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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग। अतः शिष्यो! पाण्डवोंसे बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो ॥ ३२—३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तास्ते द्विजाः सर्वे मुनिना गुरुणा तदा । पाण्डवेभ्यो भृशं भीता दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ ३६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गुरु दुर्वासा मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण पाण्डवोंसे अत्यन्त भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३६ ॥

सहदेवो देवनद्यामपश्यन् मुनिसत्तमान् । तीर्थेष्वितस्ततस्तस्या विचचार गवेषयन् ॥ ३७ ॥ सहदेवने जब देवनदीमें उन श्रेष्ठ मुनियोंको नहीं देखा, तब वे वहाँके तीर्थोंमें इधर-उधर खोजते हुए विचरने लगे ॥ ३७ ॥

तत्रस्थेभ्यस्तापसेभ्यः श्रुत्वा तांश्चैव विद्रुतान् । युधिष्ठिरमथाभ्येत्य तं वृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥ वहाँ रहनेवाले तपस्वी मुनियोंके मुखसे उनके भागनेका समाचार सुनकर सहदेव युधिष्ठिरके पास लौट आये और सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दिया ॥ ३८ ॥

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे प्रत्यागमनकाङ्क्षिणः । प्रतीक्षन्तः कियत्कालं जितात्मानोऽवतस्थिरे ॥ ३९ ॥ तदनन्तर मनको वशमें करनेवाले सब पाण्डव उनके लौट आनेकी आशासे कुछ देरतक उनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३९ ॥

निशीथेऽभ्येत्य चाकस्मादस्मान् स छलयिष्यति । कथं च निस्तरे मास्मात् कृच्छ्राद् दैवोपसादितात् ॥ ४० ॥ इति चिन्तापरान् दृष्ट्वा निःश्वसन्तो मुहुर्मुहुः । उवाच वचनं श्रीमान् कृष्णः प्रत्यक्षतां गतः ॥ ४१ ॥ पाण्डव सोचने लगे—‘दुर्वासा मुनि अकस्मात् आधी रातको आकर हमें छलेंगे। दैववश प्राप्त हुए इस महान् संकटसे हमारा उद्धार कैसे होगा?’ इसी चिन्तामें पड़कर वे बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर आदि अन्य सब पाण्डवोंको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ॥ ४०-४१ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

भवतामापदं ज्ञात्वा ऋषेः परमकोपनात् । द्रौपद्या चिन्तितः पार्था अहं सत्वरमागतः ॥ ४२ ॥ न भयं विद्यते तस्मादृषेर्दुर्वाससोऽल्पकम् । तेजसा भवतां भीतः पूर्वमेव पलायितः ॥ ४३ ॥

श्रीकृष्ण बोले— कुन्तीकुमारो! परम क्रोधी महर्षि दुर्वासासे आपलोगोंपर संकट आता जानकर द्रौपदीने मेरा स्मरण किया था, इसीलिये मैं तुरंत यहाँ आ पहुँचा। अब आपलोगोंको दुर्वासा मुनिसे तनिक भी भय नहीं है। वे आपके तेजसे डरकर पहले ही भाग गये हैं॥

धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित्।
आपृच्छे वो गमिष्यामि नियतं भद्रमस्तु वः॥ ४४॥
जो लोग सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे कभी कष्टमें नहीं पड़ते। अब मैं आपलोगोंसे जानेके लिये आज्ञा चाहता हूँ। यहाँसे द्वारकापुरीको जाऊँगा। आपलोगोंका निरन्तर कल्याण हो॥ ४४॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वैरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः।
द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः॥ ४५॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो।
तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे॥ ४६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर द्रौपदीसहित पाण्डवोंका चित्त स्वस्थ हुआ। उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे भगवान्‌से इस प्रकार बोले—‘विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक और संरक्षक पाकर हम बड़ी-बड़ी दुस्तर विपत्तियोंसे उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्य जहाजका सहारा पाकर पार हो जाते हैं॥ ४५-४६॥

स्वस्ति साधय भद्रं ते इत्याज्ञातो ययौ पुरीम्।
‘तुम्हारा कल्याण हो। इसी प्रकार भक्तोंका हित-साधन किया करो।’ पाण्डवोंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको चले गये॥ ४६½॥

पाण्डवाश्च महाभाग द्रौपद्या सहिताः प्रभो॥ ४७॥
ऊषुः प्रहृष्टमनसो विहरन्तो वनाद् वनम्।
महाभाग जनमेजय! तत्पश्चात् द्रौपदीसहित पाण्डव प्रसन्नचित्त हो वहाँ एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते हुए सुखसे रहने लगे॥ ४७½॥

इति तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया॥ ४८॥
एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः।
पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाभवन्॥ ४९॥
राजन्! यहाँ तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया। इस प्रकार दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने वनवासी पाण्डवोंपर अनेक बार छल-कपटका प्रयोग किया, परंतु वह सब व्यर्थ हो गया॥ ४८-४९॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने
त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाकी कथाविषयक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६३ ॥

२६४-

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चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन् बहुमृगेऽरण्ये अटमाना महारथाः।
काम्यके भरतश्रेष्ठा विजह्रुस्ते यथामराः॥ १॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! काम्यकवनमें नाना प्रकारके वन्य पशु रहते थे। वहाँ भरतकुलभूषण महारथी पाण्डव सब ओर घूमते हुए देवताओंके समान विहार करते थे॥ १॥

