महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सीमातक पहुँचकर ये समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भगवान् सूर्य पुनः पूर्वाभिमुख होकर चलते हैं ।। ३०-३१ ।।
स मासान् विभजन् काले बहुधा पर्वसंधिषु ।
तथैव भगवान् सोमो नक्षत्रैः सह गच्छति ॥ ३२ ॥
‘उसी प्रकार भगवान् चन्द्रमा भी नक्षत्रोंके साथ मेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और पर्वसंधिके समय विभिन्न मासोंका विभाग करते रहते हैं ।। ३२ ।।
एवमेतं त्वतिक्रम्य महामेरुमतन्द्रितः ।
भावयन् सर्वभूतानि पुनर्गच्छति मन्दरम् ॥ ३३ ॥
तथा तमिस्रहा देवो मयूखैर्भावयञ्जगत् ।
मार्गमेतदसम्बाधमादित्यः परिवर्तते ॥ ३४ ॥
‘इस तरह आलस्यरहित हो इस महामेरुका उल्लंघन करके समस्त प्राणियोंका पोषण करते हुए वे पुनः मन्दराचलको चले जाते हैं। उसी प्रकार अन्धकारनाशक भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्का पालन करते हुए इस बाधारहित मार्गपर सदा चक्कर लगाते रहते हैं ।। ३३-३४ ।।
सिसृक्षुः शिशिराण्येव दक्षिणां भजते दिशम् ।
ततः सर्वाणि भूतानि कालोऽभ्यर्च्छति शैशिरः ॥ ३५ ॥
स्थावराणां च भूतानां जङ्गमानां च तेजसा ।
तेजांसि समुपादत्ते निवृत्तः स विभावसुः ॥ ३६ ॥
ततः स्वेदक्लमौ तन्द्री ग्लानिश्च भजते नरान् ।
प्राणिभिः सततं स्वप्नो ह्यभीक्ष्णं च निषेव्यते ॥ ३७ ॥
एवमेतदनिर्देश्यं मार्गमावृत्य भानुमान् ।
पुनः सृजति वर्षाणि भगवान् भावयन् प्रजाः ॥ ३८ ॥
‘शीतकी सृष्टि करनेकी इच्छासे ही सूर्यदेव दक्षिण दिशाका आश्रय लेते हैं, इसलिये समस्त प्राणियोंपर शीतकालका प्रभाव पड़ने लगता है। दक्षिणायनसे निवृत्त होनेपर वे भगवान् सूर्य स्थावर-जंगम सभी प्राणियोंका तेज अपने तेजसे हर लेते हैं, यही कारण है कि मनुष्योंको पसीना, थकावट, आलस्य और ग्लानिका अनुभव होता है तथा प्राणी सदा निद्राका ही बार-बार सेवन करते हैं। इस प्रकार इस अन्तरिक्ष मार्गको आवृत करके समस्त प्रजाकी पुष्टि करते हुए भगवान् सूर्य पुनः वर्षाकी सृष्टि करते हैं ।। ३५—३८ ।।
वृष्टिमारुतसंतापैः सुखैः स्थावरजङ्गमान् ।
वर्धयन् सुमहातेजाः पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ ३९ ॥
‘महातेजस्वी सूर्यदेव वृष्टि, वायु और तापद्वारा सुखपूर्वक चराचर जीवोंकी पुष्टि करते हुए पुनः अपने स्थानपर लौट आते हैं ।। ३९ ।।
एवमेष चरन् पार्थ कालचक्रमतन्द्रितः ।
प्रकर्षन् सर्वभूतानि सविता परिवर्तते ॥ ४० ॥
‘कुन्तीनन्दन! इस प्रकार ये भगवान् सूर्य सावधान हो समस्त प्राणियोंका आकर्षण और पोषण करते हुए विचरते और कालचक्रका संचालन करते हैं ॥ ४० ॥
संतता गतिरेतस्य नैष तिष्ठति पाण्डव ।
आदायैव तु भूतानां तेजो विसृजते पुनः ॥ ४१ ॥
विभजन् सर्वभूतानामायुः कर्म च भारत ।
अहोरात्रं कलाः काष्ठाः सृजत्येष सदा विभुः ॥ ४२ ॥
‘युधिष्ठिर! यह सूर्यदेवकी निरन्तर चलनेवाली गति है। सूर्य कभी एक क्षणके लिये भी रुकते नहीं हैं। वे सम्पूर्ण भूतोंके रसमय तेजको ग्रहण करके पुनः उसे वर्षाकालमें बरसा देते हैं। भारत! ये भगवान् सविता सम्पूर्ण भूतोंकी आयु और कर्मका विभाग करते हुए दिन-रात, कला-काष्ठा आदि समयकी निरन्तर सृष्टि करते रहते हैं’ ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वणि मेरुदर्शने त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें मेरुदर्शनविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥
१६४-
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन
वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् नगेन्द्रे वसतां तु तेषां महात्मनां सद्व्रतमास्थितानाम् । रतिः प्रमोदश्च बभूव तेषा- माकाङ्क्षतां दर्शनमर्जुनस्य ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस पर्वतराज गन्धमादनपर उत्तम व्रतका आश्रय ले निवास करते हुए अर्जुनके दर्शनकी इच्छा रखनेवाले महामना पाण्डवोंके मनमें अत्यन्त प्रेम और आनन्दका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १ ॥
