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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

लाल सागरकी एक क्रूर स्वभाववाली कन्या थी, जिसका रक्त ही भोजन था। वह महासेनको पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाकर सर्वतोभावेन उनकी रक्षा करने लगी ॥ २८ ॥
अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रजः ।
रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥ २९ ॥
वेदप्रतिपादित अग्नि बकरेका-सा मुख बनाकर अनेक संतानोंके साथ उपस्थित हो पर्वतशिखर पर निवास करनेवाले बालक स्कन्दका इस प्रकार मन बहलाने लगे, मानो उन्हें खिलौनोंसे खेला रहे हों ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ
षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आङ्गिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२६ ॥

२२७-

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सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान

मार्कण्डेय उवाच

ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा ।
हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥ १ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः ।
परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुखसे आग उगलनेवाले दर्पयुक्त पार्षदगण—ये तथा दूसरे बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी प्राणी मातृकागणोंके साथ रहकर महासेनको सब ओरसे घेरे हुए उनकी रक्षाके लिये खड़े थे ॥ १-२ ॥

संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः ।
आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥ ३ ॥
देवेश्वर इन्द्रको अपनी विजयके विषयमें संदेह ही दिखायी देता था, तो भी वे विजयकी अभिलाषासे ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो देवताओंके साथ आगे बढ़े ॥ ३ ॥

आदाय वज्रं बलवान् सर्वैर्देवगणैर्वृतः ।
विजिघांसुर्महासेनम्रिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥ ४ ॥
सब देवताओंसे घिरे हुए बलवान् इन्द्र महासेनको मार डालनेकी इच्छासे हाथमें वज्र ले बड़े वेगसे अग्रसर हो रहे थे ॥ ४ ॥

उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम् ।
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥ ५ ॥
प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलङ्कृतम् ।
विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥ ६ ॥
देवताओंकी सेना बड़ी भयानक थी। उसमें जोर-जोरसे विकट गर्जना हो रही थी। उसकी प्रभाका विस्तार महान् था। उसके ध्वज संनाह (कवच) विचित्र थे। सभी सैनिकोंके वाहन और धनुष नाना प्रकारके दिखायी देते थे। सबने श्रेष्ठ वस्त्रोंसे अपने शरीरको आच्छादित कर रखा था। सभी लोग श्रीसम्पन्न तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देते थे। इन्द्रको अपने वधके लिये आते देख कुमारने भी उनपर धावा बोल दिया ॥ ५-६ ॥

विनदन् पार्थ देवेशो द्रुतं याति महाबलः ।

संहर्षयन् देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर! महाबली देवराज इन्द्र अग्निनन्दन स्कन्दको मार डालनेकी इच्छासे देवताओंकी सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए तीव्र गतिसे विकट गर्जनाके साथ आगे बढ़ रहे थे ॥ ७ ॥

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः । समीपमथ सम्प्राप्तः कार्तिकेयस्य वासवः ॥ ८ ॥ सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितः सुरैः । गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत् सागरो यथा ॥ ९ ॥ उस समय सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनका बड़ा सम्मान कर रहे थे। जब देवराज इन्द्र कुमार कार्तिकेयके निकट पहुँचे, तब उन्होंने देवताओंके साथ सिंहके समान गर्जना की। उनका वह सिंहनाद सुनकर कुमार कार्तिकेय भी समुद्रके समान भयंकर गर्जना करने लगे ॥ ८-९ ॥

तस्य शब्देन महता समुद्भूतोदधिप्रभम् । बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥ १० ॥ देवताओंकी सेना उमड़ते हुए समुद्रके समान जान पड़ती थी। परंतु स्कन्दकी भारी गर्जनासे अचेत-सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी ॥ १० ॥

