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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

होकर कितने ही वनोंको भस्म कर डालते हैं। राजा धर्मरूपसे विख्यात है। वही प्रजापति, इन्द्र, शुक्राचार्य, धाता और बृहस्पति भी है॥ २५-२६॥

प्रजापतिर्विराट् सम्राट् क्षत्रियो भूपतिर्नृपः।
य एभिः स्तूयते शब्दैः कस्तं नार्चितुमर्हति॥ २७॥
पुरायोनिर्य्युधाजिच्च अभिया मुदितो भवः।
स्वर्णेता सहजिद् बभ्रुरिति राजाभिधीयते॥ २८॥
सत्ययोनिः पुराविच्च सत्यधर्मप्रवर्तकः।
अधर्मादृषयो भीता बलं क्षत्रे समादधन्॥ २९॥
जिस राजाकी प्रजापति, विराट्, सम्राट्, क्षत्रिय, भूपति, नृप आदि शब्दोंद्वारा स्तुति की जाती है, उसकी पूजा कौन नहीं करेगा? पुरायोनि (प्रथम कारण), युधाजित् (संग्रामविजयी), अभिया (रक्षाके लिये सर्वत्र गमन करनेवाला), मुदित (प्रसन्न), भव (ईश्वर), स्वर्णेता (स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला), सहजित् (तत्काल विजय करनेवाला) तथा बभ्रु (विष्णु)—इन नामोंद्वारा राजाका वर्णन किया जाता है। राजा सत्यका कारण, प्राचीन बातोंको जाननेवाला तथा सत्यधर्ममें प्रवृत्ति करानेवाला है। अधर्मसे डरे हुए ऋषियोंने अपना ब्राह्मबल भी क्षत्रियोंमें स्थापित कर दिया था॥ २७—२९॥

आदित्यो दिवि देवेषु तमो नुदति तेजसा।
तथैव नृपतिर्भूमावधर्मान्नुदते भृशम्॥ ३०॥
जैसे देवलोकमें सूर्य अपने तेजसे सम्पूर्ण अन्धकारका नाश करता है, उसी प्रकार राजा इस पृथ्वीपर रहकर अधर्मोंको सर्वथा हटा देता है॥ ३०॥

ततो राज्ञः प्रधानत्वं शास्त्रप्रामाण्यदर्शनात्।
उत्तरः सिद्ध्यते पक्षो येन राजेति भाषितम्॥ ३१॥
अतः शास्त्र-प्रमाणपर दृष्टिपात करनेसे राजाकी प्रधानता सूचित होती है। इसलिये जिसने राजाको प्रजापति बतलाया है, उसीका पक्ष उत्कृष्ट सिद्ध होता है॥ ३१॥

मार्कण्डेय उवाच

ततः स राजा संहृष्टः सिद्धे पक्षे महामनाः।
तमत्रिमब्रवीत् प्रीतः पूर्वं येनाभिसंस्तुतः॥ ३२॥
यस्मात् पूर्वं मनुष्येषु ज्यायांसं मामिहाब्रवीः।
सर्वदेवैश्च विप्रर्षे सम्मितं श्रेष्ठमेव च॥ ३३॥
तस्मात् तेऽहं प्रदास्यामि विविधं वसु भूरि च।
दासीसहस्रं श्यामानां सुवस्त्राणामलंकृतम्॥ ३४॥
दशकोटीर्हिरण्यस्य रुक्मभारांस्तथा दश।
एतद् ददामि विप्रर्षे सर्वज्ञस्त्वं मतो हि मे॥ ३५॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**तदनन्तर एक पक्षकी उत्कृष्टता सिद्ध हो जानेपर महामना राजा पृथु बड़े प्रसन्न हुए और जिन्होंने उनकी पहले स्तुति की थी, उन अत्रिमुनिसे इस प्रकार बोले—‘ब्रह्मर्षे! आपने यहाँ मुझे मनुष्योंमें प्रथम (भूपाल), श्रेष्ठ, ज्येष्ठ तथा सम्पूर्ण देवताओंके समान बताया है, इसलिये मैं आपको प्रचुरमात्रामें नाना प्रकारके रत्न और धन दूँगा, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सहस्रों युवती दासियाँ अर्पित करूँगा तथा दस करोड़ स्वर्णमुद्रा और दस भार सोना भी दूँगा। विप्रर्षे! ये सब वस्तुएँ आपको अभी दे रहा हूँ, मैं समझता हूँ, आप सर्वज्ञ हैं’॥ ३२—३५॥

तदत्रिन्यायतः सर्वं प्रतिगृह्याभिसत्कृतः।
प्रत्युज्जगाम तेजस्वी गृहानेव माहतपाः॥ ३६॥
तब महान् तपस्वी और तेजस्वी अत्रि मुनि राजासे समादृत हो न्यायपूर्वक मिले हुए उस सम्पूर्ण धनको लेकर अपने घरको चले गये॥ ३६॥

प्रदाय च धनं प्रीतः पुत्रेभ्यः प्रयतात्मवान्।
तपः समभिसंधाय वनमेवान्वपद्यत॥ ३७॥
फिर मनपर संयम रखनेवाले वे महामुनि पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक वह सारा धन बाँटकर तपस्याका शुभ संकल्प मनमें लेकर वनमें ही चले गये॥ ३७॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि ब्राह्मणमाहात्म्ये
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें ब्राह्मणमाहात्म्यविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८५॥

तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद

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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद

मार्कण्डेय उवाच

अत्रैव च सरस्वत्या गीतं परपुरंजय ।
पृष्ट्या मुनिना वीर शृणु तार्क्ष्येण धीमता ॥ १ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**शत्रुओंकी राजधानी-पर विजय पानेवाले पाण्डुनन्दन! इसी विषयमें परम बुद्धिमान् तार्क्ष्य मुनिने सरस्वतीदेवीसे कुछ प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें सरस्वतीदेवीने जो कुछ कहा था, वह तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो ॥ १ ॥

