महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उस राक्षसका रूप-रंग मेघके समान काला था। उसके मारे जानेपर राजकुमार पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए और भीमसेनके अनेक गुणोंकी प्रशंसा करते हुए द्रौपदीको आगे करके वहाँसे द्वैतवनकी ओर चल दिये ॥ ६८ ॥
विदुर उवाच
एवं विनिहतः संख्ये किर्मीरो मनुजाधिप ।
भीमेन वचनात् तस्य धर्मराजस्य कौरव ॥ ६९ ॥
**विदुरजी कहते हैं—**नरेश्वर! इस प्रकार धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भीमसेनने किर्मीरको युद्धमें मार गिराया ॥ ६९ ॥
ततो निष्कण्टकं कृत्वा वनं तदपराजितः ।
द्रौपद्या सह धर्मज्ञो वसतिं तामुवास ह ॥ ७० ॥
तदनन्तर विजयी एवं धर्मज्ञ पाण्डुकुमार उस वनको निष्कण्टक (राक्षसरहित) बनाकर द्रौपदीके साथ वहाँ रहने लगे ॥ ७० ॥
समाश्वास्य च ते सर्वे द्रौपदीं भरतर्षभाः ।
प्रहृष्टमनसः प्रीत्या प्रशशंसुर्वृकोदरम् ॥ ७१ ॥
भरतकुलके भूषणरूप उन सभी वीरोंने द्रौपदीको आश्वासन देकर प्रसन्नचित्त हो प्रेमपूर्वक भीमसेनकी सराहना की ॥ ७१ ॥
भीमबाहुबलोत्पिष्टे विनष्टे राक्षसे ततः ।
विविशुस्ते वनं वीराः क्षेमं निहतकण्टकम् ॥ ७२ ॥
भीमसेनके बाहुबलसे पिसकर जब वह राक्षस नष्ट हो गया, तब उस अकण्टक एवं कल्याणमय वनमें उन सभी वीरोंने प्रवेश किया ॥ ७२ ॥
स मया गच्छता मार्गे विनिकीर्णो भयावहः ।
वने महति दुष्टात्मा दृष्टो भीमबलाद्धतः ॥ ७३ ॥
मैंने महान् वनमें जाते और आते समय रास्तेमें मरकर गिरे हुए उस भयानक एवं दुष्टात्मा राक्षसके शवको अपनी आँखों देखा था, जो भीमसेनके बलसे मारा गया था ॥ ७३ ॥
तत्राश्रौषमहं चैतत् कर्म भीमस्य भारत ।
ब्राह्मणानां कथयतां ये तत्रासन् समागताः ॥ ७४ ॥
भारत! मैंने वनमें उन ब्राह्मणोंके मुखसे, जो वहाँ आये हुए थे, भीमसेनके इस महान् कर्मका वर्णन सुना ॥ ७४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं विनिहतं संख्ये किर्मीरं रक्षसां वरम् ।
श्रुत्वा ध्यानपरो राजा निशश्वासार्तवत् तदा ॥ ७५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार राक्षसप्रवर किर्मीरका युद्धमें मारा जाना सुनकर राजा धृतराष्ट्र किसी भारी चिन्तामें डूब गये और शोकातुर मनुष्यकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे ।। ७५ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि किर्मीरवधपर्वणि विदुरवाक्ये एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत किर्मीरवधपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।।
* दोनों भुजाओंको दोनों ओर फैलानेपर एक हाथकी अँगुलियोंके सिरेसे दूसरे हाथकी अँगुलियोंके सिरेतक जितनी दूरी होती है, उसे 'व्याम' कहते हैं। यही पुरुषप्रमाण है। इसकी लम्बाई लगभग ३ १/२ हाथकी होती है।
(अर्जुनाभिगमनपर्व)
(अर्जुनाभिगमनपर्व)
द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन और द्रौपदीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति, द्रौपदीका भगवान् श्रीकृष्णसे अपने प्रति किये गये अपमान और दुःखका वर्णन और भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं धृष्टद्युम्नका उसे आश्वासन देना
वैशम्पायन उवाच
भोजाः प्रव्रजिताञ्छ्रुत्वा वृष्णयश्चान्धकैः सह ।
पाण्डवान् दुःखसंतप्तान् समाजग्मुर्महावने ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंने सुना कि पाण्डव अत्यन्त दुःखसे संतप्त हो राजधानीसे निकलकर चले गये, तब वे उनसे मिलनेके लिये महान् वनमें गये ॥ १ ॥
पाञ्चालस्य च दायादो धृष्टकेतुश्च चेदिपः ।
केकयाश्च महावीर्या भ्रातरो लोकविश्रुताः ॥ २ ॥
वने द्रष्टुं ययुः पार्थान् क्रोधामर्षसमन्विताः ।
गर्हयन्तो धार्तराष्ट्रान् किं कुर्म इति चाब्रुवन् ॥ ३ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, चेदिराज धृष्टकेतु तथा महापराक्रमी लोकविख्यात केकयराजकुमार सभी भाई क्रोध और अमर्षमें भरकर धृतराष्ट्रपुत्रोंकी निन्दा करते हुए कुन्तीकुमारोंसे मिलनेके लिये वनमें गये और आपसमें इस प्रकार कहने लगे, 'हमें क्या करना चाहिये' ॥ २-३ ॥
वासुदेवं पुरस्कृत्य सर्वे ते क्षत्रियर्षभाः ।
परिवार्योपविविशुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
अभिवाद्य कुरुश्रेष्ठं विषण्णः केशवोऽब्रवीत् ॥ ४ ॥
भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके वे सभी क्षत्रियशिरोमणि धर्मराज युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर बैठे। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण विषादग्रस्त हो कुरुप्रवर युधिष्ठिरको नमस्कार करके इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥
वासुदेव उवाच
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः ।
दुःशासनचतुर्थानां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ५ ॥
श्रीकृष्णने कहा— राजाओ! जान पड़ता है, यह पृथ्वी दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि और चौथे दुःशासन—इन सबके रक्तका पान करेगी ॥ ५ ॥
एतान् निहत्य समरे ये च तस्य पदानुगाः ।
तांश्च सर्वान् विनिर्जित्य सहितान् सनराधिपान् ॥ ६ ॥
ततः सर्वेऽभिषिञ्चामो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
निकृत्योपचरन् वध्य एष धर्मः सनातनः ॥ ७ ॥