जिघांसूनुपसम्प्राप्तान् देवान् दृष्ट्वा स पावकिः । विससर्ज मुखात् क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥ ११ ॥ अग्निकुमार स्कन्द यह देखकर कि देवतालोग मेरा वध करनेकी इच्छासे यहाँ एकत्र हुए हैं, कुपित हो उठे और अपने मुँहसे आगकी बढ़ती हुई लपटें छोड़ने लगे ॥ ११ ॥

अदहद् देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले । ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः ॥ १२ ॥ इस प्रकार उन्होंने देवताओंकी सेनाको जलाना प्रारम्भ किया। सारे सैनिक पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। किसीका शरीर जल गया, किसीका सिर, किसीके आयुध जल गये और किसीके वाहन ॥ १२ ॥

प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव । दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥ १३ ॥ देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः । त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥ १४ ॥ वे सब-के-सब सहसा तितर-बितर हो आकाशमें बिखरे हुए तारोंके समान जान पड़ते थे। इस तरह जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्रका साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्दकी ही शरणमें आये, तब उन्हें शान्ति मिली। देवताओंके त्याग देनेपर इन्द्रने स्कन्दपर अपने वज्रका प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥

तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् । बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥ १५ ॥ महाराज! इन्द्रके छोड़े हुए उस वज्रने शीघ्र ही कुमार कार्तिकेयकी दायीं पसलीपर गहरी चोट पहुँचायी और उन महामना स्कन्दके पार्श्वभागको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः । युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग् दिव्यकुण्डलः ॥ १६ ॥ वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके (उस दक्षिण पार्श्वसे) एक दूसरा वीर पुरुष प्रकट हुआ, जिसकी युवावस्था थी। उसने सुवर्णमय कवच धारण कर रखा था। उसके एक हाथमें शक्ति चमक रही थी और कानोंमें दिव्य कुण्डल झलमला रहे थे ॥ १६ ॥ यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् । संजातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् ॥ १७ ॥ भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः । वज्रके प्रविष्ट होनेसे उसकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये वह विशाख नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी उस द्वितीय वीरको प्रकट हुआ देख इन्द्र भयसे थर्रा उठे और हाथ जोड़कर उन स्कन्ददेवकी शरणमें आये ॥ १७½ ॥ तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः । ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥ १८ ॥ तब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ कुमार स्कन्दने सेनासहित इन्द्रको अभयदान दिया। इससे प्रसन्न होकर सब देवता (हर्षसूचक) बाजे बजाने लगे ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे इन्द्रस्कन्दसमागमे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें इन्द्र-स्कन्दसमागमविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥

स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन

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अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

स्कन्दपारिषदान् घोराञ्शृणुष्वाद्भुतदर्शनान् ।
वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! अब तुम स्कन्दके भयंकर पार्षदोंका वर्णन सुनो, जो देखनेमें बड़े अद्भुत हैं। वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके शरीरसे वहाँ बहुत-से कुमार ग्रह उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

ये हरन्ति शिशूञ्जातान् गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ।
वज्रप्रहारात् कन्याश्च जज्ञिरेऽस्य महाबलाः ॥ २ ॥
वे क्रूर स्वभाववाले कुमारग्रह नवजात तथा गर्भस्थ शिशुओंको भी हर ले जाते हैं। इन्द्रके वज्र—प्रहारसे स्कन्दके शरीरसे वहाँ अत्यन्त बलशालिनी कन्याएँ भी उत्पन्न हुई थीं ॥ २ ॥

कुमारास्ते विशाखं च पितृत्वे समकल्पयन् ।
स भूत्वा भगवान् संख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा ॥ ३ ॥
वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मीयैः सह पुत्रकैः ।
मातॄणां प्रेक्षमाणानां भद्रशाखश्च कौसलः ॥ ४ ॥
पूर्वोक्त कुमार-ग्रहोंने विशाख (स्कन्द)-को अपना पिता माना। भगवान् स्कन्द बकरेके समान मुख धारण करके समस्त कन्यागणों और अपने पुत्रोंसे घिरकर मातृकाओंके देखते-देखते युद्धमें अपने पक्षकी रक्षा करते हैं। वे ही ‘भद्रशाख’ तथा ‘कौसल’ नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥

ततः कुमारपितरं स्कन्दमाहुर्जना भुवि ।
रुद्रमग्निमुमां स्वाहां प्रदेशेषु महाबलाम् ॥ ५ ॥
यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः ।
इसीलिये भूतलके मनुष्य स्कन्दको कुमार-ग्रहोंका पिता कहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुत्रवान् तथा पुत्रकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य अग्निस্বরূপ रुद्र और स्वाहास्वरूपा महाबलवती उमाकी सदा आराधना करते हैं ॥ ५ ½ ॥

यास्तास्त्वजनयत् कन्यास्तपो नाम हुताशनः ॥ ६ ॥
किं करोमीति ताः स्कन्दं सम्प्राप्ताः समभाषयन् ।
तप नामक अग्निने जिन कन्याओंको जन्म दिया, वे सब स्कन्दके पास आयीं और पूछने लगीं—‘हम क्या करें?’ ॥ ६ ½ ॥

कुमार्य ऊचुः

भवेम सर्वलोकस्य मातरो वयमुत्तमाः ॥ ७ ॥ प्रसादात् तव पूज्याश्च प्रियमेतत् कुरुष्व नः । कुमारियाँ बोलीं— हम सब लोग सम्पूर्ण जगत्‌की श्रेष्ठ माताएँ हों और आपकी कृपासे हम सदा पूजनीय मानी जायँ, यही हमारा प्रिय मनोरथ है, आप इसे पूर्ण कीजिये ॥ ७ १/२ ॥

सोऽब्रवीद् बाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः ॥ ८ ॥ शिवाश्चैवाशिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः । ततः संकल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् ॥ ९ ॥ तब उदारबुद्धि स्कन्दने बार-बार कहा—‘बहुत अच्छा, तुम सब लोग पृथक्-पृथक् पूजनीया माता मानी जाओगी। तुम्हारे दो भेद होंगे—शिवा और अशिवा।’ तदनन्तर स्कन्दको अपना पुत्र मानकर मातृकाएँ वहाँसे विदा हो गयीं ॥ ८-९ ॥

काकी च हलिमा चैव मालिनी बृंहता तथा । आर्या पलाना वैमित्रा सप्तैताः शिशुमातरः ॥ १० ॥ काकी, हलिमा, मालिनी, बृंहता, आर्या, पलाना और वैमित्रा—ये सातों शिशुकी माताएँ हैं ॥ १० ॥

एतासां वीर्यसम्पन्नः शिुर्नामातिदारुणः । स्कन्दप्रसादजः पुत्रो लोहिताक्षो भयंकरः ॥ ११ ॥ भगवान् स्कन्दकी कृपासे इन्हें शिशु नामक एक अत्यन्त पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जो अत्यन्त दारुण और भयंकर था। उसकी आँखें रक्तवर्णकी थीं ॥ ११ ॥

एष वीराष्टकः प्रोक्तः स्कन्दमातृगणोद्भवः । छागवक्त्रेण सहितो नवकः परिकीर्त्यते ॥ १२ ॥ शिशु और मातृगणोंको लेकर जो आठ व्यक्ति होते हैं, उन्हें ‘वीराष्टक’ कहा गया है। बकरेके-से मुखसे युक्त स्कन्दको सम्मिलित करनेसे यह समुदाय वीर-नवक कहा जाता है ॥ १२ ॥

षष्ठं छागमयं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तत् । षट्शिरोऽभ्यन्तरं राजन् नित्यं मातृगणार्चितम् ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर! स्कन्दका ही छठा मुख छागमय है, यह जान लो। राजन्! वह छः सिरोंके बीचमें स्थित है और मातृकाएँ सदा उसकी पूजा करती हैं ॥ १३ ॥

षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शब्द्यते । शक्तिं येनासृजद् दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ॥ १४ ॥ स्कन्दके छहों मस्तकोंमें वही सर्वश्रेष्ठ बताया जाता है। उन्होंने दिव्यशक्तिका प्रयोग किया था; इसलिये उनका नाम भद्रशाख हुआ ॥ १४ ॥

इत्येतद् विविधाकारं वृत्तं शुक्लस्य पञ्चमीम् । तत्र युद्धं महाघोरं वृत्तं षष्ठ्यां जनाधिप ॥ १५ ॥ नरेश्वर! इस प्रकार शुक्लपक्षकी पंचमी तिथिको विविध आकारवाले पार्षदोंकी सृष्टि हुई और षष्ठीको वहाँ अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे कुमारोत्पत्तौ अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२८ ॥

२२९-

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एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह

मार्कण्डेय उवाच

उपविष्टं तु तं स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् ।
हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! स्कन्द सोनेका कवच, सोनेकी माला और सोनेकी कलँगीसे सुशोभित मुकुट धारण किये (सुन्दर आसनपर) बैठे थे। उनके नेत्रोंसे सुवर्णकी-सी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीरसे महान् तेजःपुंज प्रकट हो रहा था ॥ १ ॥
लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्ट्रं मनोरमम् ।
सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम् ॥ २ ॥
उन्होंने लाल रंगके वस्त्रसे अपने अंगोंको आच्छादित कर रखा था। उनके दाँत बड़े तीखे थे और उनकी आकृति मनको लुभा लेनेवाली थी। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा तीनों लोकोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे ॥ २ ॥
ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् ।
अभजत् पद्मरूपा श्रीः स्वयमेव शरीरिणी ॥ ३ ॥
तदनन्तर वर देनेमें समर्थ, शौर्यसम्पन्न, युवा अवस्थासे सुशोभित तथा सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत कुमार कार्तिकेयका कमलके समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभाने स्वयं ही सेवन किया ॥ ३ ॥
श्रिया जुष्टः पृथुयशाः स कुमारवरस्तदा ।
निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ ४ ॥
मूर्तिमती शोभासे सेवित हो वहाँ बैठे हुए महा-यशस्वी सुन्दरकुमारको उस समय सब प्राणी पूर्णमासीके चन्द्रमाकी भाँति देखते थे ॥ ४ ॥
अपूजयन् महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम् ।
इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षयः ॥ ५ ॥
महामना ब्राह्मणोंने महाबली स्कन्दकी पूजा की और सब महर्षियोंने वहाँ आकर उनका इस प्रकार स्तवन किया ॥ ५ ॥

ऋषय ऊचुः

हिरण्यगर्भ भद्रं ते लोकानां शङ्करो भव ।
त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ॥ ६ ॥

**ऋषि बोले—**हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम समस्त जगत्‌के लिये कल्याणकारी बनो। तुम्हारे पैदा हुए अभी छः रातें ही बीती होंगी। इतनेमें ही तुमने समस्त लोकोंको अपने वशमें कर लिया है ॥ ६ ॥ अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम । तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥ ७ ॥ सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है। अतः आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो ॥ ७ ॥

स्कन्द उवाच

किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः । कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ॥ ८ ॥ **स्कन्द बोले—**तपोधनो! इन्द्र इस पदपर रहकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये क्या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओंकी किस प्रकार रक्षा करते हैं? ॥ ८ ॥

ऋषय ऊचुः

इन्द्रो दधाति भूतानां बलं तेजः प्रजाः सुखम् । तुष्टः प्रयच्छति तथा सर्वान् कामान् सुरेश्वरः ॥ ९ ॥ **ऋषि बोले—**देवराज इन्द्र संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण प्राणियोंको बल, तेज, संतान और सुखकी प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ९ ॥ दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति । अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदनः ॥ १० ॥ वे दुष्टोंका संहार करते और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंको जीवन दान देते हैं। बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले इन्द्र सभी प्राणियोंको आवश्यक कार्योंमें लगनेका आदेश देते हैं ॥ १० ॥ असूर्ये च भवेत् सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमाः । भवत्यग्निश्च वायुश्च पृथिव्यापश्च कारणैः ॥ ११ ॥ सूर्यके अभावमें वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमाके न रहनेपर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं। आवश्यकता पड़नेपर वे ही अग्नि, वायु, पृथिवी और जलका स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥ एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् । त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥ १२ ॥ यह सब इन्द्रका कार्य है। इन्द्रमें अपरिमित बल होता है। वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो। अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ ॥ १२ ॥