प्रेक्षमाणा बहुविधान् वनोद्देशान् समन्ततः।
यथर्तुकालरम्याश्च वनराजीः सुपुष्पिताः॥ २॥
वे चारों ओर घूम-घूमकर नाना प्रकारके वन्य प्रदेशों तथा ऋतुकालके अनुसार भलीभाँति खिले हुए फूलोंसे सुशोभित रमणीय वनश्रेणियोंकी शोभा देखते थे॥ २॥

पाण्डवा मृगयाशीलाश्चरन्तस्तन्महद् वनम्।
विजह्रुरिन्द्रप्रतिमाः कञ्चित् कालमरिंदम॥ ३॥
शत्रुदमन जनमेजय! पाण्डवलोग बाघ-चीते आदि हिंसक पशुओंका शिकार किया करते थे। देवराज इन्द्रके समान वे उस महान् वनमें विचरते हुए कुछ कालतक विहार करते रहे॥ ३॥

ततस्ते यौगपद्येन ययुः सर्वे चतुर्दिशम्।
मृगयां पुरुषव्याघ्रा ब्राह्मणार्थे परंतपाः॥ ४॥
द्रौपदीमाश्रमे न्यस्य तृणबिन्दोरनुज्ञया।
महर्षेर्दीप्ततपसो धौम्यस्य च पुरोधसः॥ ५॥
एक दिनकी बात है, शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह पाँचों पाण्डव उद्दीप्त तपस्वी पुरोहित धौम्य तथा महर्षि तृणबिन्दुकी आज्ञासे द्रौपदीको अकेली ही आश्रममें रखकर ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये हिंसक पशुओं-को मारने एक साथ चारों दिशाओंमें (अलग-अलग) चले गये॥ ४-५॥

ततस्तु राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्महायशाः।
विवाहकामः शाल्वेयान् प्रयातः सोऽभवत् तदा॥ ६॥
महता परिबर्हेण राजयोग्येन संवृतः।
राजभिर्बहुभिः सार्धमुपायात् काम्यकं च सः॥ ७॥

उसी समय सिंधुदेशका महायशस्वी राजा जयद्रथ, जो वृद्धक्षत्रका पुत्र था, विवाहकी इच्छासे शाल्वदेशकी ओर जा रहा था। वह बहुमूल्य राजोचित ठाट-बाटसे सुसज्जित था। अनेक राजाओंके साथ यात्रा करता हुआ वह काम्यकवनमें आ पहुँचा ।। ६-७ ।। तत्रापश्यत् प्रियां भार्या पाण्डवानां यशस्विनीम् । तिष्ठन्तीमाश्रमद्वारे द्रौपदीं निर्जने वने ॥ ८ ॥ वहाँ उसने पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदीको दूरसे देखा, जो निर्जन वनमें अपने आश्रमके दरवाजेपर खड़ी थी ।। ८ ।। विभ्राजमानां वपुषा बिभ्रतीं रूपमुत्तमम् । भ्राजयन्तीं वनोद्देशं नीलाभ्रमिव विद्युसम् ॥ ९ ॥ वह परम सुन्दर रूप धारण किये अपनी अनुपम कान्तिसे उद्भासित हो रही थी और जैसे विद्युत् अपनी प्रभासे नीले मेघसमूहको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार वह सुन्दरी अपनी अङ्गच्छटासे उस वनप्रान्तको सब ओरसे देदीप्यमान कर रही थी ।। ९ ।। अप्सरा देवकन्या वा माया वा देवनिर्मिता । इति कृत्वाञ्जलिं सर्वे ददृशुस्तामनिन्दिताम् ॥ १० ॥ जयद्रथ और उसके सभी साथियोंने उस अनिन्द्य सुन्दरीकी ओर देखा और वे हाथ जोड़कर मन-ही-मन यह विचार करने लगे—'यह कोई अप्सरा है या देवकन्या अथवा देवताओंकी रची हुई माया है?' ।। १० ।। ततः स राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिजर्यद्रथः । विस्मितस्त्वनवद्याङ्गीं दृष्ट्वा तां दुष्टमानसः ॥ ११ ॥ निर्दोष अंगोंवाली उस सुन्दरीको देखकर वृद्धक्षत्र-कुमार सिन्धुराज जयद्रथ चकित रह गया। उसके मनमें दूषित भावनाका उदय हुआ ।। ११ ।। स कोटिकास्यं राजानमब्रवीत् काममोहितः । कस्य त्वेषानवद्याङ्गी यदि वापि न मानुषी ॥ १२ ॥ उसने काममोहित होकर राजा कोटिकास्यसे कहा—'कोटिक! जरा जाकर पता तो लगाओ, यह सर्वांगसुन्दरी किसकी स्त्री है? अथवा यह मनुष्यजातिकी स्त्री है भी या नहीं? ।। १२ ।। विवाहार्थो न मे कश्चिदिमां प्राप्यातिसुन्दरीम् । एतामेवाहमादाय गमिष्यामि स्वमालयम् ॥ १३ ॥ 'इस अत्यन्त सुन्दरी रमणीको पाकर मुझे और किसीसे विवाह करनेकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी। इसीको लेकर मैं अपने घर लौट जाऊँगा ।। १३ ।। गच्छ जानीहि सौम्येमां कस्य वात्र कुतोऽपि वा । किमर्थमागता सुभ्रूरिदं कण्टकितं वनम् ॥ १४ ॥