युद्धमें इनको और इनके सब सेवकोंको अन्य राजाओंसहित परास्त करके हम सब लोग धर्मराज युधिष्ठिरको पुनः चक्रवर्ती नरेशके पदपर अभिषिक्त करें। जो दूसरेके साथ छल-कपट अथवा धोखा करके सुख भोग रहा हो उसे मार डालना चाहिये, यह सनातन धर्म है ॥ ६-७ ॥
वैशम्पायन उवाच
पार्थानामभिषङ्गेण तथा क्रुद्धं जनार्दनम् ।
अर्जुनः शमयामास दिधक्षन्तमिव प्रजाः ॥ ८ ॥
संक्रुद्धं केशवं दृष्ट्वा पूर्वदेहेषु फाल्गुनः ।
कीर्तयामास कर्माणि सत्यकीर्तेर्महात्मनः ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीपुत्रोंके अपमानसे भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे कुपित हो उठे, मानो वे समस्त प्रजाको जलाकर भस्म कर देंगे। उन्हें इस प्रकार क्रोध करते देख अर्जुनने उन्हें शान्त किया और उन सत्यकीर्ति महात्माद्वारा पूर्व शरीरोंमें किये हुए कर्मोंका कीर्तन आरम्भ किया ॥ ८-९ ॥
पुरुषस्याप्रमेयस्य सत्यस्यामिततेजसः ।
प्रजापतिपतेर्विष्णोर्लोकनाथस्य धीमतः ॥ १० ॥
भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्यामी, अप्रमेय, सत्यस्वरूप, अमिततेजस्वी, प्रजापतियोंके भी पति, सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक तथा परम बुद्धिमान् श्रीविष्णु ही हैं (अर्जुनने उनकी इस प्रकार स्तुति की) ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच
दश वर्षसहस्राणि यत्रसायंगृहो मुनिः ।
व्यचरस्त्वं पुरा कृष्ण पर्वते गन्धमादने ॥ ११ ॥
अर्जुन बोले— श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें गन्धमादन पर्वतपर आपने यत्रसायंगृह* मुनिके रूपमें दस हजार वर्षोंतक विचरण किया है; अर्थात् नारायण ऋषिके रूपमें निवास किया है ॥ ११ ॥
दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । पुष्करेष्ववसः कृष्ण त्वमपो भक्षयन् पुरा ॥ १२ ॥ सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! पूर्वकालमें कभी इस धराधाममें अवतीर्ण हो आपने ग्यारह हजार वर्षों-तक केवल जल पीकर रहते हुए पुष्करतीर्थमें निवास किया है ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वबाहुर्विशालायां बदर्यां मधुसूदन । अतिष्ठ एकपादेन वायुभक्षः शतं समाः ॥ १३ ॥ मधुसूदन! आप विशालापुरीके बदरिकाश्रममें दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये केवल वायुका आहार करते हुए सौ वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे हैं ॥ १३ ॥
अवकृष्टोत्तरासङ्गः कृशो धमनिसंततः । आसीः कृष्ण सरस्वत्यां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ १४ ॥ कृष्ण! आप सरस्वती नदीके तटपर उत्तरीय वस्त्रतकका त्याग करके द्वादशवार्षिक यज्ञ करते समयतक शरीरसे अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। आपके सारे शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं ॥ १४ ॥
प्रभासमप्यथासाद्य तीर्थं पुण्यजनोचितम् । तथा कृष्ण महातेजा दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ १५ ॥ अतिष्ठस्त्वमथैकेन पादेन नियमस्थितः । लोकप्रवृत्तिहेतुस्त्वमिति व्यासो ममाब्रवीत् ॥ १६ ॥ गोविन्द! आप पुण्यात्मा पुरुषोंके निवासयोग्य प्रभासतीर्थमें जाकर लोगोंको तपमें प्रवृत्त करनेके लिये शौच-संतोषादि नियमोंमें स्थित हो महातेजस्वी स्वरूपसे एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक एक ही पैरसे खड़े रहे। ये सब बातें मुझसे श्रीव्यासजीने बतायी हैं ॥ १५-१६ ॥
क्षेत्रज्ञः सर्वभूतानामादिरन्तश्च केशव । निधानं तपसां कृष्ण यज्ञस्त्वं च सनातनः ॥ १७ ॥ केशव! आप क्षेत्रज्ञ (सबके आत्मा), सम्पूर्ण भूतोंके आदि और अन्त, तपस्याके अधिष्ठान, यज्ञ और सनातन पुरुष हैं ॥ १७ ॥
निहत्य नरकं भौममाहृत्य मणिकुण्डले । प्रथमोत्पतितं कृष्ण मेध्यमश्वमवासृजः ॥ १८ ॥ आप भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर अदितिके दोनों मणिमय कुण्डलोंको ले आये थे; एवं आपने ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न होनेवाले यज्ञके उपयुक्त घोड़ेकी रचना की थी ॥ १८ ॥
कृत्वा तत् कर्म लोकानामृषभः सर्वलोकजित् । अवधीस्त्वं रणे सर्वान् समेतान् दैत्यदानवान् ॥ १९ ॥
सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पानेवाले आप लोकेश्वर प्रभुने वह कर्म करके सामना करनेके लिये आये हुए समस्त दैत्यों और दानवोंका युद्धस्थलमें वध किया ॥ १९ ॥ ततः सर्वेश्वरत्वं च सम्प्रदाय शचीपतेः । मानुषेषु महाबाहो प्रादुर्भूतोऽसि केशव ॥ २० ॥ महाबाहु केशव! तदनन्तर शचीपतिको सर्वेश्वर-पद प्रदान करके आप इस समय मनुष्योंमें प्रकट हुए हैं ॥ २० ॥ स त्वं नारायणो भूत्वा हरिरासीः परंतप । ब्रह्मा सोमश्च सूर्यश्च धर्मो धाता यमोऽनलः ॥ २१ ॥ वायुर्वैश्रवणो रुद्रः कालः खं पृथिवी दिशः । अजश्चराचरगुरुः स्रष्टा त्वं पुरुषोत्तम ॥ २२ ॥ परंतप! पुरुषोत्तम! आप ही पहले नारायण होकर फिर हरिरूपमें प्रकट हुए। ब्रह्मा, सोम, सूर्य, धर्म, धाता, यम, अनल, वायु, कुबेर, रुद्र, काल, आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ, चराचरगुरु तथा सृष्टिकर्ता एवं अजन्मा आप ही हैं ॥ २१-२२ ॥ परायणं देवमूर्धा क्रतुभिर्मधुसूदन । अयजो भूरितेजा वै कृष्ण चैत्ररथे वने ॥ २३ ॥ मधुसूदन श्रीकृष्ण! आपने चैत्ररथवनमें अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। आप सबके उत्तम आश्रय, देवशिरोमणि और महातेजस्वी हैं ॥ २३ ॥ शतं शतसहस्राणि सुवर्णस्य जनार्दन । एकैकस्मिंस्तदा यज्ञे परिपूर्णानि भागशः ॥ २४ ॥ जनार्दन! उस समय आपने प्रत्येक यज्ञमें पृथक्-पृथक् एक-एक करोड़ स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें दीं ॥ २४ ॥ अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन । त्वं विष्णुरिति विख्यात इन्द्रादवरजो विभुः ॥ २५ ॥ यदुनन्दन! आप अदितिके पुत्र हो, इन्द्रके छोटे भाई होकर सर्वव्यापी विष्णुके नामसे विख्यात हैं ॥ २५ ॥ शिशुर्भूत्वा दिवं खं च पृथिवीं च परंतप । त्रिभिर्विक्रमणैः कृष्ण क्रान्तवानसि तेजसा ॥ २६ ॥ परंतप श्रीकृष्ण! आपने वामनावतारके समय छोटे-से बालक होकर भी अपने तेजसे तीन डगोंद्वारा द्युलोक, अन्तरिक्ष और भूलोक—तीनोंको नाप लिया ॥ २६ ॥ सम्प्राप्य दिवमाकाशमादित्यस्यन्दने स्थितः । अत्यरोचश्च भूतात्मन् भास्करं स्वेन तेजसा ॥ २७ ॥ भूतात्मन्! आपने सूर्यके रथपर स्थित हो द्युलोक और आकाशमें व्याप्त होकर अपने तेजसे भगवान् भास्करको भी अत्यन्त प्रकाशित किया है ॥ २७ ॥
प्रादुर्भावसहस्रेषु तेषु तेषु त्वया विभो । अधर्मरुचयः कृष्ण निहताः शतशोऽसुराः ॥ २८ ॥ विभो! आपने सहस्रों अवतार धारण किये हैं और उन अवतारोंमें सैकड़ों असुरोंका, जो अधर्ममें रुचि रखनेवाले थे, वध किया है ॥ २८ ॥ सादिता मौरवाः पाशा निसुन्दनरकौ हतौ । कृतः क्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥ २९ ॥ आपने मुर दैत्यके लोहमय पाश काट दिये, निसुन्द और नरकासुरको मार डाला और पुनः प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सकुशल यात्रा करनेयोग्य बना दिया ॥ २९ ॥ जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालो जनैः सह । जरासंधश्च शैब्यश्च शतधन्वा च निर्जितः ॥ ३० ॥ भगवन्! आपने जारूथी नगरीमें आहुति, क्राथ, साथियोंसहित शिशुपाल, जरासंध, शैब्य और शतधन्वाको परास्त किया ॥ ३० ॥ तथा पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । अवाप्सीर्महिषीं भोज्यां रणे निर्जित्य रुक्मिणम् ॥ ३१ ॥ इसी प्रकार मेघके समान घर्घर शब्द करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा कुण्डिनपुरमें जाकर आपने रुक्मीको युद्धमें जीता और भोजवंशकी कन्या रुक्मिणीको अपनी पटरानीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ३१ ॥ इन्द्रद्युम्नो हतः कोपाद् यवनश्च कसेरुमान् । हतः सौभपतिः शाल्वस्त्वया सौभं च पातितम् ॥ ३२ ॥ प्रभो! आपने क्रोधसे इन्द्रद्युम्नको मारा और यवनजातीय कसेरुमान् एवं सौभपति शाल्वको भी यमलोक पहुँचा दिया। साथ ही शाल्वके सौभ विमानको भी छिन्न-भिन्न करके धरतीपर गिरा दिया ॥ ३२ ॥ एवमेते युधि हता भूयश्चान्याञ्छृणुष्व ह । इरावत्यां हतो भोजः कार्तवीर्यसमो युधि ॥ ३३ ॥ इस प्रकार इन पूर्वोक्त राजाओंको आपने युद्धमें मारा है। अब आपके द्वारा मारे हुए औरोंके भी नाम सुनिये। इरावतीके तटपर आपने कार्तवीर्य अर्जुनके सदृश पराक्रमी भोजको युद्धमें मार गिराया ॥ ३३ ॥ गोपतिस्तालकेतुश्च त्वया विनिहितावभौ । तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन ॥ ३४ ॥ द्वारकामात्मसात् कृत्वा समुद्रं गमयिष्यसि । गोपति और तालकेतु—ये दोनों भी आपके ही हाथसे मारे गये। जनार्दन! भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न तथा ऋषि-मुनियोंकी प्रिय अपने अधीन की हुई पुण्यमयी द्वारका नगरीको आप अन्तमें समुद्रमें विलीन कर देंगे ॥ ३४ ½ ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं नानृतं मधुसूदन । त्वयि तिष्ठति दाशार्ह न नृशंस्यं कुतोऽनृजु ॥ ३५ ॥ आसीनं चैत्यमध्ये त्वां दीप्यमानं स्वतेजसा । आगम्य ऋषयः सर्वेऽयाचन्ताभयमच्युत ॥ ३६ ॥ मधुसूदन! वास्तवमें आपमें न तो क्रोध है, न मात्सर्य है, न असत्य है, न निर्दयता ही है। दाशार्ह! फिर आपमें कठोरता तो हो ही कैसे सकती है? अच्युत! महलके मध्यभागमें बैठे और अपने तेजसे उद्भासित हुए आपके पास आकर सम्पूर्ण ऋषियोंने अभयकी याचना की ॥ ३५-३६ ॥
युगान्ते सर्वभूतानि संक्षिप्य मधुसूदन । आत्मनैवात्मसात् कृत्वा जगदासीः परंतप ॥ ३७ ॥ परंतप मधुसूदन! प्रलयकालमें समस्त भूतोंका संहार करके इस जगत्को स्वयं ही अपने भीतर रखकर आप अकेले ही रहते हैं ॥ ३७ ॥
युगादौ तव वार्ष्णेय नाभिपद्मादजायत । ब्रह्मा चराचरगुरुर्यस्येदं सकलं जगत् ॥ ३८ ॥ वार्ष्णेय! सृष्टिके प्रारम्भकालमें आपके नाभि-कमलसे चराचरगुरु ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिनका रचा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् है ॥ ३८ ॥
तं हन्तुमुद्यतौ घोरौ दानवौ मधुकैटभौ । तयोर्व्यतिक्रमं दृष्ट्वा क्रुद्धस्य भवतो हरेः ॥ ३९ ॥ ललाटाज्जातवाञ्छम्भुः शूलपाणिस्त्रिलोचनः । इत्थं तावपि देवेशौ त्वच्छरीरसमुद्भवौ ॥ ४० ॥ जब ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, उस समय दो भयंकर दानव मधु और कैटभ उनके प्राण लेनेको उद्यत हो गये। उनका यह अत्याचार देखकर क्रोधमें भरे हुए आप श्रीहरिके ललाटसे भगवान् शंकरका प्रादुर्भाव हुआ, जिनके हाथोंमें त्रिशूल शोभा पा रहा था। उनके तीन नेत्र थे। इस प्रकार वे दोनों देव ब्रह्मा और शिव आपके ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं ॥ ३९-४० ॥
