महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ही होते हैं, प्राणियोंके विकार<sup>३</sup> भी ग्यारह हैं, तथा स्वर्गीय देवताओंमें जो रुद्र<sup>३</sup> कहलाते हैं; उनकी संख्या भी ग्यारह ही है ॥ १८ ॥
अष्टावक्र उवाच
संवत्सरं द्वादशमासमाहु-
र्जगत्याः पादो द्वादशैवाक्षराणि ।
द्वादशाहः प्राकृतो यज्ञ उक्तो
द्वादशादित्यान् कथयन्तीह धीराः ॥ १९ ॥
**अष्टावक्र बोले—**एक संवत्सरमें बारह महीने बताये गये हैं, जगती छन्दका प्रत्येक पाद बारह अक्षरोंका होता है, प्राकृत यज्ञ बारह दिनोंका माना गया है, ज्ञानी पुरुष यहाँ बारह<sup>४</sup> आदित्योंका वर्णन करते हैं ॥ १९ ॥
बन्द्युवाच
त्रयोदशी तिथिरुक्ता प्रशस्ता
त्रयोदशद्वीपवती मही च ।
**बन्दीने कहा—**त्रयोदशी तिथि उत्तम बतायी गयी है तथा यह पृथ्वी तेरह द्वीपोंसे युक्त है।
लोमश उवाच
एतावदुक्त्वा विरराम बन्दी
श्लोकस्यार्धं व्याजहाराष्टावक्रः ।
**लोमशजी कहते हैं—**इतना कहकर बन्दी चुप हो गया। तब शेष आधे श्लोककी पूर्ति अष्टावक्रने इस प्रकार की।
अष्टावक्र उवाच
त्रयोदशाहानि ससार केशी
त्रयोदशादीन्यतिच्छन्दांसि चाहुः ॥ २० ॥
**अष्टावक्र बोले—**केशी नामक दानवने भगवान् विष्णुके साथ तेरह<sup>५</sup> दिनोंतक युद्ध किया था। वेदमें जो अतिशब्द-विशिष्ट छन्द बताये गये हैं, उनका एक-एक पाद तेरह आदि अक्षरोंसे सम्पन्न होता है (अर्थात् अतिजगती छन्दका एक पाद तेरह अक्षरोंका, अतिशक्वरीका एक पाद पन्द्रह अक्षरोंका, अत्यष्टिका प्रत्येक पाद सत्रह अक्षरोंका तथा अतिधृतिका हर एक पाद उन्नीस अक्षरोंका होता है) ॥ २० ॥
ततो महानुदतिष्ठन्निनाद-
स्तूष्णींभूतं सूतपुत्रं निशम्य ।
अधोमुखं ध्यानपरं तदानी-
मष्टावक्रं चाप्युदीर्यन्तमेव ॥ २१ ॥
लोमशजी कहते हैं—इतना सुनते ही सूतपुत्र बन्दी चुप हो गया और मुँह
नीचा किये किसी भारी सोच-विचारमें पड़ गया। इधर अष्टावक्र बोलते ही रहे,
यह सब देख दर्शकों और श्रोताओंमें महान् कोलाहल मच गया ॥ २१ ॥
तस्मिंस्तथा संकुले वर्तमाने
स्फीते यज्ञे जनकस्योत राज्ञः ।
अष्टावक्रं पूजयन्तोऽभ्युपेयु-
र्विप्राः सर्वे प्राञ्जलयः प्रतीताः ॥ २२ ॥
महाराज जनकके उस समृद्धिशाली यज्ञमें जबकि चारों ओर कोलाहल
व्याप्त हो रहा था, सब ब्राह्मण हाथ जोड़े हुए श्रद्धापूर्वक अष्टावक्रके समीप
आये और उनका आदर-सत्कारपूर्वक पूजन किया ॥ २२ ॥
अष्टावक्र उवाच
अनेनैव ब्राह्मणाः शुश्रुवांसो
वादे जित्वा सलिले मज्जिताः प्राक् ।
तानेव धर्मानियमद्य बन्दी
प्राप्नोतु गृह्याप्सु निमज्जयैनम् ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् अष्टावक्रने कहा—महाराज! इस बन्दीने पहले बहुत-से शास्त्रज्ञ
(विद्वान्) ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें पराजित करके पानीमें डुबवाया है, अतः इसकी
भी वही गति होनी चाहिये जो इसके द्वारा दूसरोंकी हुई। इसलिये इसे पकड़कर
शीघ्र पानीमें डुबवा दीजिये ॥ २३ ॥
बन्द्युवाच
अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञ-
स्तत्रास सत्रं द्वादशवार्षिकं वै ।
सत्रेण ते जनक तुल्यकालं
तदर्थं ते प्रहिता मे द्विजाग्रयाः ॥ २४ ॥
बन्दी बोला—महाराज जनक! मैं राजा वरुणका पुत्र हूँ। मेरे पिताके यहाँ
भी आपके इस यज्ञके समान ही बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाला यज्ञ हो रहा था।
उस यज्ञके अनुष्ठानके लिये ही (जलमें डुबानेके बहाने) कुछ चुने हुए श्रेष्ठ
ब्राह्मणोंको मैंने वरुणलोकमें भेज दिया था ॥ २४ ॥
ते तु सर्वे वरुणस्योत यज्ञं
द्रष्टुं गता इह आयान्ति भूयः ।
अष्टावक्रं पूजये पूजनीयं
यस्य हेतोर्जनितारं समेष्ये ॥ २५ ॥
वे सब-के-सब वरुणका यज्ञ देखनेके लिये गये हैं और अब पुनः लौटकर आ रहे हैं। मैं पूजनीय ब्राह्मण अष्टावक्रजीका सत्कार करता हूँ; जिनके कारण मेरा अपने पिताजीसे मिलना होगा ॥ २५ ॥
अष्टावक्र उवाच
विप्राः समुद्राम्भसि मज्जिता ये
वाचा जिता मेधया वा विदानाः ।
तां मेधया वाचमथोज्जहार
यथा वाचमवचिन्वन्ति सन्तः ॥ २६ ॥
अष्टावक्र बोले— राजन्! बन्दीने अपनी जिस वाणी (प्रवचनपटुता अथवा मेधा—बुद्धिबल)-से विद्वान् ब्राह्मणोंको भी परास्त किया और समुद्रके जलमें डुबोया है, उसकी उस वाक्शक्तिको मैंने अपनी बुद्धिसे किस प्रकार उखाड़ फेंका है, यह सब इस सभामें बैठे हुए विद्वान् पुरुष मेरी बातें सुनकर ही जान गये होंगे ॥ २६ ॥
अग्निर्दहञ्जातवेदाः सतां गृहान्
विसर्जयंस्तेजसा न स्म धाक्षीत् ।
बालेषु पुत्रेषु कृपणं वदत्सु
तथा वाचमवचिन्वन्ति सन्तः ॥ २७ ॥
अग्नि स्वभावसे ही दहन करनेवाला है तो भी वह ज्ञेय विषयको तत्काल जाननेमें समर्थ है। इस कारण परीक्षाके समय जो सदाचारी और सत्यवादी होते हैं उनके घरोंको (शरीरोंको) छोड़ देता है, जलाता नहीं। वैसे ही संतलोग भी विनम्रभावसे बोलनेवाले बालक पुत्रोंके वचनोंमेंसे जो सत्य और हितकर बात होती है, उसे चुन लेते हैं—(उसे मान लेते हैं, उनकी अवहेलना नहीं करते)। भाव यह कि तुमको मेरे वचनोंका भाव समझकर उन्हें ग्रहण करना चाहिये ॥ २७ ॥