‘सौम्य! जाओ, पता लगाओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे इस वनमें आयी है? यह सुन्दर भौंहोंवाली युवती काँटोंसे भरे हुए इस जंगलमें किसलिये आयी है? ।। १४ ।।
अपि नाम वरारोहा मामेषा लोकसुन्दरी ।
भजेद्द्यायतापाङ्गी सुदती तनुमध्यमा ॥ १५ ॥
‘क्या यह मनोहर कटिप्रदेशवाली विश्वसुन्दरी मुझे अंगीकार करेगी? इसके नेत्रप्रान्त कितने विशाल हैं, दाँत कैसे सुन्दर हैं और शरीरका मध्यभाग कितना सूक्ष्म है? ।। १५ ।।
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्त्रियम् ।
गच्छ जानीहि को न्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ॥ १६ ॥
स कोटिकास्यस्तच्छ्रुत्वा रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली ।
उपेत्य पप्रच्छ तदा क्रोष्टा व्याघ्रवधूमिव ॥ १७ ॥
‘यदि मैं इस सुन्दरीको पा जाऊँ तो कृतार्थ हो जाऊँगा। कोटिक! जाओ और पता लगाओ कि इसका पति कौन है?’ जयद्रथका यह वचन सुनकर कुण्डलमण्डित कोटिकास्य रथसे उतर पड़ा और जैसे गीदड़ बाघकी स्त्रीसे बात करे, उसी प्रकार उसने द्रौपदीके पास जाकर पूछा ।। १६-१७ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथागमने चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथका आगमनविषयक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६४ ।।

२६५-

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पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना

कोटि क उवाच

का त्वं कदम्बस्य विनाम्य शाखा-
मेकाऽऽश्रमे तिष्ठसि शोभमाना।
देदीप्यमानाग्निशिखेव नक्तं
व्याधूयमाना पवनेन सुभ्रूः॥ १ ॥

कोटिक बोला—सुन्दर भौंहोंवाली सुन्दरी! तुम कौन हो? जो कदम्बकी डाली झुकाकर उसके सहारे इस आश्रममें अकेली खड़ी हो, यहाँ तुम्हारी बड़ी शोभा हो रही है। जैसे रातमें वायुसे आन्दोलित अग्निकी ज्वाला देदीप्यमान दिखायी देती है, उसी प्रकार तुम भी इस आश्रममें अपनी प्रभा बिखेर रही हो॥ १ ॥

अतीव रूपेण समन्विता त्वं
न चाप्यरण्येषु बिभेषि किं नु।
देवी नु यक्षी यदि दानवी वा
वराप्सरा दैत्यवराङ्गना वा॥ २ ॥

तुम बड़ी रूपवती हो। क्या इन जंगलोंमें भी तुम्हें डर नहीं लगता है? तुम किसी देवता, यक्ष, दानव अथवा दैत्यकी स्त्री तो नहीं हो या कोई श्रेष्ठ अप्सरा हो?॥ २ ॥

वपुष्मती वोरगराजकन्या
वनेचरी वा क्षणदाचरस्त्री।
यद्येव राज्ञो वरुणस्य पत्नी
यमस्य सोमस्य धनेश्वरस्य॥ ३ ॥

क्या तुम दिव्यरूप धारण करनेवाली नागराजकुमारी हो अथवा वनमें विचरनेवाली किसी राक्षसकी पत्नी हो अथवा राजा वरुण, यमराज, चन्द्रमा एवं धनाध्यक्ष कुबेर—इनमेंसे किसीकी पत्नी हो?॥ ३ ॥

धातुर्विधातुः सवितुर्विभोर्वा
शक्रस्य वा त्वं सदनात् प्रपन्ना।
न ह्येव नः पृच्छसि ये वयं स्म
न चापि जानीम तवेह नाथम्॥ ४ ॥

अथवा तुम धाता, विधाता, सविता, विभु या इन्द्रके भवनसे यहाँ आयी हो? न तो तुम्हीं हमारा परिचय पूछती हो और न हम ही यहाँ तुम्हारे पतिके विषयमें जानते हैं॥

वयं हि मानं तव वर्धयन्तः
पृच्छाम भद्रे प्रभवं प्रभुं च।
आचक्ष्व बन्धूंश्च पतिं कुलं च
तत्त्वेन यच्चेह करोषि कार्यम्॥ ५॥

भद्रे! हम तुम्हारा सम्मान बढ़ाते हुए तुम्हारे पिता और पतिका परिचय पूछ रहे हैं। तुम अपने बन्धु-बान्धव, पति और कुलका यथार्थ परिचय दो और यह भी बताओ कि तुम यहाँ कौन-सा कार्य करती हो?॥

अहं तु राज्ञः सुरथस्य पुत्रो
यं कोटिकास्येति विदुर्मनुष्याः।
असौ तु यस्तिष्ठति काञ्चनाङ्गे
रथे हुतोऽग्निश्चयने यथैव॥ ६॥
त्रिगर्तराजः कमলায়ताक्षि
क्षेमङ्करो नाम स एष वीरः।

कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदी! मैं राजा सुरथका पुत्र हूँ, जिसे साधारण जनता कोटिकास्यके नामसे जानती है और वे जो सुवर्णमय रथमें बैठे हैं तथा वेदीपर स्थापित एवं घीकी आहुति पड़नेसे प्रज्वलित हुए अग्निके समान प्रकाशित हो रहे हैं, त्रिगर्तदेशके राजा हैं। ये वीर क्षेमंकरके नामसे प्रसिद्ध हैं॥ ६ १/२॥