त्वन्नियोगकरावेताविति मे नारदोऽब्रवीत् । तथा नारायण पुरा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ ४१ ॥ इष्टवांस्त्वं महासत्रं कृष्ण चैत्ररथे वने । नैवं परे नापरे वा करिष्यन्ति कृतानि वा ॥ ४२ ॥ यानि कर्माणि देव त्वं बाल एव महाबलः । कृतवान् पुण्डरीकाक्ष बलदेवसहायवान् । कैलासभवने चापि ब्राह्मणैरन्वसः सह ॥ ४३ ॥ वे दोनों आपकी ही आज्ञाका पालन करनेवाले हैं, यह बात मुझे नारदजीने बतलायी थी। नारायण श्रीकृष्ण! इसी प्रकार पूर्वकालमें चैत्ररथवनके भीतर आपने प्रचुर
दक्षिणाओंसे सम्पन्न अनेक यज्ञों तथा महासत्रका अनुष्ठान किया था। भगवान् पुण्डरीकाक्ष! आप महान् बलवान् हैं। बलदेवजी आपके नित्य सहायक हैं। आपने बचपनमें ही जो-जो महान् कर्म किये हैं, उन्हें पूर्ववर्ती अथवा परवर्ती पुरुषोंने न तो किया है और न करेंगे। आप ब्राह्मणोंके साथ कुछ कालतक कैलास पर्वतपर भी रहे हैं ॥ ४१—४३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डवः ।
तूष्णीमासीत् ततः पार्थमित्युवाच जनार्दनः ॥ ४४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! श्रीकृष्णके आत्मस्वरूप पाण्डुनन्दन अर्जुन उन महात्मासे ऐसा कहकर चुप हो गये। तब भगवान् जनार्दनने कुन्तीकुमारसे इस प्रकार कहा — ॥ ४४ ॥
ममैव त्वं तवैवाहं ये मदीयास्तवैव ते ।
यस्त्वां द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्त्वामनु स मामनु ॥ ४५ ॥
‘पार्थ! तुम मेरे ही हो, मैं तुम्हारा ही हूँ। जो मेरे हैं, वे तुम्हारे ही हैं। जो तुमसे द्वेष रखता है, वह मुझसे भी रखता है। जो तुम्हारे अनुकूल है, वह मेरे भी अनुकूल है ॥ ४५ ॥
नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिनारायणो ह्यहम् ।
काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ॥ ४६ ॥
‘दुर्धर्ष वीर! तुम नर हो और मैं नारायण श्रीहरि हूँ। इस समय हम दोनों नर-नारायण ऋषि ही इस लोकमें आये हैं ॥ ४६ ॥
अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैव च ।
नावयोरन्तरं शक्यं वेदितुं भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
‘कुन्तीकुमार! तुम मुझसे अभिन्न हो और मैं तुमसे पृथक् नहीं हूँ। भरतश्रेष्ठ! हम दोनोंका भेद जाना नहीं जा सकता’ ॥ ४७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ते तु वचने केशवेन महात्मना ।
तस्मिन् वीरसमावाये संरब्धेष्वथ राजसु ॥ ४८ ॥
धृष्टद्युम्नमुखैर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारिता ।
पाञ्चाली पुण्डरीकाक्षमासीनं भ्रातृभिः सह ।
अभिगम्याब्रवीत् क्रुद्धा शरण्यं शरणैषिणी ॥ ४९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! रोषावेशसे भरे हुए राजाओंकी मण्डलीमें उस वीरसमुदायके मध्य महात्मा केशवके ऐसा कहनेपर धृष्टद्युम्न आदि भाइयोंसे घिरी और
कुपित हुई पांचालराजकुमारी द्रौपदी भाइयोंके साथ बैठे हुए शरणागतवत्सल श्रीकृष्णके पास जा उनकी शरणकी इच्छा रखती हुई उनसे बोली ॥ ४८-४९ ॥
द्रौपद्युवाच
पूर्वे प्रजाभिसर्गे त्वामाहुरेकं प्रजापतिम् ।
स्रष्टारं सर्वलोकानामसितो देवलोऽब्रवीत् ॥ ५० ॥
द्रौपदीने कहा—प्रभो! ऋषिलोग प्रजासृष्टिके प्रारम्भकालमें एकमात्र आपको ही सम्पूर्ण जगत्का स्रष्टा एवं प्रजापति कहते हैं। महर्षि असित-देवलका यही मत है ॥ ५० ॥
विष्णुस्त्वमसि दुर्धर्ष त्वं यज्ञो मधुसूदन ।
यष्टा त्वमसि यष्टव्यो जामदग्न्यो यथाब्रवीत् ॥ ५१ ॥
दुर्द्धर्ष मधुसूदन! आप ही विष्णु हैं, आप ही यज्ञ हैं, आप ही यजमान हैं और आप ही यजन करने योग्य श्रीहरि हैं, जैसा कि जमदग्निनन्दन परशुरामका कथन है ॥ ५१ ॥
ऋषयस्त्वां क्षमामाहुः सत्यं च पुरुषोत्तम ।
सत्याद् यज्ञोऽसि सम्भूतः कश्यपस्त्वां यथाब्रवीत् ॥ ५२ ॥
पुरुषोत्तम! कश्यपजीका कहना है कि महर्षिगण आपको क्षमा और सत्यका स्वरूप कहते हैं। सत्यसे प्रकट हुए यज्ञ भी आप ही हैं ॥ ५२ ॥
साध्यानामपि देवानां शिवानामीश्वरेश्वर ।
भूतभावन भूतेश यथा त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ ५३ ॥
भूतभावन भूतेश्वर! आप साध्य देवताओं तथा कल्याणकारी रुद्रोंके अधीश्वर हैं। नारदजीने आपके विषयमें यही विचार प्रकट किया है ॥ ५३ ॥
ब्रह्मशंकरशक्राद्यैर्देववृन्दैः पुनः पुनः ।
क्रीडसे त्वं नरव्याघ्र बालः क्रीडनकैरिव ॥ ५४ ॥
नरश्रेष्ठ! जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार आप ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि देवताओंसे बारंबार क्रीडा करते रहते हैं ॥ ५४ ॥
द्यौश्च ते शिरसा व्याप्ता पद्भ्यां च पृथिवी प्रभो ।
जठरं त इमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ५५ ॥
प्रभो! स्वर्गलोक आपके मस्तकसे और पृथ्वी आपके चरणोंसे व्याप्त है। ये सब लोक आपके उदरस्वरूप हैं। आप सनातन पुरुष हैं ॥ ५५ ॥
विद्यातपोऽभितप्तानां तपसा भावितात्मनाम् ।
आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणामसि सत्तमः ॥ ५६ ॥
विद्या और तपस्यासे सम्पन्न तथा तपके द्वारा शोधित अन्तःकरणवाले आत्मज्ञानसे तृप्त महर्षियोंमें आप ही परम श्रेष्ठ हैं ॥ ५६ ॥
राजर्षीणां पुण्यकृतामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।
सर्वधर्मोपपन्नानां त्वं गतिः पुरुषर्षभ ।
त्वं प्रभुस्त्वं विभुश्च त्वं भूतात्मा त्वं विचेष्टसे ॥ ५७ ॥
