महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
**विराटने कहा—**ग्रन्थिक! मेरे पास जो भी घोड़े और अन्य वाहन हैं, वे सब आजसे ही तुम्हारे अधीन हो जायँ। इसके सिवा जो कोई भी मेरे घोड़ोंको जोतनेवाले सारथि हैं, वे सब तुम्हारे अधिकारमें इदं रहें ।। ९ ।।
इदं तवेष्टं यदि वै सुरोपम
ब्रवीहि यत् ते प्रसमीक्षितं वसु ।
न तेऽनुरूपं हयकर्म विद्यते
प्रभासि राजेव हि सम्मतो मम ।। १० ।।
युधिष्ठिरस्येव हि दर्शनेन मे
समं तवेदं प्रियमत्र दर्शनम् ।
कथं तु भृत्यैः स विनाकृतो वने
वसत्यनिन्द्यो रमते च पाण्डवः ।। ११ ।।
देवोपम पुरुष! यदि यही कार्य तुम्हें प्रिय है, तो बताओ, इसके लिये वेतनरूपसे कितना धन लेनेका तुमने विचार किया है? यह घोड़ोंकी शिक्षाका कार्य तुम्हारे अनुरूप नहीं है। तुम तो राजाकी भाँति शोभा पा रहे हो और मुझे भी अत्यन्त प्रिय लगते हो। आज मुझे तुम्हारा जो यहाँ दर्शन हुआ है, यह राजा युधिष्ठिरके ही दर्शनके समान मुझे अत्यन्त प्रिय है। अहो! सर्वथा प्रशंसाके योग्य पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर सेवकोंके बिना वनमें कैसे रहते होंगे और कैसे उनका मन वहाँ लगता होगा? ।। १०-११ ।।
वैशम्पायन उवाच
तथा स गन्धर्ववरोपमो युवा
विराटराज्ञा मुदितेन पूजितः ।
न चैनमन्येऽपि विदुः कथंचन
प्रियाभिरामं विचरन्तमन्तरा ।। १२ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार प्रसन्न हुए राजा विराटके द्वारा सम्मानित हो श्रेष्ठ गन्धर्वके सदृश शोभा पानेवाले युवावस्थासम्पन्न नकुल वहाँ रहने लगे। उनका स्वरूप बड़ा ही प्रिय और नयनाभिराम था। वे नगरके भीतर विचरते रहते थे, तो भी उन्हें राजा तथा अन्य मनुष्य किसी प्रकार पहचान न सके ।। १२ ।।
एवं हि मत्स्ये न्यवसन्त पाण्डवा
यथाप्रतिज्ञाभिरमोघदर्शनाः ।
अज्ञातचर्यां व्यचरन् समाहिताः
समुद्रनेमीपतयोऽतिदुःखिताः ।। १३ ।।
जिनका दर्शन अमोघ है, वे पाण्डवगण इस प्रकार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार मत्स्यदेशमें रहने और एकाग्रतापूर्वक अज्ञातवासका समय व्यतीत करने लगे। वे सागरसे
घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके अधिपति होकर भी अत्यन्त कष्ट उठा रहे थे ।। १३ ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि नकुलप्रवेशे द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नकुलप्रवेशसम्बन्धी बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १५ श्लोक हैं।)
(समयपालनपर्व)
(समयपालनपर्व)
त्रयोदशोऽध्यायः
भीमसेनके द्वारा जीमूत नामक विश्वविख्यात मल्लका वध
जनमेजय उवाच
एवं ते मत्स्यनगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।
अत ऊर्ध्वं महावीर्याः किमकुर्वत वै द्विज ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले महापराक्रमी पाण्डुपुत्रोंने इसके बाद क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं मत्स्यस्य नगरे प्रच्छन्नाः कुरुनन्दनाः ।
आराधयन्तो राजानं यदकुर्वत तच्छृणु ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! इस प्रकार मत्स्यदेशकी राजधानीमें गुप्तरूपसे निवास करनेवाले पाण्डवोंने राजा विराटकी सेवा करते हुए जो-जो कार्य किया, वह सुनो ॥ २ ॥
तृणबिन्दुप्रसादाच्च धर्मस्य च महात्मनः ।
अज्ञातवासमेवं तु विराटनगरेऽवसन् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरः सभास्तारो मत्स्यानामभवत् प्रियः ।
तथैव च विराटस्य सपुत्रस्य विशाम्पते ॥ ४ ॥