शक्र उवाच

भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः ।
अभिषिञ्चस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥ १३ ॥
**इन्द्रने कहा—**महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ। सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो। अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो ॥ १३ ॥

स्कन्द उवाच
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः ।
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥ १४ ॥
**स्कन्द बोले—**इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये। मैं तो आपका सेवक हूँ। मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है ॥ १४ ॥

शक्र उवाच
बलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानांमरीन् जहि ।
अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ॥ १५ ॥
इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम् ।
आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिताः ॥ १६ ॥
**इन्द्रने कहा—**वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओंका संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे। यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे ॥ १५-१६ ॥
भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेप्स्यति ।
द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा ॥ १७ ॥
विग्रहः सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल ।
तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि ॥ १८ ॥
तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय ।
प्रभो! यदि तुम फूट जाओगे तो जगत्के प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे। महाबलवान् वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे। अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो ॥ १७-१८ १/२ ॥

स्कन्द उवाच

त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च ।। १९ ।। करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे । **स्कन्द बोले—**देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ—? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। १९ १/२ ।।

इन्द्र उवाच

अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल ।। २० ।। यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद् भाषितं त्वया । यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ।। २१ ।। अभिषिञ्चस्व देवानां सेनापत्ये महाबल । **इन्द्रने कहा—**महाबलवान् स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र-पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा। यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो—महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो ।। २०-२१ १/२ ।।

स्कन्द उवाच

दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये ।। २२ ।। गोब्राह्मणहितार्थाय सेनापत्येऽभिषिञ्च माम् । **स्कन्द बोले—**देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये ।। २२ १/२ ।।

मार्कण्डेय उवाच

सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह ।। २३ ।। अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः । तत्र तत् काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत ।। २४ ।। यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् । **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओंसहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया। उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो ।। २३-२४ १/२ ।। विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी ।। २५ ।। आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना । आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप ।। २६ ।।

नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात् त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कन्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी ॥ २५-२६ ॥ अर्चयामास सुप्रीतो भगवान् गोवृषध्वजः । रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहु रुद्रसूनुस्ततस्तु सः ॥ २७ ॥ भगवान् वृषध्वज (शिव)-ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्दका समादर किया। ब्राह्मणलोग अग्निको रुद्रका स्वरूप बताते हैं, इसलिये स्कन्द भगवान् रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २७ ॥ रुद्रेण शुक्रममुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् । पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ॥ २८ ॥ रुद्रने जिस वीर्यका त्याग किया था, वही श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। फिर कृत्तिकाओंने अग्निके वीर्यको श्वेत पर्वतपर पहुँचाया था ॥ २८ ॥ पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः । रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ॥ २९ ॥ भगवान् रुद्रके द्वारा गुणवानोंमें श्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयका सम्मान होता देख सब देवता कहने लगे, ये रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २९ ॥ अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्निं जातो ह्ययं शिशुः । तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३० ॥ 'रुद्रने अग्निमें प्रवेश करके इस शिशुको जन्म दिया है। रुद्रस्वरूप अग्निसे उत्पन्न होनेके कारण स्कन्द रुद्रके ही पुत्र कहलाये' ॥ ३० ॥ रुद्रस्य वह्नेः स्वाहायाः षण्णां स्त्रीणां च भारत । जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३१ ॥ भारत! सुरश्रेष्ठ स्कन्दका जन्म रुद्रस्वरूप अग्निसे, स्वाहासे तथा छः स्त्रियोंसे हुआ था। इसलिये वे भगवान् रुद्रके पुत्र हुए ॥ ३१ ॥ अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः । भाति दीप्तवपुः श्रीमान् रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ॥ ३२ ॥ अग्निनन्दन स्कन्द लाल रंगके दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये कान्तिमान् एवं तेजस्वी शरीरसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो दो लाल बादलोंके साथ भगवान् अंशुमाली (सूर्य) सुशोभित हो रहे हों ॥ ३२ ॥ कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृतः । रथे समुच्छ्रितो भाति कालाग्निरिव लोहितः ॥ ३३ ॥ अग्निदेवने स्कन्दके लिये कुक्कुटके चिह्नसे अलंकृत ऊँचा ध्वज प्रदान किया था, जो रथपर अपनी अरुण प्रभासे प्रलयाग्निके समान उद्भासित होता था ॥ ३३ ॥ या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शान्तिर्बलं तथा ।