अस्मात् परस्त्वेष महाधनुष्मान्
पुत्रः कुलिन्दाधिपतेर्वरिष्ठः॥ ७॥
निरीक्षते त्वां विपुलायताक्षः
सुपुष्पितः पर्वतवासनित्यः।

इनके बाद जो ये महान् धनुष धारण किये सुन्दर फूलोंकी मालाएँ पहने विशाल नेत्रोंवाले वीर तुम्हें निहार रहे हैं, कुलिन्दराजके ज्येष्ठ पुत्र हैं। वे सदा पर्वतपर ही निवास करते हैं॥ ७ १/२॥

असौ तु यः पुष्करिणीसमीपे
श्यामो युवा तिष्ठति दर्शनीयः॥ ८॥
इक्ष्वाकुराज्ञः सुबलस्य पुत्रः
स एव हन्ता द्विषतां सुगात्रि।

सुन्दराङ्गि! और वे जो पुष्करिणीके समीप श्यामवर्णके दर्शनीय नवयुवक खड़े हैं, इक्ष्वाकुवंशी राजा सुबलके पुत्र हैं। ये अकेले ही अपने शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं॥ ८ १/२॥

यस्यानुचक्रं ध्वजिनः प्रयान्ति सौवीरका द्वादश राजपुत्राः ॥ ९ ॥ शोणाश्वयुक्तेषु रधेषु सर्वे मखेषु दीप्ता इव हव्यवाहाः । अङ्गारकः कुञ्जरो गुप्तकश्च शत्रुञ्जयः संजयसुप्रवृद्धौ ॥ १० ॥ भयंकरोऽथ भ्रमरो रविश्च शूरः प्रतापः कुहनश्च नाम । यं षट् सहस्रा रथिनोऽनुयान्ति नागा हयाश्चैव पदातिनश्च ॥ ११ ॥ जयद्रथो नाम यदि श्रुतस्ते सौवीरराजः सुभगे स एषः । लाल रंगके घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर बैठकर यज्ञोंमें प्रज्वलित अग्निके समान सुशोभित होनेवाले अंगारक, कुञ्जर, गुप्तक, शत्रुञ्जय, संजय, सुप्रवृद्ध, भयंकर, भ्रमर, रवि, शूर, प्रताप तथा कुहन—सौवीरदेशके ये बारह राजकुमार जिनके रथके पीछे हाथमें ध्वजा लिये चलते हैं तथा छः हजार रथी, हाथी, घोड़े और पैदल जिनका अनुगमन करते हैं, उन सौवीरराज जयद्रथका नाम तुमने सुना होगा। सौभाग्यशालिनि! ये वे ही राजा जयद्रथ दिखायी दे रहे हैं ॥ ९—११ १/२ ॥

तस्यापरे भ्रातरोऽदीनसत्त्वा बलाहकानीकविदारणाद्याः ॥ १२ ॥ उनके दूसरे उदार हृदयवाले भाई बलाहक और अनीक—विदारण आदि भी उनके साथ हैं ॥ १२ ॥

सौवीरवीराः प्रवरा युवानो राजानमेते बलिनोऽनुयान्ति । एतैः सहायैरुपयाति राजा मरुद्गणैरिन्द्र इवाभिगुप्तः ॥ १३ ॥ सौवीरदेशके ये प्रमुख बलवान् नवयुवक वीर सदा राजा जयद्रथके साथ चलते हैं। राजा जयद्रथ इन सहायकोंसे सुरक्षित हो मरुद्गणोंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रकी भाँति यात्रा करते हैं ॥ १३ ॥

अजानतां ख्यापय नः सुकेशि कस्यासि भार्या दुहिता च कस्य ॥ १४ ॥ सुकेशि! हम तुमसे सर्वथा अनजान हैं, अतः हमें भी अपना परिचय दो; तुम किसकी पत्नी और किसकी पुत्री हो? ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि कोटिकास्यप्रश्ने पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें कोटिकास्यका प्रश्नविषयक दो सौ पैसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६५ ॥

२६६-

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षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर

वैशम्पायन उवाच

अथाब्रवीद् द्रौपदी राजपुत्री
 पृष्टा शिबीनां प्रवरेण तेन ।
अवेक्ष्य मन्दं प्रविमुच्य शाखां
 संगृह्णती कौशिकमुत्तरीयम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शिबिदेशके प्रमुख वीर कोटिकास्यके इस प्रकार पूछनेपर राजकुमारी द्रौपदी कदम्बकी वह डाली छोड़कर अपनी रेशमी ओढ़नीको सँभालती हुई संकोचपूर्वक उसकी ओर देखकर बोली— ॥ १ ॥

बुद्ध्याभिजानामि नरेन्द्रपुत्र
 न मादृशी त्वामभिभाषितुमर्हति ।
न त्वेह वक्तास्ति तवेह वाक्य-
 मन्यो नरो वाप्यथवापि नारी ॥ २ ॥
‘राजकुमार! मैं बुद्धिसे सोच-विचारकर भलीभाँति समझती हूँ कि मुझ-जैसी पतिपरायणा स्त्रीको तुम-जैसे पर पुरुषसे वार्तालाप नहीं करना चाहिये; परंतु यहाँ कोई दूसरा ऐसा पुरुष अथवा स्त्री नहीं है जो तुम्हारी बातका उत्तर दे सके ॥ २ ॥