स ह्यक्षहृदयज्ञस्तान् क्रीडयामास पाण्डवः ।
अक्षवत्यां यथाकामं सूत्रबद्धानिव द्विजान् ॥ ५ ॥
राजर्षि तृणबिन्दु और महात्मा धर्मके प्रसादसे पाण्डवलोग इस प्रकार विराटके नगरमें अज्ञातवासके दिन पूरे करने लगे। महाराज युधिष्ठिर राजसभाके प्रमुख सदस्य और मत्स्यदेशकी प्रजाके अत्यन्त प्रिय थे। राजन्! इसी प्रकार पुत्रसहित राजा विराट्का भी उनपर विशेष प्रेम था। वे पासोंका मर्म जानते थे। जैसे कोई सूतमें बाँधे हुए पक्षियोंको इच्छानुसार उड़ावे, उसी प्रकार वे
द्यूतशालामें पासोंको अपने इच्छानुसार फेंकते हुए राजा आदिको जूआ खेलाया करते थे ।। ३—५ ।। अज्ञातं च विराट्स्य विजित्य वसु धर्मराट् । भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं सम्प्रयच्छति ।। ६ ।। 'पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर जूएमं धन जीतकर अपने भाइयोंको यथायोग्य बाँट देते थे।' इसका राजा विराटको भी पता नहीं लगता था ।। ६ ।। भीमसेनोऽपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च । अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणीते युधिष्ठिरे ।। ७ ।। भीमसेन भी नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, जो मत्स्यनरेशद्वारा उन्हें पुरस्काररूपमें प्राप्त होते, बेच देते और उससे मिला हुआ धन युधिष्ठिरकी सेवामें अर्पित करते थे ।। ७ ।। वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः । विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ८ ।। अर्जुनको अन्तःपुरमें जो पुराने उतारे हुए बहुमूल्य वस्त्र प्राप्त होते, उन्हें वे बेचते और बेचनेसे मिला हुआ मूल्य सब पाण्डवोंको देते थे ।। ८ ।। सहदेवोऽपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः । दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ९ ।। पाण्डुनन्दन सहदेव भी ग्वालोंका वेश धारणकर पाण्डवोंको दही, दूध और घी दिया करते थे ।। ९ ।। नकुलोऽपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् । तुष्टे तस्मिन् नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। १० ।। नकुल भी घोड़ोंके शिक्षणका कार्य करके महाराज विराटके संतुष्ट होनेपर उनसे पुरस्कारस्वरूप जो धन पाते, उसे सब पाण्डवोंको बाँट दिया करते थे ।। १० ।। कृष्णा तु सर्वान् भर्तूंस्तान् निरीक्षन्ती तपस्विनी । यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी ।। ११ ।। तपस्विनी एवं सुन्दरी द्रौपदी भी उन सब पतियोंकी देखभाल करती हुई ऐसा बर्ताव करती, जिससे फिर कोई उसे पहचान न सके ।। ११ ।। एवं सम्पादयन्तस्ते तदान्योन्यं महारथाः । विराटनगरे चेरुः पुनर्गर्भधृता इव ।। १२ ।। इस प्रकार एक-दूसरेका सहयोग करते हुए वे महारथी पाण्डव विराटनगरमें बहुत छिपकर रहते थे; मानो पुनः माताके गर्भमें निवास कर रहे हों ।। १२ ।। साशङ्का धार्तराष्ट्रस्य भयात् पाण्डुसुतास्तदा ।
प्रेक्षमाणास्तदा कृष्णामुषुश्छन्ना नराधिप ॥ १३ ॥ राजन्! दुर्योधनद्वारा पहचान लिये जानेके भयसे पाण्डव सदा सशंक रहते थे; अतः वे उस समय द्रौपदीकी देखभाल करते हुए भी छिपकर ही वहाँ निवास करते थे ॥
अथ मासे चतुर्थे तु ब्रह्मणः सुमहोत्सवः । आसीत् समृद्धो मत्स्येषु पुरुषाणां सुसम्मतः ॥ १४ ॥ तत्र मल्लाः समापेतुर्दिग्भ्यो राजन् सहस्रशः । समाजे ब्रह्मणो राजन् यथा पशुपतेरिव ॥ १५ ॥ तदनन्तर चौथा महीना प्रारम्भ होनेपर मत्स्यदेशमें ब्रह्माजीकी पूजाका महान् उत्सव मनाया जाने लगा। इसमें बड़ा समारोह होता था। मत्स्यदेशके लोगोंको यह बहुत प्रिय था। जनमेजय! उस समय विराटनगरमें चारों दिशाओंसे हजारों कुश्ती लड़नेवाले मल्ल जुटने लगे। इसी अवसरपर ब्रह्माजी और भगवान् शंकरकी सभाके समान उस राजधानीमें लोगोंका जमाव होता था ॥ १४-१५ ॥
