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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः
आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत
नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १९ ॥
नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे—‘अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो। भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥

अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन
प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो। कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्

बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव
भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
‘पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं। अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना। अजातशत्रु युधिष्ठिर! (आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें।) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा’ ॥ २२-२३ ॥

वैशम्पायन उवाच

निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम्
जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥
तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः
तस्मिन्नेव वने हृष्टास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥

(आजगरपर्व)

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(आजगरपर्व)

षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान

जनमेजय उवाच

तस्मिन् कृतास्त्रे रथिनां प्रवीरे
प्रत्यागते भवनाद् वृत्रहन्तुः
अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः
समेत्य शूरेण धनंजयेन ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— भगवन्! रथियोंमें श्रेष्ठ महावीर अर्जुन जब इन्द्रभवनसे दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके लौट आये, तब उनसे मिलकर कुन्तीकुमारोंने पुनः कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः
सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः
तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये
धनेश्वराक्रीडगता विजह्रुः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी बोले— राजन्! वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव इन्द्रतुल्य पराक्रमी अर्जुनके साथ उस परम रमणीय शैलशिखरपर कुबेरकी क्रीड़ाभूमिके अन्तर्गत उन्हीं वनोंमें सुखसे विहार करने लगे ॥ २ ॥

वेश्मानि तान्यप्रतिमानि पश्यन्
क्रीडाश्च नानाद्रुमसंनिबद्धाः
चचार धन्वी बहुधा नरेन्द्रः
सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ॥ ३ ॥

वहाँ कुबेरके अनुपम भवन बने हुए थे। नाना प्रकारके वृक्षोंके निकट अनेक प्रकारके खेल होते रहते थे। उन सबको देखते हुए किरीटधारी अर्जुन बहुधा वहाँ विचरा करते और हाथमें धनुष लेकर सदा अस्त्रोंके अभ्यासमें संलग्न रहते थे ॥ ३ ॥

अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः
प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः
न प्राणिनां ते स्पृहयन्ति राजन्
शिवश्च कालः स बभूव तेषाम् ॥ ४ ॥
राजन्! राजकुमार पाण्डवोंको राजाधिराज कुबेरकी कृपासे वहाँका निवास प्राप्त हुआ था। वे वहाँ रहकर भूतलके अन्य प्राणियोंके ऐश्वर्य-सुखकी अभिलाषा नहीं रखते थे। उनका वह समय बड़े सुखसे बीत रहा था ॥ ४ ॥
समेत्य पार्थेन यथैकरात्र-
मूबुः समास्तत्र तदा चतस्रः
पूर्वाश्च षट् ता दश पाण्डवानां
शिवा बभूवुर्वसतां वनेषु ॥ ५ ॥
वे अर्जुनके साथ वहाँ चार वर्षोंतक रहे, परंतु उनको वह समय एक रातके समान ही प्रतीत हुआ। पहलेके छः वर्ष तथा वहाँके चार वर्ष इस प्रकार सब मिलाकर पाण्डवोंके वनवासके दस वर्ष आनन्दपूर्वक बीत गये ॥ ५ ॥
ततोऽब्रवीद् वायुसुतस्तरस्वी
जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य
यमौ च वीरौ सुरराजकल्पा-
वेकान्तमास्थाय हितं प्रियं च ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक दिन अर्जुन तथा वीरवर नकुल-सहदेव, जो देवराजके समान पराक्रमी थे, एकान्तमें राजा युधिष्ठिरके पास बैठे थे। उस समय वेगशाली वायुपुत्र भीमसेन यह हितकर एवं प्रिय वचन बोले— ॥ ६ ॥
तव प्रतिज्ञां कुरुराज सत्यां
चिकीर्षमाणास्तदनु प्रियं च
ततो न गच्छाम वनान्यपास्य
सुयोधनं सानुचरं निहन्तुम् ॥ ७ ॥
‘कुरुराज! आपकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेकी इच्छासे और आपका प्रिय करनेकी अभिलाषा रखनेके कारण हमलोग यह वनवास छोड़कर दुर्योधनका अनुचरोंसहित वध करने नहीं जा रहे हैं ॥ ७ ॥
एकादशं वर्षमिदं वसामः
सुयोधनेनात्तसुखाः सुखार्हाः
तं वञ्चयित्वाधमबुद्धिशील-
मज्ञातवासं सुखमाप्नुयाम ॥ ८ ॥

'अब हमारे निवासका यह ग्यारहवाँ वर्ष चल रहा है। हमलोग सुख भोगनेके अधिकारी थे, परन्तु दुर्योधनने हमारा सुख छीन लिया। उसकी बुद्धि तथा स्वभाव अत्यन्त अधम है। उस दुष्टको धोखा देकर हम अपने अज्ञातवासका समय भी सुखपूर्वक बिता लेंगे ।। ८ ।।

तवाज्ञया पार्थिव निर्विशङ्का विहाय मानं विचरन् वनानि समीपवासेन विलोभितास्ते ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ।। ९ ।।