श्लेष्मातकी क्षीणवर्चाः शृणोषि
उताहो त्वां स्तुतयो मादयन्ति ।
हस्तीव त्वं जनक विनुद्यमानो
न मामिकां वाचमिमां शृणोषि ॥ २८ ॥
राजन्! जान पड़ता है, तुमने लसोड़ेके पत्तोंपर भोजन किया है या उसका फल खा लिया है, इसीसे तुम्हारा तेज क्षीण हो गया है; अतः तुम बन्दीकी बात सुन रहे हो, अथवा इस बन्दीद्वारा की गयी स्तुतियाँ तुम्हें उन्मत्त कर रही हैं। यही कारण है कि अंकुशकी मार खाकर भी न माननेवाले मतवाले हाथीकी भाँति तुम मेरी इन बातोंको नहीं सुन रहे हो ॥ २८ ॥
जनक उवाच
शृणोमि वाचं तव दिव्यरूपाममानुषीं दिव्यरूपोऽसि साक्षात् ।
अजैषीर्यद् बन्दिनं त्वं विवादे
निसृष्ट एष तव कामोऽद्य बन्दी ॥ २९ ॥
**जनकने कहा—**ब्रह्मन्! मैं आपकी दिव्य एवं अलौकिक वाणी सुन रहा हूँ, आप साक्षात् दिव्यस्वरूप हैं, आपने शास्त्रार्थमें बन्दीको जीत लिया है। आपकी इच्छा अभी पूरी की जा रही है। देखिये यह है आपके द्वारा जीता हुआ बन्दी ॥ २९ ॥
अष्टावक्र उवाच
नानेन जीवता कश्चिदर्थो मे बन्दिना नृप ।
पिता यद्यस्य वरुणो मज्जयनैं जलाशये ॥ ३० ॥
**अष्टावक्र बोले—**महाराज! इस बन्दीके जीवित रहनेसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यदि इसके पिता वरुणदेव हैं तो उनके पास जानेके लिये इसे निश्चय ही जलाशयमें डुबो दीजिये ॥ ३० ॥
बन्द्युवाच
अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञो
न मे भयं विद्यते मज्जितस्य ।
इमं मुहूर्तं पितरं द्रक्ष्यतेऽयमष्टावक्रश्चिरनष्टं कहोडम् ॥ ३१ ॥
**बन्दीने कहा—**राजन्! मैं वास्तवमें राजा वरुणका पुत्र हूँ, अतः जलमें डुबाये जानेका मुझे कोई भय नहीं है। ये अष्टावक्र दीर्घकालसे नष्ट हुए अपने पिता कहोडको इसी समय देखेंगे ॥ ३१ ॥
लोमश उवाच
ततस्ते पूजिता विप्रा वरुणेन महात्मना ।
उदतिष्ठंस्ततः सर्वे जनकस्य समीपतः ॥ ३२ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर महामना वरुणद्वारा पूजित हुए वे समस्त ब्राह्मण (जो बन्दीद्वारा जलमें डुबोये गये थे,) सहसा राजा जनकके समीप प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥
कहोड उवाच
इत्यर्थमिच्छन्ति सुताञ्जना जनक कर्मणा ।
यदहं नाशकं कर्तुं तत् पुत्रः कृतवान् मम ॥ ३३ ॥
**उस समय कहोडने कहा—**जनकराज! लोग इसीलिये अच्छे कर्मोंद्वारा पुत्र पानेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि जो कार्य मैं नहीं कर सका, उसे मेरे पुत्रने कर दिखाया ॥ ३३ ॥
उताबल्स्य बलवानुत बालस्य पण्डितः ।
उत वाविदुषो विद्वान् पुत्रो जनक जायते ॥ ३४ ॥
जनकराज! कभी-कभी निर्बलके भी बलवान्, मूर्खके भी पण्डित तथा अज्ञानीके भी ज्ञानी पुत्र उत्पन्न हो जाता है ॥ ३४ ॥
शितेन ते परशुना स्वयमेवान्तको नृप ।
शिरांस्यपाहरत्वाजौ रिपूणां भद्रमस्तु ते ॥ ३५ ॥
राजन्! आपका कल्याण हो, युद्धमें स्वयं ही यमराज तीखे फरसेसे आपके शत्रुओंके मस्तक काटते रहें ॥ ३५ ॥
महदौक्थ्यं गीयते साम चाग्र्यं
सम्यक् सोमः पीयते चात्र सत्रे ।
शुचीन् भागान् प्रतिजगृहुश्च हृष्टाः
साक्षाद् देवा जनकस्योत राज्ञः ॥ ३६ ॥
महाराज जनकके इस यज्ञमें उत्तम एवं महत्त्वपूर्ण और औक्थ्य* सामका गान किया जाता है, विधिपूर्वक सोमरसका पान हो रहा है, देवगण प्रत्यक्ष दर्शन देकर बड़े हर्षके साथ अपने-अपने पवित्र भाग ग्रहण कर रहे हैं ॥ ३६ ॥
लोमश उवाच
समुत्थितेष्वथ सर्वेषु राजन्
विप्रेषु तेष्वधिकं सुप्रभेषु ।
अनुज्ञातो जनकेनाथ राज्ञा
विवेश तोयं सागरस्योत बन्दी ॥ ३७ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! बन्दीद्वारा जलमें डुबोये हुए वे सभी ब्राह्मण जब वहाँ अधिक तेजस्वी रूपसे प्रकट हो गये, तब राजाकी आज्ञा लेकर बन्दी स्वयं ही समुद्रके जलमें समा गया ॥ ३७ ॥
अष्टावक्रः पितरं पूजयित्वा सम्पूजितो ब्राह्मणैस्तैर्यथावत् । प्रत्याजगामाश्रममेव चाग्र्यं जित्वा सौतिं सहितो मातुलेन ॥ ३८ ॥ अष्टावक्र अपने पिताकी पूजा करके स्वयं भी दूसरे ब्राह्मणोंद्वारा यथोचितरूपसे सम्मानित हुए; और इस प्रकार बन्दीपर विजय पाकर पिता एवं मामाके साथ अपने श्रेष्ठ आश्रमपर ही लौट आये ॥ ३८ ॥
ततोऽष्टावक्रमातुरथान्तिके पिता नदीं समङ्गां शीघ्रमिमां विशस्व । प्रोवाच चैनं स तथा विवेश समैरङ्गैश्चापि बभूव सद्यः ॥ ३९ ॥ तदनन्तर पिता कहोडने अष्टावक्रकी माता सुजाताके निकट पुत्र अष्टावक्रसे कहा—'बेटा! तुम शीघ्र ही इस 'समंगा' नदीमें स्नानके लिये प्रवेश करो।' पिताकी आज्ञाके अनुसार उन्होंने उस नदीमें स्नानके लिये प्रवेश किया। उसके जलका स्पर्श होनेपर तत्काल ही उनके सब अंग सीधे हो गये ॥ ३९ ॥
