महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तत्रैनं च्यवनो राजन् याजयामास भार्गवः । अद्भुतानि च तत्रासन् यानि तानि निबोध मे ॥ ७ ॥ राजन्! भृगुपुत्र च्यवनने उस यज्ञमण्डपमें राजासे यज्ञ करवाया। उस यज्ञमें जो अद्भुत बातें हुई थीं, उन्हें मुझसे सुनो ॥ ७ ॥
अगृह्णाच्च्यवनः सोममश्विनोर्देवयोस्तदा । तमिन्द्रो वारयामास गृह्णानं स तयोर्ग्रहम् ॥ ८ ॥ महर्षि च्यवनने उस समय दोनों अश्विनीकुमारों-को देनेके लिये सोमरसका भाग हाथमें लिया। उन दोनोंके लिये सोमका भाग ग्रहण करते समय इन्द्रने मुनिको मना किया ॥ ८ ॥
इन्द्र उवाच
उभावेतौ न सोमाहौँ नासत्याविति मे मतिः । भिषजौ दिवि देवानां कर्मणा तेन नार्हतः ॥ ९ ॥ इन्द्र बोले—मुने! मेरा यह सिद्धान्त है कि ये दोनों अश्विनीकुमार यज्ञमें सोमपानके अधिकारी नहीं हैं; क्योंकि ये द्युलोकनिवासी देवताओंके वैद्य हैं और उस वैद्यवृत्तिके कारण ही इन्हें यज्ञमें सोमपानका अधिकार नहीं रह गया है ॥ ९ ॥
च्यवन उवाच
महोत्साहौ महात्मानौ रूपद्रविणवत्तरौ । यौ चक्रतुर्मां मघवन् वृन्दारकमिवाजरम् ॥ १० ॥ ऋते त्वां विबुधांश्चान्यान् कथं वै नार्हतः सवम् । अश्विनावपि देवेन्द्र देवौ विद्धि पुरंदर ॥ ११ ॥ च्यवनने कहा—मघवन्! ये दोनों अश्विनीकुमार बड़े उत्साही और महान् बुद्धिमान् हैं। रूप-सम्पत्तिमें भी सबसे बढ़-चढ़कर हैं। इन्होंने ही मुझे देवताओंके समान दिव्य रूपसे युक्त और अजर बनाया है। देवराज! फिर तुम्हारे या अन्य देवताओंके सिवा इन्हें यज्ञमें सोमरसका भाग पानेका अधिकार क्यों नहीं है? पुरंदर! इन अश्विनीकुमारोंको भी देवता ही समझो ॥ १०-११ ॥
इन्द्र उवाच
चिकित्सकौ कर्मकरौ कामरूपसमन्वितौ । लोके चरन्तौ मर्त्यानां कथं सोममिहार्हतः ॥ १२ ॥ इन्द्र बोले—ये दोनों चिकित्सा-कार्य करते हैं और मनमाना रूप धारण करके मृत्युलोकमें भी विचरते रहते हैं, फिर इन्हें इस यज्ञमें सोमपानका अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ १२ ॥
लोमश उवाच
एतदेव यदा वाक्यमाम्रेडयति देवराट् । अनादृत्य ततः शक्रं ग्रहं जग्राह भार्गवः ॥ १३ ॥ लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! जब देवराज इन्द्र बार-बार यही बात दुहराने लगे तब भृगुनन्दन च्यवनने उनकी अवहेलना करके अश्विनीकुमारोंको देनेके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया ॥ १३ ॥
ग्रहीष्यन्तं तु तं सोममश्विनोरुत्तमं तदा । समीक्ष्य बलभिद् देव इदं वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥ उस समय देववैद्योंके लिये उत्तम सोमरस ग्रहण करते देख इन्द्रने च्यवन मुनिसे इस प्रकार कहा— ॥
आभ्यामर्थाय सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वयम् । वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ॥ १५ ॥ ब्रह्मन्! यदि तुम इन दोनोंके लिये स्वयं सोमरस ग्रहण करोगे तो मैं तुमपर अपना परम उत्तम भयंकर वज्र छोड़ दूँगा ॥ १५ ॥
एवमुक्तः स्मयन्निन्द्रमभिवीक्ष्य स भार्गवः । जग्राह विधिवत् सोममश्विभ्यामुत्तमं ग्रहम् ॥ १६ ॥ उनके ऐसा कहनेपर च्यवन मुनिने मुसकराते हुए इन्द्रकी ओर देखकर अश्विनीकुमारोंके लिये विधिपूर्वक उत्तम सोमरस हाथमें लिया ॥ १६ ॥
ततोऽस्मै प्राहरद् वज्रं घोररूपं शचीपतिः । तस्य प्रहरतो बाहुं स्तम्भयामास भार्गवः ॥ १७ ॥ तब शचीपति इन्द्र उनके ऊपर भयंकर वज्र छोड़ने लगे, परंतु वे जैसे ही प्रहार करने लगे, भृगुनन्दन च्यवनने उनकी भुजाको स्तंभित कर दिया ॥ १७ ॥
तं स्तम्भयित्वा च्यवनो जुहुवे मन्त्रतोऽनलम् । कृत्यार्थी सुमहातेजा देवं हिंसितुमुद्यतः ॥ १८ ॥ इस प्रकार उनकी भुजा स्तंभित करके महातेजस्वी च्यवन ऋषिने मन्त्रोच्चारणपूर्वक अग्निमें आहुति दी। वे देवराज इन्द्रको मार डालनेके लिये उद्यत होकर कृत्या उत्पन्न करना चाहते थे ॥ १८ ॥
ततः कृत्याथ संजज्ञे मुनेस्तस्य तपोबलात् । मदो नाम महावीर्यो बृहत्कायो महासुरः ॥ १९ ॥ शरीरं यस्य निर्देष्टुमशक्यं तु सुरासुरैः । तस्यास्यमभवद् घोरं तीक्ष्णाग्रदशनं महत् ॥ २० ॥ हनुरेका स्थिता त्वस्य भूमावेका दिवं गता । चतस्रश्चायता दंष्ट्रा योजनानां शतं शतम् ॥ २१ ॥ च्यवन ऋषिके तपोबलसे वहाँ कृत्या प्रकट हो गयी। उस कृत्याके रूपमें महापराक्रमी विशालकाय महादैत्य मदका प्रादुर्भाव हुआ। जिसके शरीरका वर्णन देवता तथा असुर भी नहीं कर सकते। उस असुरका विशाल मुख बड़ा भयंकर था। उसके आगेके दाँत बड़े तीखे दिखायी देते थे। उसका ठोड़ीसहित नीचेका ओष्ठ धरतीपर टिका हुआ था और दूसरा स्वर्गलोकतक पहुँच गया था। उसकी चार दाढ़ें सौ-सौ योजनतक फैली हुई थीं ॥ १९—२१ ॥
