महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ततो वायुः प्रादुरभूदधस्तस्य महात्मनः । शब्देन महता तात गर्जन्निव यथा घनः ॥ ७ ॥ तात! उस समय महात्मा अगस्त्यकी गुदासे गर्जते हुए मेघकी भाँति भारी आवाजके साथ अधोवायु निकली ॥ ७ ॥
वातापे निष्क्रमस्वेति पुनः पुनरुवाच ह । तं प्रहस्याब्रवीद् राजन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥ इल्वल बार-बार कहने लगा—‘वातापे! निकलो-निकलो।’ राजन्! तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने उससे हँसकर कहा— ॥ ८ ॥
कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोऽसुरः । इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद् दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम् ॥ ९ ॥ ‘अब वह कैसे निकल सकता है, मैंने (लोकहितके लिये) उस असुरको पचा लिया है।’ महादैत्य वातापिको पच गया देख इल्वलको बड़ा खेद हुआ ॥ ९ ॥
प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत् । किमर्थमुपयाताः स्थ ब्रूत किं करवाणि वः ॥ १० ॥ उसने मन्त्रियोंसहित हाथ जोड़कर उन अतिथियोंसे यह बात पूछी—‘आपलोग किस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?’ ॥ १० ॥
प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा । ईशं ह्यसुर विद्मस्तवां वयं सर्वे धनेश्वरम् ॥ ११ ॥ तब महर्षि अगस्त्यने हँसकर इल्वलसे कहा—‘असुर! हम सब लोग तुम्हें शक्तिशाली शासक एवं धनका स्वामी समझते हैं ॥ ११ ॥
एते च नातिधनिनो धनार्थश्च महान् मम । यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः ॥ १२ ॥ ‘ये नरेश अधिक धनवान् नहीं हैं और मुझे बहुत धनकी आवश्यकता आ पड़ी है। अतः दूसरे जीवोंको कष्ट न देते हुए अपने धनमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें दो’ ॥ १२ ॥
ततोऽभिवाद्य तमृषिमिल्वलो वाक्यमब्रवीत् । दित्सितं यदि वेत्सि त्वं ततो दास्यामि ते वसु ॥ १३ ॥ तब इल्वलने महर्षिको प्रणाम करके कहा—‘मैं कितना धन देना चाहता हूँ? यह बात यदि आप जान लें तो मैं आपको धन दूँगा’ ॥ १३ ॥
अगस्त्य उवाच
गवां दशसहस्राणि राज्ञामेकैकशोऽसुर । तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर ॥ १४ ॥
अगस्त्यजीने कहा— महान् असुर! तुम इनमेंसे एक-एक राजाको दस-दस हजार गौएँ तथा इतनी ही (दस-दस हजार) सुवर्णमुद्राएँ देना चाहते हो ।। १४ ।।
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मयः ।
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर ।। १५ ।।
इन राजाओंकी अपेक्षा दूनी गौएँ और सुवर्ण-मुद्राएँ तुमने मेरे लिये देनेका विचार किया है। महादैत्य! इसके सिवा एक स्वर्णमय रथ, जिसमें मनके समान तीव्रगामी दो घोड़े जुते हों, तुम मुझे और देना चाहते हो ।। १५ ।।
(लोमश उवाच
इल्वलस्तु मुनिं प्राह सर्वमस्ति यथाऽऽत्थ माम् ।
रथं तु यमवोचो मां नैनं विद्मो हिरण्मयम् ।।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! इसपर इल्वलने अगस्त्य मुनिसे कहा कि 'आपने मुझसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है; किंतु आपने जो मुझसे रथकी बात कही है, उस रथको हमलोग सुवर्णमय नहीं समझते हैं'।
अगस्त्य उवाच
न मे वागनृता काचिदुक्तपूर्वा महासुर ।)
जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्त एष हिरण्मयः ।
अगस्त्यजीने कहा— महादैत्य! मेरे मुँहसे पहले कभी कोई बात झूठी नहीं निकली है, अतः शीघ्र पता लगाओ, यह रथ निश्चय ही सोनेका है ।।
लोमश उवाच
जिज्ञास्यमानः स रथः कौन्तेयासीद्धिरण्मयः ।
ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु ।। १६ ।।
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पता लगानेपर वह रथ सोनेका ही निकला, तब मनमें (भाईकी मृत्युसे) व्यथित हुए उस दैत्यने महर्षिको बहुत अधिक धन दिया ।। १६ ।।
विरावश्च सुरावश्च तस्मिन् युक्तौ रथे हयौ ।
ऊहतुः सवसूनाशु तावगस्त्याश्रमं प्रति ।। १७ ।।
सर्वान् राज्ञः सहागस्त्यान् निमेषादिव भारत ।
(इल्वलस्त्वनुगम्यैनमगस्त्यं हन्तुमैच्छत ।
भस्म चक्रे महातेजा हुंकारेण महासुरम् ।।
मुनेराश्रममश्वौ तौ निन्यतुर्वातरंहसौ ।)
अगस्त्येनाभ्यनुज्ञाता जग्मू राजर्षयस्तदा ।