एका ह्यहं सम्प्रति तेन वाचं
 ददामि वै भद्र निबोध चेदम् ।
अहं ह्यरण्ये कथमेकमेका
 त्वामालपेयं निरता स्वधर्मे ॥ ३ ॥
‘मैं इस समय यहाँ अकेली ही हूँ। इसलिये विवश होकर तुमसे बोलना पड़ रहा है। भद्रपुरुष! मेरी इस बातपर ध्यान दो। मैं अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहनेवाली हूँ। इस समय इस वनमें मैं अकेली हूँ और तुम भी अकेले पुरुष हो, ऐसी दशामें मैं तुम्हारे साथ कैसे वार्तालाप कर सकती हूँ? ॥ ३ ॥

जानामि च त्वां सुरथस्य पुत्रं
 यं कोटिकास्येति विदुर्मनुष्याः ।
तस्मादहं शैब्य तथैव तुभ्य-
 माख्यामि बन्धून् प्रथितं कुलं च ॥ ४ ॥
‘परंतु मैं तुम्हें पहचानती हूँ, तुम राजा सुरथके पुत्र हो, जिसे लोग कोटिकास्यके नामसे जानते हैं। शैब्य! इसीलिये मैं तुम्हें अपने बन्धुजनों तथा विश्वविख्यात वंशका परिचय देती

हूँ ॥ ४ ॥ अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः कृष्णेति मां शैब्य विदुर्मनुष्याः । साहं वृणे पञ्च जनान् पतित्वे ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते ॥ ५ ॥ ‘शिबिदेशके राजकुमार! मैं राजा द्रुपदकी पुत्री हूँ। मनुष्य मुझे कृष्णाके नामसे जानते हैं। मैंने पाँचों पाण्डवोंका पतिरूपमें वरण किया है, जो खाण्डव-प्रस्थमें रहते थे। उनका नाम तुमने अवश्य सुना होगा ॥ ५ ॥ युधिष्ठिरो भीमसेनार्जुनौ च माद्र्याश्च पुत्रौ पुरुषप्रवीरौ । ते मां निवेश्येह दिशश्चतस्रो विभज्य पार्था मृगयां प्रयाताः ॥ ६ ॥ ‘युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीपुत्र नरवीर नकुल-सहदेव—ये ही मेरे पति हैं। वे सब-के-सब मुझे यहाँ रखकर हिंसक पशुओंको मारनेके लिये अलग-अलग बँटकर चारों दिशाओंमें गये हैं ॥ ६ ॥ प्राचीं राजा दक्षिणां भीमसेनो जयः प्रतीचीं यमजावुदीचीम् । मन्ये तु तेषां रथसत्तमानां कालोऽभितः प्राप्त इहोपयातुम् ॥ ७ ॥ ‘स्वयं राजा युधिष्ठिर पूर्व दिशामें गये हैं, भीमसेन दक्षिण दिशामें, अर्जुन पश्चिम दिशामें और नकुल-सहदेव उत्तर दिशामें गये हैं। मैं समझती हूँ, अब उन महारथियोंके सब ओरसे यहाँ पहुँचनेका समय हो गया है ॥ ७ ॥ सम्मानिता यास्यथ तैर्यथेष्टं विमुच्य वाहानवरोहयध्वम् । प्रियातिथिर्धर्मसुतो महात्मा प्रीतो भविष्यत्यभिवीक्ष्य युष्मान् ॥ ८ ॥ ‘अब तुमलोग अपनी सवारियोंसे उतरो और घोड़ोंको खोलकर विश्राम करो। मेरे पतियोंका आदर-सत्कार ग्रहण करके अपने अभीष्ट देशको जाना। महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिर अतिथियोंके बड़े प्रेमी हैं। वे तुमलोगोंको देखकर बहुत प्रसन्न होंगे' ॥ ८ ॥ एतावदुक्त्वा द्रुपदात्मजा सा शैब्यात्मजं चन्द्रमुखी प्रतीता । विवेश तां पर्णशालां प्रशस्तां संचिन्त्य तेषामतिथित्वमर्थे ॥ ९ ॥

शिबिदेशके राजकुमार कोटिकास्यसे ऐसा कहकर वह चन्द्रमुखी द्रौपदी अपनी उत्तम पर्णशालाके भीतर चली गयी। 'ये लोग हमारे अतिथि हैं' ऐसा सोचकर उसे उनपर विश्वास हो गया था। अतः वह प्रसन्नतापूर्वक उनके आतिथ्यकी व्यवस्थामें लग गयी ॥ ९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि द्रौपदीवाक्ये षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें द्रौपदीवाक्यविषयक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६६ ॥

जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद

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सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद

वैशम्पायन उवाच

तथाऽऽसीनेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत ।

यदुक्तं कृष्णया सार्धं तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! पूर्वोक्त प्रकारसे रथपर बैठे हुए उन सब राजाओंके