तार्क्ष्य उवाच

किं नु श्रेयः पुरुषस्येह भद्रे
कथं कुर्वन् न च्यवते स्वधर्मात् ।
आचक्ष्व मे चारुसर्वाङ्गि कुर्यां
त्वया शिष्टो न च्यवेयं स्वधर्मात् ॥ २ ॥

**तार्क्ष्यने पूछा—**भद्रे! इस संसारमें मनुष्यका कल्याण करनेवाली वस्तु क्या है? किस प्रकार आचरण करनेवाला पुरुष अपने धर्मसे भ्रष्ट नहीं होता है? सर्वांगसुन्दरी देवि! तुम मुझसे इसका वर्णन करो। मैं तुम्हारी आज्ञाका पालन करूँगा। मुझे विश्वास है कि तुमसे उपदेश ग्रहण करके मैं अपने धर्मसे गिर नहीं सकता ॥ २ ॥

कथं वाग्निं जुहुयां पूजये वा
कस्मिन् काले केन धर्मो न नश्येत् ।
एतत् सर्वं सुभगे प्रब्रवीहि
यथा लोकान् विरजाः संचरेयम् ॥ ३ ॥

मैं कैसे और किस समय अग्निमें हवन अथवा उसका पूजन करूँ? क्या करनेसे धर्मका नाश नहीं होता है? सुभगे! तुम ये सारी बातें मुझसे बताओ। जिससे मैं रजोगुणरहित होकर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरण करूँ ॥ ३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

एवं पृष्टा प्रीतियुक्तेन तेन
शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमबुद्धियुक्तम् ।
तार्क्ष्यं विप्रं धर्मयुक्तं हितं च
सरस्वती वाक्यमिदं बभाषे ॥ ४ ॥

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! उनके इस प्रकार प्रेमपूर्वक पूछनेपर सरस्वतीदेवीने ब्रह्मर्षि तार्क्ष्यको धर्मात्मा, उत्तम बुद्धिसे युक्त एवं श्रवणके लिये उत्सुक देखकर उनसे यह हितकर वचन कहा— ॥ ४ ॥

सरस्वत्युवाच

यो ब्रह्म जानाति यथाप्रदेशं
स्वाध्यायनित्यः शुचिरप्रमत्तः ।
स वै पारं देवलोकस्य गन्ता
सहामरैः प्राप्नुयात् प्रीतियोगम् ॥ ५ ॥

**सरस्वती बोली—**मुने! जो प्रमाद छोड़कर पवित्र भावसे नित्य स्वाध्याय करता है और अर्चि आदि मार्गोंसे प्राप्त होनेयोग्य सगुण ब्रह्मको जान लेता है, वह देवलोकसे उठकर ब्रह्मलोकमें जाता है और देवताओंके साथ प्रेमसम्बन्ध स्थापित कर लेता है ॥ ५ ॥

तत्र स्म रम्या विपुला विशोकाः
सुपुष्पिताः पुष्करिण्यः सुपुण्याः ।
अकर्दमा मीनवत्यः सुतीर्था
हिरण्मयैरावृताः पुण्डरीकैः ॥ ६ ॥

वहाँ सुन्दर, विशाल, शोकरहित, अत्यन्त पवित्र तथा सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित छोटे-छोटे सरोवर हैं। उनमें कीचड़का नाम नहीं है। उनमें मछलियाँ निवास करती हैं। उन सरोवरोंमें उतरनेके लिये मनोहर सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और वे सभी सरोवर सुवर्णमय कमल-पुष्पोंसे आच्छादित रहते हैं ॥ ६ ॥

तासां तीरेष्वासते पुण्यभाजो
महीयमानाः पृथगप्सरोभिः ।
सुपुण्यगन्धाभिरलंकृताभि-
र्हिरण्यवर्णाभिरतीव हृष्टाः ॥ ७ ॥

उनके तटोंपर पूजनीय पुण्यात्मा पुरुष पृथक्-पृथक् अप्सराओंके साथ सानन्द प्रतिष्ठित होते हैं। वे अप्सराएँ अत्यन्त पवित्र सुगन्धसे सुवासित, विविध आभूषणोंसे विभूषित तथा स्वर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित होती हैं ॥ ७ ॥

परं लोकं गोप्रदास्त्वाप्नुवन्ति
दत्त्वानड्वाहं सूर्यलोकं व्रजन्ति ।
वासो दत्त्वा चान्द्रमसं तु लोकं
दत्त्वा हिरण्यममरत्वमेति ॥ ८ ॥

गोदान करनेवाले मनुष्य उत्तम लोकमें जाते हैं। छकड़े ढोनेवाले बलवान् बैलोंका दान करनेसे दाताओंको सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। वस्त्रदानसे चन्द्रलोक और सुवर्णदानसे

