महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दमनका कार्य करेंगे ।। ५ ।।
मार्काण्डेय उवाच
पितामहस्ततस्तेषां संनिधौ शक्रमब्रवीत् । सर्वैर्देवगणैः सार्धं सम्भव त्वं महीतले ।। ६ ।। **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजीने उन देवताओंके समीप ही इन्द्रसे कहा—'तुम समस्त देवताओंके साथ भूतलपर जन्म ग्रहण करो ।। ६ ।।
विष्णोः सहायान्ऋक्षीषु वानरीषु च सर्वशः । जनयध्वं सुतान् वीरान् कामरूपबलान्वितान् ।। ७ ।। 'वहाँ रीछों और वानरोंकी स्त्रियोंसे ऐसे वीर पुत्रको उत्पन्न करो, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, बलवान् तथा भूतलपर अवतीर्ण हुए भगवान् विष्णुके योग्य सहायक हों' ।। ७ ।।
ततो भागानुभागेन देवगन्धर्वपन्नगाः । अवतर्तुं महीं सर्वे मन्त्रयामासुरञ्जसा ।। ८ ।। तदनन्तर देवता, गन्धर्व और नाग अपने-अपने अंश एवं अंशांशसे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके लिये परस्पर परामर्श करने लगे ।। ८ ।।
तेषां समक्षं गन्धर्वी दुन्दुभीं नाम नामतः । शशास वरदो देवो गच्छ कार्यार्थसिद्धये ।। ९ ।। फिर वरदायक देवता ब्रह्माजीने उन सबके सामने ही दुन्दुभी नामवाली गन्धर्वीको आज्ञा दी कि 'तुम भी देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भूतलपर जाओ ।। ९ ।।
पितामहवचः श्रुत्वा गन्धर्वी दुन्दुभी ततः । मन्थरा मानुषे लोके कुब्जा समभवत् तदा ।। १० ।। पितामहकी बात सुनकर गन्धर्वी दुन्दुभी मनुष्यलोकमें आकर मन्थरा नामसे प्रसिद्ध कुबड़ी दासी हुई ।। १० ।।
शक्रप्रभृतयश्चैव सर्वे ते सुरसत्तमाः । वानरर्क्षवरस्त्रीषु जनयामासुरात्मजान् ।। ११ ।। तेऽन्ववर्तन् पितॄन् सर्वे यशसा च बलेन च । भेत्तारो गिरिशृङ्गाणां शालतालशिलायुधाः ।। १२ ।। इन्द्र आदि समस्त श्रेष्ठ देवता भी वानरों तथा रीछोंकी उत्तम स्त्रियोंसे संतान उत्पन्न करने लगे। वे सब वानर और रीछ यश तथा बलमें अपने पिता देवताओंके समान ही हुए। वे पर्वतोंके शिखर तोड़ डालनेकी शक्ति रखते थे एवं शाल (साखू) और ताल (ताड़)-के वृक्ष तथा पत्थरोंकी चट्टानें ही उनके आयुध थे ।। ११-१२ ।।
वज्रसंहननाः सर्वे सर्वे चौघबलास्तथा ।
कामवीर्यबलाश्रैव सर्वे युद्धविशारदाः ॥ १३ ॥
उनका शरीर वज्रके समान दुर्भेद्य और सुदृढ़ था। वे सभी राशि-राशि बलके आश्रय थे। उनका बल और पराक्रम इच्छाके अनुसार प्रकट होता था। वे सब-के-सब युद्ध करनेकी कलामें दक्ष थे ॥ १३ ॥
नागायुतसमप्राणा वायुवेगसमा जवे ।
यत्रेच्छकनिवासाश्च केचिदत्र वनौकसः ॥ १४ ॥
उनके शरीरमें दस हजार हाथियोंके समान बल था। तेज चलनेमें वे वायुके वेगको लजा देते थे। उनका कोई घर-बार नहीं था; जहाँ इच्छा होती वहीं रह जाते थे। उनमेंसे कुछ लोग केवल वनोंमें ही रहते थे ॥ १४ ॥
एवं विधाय तत् सर्वं भगवाँल्लोकभावनः ।
मन्थरां बोधयामास यद् यत् कार्यं यथा यथा ॥ १५ ॥
इस प्रकार सारी व्यवस्था करके लोक स्रष्टा भगवान् ब्रह्माने मन्थरा बनी हुई दुन्दुभीको जो-जो काम जैसे-जैसे करना था, वह सब समझा दिया ॥ १५ ॥
सा तद्वचः समाज्ञाय तथा चक्रे मनोजवा ।
इतश्चेतश्च गच्छन्ती वैरसन्धुक्षणे रता ॥ १६ ॥
वह मनके समान वेगसे चलनेवाली थी। उसने ब्रह्माजीकी बातको अच्छी तरह समझकर उसके अनुसार ही कार्य किया। वह इधर-उधर घूम-फिरकर वैरकी आग प्रज्वलित करनेमें लग गयी ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि वानराद्युत्पत्तौ
षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें वानर आदिकी उत्पत्तिसे सम्बन्धित दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७६ ॥
२७७-
सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर-दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना
युधिष्ठिर उवाच
उक्तं भगवता जन्म रामादीनां पृथक् पृथक् ।
प्रस्थानकारणं ब्रह्मन् श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम् ॥ १ ॥
कथं दाशरथी वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
सम्प्रस्थितौ वने ब्रह्मन् मैथिली च यशस्विनी ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— ब्रह्मन्! आपने श्रीरामचन्द्रजी आदि सभी भाइयोंके जन्मकी कथा तो पृथक्-पृथक् सुना दी, अब मैं उनके वनवासका कारण सुनना चाहता हूँ; उसे कहिये। दशरथजीके वीर पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण तथा मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीताको वनमें क्यों जाना पड़ा? ॥ १-२ ॥