'भूपशिरोमणे! आपकी आज्ञासे हम मानापमानका विचार छोड़कर निःशंक हो वनमें विचरते रहेंगे। पहले किसी निकटवर्ती स्थानमें रहकर दुर्योधन आदिके मनमें वहीं खोज करनेका लोभ उत्पन्न करेंगे और फिर वहाँसे दूर देशमें चले जायँगे, जिससे उन्हें हमारा पता न लग सकेगा ।। ९ ।।

संवत्सरं तत्र विहृत्य गूढं नराधमं तं सुखमुद्धरेम निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय ।। १० ।। सुयोधनायानुचरैर्वृताय ततो महीमावस धर्मराज स्वर्गोपमं देशमिमं चरद्भिः शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ।। ११ ।।

'वहाँ एक वर्षतक गुप्तरूपसे निवास करके जब हम लौटेंगे, तब अनायास ही उस नराधम दुर्योधनकी जड़ उखाड़ देंगे। नरेन्द्र! नीच दुर्योधन आज अपने अनुचरोंसे घिरकर सुखी हो रहा है। उसने जो वैरका वृक्ष लगा रखा है, उसे हम फल-फूलसहित उखाड़ फेकेंगे और उससे वैरका बदला लेंगे। अतः धर्मराज! आप यहाँसे चलकर पृथ्वीपर निवास करें। नरदेव! इसमें संदेह नहीं कि हमलोग इस स्वर्गतुल्य प्रदेशमें विचरते रहनेपर भी अपना सारा शोक अनायास ही निवृत्त कर सकते हैं ।। १०-११ ।।

कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु तत् प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां शक्यं महत् प्राप्तुमथ क्रियाश्च ।। १२ ।। इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात् कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय कृतागसां भारत निग्रहे च ।। १३ ।।

‘परंतु ऐसा होनेपर चराचर जगत्में आपकी पुण्यमयी कीर्ति नष्ट हो जायगी। इसलिये कुरुवंश-शिरोमणि अपने पूर्वजोंके उस महान् राज्यको प्राप्त करके ही हम और कोई सत्कर्म करनेयोग्य हो सकते हैं। भरतकुलभूषण महाराज! आप कुबेरसे जो सम्मान या अनुग्रह प्राप्त कर रहे हैं, इसे तो सदा ही प्राप्त कर सकते हैं। इस समय तो अपराधी शत्रुओंको मारने और दण्ड देनेका निश्चय कीजिये ।। १२-१३ ।।

तेजस्तवोग्रं न सहेत राजन् समेत्य साक्षादपि वज्रपाणिः न हि व्यथां जातु करिष्यतस्तौ समेत्य देवैरपि धर्मराज ।। १४ ।। तवार्थसिद्धयर्थमपि प्रवृत्तौ सुपर्णकेतुश्च शिनेश्च नप्ता तथैव कृष्णोऽप्रतिमो बलेन तथैव चाहं नरदेववर्य ।। १५ ।। तवार्थसिद्धयर्थमभिप्रपन्नो यथैव कृष्णः सह यादवैस्तैः तथैव चाहं नरदेववर्य यमौ च वीरौ कृतिनौ प्रयोगे ।। १६ ।।

‘राजन्! साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी आपसे भिड़कर आपके भयंकर तेजको नहीं सह सकते। धर्मराज! आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये दो वीर सदा प्रयत्न करते हैं! गरुड़ध्वज भगवान् श्रीकृष्ण और शिनिके नाती वीरवर सात्यकि। ये दोनों आपके लिये देवताओंसे भी युद्ध करनेमें कभी कष्टका अनुभव नहीं करेंगे। नरदेवशिरोमणे! इन्हीं दोनोंके समान अर्जुन भी बल और पराक्रममें अपना सानी नहीं रखते। इसी प्रकार मैं भी बलमें किसीसे कम नहीं हूँ। जैसे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यादवोंके साथ आपके प्रत्येक कार्यकी सिद्धिके लिये उद्यत रहते हैं, उसी प्रकार मैं, अर्जुन तथा अस्त्रोंके प्रयोगमें कुशल वीर नकुल-सहदेव भी आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा संनद्ध रहा करते हैं ।। १४—१६ ।।

त्वदर्थयोगप्रभवप्रधानाः शमं करिष्याम परान् समेत्य ।। १६ ½ ।।

आपको धनकी प्राप्ति हो और आपका ऐश्वर्य बढ़े, यही हमारा प्रधान लक्ष्य है। अतः हमलोग शत्रुओंसे भिड़कर वैरकी शान्ति करेंगे ।। १६ ½ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततस्तदाज्ञाय मतं महात्मा तेषां च धर्मस्य सुतो वरिष्ठः ।। १७ ।।