अमरत्वकी प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥ धेनुं दत्त्वा सुप्रभां सुप्रदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावद् वर्षाण्यासते देवलोके ॥ ९ ॥ जो अच्छे रंगकी हो, सुगमतासे दूध दुहा लेती हो, सुन्दर बछड़े देनेवाली हो और बन्धन तुड़ाकर भागनेवाली न हो, ऐसी गौका जो लोग दान करते हैं, वे गौके शरीरमें जितने रोएँ हों, उतने वर्षतक देवलोकमें निवास करते हैं ॥ ९ ॥ अनड्वाहं सुव्रतं यो ददाति हलस्य वोढारमनन्तवीर्यम् । धुरन्धरं बलवन्तं युवानं प्राप्नोति लोकान् दश धेनुदस्य ॥ १० ॥ जो मनुष्य अच्छे स्वभाववाले, अत्यन्त शक्तिशाली, हल खींचनेवाले, गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ, बलवान् और तरुण अवस्थावाले बैलका दान करता है, वह धेनुदान करनेवाले पुरुषसे दसगुने पुण्यलोक प्राप्त करता है ॥ १० ॥ ददाति यो वै कपिलां सचैलां कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । तैस्तैर्गुणैः कामदुहाथ भूत्वा नरं प्रदातारमुपैति सा गौः ॥ ११ ॥ जो काँसेकी दोहनी, वस्त्र, उत्तरकालिक दक्षिणाद्रव्यके साथ कपिला गौका दान करता है, उसकी दी हुई वह गौ उन-उन गुणोंके साथ कामधेनु बनकर परलोकमें दाताके पास पहुँच जाती है ॥ ११ ॥ यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावत् फलं भवति गोप्रदाने । पुत्रांश्च पौत्रांश्च कुलं च सर्व- मासप्तमं तारयते परत्र ॥ १२ ॥ उस धेनुके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक दाता गोदानके पुण्य-फलका उपभोग करता है। साथ ही वह गौ परलोकमें दाताके पुत्रों, पौत्रों एवं सात पीढ़ींतकके समूचे कुलका उद्धार करती है ॥ १२ ॥ सदक्षिणां काञ्चनचारुशृङ्गीं कांस्योपदोहां द्रविणैरुत्तरीयैः । धेनुं तिलानां ददतो द्विजाय लोका वसूनां सुलभा भवन्ति ॥ १३ ॥

स्वकर्मभिर्दानवसंनिरुद्धे
तीव्रान्धकारे नरके सम्पत्तन्तम् ।
महार्णवे नौरिव वातयुक्ता
दानं गवां तारयते परत्र ॥ १४ ॥

जो सोनेके बने हुए सुन्दर सींग, काँसके दुग्धपात्र, द्रव्य तथा ओढ़नेके वस्त्र और दक्षिणासहित तिलकी धेनुका ब्राह्मणको दान करता है, उसके लिये वसुओंके लोक सुलभ हो जाते हैं। जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्यको अनुकूल वायुके सहयोगसे चलनेवाली नाव बचा लेती है, उसी प्रकार जो अपने कर्मोंद्वारा काम, क्रोध आदि दानवोंसे घिरे हुए घोर अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण नरकमें गिर रहा है, उसे गोदानजनित पुण्य परलोकमें उबार लेता है ॥ १३-१४ ॥

यो ब्राह्मदेयां तु ददाति कन्यां
भूमिप्रदानं च करोति विप्रे ।
ददाति दानं विधिना च यश्च
स लोकमाप्नोति पुरंदरस्य ॥ १५ ॥

जो ब्राह्म विवाहकी विधिसे दान करनेयोग्य कन्याका (श्रेष्ठ वरको) दान करता है, ब्राह्मणको भूदान देता है और विधिपूर्वक अन्यान्य वस्तुओंका दान सम्पन्न करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है ॥ १५ ॥

यः सप्त वर्षाणि जुहोति तार्क्ष्य
हव्यं त्वग्नौ नियतः साधुशीलः ।
सप्तावरान् सप्त पूर्वान् पुनाति
पितामहानात्मना कर्मभिः स्वैः ॥ १६ ॥

तार्क्ष्य! जो सदाचारी पुरुष संयम—नियमका पालन करते हुए सात वर्षोंतक अग्निमें आहुति देता है, वह अपने सत्कर्मोंद्वारा अपने साथ ही सात पीढ़ीतककी भावी संतानोंको और सात पीढ़ी पूर्वतकके पितामहोंको भी पवित्र कर देता है ॥ १६ ॥

तार्क्ष्य उवाच

किमग्निहोत्रस्य व्रतं पुराण-
माचक्ष्व मे पृच्छतश्चानुरूपे ।
त्वयानुशिष्टोऽहमिहाद्य विद्यां
यदग्निहोत्रस्य व्रतं पुराणम् ॥ १७ ॥

**तार्क्ष्यने पूछा—**मनोहर रूपवाली देवि! मैं पूछता हूँ कि अग्निहोत्रका प्राचीन नियम क्या है? यह बताओ। तुम्हारे उपदेश करनेपर आज मुझे यहाँ अग्निहोत्रके प्राचीन नियमका ज्ञान हो जाय ॥ १७ ॥

सरस्वत्युवाच

न चाशुचिर्नाप्यनिर्णिंक्तपाणि-
र्नाब्रह्मविज्जुहुयान्नाविपश्चित् ।
बुभुत्सवः शुचिकामा हि देवा
नाश्रद्दधानाद्धि हविर्जुषन्ति ॥ १८ ॥

**सरस्वतीने कहा—**मुने! जो अपवित्र है, जिसने हाथ-पैर (भी) नहीं धोये हैं, जो वेदके ज्ञानसे वञ्चित है, जिसे वेदार्थका कोई अनुभव नहीं है, ऐसे पुरुषको अग्निमें आहुति नहीं देनी चाहिये। देवता दूसरोंके मनोभावको जाननेकी इच्छा रखते हैं, वे पवित्रता चाहते हैं, अतः श्रद्धाहीन मनुष्यके दिये हुए हविष्यको ग्रहण नहीं करते हैं ॥ १८ ॥

नाश्रोत्रियं देवहव्ये नियुञ्ज्या-
न्मोघं पुरा सिञ्चति तादृशो हि ।
अपूर्वमश्रोत्रियमाह तार्क्ष्य
न वै तादृग् जुहुयादग्निहोत्रम् ॥ १९ ॥

वेद-मन्त्रोंका ज्ञान न रखनेवाले पुरुषको देवताओंके लिये हविष्य प्रदान करनेके कार्यमें नियुक्त न करे; क्योंकि वैसा मनुष्य जो हवन करता है, वह व्यर्थ हो जाता है। तार्क्ष्य!