मार्कण्डेय उवाच
जातपुत्रो दशरथः प्रीतिमानभवन्नृप ।
क्रियारतिर्धर्मरतः सततं वृद्धसेविता ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! अपने पुत्रोंके जन्मसे महाराज दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सदा सत्कर्ममें तत्पर रहनेवाले, धर्मपरायण तथा बड़े-बूढ़ोंके सेवक थे ॥ ३ ॥
क्रमेण चास्य ते पुत्रा व्यवर्धन्त महौजसः ।
वेदेषु सरहस्येषु धनुर्वेदेषु पारगाः ॥ ४ ॥
चरितब्रह्मचर्यास्ते कृतदाराश्च पार्थिव ।
यदा तदा दशरथः प्रीतिमानभवत् सुखी ॥ ५ ॥
राजाके वे महातेजस्वी पुत्र क्रमशः बढ़ने लगे। उन्होंने (उपनयनके पश्चात्) विधिवत् ब्रह्मचर्यका पालन किया और वेदों तथा रहस्यसहित धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् हुए। समयानुसार जब उनका विवाह हो गया, तब राजा दशरथ बड़े प्रसन्न तथा सुखी हुए ॥ ४-५ ॥
ज्येष्ठो रामोऽभवत् तेषां रमयामास हि प्रजाः ।
मनोहरतया धीमान् पितुर्हृदयनन्दनः ॥ ६ ॥
चारों पुत्रोंमें बुद्धिमान् श्रीराम सबसे बड़े थे। वे अपने मनोहर रूप एवं सुन्दर स्वभावसे समस्त प्रजाको आनन्दित करते थे—सबका मन उन्हींमें रमता था। इसके सिवा वे पिताके मनमें भी आनन्द बढ़ानेवाले थे ॥ ६ ॥
ततः स राजा मतिमान् मत्वाऽऽत्मानं वयोऽधिकम् । मन्त्रयामास सचिवैर्धर्मज्ञैश्च पुरोहितैः ॥ ७ ॥ अभिषेकाय रामस्य यौवराज्येन भारत ।
युधिष्ठिर! राजा दशरथ बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने यह सोचकर कि अब मेरी अवस्था बहुत अधिक हो गयी; अतः श्रीरामको युवराजपदपर अभिषिक्त कर देना चाहिये; इस विषयमें अपने मन्त्री और धर्मज्ञ पुरोहितोंसे सलाह ली ॥ ७ १/२ ॥
प्राप्तकालं च ते सर्वे मेनिरे मन्त्रिसत्तमाः ॥ ८ ॥ लोहिताक्षं महाबाहुं मत्तमातङ्गगामिनम् । कम्बुग्रीवं महोरस्कं नीलकुञ्चितमूर्धजम् ॥ ९ ॥ दीप्यमानं श्रिया वीरं शक्रादनवरं रणे । पारगं सर्वधर्माणां बृहस्पतिसमं मतौ ॥ १० ॥ सर्वानुरक्तप्रकृतिं सर्वविद्याविशारदम् । जितेन्द्रियममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ॥ ११ ॥ नियन्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् । धृतिमन्तमनाधृष्यं जेतारमपराजितम् ॥ १२ ॥ पुत्रं राजा दशरथः कौसल्यानन्दवर्धनम् । संदृश्य परमां प्रीतिमगच्छत् कुरुनन्दन ॥ १३ ॥
उन सभी श्रेष्ठ मन्त्रियोंने राजाके इस समयोचित प्रस्तावका अनुमोदन किया। श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर नेत्र कुछ-कुछ लाल थे और भुजाएँ बड़ी एवं घुटनों तक लंबी थीं। वे मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलते थे। उनकी ग्रीवा शंखके समान सुन्दर थी, उनकी छाती चौड़ी थी और उनके सिरपर काले-काले घुँघराले बाल थे। उनकी देह दिव्य दीप्तिसे चमकती रहती थी। युद्धमें उनका पराक्रम देवराज इन्द्रसे कम नहीं था। वे समस्त धर्मोंके पारंगत विद्वान् और बृहस्पतिके समान बुद्धिमान् थे। सम्पूर्ण प्रजाका उनमें अनुराग था। वे सभी विद्याओंमें प्रवीण तथा जितेन्द्रिय थे। उनका अद्भुत रूप देखकर शत्रुओंके भी नेत्र और मन लुभा जाते थे। वे दुष्टोंका दमन करनेमें समर्थ, साधुओंके संरक्षक, धर्मात्मा, धैर्यवान, दुर्धर्ष, विजयी तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाले थे। कुरुनन्दन! कौसल्याका आनन्द बढ़ानेवाले अपने पुत्र श्रीरामको देख-देखकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता होती थी ॥ ८—१३ ॥
चिन्तयंश्च महातेजा गुणान् रामस्य वीर्यवान् । अभ्यभाषत भद्रं ते प्रीयमाणः पुरोहितम् ॥ १४ ॥
अद्य पुष्यो निशि ब्रह्मन् पुण्यं योगमुपैष्यति । सम्भाराः सम्भ्रियन्तां मे रामश्चोपनिमन्त्र्यताम् ॥ १५ ॥ राजन्! तुम्हारा भला हो। महातेजस्वी तथा परम पराक्रमी राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका स्मरण करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ पुरोहितसे बोले—'ब्रह्मन्! आज पुष्य नक्षत्र है। रातमें इसे परम पवित्र योग प्राप्त होनेवाला है। आप राज्याभिषेककी सामग्री तैयार कीजिये और श्रीरामको भी इसकी सूचना दे दीजिये' ॥ १४-१५ ॥ इति तद् राजवचनं प्रतिश्रुत्याथ मन्थरा । कैकेयीमभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥ राजाकी यह बात मन्थराने भी सुन ली। वह ठीक समयपर कैकेयीके पास जाकर यों बोली— ॥ १६ ॥
