनेके कारण दीपककी भाँति छोटे और बड़े प्रकाशपुंज दिखायी देते हैं, उन सभी प्रकाशमान स्वरूपोंको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। जो अपने-अपने अधिष्ठानोंमें अपनी ही ज्योतिसे देदीप्यमान हो रहे थे। उन लोकोंमें वे सिद्ध राजर्षि वीर निवास करते थे, जो युद्धमें प्राण देकर वहाँ पहुँचे थे ॥ ३३—३५ ॥
तपसा च जितं स्वर्गं सम्पेतुः शतसङ्घशः ।
गन्धर्वाणां सहस्राणि सूर्यज्वलिततेजसाम् ॥ ३६ ॥
गुह्यकानामृषीणां च तथैवाप्सरसां गणान् ।
लोकानात्मप्रभान् पश्यन् फाल्गुनो विस्मयान्वितः ॥ ३७ ॥
सैकड़ों झुंड-के-झुंड तपस्वी पुरुष स्वर्गमें जा रहे थे, जिन्होंने तपस्याद्वारा उसपर विजय पायी थी। सूर्यके समान प्रकाशमान सहस्रों गन्धर्वों, गुह्यकों, ऋषियों तथा अप्सराओंके समूहोंको और उनके स्वतः प्रकाशित होनेवाले लोकोंको देखकर अर्जुनको बड़ा आश्चर्य होता था ॥ ३६-३७ ॥
पप्रच्छ मातलिं प्रीत्या स चाप्येनमुवाच ह ।
एते सुकृतिनः पार्थ स्वेषु धिष्ण्येष्ववस्थिताः ॥ ३८ ॥
तान् दृष्टवानसि विभो तारारूपाणि भूतले ।
अर्जुनने प्रसन्नतापूर्वक मातलिसे उनके विषयमें पूछा, तब मातलिने उनसे कहा—'कुन्तीकुमार! ये वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो अपने-अपने लोकोंमें निवास करते हैं। विभो! उन्हींको भूतलपर आपने तारोंके रूपमें चमकते देखा है' ॥ ३८ १/२ ॥
ततोऽपश्यत् स्थितं द्वारि शुभं वैजयिनं गजम् ॥ ३९ ॥
ऐरावतं चतुर्दन्तं कैलासमिव शृङ्खिणम् ।
स सिद्धमार्गमाक्रम्य कुरुपाण्डवसत्तमः ॥ ४० ॥
व्यरोचत यथापूर्वं मान्धाता पार्थिवोत्तमः ।
अभिचक्राम लोकान् स राज्ञां राजीवलोचनः ॥ ४१ ॥
तदनन्तर अर्जुनने स्वर्गद्वारपर खड़े हुए सुन्दर विजयी गजराज ऐरावतको देखा, जिसके चार दाँत बाहर निकले हुए थे। वह ऐसा जान पड़ता था, मानो अनेक शिखरोंसे सुशोभित कैलास पर्वत हो। कुरु-पाण्डव-शिरोमणि अर्जुन सिद्धोंके मार्गपर आकर वैसे ही शोभा पाने लगे, जैसे पूर्वकालमें भूपालशिरोमणि मान्धाता सुशोभित होते थे। कमलनयन अर्जुनने उन पुण्यात्मा राजाओंके लोकोंमें भ्रमण किया ॥ ३९—४१ ॥
एवं स संक्रामंस्तत्र स्वर्गलोके महायशाः ।

ततो ददर्श शक्रस्य पुरीं ताममरावतीम् ॥ ४२ ॥ इस प्रकार महायशस्वी पार्थने स्वर्गलोकमें विचरते हुए आगे जाकर इन्द्रपुरी अमरावतीका दर्शन किया ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