इतरे तस्य दशना बभूवुर्दशयोजनाः । प्रासादशिखराकाराः शूलाग्रसमदर्शनाः ॥ २२ ॥ उस दैत्यके दूसरे दाँत भी दस-दस योजन लम्बे थे। उनकी आकृति महलोंके कँगूरोंके समान थी। उनका अग्रभाग शूलके समान तीखा दिखलायी देता था ॥ २२ ॥
बाहू पर्वतसंकाशावायतावायुतं समौ । नेत्रे रविशशिप्रख्ये वक्त्रं कालाग्निसंनिभम् ॥ २३ ॥ लेलिहज्जिह्वया वक्त्रं विद्युच्चपललोलया । व्यात्ताननो घोरदृष्टिर्ग्रसन्निव जगद् बलात् ॥ २४ ॥ स भक्षयिष्यन् संक्रुद्धः शतक्रतुमुपाद्रवत् । महता घोररूपेण लोकाञ्छब्देन नादयन् ॥ २५ ॥ दोनों भुजाएँ दो पर्वतोंके समान प्रतीत होती थीं। दोनोंकी लंबाई एक समान दस-दस हजार योजनकी थी। उसके दोनों नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रज्वलित हो रहे थे।
उसका मुख प्रलयकालकी अग्निके समान जाज्वल्यमान जान पड़ता था। उसकी लपलपाती हुई चञ्चल जीभ विद्युत्के समान चमक रही थी और उसके द्वारा वह अपने जबड़ोंको चाट रहा था। उसका मुख खुला हुआ था और दृष्टि भयंकर थी; ऐसा जान पड़ता था, मानो वह सारे जगत्को बलपूर्वक निगल जायगा। वह दैत्य कुपित हो अपनी अत्यन्त भयंकर गर्जनासे सम्पूर्ण जगत्को गुँजाता हुआ इन्द्रको खा जानेके लिये उनकी ओर दौड़ा ।। २३—२५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।
अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट-मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन
लोमश उवाच
तं दृष्ट्वा घोरवदनं मदं देवः शतक्रतुः ।
आयान्तं भक्षयिष्यन्तं व्यात्ताननमिवान्तकम् ॥ १ ॥
भयात् संस्तम्भितभुजः सृक्किणी लेलिहन् मुहुः ।
ततोऽब्रवीद् देवराजश्च्यवनं भयपीडितः ॥ २ ॥
सोमार्हावश्विनावेतावद्यप्रभृति भार्गव ।
भविष्यतः सत्यमेतद् वचो विप्रः प्रसीद मे ॥ ३ ॥
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति भयंकर मुखवाले उस मदासुरको निगलनेके लिये आते देख देवराज इन्द्र भयसे व्याकुल हो गये। जिनकी भुजाएँ स्तब्ध हो गयी थीं, वे इन्द्र मृत्युके डरसे घबराकर बार-बार ओष्ठप्रान्त चाटने लगे। उसी अवस्थामें उन्होंने महर्षि च्यवनसे कहा—‘भृगुनन्दन! ये दोनों अश्विनीकुमार आजसे सोमपानके अधिकारी होंगे। मेरी यह बात सत्य है, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों ॥ १—३ ॥
न ते मिथ्या समारम्भो भवत्वेष परो विधिः ।
जानामि चाहं विप्रर्षे न मिथ्या त्वं करिष्यसि ॥ ४ ॥
सोमार्हावश्विनावेतौ यथा वाद्य कृतौ त्वया ।
भूय एव तु ते वीर्यं प्रकाशेदिति भार्गव ॥ ५ ॥
सुकन्यायाः पितुश्चास्य लोके कीर्तिः प्रथेदिति ।
अतो मयैतद् विहितं तव वीर्यप्रकाशनम् ॥ ६ ॥
तस्मात् प्रसादं कुरु मे भवत्वेवं यथेच्छसि ।
‘आपके द्वारा किया हुआ यह यज्ञका आयोजन मिथ्या न हो। आपने जो कर दिया वही उत्तम विधान हो। ब्रह्मर्षे! मैं जानता हूँ, आप अपना संकल्प कभी मिथ्या न होने देंगे। आज आपने इन अश्विनीकुमारोंको जैसे सोमपानका अधिकारी बनाया है उसी प्रकार मेरा भी कल्याण कीजिये। भृगुनन्दन! आपकी अधिक-से-अधिक शक्ति प्रकाशमें आवे तथा जगत्में सुकन्या और इसके पिताकी कीर्तिका विस्तार हो। इस उद्देश्यसे मैंने यह आपके बल-वीर्यको प्रकाशित करनेवाला कार्य किया है। अतः आप प्रसन्न होकर मेरे ऊपर कृपा करें। आप जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा’ ॥ ४—६½ ॥
एवमुक्तस्य शक्रेण भार्गवस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ स मन्युर्व्यगमच्छीघ्रं मुमोच च पुरंदरम् । मदं च व्यभजद् राजन् पाने स्त्रीषु च वीर्यवान् ॥ ८ ॥ अक्षेषु मृगयायां च पूर्वसृष्टं पुनः पुनः । तदा मदं विनिक्षिप्य शक्रं संतर्प्य चेन्दुना ॥ ९ ॥ अश्विभ्यां सहितान् देवान् याजयित्वा च तं नृपम् । विख्याप्य वीर्यं लोकेषु सर्वेषु वदतां वरः ॥ १० ॥ सुकन्यया सहारण्ये विजहारानुकूलया । तस्यैतद् द्विजसंघुष्टं सरो राजन् प्रकाशते ॥ ११ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन महामना च्यवनका क्रोध शीघ्र शान्त हो गया और उन्होंने देवेन्द्रको (उसी क्षण) सम्पूर्ण दुःखोंसे, मुक्त कर दिया। राजन्! उन शक्तिशाली ऋषिने मदको, जिसे पहले उन्होंने ही उत्पन्न किया था, मद्यपान, स्त्री, जूआ और मृगया (शिकार)—इन चार स्थानोंमें पृथक्-पृथक् बाँट दिया। इस प्रकार मदको दूर हटाकर उन्होंने देवराज इन्द्र और अश्विनीकुमारोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको सोमरससे तृप्त किया तथा राजा शर्यातिके यज्ञ पूर्ण कराकर समस्त लोकोंमें अपनी अद्भुत शक्तिको विख्यात करके वक्ताओंमें श्रेष्ठ च्यवन ऋषि अपनी मनोनुकूल पत्नी सुकन्याके साथ वनमें विहार करने लगे। युधिष्ठिर! यह जो पक्षियोंके कलरवसे गूँजता हुआ सरोवर सुशोभित हो रहा है, महर्षि च्यवनका ही है ॥ ७—११ ॥
अत्र त्वं सह सोदर्यैः पितॄन् देवांश्च तर्पय । एतद् दृष्ट्वा महीपाल सिकताक्षं च भारत ॥ १२ ॥ सैन्धवारण्यमासाद्य कुल्यानां कुरु दर्शनम् । पुष्करेषु महाराज सर्वेषु च जलं स्पृश ॥ १३ ॥ स्थाणोर्मन्त्राणि च जपन् सिद्धिं प्राप्स्यसि भारत । संधिर्द्वयोर्नरश्रेष्ठ त्रेताया द्वापरस्य च ॥ १४ ॥ तुम भाइयोंसहित इसमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करो। भूपाल! भरतनन्दन! इस सरोवरका और सिकताक्षतीर्थका दर्शन करके सैन्धवारण्यमें पहुँचकर वहाँकी छोटी-छोटी नदियोंके दर्शन करना। महाराज! यहाँके सभी तालाबमें जाकर जलका स्पर्श करो। भारत! स्थाणु (शिव)-के मन्त्रोंका जप करते हुए उन तीर्थोंमें स्नान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। नरश्रेष्ठ! यह त्रेता और द्वापरकी संधिके समय प्रकट हुआ तीर्थ है ॥ १२—१४ ॥
अयं हि दृश्यते पार्थ सर्वपापप्रणाशनः । अत्रोपस्पृश्य चैव त्वं सर्वपापप्रणाशने ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर! यह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ दिखायी देता है। इस सर्वपापनाशन तीर्थमें स्नान करके तुम शुद्ध हो जाओगे ॥ १५ ॥
आर्चीकपर्वतश्चैव निवासो वै मनीषिणाम् ।
सदाफलः सदास्रोतो मरुतां स्थानमुत्तमम् ॥ १६ ॥
इसके आगे आर्चीक पर्वत है, जहाँ मनीषी पुरुष निवास करते हैं। वहाँ सदा फल लगे रहते हैं और निरन्तर पानीके झरने बहते हैं। इस पर्वतपर अनेक देवताओंके उत्तम स्थान हैं ॥ १६ ॥
चैत्याश्चैते बहुविधास्त्रिदशानां युधिष्ठिर ।
एतच्चन्द्रमसस्तीर्थमृषयः पर्युपासते ।
वैखानसा बालखिल्याः पावका वायुभोजनाः ॥ १७ ॥
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्यानि त्रीणि प्रस्रवणानि च ।
सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! ये देवताओंके अनेकानेक मन्दिर दिखायी देते हैं, जो नाना प्रकारके हैं। यह चन्द्रतीर्थ है, जिसकी बहुत-से ऋषिलोग उपासना करते हैं। यहाँ बालखिल्य नामक वैखानस महात्मा रहते हैं जो वायुका आहार करनेवाले और परम पावन हैं। यहाँ तीन पवित्र शिखर और तीन झरने हैं। इन सबकी इच्छानुसार परिक्रमा करके स्नान करो ॥ १७-१८ ॥
शान्तनुश्चात्र राजेन्द्र शुनकश्च नराधिपः ।
नरनारायणौ चोभौ स्थानं प्राप्ताः सनातनम् ॥ १९ ॥
राजेन्द्र! यहाँ राजा शान्तनु, शुनक और नर-नारायण—ये सभी नित्य धाममें गये हैं ॥ १९ ॥
इह नित्यशया देवाः पितरश्च महर्षिभिः ।
आर्चीकपर्वते तेपुस्तान् यजस्व युधिष्ठिर ॥ २० ॥
युधिष्ठिर! इस आर्चीक पर्वतपर नित्य निवास करते हुए महर्षियोंसहित जिन देवताओं और पितरोंने तपस्या की है, तुम उन सबकी पूजा करो ॥ २० ॥
इह ते वै चरून् प्राश्नन्नृषयश्च विशाम्पते ।
यमुना चाक्षयस्रोता कृष्णश्चेह तपोरतः ॥ २१ ॥
यमौ च भीमसेनश्च कृष्णा चामित्रकर्शन ।
सर्वे चात्र गमिष्यामस्त्वयैव सह पाण्डव ॥ २२ ॥
एतत् प्रस्रवणं पुण्यमिन्द्रस्य मनुजेश्वर ।
यत्र धाता विधाता च वरुणश्चोर्ध्वमागताः ॥ २३ ॥
राजन्! यहाँ देवताओं और ऋषियोंने चरुभोजन किया था। इसके पास ही अक्षय प्रवाहवाली यमुना नदी बहती है। यहीं भगवान् कृष्णने भी तपस्या की है। शत्रुदमन! नकुल,
सहदेव, भीमसेन, द्रौपदी और हम सब लोग तुम्हारे साथ इसी स्थानपर चलेंगे। पाण्डुनन्दन! यह इन्द्रका पवित्र झरना है। नरेश्वर! यह वही स्थान है जहाँ धाता, विधाता और वरुण ऊर्ध्वलोक गये हैं ॥ २१—२३ ॥
इह तेऽप्यवसन् राजन् क्षान्ताः परमधर्मिणः ।
मैत्राणामृजुबुद्धीनामयं गिरिवरः शुभः ॥ २४ ॥
राजन्! वे क्षमाशील और परम धर्मात्मा पुरुष यहीं रहते थे। सरल बुद्धि तथा सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिये यह श्रेष्ठ पर्वत शुभ आश्रय है ॥ २४ ॥