पास जाकर कोटिकास्यने द्रौपदीके साथ उसकी जो-जो बातें हुई थीं, वे सब कह

सुनायीं ॥ १ ॥

कोटिकास्यवचः श्रुत्वा शैब्यं सौवीरकोऽब्रवीत् ।

यदा वाचं व्याहरन्त्यामस्यां मे रमते मनः ॥ २ ॥

सीमन्तिनीनां मुख्यायां विनिवृत्तः कथं भवान् ।

एतां दृष्ट्वा स्त्रियो मेऽन्या यथा शाखामृगस्त्रियः ॥ ३ ॥

प्रतिभान्ति महाबाहो सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।

दर्शनादेव हि मनस्तया मेऽपहृतं भृशम् ॥ ४ ॥

तां समाचक्ष्व कल्याणीं यदि स्याच्छैब्य मानुषी ।

कोटिकास्यकी बात सुनकर सौवीरनरेश जयद्रथने उससे कहा—'शैब्य! सुन्दरियोंमें

सर्वश्रेष्ठ वह युवती जब तुमसे बातचीत कर रही थी, उस समय मेरा मन उसीमें लगा हुआ

था। तुम उसे साथ लिये बिना कैसे लौट आये? महाबाहो! मैं तुमसे यह सच कहता हूँ इसे

देखकर मुझे दूसरी स्त्रियाँ ऐसी जान पड़ती हैं मानो बंदरियाँ हों। उसने दर्शनमात्रसे ही मेरे

मनको अच्छी तरह हर लिया है। शैब्य! यदि वह मानवी हो तो उस कल्याणीके विषयमें

ठीक-ठीक बताओ' ॥ २—४ १/२ ॥

कोटिक उवाच

एषा वै द्रौपदी कृष्णा राजपुत्री यशस्विनी ॥ ५ ॥

पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी सम्मता भृशम् ।

सर्वेषां चैव पार्थानां प्रिया बहुमता सती ॥ ६ ॥

तया समेत्य सौवीर सौवीराभिमुखो व्रज ।

कोटिक बोला—सौवीरनरेश! यह यशस्विनी राजकुमारी द्रुपदपुत्री कृष्णा ही है, जो

पाँचों पाण्डवोंकी अत्यन्त आदरणीया महारानी है। कुन्तीके सभी पुत्र इसे प्यार करते हैं।

यह सती-साध्वी देवी अपने पतियोंके लिये बड़े सम्मानकी वस्तु है। तुम उससे मिलकर

सौवीरदेशकी राह लो ॥ ५-६ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच पश्यामि द्रौपदीमिति ॥ ७ ॥
पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! कोटिकास्यके ऐसा कहनेपर सौवीर और सिन्धु आदि देशोंके स्वामी जयद्रथने मनमें दुर्भावना लेकर उसे उत्तर दिया—'अच्छा, मैं भी द्रौपदीसे मिल लेता हूँ' ॥ ७ १/२ ॥

स प्रविश्याश्रमं पुण्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा ॥ ८ ॥
आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमब्रवीत् ।
कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामयाः ॥ ९ ॥
येषां कुशलकामासि तेऽपि कच्चिदनामयाः ।
उसने अपने छः भाइयोंके साथ स्वयं सातवाँ बनकर द्रौपदीके पवित्र आश्रममें प्रवेश किया, मानो कोई भेड़िया सिंहकी माँदमें घुसा हो। वहाँ जाकर उसने द्रौपदीसे इस प्रकार कहा—'वरारोहे! तुम कुशलसे हो न? तुम्हारे पति नीरोग तो हैं न? इनके सिवा और जिन लोगोंको तुम सकुशल देखना चाहती हो, वे सभी स्वस्थ तो हैं न? ॥ ८-९ १/२ ॥

द्रौपद्युवाच

अपि ते कुशलं राजन् राष्ट्रे कोशे बले तथा ॥ १० ॥
कच्चिदेकः शिबीनाढ्यान् सौवीरान् सह सिन्धुभिः ।
अनुतिष्ठसि धर्मेण ये चान्ये विजितास्त्वया ॥ ११ ॥
द्रौपदी बोली—राजन्! तुम स्वयं सकुशल हो न? तुम्हारे राज्य, खजाना और सैनिक तो कुशलसे हैं न? समृद्धिशाली शिबि, सौवीर, सिन्धु तथा अन्य जो-जो प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें आ गये हैं, उन सबकी प्रजाका तुम धर्मपूर्वक पालन तो करते हो न? ॥ १०-११ ॥

कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अहं च भ्रातरश्चास्य यांश्चान्यान् परिपृच्छसि ॥ १२ ॥
पाद्यं प्रतिगृह्णाणेदमासनं च नृपात्मज ।
मेरे पति कुरुकुलरत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं। मैं, उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगोंके विषयमें तुम पूछ रहे हो, वे सब कुशलसे हैं। राजकुमार! यह पैर धोनेके लिये जल है, इसे ग्रहण करो और यह आसन है, इसपर बैठो ॥ १२ १/२ ॥

जयद्रथ उवाच

एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम् ॥ १३ ॥
गतश्रीकांश्च्युतान् राज्यात् कृपणान् गतचेतसः ।

अरण्यवासिनः पार्थान् नानुरोद्धुं त्वमर्हसि ।। १४ ।।

नैव प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपयुञ्जते ।

युञ्जानमनुयुञ्जीत न श्रियः संक्षये वसेत् ।। १५ ।।

जयद्रथने कहा—आओ चलो, मेरे रथपर बैठो और अखण्ड सुखका उपभोग करो।

अब पाण्डवोंके पास धन नहीं रहा। उनका राज्य छीन लिया गया। वे दीन और उत्साहहीन

हो गये हैं। अब इन वनवासी कुन्तीपुत्रोंका अनुसरण करना तुम्हें शोभा नहीं देता। विदुषी