पुरुषोत्तम! युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले, सब धर्मोंसे सम्पन्न पुण्यात्मा राजर्षियोंके आप ही आश्रय हैं। आप ही प्रभु (सबके स्वामी), आप ही विभु (सर्वव्यापी) और आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं। आप ही विविध प्राणियोंके रूपमें नाना प्रकारकी चेष्टाएँ कर रहे हैं ॥ ५७ ॥
लोकपालाश्च लोकाश्च नक्षत्राणि दिशो दश ।
नभश्चन्द्रश्च सूर्यश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥
लोक, लोकपाल, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, आकाश, चन्द्रमा और सूर्य सब आपमें प्रतिष्ठित हैं ॥ ५८ ॥
मर्त्यता चैव भूतानाममरत्वं दिवौकसाम् ।
त्वयि सर्वं महाबाहो लोककार्यं प्रतिष्ठितम् ॥ ५९ ॥
महाबाहो! भूलोकके प्राणियोंकी मृत्युपरवशता, देवताओंकी अमरता तथा सम्पूर्ण जगत्का कार्य सब कुछ आपमें ही प्रतिष्ठित है ॥ ५९ ॥
सा तेऽहं दुःखमाख्यास्ये प्रणयान्मधुसूदन ।
ईशस्त्वं सर्वभूतानां ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ ६० ॥
मधुसूदन! मैं आपके प्रति प्रेम होनेके कारण आपसे अपना दुःख निवेदन करूँगी; क्योंकि दिव्य और मानव जगत्में जितने भी प्राणी हैं, उन सबके ईश्वर आप ही हैं ॥ ६० ॥
कथं नु भार्या पार्थानां तव कृष्ण सखी विभो ।
धृष्टद्युम्नस्य भगिनी सभां कृष्येत मादृशी ॥ ६१ ॥
भगवन् कृष्ण! मेरे-जैसी स्त्री जो कुन्तीपुत्रोंकी पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न-जैसे वीरकी बहिन हो, क्या किसी तरह सभामें (केश पकड़कर) घसीटकर लायी जा सकती है? ॥ ६१ ॥
स्त्रीधर्मिणी वेपमाना शोणितेन समुक्षिता ।
एकवस्त्रा विकृष्टास्मि दुःखिता कुरुसंसदि ॥ ६२ ॥
मैं रजस्वला थी, मेरे कपड़ोंपर रक्तके छींटे लगे थे, शरीरपर एक ही वस्त्र था और लज्जा एवं भयसे मैं थरथर काँप रही थी। उस दशामें मुझ दुःखिनी अबलाको कौरवोंकी सभामें घसीटकर लाया गया था ॥ ६२ ॥
राज्ञां मध्ये सभायां तु रजसातिपरिप्लुता ।
दृष्ट्वा च मां धार्तराष्ट्रा प्राहसन् पापचेतसः ॥ ६३ ॥
भरी सभामें राजाओंकी मण्डलीके बीच अत्यन्त रजस्राव होनेके कारण मैं रक्तसे भींगी जा रही थी। उस अवस्थामें मुझे देखकर धृतराष्ट्रके पापात्मा पुत्रोंने जोर-जोरसे हँसकर मेरी हँसी उड़ायी ॥ ६३ ॥
दासीभावेन मां भोक्तुमीषुस्ते मधुसूदन । जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु पञ्चालेषु च वृष्णिषु ॥ ६४ ॥ मधुसूदन! पाण्डवों, पांचालों और वृष्णिवंशी वीरोंके जीते-जी धृतराष्ट्रके पुत्रोंने दासीभावसे मेरा उपभोग करनेकी इच्छा प्रकट की ॥ ६४ ॥
नन्वहं कृष्ण भीष्मस्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः । स्नुषा भवामि धर्मेण साहं दासीकृता बलात् ॥ ६५ ॥ श्रीकृष्ण! मैं धर्मतः भीष्म और धृतराष्ट्र दोनोंकी पुत्रवधू हूँ, तो भी उनके सामने ही बलपूर्वक दासी बनायी गयी ॥ ६५ ॥
गर्हये पाण्डवांस्त्वेव युधि श्रेष्ठान् महाबलान् । यत्क्लिश्यमानां प्रेक्षन्ते धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ६६ ॥ मैं तो संग्राममें श्रेष्ठ इन महाबली पाण्डवोंकी ही निन्दा करती हूँ; जो अपनी यशस्विनी धर्मपत्नीको शत्रुओंद्वारा सतायी जाती हुई देख रहे थे ॥ ६६ ॥
धिग् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य च गाण्डिवम् । यौ मां विप्रकृतां क्षुद्रैर्मर्षयेतां जनार्दन ॥ ६७ ॥ जनार्दन! भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके गाण्डीव धनुषको भी धिक्कार है, जो उन नराधमोंद्वारा मुझे अपमानित होती देखकर भी सहन करते रहे ॥ ६७ ॥
शाश्वतोऽयं धर्मपथः सद्भिDIRAचरितः सदा । यद् भार्यां परिरक्षन्ति भर्तारोऽल्पबला अपि ॥ ६८ ॥ सत्पुरुषोंद्वारा सदा आचरणमें लाया हुआ यह धर्मका सनातन मार्ग है कि निर्बल पति भी अपनी पत्नीकी रक्षा करते हैं ॥ ६८ ॥
भार्यायां रक्ष्यमाणायां प्रजा भवति रक्षिता । प्रजायां रक्ष्यमाणायामात्मा भवति रक्षितः ॥ ६९ ॥ पत्नीकी रक्षा करनेसे अपनी संतान सुरक्षित होती है और संतानकी रक्षा होनेपर अपने आत्माकी रक्षा होती है ॥ ६९ ॥
आत्मा हि जायते तस्यां तस्माज्जाया भवत्युत । भर्ता च भार्यया रक्ष्यः कथं जायान्ममोदरे ॥ ७० ॥ अपना आत्मा ही स्त्रीके गर्भसे जन्म लेता है; इसीलिये वह जाया कहलाती है। पत्नीको भी अपने पतिकी रक्षा इसीलिये करनी चाहिये कि यह किसी प्रकार मेरे उदरसे जन्म ग्रहण करे ॥ ७० ॥
नन्विमे शरणं प्राप्तं न त्यजन्ति कदाचन । ते मां शरणमापन्नां नान्वपद्यन्त पाण्डवाः ॥ ७१ ॥ ये अपनी शरणमें आनेपर कभी किसीका भी त्याग नहीं करते; किंतु इन्हीं पाण्डवोंने मुझ शरणागत अबलापर तनिक भी दया नहीं की ॥ ७१ ॥
पञ्चभिः पतिभिर्जाताः कुमारा मे महौजसः । एतेषामप्यवेक्षार्थं त्रातव्यास्मि जनार्दन ॥ ७२ ॥ जनार्दन! इन पाँच पतियोंसे उत्पन्न हुए मेरे महाबली पाँच पुत्र हैं। उनकी देखभालके लिये भी मेरी रक्षा आवश्यक थी ॥ ७२ ॥
प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात् सुतसोमो वृकोदरात् । अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिश्च शतानीकस्तु नाकुलिः ॥ ७३ ॥ कनिष्ठाच्छ्रुतकर्मा च सर्वे सत्यपराक्रमाः । प्रद्युम्नो यादृशः कृष्ण तादृशास्ते महारथाः ॥ ७४ ॥ युधिष्ठिरसे प्रतिविन्ध्य, भीमसेनसे सुतसोम, अर्जुनसे श्रुतकीर्ति, नकुलसे शतानीक और छोटे पाण्डव सहदेवसे श्रुतकर्माका जन्म हुआ है। ये सभी कुमार सच्चे पराक्रमी हैं। श्रीकृष्ण! आपका पुत्र प्रद्युम्न जैसा शूरवीर है, वैसे ही वे मेरे महारथी पुत्र भी हैं ॥ ७३-७४ ॥