एषा सा यमुना राजन् महर्षिगणसेविता ।
नानायज्ञचिता राजन् पुण्या पापभयापहा ॥ २५ ॥
अत्र राजा महेष्वासो मान्धातायजत स्वयम् ।
साहदेविश्च कौन्तेय सोमको ददतां वरः ॥ २६ ॥
राजन्! यही वह महर्षिगणसेवित पुण्यमयी यमुना है जिसके तटपर अनेक यज्ञ हो चुके हैं। यह पापके भयको दूर भगानेवाली है। कुन्तीनन्दन! यहीं महान् धनुर्धर राजा मान्धाताने स्वयं यज्ञ किया था। दानिशिरोमणि सहदेव-कुमार सोमकने भी इसीके तटपर यज्ञानुष्ठान किया ॥ २५-२६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां सौकन्ये पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें सुकन्योपाख्यानविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
१२६-
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र
युधिष्ठिर उवाच
मान्धाता राजशार्दूलस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।
कथं जातो महाब्रह्मन् यौवनाश्वो नृपोत्तमः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— ब्राह्मणश्रेष्ठ! युवनाश्वके पुत्र नृपश्रेष्ठ मान्धाता तीनों लोकोंमें विख्यात थे। उनकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई थी? ॥ १ ॥
कथं चैनां परां काष्ठां प्राप्तवानमितद्युतिः ।
यस्य लोकास्त्रयो वश्या विष्णोरिव महात्मनः ॥ २ ॥
अमित तेजस्वी मान्धाताने यह सर्वोच्च स्थिति कैसे प्राप्त कर ली थी? सुना है, परमात्मा विष्णुके समान महाराज मान्धाताके वशमें तीनों लोक थे ॥ २ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं चरितं तस्य धीमतः ।
(सत्यकीर्तेर्हि मान्धातुः कथ्यमानं त्वयानघ ।)
यथा मान्धातृशब्दश्च तस्य शक्रसमद्युतेः ।
जन्म चाप्रतिवीर्यस्य कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ ३ ॥
निष्पाप महर्षे! मैं आपके मुखसे उन सत्यकीर्ति एवं बुद्धिमान् राजा मान्धाताका वह सब चरित्र सुनना चाहता हूँ। इन्द्रके समान तेजस्वी और अनुपम पराक्रमी उन नरेशका 'मान्धाता' नाम कैसे हुआ? और उनके जन्मका वृत्तान्त क्या है? बताइये; क्योंकि आप ये सब बातें बतानेमें कुशल हैं ॥ ३ ॥
लोमश उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् राज्ञस्तस्य महात्मनः ।
यथा मान्धातृशब्दो वै लोकेषु परिगीयते ॥ ४ ॥
लोमशजीने कहा— राजन्! लोकमें उन महामना नरेशका 'मान्धाता' नाम कैसे प्रचलित हुआ? यह बतलाता हूँ, ध्यान देकर सुनो ॥ ४ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो युवनाश्वो महीपतिः ।
सोऽयजत् पृथिवीपालः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशमें युवनाश्व नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। भूपाल युवनाश्वने प्रचुर दक्षिणावाले बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ५ ॥
अश्वमेधसहस्रं च प्राप्य धर्मभृतां वरः ।
अन्यैश्च क्रतुभिर्मुख्यैरयजत् स्वाप्तदक्षिणैः ॥ ६ ॥
वे धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेधयज्ञ पूर्ण करके बहुत दक्षिणाके साथ दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा भी भगवान्की आराधना की ॥ ६ ॥ अनपत्यस्तु राजर्षिः स महात्मा महाव्रतः। मन्त्रिष्वाधाय तद् राज्यं वननित्यो बभूव ह ॥ ७ ॥ शास्त्रदृष्टेन विधिना संयोज्यात्मानमात्मवान्। स कदाचिन्नृपो राजन्नुपवासेन दुःखितः ॥ ८ ॥ पिपासाशुष्कहृदयः प्रविवेशाश्रमं भृगोः। तामेव रात्रिं राजेन्द्र महात्मा भृगुनन्दनः ॥ ९ ॥ इष्टिं चकार सौद्युम्नेर्महर्षिः पुत्रकारणात् । सम्भृतो मन्त्रपूतेन वारिणा कलशो महान् ॥ १० ॥ वे महामना राजर्षि महान् व्रतका पालन करनेवाले थे तो भी उनके कोई संतान नहीं हुई। तब वे मनस्वी नरेश राज्यका भार मन्त्रियोंपर रखकर शास्त्रीय विधिके अनुसार अपने-आपको परमात्म-चिन्तनमें लगाकर सदा वनमें ही रहने लगे। एक दिनकी बात है, राजा युवनाश्व उपवासके कारण दुःखित हो गये। प्याससे उनका हृदय सूखने लगा। उन्होंने जल पीनेकी इच्छासे रातके समय महर्षि भृगुके आश्रममें प्रवेश किया। राजेन्द्र! उसी रातमें महात्मा भृगुनन्दन महर्षि च्यवनने सुद्युम्नकुमार युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये एक इष्टि की थी। उस इष्टिके समय महर्षिने मन्त्रपूत जलसे एक बहुत बड़े कलशको भरकर रख दिया था ॥ ७—१० ॥ तत्रातिष्ठत राजेन्द्र पूर्वमेव समाहितः । यत् प्राश्य प्रसवेत् तस्य पत्नी शक्रसमं सुतम् ॥ ११ ॥ महाराज! वह कलशका जल पहलेसे ही आश्रमके भीतर इस उद्देश्यसे रखा गया था कि उसे पीकर राजा युवनाश्वकी रानी इन्द्रके समान शक्तिशाली पुत्रको जन्म दे सके ॥ ११ ॥ तं न्यस्य वेद्यां कलशं सुषुपुस्ते महर्षयः। रात्रिजागरणाच्छ्रान्तान् सौद्युम्निः समतीत्य तान् ॥ १२ ॥ उस कलशको वेदीपर रखकर सभी महर्षि सो गये थे। रातमें देरतक जागनेके कारण वे सब-के-सब थके हुए थे। युवनाश्व उन्हें लाँघकर आगे बढ़ गये ॥ १२ ॥ शुष्ककण्ठः पिपासार्तः पानीयार्थी भृशं नृपः। तं प्रविश्याश्रमं शान्तः पानीयं सोऽभ्ययाचत ॥ १३ ॥ वे प्याससे पीड़ित थे। उनका कण्ठ सूख गया था। पानी पीनेकी अत्यन्त अभिलाषासे वे उस आश्रमके भीतर गये और शान्तभावसे जलके लिये याचना करने लगे ॥ १३ ॥ तस्य श्रान्तस्य शुष्केण कण्ठेन क्रोशतस्तदा। नाश्रौषीत् कश्चन तदा शकुनेरिव वाशतः ॥ १४ ॥
राजा थककर सूखे कण्ठसे पानीके लिये चिल्ला रहे थे, परंतु उस समय चें-चें करनेवाले पक्षीकी भाँति उनकी चीख-पुकार कोई भी न सुन सका ॥ १४ ॥
ततस्तं कलशं दृष्ट्वा जलपूर्णं स पार्थिवः ।
अभ्यद्रवत वेगेन पीत्वा चाम्भो व्यवासृजत् ॥ १५ ॥
तदनन्तर जलसे भरे हुए पूर्वोक्त कलशपर उनकी दृष्टि पड़ी। देखते ही वे बड़े वेगसे उसकी ओर दौड़े और (इच्छानुसार) पीकर उन्होंने बचे हुए जलको वहीं गिरा दिया ॥ १५ ॥
स पीत्वा शीतलं तोयं पिपासार्तो महीपतिः ।
निर्वाणमगमद् धीमान् सुसुखी चाभवत् तदा ॥ १६ ॥
राजा युवनाश्व प्याससे बड़ा कष्ट पा रहे थे। वह शीतल जल पीकर उन्हें बड़ी शान्ति मिली। वे बुद्धिमान् नरेश उस समय जल पीनेसे बहुत सुखी हुए ॥ १६ ॥
ततस्ते प्रत्यबुध्यन्त मुनयः सतपोधनाः ।
निस्तोयं तं च कलशं ददृशुः सर्व एव ते ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् तपोधन च्यवन मुनिके सहित सब मुनि जाग उठे। उन सबने उस कलशको जलसे शून्य देखा ॥
कस्य कर्मेदमिति ते पर्यपृच्छन् समागताः ।
युवनाश्वो ममेत्येवं सत्यं समभिपद्यत ॥ १८ ॥
फिर तो वे सब एकत्र हो गये और एक-दूसरेसे पूछने लगे—'यह किसका कर्म है?' युवनाश्वने सामने आकर कहा—'यह मेरा ही कर्म है।' इस प्रकार उन्होंने सत्यको स्वीकार कर लिया ॥ १८ ॥
न युक्तमिति तं प्राह भगवान् भार्गवस्तदा ।
सुतार्थं स्थापिता ह्यापस्तपसा चैव सम्भृताः ॥ १९ ॥
मया ह्यात्राहितं ब्रह्म तप आस्थाय दारुणम् ।
पुत्रार्थं तव राजर्षे महाबलपराक्रम ॥ २० ॥
तब भगवान् च्यवनने कहा—'महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न राजर्षि युवनाश्व! यह तुमने ठीक नहीं किया। इस कलशमें मैंने तुम्हें ही पुत्र प्रदान करनेके लिये तपस्यासे संस्कारयुक्त किया हुआ जल रखा था और कठोर तपस्या करके उसमें ब्रह्मतेजकी स्थापना की थी ॥ १९-२० ॥
महाबलो महावीर्यस्तपोबलसमन्वितः ।
यः शक्रमपि वीर्येण गमयेद् यमसादनम् ॥ २१ ॥
अनेन विधिना राजन् मयैतदुपपादितम् ।
अब्भक्षणं त्वया राजन् न युक्तं कृतमद्य वै ॥ २२ ॥
‘राजन्! उक्त विधिसे इस जलको मैंने ऐसा शक्तिसम्पन्न कर दिया था कि इसको पीनेसे एक महाबली, महापराक्रमी और तपोबल सम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो जो अपने बल-पराक्रमसे देवराज इन्द्रको भी यमलोक पहुँचा सके। उसी जलको तुमने आज पी लिया, यह अच्छा नहीं किया ।। २१-२२ ।।
न त्वद्य शक्यमस्माभिरेतत् कर्तुमतोऽन्यथा।
नूनं दैवकृतं ह्येतद् यदेवं कृतवानसि ।। २३ ।।
‘अब हमलोग इसके प्रभावको टालने या बदलनेमें असमर्थ हैं। तुमने जो ऐसा कार्य कर डाला है, इसमें निश्चय ही दैवकी प्रेरणा है ।। २३ ।।
पिपासितेन याः पीता विधिमन्त्रपुरस्कृताः।
आपस्त्वया महाराज मत्तपोवीर्यसम्भृताः ।। २४ ।।
ताभ्यस्त्वमात्मना पुत्रमीदृशं जनयिष्यसि ।
विधास्यामो वयं तत्र तवेष्टिं परमाद्भुताम् ।। २५ ।।
यथा शक्रसमं पुत्रं जनयिष्यसि वीर्यवान् ।
गर्भधारणजं वापि न खेदं समवाप्स्यसि ।। २६ ।।
‘महाराज! तुमने प्याससे व्याकुल होकर जो मेरे तपोबलसे संचित तथा विधिपूर्वक मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलको पी लिया है, उसके कारण तुम अपने ही पेटसे तथाकथित इन्द्रविजयी पुत्रको जन्म दोगे। इस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये हम तुम्हारी इच्छाके अनुरूप अत्यन्त अद्भुत यज्ञ करायेंगे जिससे तुम स्वयं भी शक्तिशाली रहकर इन्द्रके समान पराक्रमी पुत्र उत्पन्न कर सकोगे और गर्भधारणजनित कष्टका भी तुम्हें अनुभव न होगा’ ।। २४—२६ ।।