तान् वीर्ययुक्तान् सुविशुद्धकामां- स्तेजस्विनः सत्यधृतिप्रधानान् । सम्प्रीयमाणा बहवोऽभिजग्मु- र्गन्धर्वसङ्घाश्च महर्षयश्च ॥ २ ॥
वे सब-के-सब बड़े पराक्रमी थे। उनकी कामनाएँ अत्यन्त विशुद्ध थीं। वे तेजस्वी तो थे ही, सत्य और धैर्य उनके प्रधान गुण थे; अतः बहुतसे गन्धर्व तथा महर्षिगण उनसे प्रेमपूर्वक मिलने-जुलनेके लिये आने लगे ॥ २ ॥
तं पादपैः पुष्पधरैरुपेतं नगोत्तमं प्राप्य महारथानाम् । मनःप्रसादः परमो बभूव यथा दिवं प्राप्य मरुद्गणानाम् ॥ ३ ॥
वह श्रेष्ठ पर्वत विकसित वृक्षावलियोंसे विभूषित था। वहाँ पहुँच जानेसे महारथी पाण्डवोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता रहने लगी। ठीक उसी तरह, जैसे मरुद्गणोंको स्वर्गलोकमें पहुँचनेपर प्रसन्नता होती है ॥ ३ ॥
मयूरहंसस्वननादितानि पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य । शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ॥ ४ ॥
उस महान् पर्वतके शिखर मयूरों और हंसोंके कलनादसे गूँजते रहते थे। वहाँ सब ओर सुन्दर पुष्प व्याप्त हो रहे थे। उन मनोहर शिखरोंको देखते हुए पाण्डवलोग बड़े हर्षके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ४ ॥
साक्षात् कुबेरेण कृताश्च तस्मिन् नगोत्तमे संवृतकूलरोधसः । कादम्बकारण्डवहंसजुष्टाः पद्माकुलाः पुष्करिणीरपश्यन् ॥ ५ ॥
उस श्रेष्ठ शैलपर साक्षात् भगवान् कुबेरने अनेक सुन्दर सरोवर बनवाये थे, जो कमल-समूहसे आच्छादित रहते थे। उनके जल शैवाल आदिसे ढके होते थे और उन सबमें हंस, कारण्डव आदि पक्षी सानन्द निवास करते थे। पाण्डवोंने उन सरोवरोंको देखा ॥ ५ ॥
क्रीडाप्रदेशांश्च समृद्धरूपान् सुचित्रमाल्यावृतजातशोभान् । मणिप्रकीर्णांश्च मनोरमांश्च यथा भवेयुर्धनदस्य राज्ञः ॥ ६ ॥
धनाध्यक्ष राजा कुबेरके लिये जैसे होने चाहिये, वैसे ही समृद्धिशाली क्रीडा-प्रदेश वहाँ बने हुए थे। विचित्र मालाओंसे समावृत होनेके कारण उनकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी। उनको मणि तथा रत्नोंसे अलंकृत किया गया था, जिससे वे क्रीड़ा-स्थल मनको मोहे लेते थे ॥
अनेकवर्णैश्च सुगन्धिभिश्च महाद्रुमैः संततमभ्रजालैः । तपःप्रधानाः सततं चरन्तः शृङ्गं गिरेर्श्चिन्तयितुं न शेकुः ॥ ७ ॥
अनेक वर्णवाले विशाल सुगन्धित वृक्षों तथा मेघसमूहोंसे व्याप्त उस पर्वतशिखरपर विचरते हुए सदा तपस्यामें ही संलग्न रहनेवाले पाण्डव उस पर्वतकी महत्ताका चिन्तन नहीं कर पाते थे ॥ ७ ॥
स्वतेजसा तस्य नगोत्तमस्य महौषधीनां च तथा प्रभावात् । विभक्तभावो न बभूव कश्चि- दहोनिशानां पुरुषप्रवीर ॥ ८ ॥
वीरवर जनमेजय! पर्वतराज गन्धमादनके अपने तेजसे तथा वहाँकी तेजस्विनी महौषधियोंके प्रभावसे वहाँ सदा प्रकाश व्याप्त रहनेके कारण दिन-रातका कोई विभाग नहीं हो पाता था ॥ ८ ॥
यमास्थितः स्थावरजङ्गमानि
विभावसुर्भावयतेऽमितौजाः । तस्योदयं चास्तमनं च वीरा- स्तत्र स्थितास्ते ददृशुर्नृसिंहाः ॥ ९ ॥ जिन भगवान् सूर्यका आश्रय लेकर अमित तेजस्वी अग्निदेव सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्राणियोंका पोषण करते हैं, उनके उदय और अस्तकी लीलाको पुरुषसिंह वीर पाण्डव वहाँ रहकर स्पष्ट देखते थे ॥ ९ ॥
रवेस्तमिस्रागमनिर्गमांस्ते तथोदयं चास्तमनं च वीराः । समावृताः प्रेक्ष्य तमोनुदस्य गभस्तिजालैः प्रदिशो दिशश्च ॥ १० ॥ स्वाध्यायवन्तः सततक्रियाश्च धर्मप्रधानाश्च शुचिव्रताश्च । सत्ये स्थितास्तस्य महारथस्य सत्यव्रतस्यागमनप्रतीक्षाः ॥ ११ ॥ वे वीर पाण्डव वहाँसे अन्धकारके आगमन और निर्गमनको अन्धकारविनाशक भगवान् सूर्यके उदय और अस्तकी लीलाको तथा उनके किरणसमूहोंसे व्याप्त हुई सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको देखकर स्वाध्यायमें संलग्न रहते थे। सदा शुभकर्मोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहकर प्रधानरूपसे धर्मका ही आश्रय लेते थे। उनका आचार-व्यवहार अत्यन्त पवित्र था। वे सत्यमें स्थित होकर सत्यव्रतपरायण महारथी अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते थे ॥ १०-११ ॥