प्रदक्षिणं वैश्रवणाधिवासं चकार धर्मार्थविदुत्तमौजाः। आमन्त्र्य वेश्मानि नदीः सरांसि सर्वाणि रक्षांसि च धर्मराजः ॥ १८ ॥ यथागतं मार्गमवेक्षमाणः पुनर्गिरिं चैव निरीक्षमाणः। ततो महात्मा स विशुद्धबुद्धिः सम्प्राथयामास नगेन्द्रवर्यम् ॥ १९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उत्तम ओजसे सम्पन्न श्रेष्ठ महात्मा धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उस समय उन सबके अभिप्रायको जानकर कुबेरके निवासस्थान उस गन्धमादन पर्वतकी प्रदक्षिणा की। फिर उन्होंने वहाँके भवनों, नदियों, सरोवरों तथा समस्त राक्षसोंसे विदा ली। इसके बाद वे जिस मार्गसे आये थे, उसकी ओर देखने लगे। तदनन्तर उन विशुद्धबुद्धि महात्मा युधिष्ठिरने पुनः गन्धमादन पर्वतकी ओर देखते हुए उस श्रेष्ठ गिरिराजसे इस प्रकार प्रार्थना की ॥ १७—१९ ॥

समाप्तकर्मा सहितः सुहृद्भि- र्जित्वा सपत्नान् प्रतिलभ्य राज्यम्। शैलेन्द्र भूयस्तपसे जितात्मा द्रष्टा तवास्मीति मतिं चकार ॥ २० ॥ ‘शैलेन्द्र! अब अपने मन और बुद्धिको संयममें रखनेवाला मैं शत्रुओंको जीतकर अपना खोया हुआ राज्य पानेके बाद सुहृदोंके साथ अपना सब कार्य सम्पन्न करके पुनः तपस्याके लिये लौटनेपर आपका दर्शन करूँगा’। इस प्रकार युधिष्ठिरने निश्चय किया ॥ २० ॥

वृतश्च सर्वैरनुजैर्द्विजैश्च तेनैव मार्गेण पतिः कुरूणाम्। उवाह चैतान् गणशस्तथैव घटोत्कचः पर्वतनिर्झरेषु ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् समस्त भाइयों और ब्राह्मणोंसे घिरे हुए कुरुराज युधिष्ठिर उसी मार्गसे नीचे उतरने लगे जहाँ दुर्गम पर्वत और झरने पड़ते थे, वहाँ घटोत्कच अपने गणोंसहित आकर पहलेकी तरह इन सबको पीठपर बिठा वहाँसे पार कर देता था ॥ २१ ॥

तान् प्रस्थितान् प्रीतमना महर्षिः पितेव पुत्राननुशिष्य सर्वान्। स लोमशः प्रीतमना जगाम दिवौकसां पुण्यतमं निवासम् ॥ २२ ॥

महर्षि लोमशने जब पाण्डवोंको वहाँसे प्रस्थान करते देखा, तब जिस प्रकार दयालु पिता अपने पुत्रोंको उपदेश देता है वैसे ही उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर सबको उत्तम उपदेश दिया। फिर मन-ही-मन प्रसन्नताका अनुभव करते हुए वे देवताओंके परम पवित्र स्थानको चले गये ॥ २२ ॥ तेनार्ष्टिषेणेन तथानुशिष्टा- स्तीर्थानि रम्याणि तपोवनानि महान्ति चान्यानि सरांसि पार्थाः सम्पश्यमानाः प्रययुर्नराग्र्याः ॥ २३ ॥ इसी प्रकार राजर्षि आर्ष्टिषेणने भी उन सबको उपदेश दिया। तत्पश्चात् वे नरश्रेष्ठ पाण्डव पवित्र तीर्थों, मनोहर तपोवनों और अन्य बड़े-बड़े सरोवरोंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि गन्धमादनप्रस्थाने षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें गन्धमादनसे प्रस्थानविषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७६ ॥

१७७-

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सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

नगोत्तमं प्रस्रवणैरुपेतं
दिशां गजैः किन्नरपक्षिभिश्च
सुखं निवासं जहतां हि तेषां
न प्रीतिरासीद् भरतर्षभाणाम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पर्वतश्रेष्ठ गन्धमादन अनेकानेक निर्झरोंसे सुशोभित तथा दिग्गजों, किन्नरों और पक्षियोंसे सुसेवित होनेके कारण भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ पाण्डवोंके लिये एक सुखदायक निवास था, उसे छोड़ते समय उनका मन प्रसन्न नहीं था ॥ १ ॥

ततस्तु तेषां पुनरेव हर्षः
कैलासमालोक्य महान् बभूव
कुबेरकान्तं भरतर्षभाणां
महीधरं वारिधरप्रकाशम् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् कुबेरके प्रिय भूधर कैलाशको, जो श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहा था, देखकर भरतकुलभूषण पाण्डुपुत्रोंको पुनः महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥

समुच्छ्रयान् पर्वतसंनिरोधान्
गोष्ठान् हरीणां गिरिसेतुमालाः
बहून् प्रपातांश्च समीक्ष्य वीराः
स्थलानि निम्नानि च तत्र तत्र ॥ ३ ॥
तथैव चान्यानि महावनानि
मृगद्विजानेकपसेवितानि
आलोकयन्तोऽभिययुः प्रतीता-
स्ते धन्विनः खड्गधरा नराग्र्याः ॥ ४ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव अपने हाथोंमें खड्ग और धनुष लिये हुए थे। वे ऊँचाई, पर्वतोंके सकरे स्थान, सिंहोंकी मादें, पर्वतीय नदियोंको पार करनेके लिये बने हुए पुल, बहुत-से झरने और नीची भूमियोंको जहाँ-तहाँ देखते हुए तथा मृग, पक्षी एवं हाथियोंसे सेवित दूसरे-दूसरे विशाल वनोंका अवलोकन करते हुए विश्वासपूर्वक आगे बढ़ने लगे ॥ ३-४ ॥