ततो वर्षशते पूर्णे तस्य राज्ञो महात्मनः ।
वामं पार्श्वं विनिर्भिद्य सुतः सूर्य इव स्थितः ।। २७ ।।
निष्चक्राम महातेजा न च तं मृत्युराविशत् ।
युवनाश्वं नरपतिं तदद्भुतमिवाभवत् ।। २८ ।।
तदनन्तर पूरे सौ वर्ष बीतनेपर उन महात्मा राजा युवनाश्वकी बायीं कोख फाड़कर एक सूर्यके समान महातेजस्वी बालक बाहर निकला तथा राजाकी मृत्यु भी नहीं हुई। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ।। २७-२८ ।।
ततः शक्रो महातेजास्तं दिदृक्षुरुपागमत् ।
ततो देवा महेन्द्रं तमपृच्छन् धास्यतीति किम् ।। २९ ।।
तत्पश्चात् महातेजस्वी इन्द्र उस बालकको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय देवताओंने महेन्द्रसे पूछा—यह बालक क्या पीयेगा? ।। २९ ।।
प्रदेशिनीं ततोऽस्यास्ये शक्रः समभिसंदधे । मामयं धास्यतीत्येवं भाषिते चैव वज्रिणा ।। ३० ।। मान्धातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ।। ३१ ।। प्रदेशिनीं शक्रदत्तामास्वाद्य स शिशुस्तदा । अवर्धत महातेजाः किष्कून् राजंस्त्रयोदश ।। ३२ ।। तब इन्द्रने अपनी तर्जनी अंगुली बालकके मुँहमें डाल दी और कहा—'माम् अयं धाता।' 'अर्थात् यह मुझे ही पीयेगा' वज्रधारी इन्द्रके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि सब देवताओंने मिलकर उस बालकका नाम 'मान्धाता' रख दिया। राजन्! इन्द्रकी दी हुई प्रदेशिनी (तर्जनी) अंगुलिका रसास्वादन करके वह महातेजस्वी शिशु तेरह बित्ता बढ़ गया ।। ३०—३२ ।।
वेदास्तं सधनुर्वेदा दिव्यान्यस्त्राणि चेश्वरम् । उपतस्थुर्महाराज ध्यातमात्रस्य सर्वशः ।। ३३ ।। महाराज! उस समय शक्तिशाली मान्धाताके चिन्तन करनेमात्रसे ही धनुर्वेदसहित सम्पूर्ण वेद और दिव्य अस्त्र (ईश्वरकी कृपासे) उपस्थित हो गये ।। ३३ ।।
आजगवं नाम धनुः शतः शृङ्गोद्भवाश्च ये । अभैद्यं कवचं चैव सद्यस्तमुपशिश्रियुः ।। ३४ ।।
आजगव नामक धनुष, सींगके बने हुए बाण और अभेद्य कवच—सभी तत्काल उनकी सेवामें आ गये।। सोऽभिषिक्तो मघवता स्वयं शक्रेण भारत। धर्मेण व्यजयल्लोकांस्त्रीन् विष्णुरिव विक्रमैः।। ३५ ।। भारत! साक्षात् देवराज इन्द्रने मान्धाताका राज्याभिषेक किया। भगवान् विष्णुने जैसे तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया था, उसी प्रकार मान्धाताने भी धर्मके द्वारा तीनों लोकोंको जीत लिया।। ३५ ।। तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः। रत्नानि चैव राजर्षिं स्वयमेवोपतस्थिरे ।। ३६ ।। उन महात्मा नरेशका शासनचक्र सर्वत्र बेरोक-टोक चलने लगा। सारे रत्न राजर्षि मान्धाताके यहाँ स्वयं उपस्थित हो जाते थे।। ३६ ।। तस्यैवं वसुसम्पूर्णा वसुधा वसुधाधिप। तेनेष्टं विविधैर्यज्ञैर्बहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः ।। ३७ ।। युधिष्ठिर! इस प्रकार उनके लिये यह सारी पृथ्वी धन-रत्नोंसे परिपूर्ण थी। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणावाले नाना प्रकारके बहुसंख्यक यज्ञोंद्वारा भगवान्की समाराधना की।। ३७ ।। चितचैत्यो महातेजा धर्मान् प्राप्य च पुष्कलान्। शक्रस्यार्धासनं राजँल्लब्धवानमितद्युतिः ।। ३८ ।। राजन्! महातेजस्वी एवं परम कान्तिमान् राजा मान्धाताने यज्ञमण्डपोंका निर्माण करके पर्याप्त धर्मका सम्पादन किया और उसीके फलसे स्वर्गलोकमें इन्द्रका आधा सिंहासन प्राप्त कर लिया।। ३८ ।। एकाहात् पृथिवी तेन धर्मनित्येन धीमता। विजिता शासनादेव सरत्नाकरपत्तना ।। ३९ ।। उन धर्मपरायण बुद्धिमान् नरेशने केवल शासनमात्रसे एक ही दिनमें समुद्र, खान और नगरोंसहित सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली।। ३९ ।। तस्य चैत्यैर्महाराज ऋतूनां दक्षिणावताम्। चतुरन्ता मही व्याप्ता नासीत् किंचिदनावृतम् ।। ४० ।। महाराज! उनके दक्षिणायुक्त यज्ञोंके चैत्यों (यज्ञमण्डपों)-से चारों ओरकी पृथ्वी भर गयी थी, कहीं कोई भी स्थान ऐसा नहीं था जो उनके यज्ञमण्डपोंसे घिरा न हो।। ४० ।। तेन पद्मसहस्राणि गवां दश महात्मना। ब्राह्मणानां महाराज दत्तानीति प्रचक्षते ।। ४१ ।। महाराज! महात्मा राजा मान्धाताने दस हजार पद्म गौएँ ब्राह्मणोंको दानमें दी थीं, ऐसा जानकार-लोग कहते हैं।। ४१ ।।