इहैव हर्षोऽस्तु समागतानां क्षिप्रं कृतास्त्रेण धनंजयेन । इति ब्रुवन्तः परमाशिषस्ते पार्थास्तपोयोगपरा बभूवुः ॥ १२ ॥ ‘इस पर्वतपर आये हुए हम सब लोगोंको यहीं अस्त्रविद्या सीखकर पधारे हुए अर्जुनके दर्शनसे शीघ्र ही अत्यन्त हर्षकी प्राप्ति हो;’ इस प्रकार परस्पर शुभ-कामना प्रकट करते हुए वे सभी कुन्तीपुत्र तप और योगके साधनमें संलग्न रहते थे ॥ १२ ॥
दृष्ट्वा विचित्राणि गिरौ वनानि किरीटिनं चिन्तयतामभीक्ष्णम् । बभूव रात्रिर्दिवसश्च तेषां संवत्सरेणैव समानरूपः ॥ १३ ॥ उस पर्वतपर विचित्र वन-कुंजोंकी शोभा देखते और निरन्तर अर्जुनका चिन्तन करते हुए पाण्डवोंको एक दिन-रातका समय एक वर्षके समान प्रतीत होता था ॥ १३ ॥
यदैव धौम्यानुमते महात्मा कृत्वा जटां प्रव्रजितः स जिष्णुः। तदैव तेषां न बभूव हर्षः कुतो रतिस्तद्गतमानसानाम् ॥ १४ ॥ जबसे धौम्य मुनिकी आज्ञा लेकर महामना अर्जुन सिरपर जटा धारण करके तपस्याके लिये प्रस्थित हुए थे, तभीसे उन पाण्डवोंके मनमें रंचमात्र भी हर्ष नहीं रह गया था। उनका मन निरन्तर अर्जुनमें ही लगा रहता था। ऐसी दशामें उन्हें सुख कैसे प्राप्त हो सकता था? ॥ १४ ॥
भ्रातुर्नियोगात् तु युधिष्ठिरस्य वनादसौ वारणमत्तगामी। यत् काम्यकात् प्रव्रजितः स जिष्णु- स्तदैव ते शोकहता बभूवुः ॥ १५ ॥ गजराजके समान मस्तानी चालसे चलनेवाले वे अर्जुन जब बड़े भाई युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर काम्यक वनसे प्रस्थित हुए थे, तभी समस्त पाण्डव शोकसे पीड़ित हो गये थे ॥ १५ ॥
तथैव तं चिन्तयतां सिताश्व- मस्त्रार्थिनं वासवमभ्युपेतम्। मासोऽथ कृच्छ्रेण तदा व्यतीत- स्तस्मिन् नगे भारत भारतानाम् ॥ १६ ॥ जनमेजय! अस्त्रविद्याकी अभिलाषासे देवराज इन्द्रके समीप गये हुए श्वेतवाहन अर्जुनका चिन्तन करनेवाले पाण्डवोंका एक मास उस पर्वतपर बड़ी कठिनाईसे व्यतीत हुआ ॥ १६ ॥
उषित्वा पञ्च वर्षाणि सहस्राक्षनिवेशने। अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि विबुधेश्वरात् ॥ १७ ॥ आग्नेयं वारुणं सौम्यं वायव्यमथ वैष्णवम्। ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं पारमेष्ठ्यं प्रजापतेः ॥ १८ ॥ यमस्य धातुः सवितुस्त्वष्टुर्वैश्रवणस्य च। तानि प्राप्य सहस्राक्षादभिवाद्य शतक्रतुम् ॥ १९ ॥ अनुज्ञातस्तदा तेन कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। आगच्छदर्जुनः प्रीतः प्रहृष्टो गन्धमादनम् ॥ २० ॥ इधर अर्जुनने इन्द्र-भवनमें पाँच वर्ष रहकर देवेश्वर इन्द्रसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये। इस प्रकार अग्नि, वरुण, सोम, वायु, विष्णु, इन्द्र, पशुपति, ब्रह्मा, परमेष्ठी, प्रजापति, यम, धाता, सविता, त्वष्टा तथा कुबेरसम्बन्धी अस्त्रोंको भी देवेन्द्रसे ही प्राप्त करके उन्हें
प्रणाम किया। तदनन्तर उनसे अपने भाइयोंके पास लौटनेकी आज्ञा पाकर उनकी परिक्रमा करके अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए और हर्षोल्लासमें भरकर गन्धमादनपर आये ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि यक्षयुद्धपर्वण्यर्जुनाभिगमने चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत यक्षयुद्धपर्वमें अर्जुनाभिगमनविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥
(निवातकवचयुद्धपर्व)
(निवातकवचयुद्धपर्व)
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचिद्धरिसम्प्रयुक्तं
महेन्द्रवाहं सहसोपयातम् ।
विद्युत्प्रभं प्रेक्ष्य महारथानां