अद्य कैकेयि दौर्भाग्यं राज्ञा ते ख्यापितं महत् । आशीविषस्त्वां संक्रुद्धश्चण्डो दशत दुर्भगे ॥ १७ ॥ 'केकयनन्दिनि! आज राजाने तुम्हारे लिये महान् दुर्भाग्यकी घोषणा की है। खोटे भाग्यवाली रानी! इससे अच्छा तो यह होता कि तुम्हें क्रोधमें भरा हुआ प्रचण्ड विषधर सर्प डँस लेता ॥ १७ ॥ सुभगा खलु कौसल्या यस्याःपुत्रोऽभिषेक्ष्यते ।
कुतो हि तव सौभाग्यं यस्याः पुत्रो न राज्यभाक् ॥ १८ ॥ ‘रानी कौसल्याका भाग्य अवश्य अच्छा है, जिनके पुत्रका राज्याभिषेक होगा। तुम्हारा ऐसा सौभाग्य कहाँ? जिसका पुत्र राज्यका अधिकारी ही नहीं है’॥
सा तद्वचनमाज्ञाय सर्वाभरणभूषिता । देवी विलग्नमध्येव बिभ्रती रूपमुत्तमम् ॥ १९ ॥ विविक्ते पतिमासाद्य हसन्तीव शुचिस्मिता । प्रणयं व्यञ्जयन्तीव मधुरं वाक्यमब्रवीत् ॥ २० ॥ मन्थराकी यह बात सुनकर सूक्ष्म कटिप्रदेशवाली देवी कैकेयी समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो परम सुन्दर रूप बनाकर एकान्तमें अपने पतिके पास गयी। उसकी मुसकराहटसे उसके शुद्ध भावकी सूचना मिल रही थी। वह हँसती और प्रेम जताती हुई-सी मधुर वाणीमें बोली— ॥ १९-२० ॥
सत्यप्रतिज्ञ यन्मे त्वं काममेकं निसृष्टवान् । उपाकुरुष्व तद् राजंस्तस्मान्मुच्यस्व संकटात् ॥ २१ ॥ ‘सच्ची प्रतिज्ञा करनेवाले महाराज! आपने पहले जो ‘तेरा मनोरथ सफल करूँगा’ ऐसा वर दिया था, उसे आज पूर्ण कीजिये और उस संकटसे मुक्त हो जाइये’ ॥ २१ ॥
राजोवाच
वरं ददानि ते हन्त तद् गृहाण यदिच्छसि । अवध्यो वध्यतां कोऽद्य वध्यः कोऽद्य विमुच्यताम् ॥ २२ ॥ धनं ददानि कस्याद्य ह्रियतां कस्य वा पुनः । ब्राह्मणस्वादिहान्यत्र यत् किंचिद् वित्तमस्ति मे ॥ २३ ॥ राजाने कहा— प्रिये! यह तो बड़े हर्षकी बात है। मैं अभी तुम्हें वर देता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, ले लो। आज मैं तुम्हारे कहनेसे किस कैद करनेके अयोग्यको कैद कर दूँ अथवा किस कैद करनेयोग्यको मुक्त कर दूँ? किसे धन दे दूँ अथवा किसका सर्वस्व हरण कर लूँ? ब्राह्मणधनके अतिरिक्त यहाँ अथवा अन्यत्र जो कुछ भी मेरे पास धन है, उसपर तुम्हारा अधिकार है ॥ २२-२३ ॥
पृथिव्यां राजराजोऽस्मि चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता । यस्तेऽभिलषितः कामो ब्रूहि कल्याणि मा चिरम् ॥ २४ ॥ मैं इस समय इस भूमण्डलका राजराजेश्वर हूँ चारों वर्णोंकी रक्षा करनेवाला हूँ। कल्याणि! तुम्हारा जो भी अभिलषित मनोरथ हो, उसे बताओ, देर न करो ॥
सा तद्वचनमाज्ञाय परिगृह्य नराधिपम् । आत्मनो बलमाज्ञाय तत एनमुवाच ह ॥ २५ ॥
राजाकी बातको समझकर और उन्हें सब प्रकारसे वचनबद्ध करके अपनी शक्तिको भी ठीक-ठीक जान लेनेके बाद कैकेयीने उनसे कहा— ॥ २५ ॥
आभिषेचनिकं यत् ते रामार्थमुपकल्पितम् ।
भरतस्तदवाप्नोतु वनं गच्छतु राघवः ॥ २६ ॥
‘महाराज! आपने श्रीरामके लिये जो राज्याभिषेकका सामान तैयार कराया है, वह भरतको प्राप्त हो और राम वनमें चले जायँ’ ॥ २६ ॥
स तद् राजा वचः श्रुत्वा विप्रियं दारुणोदयम् ।
दुःखार्तो भरतश्रेष्ठ न किंचिद् व्याजहार ह ॥ २७ ॥
भरतश्रेष्ठ! कैकेयीका यह अप्रिय एवं भयानक परिणामवाला वचन सुनकर राजा दशरथ दुःखसे आतुर हो अपने मुँहसे कुछ भी बोल न सके ॥ २७ ॥
ततस्तथोक्तं पितरं रामो विज्ञाय वीर्यवान् ।
वनं प्रतस्थे धर्मात्मा राजा सत्यो भवत्विति ॥ २८ ॥
श्रीरामचन्द्रजी शक्तिशाली होनेके साथ ही बड़े धर्मात्मा थे। उन्होंने पिताके पूर्वोक्त वरदानकी बात जानकर राजाके सत्यकी रक्षा हो, इस उद्देश्यसे स्वयं ही वनको प्रस्थान किया ॥ २८ ॥
तमन्वगच्छल्लक्ष्मीवान् धनुष्माँल्लक्ष्मणस्तदा ।
सीता च भार्या भद्रं ते वैदेही जनकात्मजा ॥ २९ ॥
राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। श्रीरामचन्द्रजीके वन जाते समय उत्तम शोभासे सम्पन्न उनके भाई धनुर्धर लक्ष्मणने तथा उनकी पत्नी विदेहराजकुमारी जनकनन्दिनी सीताने भी उनका अनुसरण किया ॥ २९ ॥
ततो वनं गते रामे राजा दशरथस्तदा ।
समययुज्यत देहस्य कालपर्यायधर्मणा ॥ ३० ॥
श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेपर (उनके वियोगमें) राजा दशरथने शरीर त्याग दिया ॥ ३० ॥
रामं तु गतमाज्ञाय राजानं च तथागतम् ।
आनाय्य भरतं देवी कैकेयी वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
श्रीरामचन्द्रजी वनमें चले गये तथा राजा परलोकवासी हो गये, यह देखकर कैकेयीने भरतको ननिहालसे बुलवाया और इस प्रकार कहा— ॥ ३१ ॥