महाकाया महावीर्याः कालखञ्जा इवासुराः । वीर्योन्मत्ता बलोदग्रा राज्ञा समभिपूजिताः ॥ १६ ॥ वहाँ आये हुए विशालकाय और महान् बलशाली मल्ल कालखंज नामक असुरोंके समान जान पड़ते थे। वे सब अपनी शक्ति और पराक्रमके मदसे उन्मत्त थे एवं बलमें बहुत बड़े-चढ़े थे। राजा विराटने उन सबका खूब स्वागत-सत्कार किया ॥ १६ ॥
सिंहस्कन्धकटिग्रीवाः स्ववदाता मनस्विनः । असकृल्लब्धलक्षास्ते रङ्गे पार्थिवसंनिधौ ॥ १७ ॥ उनके कंधे, कमर और कण्ठ सिंहके समान थे। वे निर्मल यशसे सुशोभित और मनस्वी थे। उन्होंने अनेक बार राजाके समीप रंगभूमि (अखाड़े) में विजय पायी थी ॥ १७ ॥
तेषामेको महानासीत् सर्वमल्लानथाह्वयत् । आवल्गमानं तं रङ्गे नोपतिष्ठति कश्चन ॥ १८ ॥ उन सबमें एक बहुत बड़ा पहलवान था, जो दूसरे सब पहलवानोंको अपने साथ लड़नेके लिये ललकारता था। जब वह अखाड़ेमें उतरकर उलछने लगा, उस समय कोई भी उसके समीप खड़ा न हो सका ॥ १८ ॥
यदा सर्वे विमनसस्ते मल्ला हतचेतसः । अथ सूदेन तं मल्लं योधयामास मत्स्यराट् ॥ १९ ॥
जब वे सभी मल्ल उदासीन हो हिम्मत हार बैठे, तब मत्स्यनरेशने अपने रसोइयेसे उस पहलवानको लड़ानेका निश्चय किया ॥ १९ ॥ नोद्यमानस्तदा भीमो दुःखैनावाकरोन्मतिम् । न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् ॥ २० ॥ उस समय राजासे प्रेरित होनेपर भीमसेनने [पहचाने जानेके भयसे] दुःखी होकर ही उससे लड़नेका विचार किया। वे राजाकी बातको प्रकटरूपमें टाल नहीं सकते थे ॥ २० ॥ ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलश्वरन् । प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिपूजयन् ॥ २१ ॥ तदनन्तर पुरुषसिंह भीमने सिंहके समान धीमी चालसे चलते हुए राजा विराटका मान रखनेके लिये उस विशाल रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥ बबन्ध कक्षां कौन्तेयस्ततः संहर्षयन् जनम् । ततस्तु वृत्रसंकाशं भीमो मल्लं समाह्वयत् ॥ २२ ॥ जीमूतं नाम तं तत्र मल्लं प्रख्यातविक्रमम् । फिर लोगोंमें हर्षका संचार करते हुए उन्होंने लँ गोट बाँधा और उस प्रसिद्ध पराक्रमी जीमूत नामक मल्लको, जो वृत्रासुरके समान दिखायी देता था, युद्धके लिये ललकारा ॥ २२ ½ ॥ तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ भीमपराक्रमौ ॥ २३ ॥ मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्टिहायनौ । वे दोनों बड़े उत्साहमें भरे थे। दोनों ही प्रचण्ड पराक्रमी थे, ऐसा लगता था मानो साठ वर्षके दो मतवाले एवं विशालकाय गजराज एक-दूसरेसे भिड़नेको उद्यत हों ॥ २३ ½ ॥ ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुयुद्धं समीयुतुः ॥ २४ ॥ वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । आसीत् सुभीमः सम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २५ ॥ अत्यन्त हर्षमें भरकर एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छावाले वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय उन दोनोंमें बड़ी भयंकर भिड़न्त हुई। उनके परस्परके आघातसे इस प्रकार चटचट शब्द होने लगा, मानो वज्र और पर्वत एक-दूसरेसे टकरा गये हों ॥ उभौ परमसंहृष्टौ बलेनातिबलावुभौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २६ ॥ दोनों अत्यन्त प्रसन्न थे। बलकी दृष्टिसे दोनों ही अत्यन्त बलशाली थे और एक-दूसरेपर चोट करनेका अवसर देखते हुए विजयके अभिलाषी हो रहे