स्त्रियाँ निर्धन पतिकी उपासना नहीं करती हैं। स्वामीके पास जबतक लक्ष्मी रहे, तभीतक

उसके साथ रहना चाहिये। जब उसकी सम्पत्ति नष्ट हो जाय, तो वहाँ कदापि न रहे ।। १३

—१५ ।।

श्रिया विहीना राष्ट्राच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः ।

अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ।। १६ ।।

पाण्डव सदाके लिये श्रीहीन तथा राज्यभ्रष्ट हो गये हैं। अब तुम्हें पाण्डवोंके प्रति भक्ति

रखकर कष्ट भोगनेकी आवश्यकता नहीं है ।। १६ ।।

भार्या मे भव सुश्रोणि त्यजैनान् सुखमाप्नुहि ।

अखिलान् सिन्धुसौवीरानाप्नुहि त्वं मया सह ।। १७ ।।

सुन्दरि! तुम मेरी भार्या बन जाओ। इन पाण्डवोंको छोड़ दो और मेरे साथ रहकर सुख

भोगो। मेरे साथ रहनेसे तुम्हें सम्पूर्ण सिन्धु और सौवीरदेशका राज्य प्राप्त होगा, तुम

महारानी बनोगी ।। १७ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्ता सिन्धुराजेन वाक्यं हृदयकम्पनम् ।

कृष्णा तस्मादपाक्रामद् देशात् सभ्रुकुटीमुखी ।। १८ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सिन्धुराज जयद्रथके मुखसे यह हृदय कँपा

देनेवाली बात सुनकर द्रुपदकुमारी कृष्णा उस स्थानसे दूर हट गयी। उसके मुखपर रोष छा

गया और उसकी भौंहें तन गयीं ।। १८ ।।

अवमत्यास्य तद् वाक्यमाक्षिप्य च सुमध्यमा ।

मैवमित्यब्रवीत् कृष्णा लज्जस्वेति च सैन्धव ।। १९ ।।

उसके इस प्रस्तावका तिरस्कार करके सुन्दरी द्रौपदीने उसे कड़ी फटकार सुनायी और

बोली—'खबरदार, फिर कभी ऐसी बात मुखसे मत निकालना। सिन्धुराज! तुम्हें लज्जा

आनी चाहिये थी ।। १९ ।।

सा काङ्क्षमाणा भर्तॄणामुपयातमनिन्दिता ।

विलोभयामास परं वाक्यैर्वाक्यानि युञ्जती ।। २० ।।

पतिव्रता द्रौपदी चाहती थी कि मेरे पति अभी यहाँ आ जायँ। अतः वह जयद्रथसे वाद-विवाद करती हुई उसे बातोंमें फँसाये रखनेकी चेष्टा करने लगी ॥ २० ॥

(द्रौपद्युवाच

नैवं वद महाबाहो न्याय्यं त्वं न च बुध्यसे ।
पाण्डूनां धार्तराष्ट्राणां स्वसा चैव कनीयसी ।
दुःशला नाम तस्यास्त्वं भर्ता राजकुलोद्वह ॥
मम भ्राता च न्याय्येन त्वया रक्ष्या महारथ ।
धर्मिष्ठानां कुले जातो न धर्मं त्वमवेक्षसे ॥
**द्रौपदी बोली—**महाबाहो! ऐसी पापकी बात न बोलो। कौन-सा कार्य धर्मके अनुकूल और न्यायसंगत है, इसका तुम्हें ज्ञान नहीं है। तुम धृतराष्ट्रपुत्रों तथा पाण्डवोंकी छोटी बहन दुःशलाके पति हो। महारथी राजकुमार! इस नातेसे न्यायतः तुम मेरे भाई हो; अतः तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिये। तुम्हारा जन्म तो धर्मात्माओंके कुलमें हुआ है, परंतु तुम्हारी दृष्टि धर्मकी ओर नहीं है ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तः सिन्धुराजोऽथ वाक्यमुत्तरमब्रवीत् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**द्रौपदीके ऐसा कहनेपर सिन्धुराज जयद्रथने उसे इस प्रकार उत्तर दिया।

जयद्रथ उवाच

राज्ञां धर्मं न जानीषे स्त्रियो रत्नानि चैव हि ।
साधारणानि लोकेऽस्मिन् प्रवदन्ति मनीषिणः ॥)
**जयद्रथ बोला—**कृष्णे! तुम राजाओंका धर्म नहीं जानती। मनीषी पुरुषोंका कथन है कि इस संसारमें स्त्रियाँ तथा रत्न सर्वसाधारणकी वस्तुएँ हैं ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथद्रौपदीसंवादे
सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथद्रौपदीसंवादविषयक दो सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)

२६८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथद्वारा उसका अपहरण

वैशम्पायन उवाच

सरोषरागोपहतेन बल्गुना
सरागनेत्रेण नतोन्नतभ्रुवा ।
मुखेन विस्फूर्य सुवीरराष्ट्रपं
ततोऽब्रवीत् तं द्रुपदात्मजा पुनः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जयद्रथकी बात सुनकर द्रौपदीका सुन्दर मुख क्रोधसे तमतमा उठा, आँखें लाल हो गयीं, भौंहें टेढ़ी होकर तन गयीं और उसने सौवीरराज जयद्रथको फटकारकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

यशस्विनस्तीक्ष्णविषान् महारथा-
नभिब्रुवन् मूढ न लज्जसे कथम् ।
महेन्द्रकल्पान् निरतान् स्वकर्मसु
स्थितान् समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम् ॥ २ ॥