गतो दशरथः स्वर्गं वनस्थौ रामलक्ष्मणौ ।
गृहाण राज्यं विपुलं क्षेमं निहतकण्टकम् ॥ ३२ ॥
'बेटा! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ स्वर्गलोकको सिधार गये तथा श्रीराम और लक्ष्मण वनमें निवास करते हैं। अब यह विशाल राज्य सब प्रकारसे सुखद और निष्कण्टक हो गया है। तुम इसे ग्रहण करो' ॥ ३२ ॥
तामुवाच स धर्मात्मा नृशंसं बत ते कृतम् ।
पतिं हत्वा कुलं चेदमुत्साद्य धनलुब्धया ॥ ३३ ॥
अयशः पातयित्वा मे मूर्ध्नि त्वं कुलपांसने ।
सकामा भव मे मातरित्युक्त्वा प्ररुरोद ह ॥ ३४ ॥
भरत बड़े धर्मात्मा थे। वे माताकी बात सुनकर उससे बोले—'कुलकलंकिनी जननी! तूने धनके लोभमें पड़कर यह कितनी बड़ी क्रूरताका काम किया है? पतिकी हत्या की और इस कुलका विनाश कर डाला। 'मेरे मस्तकपर कलंकका टीका लगाकर तू अपना मनोरथ पूर्ण कर ले।' ऐसा कहकर भरत फूट-फूटकर रोने लगे ॥ ३३-३४ ॥
स चारित्रं विशोध्याथ सर्वप्रकृतिसंनिधौ ।
अन्वयाद् भ्रातरं रामं विनिवर्तनलालसः ॥ ३५ ॥
उन्होंने सारी प्रजा और मन्त्रियों आदिके निकट अपनी सफाई दी तथा भाई श्रीरामको वनसे लौटा लानेकी लालसासे उन्हींके पथका अनुसरण किया ॥ ३५ ॥
कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं च सुदुःखितः ।
अग्रे प्रस्थाप्य यानैः स शत्रुघ्नसहितो ययौ ॥ ३६ ॥
वे कौसल्या, सुमित्रा तथा कैकेयीको सवारियोंद्वारा आगे भेजकर स्वयं अत्यन्त दुःखी हो शत्रुघ्नके साथ (पैदल ही) वनको चले ॥ ३६ ॥
वसिष्ठवामदेवाभ्यां विप्रैश्चान्यैः सहस्रशः ।
पौरजानपदैः सार्धं रामानयनकाङ्क्षया ॥ ३७ ॥
श्रीरामचन्द्रजीको लौटा लानेकी अभिलाषासे उन्होंने वसिष्ठ, वामदेव और दूसरे सहस्रों ब्राह्मणों तथा नगर एवं जनपदके लोगोंको साथ लेकर यात्रा की ॥ ३७ ॥
ददर्श चित्रकूटस्थं स रामं सहलक्ष्मणम् ।
तापसानामलंकारं धारयन्तं धनुर्धरम् ॥ ३८ ॥
चित्रकूट पहुँचकर भरतने लक्ष्मणसहित श्रीरामको धनुष हाथमें लिये तपस्वीजनोंकी वेष-भूषा धारण किये देखा ॥ ३८ ॥
(श्रीराम उवाच
गच्छ तात प्रजा रक्ष्याः सत्यं रक्षाम्यहं पितुः ।)
विसर्जितः स रामेण पितुर्वचनकारिणा ।
नन्दिग्रामेऽकरोद् राज्यं पुरस्कृत्यास्य पादुके ॥ ३९ ॥
**उस समय श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**तात भरत! अयोध्याको लौट जाओ। तुम्हें प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये और मैं पिताके सत्यकी रक्षा कर रहा हूँ, ऐसा कहकर पिताकी आज्ञा पालन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीने (समझा-बुझाकर) उन्हें विदा कर दिया। तब वे (लौटकर) बड़े भाईकी चरणपादुकाओंको आगे रखकर नन्दिग्राममें ठहर गये और वहींसे राज्यकी देख-भाल करने लगे ॥ ३९ ॥
रामस्तु पुनराशङ्क्य पौरजानपदागमम् । प्रविवेश महारण्यं शरभङ्गाश्रमं प्रति ॥ ४० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ नगर और जनपदके लोगोंके बराबर आने-जानेकी आशंकासे शरभंग मुनिके आश्रमके पास विशाल वनमें प्रवेश किया ॥ ४० ॥
सत्कृत्य शरभङ्गं स दण्डकारण्यमाश्रितः । नदीं गोदावरीं रम्यामाश्रित्य न्यवसत् तदा ॥ ४१ ॥ वहाँ शरभंग मुनिका सत्कार करके वे दण्डकारण्यमें चले गये और वहाँ सुरम्य गोदावरी नदीके तटका आश्रय लेकर रहने लगे ॥ ४१ ॥
वसतस्तस्य रामस्य ततः शूर्पणखाकृतम् । खरेणासीन्महद् वैरं जनस्थाननिवासिना ॥ ४२ ॥ वहाँ रहते समय शूर्पणखाके (नाक, कान और ओंठ काटनेके) कारण श्रीरामचन्द्रजीका जनस्थान-निवासी खर नामक राक्षसके साथ महान् वैर हो गया ॥ ४२ ॥
रक्षार्थं तापसानां तु राघवो धर्मवत्सलः । चतुर्दश सहस्राणि जघान भुवि रक्षसाम् ॥ ४३ ॥
दूषणं च खरं चैव निहत्य सुमहाबलौ । चक्रे क्षेमं पुनर्धीमान् धर्मारण्यं स राघवः ॥ ४४ ॥
धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजीने तपस्वी मुनियोंकी रक्षाके लिये महाबली खर और दूषणको मारकर वहाँके चौदह हजार राक्षसोंका संहार कर डाला तथा उन बुद्धिमान् रघुनाथजीने पुनः उस वनको क्षेमकारक धर्मारण्य बना दिया ।। ४३-४४ ।।