हर्षोऽर्जुनं चिन्तयतां बभूव ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर किसी समय हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ देवराज इन्द्रका रथ सहसा आकाशमें प्रकट हुआ, मानो बिजली चमक उठी हो। उसे देखकर अर्जुनका चिन्तन करते हुए महारथी पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १ ॥
स दीप्यमानः सहसान्तरिक्षं
प्रकाशयन् मातुलिसंगृहीतः ।
बभौ महोल्केव घनान्तरस्था
शिखेव चाग्नेर्ज्वलिता विधूमा ॥ २ ॥
उस रथका संचालन मातलि कर रहे थे। वह दीप्तिमान् रथ सहसा अन्तरिक्षलोकको प्रकाशित करता हुआ इस प्रकार सुशोभित होने लगा, मानो बादलोंके भीतर बड़ी भारी उल्का प्रकट हुई हो अथवा अग्निकी धूमरहित ज्वाला प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २ ॥
तमास्थितः संददृशे किरीटी
स्रग्वी नवान्याभरणानि बिभ्रत् ।
धनंजयो वज्रधरप्रभावः
श्रिया ज्वलन् पर्वतमाजगाम ॥ ३ ॥
उस दिव्य रथपर बैठे हुए किरीटधारी अर्जुन स्पष्ट दिखायी देने लगे। उनके कण्ठमें दिव्य हार शोभा पा रहा था और उन्होंने स्वर्गलोकके नूतन आभूषण धारण कर रखे थे। उस समय धनंजयका प्रभाव वज्रधारी इन्द्रके समान जान पड़ता था। वे अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होते हुए गन्धमादन पर्वतपर आ पहुँचे ॥ ३ ॥
स शैलमासाद्य किरीटमाली
महेन्द्रवाहादवरुह्य तस्मात् । धौम्यस्य पादावभिवाद्य धीमा- नजातशत्रोस्तदनन्तरं च ॥ ४ ॥ वृकोदरस्यापि च वन्द्यपादौ माद्रीसुताभ्यामभिवादितश्च । समेत्य कृष्णां परिसान्त्व्य चैनां प्रह्वोऽभवद् भ्रातुरुपह्वरे सः ॥ ५ ॥ पर्वतपर पहुँचकर बुद्धिमान् किरीटधारी अर्जुन देवराज इन्द्रके उस दिव्य रथसे उतर पड़े। उस समय सबसे पहले उन्होंने महर्षि धौम्यके दोनों चरणोंमें मस्तक झुकाया। तदनन्तर अजातशत्रु युधिष्ठिर तथा भीमसेनके चरणोंमें प्रणाम किया। इसके बाद नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया तत्पश्चात् द्रौपदीसे मिलकर अर्जुनने उसे बहुत आश्वासन दिया और अपने भाई युधिष्ठिरके समीप आकर वे विनीत भावसे खड़े हो गये ॥ ४-५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1123)
स्तेनाप्रमेयेण समागतानाम् । स चापि तान् प्रेक्ष्य किरीटमाली ननन्द राजानमभिप्रशंसन् ॥ ६ ॥ अप्रमेय वीर अर्जुनसे मिलकर सब पाण्डवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अर्जुन भी उन सबसे मिलकर बड़े प्रसन्न हुए तथा राजा युधिष्ठिरकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ ६ ॥
यमास्थितः सप्त जघान पूगान् दितेः सुतानां नमुचेर्निहन्ता । तमिन्द्रवाहं समुपेत्य पार्थाः प्रदक्षिणं चक्रुरदीनसत्त्वाः ॥ ७ ॥ नमुचिनाशक इन्द्रने जिसपर बैठकर दैत्योंके सात यूथोंका संहार किया था, उस इन्द्ररथके समीप जाकर उदार हृदयवाले कुन्तीपुत्रोंने उसकी परिक्रमा की ॥ ७ ॥
ते मातलेश्चक्रुरतीव हृष्टाः सत्कारमग्र्यं सुरराजतुल्यम् । सर्वान् यथावच्च दिवौकसस्ते पप्रच्छुरेनं कुरुराजपुत्राः ॥ ८ ॥ साथ ही, उन्होंने अत्यन्त हर्षमें भरकर मातलिके देवराज इन्द्रके समान सर्वोत्तम विधिसे सत्कार किया। इसके बाद उन पाण्डवोंने मातलिसे सम्पूर्ण देवताओंका यथावत् कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ ॥
तानप्यसौ मातलिरभ्यनन्दत् पितेव पुत्राननुशिष्य पार्थान् । ययौ रथेनाप्रतिमप्रभेण पुनः सकाशं त्रिदिवेश्वरस्य ॥ ९ ॥ मातलिने भी पाण्डवोंका अभिनन्दन किया और जैसे पिता पुत्रको उपदेश देता है, उसी प्रकार पाण्डवोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर वे पुनः अपने अनुपम कान्तिशाली रथके द्वारा स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्रके समीप चले गये ॥ ९ ॥
गते तु तस्मिन् नरदेववर्यः शक्रात्मजः शक्ररिपुप्रमाथी । (साक्षात् सहस्राक्ष इव प्रतीतः श्रीमान् स्वदेहादवमुच्य जिष्णुः ।) शक्रेण दत्तानि ददौ महात्मा महाधनान्युत्तमरूपवन्ति ॥ १० ॥ दिवाकराभाणि विभूषणानि प्रियः प्रियायै सुतसोममात्रे ।