अग्रतस्तस्य सा शक्तिर्देवानां जयवर्धिनी ॥ ३४ ॥
सम्पूर्ण भूतोंमें जो चेष्टा, प्रभा, शान्ति और बल है, वही कुमार कार्तिकेयके सम्मुख शक्तिरूपमें उपस्थित है। वह देवताओंकी विजयश्रीको बढ़ानेवाली है ॥ ३४ ॥
विवेश कवचं चास्य शरीरे सहजं तथा ।
युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत् सदा ॥ ३५ ॥
तथा उन स्कन्ददेवके शरीरमें सहज (स्वाभाविक) कवचका प्रवेश हो गया, जो सदा उनके युद्ध करते समय प्रकट होता था ॥ ३५ ॥
शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः ।
ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥ ३६ ॥
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् ।
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥ ३७ ॥
राजन्! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह (विवेक), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन—ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे ॥ ३६-३७ ॥
एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलंकृतः ।
बभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुमण्डलः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार समस्त देवताओं द्वारा सेनापतिके पदपर अभिषिक्त होकर विविध आभूषणोंसे विभूषित, विशुद्ध एवं प्रसन्न हृदयवाले स्कन्द पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हुए ॥ ३८ ॥
इष्टैः स्वाध्यायघोषैश्च देवतूर्यवरैरपि ।
देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ॥ ३९ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिस्तुष्टैर्हृष्टैः स्वलंकृतैः ।
सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा ॥ ४० ॥
उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। ये तथा और भी बहुत-से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे ॥ ३९-४० ॥
क्रीडन् भाति तदा देवैरभिषिक्तश्च पावकिः ।
अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः ॥ ४१ ॥
विनिहत्य तमः सूर्यं यथेहाभ्युदितं तथा ।

उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति-भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों॥ ४१ १/२॥ अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः ॥ ४२ ॥ अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः । तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं—'आप ही हमारे पति हैं'॥ ४२ १/२॥ ताः समासाद्य भगवान् सर्वभूतगणैर्वृतः ॥ ४३ ॥ अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि । समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान् स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए॥ ४३ १/२॥ शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥ ४४ ॥ सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था॥ ४४ १/२॥ अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ४५ ॥ विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् । उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये॥ स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम ॥ ४६ ॥ अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा । तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ४७ ॥ गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा । एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥ ४८ ॥ फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो। अपने कमलकी-सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो।' इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया॥ ४६—४८॥

बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च । एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः ॥ ४९ ॥ उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंका जप और होम किया। इस प्रकार सब लोग यह जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेयकी पटरानी है ॥ ४९ ॥ षष्ठीं यां ब्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् । सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ॥ ५० ॥ उसीको ब्राह्मणलोग षष्ठी, लक्ष्मी, आशा, सुखप्रदा, सिनीवाली, कुहू, सद्वृत्ति तथा अपराजिता कहते हैं ॥ यदा स्कन्दः पतिर्लब्धः शाश्वतो देवसेनया । तदा तमाश्रयल्लक्ष्मीः स्वयं देवी शरीरिणी ॥ ५१ ॥ जब देवसेनाने स्कन्दको अपने सनातन पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया, तब (शोभास्वरूपा) लक्ष्मीदेवीने स्वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया ॥ ५१ ॥ श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता । षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद् यस्मात् तस्मात् षष्ठी महातिथिः ॥ ५२ ॥ पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात् शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपञ्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्ठी महातिथि मानी गयी ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमस्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमस्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दोपाख्यानसम्बन्धी दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥

कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन

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त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन

मार्कण्डेय उवाच

श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम् ।
सप्तर्षिपत्न्यः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! कुमार महासेनको श्रीसम्पन्न और देवताओंका सेनापति हुआ देख सप्तर्षियोंमेंसे छःकी पत्नियाँ उनके पास आयीं ॥ १ ॥

ऋषिभिः सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः ।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥ २ ॥
वे धर्मपरायणा तथा महान् पातिव्रत्यका पालन करनेवाली थीं, तो भी ऋषियोंने उन्हें त्याग दिया था। अतः उन्होंने देवसेनाके स्वामी भगवान् स्कन्दके पास शीघ्रतापूर्वक आकर कहा— ॥ २ ॥

वयं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसम्मितैः ।
अकारणाद् रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात् परिच्युताः ॥ ३ ॥
‘बेटा! हमारे देवतुल्य पतियोंने अकारण रुष्ट होकर हमें त्याग दिया है, इसलिये (हम) पुण्यलोकसे च्युत हो गयी हैं ॥ ३ ॥

अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम् ।
तत् सत्यमेतत् संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ ४ ॥
‘उन्हें किसीने यह बता दिया है कि तुम हमारे गर्भसे उत्पन्न हुए हो, (परंतु ऐसी बात नहीं है।) अतः हमारे सत्य कथनको सुनकर तुम इस संकटसे हमारी रक्षा करो ॥ ४ ॥

अक्षयश्च भवेत् स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो ।
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥ ५ ॥
‘प्रभो! तुम्हारी कृपासे हमें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है। इसके सिवा हम तुम्हें अपना पुत्र भी बनाये रखना चाहती हैं। यह सब कार्य सम्पन्न करके तुम हमसे उऋण हो जाओ’ ॥ ५ ॥

स्कन्द उवाच

मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः ।
यद्द्वापीच्छत तत् सर्वं सम्भविष्यति वस्त्रथा ॥ ६ ॥

**स्कन्द बोले—**वन्दनीय सतियो! आपलोग मेरी माताएँ हैं और मैं आप सबका पुत्र हूँ। इसके सिवा यदि आप लोगोंकी और कोई इच्छा हो तो वह भी पूर्ण हो जायगी ।। ६ ।।

मार्कण्डेय उवाच

विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत् । उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवतस्तः ।। ७ ।। **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर इन्द्रको कुछ कहनेके लिये उत्सुक देख स्कन्दने पूछा—'क्या काम है, कहिये।' स्कन्दके इस प्रकार आदेश देनेपर इन्द्र बोले— ।। ७ ।।

अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा । इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ।। ८ ।। ‘रोहिणीकी छोटी बहिन अभिजित् देवी स्पर्धाके कारण ज्येष्ठता पानेकी इच्छासे तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयी है ।। ८ ।।

तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् । कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ।। ९ ।। ‘तुम्हारा कल्याण हो, आकाशसे यह एक नक्षत्र च्युत हो गया है; (इसकी पूर्ति कैसे हो?) इस प्रश्नको लेकर मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया हूँ। स्कन्द! तुम ब्रह्माजीके साथ मिलकर