हतेषु तेषु रक्षःसु ततः शूर्पणखा पुनः । ययौ निकृत्तनासोष्ठी लङ्कां भ्रातुर्निवेशनम् ।। ४५ ।। उन राक्षसोंके मारे जानेपर शूर्पणखा, जिसकी नाक और ओंठ काट लिये गये थे, पुनः लंकामें अपने भाई रावणके घर गयी ।। ४५ ।। ततो रावणमभ्येत्य राक्षसी दुःखमूर्च्छिता । पपात पादयोर्भ्रातुः संशुष्करुधिरानना ।। ४६ ।। रावणके पास पहुँचकर वह राक्षसी दुःखसे मूर्च्छित हो भाईके चरणोंमें गिर पड़ी। उसके मुखपर रक्त बहकर सूख गया था ।। ४६ ।। तां तथा विकृतां दृष्ट्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः । उत्पपातासनात् क्रुद्धो दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ।। ४७ ।। बहिनका रूप इस प्रकार विकृत हुआ देखकर रावण क्रोधसे मूर्च्छित हो उठा और दाँतोंसे दाँत पीसता हुआ रोषपूर्वक आसनसे उठकर खड़ा हो गया ।। ४७ ।। स्वानमात्यान् विसृज्याथ विविक्ते तामुवाच सः ।
केनास्येवं कृता भद्रे मामचिन्त्यावमन्य च ॥ ४८ ॥
अपने मन्त्रियोंको विदा करके उसने एकान्तमें शूर्पणखासे पूछा—'भद्रे! किसने मेरी परवा न करके—मेरी सर्वथा अवहेलना करके तुम्हारी ऐसी दुर्दशा की है? ॥ ४८ ॥
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवते ।
कः शिरस्यग्निमाधाय विश्वस्तः स्वपते सुखम् ॥ ४९ ॥
'कौन तीखे शूलके पास जाकर उसे अपने सारे अंगोंमें चुभोना चाहता है? कौन मूर्ख अपने सिरपर आग रखकर बेखटके सुखकी नींद सो रहा है? ॥ ४९ ॥
आशीविषं घोरतरं पादेन स्पृशतीह कः ।
सिंहं केसरिणं कश्च दंष्ट्रायां स्पृश्य तिष्ठति ॥ ५० ॥
'कौन अत्यन्त भयंकर विषधर सर्पको पैरसे कुचल रहा है? तथा कौन केसरी सिंहकी दाढ़ोंमें हाथ डालकर निश्चिन्त खड़ा है?' ॥ ५० ॥
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः ।
निश्चेरुर्द्दह्यतो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रतः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार बोलते हुए रावणके कान, नाक एवं आँख आदि छिद्रोंसे उसी प्रकार आगकी चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिस प्रकार रातको जलते हुए वृक्षके छेदोंसे आगकी लपटें निकलती हैं ॥ ५१ ॥
तस्य तत् सर्वमाचख्यौ भगिनी रामविक्रमम् ।
खरदूषणसंयुक्तं राक्षसानां पराभवम् ॥ ५२ ॥
तब रावणकी बहिन शूर्पणखाने श्रीरामके उस पराक्रम और खर-दूषणसहित समस्त राक्षसोंके संहारका (सारा) वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ५२ ॥
स निश्चित्य ततः कृत्यं स्वसारमुपसान्त्व्य च ।
ऊर्ध्वमाचक्रमे राजा विधाय नगरे विधिम् ॥ ५३ ॥
यह सुनकर रावणने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अपनी बहिनको सान्त्वना देकर नगर आदिकी रक्षाका प्रबन्ध करके वह आकाशमार्गसे उड़ चला ॥ ५३ ॥
त्रिकूटं समतिक्रम्य कालपर्वतमेव च ।
ददर्श मकरावासं गम्भीरोदं महोदधिम् ॥ ५४ ॥
त्रिकूट और कालपर्वतको लाँघकर उसने मगरोंके निवासस्थान गहरे महासागरको देखा ॥ ५४ ॥
तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद् दशाननः ।
दयितं स्थानमव्यग्रं शूलपाणेर्महात्मनः ॥ ५५ ॥
उसे ऊपर-ही-ऊपर लाँघकर दशमुख रावण गोकर्णतीर्थमें गया, जो परमात्मा शूलपाणि शिवका प्रिय एवं अविचल स्थान है ॥ ५५ ॥
तत्राभ्यगच्छन्मारीचं पूर्वामात्यं दशाननः ।
पुरा रामभयादेव तापस्यं समुपाश्रितम् ॥ ५६ ॥
वहाँ रावण अपने भूतपूर्व मन्त्री मारीचसे मिला, जो श्रीरामचन्द्रजीके भयसे ही पहलेसे उस स्थानमें आकर तपस्या करता था ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रामवनाभिगमने
सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामवनगमनविषयक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५६ १/२ श्लोक हैं)
२७८-
अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण
मार्कण्डेय उवाच
मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
पूजयामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्ततः ॥ १ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! रावणको आया देख मारीच सहसा उठकर खड़ा हो गया और उसने फल-मूल आदि अतिथिसत्कारकी सामग्रियोंद्वारा उसका विधिवत् पूजन किया ॥ १ ॥
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः ।
उवाच प्रथितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ २ ॥
जब रावण बैठकर विश्राम कर चुका, तब उसके पास बैठकर बातचीत करनेमें कुशल राक्षस मारीचने वाक्यका मर्म समझनेमें निपुण रावणसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २ ॥
न ते प्रकृतिमान् वर्णः कच्चित् क्षेमं पुरे तव ।
कच्चित् प्रकृतयः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ॥ ३ ॥
‘लंकेश्वर! तुम्हारे शरीरका रंग ठीक हालतमें नहीं है। तुम उदास दिखायी देते हो। तुम्हारे नगरमें कुशल तो है न? समस्त प्रजा और मन्त्री आदि पहलेकी भाँति तुम्हारी सेवा करते हैं न? ॥ ३ ॥
किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर ।
कृतमित्येव तद् विद्धि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
‘राक्षसराज! कौन-सा ऐसा कार्य आ गया है, जिसके लिये तुम्हें यहाँतक आना पड़ा? यदि वह मेरेद्वारा साध्य है तो कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे किया हुआ ही समझो’ ॥ ४ ॥
शशंस रावणस्तस्मै तत् सर्वं रामचेष्टितम् ।
समासेनैव कार्याणि क्रोधामर्षसमन्वितः ॥ ५ ॥
रावण क्रोध और अमर्षमें भरा हुआ था। उसने एक-एक करके रामद्वारा किये हुए सब कार्य संक्षेपसे कह सुनाये ॥ ५ ॥
मारीचस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ।
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै ॥ ६ ॥
मारीचने सारी बातें सुनकर थोड़ेमें ही रावणको समझाते हुए कहा—‘दशानन! तुम श्रीरामसे भिड़नेका साहस न करो। मैं उनके पराक्रमको जानता हूँ ॥ ६ ॥
बाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढुं महात्मनः ।
प्रव्रज्यायां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥ विनाशमुखमेतत् ते केनाख्यातं दुरात्मना । ‘भला! इस जगत्में कौन ऐसा वीर है, जो परमात्मा श्रीरामके बाणोंका वेग सह सके? मैं जो यहाँ संन्यासी बना बैठा हूँ, इसमें भी वे पुरुषरत्न श्रीराम ही कारण हैं। श्रीरामसे वैर मोल लेना विनाशके मुखमें जाना है, किस दुरात्माने तुम्हें ऐसी सलाह दी है?’ ॥ ७ १/२ ॥
तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सयन् ॥ ८ ॥ अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्यूरपि ते ध्रुवम् । मारीचकी बात सुनकर रावण और भी कुपित हो उठा और उसे डाँटते हुए बोला—‘मारीच! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो भी तेरी मृत्यु निश्चित ही है ॥ ८ १/२ ॥ मारीचश्चिन्तयामास विशिष्टान्मरणं वरम् ॥ ९ ॥ अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् । मारीचने सोचा, ‘यदि मृत्यु निश्चित ही है तो श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे ही मरना अच्छा होगा; अतः रावणका जो अभीष्ट कार्य है, उसे अवश्य करूँगा’ ॥ ९ १/२ ॥ ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो रक्षसां वरम् ॥ १० ॥ किं ते साह्यं मया कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ।
तदनन्तर उसने राक्षसराज रावणसे कहा—'अच्छा; बताओ, मुझे तुम्हारी क्या सहायता करनी होगी? इच्छा, न होनेपर भी मैं विवश होकर उसे करूँगा' ।। १० १/२ ।। तमब्रवीद् दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय ।। ११ ।। रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः । ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदयिष्यति ।। १२ ।। तब दशाननने उससे कहा—'तुम एक ऐसे मनोहर मृगका रूप धारण करो जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हों और शरीरके रोएँ भी रत्नोंके ही समान चित्र-विचित्र दिखायी दें। फिर रामके आश्रमपर जाओ और सीताको लुभाओ। सीता तुम्हें देख लेनेपर निश्चय ही रामसे यह अनुरोध करेगी कि 'आप इस मृगको पकड़ लाइये' ।। ११-१२ ।। अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति । तामादायापनेष्यामि ततः स न भविष्यति ।। १३ ।। भार्यावियोगाद् दुर्बुद्धिरेतत् साह्यं कुरुष्व मे । 'तुम्हारे पीछे रामके अपने आश्रमसे दूर निकल जानेपर सीताको वशमें लाना सहज हो जायगा। मैं उसे आश्रमसे हरकर ले जाऊँगा और दुर्बुद्धि राम अपनी प्यारी पत्नीके वियोगसे व्याकुल होकर प्राण दे देगा। बस, मेरी इतनी ही सहायता कर दो' ।। १३ १/२ ।। इत्येवमुक्तो मारीचः कृत्वोदकमथात्मनः ।। १४ ।। रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत् सुदुःखितः । रावणके ऐसा कहनेपर मारीच स्वयं ही अपना श्राद्ध-तर्पण करके अत्यन्त दुःखी होकर आगे जाते हुए रावणके पीछे-पीछे चला ।। १४ १/२ ।। ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ।। १५ ।। चक्रतुस्तत् तथा सर्वमुभौ यत् पूर्वमन्त्रितम् । तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप जाकर उन दोनोंने पहले जैसी सलाह कर रखी थी, उसके अनुसार सब कार्य किया ।। १५ १/२ ।। रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् ।। १६ ।। मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः । दर्शयामास मारीचो वैदेहीं मृगरूपधृक् ।। १७ ।। रावण मूँड़ मुड़ाने, भिक्षापात्र हाथमें लिये एवं त्रिदण्डधारी संन्यासीका रूप धारण करके और मारीच मृग बनकर—दोनों उस स्थानपर गये। मारीचने विदेहनन्दिनी सीताके समक्ष अपना मृगरूप प्रकट किया ।। १६-१७ ।। चोदयामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता । रामस्तस्याः प्रियं कुर्वन् धनुरादाय सत्वरः ।। १८ ।। रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रययौ मृगलिप्सया ।