मातलिके चले जानेपर इन्द्रशत्रुओंका संहार करनेवाले देवेन्द्रकुमार नृपश्रेष्ठ महात्मा श्रीमान् अर्जुनने, जो साक्षात् सहस्रलोचन इन्द्रके समान प्रतीत होते थे, अपने शरीरसे उतारकर इन्द्रके दिये हुए बहुमूल्य, उत्तम तथा सूर्यके समान देदीप्यमान दिव्य आभूषण अपनी प्रियतमा सुतसोमकी माता द्रौपदीको समर्पित कर दिये।।
ततः स तेषां कुरुपुङ्गवानां
तेषां च सूर्याग्निसमप्रभाणाम् ॥ ११ ॥
विप्रर्षभाणामुपविश्य मध्ये
सर्वं यथावत् कथयांबभूव ।
एवं मयास्त्राण्युपशिक्षितानि
शक्राच्च वाताच्च शिवाच्च साक्षात् ॥ १२ ॥
तदनन्तर उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवों तथा सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंके बीचमें बैठकर अर्जुनने अपना सब समाचार यथावत् रूपसे कह सुनाया। 'मैंने अमुक प्रकारसे इन्द्र, वायु और साक्षात् शिवसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है ॥ ११-१२ ॥
तथैव शीलेन समाधिनाथ
प्रीताः सुरा मे सहिताः सहेन्द्राः ।
संक्षेपतो वै स विशुद्धकर्मा
तेभ्यः समाख्याय दिवि प्रवासम् ॥ १३ ॥
माद्रीसुताभ्यां सहितः किरीटी
सुष्वाप तामावसतिं प्रतीतः ॥ १४ ॥
'मेरे शील-स्वभाव तथा चित्तकी एकाग्रतासे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मुझपर बहुत प्रसन्न रहते थे। निर्दोष कर्म करनेवाले अर्जुनने अपने स्वर्गीय प्रवासका सब समाचार उन सबको संक्षेपसे बताकर नकुल-सहदेवके साथ निश्चिन्त होकर उस आश्रममें शयन किया ॥ १३-१४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वण्यर्जुनसमागमे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अर्जुनसमागमविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर १४ १/२ श्लोक हैं)
१६६-
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना
वैशम्पायन उवाच
ततो रजन्यां व्युष्टायां धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैरवन्दत धनंजयः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर समस्त भाइयोंसहित अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु सर्ववादित्रनिःस्वनः ।
बभूव तुमुलः शब्दस्त्वन्तरिक्षे दिवौकसाम् ॥ २ ॥
इसी समय अन्तरिक्षमें देवताओंके सम्पूर्ण वाद्योंकी तुमुल ध्वनि गूँज उठी ॥ २ ॥
रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशब्दश्च भारत ।
पृथग् व्यालमृगाणां च पक्षिणामिव सर्वशः ॥ ३ ॥
भारत! रथके पहियोंकी घर्घराहट, घण्टानाद तथा सर्प, मृग एवं पक्षियोंके कोलाहल सब ओर पृथक्-पृथक् सुनायी दे रहे थे ॥ ३ ॥
(रवोन्मुखास्ते ददृशुः प्रीयमाणाः कुरूद्वहाः ।
मरुद्भिरन्वितं शक्रमापतन्तं विहायसा ॥)
ते समन्तादनुययुर्गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।
विमानैः सूर्यसंकाशैर्देवराजमरिंदमम् ॥ ४ ॥
पाण्डवोंने प्रसन्नतापूर्वक उस ध्वनिकी ओर आँख उठाकर देखा, तो उन्हें देवराज इन्द्र दृष्टिगोचर हुए जो सम्पूर्ण मरुद्गण आदि देवताओंके साथ आकाशमार्गसे आ रहे थे। गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा शत्रुदमन देवराजको चारों ओरसे घेरकर उन्हींके पथका अनुसरण कर रहे थे ॥ ४ ॥
ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ।
मेघनादिनमारुह्य श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ५ ॥
पार्थानभ्याजगामाथ देवराजः पुरंदरः ।
थोड़ी ही देरमें हरे रंगके घोड़ोंसे जुते हुए, मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले, जाम्बूनद नामक सुवर्णसे अलंकृत रथपर आरूढ़ देवराज इन्द्र पाण्डवोंके पास आ पहुँचे। उस समय वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे अत्यन्त उद्भासित हो रहे थे ॥ ५ १/२ ॥
आगत्य च सहस्राक्षो रथादववरोह वै ॥ ६ ॥
तं दृष्ट्वैव महात्मानं धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् देवराजमुपागमत् ॥ ७ ॥