नदी समङ्गा च बभूव पुण्या यस्यां स्नातो मुच्यते किल्बिषाद्धि । त्वमप्येनां स्नानपानावगाहैः सभ्रातृकः सहभार्यो विशस्व ॥ ४० ॥ युधिष्ठिर! इसीसे समंगा नदी पुण्यमयी हो गयी। इसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तुम भी स्नान, पान (आचमन) और अवगाहनके लिये अपनी पत्नी और भाइयोंके साथ इस नदीमें प्रवेश करो ॥ ४० ॥
अत्र कौन्तेय सहितो भ्रातृभिस्त्वं सुखोषितः सह विप्रैः प्रतीतः । पुण्यान्यन्यानि शुचिकर्मैकभक्ति- र्मया सार्धं चरितस्याजमीढ ॥ ४१ ॥ अजमीढ़कुलभूषण कुन्तीनन्दन! तुम विश्वासपूर्वक अपने भाइयों और ब्राह्मणोंके साथ यहाँ एक रात सुखसे रहकर कलसे पुनः मेरे साथ पवित्र कर्मोंमें अविचल श्रद्धा-भक्ति रखते हुए दूसरे-दूसरे पुण्यतीर्थोंकी यात्रा करना ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रियोपाख्यानविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥
* यहाँ अष्टावक्रजीने परोक्षरूपमें ही प्रश्नका उत्तर दिया है। भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषामें रयि और प्राणके नामसे कहा है (देखिये प्रश्नोपनिषद् १।४) एवं अंग्रेजीमें जिनको पोजिटिव (अनुलोम) और निगेटिव (प्रतिलोम) कहते हैं, स्वभावसे ही संयुक्त रहनेवाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप विद्युत्-शक्ति है। उसे गर्भकी भाँति मेघ धारण किये रहता है। संघर्षसे वह प्रकट होती है और आकर्षण होनेपर बाजकी भाँति गिरती है। जहाँ गिरती है वहाँ सबको भस्म कर देती है; इसलिये यह कहा गया कि वह कभी आपके शत्रुओंके घरपर भी न पड़े। इन दो तत्त्वोंकी संयुक्त शक्तिसे ही मेघकी उत्पत्ति होती है। इसलिये यह कहा गया कि उस मेघरूप गर्भको ये उत्पन्न करते हैं।
१- ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास। २- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ३- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर। ४- ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और हल्। ५- परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी—ये वाणीके चार पैर हैं। ६- आठ-आठ अक्षरके पाँच पादोंसे पंक्तिछन्दकी सिद्धि होती है। ७- त्वचा, श्रोत्र, नेत्र, रसना और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ८- पंचचूड़ा अप्सराका उल्लेख महाभारतके अनुशासनपर्वमें ३८वें अध्यायमें भी आया है। ९- विपाशा (व्यास), इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चिनाव) और शतद्रू (सतलज) ये ही पञ्चनद प्रदेशकी पाँच नदियाँ हैं।
१- हिरन, शूकर, खरगोश, गीदड़ आदि जन्तुओंका ग्रहण मृग नामसे ही हो जाता है। २- सप्तर्षि ये हैं— मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ (महा० शान्ति० ३४०।६९) '(भगवान्ने स्वयं ब्रह्माजीसे कहा है कि) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ—ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं।'
३- धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ (महा० आदि० ६६।१८) 'धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं।'
४- यथा रोगी, दरिद्र, शोकार्त, राजदण्डित, शठ, खल, वृत्तिसे वंचित, उन्मत्त, ईर्ष्यापरायण और कामी —ये दस निन्दक होते हैं। जैसा कि निम्नांकित श्लोकसे सिद्ध होता है—'आमयी दुर्मतः शोकी दण्डितश्च शठः खलः । नष्टवृत्तिर्मदी चेर्ष्या कामी च दश निन्दकाः ॥' (इति नीतिशास्त्रोक्तिः) ५- उन दसों अवस्थाओंके नाम इस प्रकार हैं—गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, यौवन, प्रौढ़, वार्द्धक्य तथा मृत्यु। ६- अध्यापक, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, श्वशुर, नाना, दादा, अपनेसे बड़ी अवस्थावाले कुटुम्बी तथा पितृव्य (चाचा-ताऊ)—ये दस पूजनीय पुरुष माने गये हैं। जैसा कि कूर्मपुराणका वचन है—उपाध्यायः पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव मातामहपितामहौ ॥ बन्धुर्जेष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवो मताः ॥
१- वाक्य बोलना, ग्रहण करना, चलना-फिरना, मलत्याग करना और मैथुनजनित सुखका अनुभव करना—ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं और इन सबका मनन—मनका विषय है। इस प्रकार कुल मिलाकर ग्यारह विषय हैं। २- काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, हर्ष-शोक, राग-द्वेष और अहंकार—ये ग्यारह विकार होते हैं। ३- एकादश रुद्र ये हैं— मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतपः ॥ दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः । स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ॥
(महाभारत आदि० ६६।२-३)
‘मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, शत्रु-संतापन पिनाकी, दहन, ईश्वर, परमकान्तिमान् कपाली, स्थाणु और भगवान् भव—ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं।’
४- द्वादश आदित्य ये हैं—