विधिके विधानसे प्रेरित होकर सीताने उस मृगको लानेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको भेजा। श्रीरामचन्द्रजी सीताका प्रिय करनेके लिये धनुष हाथमें ले लक्ष्मणको सीताकी रक्षाका भार सौंपकर मृगको लानेकी इच्छासे तुरंत चल दिये ।। १८ १/२ ।।
स धन्वी बद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् ।। १९ ।।
अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ।
वे धनुष-बाण ले, पीठपर तरकस बाँधकर, कटिमें कृपाण लटकाये तथा हाथोंमें दस्ताने पहने उस मृगके पीछे उसी प्रकार दौड़े, जैसे मृगशिरा नक्षत्रके पीछे भगवान् रुद्र दौड़े थे ।। १९ १/२ ।।
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् ।। २० ।।
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं बुबुधे ततः ।
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् ।। २१ ।।
अमोघं शरमादाय जघान मृगरूपिणम् ।
मायावी राक्षस मारीच कभी छिप जाता और कभी नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो जाता था। इस प्रकार वह श्रीरामचन्द्रजीको आश्रमसे बहुत दूर खींच ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजी यह ताड़ गये कि यह कोई मायावी राक्षस है। यह बात ध्यानमें आते ही प्रतिभाशाली
श्रीरघुनाथजीने एक अमोघ बाण लेकर उस मृगरूपधारी निशाचरको मार डाला॥ २०-२१॥ स रामबाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा ॥ २२ ॥ हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह । श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे आहत हो मरते समय मारीचने उनके ही स्वरमें 'हा सीते, हा लक्ष्मण' कहकर आर्तनाद किया ॥ २२ १/२ ॥ शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् ॥ २३ ॥ सा प्राद्रवद् यतः शब्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः । अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिष्यति ॥ २४ ॥ मुहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते । विदेहनन्दिनी सीताने भी उसकी वह करुणाभरी पुकार सुनी। उसकी पुकार सुनते ही जिस ओरसे वह आवाज आयी थी, उसी ओर वे दौड़ पड़ीं। तब लक्ष्मणने उनसे कहा—'भीरु! डरनेकी कोई बात नहीं है। भला, कौन ऐसा है, जो भगवान् रामको मार सकेगा? शुचिस्मिते! तुम दो ही घड़ीमें अपने पति भगवान् श्रीरामको यहाँ उपस्थित देखोगी॥ २३-२४ १/२ ॥ इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ॥ २५ ॥ हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा । सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ॥ २६ ॥ लक्ष्मणकी यह बात सुनकर रोती हुई सीताने उन्हें संदेहकी दृष्टिसे देखा। यद्यपि शुद्ध सदाचार ही उनका आभूषण था। वे साध्वी और पतिव्रता थीं; तथापि स्त्री स्वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गयी। उन्होंने लक्ष्मणको कठोर बातें सुनानी आरम्भ कीं—॥ २५-२६॥ नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा । अप्यहं शस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना ॥ २७ ॥ पतेयं गिरिशृङ्गाद् वा विशेयं वा हुताशनम् । रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथंचन ॥ २८ ॥ निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा । 'ओ मूढ़! तुम मन-ही-मन जिस वस्तुको पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा। मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वतके शिखरसे कूद पडूँगी अथवा जलती हुई आगमें समा जाऊँगी; परंतु' राम-जैसे स्वामीको छोड़कर तुम-जैसे नीच पुरुषका कदापि वरण न करूँगी। जैसे सिंहिनी सियारको नहीं स्वीकार कर सकती, उसी प्रकार मैं तुम्हें नहीं ग्रहण करूँगी' ॥ २७-२८ १/२ ॥ एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ॥ २९ ॥
पिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः । स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ॥ ३० ॥ अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा । लक्ष्मण सदाचारी तथा श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी थे। उन्होंने सीताके ये कठोर वचन सुनकर अपने दोनों कान बंद कर लिये और उसी मार्गसे चल दिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी गये थे। उस समय लक्ष्मणके हाथमें धनुष था। उन्होंने बिम्बफलके समान अरुण अधरोंवाली सीताकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं। श्रीरामके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ २९-३० १/२ ॥ एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत ॥ ३१ ॥ अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः । यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ॥ ३२ ॥ इसी समय अवसर पाकर राक्षस रावण साध्वी सीताको हर ले जानेकी इच्छासे वहाँ दिखायी दिया। वह भयानक निशाचर सुन्दर रूप धारण करके राखमें छिपी हुई आगके समान संन्यासीके वेषमें अपने यथार्थ रूपको छिपाये हुए था ॥ ३१-३२ ॥ सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा । निमन्त्रयामास तदा फलमूलाश्नादिभिः ॥ ३३ ॥ उस समय यतिको अपने आश्रमपर आया हुआ देख धर्मको जाननेवाली जनकनन्दिनी सीता फल-मूलके भोजन आदिके अतिथिसत्कारके लिये उसे निमन्त्रित किया ॥ अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत । सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ॥ ३४ ॥ राक्षसराज रावण सीताकी दी हुई उन सभी वस्तुओंकी अवहेलना करके अपने असली रूपमें प्रकट हो गया और विदेहराजकुमारीको इस प्रकार सान्त्वना देने लगा— ॥ ३४ ॥ सीते राक्षसराजोऽहं रावणो नाम विश्रुतः । मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ॥ ३५ ॥ 'सीते! मैं राक्षसोंका राजा हूँ। मेरा 'रावण' नाम सर्वत्र विख्यात है। समुद्रके पार बसी हुई रमणीय लंकापुरी मेरी राजधानी है ॥ ३५ ॥ तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह । भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ॥ ३६ ॥ 'वहाँ नर-नारियोंके बीच मेरे साथ रहकर तुम बड़ी शोभा पाओगी। अतः सुन्दरी! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और इस तपस्वी रामको छोड़ दो' ॥ ३६ ॥ एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी । पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वचः ॥ ३७ ॥ प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ।
शैत्यमग्निरियान्नाहं त्यजेयं रघुनन्दनम् ॥ ३८ ॥ रावणके ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जनककिशोरीने अपने दोनों कान बंद कर लिये और उससे इस प्रकार कहा—'बस, अब ऐसी बातें मुँहसे न निकाल। नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूक-टूक हो जाय और अग्नि अपनी उष्णताका त्याग करके शीतल हो जाय, परंतु मैं रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नहीं छोड़ सकती ॥ ३७-३८ ॥ कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् । उपस्थाय महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ॥ ३९ ॥ 'गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले पद्ममाला-मण्डित वनवासी गजराजकी सेवामें उपस्थित होकर कोई हथिनी किसी शूकरको कैसे छू सकती है? ॥ ३९ ॥ कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् । लोभं सौवीरके कुर्यान्नारी काचिदिति स्मरेत् ॥ ४० ॥ 'जो फूलोंके रससे बने हुए मधुर पेय तथा मधुमक्षिकाओंद्वारा तैयार किया हुआ मधु पी चुकी हो, ऐसी कोई भी नारी काँजीके रसका लोभ कैसे कर सकती है?' ॥ ४० ॥ इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः । क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ॥ ४१ ॥ रावणसे इस प्रकार कहकर सीता अपने आश्रममें प्रवेश करने लगीं। उस समय क्रोधके मारे उनके ओंठ फड़क रहे थे और वे अपने दोनों हाथोंको बार-बार हिला रही थीं ॥ ४१ ॥ तामभिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् । भर्त्सयित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् ॥ ४२ ॥ इसी समय रावणने दौड़कर उनका मार्ग रोक लिया और कठोर स्वरसे उन्हें डराना, धमकाना आरम्भ किया। इससे वे भयके मारे मूर्च्छित हो गयीं ॥ ४२ ॥