अश्रोत्रिय पुरुषको वेदमें अपूर्व (कुलशीलसे अपरिचित) कहा गया है*। अतः वैसा पुरुष अग्निहोत्रका अधिकारी नहीं है ॥ १९ ॥

कृशाश्च ये जुह्वति श्रद्दधानाः
सत्यव्रता हुतशिष्टाशिनश्च ।
गवां लोकं प्राप्य ते पुण्यगन्धं
पश्यन्ति देवं परमं चापि सत्यम् ॥ २० ॥
जो तपसे कृश हो सत्य व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक हवन करते हैं और हवनसे बचे हुए अन्नका भोजन करते हैं, वे पवित्र सुगन्धसे भरे हुए गौओंके लोकमें जाते हैं और वहाँ परम सत्य परमात्माका दर्शन करते हैं ॥ २० ॥

ताक्ष्य उवाच

क्षेत्रज्ञभूतां परलोकभावे
कर्मोदये बुद्धिमतिप्रविष्टाम् ।
प्रज्ञां च देवीं सुभगे विमृश्य
पृच्छामि त्वां का ह्यसि चारुरूपे ॥ २१ ॥
**तार्क्ष्यने पूछा—**सुन्दर रूपवाली सौभाग्यशालिनी देवि! तुम आत्मस्वरूपा हो तथा परलोकके विषयमें एवं कर्म-फलके विचारमें प्रविष्ट हुई अत्यन्त उत्कृष्ट बुद्धि हो। प्रज्ञा देवी भी तुम्हीं हो। तुम्हींको इन दोनों रूपोंमें जानकर मैं पूछता हूँ, बताओ, वास्तवमें तुम क्या हो? ॥

सरस्वत्युवाच

अग्निहोत्रादहमभ्यागतास्मि
विप्रर्षभाणां संशयच्छेदनाय ।
त्वत्संयोगादहमेतमब्रुवं
भावे स्थिता तथ्यमर्थं यथावत् ॥ २२ ॥
**सरस्वती बोली—**मुने! मैं [विद्यारूपा सरस्वती हूँ और] श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके अग्निहोत्रसे यहाँ तुम्हारे संशयका निवारण करनेके लिये आयी हूँ। (तुम श्रद्धालु हो) तुम्हारा सांनिध्य पाकर ही मैंने यहाँ ये पूर्वोक्त सत्य बातें यथार्थरूपसे बतायी हैं; क्योंकि आन्तरिक श्रद्धाभावमें ही मेरी स्थिति है ॥ २२ ॥

ताक्ष्य उवाच

न हि त्वया सदृशी काचिदस्ति
विभ्राजसे ह्यतिमात्रं यथा श्रीः ।
रूपं च ते दिव्यमनन्तकान्ति

प्रज्ञां च देवीं सुभगे बिभर्षि ॥ २३ ॥ तार्क्ष्यने पूछा— सुभगे! तुम्हारी-जैसी दूसरी कोई नारी नहीं है। तुम साक्षात् लक्ष्मीजीकी भाँति अत्यन्त प्रकाशमान दिखायी देती हो। तुम्हारा यह परम कान्तिमान् स्वरूप अत्यन्त दिव्य है। साथ ही तुम दिव्य प्रज्ञा भी धारण करती हो (इसका क्या कारण है?) ॥ २३ ॥

सरस्वत्युवाच

श्रेष्ठानि यानि द्विपदां वरिष्ठ यज्ञेषु विद्वन्नुपपादयन्ति । तैरेव चाहं सम्प्रवृद्धा भवामि चाप्यायिता रूपवती च विप्र ॥ २४ ॥ सरस्वती बोली— नरश्रेष्ठ! विद्वन्! याज्ञिकलोग यज्ञोंमें जो श्रेष्ठ कार्य करते हैं अथवा श्रेष्ठ वस्तुओंका संकलन करते हैं, उन्हींसे मेरी पुष्टि तथा तृप्ति होती है और विप्रवर! उन्हींसे मैं रूपवती होती हूँ ॥ २४ ॥

यच्चापि द्रव्यमुपयुज्यते ह वानस्पत्यमायसं पार्थिवं वा । दिव्येन रूपेण च प्रज्ञया च तेनैव सिद्धिरिति विद्धि विद्वन् ॥ २५ ॥ विद्वन्! उन यज्ञोंमें जो समिधा-स्रुवा आदि वृक्षसे उत्पन्न होनेवाली वस्तुएँ, सुवर्ण आदि तैजस वस्तुएँ तथा व्रीहि आदि पार्थिव वस्तुएँ उपयोगमें लायी जाती हैं, उन्हींके द्वारा दिव्य रूप तथा प्रज्ञासे सम्पन्न मेरे स्वरूपकी पुष्टि होती है, यह बात तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ २५ ॥

तार्क्ष्य उवाच

इदं श्रेयः परमं मन्यमाना व्यायच्छन्ते मुनयः सम्प्रतीताः । आचक्ष्व मे तं परमं विशोकं मोक्षं परं यं प्रविशन्ति धीराः । सांख्या योगा परमं यं विदन्ति परं पुराणं तमहं न वेद्मि ॥ २६ ॥ तार्क्ष्यने पूछा— देवि! जिसे परम कल्याणस्वरूप मानते हुए मुनिजन अत्यन्त विश्वासपूर्वक इन्द्रियों आदिका निग्रह करते हैं तथा जिस परम मोक्ष-स्वरूपमें धीर पुरुष प्रवेश करते हैं, उस शोकरहित परम मोक्षपदका वर्णन करो; क्योंकि जिस परम मोक्षपदको सांख्ययोगी और कर्मयोगी जानते हैं, उस सनातन मोक्ष-तत्त्वको मैं नहीं जानता ॥ २६ ॥