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥
एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते ।
(महा० आदि० ६५।१५-१६)
‘धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये हैं।’
५- नृसिंहपुराणमें यही बात कही गयी है—‘युयुधे विष्णुना सार्धं त्रयोदश दिनान्यसौ ।’
* उक्थ नाम यज्ञविशेषमें गाये जानेयोग्य सामको औक्थ्य कहते हैं।
कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु
लोमश उवाच
एषा मधुविला राजन् समङ्गा सम्प्रकाशते ।
एतत् कर्दमिलं नाम भरतस्याभिषेचनम् ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! यह मधुविला नदी प्रकाशित हो रही है। इसीका दूसरा नाम समंगा है और यह कर्दमिल नामक क्षेत्र है, जहाँ राजा भरतका अभिषेक किया गया था ॥ १ ॥
अलक्ष्म्या किल संयुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः ।
आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गायां व्यमुच्यत ॥ २ ॥
कहते हैं, वृत्रासुरका वध करके जब शचीपति इन्द्र श्रीहीन हो गये थे, उस समय उस समंगा नदीमें गोता लगाकर ही वे अपने सब पापोंसे छुटकारा पा सके थे ॥ २ ॥
एतद् विनशनं कुक्षौ मैनाकस्य नरर्षभ ।
अदितिर्यत्र पुत्रार्थं तदन्नमपचत् पुरा ॥ ३ ॥
नरश्रेष्ठ! मैनाक पर्वतके कुक्षिभागमें यह विनशन नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें अदिति देवीने पुत्र-प्राप्तिके लिये साध्य देवताओंके उद्देश्यसे अन्न* तैयार किया था ॥ ३ ॥
एनं पर्वतराजानमारुह्य भरतर्षभाः ।
अयशस्यामसंशब्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ॥ ४ ॥
भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुषो! इस पर्वतराज हिमालयपर आरूढ़ होकर तुम सब अयश फैलानेवाली और नाम लेनेके अयोग्य अपनी श्रीहीनताको शीघ्र ही दूर भगा दोगे ॥ ४ ॥
एते कनखला राजन्नृषीणां दयिता नगाः ।
एषा प्रकाशते गङ्गा युधिष्ठिर महानदी ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर! ये कनखलकी पर्वत-मालाएँ हैं जो ऋषियोंको बहुत प्रिय लगती हैं। ये महानदी गंगा सुशोभित हो रही हैं ॥ ५ ॥
सनत्कुमारो भगवानत्र सिद्धिमगात् पुरा ।
आजमीढावगाह्यैनां सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥ ६ ॥
यहीं पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने सिद्धि प्राप्त की थी। अजमीढनन्दन! इस गंगामें स्नान करके तुम सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगे ॥ ६ ॥
अपां हृदं च पुण्याख्यं भृगुतुङ्गं च पर्वतम् । उष्णीगङ्गे च कौन्तेय सामात्यः समुपस्पृश ॥ ७ ॥ कुन्तीकुमार! जलके इस पुण्य सरोवर, भृगुतुंग पर्वतपर तथा ‘उष्णीगंग’ नामक तीर्थमें जाकर तुम अपने मन्त्रियोंसहित स्नान और आचमन करो ॥ ७ ॥
आश्रमः स्थूलशिरसो रमणीयः प्रकाशते । अत्र मानं च कौन्तेय क्रोधं चैव विवर्जय ॥ ८ ॥ यह स्थूलशिरा मुनिका रमणीय आश्रम शोभा पा रहा है। कुन्तीनन्दन! यहाँ अहंकार और क्रोधको त्याग दो ॥ ८ ॥
एष रैभ्याश्रमः श्रीमान् पाण्डवेय प्रकाशते । भारद्वाजो यत्र कविर्यवक्रीतो व्यनश्यत ॥ ९ ॥ पाण्डुनन्दन! यह रैभ्यका सुन्दर आश्रम प्रकाशित हो रहा है, जहाँ विद्वान् भरद्वाजपुत्र यवक्रीत नष्ट हो गये थे ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं युक्तोऽभवदृषिर्भरद्वाजः प्रतापवान् । किमर्थं च यवक्रीतः पुत्रोऽनश्यत वै मुनेः ॥ १० ॥ युधिष्ठिरने पूछा—ब्रह्मन्! प्रतापी भरद्वाज मुनि कैसे योगयुक्त हुए थे और उनके पुत्र यवक्रीत किसलिये नष्ट हो गये थे? ॥ १० ॥
एतत् सर्वं यथावृत्तं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । कर्मभिर्देवकल्पानां कीर्त्यमानैर्भृशं रमे ॥ ११ ॥ ये सब बातें मैं यथार्थरूपसे ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। उन देवोपम मुनियोंके चरित्रोंका वर्णन सुनकर मेरे मनको बड़ा सुख मिलता है ॥ ११ ॥
लोमश उवाच
भरद्वाजश्च रैभ्यश्च सखायौ सम्बभूवतुः । तावूषतुरिहात्यन्तं प्रीयमाणावनन्तरम् ॥ १२ ॥ लोमशजीने कहा—राजन्! भरद्वाज तथा रैभ्य दोनों एक-दूसरेके सखा थे और निरन्तर इसी आश्रममें बड़े प्रेमसे रहा करते थे ॥ १२ ॥
रैभ्यस्य तु सुतावास्तामर्वावसुपरावसू । आसीद् यवक्रीः पुत्रस्तु भरद्वाजस्य भारत ॥ १३ ॥ रैभ्यके दो पुत्र थे—अर्वावसु और परावसु। भारत! भरद्वाजके पुत्रका नाम ‘यवक्री’ अथवा ‘यवक्रीत’ था ॥ १३ ॥
रैभ्यो विद्वान् सहापत्यस्तपस्वी चेतरोऽभवत् । तयोश्चाप्यतुला कीर्तिर्बाल्यात् प्रभृति भारत ॥ १४ ॥
भारत! पुत्रोंसहित रैभ्य बड़े विद्वान् थे, परंतु भरद्वाज केवल तपस्यामें संलग्न रहते थे। युधिष्ठिर! बाल्यावस्थासे ही इन दोनों महात्माओंकी अनुपम कीर्ति सब ओर फैल रही थी ॥ १४ ॥
यवक्रीः पितरं दृष्ट्वा तपस्विनमसत्कृतम् ।