वनानि रम्याणि नदीः सरांसि गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि एते निवासाः सततं बभूवु- र्दिवानिशं प्राप्य नरर्षभाणाम् ॥ ५ ॥ पुरुषरत्न पाण्डव कभी रमणीय वनोंमें, कभी सरोवरोंके किनारे, कभी नदियोंके तटपर और कभी पर्वतोंकी छोटी-बड़ी गुफाओंमें दिन या रातके समय ठहरते जाते थे। सदा ऐसे ही स्थानोंमें उनका निवास होता था ।। ५ ।।

ते दुर्गवासं बहुधा निरुष्य व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम् आसेदुरत्यर्थमनोरमं ते तमाश्रमाग्र्यं वृषपर्वणस्तु ॥ ६ ॥ अनेक बार दुर्गम स्थानोंमें निवास करके अचिन्त्यरूप कैलासपर्वतको पीछे छोड़कर वे पुनः वृषपर्वाके अत्यन्त मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें आ पहुँचे ।। ६ ।।

समेत्य राज्ञा वृषपर्वणा ते प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहाः शशंसिरे विस्तरशः प्रवासं गिरौ यथावद् वृषपर्वणस्ते ॥ ७ ॥ वहाँ राजा वृषपर्वासे मिलकर और उनसे भलीभाँति पूजित होकर उन सबका शोक-मोह दूर हो गया। फिर उन्होंने वृषपर्वासे गन्धमादन पर्वतपर अपने रहनेके वृत्तान्तका यथार्थरूपसे एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।।

सुखोषितास्तस्य त एकरात्रं पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे अभ्याययुस्ते बदरीं विशालां सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ॥ ८ ॥ उस पवित्र आश्रममें देवता और महर्षि निवास किया करते थे। वहाँ एक रात सुखपूर्वक रहकर वे वीर पाण्डव फिर विशालापुरीके बदरिकाश्रमतीर्थमें चले आये और वहाँ बड़े आनन्दसे रहे ।। ८ ।।

ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा नारायणस्थानगताः समग्राः कुबेरकान्तां नलिनीं विशोकाः सम्पश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् वहाँ भगवान् नर-नारायणके क्षेत्रमें आकर सभी महानुभाव पाण्डवोंने सुखपूर्वक निवास किया और शोकरहित हो कुबेरकी उस प्रिय पुष्करिणीका दर्शन किया,

जिसका सेवन देवता और सिद्ध पुरुष किया करते हैं ।। तां चाथ दृष्ट्वा नलिनीं विशोकाः पाण्डोः सुताः सर्वनरप्रधानाः ते रेमिरे नन्दनवासमेत्य द्विजर्षयो वीतमला यथैव ।। १० ।। सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ वे पाण्डुपुत्र उस पुष्करिणीका दर्शन करके शोकरहित हो वहाँ इस प्रकार आनन्दका अनुभव करने लगे, मानो निर्मल ब्रह्मर्षिगण इन्द्रके नन्दनवनमें सानन्द विचर रहे हों ।। १० ।। ततः क्रमेणोपययुर्नृवीरा यथागतेनैव पथा समग्राः विहृत्य मासं सुखिनो बदर्यां किरातराज्ञो विषयं सुबाहोः ।। ११ ।। इसके बाद वे सारे नरवीर जिस मार्गसे आये थे, क्रमशः उसी मार्गसे चल दिये। बदरिकाश्रममें एक मासतक सुखपूर्वक विहार करके उन्होंने किरातनरेश सुबाहुके राज्यकी ओर प्रस्थान किया ।। ११ ।। पीनांस्तुषारान् दरदांश्च सर्वान् देशान् कुलिन्दस्य च भूमिरत्नान् अतीत्य दुर्गं हिमवत्प्रदेशं पुरं सुबाहोर्ददृशुर्नृवीराः ।। १२ ।। कुलिन्दके तुषार, दरद आदि धन-धान्यसे युक्त और प्रचुर रत्नोंसे सम्पन्न देशोंको लाँघते हुए हिमालयके दुर्गम स्थानोंको पार करके उन नरवीरोंने राजा सुबाहुका नगर देखा ।। १२ ।। श्रुत्वा च तान् पार्थिवपुत्रपौत्रान् प्राप्तान् सुबाहुर्विषये समग्रान् प्रत्युद्ययौ प्रीतियुतः स राजा तं चाभ्यनन्दन् वृषभाः कुरूणाम् ।। १३ ।। राजा सुबाहुने जब सुना कि मेरे राज्यमें राजपुत्र पाण्डवगण पधारे हुए हैं, तब बहुत प्रसन्न होकर नगरसे बाहर आ उसने उन सबकी अगवानी की। फिर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदिने भी उनका बड़ा समादर किया ।। १३ ।। समेत्य राज्ञा तु सुबाहुना ते सूतैर्विशोकप्रमुखैश्च सर्वे सहेन्द्रसेनैः परिचारिकैश्च पौरोगवैर्ये च महानसस्थाः ।। १४ ।।