सरस्वत्युवाच

तं वै परं वेदविदः प्रपन्नाः परं परेभ्यः प्रथितं पुराणम् । स्वाध्यायवन्तो व्रतपुण्ययोगै- स्तपोधना वीतशोका विमुक्ताः ॥ २७ ॥ सरस्वती बोली—स्वाध्यायरूप योगमें लगे हुए तथा तपको ही धन माननेवाले योगी व्रत-पुण्य और योगके साधनोंसे जिस प्रख्यात, परात्पर एवं पुरातन पदको प्राप्तकर शोकरहित तथा मुक्त हो जाते हैं, वही सनातन ब्रह्मपद है। वेदवेत्ता उसी परमपदका आश्रय लेते हैं ॥ २७ ॥

तस्याथ मध्ये वेतसः पुण्यगन्धः सहस्रशाखो विपुलो विभाति । तस्य मूलात् सरितः प्रस्रवन्ति मधूदकप्रस्रवणाः सुपुण्याः ॥ २८ ॥ उस परब्रह्ममें ब्रह्माण्डरूपी एक विशाल बेंतका वृक्ष है, जो भोग-स्थानरूपी अनन्त शाखाओंसे युक्त तथा शब्दादि विषयरूपी पवित्र सुगन्धसे सम्पन्न है। (उस ब्रह्माण्डरूपी वृक्षका मूल अविद्या है।) उस अविद्यारूपी मूलसे भोगवासनामयी निरन्तर बहनेवाली अनन्त नदियाँ उत्पन्न होती हैं। वे नदियाँ ऊपरसे तो रमणीय और पवित्र सुवाससे युक्त प्रतीत होती हैं तथा मधुके समान मधुर एवं जलके समान तृप्तिकारक विषयोंको बहाया करती हैं ॥ २८ ॥

शाखां शाखां महानद्यः संयान्ति सिकताशयाः । धानापूपा मांसशाकाः सदा पायसकर्दमाः ॥ २९ ॥ परंतु वास्तवमें वे सब भूने हुए जौके समान फल देनेमें असमर्थ, पूओंके समान अनेक छिद्रोंवाली, हिंसासे मिल सकनेवाली अर्थात् मांसके समान अपवित्र, सूखे शाकके समान सारशून्य और खीरके समान रुचिकर लगनेवाली होनेपर भी कीचड़के समान चित्तमें मलिनता उत्पन्न करनेवाली हैं। बालूके कणोंके समान परस्पर विलग एवं ब्रह्माण्डरूपी बेंतके वृक्षकी शाखाओंमें बहनेवाली हैं ॥ २९ ॥

यस्मिन्नग्निमुखा देवाः सेन्द्राः सहमरुद्गणाः । ईजिरे क्रतुभिः श्रेष्ठैस्तत् पदं परमं मम ॥ ३० ॥ मुने! इन्द्र, अग्नि और पवन आदि मरुद्गणोंके साथ देवतालोग जिस ब्रह्मको प्राप्त करनेके लिये श्रेष्ठ यज्ञोंद्वारा उसका पूजन करते हैं, वह मेरा परमपद है ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि सरस्वतीताक्ष्यसंवादे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें सरस्वती- तार्क्ष्यसंवादविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८६ ।।


* जैसे मनुष्य अपरिचित पुरुषका दिया हुआ अन्न नहीं खाता, उसी प्रकार अश्रोत्रियका दिया हुआ हविष्य देवता नहीं स्वीकार करते हैं।

वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा

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सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा

वैशम्पायन उवाच

ततः स पाण्डवो विप्रं मार्कण्डेयमुवाच ह ।
कथयस्वेति चरितं मनोर्वैवस्वतस्य च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इसके बाद पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मार्कण्डेयजीसे कहा—'अब आप हमसे वैवस्वत मनुके चरित्र कहिये' ॥ १ ॥

मार्कण्डेय उवाच

विवस्वतः सुतो राजन् महर्षिः सुप्रतापवान् ।
बभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी बोले— नरश्रेष्ठ नरेश! विवस्वान् (सूर्य)-के एक अत्यन्त प्रतापी पुत्र हुआ, जो प्रजापतिके समान कान्तिमान् और महान् ऋषि था ॥ २ ॥

ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः ।
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ॥ ३ ॥
वह बालक मनु ओज, तेज, कान्ति और विशेषतः तपस्याद्वारा अपने पिता भगवान् सूर्य तथा पितामह महर्षि कश्यपसे भी आगे बढ़ गया ॥ ३ ॥

ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां स नराधिप ।
एकपादस्थितस्तीव्रं चकार सुमहत् तपः ॥ ४ ॥
अवाक्शिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् ।
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामयुतं तदा ॥ ५ ॥
महाराज! उसने बदरिकाश्रममें जाकर दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा हो दस हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। उस समय उसका सिर नीचेकी ओर झुका हुआ था और वह एकटक नेत्रोंसे निरन्तर देखता रहता था। इस प्रकार बड़ी दृढ़ताके साथ उस बालकने घोर तप किया ॥ ४-५ ॥

तं कदाचित् तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् ।
चीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
(वही बालक वैवस्वत मनुके नामसे प्रसिद्ध हुआ।) एक दिनकी बात है, मनु भीगे चीर और जटा धारण किये चीरिणी नदीके तटपर तपस्या कर रहे थे। उस समय एक मत्स्य आकर इस प्रकार बोला— ॥ ६ ॥