दृष्ट्वा च सत्कृतं विप्रै रैभ्यं पुत्रैः सहानघ ॥ १५ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! यवक्रीतने देखा, मेरे तपस्वी पिताका लोग सत्कार नहीं करते हैं; परंतु पुत्रोंसहित रैभ्यका ब्राह्मणोंद्वारा बड़ा आदर होता है ॥ १५ ॥
पर्यतप्यत तेजस्वी मन्युनाभिपरिप्लुतः ।
तपस्तेपे ततो घोरं वेदज्ञानाय पाण्डव ॥ १६ ॥
यह देख तेजस्वी यवक्रीतको बड़ा संताप हुआ। पाण्डुनन्दन! वे क्रोधसे आविष्ट हो वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये घोर तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥
स समिद्धे महत्यग्नौ शरीरमुपतापयन् ।
जनयामास संतापमिन्द्रस्य सुमहातपाः ॥ १७ ॥
उन महातपस्वीने अत्यन्त प्रज्ज्वलित अग्निमें अपने शरीरको तपाते हुए इन्द्रके मनमें संताप उत्पन्न कर दिया ॥
तत इन्द्रो यवक्रीतमुपगम्य युधिष्ठिर ।
अब्रवीत् कस्य हेतोस्त्वमास्थितस्तप उत्तमम् ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! तब इन्द्र यवक्रीतके पास आकर बोले—'तुम किसलिये यह उच्चकोटिकी तपस्या कर रहे हो?' ॥ १८ ॥
यवक्रीत उवाच
द्विजानामनधीता वै वेदाः सुरगणार्चित ।
प्रतिभान्त्विति तप्येऽहमिदं परमकं तपः ॥ १९ ॥
यवक्रीतने कहा—देववृन्दपूजित महेन्द्र! मैं यह उच्चकोटिकी तपस्या इसलिये करता हूँ कि द्विजातियोंको बिना पढ़े ही सब वेदोंका ज्ञान हो जाय ॥ १९ ॥
स्वाध्यायर्थं समारम्भो ममायं पाकशासन ।
तपसा ज्ञातुमिच्छामि सर्वज्ञानानि कौशिक ॥ २० ॥
पाकशासन! मेरा यह आयोजन स्वाध्यायके लिये ही है। कौशिक! मैं तपस्याद्वारा सब बातोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ २० ॥
कालेन महता वेदाः शक्या गुरुमुखाद् विभो ।
प्राप्तुं तस्मादयं यत्नः परमो मे समास्थितः ॥ २१ ॥
प्रभो! गुरुके मुखसे दीर्घकालके पश्चात् वेदोंका ज्ञान हो सकता है। अतः मेरा यह महान् प्रयत्न शीघ्र ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये है ॥ २१ ॥
इन्द्र उवाच
अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि ।
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ॥ २२ ॥
**इन्द्र बोले—**विप्रर्षे! तुम जिस राहसे जाना चाहते हो, वह अध्ययनका मार्ग नहीं है। स्वाध्यायके समुचित मार्गको नष्ट करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? अतः जाओ गुरुके मुखसे ही अध्ययन करो ॥ २२ ॥
लोमश उवाच
एवमुक्त्वा गतः शक्रो यवक्रीरपि भारत ।
भूय एवाकरोद् यत्नं तपस्यमितविक्रमः ॥ २३ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर इन्द्र चले गये; तब अत्यन्त पराक्रमी यवक्रीतने भी पुनः तपस्याके लिये ही घोर प्रयास आरम्भ कर दिया ॥ २३ ॥
घोरेण तपसा राजंस्तप्यमानो महत् तपः ।
संतापयामास भृशं देवेन्द्रमिति नः श्रुतम् ॥ २४ ॥
राजन्! उसने घोर तपस्याद्वारा महान् तपका संचय करते हुए देवराज इन्द्रको अत्यन्त संतप्त कर दिया; यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २४ ॥
तं तथा तप्यमानं तु तपस्तीव्रं महामुनिम् ।
उपेत्य बलभिद् देवो वारयामास वै पुनः ॥ २५ ॥
अशक्योऽर्थः समारब्धो नैतद् बुद्धिकृतं तव ।
प्रतिभास्यन्ति वै वेदास्तव चैव पितुश्च ते ॥ २६ ॥
महामुनि यवक्रीतको इस प्रकार तपस्या करते देख इन्द्रने उनके पास जाकर पुनः मना किया और कहा—‘मुने! तुमने ऐसे कार्यका आरम्भ किया है जिसकी सिद्धि होनी असम्भव है। तुम्हारा यह (द्विजमात्रके लिये बिना पढ़े वेदका ज्ञान होनेका) आयोजन बुद्धि-संगत नहीं है; किंतु केवल तुमको और तुम्हारे पिताको ही वेदोंका ज्ञान होगा’ ॥ २५-२६ ॥
यवक्रीत उवाच
न चैतदेवं क्रियते देवराज ममेप्सितम् ।
महता नियमेनाहं तप्स्ये घोरतरं तपः ॥ २७ ॥
**यवक्रीतने कहा—**देवराज! यदि इस प्रकार आप मेरे इष्ट मनोरथकी सिद्धि नहीं करते हैं तो मैं और भी कठोर नियम लेकर अत्यन्त भयंकर तपस्यामें लग जाऊँगा ॥ २७ ॥
समिद्धेऽग्नावुपकृत्याङ्गमङ्गं
होश्यामि वा मघवंस्तन्निबोध ।
यद्येतदेवं न करोषि कामं
ममेप्सितं देवराजेह सर्वम् ॥ २८ ॥
देवराज इन्द्र! यदि आप यहाँ मेरी सारी मनोवांछित कामना पूरी नहीं करते हैं तो मैं प्रज्वलित अग्निमें अपने एक-एक अंगको होम दूँगा। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ॥ २८ ॥
लोमश उवाच
निश्चयं तमभिज्ञाय मुनेस्तस्य महात्मनः ।
प्रतिवारणहेत्वर्थं बुद्ध्या संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥ २९ ॥
तत इन्द्रोऽकरोद् रूपं ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
अनेकशतवर्षस्य दुर्बलस्य सयक्ष्मणः ॥ ३० ॥
लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! उन महामुनिके उस निश्चयको जानकर बुद्धिमान् इन्द्रने उन्हें रोकनेके लिये बुद्धिपूर्वक कुछ विचार किया और एक ऐसे तपस्वी ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया जिसकी उम्र कई सौ वर्षोंकी थी, तथा जो यक्ष्माका रोगी और दुर्बल दिखायी देता था ॥ २९-३० ॥
यवक्रीतस्य यत् तीर्थमुचितं शौचकर्मणि ।