इस उत्तम काल (मुहूर्त या नक्षत्र) की पूर्तिके उपायका विचार करो ॥ ९ ॥ धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः । रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥ 'अभिजित्‌का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही (सत्ययुग आदि) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया (क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था)। इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था (क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था)—इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन-संख्या उन दिनों सम थी' ॥ १० ॥ एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः । नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥ इन्द्रके उपर्युक्त प्रस्ताव करनेपर उनका आशय समझकर छहों कृत्तिकाएँ अभिजित्‌के स्थानकी पूर्ति करनेके लिये आकाशमें चली गयीं। वह अग्निदेवता-सम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्र सात सिरोंकी आकृतिमें प्रकाशित हो रहा है ॥ ११ ॥ विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः । इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥ गरुड़जातीय विनताने स्कन्दसे कहा—'बेटा! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो। मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ' ॥ १२ ॥

स्कन्द उवाच

एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम् । स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥ **स्कन्दने कहा—**एवमस्तु (ऐसा ही हो), मा! तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे ऊपर पुत्रोचित स्नेह रखकर कर्तव्यका आदेश देती रहो। देवि! तुम यहाँ सदा अपनी पुत्रवधू देवसेनाद्वारा सम्मानित होकर रहोगी ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत् । वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः । इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर समस्त मातृगणोंने आकर स्कन्दसे कहा—'बेटा! विद्वानोंने हमें सम्पूर्ण लोकोंकी माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है। अब हम तुम्हारी माता होना चाहती हैं। तुम मातृभावसे हमारा पूजन करो' ॥ १४ ॥

स्कन्द उवाच

मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः ।

उच्चतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥ १५ ॥
**स्कन्दने कहा—**आप मेरी माताएँ हैं। मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ। मुझसे सिद्ध होनेयोग्य जो आपका अभीष्ट कार्य हो, उसे बताइये ॥ १५ ॥

मातर ऊचुः

यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः ।
अस्माकं तु भवेत् स्थानं तासां चैव न तद् भवेत् ॥ १६ ॥
माताओंने कहा—(ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि) सुप्रसिद्ध लोकमाताएँ जो पहलेसे इस सम्पूर्ण जगत्की माताओंके स्थानपर प्रतिष्ठित हों, (वे अपना पद छोड़ दें।) उनके उस स्थानपर अब हमारा अधिकार हो जाय। उनका उसपर कोई अधिकार न रहे ॥ १६ ॥
भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ ।
प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥ १७ ॥
सुरश्रेष्ठ! हम सम्पूर्ण जगत्की पूजनीया हों। जो पहले मातृकाएँ थीं, उनकी अब पूजा न हो। उन्होंने तुम्हारे लिये हमपर मिथ्या अपवाद लगाकर हमारे पतियोंको कुपित करके हमारे सन्तानसुखको छीन लिया है। अतः तुम हमें संतान प्रदान करो (हमारे पतियोंको अनुकूल करके हमें संतान-सुखकी प्राप्ति कराओ) ॥ १७ ॥

स्कन्द उवाच

वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम् ।
अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥ १८ ॥
**स्कन्द बोले—**माताओं! जिन प्रजाओंकी उत्पत्तिका अवसर बीत गया, उन्हें आपलोग अब नहीं पा सकतीं। यदि दूसरी कोई प्रजा पानेकी आपके मनमें इच्छा हो तो कहिये, मैं उसे प्रदान करूँगा ॥ १८ ॥

मातर ऊचुः

इच्छाम तासां मातृणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः ।
त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥ १९ ॥
**माताओंने कहा—**यदि ऐसी बात है, तो हमें इन लोकमाताओंकी संतानें सौंप दो। हम उन्हें खाना चाहती हैं। तुमसे पृथक् जो उन संतानोंके पिता आदि अभिभावक हैं, उन्हें भी हम खाना चाहती हैं ॥ १९ ॥

स्कन्द उवाच

प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम् ।
परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधु नमस्कृताः ॥ २० ॥