भगवन् क्षुद्रमत्स्योऽस्मि बलवद्भ्यो भयं मम ।

मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ॥ ७ ॥
‘भगवन्! मैं एक छोटा-सा मत्स्य हूँ। मुझे (अपनी जातिके) बलवान् मत्स्योंसे बराबर भय बना रहता है। अतः उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सहर्षे! आप उनसे मेरी रक्षा करें ॥ ७ ॥
दुर्बलं बलवन्तो हि मत्स्या मत्स्यं विशेषतः ।
आस्वदन्ति सदा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ॥ ८ ॥
‘बलवान् मत्स्य विशेषतः दुर्बल मत्स्यको अपना आहार बना लेते हैं, यह सदासे हमारी मत्स्य-जातिकी नियत—वृत्ति है ॥ ८ ॥
तस्माद् भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः ।
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ॥ ९ ॥
‘इसलिये भयके महान् समुद्रमें मैं डूब रहा हूँ। आप विशेष प्रयत्न करके मुझे बचानेका कष्ट करें। आपके इस उपकारके बदले मैं भी प्रत्युपकार करूँगा' ॥ ९ ॥
स मत्स्यवचनं श्रुत्वा कृपयाभिपरिप्लुतः ।
मनुर्वैवस्वतोऽगृह्णात् तं मत्स्यं पाणिना स्वयम् ॥ १० ॥
उदकान्तमुपानीय मत्स्यं वैवस्वतो मनुः ।
अलिञ्जरे प्राक्षिपत् तं चन्द्रांशुसदृशप्रभम् ॥ ११ ॥
मत्स्यकी यह बात सुनकर वैवस्वत मनुको बड़ी दया आयी। उन्होंने स्वयं अपने हाथसे चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत रंगवाले उस मत्स्यको उठा लिया और पानीके बाहर लाकर मटकेमें डाल दिया ॥

स तत्र ववृधे राजन् मत्स्यः परमसत्कृतः ।
पुत्रवत् स्वीकरोत् तस्मै मनुर्भावं विशेषतः ॥ १२ ॥
अथ कालेन महता स मत्स्यः सुमहानभूत् ।
अलिञ्जरे यथा चैव नासौ समभवत् किल ॥ १३ ॥
राजन्! वहाँ उन्होंने बड़े आदरके साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-दिन बढ़ने लगा। मनुने उसके प्रति पुत्रके समान विशेष वात्सल्य भाव प्रकट किया। तदनन्तर दीर्घकाल बीतनेपर वह मत्स्य इतना बड़ा हो गया कि मटकेमें उसका रहना असम्भव हो गया ॥ १२-१३ ॥
अथ मत्स्यो मनुं दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ।
भगवन् साधु मेऽद्यान्यत् स्थानं सम्प्रतिपादय ॥ १४ ॥
तब एक दिन मत्स्यने मनुको देखकर फिर कहा—‘भगवन्! अब आप मेरे लिये इससे अच्छा कोई दूसरा स्थान दीजिये’ ॥ १४ ॥
उद्धृत्यालिञ्जरात् तस्मात् ततः स भगवान् मनुः ।
तं मत्स्यमनयद् वापीं महतीं स मनुस्तदा ॥ १५ ॥
तब वे भगवान् मनु उस मत्स्यको उस मटकेसे निकालकर एक बहुत बड़ी बावलीके पास ले गये ॥ १५ ॥

तत्र तं प्राक्षिपच्चापि मनुः परपुरंजय । अथावर्धत मत्स्यः स पुनर्वर्षगणान् बहून् ॥ १६ ॥ शत्रुविजयी युधिष्ठिर! मनुने उसे वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षोंतक उसीमें क्रमशः बढ़ता रहा ॥ १६ ॥ द्वियोजनायता वापी विस्तृता चापि योजनम् । तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन ॥ १७ ॥ कमलनयन! उस बावलीकी लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजनकी थी; परंतु उसमें भी उस मत्स्यका रहना कठिन हो गया ॥ १७ ॥ विचेष्टितुं च कौन्तेय मत्स्यो वाप्यां विशाम्पते । मनुं मत्स्यस्ततो दृष्ट्वा पुनरेवाभ्यभाषत ॥ १८ ॥ नराधिप कुन्तीनन्दन! वह उस बावलीमें हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनुको देखकर वह पुनः बोला— ॥ १८ ॥ नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् । गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥ १९ ॥ निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता । वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥ २० ॥ ‘भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गङ्गाजीमें ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ’ ॥ १९-२० ॥ एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनयद् भगवान् वशी । नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वयं प्राक्षिपदच्युतः ॥ २१ ॥ मत्स्यके ऐसा कहनेपर जितेन्द्रिय, अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् मनुने उसे स्वयं ले जाकर गङ्गामें डाल दिया ॥ २१ ॥ स तत्र ववृधे मत्स्यः किंचित्कालमरिंदम । ततः पुनर्मनुं दृष्ट्वा मत्स्यो वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ गङ्गायां हि न शक्नोमि बृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो । समुद्रं नय मामाशु प्रसीद भगवन्निति ॥ २३ ॥ उद्धृत्य गङ्गासलिलात् ततो मत्स्यं मनुः स्वयम् । समुद्रमनयत् पार्थ तत्र चैनमवासृजत् ॥ २४ ॥ शत्रुदमन! फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ कालतक बढ़ता रहा। फिर एक दिन मनुको देखकर उसने कहा—‘प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गङ्गाजीमें हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्रमें ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर

इतनी कृपा अवश्य कीजिये।' कुन्तीनन्दन! तब मनुने स्वयं उस मत्स्यको गंगाजीके जलसे निकालकर समुद्रतक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया ॥ २२—२४ ॥

सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा । आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥ २५ ॥ राजन्! यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया, जिससे आसानीसे ले जाया जा सके। उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनुके लिये बड़े सुखकर थे ॥ २५ ॥

यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा । तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ २६ ॥ जब मनुने उस मत्स्यको समुद्रमें डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए-से कहा— ॥ २६ ॥