कृतवांश्च मुनिः सर्वं लोपामुद्राचिकीर्षितम् ॥ १८ ॥ उस रथमें विराव और सुराव नामक दो घोड़े जुते हुए थे। वे धनसहित राजाओं तथा अगस्त्य मुनिको शीघ्र ही मानो पलक मारते ही अगस्त्याश्रमकी ओर ले भागे। उस समय इल्वल असुरने अगस्त्य मुनिके पीछे जाकर उनको मारनेकी इच्छा की, परंतु महातेजस्वी अगस्त्यमुनिने उस महादैत्य इल्वलको हुंकारसे ही भस्म कर दिया। तदनन्तर उन वायुके समान वेगवाले घोड़ोंने उन सबको मुनिके आश्रमपर पहुँचा दिया। भरतनन्दन! फिर अगस्त्यजीकी आज्ञा ले वे राजर्षिगण अपनी-अपनी राजधानीको चले गये और महर्षिने लोपामुद्राकी सभी इच्छाएँ पूर्ण कीं ॥ १७-१८ ॥
लोपामुद्रोवाच
कृतवानसि तत् सर्वं भगवन् मम काङ्क्षितम् । उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥ १९ ॥ **लोपामुद्रा बोली—**भगवन्! मेरी जो-जो अभिलाषा थी, वह सब आपने पूर्ण कर दी। अब मुझसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न कीजिये ॥ १९ ॥
अगस्त्य उवाच
तुष्टोऽहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने । विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु ॥ २० ॥ **अगस्त्यजीने कहा—**शोभामयी कल्याणी! तुम्हारे सद्व्यवहारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। पुत्रके सम्बन्धमें तुम्हारे सामने एक विचार उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥ २० ॥ सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसम्मितम् । दश वा शततुल्याः स्युरेको वापि सहस्रजित् ॥ २१ ॥ क्या तुम्हारे गर्भसे एक हजार या एक सौ पुत्र उत्पन्न हों, जो दसके ही समान हों? अथवा दस ही पुत्र हों, जो सौ पुत्रोंकी समानता करनेवाले हों? अथवा एक ही पुत्र हो, जो हजारोंको जीतनेवाला हो? ॥ २१ ॥
लोपामुद्रोवाच
सहस्रसम्मितः पुत्र एकोऽप्यस्तु तपोधन।
एको हि बहुभिः श्रेयान् विद्वान् साधुरसाधुभिः॥ २२॥
**लोपामुद्रा बोली—**तपोधन! मुझे सहस्रोंकी समानता करनेवाला एक ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो; क्योंकि बहुत-से दुष्ट पुत्रोंकी अपेक्षा एक ही विद्वान् एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्तम माना गया है॥ २२॥
लोमश उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनिः।
समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्छ्रद्दधानया॥ २३॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! तब ‘तथास्तु’ कहकर श्रद्धालु महात्मा अगस्त्यने समान शील-स्वभाववाली श्रद्धालु पत्नी लोपामुद्राके साथ यथासमय समागम किया॥ २३॥
तत आधाय गर्भं तमगमद् वनमेव सः।
तस्मिन् वनगते गर्भो ववृधे सप्त शारदान्॥ २४॥
गर्भाधान करके अगस्त्यजी फिर वनमें ही चले गये। उनके वनमें चले जानेपर वह गर्भ सात वर्षोंतक माताके पेटमें ही पलता और बढ़ता रहा॥ २४॥
सप्तमेऽब्दे गते चापि प्राच्यवत् स महाकविः ।
ज्वलन्निव प्रभावेण दृढस्युर्नाम भारत ॥ २५ ॥
भारत! सात वर्ष बीतनेपर अपने तेज और प्रभावसे प्रज्वलित होता हुआ वह गर्भ उदरसे बाहर निकला। वही महाविद्वान् दृढस्युके नामसे विख्यात हुआ ॥ २५ ॥
साङ्गोपनिषदन् वेदाञ्जपन्निव महातपाः ।
तस्य पुत्रोऽभवदृषेः स तेजस्वी महाद्विजः ॥ २६ ॥
महर्षिका वह महातपस्वी और तेजस्वी पुत्र जन्म-कालसे ही अंग और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय-सा करता जान पड़ा। दृढस्यु ब्राह्मणोंमें महान् माने गये ॥ २६ ॥
स बाल एव तेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने ।
इध्मानां भारमाजह्रे इध्मवाहस्ततोऽभवत् ॥ २७ ॥
पिताके घरमें रहते हुए तेजस्वी दृढस्यु बाल्य-कालसे ही इध्म (समिधा)-का भार वहन करके लाने लगे; अतः ‘इध्मवाह’ नामसे विख्यात हो गये ॥ २७ ॥
तथायुक्तं तु तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा ।
एवं स जनयामास भारतापत्यमुत्तमम् ॥ २८ ॥
अपने पुत्रको स्वाध्याय और समिधानयनके कार्यमें संलग्न देख महर्षि अगस्त्य उस समय बहुत प्रसन्न हुए। भारत! इस प्रकार अगस्त्यजीने उत्तम संतान उत्पन्न की ॥ २८ ॥
लेभिरे पितरश्चास्य लोकान् राजन् यथेप्सितान् ।
तत ऊर्ध्वमयं ख्यातस्त्वगस्त्यस्याश्रमो भुवि ॥ २९ ॥
राजन्! तदनन्तर उनके पितरोंने मनोवांछित लोक प्राप्त कर लिये। उसके बादसे यह स्थान इस पृथ्वीपर अगस्त्याश्रमके नामसे विख्यात हो गया ॥ २९ ॥
प्राह्लादिरेवं वातापिरगस्त्येनोपशामितः ।
तस्यायमाश्रमो राजन् रमणीयैर्गुणैर्युतः ॥ ३० ॥
वातापि प्रह्लादके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, जिसे अगस्त्यजीने इस प्रकार शान्त कर दिया। राजन्! यह उन्हींका रमणीय गुणोंसे युक्त आश्रम है ॥ ३० ॥
एषा भागीरथी पुण्या देवगन्धर्वसेविता ।
वातेरिता पताकेव विराजति नभस्तले ॥ ३१ ॥
इसके-समीप यह वही देव-गन्धर्वसेवित पुण्यसलिला भागीरथी है, जो आकाशमें वायुकी प्रेरणासे फहरानेवाली श्वेत पताकाके समान सुशोभित हो रही है ॥ ३१ ॥