नन्विमे धनुषि श्रेष्ठा अजेया युधि शात्रवैः । किमर्थं धार्तराष्ट्राणां सहन्ते दुर्बलीयसाम् ॥ ७५ ॥ ये धनुर्विद्यामें श्रेष्ठ तथा शत्रुओंद्धारा युद्धमें अजेय हैं तो भी दुर्बल धृतराष्ट्र-पुत्रोंका अत्याचार कैसे सहन करते हैं? ॥ ७५ ॥
अधर्मेण हृतं राज्यं सर्वे दासाः कृतास्तथा । सभायां परिकृष्टाहमेकवस्त्रा रजस्वला ॥ ७६ ॥ अधर्मसे सारा राज्य हरण कर लिया गया, सब पाण्डव दास बना दिये गये और मैं एकवस्त्रधारिणी रजस्वला होनेपर भी सभामें घसीटकर लायी गयी ॥ ७६ ॥
नाधिज्यमपि यच्छक्यं कर्तुमन्येन गाण्डिवम् । अन्यत्रार्जुनभीमाभ्यां त्वया वा मधुसूदन ॥ ७७ ॥ मधुसूदन! अर्जुनके पास जो गाण्डीव धनुष है, उसपर अर्जुन, भीम अथवा आपके सिवा दूसरा कोई प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा सकता (तो भी ये मेरी रक्षा न कर सके) ॥ ७७ ॥
धिग् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य च पौरुषम् । यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७८ ॥ कृष्ण! भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके पुरुषार्थको भी धिक्कार है, जिसके होते हुए दुर्योधन इतना बड़ा अत्याचार करके दो घड़ी भी जीवित रह रहा है ॥ ७८ ॥
य एतानाक्षिपद् राष्ट्रात् सह मात्राविहिंसकान् । अधीयानान् पुरा बालान् व्रतस्थान् मधुसूदन ॥ ७९ ॥ मधुसूदन! पहले बाल्यावस्थामें, जब कि पाण्डव ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए अध्ययनमें लगे थे, किसीकी हिंसा नहीं करते थे, जिन दुष्टने इन्हें इनकी माताके साथ राज्यसे बाहर निकाल दिया था ॥ ७९ ॥
भोजने भीमसेनस्य पापः प्राक्षेपयद् विषम् । कालकूटं नवं तीक्ष्णं सम्भूतं लोमहर्षणम् ॥ ८० ॥ जिस पापीने भीमसेनके भोजनमें नूतन, तीक्ष्ण, परिमाणमें अधिक एवं रोमांचकारी कालकूट नामक विष डलवा दिया था ॥ ८० ॥ तज्जीर्णमविकारेण सहान्नेन जनार्दन । सशेषत्वान्महाबाहो भीमस्य पुरुषोत्तम ॥ ८१ ॥ महाबाहु नरश्रेष्ठ जनार्दन! भीमसेनकी आयु शेष थी, इसीलिये वह घातक विष अन्नके साथ ही पच गया और उसने कोई विकार नहीं उत्पन्न किया (इस प्रकार उस दुर्योधनके अत्याचारोंको कहाँतक गिनाया जाय) ॥ ८१ ॥ प्रमाणकोट्यां विश्वस्तं तथा सुप्तं वृकोदरम् । बद्ध्वैनं कृष्ण गङ्गायां प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥ ८२ ॥ श्रीकृष्ण! प्रमाणकोटितीर्थमें, जब भीमसेन विश्वस्त होकर सो रहे थे, उस समय दुर्योधनने इन्हें बाँधकर गंगामें फेंक दिया और स्वयं चुपचाप राजधानीमें लौट आया ॥ ८२ ॥ यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संच्छिद्य बन्धनम् । उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबलः ॥ ८३ ॥ जब इनकी आँख खुली तो ये महाबली महाबाहु भीमसेन सारे बन्धनोंको तोड़कर जलसे ऊपर उठे ॥ ८३ ॥ आशीविषैः कृष्णसर्पैर्भीमसेनमदंशयत् । सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥ ८४ ॥ इनके सारे अंगोंमें विषैले काले सर्पोंसे डँसवाया; परंतु शत्रुहन्ता भीमसेन मर न सके ॥ ८४ ॥ प्रतिबुद्धस्तु कौन्तेयः सर्वान् सर्पानपोथयत् । सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान् ॥ ८५ ॥ जागनेपर कुन्तीनन्दन भीमने सब सर्पोंको उठा-उठाकर पटक दिया। दुर्योधनने भीमसेनके प्रिय सारथिको भी उलटे हाथसे मार डाला ॥ ८५ ॥ पुनः सुप्तानपाधाक्षीद् बालकान् वारणावते । शयानानार्यया सार्धं को नु तत् कर्तुमर्हति ॥ ८६ ॥ इतना ही नहीं, वारणावतमें आर्या कुन्तीके साथमें ये बालक पाण्डव सो रहे थे, उस समय उसने घरमें आग लगवा दी। ऐसा दुष्कर्म दूसरा कौन कर सकता है? ॥ ८६ ॥ यत्रार्या रुदती भीता पाण्डवानिदमब्रवीत् । महद् व्यसनमापन्ना शिखिना परिवारिता ॥ ८७ ॥
उस समय वहाँ आर्या कुन्ती भयभीत हो रोती हुई पाण्डवोंसे इस प्रकार बोलीं—‘मैं बड़े भारी संकटमें पड़ी, आगसे घिर गयी ॥ ८७ ॥
हा हतास्मि कुतो न्वद्य भवेच्छान्तिरिहानलात् ।
अनाथा विनशिष्यामि बालकैः पुत्रकैः सह ॥ ८८ ॥
‘हाय! हाय! मैं मारी गयी, अब इस आगसे कैसे शान्ति प्राप्त होगी? मैं अनाथकी तरह अपने बालक पुत्रोंके साथ नष्ट हो जाऊँगी’ ॥ ८८ ॥
तत्र भीमो महाबाहुर्वायुवेगपराक्रमः ।
आर्यामाश्वासयामास भ्रातॄंश्चापि वृकोदरः ॥ ८९ ॥
वैनतेयो यथा पक्षी गरुत्मान् पततां वरः ।
तथैवाभिपतिष्यामि भयं वो नेह विद्यते ॥ ९० ॥
उस समय वहाँ वायुके समान वेग और पराक्रमवाले महाबाहु भीमसेनने आर्या कुन्ती तथा भाइयोंको आश्वासन देते हुए कहा—‘पक्षियोंमें श्रेष्ठ विनतानन्दन गरुड जैसे उड़ा करते हैं, उसी प्रकार मैं भी तुम सबको लेकर यहाँसे चल दूँगा। अतः तुम्हें यहाँ तनिक भी भय नहीं है’ ॥ ८९-९० ॥
आर्यामङ्केन वामेन राजानं दक्षिणेन च ।
अंसयोश्च यमौ कृत्वा पृष्ठे बीभत्सुमेव च ॥ ९१ ॥
सहसोत्पत्य वेगेन सर्वानादाय वीर्यवान् ।
भ्रातॄनार्यां च बलवान् मोक्षयामास पावकात् ॥ ९२ ॥
ऐसा कहकर पराक्रमी एवं बलवान् भीमने आर्या कुन्तीको बायें अंकमें, धर्मराजको दाहिने अंकमें, नकुल और सहदेवको दोनों कंधोंपर तथा अर्जुनको पीठपर चढ़ा लिया और सबको लिये-दिये सहसा वेगसे उछलकर इन्होंने उस भयंकर अग्निसे भाइयों तथा माताकी रक्षा की* ॥ ९१-९२ ॥