भगवन् हि कृता रक्षा त्वया सर्वा विशेषतः । प्राप्तकालं तु यत् कार्यं त्वया तच्छ्रूयतां मम ॥ २७ ॥ 'भगवन्! आपने विशेष मनोयोगके साथ सब प्रकारसे मेरी रक्षा की है, अब आपके लिये जिस कार्यका अवसर प्राप्त हुआ है, वह बताता हूँ, सुनिये— ॥ २७ ॥

अचिराद् भगवन् भौममिदं स्थावरजङ्गमम् । सर्वमेव महाभाग प्रलयं वै गमिष्यति ॥ २८ ॥ 'भगवन्! यह सारा-का-सारा चराचर पार्थिव जगत् शीघ्र ही नष्ट होनेवाला है। महाभाग! सम्पूर्ण जगत्‌का प्रलय हो जायगा ॥ २८ ॥

सम्प्रक्षालनकालोऽयं लोकानां समुपस्थितः । तस्मात् त्वां बोधयाम्यद्य यत् ते हितमनुत्तमम् ॥ २९ ॥ 'यह सब लोकोंके सम्प्रक्षालन (एकार्णवके जलसे धुलकर नष्ट होने)-का समय आ गया है। इसलिये मैं आपको सचेत करता हूँ और आपके लिये जो परम उत्तम हितकी बात है, उसे बताता हूँ ॥ २९ ॥

त्रसानां स्थावराणां च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति । तस्य सर्वस्य सम्प्राप्तः कालः परमदारुणः ॥ ३० ॥ 'सम्पूर्ण जंगमों तथा स्थावर पदार्थोंमें जो हिल-डुल सकते हैं और जो हिलने-डुलनेवाले नहीं हैं, उन सबके लिये अत्यन्त भयंकर समय आ पहुँचा है ॥ ३० ॥

नौश्च कारयितव्या ते दृढा युक्तवटारका । तत्र सप्तर्षिभिः सार्धमारुहेथा महामुने ॥ ३१ ॥ 'आपको एक मजबूत नाव बनवानी चाहिये, जिसमें (मजबूत) रस्सी जुटी हो। महामुने! फिर आप सप्तर्षियोंके साथ उस नावपर बैठ जाइये ॥ ३१ ॥

बीजानि चैव सर्वाणि यथोक्तानि द्विजैः पुरा ।

तस्यामारोहयेर्नावि सुसंगुप्तानि भागशः ॥ ३२ ॥ ‘पूर्वकालमें ब्राह्मणोंने जो सब प्रकारके बीज बताये हैं, उनका पृथक्-पृथक् संग्रह करके उन्हें सुरक्षितरूपसे उस नावपर रख लें’ ॥ ३२ ॥ नौस्थश्च मां प्रतीक्षेथास्ततो मुनिजनप्रिय । आगमिष्याम्यहं शृङ्गी विज्ञेयस्तेन तापस ॥ ३३ ॥ एवमेतत् त्वया कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् । ता न शक्या महत्यो वै आपस्तर्तुं मया विना ॥ ३४ ॥ ‘मुनिजनोंके प्रेमी तपस्वी नरेश! उस नावमें बैठे रहकर आप मेरी प्रतीक्षा कीजियेगा। मैं आपके पास अपने मस्तकमें सींग धारण किये आऊँगा। उसीसे आप मुझे पहचान लेंगे। इस प्रकार यह सब कार्य आपको करना है। अब मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ और यहाँसे जाता हूँ। उस महान् जलराशिको आपलोग मेरी सहायताके बिना पार नहीं कर सकेंगे’ ॥ ३३-३४ ॥ नाभिशङ्क्यमिदं चापि वचनं मे त्वया विभो । एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत ॥ ३५ ॥ ‘प्रभो! आप मेरी इस बातमें तनिक भी संदेह न करें।’ तब राजाने उस मत्स्यसे कहा—‘बहुत अच्छा! मैं ऐसा ही करूँगा’ ॥ ३५ ॥ जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् । ततो मनुर्महाराज यथोक्तं मत्स्यकेन ह ॥ ३६ ॥ बीजान्यादाय सर्वाणि सागरं पुप्लुवे तदा । नौकया शुभया वीर महोर्मिणमरिंदम ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन! वे दोनों एक-दूसरेसे विदा लेकर इच्छानुसार वहाँसे चले गये। महाराज! तदनन्तर मनु मत्स्यभगवान्‌के कथनानुसार सम्पूर्ण बीज लेकर एक सुन्दर नौकाद्वारा उत्ताल तरंगोंसे भरे हुए महासागरमें तैरने लगे ॥ ३६-३७ ॥ चिन्तयामास च मनुस्तं मत्स्यं पृथिवीपते । स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा मत्स्यः परपुरंजय ॥ ३८ ॥ शृङ्गी तत्राजगामाशु तदा भरतसत्तम । तं दृष्ट्वा मनुजव्याघ्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे ॥ ३९ ॥ शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् । वटारकमयं पाशमथ मत्स्यस्य मूर्धनि ॥ ४० ॥ शत्रुनगरविजयी नरेश्वर! तदनन्तर मनुने भगवान् मत्स्यका चिन्तन किया। यह जानकर शृंगधारी भगवान् मत्स्य वहाँ शीघ्र आ पहुँचे। नरश्रेष्ठ भरतकुलशिरोमणे! समुद्रमें अपने पूर्वकथित रूपसे ऊँचे पर्वतकी भाँति शृंगधारी मत्स्य भगवान्‌को आया देख उनके मस्तकवर्ती सींगमें उन्होंने बँटी हुई रस्सी बाँध दी ॥ ३८—४० ॥

मनुर्मनुजशार्दूल तस्मिन् शृङ्गे न्यवेशयत् ।
संयतस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरंजय ।। ४१ ।।
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ।
स च तांस्तारयन् नावा समुद्रं मनुजेश्वर ।। ४२ ।।
नृत्यमानमिवोर्मीभिर्गर्जमानमिवाम्भसा ।
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन् महोदधौ ।। ४३ ।।
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरंजय ।
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे ।। ४४ ।।