तेन द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महात्मना । वृष्टं सस्यविवृद्ध्यर्थं मिषतो वज्रपाणिनः ॥ ४२ ॥ उन महामना नरेशने बारह वर्षोंतक होनेवाली अनावृष्टिके समय वज्रधारी इन्द्रके देखते-देखते खेतीकी उन्नतिके लिये स्वयं पानीकी वर्षा की थी ॥ ४२ ॥
तेन सोमकुलोत्पन्नो गान्धाराधिपतिर्महान् । गर्जन्निव महामेघः प्रमथ्य निहतः शरैः ॥ ४३ ॥ उन्होंने महामेघके समान गर्जते हुए महापराक्रमी चन्द्रवंशी गान्धारराजको बाणोंसे घायल करके मार डाला था ॥ ४३ ॥
प्रजाश्चतुर्विधास्तेन त्राता राजन् कृतात्मना । तेनात्मतपसा लोकास्तापिताश्चातितेजसा ॥ ४४ ॥ युधिष्ठिर! वे अपने मनको वशमें रखते थे। उन्होंने अपने तपोबलसे देवता, मनुष्य, तिर्यक् और स्थावर—चार प्रकारकी प्रजाकी रक्षा की थी; साथ ही अपने अत्यन्त तेजसे सम्पूर्ण लोकोंको संतप्त कर दिया था ॥
तस्यैतद् देवयजनं स्थानमादित्यवर्चसः । पश्य पुण्यतमे देशे कुरुक्षेत्रस्य मध्यतः ॥ ४५ ॥ (तथा त्वमपि राजेन्द्र मान्धातेव महीपतिः । धर्मं कृत्वा महीं रक्षन् स्वर्गलोकमवाप्स्यसि ॥) सूर्यके समान तेजस्वी उन्हीं महाराज मान्धाताके देवयज्ञका यह स्थान है जो कुरुक्षेत्रकी सीमाके भीतर परम पवित्र प्रदेशमें स्थित है, इसका दर्शन करो। राजेन्द्र! महाराज मान्धाताकी भाँति तुम भी धर्मपूर्वक पृथ्वीकी रक्षा करते रहनेपर अक्षय स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं मान्धातुश्चरितं महत् । जन्म चाग्र्यं महीपाल यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ४६ ॥ भूपाल! तुम मुझसे जिसके विषयमें पूछ रहे थे, वह मान्धाताका उत्तम जन्मवृत्तान्त और उनका महान् चरित्र सब कुछ तुम्हें सुना दिया ॥ ४६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स कौन्तेयो लोमशेन महर्षिणा । पप्रच्छानन्तरं भूयः सोमकं प्रति भारत ॥ ४७ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—भारत! महर्षि लोमशके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने पुनः सोमकके विषयमें प्रश्न किया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां मान्धातोपाख्याने षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें मान्धातोपाख्यानविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)
सोमक और जन्तुका उपाख्यान
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
सोमक और जन्तुका उपाख्यान
युधिष्ठिर उवाच
कथं वीर्यः स राजाभूत् सोमको वदतां वर ।
कर्माण्यस्य प्रभावं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! राजा सोमकका बल-पराक्रम कैसा था? मैं उनके कर्म और प्रभावका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमश उवाच
युधिष्ठिरासीन्नृपतिः सोमको नाम धार्मिकः ।
तस्य भार्याशतं राजन् सदृशीनामभूत् तदा ॥ २ ॥
**लोमशजीने कहा—**युधिष्ठिर! सोमक नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उनकी सौ रानियाँ थीं। वे सभी रूप-अवस्था आदिमें प्रायः एक समान थीं ॥ २ ॥
स वै यत्नेन महता तासु पुत्रं महीपतिः ।
कंचिन्नासादयामास कालेन महता ह्यपि ॥ ३ ॥
परंतु दीर्घकालतक महान् प्रयत्न करते रहनेपर भी वे अपनी उन रानियोंके गर्भसे कोई पुत्र न प्राप्त कर सके ॥ ३ ॥
कदाचित् तस्य वृद्धस्य घटमानस्य यत्नतः ।
जन्तुर्नाम सुतस्तस्मिन् स्त्रीशते समजायत ॥ ४ ॥
राजा सोमक वृद्धावस्थामें भी इसके लिये निरन्तर यत्नशील थे; अतः किसी समय उनकी सौ स्त्रियोंमेंसे किसी एकके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था जन्तु ॥ ४ ॥
तं जातं मातरः सर्वाः परिवार्य समासतः ।
सततं पृष्ठतः कृत्वा कामभोगान् विशाम्पते ॥ ५ ॥
राजन्! उसके जन्म लेनेके पश्चात् सभी माताएँ काम-भोगकी ओरसे मुँह मोड़कर सदा उसी बच्चेके पास उसे सब ओरसे घेरकर बैठी रहती थीं ॥ ५ ॥
ततः पिपीलिका जन्तुं कदाचिददशत् स्फिचि ।
स दष्टो व्यनदन्नादं तेन दुःखेन बालकः ॥ ६ ॥
एक दिन एक चींटीने जन्तुके कटिभागमें डँस लिया। चींटीके काटनेपर उसकी पीड़ासे विकल हो जन्तु सहसा रोने लगा ॥ ६ ॥
ततस्ता मातरः सर्वाः प्राक्रोशन् भृशदुःखिताः ।