प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यशः ।
शिलातलेषु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव ॥ ३२ ॥
यह क्रमशः नीचे-नीचेके शिखरोंपर गिरती हुई सदा तीव्रगतिसे बहती है और शिलाखण्डोंके नीचे इस प्रकार समायी जाती है, मानो भयभीत सर्पिणी बिलमें घुसी जा रही हो ॥ ३२ ॥
दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् । पूर्वं शम्भोजटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया । अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ।। ३३ ।। पहले भगवान् शंकरकी जटासे गिरकर प्रवाहित होनेवाली समुद्रकी प्रियतमा महारानी गंगा सम्पूर्ण दक्षिण दिशाको इस प्रकार आप्लावित कर रही है, मानो माता अपनी संतानको नहला रही हो। इस परम पवित्र नदीमें तुम इच्छानुसार स्नान करो ।। ३३ ।। युधिष्ठिर निबोधेदं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । भृगोस्तीर्थं महाराज महर्षिगणसेवितम् ।। ३४ ।। महाराज युधिष्ठिर! इधर ध्यान दो, यह महर्षि-गणसेवित भृगुतीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ।। यत्रोपस्पृष्टवान् रामो हृतं तेजस्तदाऽऽप्तवान् । अत्र त्वं भ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव ।। ३५ ।। दुर्योधनहृतं तेजः पुनरादातुमर्हसि । कृतवैरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः ।। ३६ ।। जहाँ परशुरामजीने स्नान किया और उसी क्षण अपने खोये हुए तेजको पुनः प्राप्त कर लिया। पाण्डुनन्दन! तुम अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ इसमें स्नान करके दुर्योधनद्वारा छीने हुए अपने तेजको पुनः प्राप्त कर सकते हो। जैसे दशरथनन्दन श्रीरामसे वैर करनेपर उनके द्वारा अपहृत हुए तेजको परशुरामने यहाँ स्नानके प्रभावसे पुनः पा लिया था ।। ३५-३६ ।।
वैशम्पायन उवाच
स तत्र भ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डवः । स्नात्वा देवान् पितॄंश्चैव तर्पयामास भारत ।। ३७ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया ।। ३७ ।। तस्य तीर्थस्य रूपं वै दीप्ताद् दीप्ततरं बभौ । अप्रधृष्यतरश्चासीच्छात्रावाणां नरर्षभ ।। ३८ ।। नरश्रेष्ठ! उस तीर्थमें स्नान कर लेनेपर राजा युधिष्ठिरका रूप अत्यन्त तेजोयुक्त हो प्रकाशमान हो गया। अब वे शत्रुओंके लिये परम दुर्धर्ष हो गये ।। ३८ ।। अपृच्छच्चैव राजेन्द्र लोमशं पाण्डुनन्दनः । भगवन् किमर्थं रामस्य हृतमासीद् वपुः प्रभो । कथं प्रत्याहृतं चैव एतदाचक्ष्व पृच्छतः ।। ३९ ।।
राजेन्द्र! उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा—‘भगवन्! परशुरामजीके तेजका अपहरण किसलिये किया गया था और प्रभो! वह इन्हें पुनः किस प्रकार प्राप्त हो गया? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपा करके इस प्रसंगका वर्णन करें' ।। ३९ ।।
लोमश उवाच
शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमतः ।
जातो दशरथस्यासीत् पुत्रो रामो महात्मनः ।। ४० ।।
विष्णुः स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै ।
पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं ततः ।। ४१ ।।
**लोमशजीने कहा—**राजेन्द्र! तुम दशरथनन्दन श्रीराम तथा परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजीका चरित्र सुनो। पूर्वकालमें महात्मा राजा दशरथके यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु अपने ही सच्चिदानन्दमय विग्रहसे श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतारका उद्देश्य था—पापी रावणका विनाश। अयोध्यामें प्रकट हुए दशरथनन्दन श्रीरामका हम लोग प्रायः दर्शन करते रहते थे ।। ४०-४१ ।।
ऋचीकनन्दनों रामो भार्गवो रेणुकासुतः ।
तस्य दाशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।। ४२ ।।
कौतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यागमत् पुनः ।
धनुरादाय तद् दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् ।। ४३ ।।
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले दशरथकुमार श्रीरामका भारी पराक्रम सुनकर भृगु तथा ऋचीकके वंशज रेणुकानन्दन परशुराम उन्हें देखनेके लिये उत्सुक हो क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष लिये अयोध्यामें आये ।। ४२-४३ ।।
जिज्ञासमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तदा ।
तं वै दशरथः श्रुत्वा विषयान्तमुपागतम् ।। ४४ ।।
प्रेषयामास रामस्य रामं पुत्रं पुरस्कृतम् ।
स तमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् ।। ४५ ।।
प्रहसन्निव कौन्तेय रामो वचनमब्रवीत् ।
कृतकालं हि राजेन्द्र धनुरेतन्मया विभो ।। ४६ ।।
समारोपय यत्नेन यदि शक्नोषि पार्थिव ।
उनके शुभागमनका उद्देश्य था दशरथनन्दन श्रीरामके बल-पराक्रमकी परीक्षा करना। महाराज दशरथने जब सुना कि परशुरामजी हमारे राज्यकी सीमापर आ गये हैं, तब उन्होंने मुनिकी अगवानीके लिये अपने पुत्र श्रीरामको भेजा। कुन्तीनन्दन! श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाण हाथमें लिये आकर खड़े हैं, यह देखकर परशुरामजीने हँसते हुए कहा—'राजेन्द्र! प्रभो! भूपाल! यदि तुममें शक्ति हो तो यत्नपूर्वक इस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ। यह वह धनुष है जिसके द्वारा मैंने क्षत्रियोंका संहार किया है' ।। ४४-४६१/२ ।।
इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि ।। ४७ ।।
उनके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'भगवन्! आपको इस तरह आक्षेप नहीं करना चाहिये ।।
नाहमप्यधमो धर्मे क्षत्रियाणां द्विजातिषु ।
इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्ये न कथनम् ।। ४८ ।।
'मैं भी समस्त द्विजातियोंमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेमें अधम नहीं हूँ। विशेषतः इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय अपने बाहुबलकी प्रशंसा नहीं करते' ।। ४८ ।।
तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ।
अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ।। ४९ ।।
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर परशुरामजी बोले—'रघुनन्दन! बातें बनानेकी कोई आवश्यकता नहीं। यह धनुष लो और इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ' ।। ४९ ।।
ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् ।
रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद् रामस्य कार्मुकम् ।। ५० ।।
धनुरारोपयामास सलील इव भारत ।
ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् ।। ५१ ।।
तब दशरथनन्दन श्रीरामजीने रोषपूर्वक परशुरामका वह वीर क्षत्रियोंका संहारक दिव्य धनुष उनके हाथसे ले लिया। भारत! उन्होंने लीलापूर्वक प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराते हुए धनुषकी टंकार फैलायी ।। ५०-५१ ।।
तस्य शब्दस्य भूतानि वित्रसन्त्यशनेरिव ।
अथाब्रवीत् तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा ।। ५२ ।।
इदमारोपितं ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते ।
तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः ।
शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति ।। ५३ ।।
बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान उस टंकार-ध्वनिको सुनकर सब प्राणी घबरा उठे। उस समय दशरथनन्दन श्रीरामने परशुरामजीसे कहा—'ब्रह्मन्! यह धनुष तो मैंने चढ़ा दिया अब और आपका कौन-सा कार्य करूँ?' तब जमदग्निनन्दन परशुरामने महात्मा
श्रीरामचन्द्रजीको एक दिव्य बाण दे दिया और कहा—‘इसे धनुषपर रखकर अपने कानके पासतक खींचिये’ ॥
लोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वाब्रवीद् रामः प्रदीप्त इव मन्युना ।
श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ ५४ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! इतना सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मानो क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे और बोले—‘भृगुनन्दन! तुम बड़े घमण्डी हो। मैं तुम्हारी कठोर बातें सुनता हूँ फिर क्षमा कर लेता हूँ ॥ ५४ ॥
त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः ।
पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् ॥ ५५ ॥
‘तुमने अपने पितामह ऋचीकके प्रभावसे क्षत्रियोंको जीतकर विशेष तेज प्राप्त किया है, निश्चय ही, इसीलिये मुझपर आक्षेप करते हो ॥ ५५ ॥
पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ।
ततो रामशरीरे वै रामः पश्यति भार्गवः ॥ ५६ ॥
आदित्यान् सवसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ।
पितरो हुताशनश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ ५७ ॥
गन्धर्वा राक्षसा यक्षा नद्यस्तीर्थानि यानि च ।
ऋषयो बालखिल्याश्च ब्रह्मभूताः सनातनाः ॥ ५८ ॥
देवर्षयश्च कात्स्न्र्येन समुद्राः पर्वतास्तथा ।
वेदाश्च सोपनिषदो वषट्कारैः सहाध्वरैः ॥ ५९ ॥
चेतोमन्ति च सामानि धनुर्वेदश्च भारत ।