राजा सुबाहुसे मिलकर वे विशोक आदि अपने सारथियों, इन्द्रसेन आदि परिचारकों, अग्रगामी सेवकों तथा रसोइयोंसे भी मिले ॥ १४ ॥

सुखोषितास्तत्र त एकरात्रं
सूतान् समादाय रथांश्च सर्वान्
घटोत्कचं सानुचरं विसृज्य
ततोऽभ्ययुर्यामुनमद्रिराजम् ॥ १५ ॥
वहाँ उन सबने एक रात बड़े सुखसे निवास किया। पाण्डवोंने अपने सारे सारथियों तथा रथोंको साथ ले लिया और अनुचरोंसहित घटोत्कचको विदा करके वहाँसे पर्वतराजको प्रस्थान किया जहाँ यमुनाका उद्गम-स्थान है ॥ १५ ॥

तस्मिन् गिरौ प्रस्रवणोपपन्न-
हिमोत्तरीयारुणपाण्डुसानौ
विशाखयूपं समुपेत्य चक्रु-
स्तदा निवासं पुरुषप्रवीराः ॥ १६ ॥
झरनोंसे युक्त हिमराशि उस पर्वतरूपी पुरुषके लिये उत्तरीयका काम करती थी और उसका अरुण एवं श्वेत रंगका शिखर बालसूर्यकी किरणें पड़नेसे सफेद एवं लाल पगड़ीके समान शोभा पाता था। उसके ऊपर विशाखयूप नामक वनमें पहुँचकर नरवीर पाण्डवोंने उस समय निवास किया ॥ १६ ॥

वराहनानामृगपक्षिजुष्टं
महावनं चैत्ररथप्रकाशम्
शिवेन पार्था मृगयाप्रधानाः
संवत्सरं तत्र वने विजह्रुः ॥ १७ ॥
वह विशाल वन चैत्ररथ वनके समान शोभायमान था। वहाँ सूअर, नाना प्रकारके मृग तथा पक्षी निवास करते थे। उन दिनों पाण्डवोंका वहाँ हिंस्र जीवोंको मारना ही प्रधान काम था। वहाँ वे एक वर्षतक बड़े सुखसे विचरते रहे ॥ १७ ॥

तत्राससादातिबलं भुजङ्गं
क्षुधार्दितं मृत्युमिवोग्ररूपम्
वृकोदरः पर्वतकन्दरायां
विषादमोहव्यथितान्तरात्मा ॥ १८ ॥
उसी यात्रामें भीमसेन एक दिन पर्वतकी कन्दरामें भूखसे पीड़ित एक अजगरके पास जा पहुँचे, जो अत्यन्त बलवान् होनेके साथ ही मृत्युके समान भयानक था। उस समय उनकी अन्तरात्मा विषाद एवं मोहसे व्यथित हो उठी ॥ १८ ॥

द्वीपोऽभवद् यत्र वृकोदरस्य
युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः

अमोक्षयद् यस्तमनन्ततेजा ग्राहेण संवेष्टितसर्वगात्रम् ॥ १९ ॥ उस अवसरपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अत्यन्त तेजस्वी युधिष्ठिर भीमसेनके लिये द्वीपकी भाँति अवलम्ब हो गये। अजगरने भीमसेनके सम्पूर्ण शरीरको लपेट लिया था, परंतु युधिष्ठिरने (अजगरको उसके प्रश्नोंके उत्तरद्वारा संतुष्ट करके) उन्हें छुड़ा दिया ॥ १९ ॥

ते द्वादशं वर्षमुपोपयातं वने विहर्तुं कुरवः प्रतीताः। तस्माद् वनाच्चैत्ररथप्रकाशात् श्रिया ज्वलन्तस्तपसा च युक्ताः ॥ २० ॥ ततश्च यात्वा मरुधन्वपार्श्वं सदा धनुर्वेदरतिप्रधानाः। सरस्वतीमेत्य निवासकामाः सरस्ततो द्वैतवनं प्रतीयुः ॥ २१ ॥ अब इन पाण्डवोंके वनवासका बारहवाँ वर्ष आ पहुँचा था। उसे भी वनमें सानन्द व्यतीत करनेके लिये उनके मनमें बड़ा उत्साह था। अपनी अद्भुत कान्तिसे प्रकाशित होते हुए तपस्वी पाण्डव चैत्ररथ वनके समान शोभा पानेवाले उस वनसे निकलकर मरुभूमिके पास सरस्वतीके तटपर गये और वहीं निवास करनेकी इच्छासे द्वैतवनके द्वैत सरोवरके समीप गये। उस समय पाण्डवोंका विशेष प्रेम सदा धनुर्वेदमें ही लक्षित होता था ॥

समीक्ष्य तान् द्वैतवने निविष्टान् निवासिनस्तत्र ततोऽभिजग्मुः। तपोदमाचारसमाधियुक्ता- स्तृणोदपात्रावरणाश्मकुट्टाः ॥ २२ ॥ उन्हें द्वैतवनमें आया देख वहाँके निवासी उनके दर्शनके लिये निकट आये। वे सब-के-सब तपस्या, इन्द्रिय-संयम, सदाचार और समाधिमें तत्पर रहनेवाले थे। तिनकेकी चटाई, जलपात्र, ओढ़नेका कपड़ा और सिल-लोढ़े—यही उनके पास सामग्री थी ॥ २२ ॥