‘अरे मूढ़! मेरे पति पाण्डव महान् यशस्वी, सदा अपने धर्मके पालनमें स्थित, यक्षों तथा राक्षसोंके समूहमें भी युद्ध करनेमें समर्थ, देवराज इन्द्रके सदृश शक्तिशाली तथा महारथी वीर हैं। उनका क्रोध तीक्ष्ण विषवाले नागोंके समान भयंकर है। उनके सम्मानके विरुद्ध ऐसी ओछी बातें कहते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती? ॥ २ ॥

न किंचिदीड्यं प्रवदन्ति पापं
वनेचरं वा गृहमेधिनं वा ।
तपस्विनं सम्परिपूर्णविद्यं
भषन्ति हैवं श्वनराः सुवीर ॥ ३ ॥

‘अच्छे लोग पूजनीय, तपस्वी तथा पूर्ण विद्वान् पुरुषके प्रति भले ही वह वनवासी हो या गृहस्थ कोई अनुचित बात नहीं कहते हैं। जयद्रथ! मनुष्योंमें जो तेरे-जैसे कुत्ते हैं, वे ही इस तरह भूँका करते हैं ॥ ३ ॥

अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि-
देतादृशे क्षत्रियसंनिवेशे ।
यस्त्वाद्य पातालमुखे पतन्तं
पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत ॥ ४ ॥

नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प- मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम् । दण्डीव यूथादपसेधसि त्वं यो जेतुमाशंससि धर्मराजम् ॥ ५ ॥

‘मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि इस क्षत्रिय-मण्डलीमें कोई भी तेरा ऐसा हितैषी स्वजन नहीं है, जो आज तेरा हाथ पकड़कर तुझे पातालके गहरे गर्तमें गिरनेसे बचा ले। अरे! जैसे कोइ मूर्ख मनुष्य हिमालयकी उपत्यकामें विचरनेवाले पर्वतशिखरके समान ऊँचे एवं मदकी धारा बहानेवाले गजराजको हाथमें डंडा लेकर उसके यूथसे अलग हाँक लाना चाहे, उसी प्रकार तू धर्मराज युधिष्ठिरको जीतनेका हौसला रखता है ॥ ४-५ ॥

बाल्यात् प्रसुप्तस्य महाबलस्य सिंहस्य पक्ष्माणि मुखाल्लुनासि । पदा समाहत्य पलायमानः क्रुद्धं यदा द्रक्ष्यसि भीमसेनम् ॥ ६ ॥

‘तू मूर्खतावश (अपनी माँदमें) सोये हुए महाबली सिंहको लात मारकर उसके मुखके बाल नोंच रहा है। जिस समय तू क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको देखेगा, उस समय तुरंत भाग

छूटेगा ।। ६ ।। महाबलं घोरतरं प्रवृद्धं जातं हरिं पर्वतकन्दरेषु । प्रसुप्तमुग्रं प्रपदेन हंसि यः क्रुद्धमायोत्स्यसि जिष्णुमुग्रम् ।। ७ ।। ‘यदि तू रोषमें भरे हुए भयंकर योद्धा अर्जुनसे जूझना चाहता है, तो समझ ले कि पर्वतकी कन्दराओंमें उत्पन्न हो वहीं पलकर बढ़े हुए अत्यन्त घोर और महाबली सोये हुए भयानक सिंहको तू पैरसे ठोकर मार रहा है ।। ७ ।। कृष्णोरगौ तीक्ष्णमुखौ द्विजिह्वौ मत्तः पदाऽऽक्रामसि पुच्छदेशे । यः पाण्डवाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्यां जघन्यजाभ्यां प्रयुयुत्ससे त्वम् ।। ८ ।। ‘यदि तू पुरुषरत्न दोनों छोटे पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखता है तो यह मानना पड़ेगा कि मतवाला होकर तू मुखमें तीक्ष्ण विष धारण करनेवाले एवं दो जिह्वाओंसे युक्त दो काले नागोंकी पूँछको पैरसे कुचल रहा है ।। ८ ।। यथा च वेणुः कदली नलो वा फलन्त्यभावाय न भूतयेऽऽत्मनः । तथैव मां तैः परिरक्ष्यमाणा- मादास्यसे कर्कटकीव गर्भम् ।। ९ ।। ‘अरे मूर्ख! जैसे बाँस, केला और नरकुल—ये अपने विनाशके लिये ही फलते हैं, समृद्धिके लिये नहीं तथा जैसे केकड़ेकी मादा अपनी मृत्युके लिये ही गर्भ धारण करती है, उसी प्रकार तू पाण्डवोंद्वारा सदा सुरक्षित मुझ द्रौपदीका अपनी मृत्युके लिये ही अपहरण करना चाहता है' ।। ९ ।।

जयद्रथ उवाच जानामि कृष्णे विदितं ममैतद् यथाविधास्ते नरदेवपुत्राः । न त्वेवमेतेन विभीषणेन शक्या वयं त्रासयितुं त्वयाद्य ।। १० ।। जयद्रथने कहा—कृष्णे! मैं जानता हूँ कि तुम्हारे पति राजकुमार पाण्डव कैसे हैं? मुझे ये सब बातें मालूम हैं। परंतु इस समय इस विभीषिकाद्वारा तुम हमें डरा नहीं सकती ।। १० ।। वयं पुनः सप्तदशेषु कृष्णे