ते रात्रौ प्रस्थिताः सर्वे सह मात्रा यशस्विनः ।
अभ्यगच्छन्महारण्ये हिडिम्बवनमन्तिकात् ॥ ९३ ॥
फिर वे सब यशस्वी पाण्डव माताके साथ रातमें ही वहाँसे चल दिये और हिडिम्बवनके पास एक भारी वनमें जा पहुँचे ॥ ९३ ॥
श्रान्ताः प्रसुप्तास्तत्रेमे मात्रा सह सुदुःखिताः ।
सुप्तांश्चैनानभ्यगच्छद्धिडिम्बा नाम राक्षसी ॥ ९४ ॥
वहाँ मातासहित ये दुःखी पाण्डव थककर सो गये। सो जानेपर इनके निकट हिडिम्बा नामक राक्षसी आयी ॥ ९४ ॥
सा दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सुप्तान् मात्रा सह क्षितौ ।
हृच्छयेनाभिभूतात्मा भीमसेनमकामयत् ॥ ९५ ॥
मातासहित पाण्डवोंको वहाँ धरतीपर सोते देख कामसे पीड़ित हो उस राक्षसीने भीमसेनकी कामना की ॥ ९५ ॥
भीमस्य पादौ कृत्वा तु स्व उत्सङ्गे ततोऽबला ।
पर्यमर्दत संहृष्टा कल्याणी मृदुपाणिना ॥ ९६ ॥
भीमके पैरोंको अपनी गोदमें लेकर वह कल्याणमयी अबला अपने कोमल हाथोंसे प्रसन्नतापूर्वक दबाने लगी ॥ ९६ ॥
तामबुध्यदमेयात्मा बलवान् सत्यविक्रमः ।
पर्यपृच्छत तां भीमः किमिहेच्छस्यनिन्दिते ॥ ९७ ॥
उसका स्पर्श पाकर बलवान् सत्यपराक्रमी तथा अमेयात्मा भीमसेन जाग उठे। जागनेपर उन्होंने पूछा—'सुन्दरी! तुम यहाँ क्या चाहती हो?' ॥ ९७ ॥
एवमुक्ता तु भीमेन राक्षसी कामरूपिणी ।
भीमसेनं महात्मानमाह चैवमनिन्दिता ॥ ९८ ॥
इस प्रकार पूछनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली उस अनिन्द्य सुन्दरी राक्षसकन्याने महात्मा भीमसे कहा— ॥ ९८ ॥
पलायध्वमितः क्षिप्रं मम भ्रातैष वीर्यवान् ।
आगमिष्यति वो हन्तुं तस्माद् गच्छत मा चिरम् ॥ ९९ ॥
'आपलोग यहाँसे जल्दी भाग जायँ, मेरा यह बलवान् भाई हिडिम्ब आपको मारनेके लिये आयेगा; अतः आपलोग जल्दी चले जाइये, देर न कीजिये' ॥ ९९ ॥
अथ भीमोऽभ्युवाचैनां साभिमानमिदं वचः ।
नोद्विजेयमहं तस्मान्निहनिष्येऽहमागतम् ॥ १०० ॥
यह सुनकर भीमने अभिमानपूर्वक कहा—'मैं उस राक्षससे नहीं डरता। यदि यहाँ आयेगा तो मैं ही उसे मार डालूँगा' ॥ १०० ॥
तयोः श्रुत्वा तु संजल्पमागच्छद् राक्षसाधमः ।
भीमरूपो महानादान् विसृजन् भीमदर्शनः ॥ १०१ ॥
उन दोनोंकी बातचीत सुनकर वह भीमरूपधारी भयंकर एवं नीच राक्षस बड़े जोरसे गर्जना करता हुआ वहाँ आ पहुँचा ॥ १०१ ॥
राक्षस उवाच
केन सार्धं कथयसि आनयैनं ममान्तिकम् ।
हिडिम्बे भक्षयिष्यामो न चिरं कर्तुमर्हसि ॥ १०२ ॥
राक्षस बोला—हिडिम्बे! 'तू किससे बात कर रही है? लाओ इसे मेरे पास। हमलोग खायेंगे। अब तुम्हें देर नहीं करनी चाहिये ॥ १०२ ॥
सा कृपासंगृहीतेन हृदयेन मनस्विनी ।
नैनमैच्छत् तदाख्यातुमनुक्रोशादनिन्दिता ।। १०३ ।। मनस्विनी एवं अनिन्दिता हिडिम्बाने स्नेहयुक्त हृदयके कारण दयावश यह क्रूरतापूर्ण संदेश भीमसेनसे कहना उचित न समझा ।। १०३ ।। स नादान् विनदन् घोरान् राक्षसः पुरुषादकः । अभ्यद्रवत वेगेन भीमसेनं तदा किल ।। १०४ ।। इतनेहीमें वह नरभक्षी राक्षस घोर गर्जना करता हुआ बड़े वेगसे भीमसेनकी ओर दौड़ा ।। १०४ ।। तमभिद्रुत्य संक्रुद्धो वेगेन महता बली । अगृह्णात् पाणिना पाणिं भीमसेनस्य राक्षसः ।। १०५ ।। इन्द्राशनिसमस्पर्शं वज्रसंहननं दृढम् । संहत्य भीमसेनाय व्याक्षिपत् सहसा करम् ।। १०६ ।। क्रोधमें भरे हुए उस बलवान् राक्षसने बड़े वेगसे निकट जाकर अपने हाथसे भीमसेनका हाथ पकड़ लिया। भीमसेनके हाथका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान था। उनका शरीर भी वैसा ही सुदृढ़ था। राक्षसने भीमसेनसे भिड़कर उनके हाथको सहसा झटक दिया ।। १०५-१०६ ।। गृहीतं पाणिना पाणिं भीमसेनस्य रक्षसा । नामृष्यत महाबाहुस्तत्राक्रुध्यद् वृकोदरः ।। १०७ ।। राक्षसने भीमसेनके हाथको अपने हाथसे पकड़ लिया; यह बात महाबाहु भीमसेन नहीं सह सके। वे वहीं कुपित हो गये ।। १०७ ।। तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं भीमसेनहिडिम्बयोः । सर्वास्त्रविदुषोर्घोरं वृत्रवासवयोरिव ।। १०८ ।। उस समय सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता भीमसेन और हिडिम्बमें इन्द्र और वृत्रासुरके समान भयानक एवं घमासान युद्ध होने लगा ।। १०८ ।। विक्रीड्य सुचिरं भीमो राक्षसेन सहानघ । निजघान महावीर्यस्तं तदा निर्बलं बली ।। १०९ ।। निष्पाप श्रीकृष्ण! महापराक्रमी और बलवान् भीमसेनने उस राक्षसके साथ बहुत देरतक खिलवाड़ करके उसके निर्बल हो जानेपर उसे मार डाला ।। १०९ ।। हत्वा हिडिम्बं भीमोऽथ प्रस्थितो भ्रातृभिः सह । हिडिम्बामग्रतः कृत्वा यस्यां जातो घटोत्कचः ।। ११० ।। इस प्रकार हिडिम्बको मारकर हिडिम्बाको आगे किये भीमसेन अपने भाइयोंके साथ आगे बढ़े। उसी हिडिम्बासे घटोत्कचका जन्म हुआ ।। ११० ।। ततः सम्प्राद्रवन् सर्वे सह मात्रा परंतपाः । एकचक्रामभिमुखाः संवृता ब्राह्मणव्रजैः ।। १११ ।।
तदनन्तर सब परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ आगे बढ़े। ब्राह्मणोंसे घिरे हुए ये लोग एकचक्रा नगरीकी ओर चल दिये ।। १११ ।।
प्रस्थाने व्यास एषां च मन्त्री प्रियहिते रतः ।
ततोऽगच्छन्नेकचक्रां पाण्डवाः संशितव्रताः ।। ११२ ।।
उस यात्रामें इनके प्रिय एवं हितमें लगे हुए व्यासजी ही इनके परामर्शदाता हुए। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव उन्हींकी सम्मतिसे एकचक्रापुरीमें गये ।। ११२ ।।
तत्राप्यासादयामासुर्बकं नाम महाबलम् ।