प्लक्षाक्षरौहीतकवेतसाश्च तथा बदर्यः खदिराः शिरीषाः। बिल्वेङ्गुदाः पीलुशमीकरीराः सरस्वतीतीररुहा बभूवुः ॥ २३ ॥ तां यक्षगन्धर्वमहर्षिकान्ता- मागारभूतामिव देवतानाम्। सरस्वतीं प्रीतियुताश्चरन्तः सुखं विजह्रर्नरदेवपुत्राः ॥ २४ ॥

सरस्वतीके तटपर पाकड़, बहेड़ा, रोहितक, बेंत, बेर, खैर, सिरस, बेल, इंगुदी, पीलु, शमी और करीर आदिके वृक्ष खड़े थे। वह नदी यक्ष, गन्धर्व और महर्षियोंको प्रिय थी। देवताओंकी तो वह मानो बस्ती ही थी। राजपुत्र पाण्डव बड़ी प्रसन्नता और सुखसे वहाँ विचरने और निवास करने लगे ॥ २३-२४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि पुनर्द्वैतवनप्रवेशे सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें पाण्डवोंका पुनः द्वैतवनमें प्रवेशविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥

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अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना

जनमेजय उवाच

कथं नागायुतप्राणो भीमो भीमपराक्रमः।
भयमाहारयत् तीव्रं तस्मादजगरान्मुने ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! भयानक पराक्रमी भीमसेनमें तो दस हजार हाथियोंका बल था। फिर उन्हें उस अजगरसे इतना तीव्र भय कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥

पौलस्त्यं धनदं युद्धे य आह्वयति दर्पितः।
नलिन्यां कदनं कृत्वा निहन्ता यक्षरक्षसाम् ॥ २ ॥
तं शंससि भयाविष्टमापन्नमरिसूदनम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
जो बलके घमंडमें आकर पुलस्त्यनन्दन कुबेरको भी युद्धके लिये ललकारते थे, जिन्होंने कुबेरकी पुष्करिणीके तटपर कितने ही यक्षों तथा राक्षसोंका संहार कर डाला था, उन्हीं शत्रुसूदन भीमसेनको आप भयभीत (और विपत्तिग्रस्त) बताते हैं। अतः मैं इस प्रसंगको विस्तारसे सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ २-३ ॥

वैशम्पायन उवाच

बह्वाश्चर्ये वने तेषां वसतामुग्रधन्विनाम्।
प्राप्तानामाश्रमाद् राजन् राजर्षेर्वृषपर्वणः ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! राजर्षि वृषपर्वाके आश्रमसे आकर उग्र धनुर्धर पाण्डव अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए उस द्वैतवनमें निवास करते थे ॥ ४ ॥

यदृच्छया धनुष्पाणिर्बद्धखड्गो वृकोदरः।
ददर्श तद् वनं रम्यं देवगन्धर्वसेवितम् ॥ ५ ॥
भीमसेन तलवार बाँधकर हाथमें धनुष लिये अकस्मात् घूमने निकल जाते और देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित उस रमणीय वनकी शोभा निहारते थे ॥ ५ ॥

स ददर्श शुभान् देशान् गिरेर्हिमवतस्तदा।
देवर्षिसिद्धचरितानप्सरोगणसेवितान् ॥ ६ ॥
उन्होंने हिमालय पर्वतके उन शुभ प्रदेशोंका अवलोकन किया जहाँ देवर्षि और सिद्ध पुरुष विचरण करते थे तथा अप्सराएँ जिनका सदा सेवन करती थीं ॥ ६ ॥

चकोरैरुपचक्रैश्च पक्षिभिर्जीवजीवकैः कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च तत्र तत्र निनादितान् ।। ७ ।। वहाँ भिन्न-भिन्न स्थानोंमें चकोर, उपचक्र, जीव-जीवक, कोकिल और भृंगराज आदि पक्षी कलरव करते थे ।। ७ ।।

नित्यपुष्पफलैर्वृक्षैर्हिमसंस्पर्शकोमलैः उपेतान् बहुलच्छायैर्मनोनयननन्दनैः ।। ८ ।। वहाँके वृक्ष सदा फूल और फल देते थे। हिमके स्पर्शसे उनमें कोमलता आ गयी थी। उनकी छाया बहुत घनी थी और वे दर्शनमात्रसे मन एवं नेत्रोंको आनन्द प्रदान करते थे ।। ८ ।।

स सम्पश्यन् गिरिनदीर्वैदूर्यमणिसंनिभैः सलिलैर्हिमसंकाशैर्हंसकारण्डवायुतैः ।। ९ ।। उन वृक्षोंसे सुशोभित प्रदेशों तथा वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, हिमसदृश स्वच्छ, शीतल सलिल-समूहसे संयुक्त पर्वतीय नदियोंकी शोभा निहारते हुए वे सब ओर घूमते थे। नदियोंकी उस जलराशिमें हंस और कारण्डव आदि सहस्रों पक्षी किलोलें करते थे ।।