निकट आनेपर सहस्रलोचन इन्द्र रथसे उतर गये। उन महामना देवराजको देखते ही भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर उनके पास गये ॥ ६-७ ॥ पूजयामास चैवाथ विधिवद् भूरिदक्षिणः । यथार्हममितात्मानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ८ ॥ यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर शास्त्रवर्णित पद्धतिसे अमितबुद्धि इन्द्रका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ॥ ८ ॥ धनंजयश्च तेजस्वी प्रणिपत्य पुरंदरम् । भृत्यवत् प्रणतस्तस्थौ देवराजसमीपतः ॥ ९ ॥ तेजस्वी अर्जुन भी इन्द्रको प्रणाम करके उनके समीप सेवककी भाँति विनीतभावसे खड़े हो गये ॥ ९ ॥ आप्यायत महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । धनंजयमभिप्रेक्ष्य विनीतं स्थितमन्तिके ॥ १० ॥ जटिलं देवराजस्य तपोयुक्तमकल्मषम् । हर्षेण महताऽऽविष्टः फाल्गुनस्याथ दर्शनात् ॥ ११ ॥
महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर अर्जुनको देवराजके समीप विनीतभावसे स्थित देख बड़े प्रसन्न हुए। अर्जुनके सिरपर जटा बँध गयी थी। वे देवराजके आदेशके अनुसार तपस्यामें लगे रहते थे; अतः सर्वथा निष्पाप हो गये थे। अर्जुनको देखनेसे उन्हें महान् हर्ष हुआ था ।। १०-११ ।।
वभूव परमप्रीतो देवराजं च पूजयन् ।
तं तथादीनमनसं राजानं हर्षसम्प्लुतम् ।। १२ ।।
उवाच वचनं धीमान् देवराजः पुरंदरः ।
त्वमिमां पृथिवीं राजन् प्रशासिष्यसि पाण्डव ।
स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय काम्यकं पुनराश्रमम् ।। १३ ।।
अतः देवराजका पूजन करके वे बड़े प्रसन्न हुए। उदारचित्त राजा युधिष्ठिरको इस प्रकार हर्षमें मग्न देखकर परम बुद्धिमान् देवराज इन्द्रने कहा—पाण्डुनन्दन! तुम इस पृथ्वीका शासन करोगे। कुन्तीकुमार! अब तुम पुनः काम्यक वनके कल्याणकारी आश्रममें चले जाओ ।। १२-१३ ।।
अस्त्राणि लब्धानि च पाण्डवेन
सर्वाणि मत्तः प्रयतेन राजन् ।
कृतप्रियश्चास्मि धनंजयेन
जेतुं न शक्यस्त्रिभिरेष लोकैः ।। १४ ।।
‘राजन्! पाण्डुनन्दन अर्जुनने एकाग्रचित्त होकर मुझसे सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये हैं। साथ ही इन्होंने मेरा बड़ा प्रिय कार्य सम्पन्न किया है। तीनों लोकोंके समस्त प्राणी इन्हें युद्धमें परास्त नहीं कर सकते’ ।। १४ ।।
एवमुक्त्वा सहस्राक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
जगाम त्रिदिवं हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर इन्द्र महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सानन्द स्वर्गलोकको चले गये ।। १५ ।।
धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् ।
शक्रेण य इदं विद्वानधीयीत समाहितः ।। १६ ।।
संवत्सरं ब्रह्मचारी नियतः संशितव्रतः ।
स जीवेद्धि निराबाधः स सुखी शरदां शतम् ।। १७ ।।
धनाध्यक्ष कुबेरके घरमें टिके हुए पाण्डवोंका जो इन्द्रके साथ समागम हुआ था, उस प्रसंगको जो विद्वान् एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन पढ़ता है और संयम-नियमसे रहकर कठोर व्रतका आश्रय ले एक वर्षतक ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह सब प्रकारकी बाधाओंसे रहित हो सौ वर्षोंतक सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि इन्द्रागमने
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें इन्द्रागमनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोक हैं)
अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा
वैशम्पायन उवाच
यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह सङ्गतः ।
कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवराज इन्द्रके चले जानेपर भाइयों तथा द्रौपदीके साथ मिलकर अर्जुनने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥
अभिवादयमानं तं मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ।