मेघवृन्दानि वर्षाणि विद्युतश्च युधिष्ठिर ॥ ६० ॥
‘लो! मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि देता हूँ। उसके द्वारा मेरे यथार्थ स्वरूपका दर्शन करो।’ तब भृगुवंशी परशुरामजीने श्रीरामचन्द्रजीके शरीरमें बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, साध्य देवता, उनचास मरुद्गण, पितृगण, अग्निदेव, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदियाँ, तीर्थ, सनातन ब्रह्मभूत बालखिल्य ऋषि, देवर्षि, सम्पूर्ण समुद्र, पर्वत, उपनिषदोंसहित वेद, वषट्कार, यज्ञ, साम और धनुर्वेद, इन सभीको चेतनरूप धारण किये हुए प्रत्यक्ष देखा। भरतनन्दन युधिष्ठिर! मेघोंके समूह, वर्षा और विद्युत्का भी उनके भीतर दर्शन हो रहा था ॥ ५६—६० ॥
ततः स भगवान् विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह ।
शुष्काशनिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च भारत ॥ ६१ ॥
पांसुवर्षेण महता मेघवर्षैश्च भूतलम् ।
भूमिकम्पैश्च निर्घातैर्नदैश्च विपुलैरपि ॥ ६२ ॥ तदनन्तर भगवान् विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीने उस बाणको छोड़ा। भारत! उस समय सारी पृथ्वी बिना बादलकी बिजली और बड़ी-बड़ी उल्काओंसे व्याप्त-सी हो उठी। बड़े जोरकी आँधी उठी और सब ओर धूलकी वर्षा होने लगी। फिर मेघोंकी घटा घिर आयी और भूतलपर मूसलाधार वर्षा होने लगी। बार-बार भूकम्प होने लगा। मेघगर्जन तथा अन्य भयानक उत्पातसूचक शब्द गूँजने लगे ।। ६१-६२ ।। स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् । आगच्छज्ज्वलितो बाणो रामबाहुप्रचोदितः ॥ ६३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंसे प्रेरित हुआ वह प्रज्वलित बाण परशुरामजीको व्याकुल करके केवल उनके तेजको छीनकर पुनः लौट आया ।। ६३ ।। स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणमद् विष्णुतेजसम् ॥ ६४ ॥ विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेन्द्रमगमत् पुनः । भीतस्तु तत्र न्यवसद् व्रीडितस्तु महातपाः ॥ ६५ ॥ परशुरामजी एक बार मूर्च्छित होकर जब पुनः होशमें आये तब मरकर जी उठे हुए मनुष्यकी भाँति उन्होंने विष्णुतेज धारण करनेवाले भगवान् श्रीरामको नमस्कार किया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु श्रीरामकी आज्ञा लेकर वे पुनः महेन्द्रपर्वतपर चले गये। वहाँ भयभीत और लज्जित हो महान् तपस्यामें संलग्न होकर रहने लगे ।। ६४-६५ ।। ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् । निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राममब्रुवन् ॥ ६६ ॥ तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर तेजोहीन और अभिमानशून्य होकर रहनेवाले परशुरामको दुःखी देखकर उनके पितरोंने कहा ।। ६६ ।।
पितर ऊचुः
न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् । स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥ ६७ ॥ **पितर बोले—**तुमने भगवान् विष्णुके पास जाकर जो बर्ताव किया है वह ठीक नहीं था। वे तीनों लोकोंमें सर्वदा पूजनीय और माननीय हैं ।। ६७ ।। गच्छ पुत्र नदीं पुण्यां वधूसरकृताह्वयाम् । तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्वपुरवाप्स्यसि ॥ ६८ ॥ बेटा! अब तुम वधूसर नामक पुण्यमयी नदीके तटपर जाओ। वहाँ तीर्थोंमें स्नान करके पूर्ववत् अपना तेजोमय शरीर पुनः प्राप्त कर लोगे ।। ६८ ।। दीप्तोदं नाम तत् तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ।
भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः ॥ ६९ ॥
राम! वह दीप्तोदक नामक तीर्थ है, जहाँ देवयुगमें तुम्हारे प्रपितामह भृगुने उत्तम तपस्या की थी ॥ ६९ ॥
तत् तथा कृतवान् रामः कौन्तेय वचनात् पितुः ।
प्राप्तवांश्च पुनस्तेजस्तीर्थेऽस्मिन् पाण्डुनन्दन ॥ ७० ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पितरोंके कहनेसे परशुरामजीने वैसा ही किया। पाण्डुनन्दन! इस तीर्थमें नहाकर पुनः उन्होंने अपना तेज प्राप्त कर लिया ॥ ७० ॥
एतदीदृशकं तात रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
प्राप्तमासीन्महाराज विष्णुमासाद्य वै पुरा ॥ ७१ ॥
तात महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पूर्वकालमें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले परशुराम विष्णुस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीसे भिड़कर इस दशाको प्राप्त हुए थे ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां
जामदग्न्यतेजोहानिकथने एकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार महाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें
परशुरामके तेजकी हानिविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं)
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! मैं पुनः बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यजीके चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
शततमोऽध्यायः
वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण
युधिष्ठिर उवाच
भूय एवाहमिच्छामि महर्षेस्तस्य धीमतः ।
कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! मैं पुनः बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यजीके चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमश उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यामद्भुतामतिमानुषीम् ।
अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितौजसः ॥ २ ॥
लोमशजीने कहा— महाराज! अमिततेजस्वी महर्षि अगस्त्यकी कथा दिव्य, अद्भुत और अलौकिक है। उनका प्रभाव महान् है। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
आसन् कृतयुगे घोरा दानवा युद्धदुर्मदाः ।
कालकेया इति ख्याता गणाः परमदारुणाः ॥ ३ ॥
सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके बहुत-से भयंकर दल थे जो कालकेय नामसे विख्यात थे। उनका स्वभाव अत्यन्त निर्दय था। वे युद्धमें उन्मत्त होकर लड़ते थे ॥ ३ ॥
ते तु वृत्रं समाश्रित्य नानाप्रहरणोद्यताः ।
समन्तात् पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान् सुरान् ॥ ४ ॥
उन सबने एक दिन वृत्रासुरकी शरण ले उसकी अध्यक्षतामें नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित हो महेन्द्र आदि देवताओंपर चारों ओरसे आक्रमण किया ॥ ४ ॥
ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वंस्त्रिदशाः पुरा ।
पुरंदरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥ ५ ॥
तब समस्त देवता वृत्रासुरके वधके प्रयत्नमें लग गये। वे देवराज इन्द्रको आगे करके ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५ ॥
कृताञ्जलींस्तु तान् सर्वान् परमेष्ठीत्युवाच ह ।
विदितं मे सुराः सर्वं यद् वः कार्यं चिकीर्षितम् ॥ ६ ॥
वहाँ पहुँचकर सब देवता हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब ब्रह्माजीने उनसे कहा— 'देवताओ! तुम जो कार्य सिद्ध करना चाहते हो वह सब मुझे मालूम है ॥ ६ ॥
तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिष्यथ ।
दधीच इति विख्यातो महानृषिरुदारधीः ।। ७ ।। तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै सम्प्रयाचत । स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ।। ८ ।। ‘मैं तुम्हें एक उपाय बता रहा हूँ, जिससे तुम वृत्रासुरका वध कर सकोगे। दधीच नामसे विख्यात जो उदारचेता महर्षि हैं, उनके पास जाकर तुम सब लोग एक साथ एक ही वर माँगो। वे बड़े धर्मात्मा हैं। अत्यन्त प्रसन्नमनसे तुम्हें मुँहमाँगी वस्तु देंगे ।। ७-८ ।। स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्भिर्जयकाङ्क्षिभिः । स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै ।। ९ ।। ‘जब वे वर देना स्वीकार कर लें तब विजयकी अभिलाषा रखनेवाले तुम सब लोग उनसे एक साथ यों कहना—‘महात्मन्! आप तीनों लोकोंके हितके लिये अपने शरीरकी हड्डियाँ प्रदान करें’ ।। ९ ।। स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति । तस्यास्थिभिर्महाघोरं वज्रं संस्क्रियतां दृढम् ।। १० ।। ‘तुम्हारे माँगनेपर वे शरीर त्यागकर अपनी हड्डियाँ दे देंगे। उनकी उन हड्डियोंद्वारा तुमलोग सुदृढ़ एवं अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करो ।। १० ।। महच्छत्रुहणं घोरं षडश्रं भीमनिःस्वनम् । तेन वज्रेण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतुः ।। ११ ।।
अध्याय (पृष्ठ 719)
देवताओंद्वारा वृत्रासुरके वधके लिये दधीचिसे उनकी अस्थियोंकी याचना
देवराज इन्द्रका वज्रके प्रहारसे वृत्रासुरका वध करना
'उसकी आकृति षट्कोणके समान होगी। वह महान् एवं घोर शत्रुनाशक अस्त्र भयंकर गड़गड़ाहट पैदा करनेवाला होगा। उस वज्रके द्वारा इन्द्र निश्चय ही वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ।। ११ ।।
एतद् वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् । एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ।। १२ ।। नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययुः । सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ।। १३ ।।
'ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं। अतः अब शीघ्रता करो।' ब्रह्माजीके ऐसा करनेपर सब देवता उनकी आज्ञा ले भगवान् नारायणको आगे करके दधीचके आश्रमपर गये। वह आश्रम सरस्वती नदीके उस पार था। अनेक प्रकारके वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं ।। १२-१३ ।।
षट्पदोद्गीतनिनादैर्विघुष्टं सामगैरिव । पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवं जीवकनादितम् ।। १४ ।।
भ्रमरोंके गीतोंकी ध्वनिसे वह स्थान इस प्रकार गूँज रहा था, मानो सामगान करनेवाले ब्राह्मणोंद्वारा सामवेदका पाठ हो रहा हो। कोकिलके कलरवोंसे कूजित और दूसरे जन्तुओं (पशु-पक्षियों) के शब्दोंसे कोलाहलपूर्ण बना हुआ वह आश्रम सजीव-सा जान पड़ता था ।। १४ ।।
महिषैश्च वराहेश्च सृमरैश्चमरैरपि । तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभयवर्जितैः ।। १५ ।।
भैंसे, सूअर, बालमृग और चवँरी गायें बाघ-सिंहोंके भयसे रहित हो उस आश्रमके आस-पास विचर रही थीं ।। १५ ।।
करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः । सरोऽवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ।। १६ ।।
अपने कपोलोंसे मदकी धारा बहानेवाले हाथी और हथिनियाँ वहाँ सरोवरके जलमें गोते लगाकर क्रीड़ाएँ कर रहे थे, जिससे आश्रमके चारों ओर कोलाहल-सा हो रहा था ।। १६ ।।
सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् । अपरैश्चापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभिः ।। १७ ।।
पर्वतोंकी गुफाओं तथा कन्दराओंमें लेटे, झाड़ियोंमें छिपे और वनमें विचरते हुए जोर-जोरसे दहाड़नेवाले सिंहों और व्याघ्रोंकी गर्जनासे वह स्थान गूँज रहा था ।।
तेषु तेष्ववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् । त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ।। १८ ।।
विभिन्न स्थानोंमें अधिक शोभा पानेवाला महर्षि दधीचका वह मनोरम आश्रम स्वर्गके समान प्रतीत होता था। देवता लोग वहाँ आ पहुँचे ॥ १८ ॥ तत्रापश्यन् दधीचं ते दिवाकरसमद्युतिम् । जाज्वल्यमानं वपुषा यथा लक्ष्म्या पितामहम् ॥ १९ ॥ उन्होंने देखा, महर्षि दधीच भगवान् सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं। अपने शरीरकी दिव्य कान्तिसे साक्षात् ब्रह्माजीके समान जान पड़ते हैं ॥ १९ ॥
तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवाद्य प्रणम्य च । अयाचन्त वरं सर्वे यथोक्तं परमेष्ठिना ॥ २० ॥ राजन्! उस समय सब देवताओंने महर्षिके चरणोंमें अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजीने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा ॥ २० ॥ ततो दधीचः परमप्रतीतः सुरोत्तमांस्तानिदमभ्युवाच । करोमि यद् वो हितमद्य देवाः स्वं चापि देहं स्वयमुत्सृजामि ॥ २१ ॥ तब महर्षि दधीचने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओंसे इस प्रकार कहा—‘देवगण! आज मैं वही करूँगा, जिससे आपलोगोंका हित हो। अपने इस शरीरको मैं
स्वयं ही त्याग देता हूँ' ।। २१ ।। स एवमुक्त्वा द्विपदां वरिष्ठः प्राणान् वशी स्वान् सहसोत्ससर्ज । ततः सुरास्ते जगृहुः परासो- रस्थीनि तस्याथ यथोपदेशम् ।। २२ ।। ऐसा कहकर मनुष्योंमें श्रेष्ठ, जितेन्द्रिय महर्षि दधीचने सहसा अपने प्राणोंका त्याग कर दिया। तब देवताओंने ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार महर्षिके निर्जीव शरीरसे हड्डियाँ ले लीं ।। २२ ।। प्रहृष्टरूपाश्च जयाय देवा- स्त्वष्टारमागम्य तमर्थमूचुः । त्वष्टा तु तेषां वचनं निशम्य प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् ।। २३ ।। चकार वज्रं भृशमुग्ररूपं कृत्वा च शक्रं स उवाच हृष्टः । अनेन वज्रप्रवरेण देव भस्मीकुरुष्वाद्य सुरारिमुग्रम् ।। २४ ।। इसके बाद वे हर्षोल्लाससे भरकर विजयकी आशा लिये त्वष्टा प्रजापतिके पास आये और उनसे अपना प्रयोजन बताया। देवताओंकी बात सुनकर त्वष्टा प्रजापति बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने एकाग्रचित्त हो प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण किया। तत्पश्चात् वे हर्षमें भरकर इन्द्रसे बोले—'देव! इस उत्तम वज्रसे आप आज ही भयंकर देवद्रोही वृत्रासुरको भस्म कर डालिये ।। ततो हतारिः सगणः सुखं वै प्रशाधि कृत्स्नं त्रिदिवं दिविष्ठः । त्वष्ट्रा तथोक्तस्तु पुरंदरस्तद् वज्रं प्रहृष्टः प्रयतो ह्यगृह्णात् ।। २५ ।। 'इस प्रकार शत्रुके मारे जानेपर आप देवगणोंके साथ स्वर्गमें रहकर सुखपूर्वक सम्पूर्ण स्वर्गका शासन एवं पालन कीजिये।' त्वष्टा प्रजापतिके ऐसा कहनेपर इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शुद्धचित्त होकर उनके हाथसे वह वज्र ले लिया ।। २५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां वज्रनिर्माणकथने शततमोऽध्यायः ।। १०० ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वज्रनिर्माणकथनविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०० ।।