वनानि देवदारूणां मेघानामिव वागुराः हरिचन्दनमिश्राणि तुङ्गकालीयकान्यपि ।। १० ।। हरिचन्दन, तुंग और कालीयक आदि वृक्षोंसे युक्त ऊँचे-ऊँचे देवदारुके वन ऐसे जान पड़ते थे मानो बादलोंको फँसानेके लिये फंदे हों ।। १० ।।

मृगयां परिधावन् स समेषु मरुधन्वसु विध्यन् मृगान् शरैः शुद्धैश्चचार स महाबलः ।। ११ ।। महाबली भीम सारे मरु प्रदेशमें शिकारके लिये दौड़ते और केवल बाणोंद्वारा हिंसक पशुओंको घायल करते हुए विचरा करते थे ।। ११ ।।

भीमसेनस्तु विख्यातो महान्तं दंष्ट्रिणं बलात् निघ्नन् नागशतप्राणो वने तस्मिन् महाबलः ।। १२ ।। भीमसेन अपने महान् बलके लिये विख्यात थे। उनमें सैकड़ों हाथियोंकी शक्ति थी। वे उस वनमें विकराल दाढ़ोंवाले बड़े-से-बड़े सिंहको भी पछाड़ देते थे ।। १२ ।।

मृगाणां स वराहाणां महिषाणां महाभुजः विनिघ्नंस्तत्र तत्रैव भीमो भीमपराक्रमः ।। १३ ।। भीमसेनका पराक्रम भी उनके नामके अनुसार ही भयानक था। उनकी भुजाएँ विशाल थीं। वे मृगयामें प्रवृत्त होकर जहाँ-तहाँ हिंसक पशुओं, वराहों और भैंसोंको भी मारा करते थे ।। १३ ।।

स मातङ्गशतप्राणो मनुष्यशतवारणः सिंहशार्दूलविक्रान्तो वने तस्मिन् महाबलः ।। १४ ।।

वृक्षानुत्पाटयामास तरसा वै बभञ्ज च पृथिव्याश्च प्रदेशान् वै नादयंस्तु वनानि च ॥ १५ ॥ उनमें सैकड़ों मतवाले गजराजोंके समान बल था। वे एक साथ सौ-सौ मनुष्योंका वेग रोक सकते थे। उनका पराक्रम सिंह और शार्दूलके समान था महाबली भीम उस वनमें वृक्षोंको उखाड़ते और उन्हें वेगपूर्वक पुनः तोड़ डालते थे। वे अपनी गर्जनासे उस वन्य भूमिके प्रदेशों तथा समूचे वनको गुँजाते रहते थे ॥ १४-१५ ॥ पर्वताग्राणि वै मृद्नन् नादयानश्च विज्वरः प्रक्षिपन् पादपांश्चापि नादेनापूरयन् महीम् ॥ १६ ॥ वे पर्वतशिखरोंको रौंदते, वृक्षोंको तोड़कर इधर-उधर बिखेरते और निश्चिन्त होकर अपने सिंहनादसे भूमण्डलको प्रतिध्वनित किया करते थे ॥ १६ ॥ वेगेन न्यपतद् भीमो निर्भयश्च पुनः पुनः आस्फोटयन् क्ष्वेडयंश्च तलतालांश्च वादयन् ॥ १७ ॥ वे निर्भय होकर बार-बार वेगपूर्वक कूदते-फाँदते, ताल ठोंकते, सिंहनाद करते और तालियाँ बजाते थे ॥ १७ ॥ चिरसम्बद्धदर्पस्तु भीमसेनो वने तदा गजेन्द्राश्च महासत्त्वा मृगेन्द्राश्च महाबलाः ॥ १८ ॥ भीमसेनस्य नादेन व्यमुज्जन्त गुहा भयात् वनमें घूमते हुए भीमसेनका बलाभिमान दीर्घकालसे बहुत बढ़ा हुआ था। उस समय उनकी सिंह-गर्जनासे महान् बलशाली गजराज और मृगराज भी भयसे अपना स्थान छोड़कर भाग गये ॥ १८ १/२ ॥ क्वचित् प्रधावंस्तिष्ठंश्च क्वचिच्चोपविशंस्तथा ॥ १९ ॥ मृगप्रेप्सुर्महारौद्रे वने चरति निर्भयः स तत्र मनुजव्याघ्रो वने वनचरोपमः ॥ २० ॥ पद्भ्यामभिसमापेदे भीमसेनो महाबलः स प्रविष्टो महारण्ये नादान् नदति चाद्भुतान् ॥ २१ ॥ त्रासयन् सर्वभूतानि महासत्त्वपराक्रमः वे कहीं दौड़ते, कहीं खड़े होते और कहीं बैठते हुए शिकार पानेकी अभिलाषासे उस महाभयंकर वनमें निर्भय विचरते रहते थे। वे नरश्रेष्ठ महाबली भीम उस वनमें वनचर भीलोंकी भाँति पैदल ही चलते थे, उनका साहस और पराक्रम महान् था। वे गहन वनमें प्रवेश करके समस्त प्राणियोंको डराते हुए अद्भुत गर्जना करते थे ॥ १९—२१ १/२ ॥ ततो भीमस्य शब्देन भीताः सर्पा गुहाशयाः ॥ २२ ॥ अतिक्रान्तास्तु वेगेन जगामानुसृतः शनैः ततोऽमरवरप्रख्यो भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥

स ददर्श महाकायं भुजङ्गं लोमहर्षणम् गिरिदुर्गे समापन्नं कायेनावृत्य कन्दरम् ॥ २४ ॥ तदनन्तर एक दिनकी बात है, भीमसेनके सिंहनादसे भयभीत हो गुफाओंमें रहनेवाले सारे सर्प बड़े वेगसे भागने लगे और भीमसेन धीरे-धीरे उन्हींका पीछा करने लगे। श्रेष्ठ देवताओंके समान कान्तिमान् महाबली भीमसेनने आगे जाकर एक विशालकाय अजगर देखा, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। वह अपने शरीरसे एक (विशाल) कन्दराको घेरकर पर्वतके एक दुर्गम स्थानमें रहता था ॥ २२—२४ ॥ पर्वताभोगवर्ष्माणमतिकायं महाबलम् चित्राङ्गमङ्गैश्चित्रैर्हरिद्रासदृशच्छविम् ॥ २५ ॥ गुहाकारेण वक्त्रेण चतुर्दंष्ट्रेण राजता दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिह्हानं सृक्किणी मुहुः ॥ २६ ॥ त्रासनं सर्वभूतानां कालान्तकयमोपमम् निःश्वासक्ष्वेडनादेन भर्त्सयन्तमिव स्थितम् ॥ २७ ॥ उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह महाकाय होनेके साथ ही अत्यन्त बलवान् भी था। उसका प्रत्येक अंग शारीरिक विचित्र चिह्नोंसे चिह्नित होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था। उसका रंग हल्दीके समान पीला था। प्रकाशमान चारों दाढ़ोंसे युक्त उसका मुख गुफा-सा जान पड़ता था। उसकी आँखें अत्यन्त लाल और आग उगलती-सी प्रतीत होती थीं। वह बार-बार अपने दोनों गलफरोंको चाट रहा था। कालान्तक तथा यमके समान समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह भयानक भुजंग अपने उच्छ्वास और सिंहनादसे दूसरोंकी भर्त्सना करता-सा प्रतीत होता था ॥ २५—२७ ॥ स भीमं सहसाभ्येत्य पृदाकुः कुपितो भृशम् जग्राहाजगरो ग्राहो भुजयोरुभयोर्बलात् ॥ २८ ॥ वह अजगर अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ था। (मनुष्योंको) जकड़नेवाले उस सर्पने सहसा भीमसेनके निकट पहुँचकर उनकी दोनों बाँहोंको बलपूर्वक जकड़ लिया ॥ २८ ॥

तेन संस्पृष्टगात्रस्य भीमसेनस्य वै तदा संज्ञा मुमोह सहसा वरदानेन तस्य हि ॥ २९ ॥ उस समय भीमसेनके शरीरका उससे स्पर्श होते ही वे भीमसेन सहसा अचेत हो गये। ऐसा इसलिये हुआ कि उस सर्पको वैसा ही वरदान मिला था ॥ २९ ॥

दशनागसहस्राणि धारयन्ति हि यद् बलम् तद् बलं भीमसेनस्य भुजयोरसमं परैः ॥ ३० ॥ दस हजार गजराज जितना बल धारण करते हैं, उतना ही बल भीमसेनकी भुजाओंमें विद्यमान था। उनके बलकी और कहीं समता नहीं थी ॥ ३० ॥

स तेजस्वी तथा तेन भुजगेन वशीकृतः विस्फुरन् शनकैर्भीमो न शशाक विचेष्टितुम् ॥ ३१ ॥ ऐसे तेजस्वी भीम भी उस अजगरके वशमें पड़ गये। वे धीरे-धीरे छटपटाते रहे, परंतु छूटनेकी अधिक चेष्टा करनेमें सफल न हो सके ॥ ३१ ॥

नागायुतसमप्राणः सिंहस्कन्धो महाभुजः गृहीतो व्यजहात् सत्त्वं वरदानविमोहितः ॥ ३२ ॥ उनकी प्राणशक्ति दस सहस्र हाथियोंके समान थी। दोनों कंधे सिंहके कंधोंके समान थे और भुजाएँ बहुत बड़ी थीं। फिर भी सर्पको मिले हुए वरदानके प्रभावसे मोहित हो जानेके कारण सर्पकी पकड़में आकर वे अपना साहस खो बैठे ॥ ३२ ॥

स हि प्रयत्नमकरोत् तीव्रमात्मविमोक्षणे
न चैनमशकद् वीरः कथंचित् प्रतिबाधितुम् ॥ ३३ ॥
उन्होंने अपनेको छुड़ानेके लिये घोर प्रयत्न किया, किंतु वीरवर भीमसेन किसी प्रकार भी उस सर्पको पराजित करनेमें सफलता नहीं प्राप्त कर सके ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि अजगरग्रहणे
अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें भीमसेनका अजगरद्वारा ग्रहणसम्बन्धी एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