प्रवार्य जन्तुं सहसा स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ ७ ॥ इससे उसकी सब माताएँ भी सहसा जन्तुके शरीरसे चींटीको हटाकर अत्यन्त दुखी हो जोर-जोरसे रोने लगीं। उनके रोदनकी वह सम्मिलित ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत हुई ॥ ७ ॥ तमार्तनादं सहसा शुश्राव स महीपतिः । अमात्यपर्षदो मध्ये उपविष्टः सहर्त्विजा ॥ ८ ॥ उस समय राजा सोमक पुरोहितके साथ मन्त्रियोंकी सभामें बैठे थे। उन्होंने अकस्मात् वह आर्तनाद सुना ॥ ततः प्रस्थापयामास किमेतदिति पार्थिवः । तस्मै क्षत्ता यथावृत्तमाचचक्षे सुतं प्रति ॥ ९ ॥ सुनकर राजाने 'यह क्या हो गया?' इस बातका पता लगानेके लिये द्वारपालको भेजा। द्वारपालने लौटकर राजकुमारसे सम्बन्ध रखनेवाली पूर्वोक्त घटनाका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ९ ॥ त्वरमाणः स चोत्थाय सोमकः सह मन्त्रिभिः । प्रविश्यान्तःपुरं पुत्रमाश्वासयदरिंदमः ॥ १० ॥ तब शत्रुदमन राजा सोमकने मन्त्रियोंसहित उठकर बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुत्रको आश्वासन दिया ॥ १० ॥ सान्त्वयित्वा तु तं पुत्रं निष्क्रम्यान्तःपुरान्नृपः । ऋत्विजा सहितो राजन् सहामात्य उपाविशत् ॥ ११ ॥ बेटेको सान्त्वना देकर राजा अन्तःपुरसे बाहर निकले और पुरोहित तथा मन्त्रियोंके साथ पुनः मन्त्रणा-गृहमें जा बैठे ॥ ११ ॥
सोमक उवाच
धिगस्त्विहैकपुत्रत्वमपुत्रत्वं वरं भवेत् । नित्यातुरत्वाद् भूतानां शोक एवैकपुत्रता ॥ १२ ॥ उस समय सोमकने कहा— इस संसारमें किसी पुरुषके एक ही पुत्रका होना धिक्कारका विषय है। एक पुत्र होनेकी अपेक्षा तो पुत्रहीन रह जाना ही अच्छा है। एक ही संतान हो तो सब प्राणी उसके लिये सदा आकुल-व्याकुल रहते हैं, अतः एक पुत्रका होना शोक ही है ॥ इदं भार्याशतं ब्रह्मन् परीक्ष्य सदृशं प्रभो । पुत्रार्थिना मया वोढं न तासां विद्यते प्रजा ॥ १३ ॥ ब्रह्मन्! मैंने अच्छी तरह जाँच-बूझकर पुत्रकी इच्छासे अपने योग्य सौ स्त्रियोंके साथ विवाह किया, किंतु उनके कोई संतान नहीं हुई ॥ १३ ॥ एकः कथंचिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरयं मम ।
यतमानासु सर्वासु किं नु दुःखमतः परम् ॥ १४ ॥ यद्यपि मेरी सभी रानियाँ संतानके लिये यत्नशील थीं, तथापि किसी तरह मेरे यही एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम जन्तु है। इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ १४ ॥
वयश्च समतीतं मे सभार्यस्य द्विजोत्तम । आसां प्राणाः समायत्ता मम चात्रैकपुत्रके ॥ १५ ॥ द्विजश्रेष्ठ! मेरी तथा इन रानियोंकी अधिक अवस्था बीत गयी, किंतु अभीतक मेरे और उन पत्नियोंके प्राण केवल इस एक पुत्रमें ही बसते हैं ॥ १५ ॥
स्यात्तु कर्म तथा युक्तं येन पुत्रशतं भवेत् । महता लघुना वापि कर्मणा दुष्करेण वा ॥ १६ ॥ क्या कोई ऐसा उपयोगी कर्म हो सकता है जिससे मेरे सौ पुत्र हो जायँ। भले ही वह कर्म महान् हो, लघु हो अथवा अत्यन्त दुष्कर हो ॥ १६ ॥
ऋत्विगुवाच
अस्ति चैतादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत् । यदि शक्नोषि तत् कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक ॥ १७ ॥ **पुरोहितने कहा—**सोमक! ऐसा कर्म है जिससे तुम्हें सौ पुत्र हो सकते हैं। यदि तुम उसे कर सको तो बताऊँगा ॥ १७ ॥
सोमक उवाच
कार्यं वा यदि वाकार्यं येन पुत्रशतं भवेत् । कृतमेवेति तद् विद्धि भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥ १८ ॥ **सोमकने कहा—**भगवन्! आप वह कर्म मुझे बताइये जिससे सौ पुत्र हो सकते हैं। वह करनेयोग्य हो या न हो, मेरेद्वारा उसे किया हुआ ही जानिये ॥ १८ ॥
ऋत्विगुवाच
यजस्व जन्तुना राजंस्त्वं मया वितते क्रतौ । ततः पुत्रशतं श्रीमद् भविष्यत्यचिरेण ते ॥ १९ ॥ **पुरोहितने कहा—**राजन्! मैं एक यज्ञ आरम्भ करवाऊँगा, उसमें तुम अपने पुत्र जन्तुकी आहुति देकर यजन करो। इससे शीघ्र ही तुम्हें सौ परम सुन्दर पुत्र प्राप्त होंगे ॥ १९ ॥
वपायां हूयमानायां धूममाघ्राय मातरः । ततस्ताः सुमहावीर्याञ्जनयिष्यन्ति ते सुतान् ॥ २० ॥
जिस समय उसकी चर्बीकी आहुति दी जायगी उस समय उसके धूएँको सूँघ लेनेपर सब माताएँ (गर्भवती हो) आपके लिये अत्यन्त पराक्रमी पुत्रोंको जन्म देंगी ॥ २० ॥
तस्यामेव तु ते जन्तुर्भविता पुनरात्मजः ।
उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति ॥ २१ ॥
आपका पुत्र जन्तु पुनः अपनी माताके ही पेटसे उत्पन्न होगा। उस समय उसकी बायीं पसलीमें एक सुनहरा चिह्न होगा ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