भागीरथ्यां तत्र सेतुं वालुकाभिश्चकार सः ॥ ३१ ॥
गंगाके जिस तीर्थमें यवक्रीत मुनि स्नान आदि किया करते थे, उसीमें वे ब्राह्मण देवता बालूद्वारा पुल बनाने लगे ॥ ३१ ॥
यदास्य वदतो वाक्यं न स चक्रे द्विजोत्तमः ।
वालुकाभिस्ततः शक्रो गङ्गां समभिपूरयन् ॥ ३२ ॥
द्विजश्रेष्ठ यवक्रीतने जब इन्द्रका कहना नहीं माना, तब वे बालूसे गंगाजीको भरने लगे ॥ ३२ ॥
वालुकामुष्टिमनिश्ं भागीरथ्यां व्यसर्जयत् ।
सेतुमभ्यारभच्छक्रो यवक्रीतं निदर्शयन् ॥ ३३ ॥
वे निरन्तर एक-एक मुट्ठी बालू गंगाजीमें छोड़ते थे और इस प्रकार उन्होंने यवक्रीतको दिखाकर पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ३३ ॥
तं ददर्श यवक्रीतो यत्नवन्तं निबन्धने ।
प्रहसंश्चाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥ ३४ ॥
मुनिवर यवक्रीतने देखा, ब्राह्मण देवता पुल बाँधनेके लिये बड़े यत्नशील हैं, तब उन्होंने हँसते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ३४ ॥
किमिदं वर्तते ब्रह्मन् किं च ते ह चिकीर्षितम् ।
अतीव हि महान् यत्नः क्रियतेऽयं निरर्थकः ॥ ३५ ॥
‘ब्रह्मन्! यह क्या है? आप क्या करना चाहते हैं? आप प्रयत्न तो महान् कर रहे हैं, परंतु यह व्यर्थ है’ ॥
इन्द्र उवाच
बन्धिष्ये सेतुना गङ्गां सुखः पन्था भविष्यति ।
क्लिश्यते हि जनस्तात तरमाणः पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
**इन्द्र बोले—**तात! मैं गङ्गाजीपर पुल बाँधूँगा। इससे पार जानेके लिये सुखद मार्ग बन जायगा; क्योंकि पुलके न होनेसे इधर आने-जानेवाले लोगोंको बार-बार तैरनेका कष्ट उठाना पड़ता है ॥ ३६ ॥
यवक्रीत उवाच
नायं शक्यस्त्वया बद्धुं महानोघस्तपोधन ।
अशक्याद् विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ॥ ३७ ॥
**यवक्रीतने कहा—**तपोधन! यहाँ अगाध जलराशि भरी है; अतः तुम पुल बाँधनेमें सफल नहीं हो सकोगे। इसलिये इस असम्भव कार्यसे मुँह मोड़ लो और ऐसे कार्यमें हाथ डालो जो तुमसे हो सके ॥ ३७ ॥
इन्द्र उवाच
यथैव भवता चेदं तपो वेदाथमुद्यतम् ।
अशक्यं तद्वदस्माभिरयं भारः समाहितः ॥ ३८ ॥
**इन्द्र बोले—**मुने! जैसे आपने बिना पढ़े वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये यह तपस्या प्रारम्भ की है जिसकी सफलता असम्भव है, उसी प्रकार मैंने भी यह पुल बाँधनेका भार उठाया है ॥ ३८ ॥
यवक्रीत उवाच
यथा तव निरर्थोऽयमारम्भस्त्रिदशेश्वर ।
तथा यदि ममापीदं मन्यसे पाकशासन ॥ ३९ ॥
क्रियतां यद् भवेच्छक्यं त्वया सुरगणेश्वर ।
वरांश्च मे प्रयच्छान्यान् यैरन्यान् भवितास्म्यति ॥ ४० ॥
**यवक्रीतने कहा—**देवेश्वर पाकशासन! जैसे आपका यह पुल बाँधनेका आयोजन व्यर्थ है, उसी प्रकार यदि मेरी इस तपस्याको भी आप निरर्थक मानते हैं तो वही कार्य कीजिये जो सम्भव हो, मुझे ऐसे उत्तम वर प्रदान कीजिये, जिनके द्वारा मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ ॥ ३९-४० ॥
लोमश उवाच
तस्मै प्रादाद् वरानिन्द्र उक्तवान् यान् महातपाः ।
प्रतिभास्यन्ति ते वेदाः पित्रा सह यथेप्सिताः ॥ ४१ ॥
यच्चान्यत् काङ्क्षसे कामं यवक्रीर्गम्यतामिति ।
स लब्धकामः पितरं समेत्याथेदमब्रवीत् ॥ ४२ ॥ लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब इन्द्रने महातपस्वी यवक्रीतके कथनानुसार उन्हें वर देते हुए कहा—'यवक्रीत! तुम्हारे पितासहित तुम्हें वेदोंका यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो जायगा। साथ ही और भी जो तुम्हारी कामना हो, वह पूर्ण हो जायगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रमको लौट जाओ।' इस प्रकार पूर्णकाम होकर, यवक्रीत अपने पिताके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ ४१-४२ ॥
यवक्रीत उवाच
प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभयोः । अति चान्यान् भविष्यावो वरा लब्धास्तदा मया ॥ ४३ ॥ यवक्रीतने कहा— पिताजी! आपको और मुझे दोनोंको ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान हो जायगा। साथ ही हम दोनों दूसरोंसे ऊँची स्थितिमें हो जायँगे—ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है ॥ ४३ ॥
भरद्वाज उवाच
दर्पस्ते भविता तात वराँल्लब्ध्वा यथेप्सितान् । स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनङ्क्ष्यसि ॥ ४४ ॥ भरद्वाज बोले— तात! इस तरह मनोवाञ्छित वर प्राप्त करनेके कारण तुम्हारे मनमें अहंकार उत्पन्न हो जायगा और अहंकारसे युक्त होनेपर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ ४४ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा देवैरुदाहृताः । मुनिरासीत् पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ॥ ४५ ॥ इस विषयमें विज्ञजन देवताओंकी कही हुई यह गाथा सुनाया करते हैं—प्राचीनकालमें बालधि नामसे प्रसिद्ध एक शक्तिशाली मुनि थे ॥ ४५ ॥