शत्रुकी राजधानीपर विजय पानेवाले पुरुषसिंह! मनुने वह नाव उस सींगमें अटका दी। रस्सीसे बँधे हुए मत्स्यभगवान् उन सबको नौकाद्वारा पार उतारनेके लिये उस खारे पानीके समुद्रमें बड़े वेगसे नाव खींचने लगे। मनुजेश्वर! उस समय समुद्र अपनी लहरोंसे नृत्य करता-सा जान पड़ता था। पानीके हिलोरोंसे भयंकर गर्जना-सी कर रहा था। शत्रुविजयी नरेश्वर! उस महासागरमें प्रचण्ड वायुके झोंकोंसे विक्षुब्ध होकर हिलती-डुलती हुई वह नौका चंचल-चित्तवाली मतवाली स्त्रीके समान झूम रही थी। उस समय न तो भूमिका पता लगता था और न दिशाओं तथा विदिशाओंका ही भान होता था ।।

सर्वमाम्भसमेवासीत् खं द्यौश्च नरपुङ्गव ।
एवंभूते तदा लोके संकुले भरतर्षभ ।। ४५ ।।

अदृश्यन्तर्षयः सप्त मनुर्मत्स्यस्तथैव च । एवं बहून् वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः ॥ ४६ ॥ चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन् सलिलसंचये । ततो हिमवतः शृङ्गं यत् परं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥ तत्राकर्षत् ततो नावं स मत्स्यः कुरुनन्दन । अथाब्रवीत् तदा मत्स्यस्तानृषीन् प्रहसन् शनैः ॥ ४८ ॥ अस्मिन् हिमवतः शृङ्गे नावं बध्नीत मा चिरम् । सा बद्धा तत्र तैस्तूर्णमृषिभिर्भरतर्षभ ॥ ४९ ॥ नौर्मत्स्यस्य वचः श्रुत्वा शृङ्गे हिमवतस्तदा । तच्च नौबन्धनं नाम शृङ्गं हिमवतः परम् ॥ ५० ॥ भरतकुलभूषण नरेश्वर! आकाश और द्युलोक सब कुछ जलमय ही प्रतीत होता था। इस प्रकार जब सारा विश्व एकार्णवके जलमें डूबा हुआ था, उस समय केवल सप्तर्षि, मनु और मत्स्य भगवान्—ये ही नौ व्यक्ति दृष्टिगोचर होते थे। राजन्! इस तरह बहुत वर्षोंतक भगवान् मत्स्य आलस्यरहित होकर उस अगाध जलराशिमें उस नौकाको खींचते रहे। भरतकुलतिलक! तदनन्तर हिमालयका जो सर्वोच्च शिखर था, वहाँ मत्स्यभगवान् उस नावको खींचकर ले गये। कुरुनन्दन! तब वे धीरे-धीरे हँसते हुए उन समस्त ऋषियोंसे बोले—'आपलोग हिमालयके इस शिखरमें इस नावको शीघ्र बाँध दें।' भरतश्रेष्ठ! मत्स्यका वह वचन सुनकर उन महर्षियोंने तुरंत वहाँ हिमालयके शिखरमें वह नौका बाँध दी। तभीसे हिमालयका वह उत्तम शिखर 'नौका-बन्धन' के नामसे विख्यात हुआ ॥ ४६—५० ॥ ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद् विद्धि भरतर्षभ । अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन् सहितस्तदा ॥ ५१ ॥ भरतश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि वह शिखर आज भी उसी नामसे प्रसिद्ध है। तदनन्तर एकटक दृष्टिवाले भगवान् मत्स्य एक साथ उन सब ऋषियोंसे बोले— ॥ ५१ ॥ अहं प्रजापतिर्ब्रह्मा मत्परं नाधिगम्यते । मत्स्यरूपेण यूयं च मयास्मान्मोक्षिता भयात् ॥ ५२ ॥ मनुना च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानुषाः । स्रष्टव्याः सर्वलोकाश्च यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति ॥ ५३ ॥ 'मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मुझसे भिन्न दूसरी कोई वस्तु नहीं उपलब्ध होती। मैंने ही मत्स्यरूप धारण करके इस महान् भयसे तुमलोगोंकी रक्षा की है। अब मनुको चाहिये कि ये देवता, असुर और मनुष्य आदि समस्त प्रजाकी, सब लोकोंकी और सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि करें ॥ तपसा चापि तीव्रेण प्रतिभास्य भविष्यति ।

मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ॥ ५४ ॥
‘इन्हें तीव्र तपस्याके द्वारा जगत्‌की सृष्टि करनेकी प्रतिभा प्राप्त हो जायगी। मेरी कृपासे प्रजाकी सृष्टि करते समय इन्हें मोह नहीं होगा ॥ ५४ ॥
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः ।
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥ ५५ ॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः ।
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ५६ ॥
ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य क्षणभरमें अदृश्य हो गये। तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनुको प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, किंतु प्रजाकी सृष्टि करनेमें उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी थी। तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर उन्होंने सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया ॥ ५५-५६ ॥
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद् यथावद् भरतर्षभ ।
इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥
भरतकुलभूषण! फिर वे पूर्वकल्पके अनुसार सारी प्रजाकी यथावत् सृष्टि करने लगे। इस प्रकार यह संक्षेपसे मत्स्य पुराणका वृत्तान्त बताया गया है ॥ ५७ ॥
आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ।
य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः ।
स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥ ५८ ॥
मेरे द्वारा वर्णित यह उपाख्यान सब पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रारम्भसे ही मनुके इस चरित्रको सुनता है, वह सुखी हो सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता और सब लोकोंमें जा सकता है ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि मत्स्योपाख्याने
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें मत्स्योपाख्यानविषयक
एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