हर्षगद्गदया वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनको प्रणाम करते देख युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए एवं उनका मस्तक सूँघकर हर्षगद्गद-वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
कथमर्जुन कालोऽयं स्वर्गे व्यतिगतस्तव ।
कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
'अर्जुन! स्वर्गमें तुम्हारा यह समय किस प्रकार बीता? कैसे तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त किये और कैसे देवराज इन्द्रको संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥
सम्यग् वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव ।
कच्चित् सुराधिपः प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात् तव ॥ ४ ॥
'पाण्डुनन्दन! क्या तुमने सभी अस्त्र अच्छी तरह सीख लिये? क्या देवराज इन्द्र अथवा भगवान् रुद्रने प्रसन्न होकर तुम्हें अस्त्र प्रदान किये हैं? ॥ ४ ॥
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक् ।
यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्च ते ॥ ५ ॥
यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम ।
कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम् ॥ ६ ॥
'शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान् शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ। भगवान् इन्द्रने अभी-अभी कहा था कि 'अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है' सो वह उनका कौन-सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है ॥ ५-६ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महाद्युते ।
यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ ॥ ७ ॥
यच्चापि वज्रपाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम ।
एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय ॥ ८ ॥
‘महातेजस्वी वीर! मैं ये सब बातें विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। शत्रुओंका दमन करनेवाले निष्पाप अर्जुन! जिस प्रकार तुम्हारे ऊपर महादेवजी तथा देवराज इन्द्र संतुष्ट हुए और वज्रधारी इन्द्रका जो प्रिय कार्य तुमने सम्पन्न किया है, वह सब पूर्णरूपसे बताओ’ ॥ ७-८ ॥
अर्जुन उवाच
शृणु हन्त महाराज विधिना येन दृष्टवान् ।
शतक्रतुमहं देवं भगवन्तं च शङ्करम् ॥ ९ ॥
विद्यामधीत्य तां राजंस्त्वयोक्तामरिमर्दन ।
भवता च समादिष्टस्तपसे प्रस्थितो वनम् ॥ १० ॥
अर्जुन बोले— महाराज! मैंने जिस विधिसे देवराज इन्द्र तथा भगवान् शंकरका दर्शन किया था, वह सब बतलाता हूँ, सुनिये! शत्रुओंका मर्दन करनेवाले नरेश! आपकी बतायी हुई विद्याको ग्रहण करके आपहीके आदेशसे मैं तपस्या करनेके लिये वनकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ ९-१० ॥
भृगुतुङ्गमथो गत्वा काम्यकादास्थितस्तपः ।
एकरात्रोषितः कञ्चिदपश्यं ब्राह्मणं पथि ॥ ११ ॥
काम्यक वनसे चलकर तपस्यामें पूरी आशा रखकर मैं भृगुतुंग पर्वतपर पहुँचा और वहाँ एक रात रहकर जब आगे बढ़ा, तब मार्गमें किसी ब्राह्मणदेवताका मुझे दर्शन हुआ ॥ ११ ॥
स मामपृच्छत् कौन्तेय क्वासि गन्ता ब्रवीहि मे ।
तस्मा अवितथं सर्वमब्रुवं कुरुनन्दन ॥ १२ ॥
उन्होंने मुझसे कहा—‘कुन्तीनन्दन! कहाँ जाते हो? मुझे ठीक-ठीक बताओ।’ तब मैंने उनसे सब कुछ सच-सच बता दिया ॥ १२ ॥
स तथ्यं मम तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो राजसत्तम ।
अपूजयत मां राजन् प्रीतिमांश्चाभवन्मयि ॥ १३ ॥
नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मणदेवताने मेरी यथार्थ बातें सुनकर मेरी प्रशंसा की और मुझपर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १३ ॥
ततो मामब्रवीत् प्रीतस्तप आतिष्ठ भारत ।
तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विबुधाधिपम् ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक कहा—'भारत! तुम तपस्याका आश्रय लो! तपमें प्रवृत्त होनेपर तुम्हें शीघ्र ही देवराज इन्द्रका दर्शन होगा' ।। १४ ।। ततोऽहं वचनात् तस्य गिरिमारुह्य शैशिरम् । तपोऽतप्यं महाराज मासं मूलफलाशनः ।। १५ ।। महाराज! उनके इस आदेशको मानकर मैं हिमालय पर्वतपर आरूढ़ हो तपस्यामें संलग्न हो गया और एक मासतक केवल फल-फूल खाकर रहा ।। १५ ।। द्वितीयश्चापि मे मासो जलं भक्षयतो गतः । निराहारस्तृतीयेऽथ मासे पाण्डवनन्दन ।। १६ ।। ऊर्ध्वबाहुश्चतुर्थं तु मासमस्मि स्थितस्तदा । न च मे हीयते प्राणस्तदद्भुतमिवाभवत् ।। १७ ।। इसी प्रकार मैंने दूसरा महीना भी केवल जल पीकर बिताया। पाण्डवनन्दन! तीसरे महीनेमें मैं पूर्णतः निराहार रहा। चौथे महीनेमें मैं ऊपरको हाथ उठाये खड़ा रहा। इतनेपर भी मेरा बल क्षीण नहीं हुआ, यह एक आश्चर्यकी-सी बात हुई ।। १६-१७ ।। पञ्चमे त्वथ सम्प्राप्ते प्रथमे दिवसे गते । वराहसंस्थितं भूतं मत्समीपं समागमत् ।। १८ ।। पाँचवाँ महीना प्रारम्भ होनेपर जब एक दिन बीत गया तब दूसरे दिन एक शूकररूपधारी जीव मेरे निकट आया ।। १८ ।। निघ्नन् प्रोथेन पृथिवीं विलिखंश्चरणैरपि । सम्मार्जञ्जठरेणोर्वीं विवर्तंश्च मुहुर्मुहुः ।। १९ ।। वह अपनी थूथुनसे पृथ्वीपर चोट करता और पैरोंसे धरती खोदता था। बार-बार लेटकर वह अपने पेटसे वहाँकी भूमिको ऐसा स्वच्छ कर देता था, मानो उसपर झाड़ दिया गया हो ।। १९ ।। अनु तस्यापरं भूतं महत् कैरातसंस्थितम् । धनुर्बाणासिमत् प्राप्तं स्त्रीगणानुगतं तदा ।। २० ।। उसके पीछे किरात-जैसी आकृतिमें एक महान् पुरुषका दर्शन हुआ। उसने धनुष-बाण और खड्ग ले रखे थे। उसके साथ स्त्रियोंका एक समुदाय भी था ।। २० ।। ततोऽहं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी । अताडयं शरेणाथ तद् भूतं लोमहर्षणम् ।। २१ ।। तब मैंने धनुष तथा अक्षय तरकस लेकर एक बाणके द्वारा उस रोमांचकारी सूकरपर आघात किया ।। युगपत् तं किरातस्तु विकृष्य बलवद् धनुः । अभ्याजघ्ने दृढतरं कम्पयन्निव मे मनः ।। २२ ।।
साथ ही किरातने भी अपने सुदृढ़ धनुषको खींचकर उसपर गहरी चोटकी, जिससे मेरा हृदय कम्पित-सा हो उठा ॥ २२ ॥
स तु मामब्रवीद् राजन् मम पूर्वपरिग्रहः ।
मृगयाधर्ममुत्सृज्य किमर्थं ताडितस्त्वया ॥ २३ ॥
राजन्! फिर वह किरात मुझसे बोला—'यह सूअर तो पहले मेरा निशाना बन चुका था, फिर तुमने आखेटके नियमको छोड़कर उसपर प्रहार क्यों किया?' ॥ २३ ॥
एष ते निशितैर्बाणैर्दर्पं हन्मि स्थिरो भव ।
स धनुष्मान् महाकायस्ततो मामभ्यभाषत ॥ २४ ॥
इतना ही नहीं उस विशालकाय एवं धनुर्धर किरातने उस समय मुझसे यह भी कहा—'अच्छा, ठहर जाओ। मैं अपने पैने बाणोंसे अभी तुम्हारा घमंड चूर-चूर किये देता हूँ' ॥ २४ ॥
ततो गिरिमिवात्यर्थमावृणोन्मां महाशरैः ।
तं चाहं शरवर्षेण महता समवाकिरम् ॥ २५ ॥
ऐसा कहकर उस भीलने जैसे पर्वतपर वर्षा हो, उस प्रकार महान् बाणोंकी बौछार करके मुझे सब ओरसे ढक दिया; तब मैंने भी भारी बाणवर्षा करके उसे सब ओरसे आच्छादित कर दिया ॥ २५ ॥
ततः शरैर्दीप्तमुखैर्यन्त्रितैरनुमन्त्रितैः ।
प्रत्यविध्यमहं तं तु वज्रैरिव शिलोच्चयम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर जैसे वज्रसे पर्वतपर आघात किया जाय, उसी प्रकार प्रज्वलित मुखवाले अभिमन्त्रित और खूब खींचकर छोड़े हुए बाणोंद्वारा मैंने उसे बार-बार घायल किया ॥ २६ ॥
तस्य तच्छतधा रूपमभवच्च सहस्रधा ।
तानि चास्य शरीराणि शरैरहमताडयम् ॥ २७ ॥
उस समय उसके सैकड़ों और सहस्रों रूप प्रकट हुए और मैंने उसके सभी शरीरोंपर बाणोंसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ २७ ॥
पुनस्तानि शरीराणि एकीभूतानि भारत ।
अदृश्यन्त महाराज तान्यहं व्यधमं पुनः ॥ २८ ॥
भारत! फिर उसके वे सारे शरीर एकरूप दिखायी दिये। महाराज! उस एकरूपमें भी मैंने उसे पुनः अच्छी तरह घायल किया ॥ २८ ॥
अणुर्बृहच्छिरा भूत्वा बृहच्चाणुशिराः पुनः ।
एकीभूतस्तदा राजन् सोऽभ्यवर्तत मां युधि ॥ २९ ॥
यदाभिभवितुं बाणैर्न च शक्नोमि तं रणे ।
ततो महास्त्रमातिष्ठं वायव्यं भरतर्षभ ॥ ३० ॥