स पुत्रशोकादुद्विग्नस्तपस्तेपे सुदुष्करम् । भवेन्मम सुतोऽमर्त्य इति तं लब्धवांश्च सः ॥ ४६ ॥ उन्होंने पुत्रशोकसे संतप्त होकर अत्यन्त कठोर तपस्या की। तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे देवोपम पुत्र प्राप्त हो। अपनी उस अभिलाषाके अनुसार बालधिको एक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ४६ ॥
तस्य प्रसादो वै देवैः कृतो न त्वमरैः समः । नामर्त्यो विद्यते मर्त्यो निमित्तायुर्भविष्यति ॥ ४७ ॥ देवताओंने उनपर कृपा अवश्य की, परंतु उनके पुत्रको देवतुल्य नहीं बनाया और वरदान देते हुए यह कहा 'कि मरणधर्मा मनुष्य कभी देवताके समान अमर नहीं हो सकता। अतः उसकी आयु निमित्त (कारण)-के अधीन होगी' ॥ ४७ ॥
बालधिरुवाच
यथेमे पर्वताः शश्वत् तिष्ठन्ति सुरसत्तमाः । अक्षयास्तन्निमित्तं मे सुतस्यायुर्भविष्यति ॥ ४८ ॥ बालधि बोले—देववरो! जैसे ये पर्वत सदा अक्षयभावसे खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयुके निमित्त होंगे अर्थात् जबतक ये पर्वत यहाँ बने रहें तबतक मेरा पुत्र भी जीवित रहे ॥ ४८ ॥
भरद्वाज उवाच
तस्य पुत्रस्तदा जज्ञे मेधावी क्रोधनस्तदा । स तच्छ्रुत्वाकरोद् दर्पमृषींश्चैवावमन्यत ॥ ४९ ॥ भरद्वाज कहते हैं—यवक्रीत! तदनन्तर बालधिके पुत्रका जन्म हुआ, जो मेधायुक्त होनेके कारण मेधावी नामसे विख्यात था। वह स्वभावका बड़ा क्रोधी था। अपनी आयुके विषयमें देवताओंके वरदानकी बात सुनकर मेधावी घमण्डमें भर गया और ऋषियोंका अपमान करने लगा ॥ ४९ ॥
विकुर्वाणो मुनीनां च व्यचरत् स महीमिमाम् । आससाद महावीर्यं धनुषाक्षं मनीषिणम् ॥ ५० ॥ इतना ही नहीं, वह ऋषि-मुनियोंको सतानेके उद्देश्यसे ही इस पृथ्वीपर सब ओर विचरा करता था। एक दिन मेधावी महान् शक्तिशाली एवं मनीषी धनुषाक्षके पास जा पहुँचा ॥ ५० ॥
तस्यापचक्रे मेधावी तं शशाप स वीर्यवान् । भव भस्मेति चोक्तः स न भस्म समपद्यत ॥ ५१ ॥ और उनका तिरस्कार करने लगा। तब तपोबल-सम्पन्न ऋषि धनुषाक्षने उसे शाप देते हुए कहा—'अरे, तू जलकर भस्म हो जा।' परंतु उनके कहनेपर भी वह भस्म नहीं हुआ ॥ ५१ ॥
धनुषाक्षस्तु तं दृष्ट्वा मेधाविनमनामयम् । निमित्तमस्य महिषैर्भेदयामास वीर्यवान् ॥ ५२ ॥ शक्तिशाली धनुषाक्षने ध्यानमें देखा कि मेधावी रोग एवं मृत्युसे रहित है। तब उसकी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंको उन्होंने भैंसोंद्वारा विदीर्ण करा दिया ॥ ५२ ॥
स निमित्ते विनष्टे तु ममार सहसा शिशुः । तं मृतं पुत्रमादाय विललाप ततः पिता ॥ ५३ ॥ निमित्तका नाश होते ही उस मुनिकुमारकी सहसा मृत्यु हो गयी। तदनन्तर पिता उस मरे हुए पुत्रको लेकर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥ ५३ ॥
लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् ।
ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ।। ५४ ।। अधिक पीड़ित मनुष्योंकी भाँति उन्हें विलाप करते देख वहाँके समस्त वेदवेत्ता मुनिगण एकत्र हो जिस गाथाको गाने लगे, उसे बताता हूँ, सुनो ।। ५४ ।।
न दिष्टमर्थमत्येतुमीशो मर्त्यः कथंचन । महिषैर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ।। ५५ ।। 'मरणधर्मा मनुष्य किसी तरह दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर सकता, तभी तो धनुषाक्षने उस बालककी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंका भैसोंद्वारा भेदन करा दिया' ।। ५५ ।।
एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विनः । क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात् तथा भवान् ।। ५६ ।। इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्डमें भर जाते हैं और (अपने दुर्व्यवहारोंके कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। तुम्हारी भी यही अवस्था न हो (इसलिये सावधान किये देता हूँ) ।। ५६ ।।
एष रैभ्यो महावीर्यः पुत्रौ चास्य तथाविधौ । तं यथा पुत्र नाभ्येषि तथा कुर्यास्त्वतन्द्रितः ।। ५७ ।। ये रैभ्यमुनि महान् शक्तिशाली हैं। इनके दोनों पुत्र भी इन्हींके समान हैं। बेटा! तुम उन रैभ्यमुनिके पास कदापि न जाना और आलस्य छोड़कर इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहना ।। ५७ ।।
स हि क्रुद्धः समर्थस्त्वां पुत्र पीडयितुं रुषा । रैभ्यश्चापि तपस्वी च कोपनश्च महानृषिः ।। ५८ ।। बेटा! तुम्हें सावधान करनेका कारण यह है कि शक्तिशाली तपस्वी महर्षि रैभ्य बड़े क्रोधी हैं। वे कुपित होकर रोषसे तुम्हें पीड़ा दे सकते हैं ।। ५८ ।।
यवक्रीत उवाच
एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथंचन । यथा हि मे भवान् मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ।। ५९ ।। यवक्रीत बोले—पिताजी! मैं ऐसा ही करूँगा, आप किसी तरह मनमें संताप न करें। जैसे आप मेरे माननीय हैं, वैसे रैभ्यमुनि मेरे लिये पिताके समान हैं ।। ५९ ।।