पुरुषादं प्रतिभयं हिडिम्बेनैव सम्मितम् ।। ११३ ।।
वहाँ जानेपर भी इन्हें नरभक्षी राक्षस महाबली बकासुर मिला। वह भी हिडिम्बके ही समान भयंकर था ।। ११३ ।।
तं चापि विनिहत्योग्रं भीमः प्रहरतां वरः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैर्द्रुपदस्य पुरं ययौ ।। ११४ ।।
योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीम उस भयंकर राक्षसको मारकर अपने सब भाइयोंके साथ मेरे पिता द्रुपदकी राजधानीमें गये ।। ११४ ।।
लब्धाहमपि तत्रैव वसता सव्यसाचिना ।
यथा त्वया जिता कृष्ण रुक्मिणी भीष्मकात्मजा ।। ११५ ।।
श्रीकृष्ण! जैसे आपने भीष्मकनन्दिनी रुक्मिणीको जीता था, उसी प्रकार मेरे पिताकी राजधानीमें रहते समय सव्यसाची अर्जुनने मुझे जीता ।। ११५ ।।
एवं सुयुद्धे पार्थेन जिताहं मधुसूदन ।
स्वयंवरे महत् कर्म कृत्वा न सुकरं परैः ।। ११६ ।।
मधुसूदन! स्वयंवरमें, जो महान् कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर था, वह करके भारी युद्धमें भी अर्जुनने मुझे जीत लिया था ।। ११६ ।।
एवं क्लेशैः सुबहुभिः क्लिश्यमाना सुदुःखिता ।
निवसाम्यार्यया हीना कृष्ण धौम्यपुरःसरा ।। ११७ ।।
परंतु आज मैं इन सबके होते हुए भी अनेक प्रकारके क्लेश भोगती और अत्यन्त दुःखमें डूबी रहकर अपनी सास कुन्तीसे अलग हो धौम्यजीको आगे रखकर वनमें निवास करती हूँ ।। ११७ ।।
त इमे सिंहविक्रान्ता वीर्येणाभ्यधिकाः परैः ।
विहीनैः परिक्लिश्यन्तीं समुपैक्षन्त मां कथम् ।। ११८ ।।
ये सिंहके समान पराक्रमी पाण्डव बल-वीर्यमें शत्रुओंसे बढ़े-चढ़े हैं, इनसे सर्वथा हीन कौरव मुझे भरी सभामें कष्ट दे रहे थे, तो भी इन्होंने क्यों मेरी उपेक्षा की? ।। ११८ ।।
एतादृशानि दुःखानि सहन्ती दुर्बलीयसाम् ।
दीर्घकालं प्रदीप्तास्मि पापानां पापकर्मणाम् ।। ११९ ।।
पापकर्मोंमें लगे हुए अत्यन्त दुर्बल पापी शत्रुओंके दिये हुए ऐसे-ऐसे दुःख मैं सह रही हूँ और दीर्घकालसे चिन्ताकी आगमें जल रही हूँ ॥ ११९ ॥ कुले महति जातास्मि दिव्येन विधिना किल । पाण्डवानां प्रिया भार्या स्नुषा पाण्डोर्महात्मनः ॥ १२० ॥ यह प्रसिद्ध है कि मैं दिव्य विधिसे एक महान् कुलमें उत्पन्न हुई हूँ। पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी और महाराज पाण्डुकी पुत्रवधू हूँ ॥ १२० ॥ कचग्रगमनुप्राप्ता सास्मि कृष्ण वरा सती । पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां प्रेक्षतां मधुसूदन ॥ १२१ ॥ मधुसूदन श्रीकृष्ण! मैं श्रेष्ठ और सती-साध्वी होती हुई भी इन पाँचों पाण्डवोंके देखते-देखते केश पकड़कर घसीटी गयी ॥ १२१ ॥ इत्युक्त्वा प्रारुदत् कृष्णा मुखं प्रच्छाद्य पाणिना । पद्मकोशप्रकाशेन मृदुना मृदुभाषिणी ॥ १२२ ॥ ऐसा कहकर मृदुभाषिणी द्रौपदी कमलकोशके समान कान्तिमान् एवं कोमल हाथसे अपना मुँह ढककर फूट-फूटकर रोने लगी ॥ १२२ ॥ स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ । अभ्यवर्षत पाञ्चाली दुःखजैरश्रुबिन्दुभिः ॥ १२३ ॥ पांचालराजकुमारी कृष्णा अपने कठोर, उभरे हुए, शुभलक्षण तथा सुन्दर स्तनोंपर दुःखजनित अश्रुबिन्दुओंकी वर्षा करने लगी ॥ १२३ ॥ चक्षुषी परिमार्जन्ती निःश्वसन्ती पुनः पुनः । बाष्पपूर्णेन कण्ठेन क्रुद्धा वचनमब्रवीत् ॥ १२४ ॥ कुपित हुई द्रौपदी बार-बार सिसकती और आँसू पोंछती हुई आँसूभरे कण्ठसे बोली — ॥ १२४ ॥ नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा न च बान्धवाः । न भ्रातरो न च पिता नैव त्वं मधुसूदन ॥ १२५ ॥ 'मधुसूदन! मेरे लिये न पति हैं, न पुत्र हैं, न बान्धव हैं, न भाई हैं, न पिता हैं और न आप ही हैं ॥ १२५ ॥ ये मां विप्रकृतां क्षुद्रैरुपेक्षध्वं विशोकवत् । न च मे शाम्यते दुःखं कर्णो यत् प्राहसत् तदा ॥ १२६ ॥ 'क्योंकि आप सब लोग, नीच मनुष्योंद्वारा जो मेरा अपमान हुआ था, उसकी उपेक्षा कर रहे हैं, मानो इसके लिये आपके हृदयमें तनिक भी दुःख नहीं है। उस समय कर्णने जो मेरी हँसी उड़ायी थी, उससे उत्पन्न हुआ दुःख मेरे हृदयसे दूर नहीं होता है ॥ १२६ ॥ चतुर्भिः कारणैः कृष्ण त्वया रक्ष्यास्मि नित्यशः । सम्बन्धाद् गौरवात् सख्यात् प्रभुत्वेनैव केशव ॥ १२७ ॥
'श्रीकृष्ण! चार कारणोंसे आपको सदा मेरी रक्षा करनी चाहिये। एक तो आप मेरे सम्बन्धी हैं, दूसरे अग्निकुण्डमें उत्पन्न होनेके कारण मैं गौरवशालिनी हूँ, तीसरे आपकी सच्ची सखी हूँ और चौथे आप मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ॥ १२७ ॥
वैशम्पायन उवाच
अथ तामब्रवीत् कृष्णस्तस्मिन् वीरसमागमे ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने वीरोंके उस समुदायमें द्रौपदीसे इस प्रकार कहा ॥ १२७ १/२ ॥
वासुदेव उवाच
रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भाविनि ।
बीभत्सुशरसंछन्नाञ्छोणितौघपरिप्लुतान् ॥ १२८ ॥
निहतान् वल्लभान् वीक्ष्य शयानान् वसुधातले ।
यत् समर्थं पाण्डवानां तत् करिष्यामि मा शुचः ॥ १२९ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**भाविनि! तुम जिनपर क्रुद्ध हुई हो, उनकी स्त्रियाँ भी अपने प्राणप्यारे पतियोंको अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न और खूनसे लथपथ हो मरकर धरतीपर पड़ा देख इसी प्रकार रोयेंगी। पाण्डवोंके हितके लिये जो कुछ भी सम्भव है, वह सब करूँगा, शोक न करो ॥ १२८-१२९ ॥