१०१-
एकाधिकशततमोऽध्यायः
वृत्रासुरका वध और असुरोंकी भयंकर मन्त्रणा
लोमश उवाच
ततः स वज्री बलिभिर्देवैरभिरक्षितः ।
आससाद ततो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्र बलवान् देवताओंसे सुरक्षित हो वृत्रासुरके पास गये। वह असुर भूलोक और आकाशको घेरकर खड़ा था ॥ १ ॥
कालकेयैर्महाकायैः समन्तादभिरक्षितम् ।
समुद्यतप्रहरणैः सशृङ्गैरिव पर्वतैः ॥ २ ॥
कालकेय नामवाले विशालकाय दैत्य, जो हाथोंमें हथियार लिये होनेके कारण शृंगयुक्त पर्वतोंके समान जान पड़ते थे, चारों ओरसे उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ २ ॥
ततो युद्धं समभवद् देवानां दानवैः सह ।
मुहूर्तं भरतश्रेष्ठ लोकत्रासकरं महत् ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इन्द्रके आते ही देवताओंका दानवोंके साथ दो घड़ीतक बड़ा भीषण युद्ध हुआ जो तीनों लोकोंको त्रसा करनेवाला था ॥ ३ ॥
उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः ।
आसीत् सुतुमुलः शब्दः शरीरेष्वभिपात्यताम् ॥ ४ ॥
वीरोंकी भुजाओंके साथ उठे हुए खड्ग शत्रुके शरीरोंपर पड़ते और विपक्षी योद्धाओंके घातक प्रहारोंसे टूटकर चूर-चूर हो जाते थे, उस समय उनका अत्यन्त भयंकर शब्द सुन पड़ता था ॥ ४ ॥
शिरोभिः प्रपतद्भिश्चाप्यन्तरिक्षान्महीतलम् ।
तालैरिव महाराज वृन्ताद् भ्रष्टैरदृश्यत ॥ ५ ॥
महाराज! अपने मूल स्थानसे टूटकर गिरे हुए ताल-फलोंके समान आकाशसे गिरते हुए योद्धाओंके मस्तकों-द्वारा वहाँकी भूमि आच्छादित दिखायी देती थी ॥ ५ ॥
ते हेमकवचा भूत्वा कालेयाः परिघायुधाः ।
त्रिदशानभ्यवर्तन्त दावदग्धा इवाद्रयः ॥ ६ ॥
कालकेयोंने सोनेके कवच धारण करके हाथोंमें परिघ लिये देवताओंपर धावा किया। उस समय वे दानव दावानलसे दग्ध हुए पर्वतोंकी भाँति दिखायी देते थे ॥ ६ ॥
तेषां वेगवतां वेगं साभिमानं प्रधावताम् ।
न शेकुस्त्रिदशाः सोढुं ते भग्नाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ७ ॥
अभिमानपूर्वक आक्रमण करनेवाले उन वेगशाली दैत्योंका वेग देवताओंके लिये असह्य हो गया। वे अपने दलसे बिछुड़कर भयसे भागने लगे ॥ ७ ॥
तान् दृष्ट्वा द्रवतो भीतान् सहस्राक्षः पुरंदरः ।
वृत्रे विवर्धमाने च कश्मलं महदाविशत् ॥ ८ ॥
देवताओंको डरकर भागते देख वृत्रासुरकी प्रगतिका अनुमान करके सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्रपर महान् मोह छा गया ॥ ८ ॥
कालेयभयसंत्रस्तो देवः साक्षात् पुरंदरः ।
जगाम शरणं शीघ्रं तं तु नारायणं प्रभुम् ॥ ९ ॥
कालेयोंके भयसे त्रस्त हुए साक्षात् इन्द्रदेवने सर्व-शक्तिमान् भगवान् नारायणकी शीघ्रतापूर्वक शरण ली ॥
तं शक्रं कश्मलाविष्टं दृष्ट्वा विष्णुः सनातनः ।
स्वतेजो व्यदधाच्छक्रे बलमस्य विवर्धयन् ॥ १० ॥
इन्द्रको इस प्रकार मोहाच्छन्न होते देख सनातन भगवान् विष्णुने उनका बल बढ़ाते हुए उनमें अपना तेज स्थापित कर दिया ॥ १० ॥
विष्णुना गोपितं शक्रं दृष्ट्वा देवगणास्ततः ।
सर्वे तेजः समादध्युस्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ११ ॥
देवताओंने देखा इन्द्र भगवान् विष्णुके द्वारा सुरक्षित हो गये हैं, तब उन सबने तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले ब्रह्मर्षियोंने भी देवराज इन्द्रमें अपना-अपना तेज भर दिया ॥ ११ ॥
स समाप्यायितः शक्रो विष्णुना दैवतैः सह ।
ऋषिभिश्च महाभागैर्बलवान् समपद्यत ॥ १२ ॥
ज्ञात्वा बलस्थं त्रिदशाधिपं तु
ननाद वृत्रो महतो निनादान् ।
तस्य प्रणादेन धरा दिशश्च
खं द्यौर्नगाश्चापि चचाल सर्वम् ॥ १३ ॥
देवताओंसहित श्रीविष्णु तथा महाभाग महर्षियोंके तेजसे परिपूर्ण हो देवराज इन्द्र अत्यन्त बलशाली हो गये। देवेश्वर इन्द्रको बलसे सम्पन्न जान वृत्रासुरने बड़ी विकट गर्जना की। उसके सिंहनादसे भूलोक, सम्पूर्ण दिशाएँ, आकाश, स्वर्गलोक तथा पर्वत सब-के-सब काँप उठे ॥ १२-१३ ॥
ततो महेन्द्रः परमाभितप्तः
श्रुत्वा रवं घोररूपं महान्तम् ।
भये निमग्नस्त्वरितो मुमोच
वज्रं महत् तस्य वधाय राजन् ॥ १४ ॥