लोमश उवाच
उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभयः । विप्रकुर्वन्नृषीनन्यानतुष्यत् परया मुदा ।। ६० ।। लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! पितासे यह मीठी बातें कहकर यवक्रीत निर्भय विचरने लगे। दूसरे ऋषियोंको सतानेमें उन्हें अधिक सुख मिलता था। वैसा करके वे बहुत
संतुष्ट रहते थे ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
* इस अन्नको ब्रह्मौदन कहते हैं, जैसा कि श्रुतिका कथन है—‘साध्येभ्यो देवेभ्यो ब्रह्मौदनमपचत्’ इति।
१३६-
षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु
लोमश उवाच
चङ्क्रम्यमाणः स तदा यवक्रीरकुतोभयः ।
जगाम माधवे मासि रैभ्याश्रमपदं प्रति ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं—युधिष्ठिर! उन दिनों यवक्रीत सर्वथा भयशून्य होकर चारों ओर चक्कर लगाता था। एक दिन वैशाखमासमें वह रैभ्यमुनिके आश्रममें गया ॥ १ ॥
स ददर्शाश्रमे रम्ये पुष्पितद्रुमभूषिते ।
विचरन्तीं स्नुषां तस्य किन्नरीमिव भारत ॥ २ ॥
भारत! वह आश्रम खिले हुए वृक्षोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित हो अत्यन्त रमणीय प्रतीत होता था। उस आश्रममें रैभ्यमुनिकी पुत्रवधू किन्नरीके समान विचर रही थी। यवक्रीतने उसे देखा ॥ २ ॥
यवक्रीस्तामुवाचेदमुपतिष्ठस्व मामिति ।
निर्लज्जो लज्जया युक्तां कामेन हृतचेतनः ॥ ३ ॥
देखते ही वह कामदेवके वशीभूत हो अपनी विचारशक्ति खो बैठा और लजाती हुई उस मुनि-वधूसे निर्लज्ज होकर बोला—'सुन्दरी! तू मेरी सेवामें उपस्थित हो' ॥ ३ ॥
सा तस्य शीलमाज्ञाय तस्माच्छापाच्च बिभ्यती ।
तेजस्वितां च रैभ्यस्य तथेत्युक्त्वाऽऽजगाम ह ॥ ४ ॥
वह यवक्रीतके शील-स्वभावको जानकर भी उसके शापसे डरती थी। साथ ही उसे रैभ्यमुनिकी तेजस्विताका भी स्मरण था। अतः 'बहुत अच्छा' कहकर उसके पास चली आयी ॥ ४ ॥
तत एकान्तमुन्नीय मज्जयामास भारत ।
आजगाम तदा रैभ्यः स्वमाश्रममरिंदम ॥ ५ ॥
शत्रुविनाशन भारत! तब यवक्रीतने उसे एकान्तमें ले जाकर पापके समुद्रमें डुबो दिया। (उसके साथ रमण किया।) इतनेहीमें रैभ्यमुनि अपने आश्रममें आ गये ॥ ५ ॥
रुदतीं च स्नुषां दृष्ट्वा भार्यामार्तां परावसोः ।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर ॥ ६ ॥
सा तस्मै सर्वमाचष्ट यवक्रीभाषितं शुभा ।
प्रत्युक्तं च यवक्रीतं प्रेक्षापूर्वं तथाऽऽत्मना ॥ ७ ॥
आकर उन्होंने देखा कि मेरी पुत्रवधू एवं परावसुकी पत्नी आर्तभावसे रो रही है। युधिष्ठिर! यह देखकर रैभ्यने मधुर वाणीद्वारा उसे सान्त्वना दी तथा रोनेका कारण पूछा। उस शुभलक्षणा बहूने यवक्रीतकी कही हुई सारी बातें श्वशुरके सामने कह सुनायीं एवं स्वयं उसने भलीभाँति सोच-विचारकर यवक्रीतकी बातें माननेसे जो अस्वीकार कर दिया था, वह सारा वृत्तान्त भी बता दिया ।। ६-७ ।। शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रीत विचेष्टितम् । दहन्निव तदा चेतः क्रोधः समभवन्महान् ॥ ८ ॥ यवक्रीतकी यह कुचेष्टा सुनते ही रैभ्यके हृदयमें क्रोधकी प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जो उनके अन्तःकरणको मानो भस्म किये दे रही थी ।। ८ ।। स तदा मन्युनाऽऽविष्टस्तपस्वी कोपनो भृशम् । अवलुच्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ॥ ९ ॥ तपस्वी रैभ्य स्वभावसे ही बड़े क्रोधी थे, तिसपर भी उस समय उनके ऊपर क्रोधका आवेश छा रहा था। अतः उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़कर संस्कारपूर्वक स्थापित की हुई अग्निमें होम दी ।। ९ ।। ततः समभवन्नारी तस्या रूपेण सम्मिता । अवलुच्यापरां चापि जुहावाग्नौ जटां पुनः ॥ १० ॥ उससे एक नारीके रूपमें कृत्या प्रकट हुई, जो रूपमें उनकी पुत्रवधूके ही समान थी। तत्पश्चात् एक-दूसरी जटा उखाड़कर उन्होंने पुनः उसी अग्निमें डाल दी ।। १० ।। ततः समभवद् रक्षो घोराक्षं भीमदर्शनम् । अब्रूतां तौ तदा रैभ्यं किं कार्यं करवावहै ॥ ११ ॥ उससे एक राक्षस प्रकट हुआ, जिसकी आँखें बड़ी डरावनी थीं। वह देखनेमें बड़ा भयानक प्रतीत होता था। उस समय उन दोनोंने रैभ्य मुनिसे पूछा—'हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें?' ।। ११ ।। तावब्रवीदृषिः क्रुद्धो यवक्रीर्वध्यतामिति । जग्मतुस्तौ तथेत्युक्त्वा यवक्रीतजिघांसया ॥ १२ ॥ तब क्रोधमें भरे हुए महर्षिने कहा—'यवक्रीतको मार डालो।' उस समय 'बहुत अच्छा' कहकर वे दोनों यवक्रीतके वधकी इच्छासे उसका पीछा करने लगे ।। १२ ।। ततस्तं समुपास्थाय कृत्या सृष्टा महात्मना । कमण्डलुं जहारास्य मोहयित्वेव भारत ॥ १३ ॥ भारत! महामना रैभ्यकी रची हुई कृत्यारूप सुन्दरी नारीने पहले यवक्रीतके पास उपस्थित हो उसे मोहमें डालकर उसका कमण्डलु हर लिया ।। १३ ।। उच्छिष्टं तु यवक्रीतमपकृष्टकमण्डलुम् । तत उद्यतशूलः स राक्षसः समुपाद्रवत् ॥ १४ ॥