थे ॥ २६ ॥ उभौ परमसंहृष्टौ मत्ताविव महागजी । कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः । संनिपातावधूतैश्च प्रमाथोन्मथनैस्तथा३ ॥ २७ ॥ दोनोंमें भरपूर हर्ष और उत्साह भरा था। दोनों ही मतवाले गजराजोंकी भाँति एक-दूसरेसे भिड़े हुए थे। जब एक-दूसरेका कोई अंग जोरसे दबाता, तब दूसरा फौरन उसका प्रतीकार करता—उस अंगको उसकी पकड़से छुड़ा लेता था। दोनों एक-दूसरेके हाथोंको मुट्ठीसे पकड़कर विवश कर देते और विचित्र ढंगसे परस्पर प्रहार करते थे। दोनों आपसमें गुँथ जाते और फिर धक्के देकर एक दूसरेको दूर हटा देते। कभी एक-दूसरेको पटककर जमीनपर रगड़ता, तो दूसरा नीचेसे ही कुलाँचकर ऊपरवालेको दूर फेंक देता या उसे लिये-दिये खड़ा हो अपने शरीरसे दबाकर उसके अंगोंको भी मथ डालता था ॥ २७ ॥
क्षेपणैर्मुष्टिभिश्चैव३ ३ वराहोद्भूतनिःस्वनैः३ । तलैर्वज्रनिपातैश्च४ प्रसृष्टाभिस्तथैव५ च ॥ २८ ॥ कभी दोनों दोनोंको बलपूर्वक पीछे हटाते और मुक्कोंसे एक-दूसरेकी छातीपर चोट करते थे। कभी एकको दूसरा अपने कंधेपर उठा लेता और उसका मुँह नीचे करके घुमाकर पटक देता था, जिससे ऐसा शब्द होता; मानो किसी शूकरने चोट की हो। कभी परस्पर तर्जनी और अँगूठेके मध्यभागको फैलाकर चाँटोंकी मार होती और कभी हाथकी अंगुलियोंको फैलाकर वे एक-दूसरेको थप्पड़ मारते थे ॥ २८ ॥
शलाखानखपातैश्च पादोद्भूतैश्च दारुणैः । जानुभिश्चाश्मनिर्घोषैः शिरोभिश्चावघट्टनैः ॥ २९ ॥ कभी वे रोषपूर्वक अंगुलियोंके नखोंसे एक-दूसरेको बकोटते। कभी पैरोंसे उलझाकर दोनों दोनोंको गिरा देते। कभी घुटने और सिरसे टक्कर मारते; जिससे पत्थर टकरानेके समान भयंकर शब्द होता था ॥ २९ ॥
तद् युद्धमभवद् घोरमशस्त्रं बाहुतेजसा । बलप्राणेन शूराणां समाजोत्सवसंनिधौ ॥ ३० ॥
अरज्यत जनः सर्वः सोत्कृष्टनिनदोत्थितः । बलिनोः संयुगे राजन् वृत्रवासवयोरिव ॥ ३१ ॥
प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः६ । आकर्षतुरथान्योन्यं जानुभिश्चापि जघ्नतुः ॥ ३२ ॥
कभी वे प्रतिपक्षीको गोदमें घसीट लाते, कभी खेलमें ही उसे सामने खींच लेते, कभी आगे-पीछे, दायें-बायें पैंतरे बदलते और कभी सहसा पीछे ढकेलकर पटक देते थे। इस तरह दोनों दोनोंको अपनी ओर खींचते और घुटनोंसे एक-दूसरेपर प्रहार करते थे। उस सामूहिक उत्सवमें पहलवानों और जनसमुदायके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। राजन्! इन्द्र और वृत्रासुरके समान भीम और जीमूतके उस मल्लयुद्धमें सब लोगोंका बड़ा मनोरंजन हुआ। सभी दर्शक जीतनेवालेका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे ।। ३०—३२ ।।
ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् ।
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ ।
बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ।। ३३ ।।
चकर्ष दोर्भ्यामुत्पाट्य भीमो मल्लममित्रहा ।
निनदन्तमभिक्रोशन् शार्दूल इव वारणम् ।। ३४ ।।
समुद्यम्य महाबाहुर्भ्रामयामास वीर्यवान् ।
ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मयं चक्रिरे परम् ।। ३५ ।।
तदनन्तर चौड़ी छाती और लंबी भुजावाले, कुश्तीके दाँव-पेचमें कुशल वे दोनों वीर गम्भीर गर्जनाके साथ एक-दूसरेको डाँट बताते हुए लोहेके परिघ (मोटे डंडे)-जैसी बाँहोंसे बाँहें मिलाकर परस्पर भिड़ गये। फिर विपुलपराक्रमी शत्रुहन्ता महाबाहु भीमसेनने गर्जना करते हुए, जैसे सिंह हाथीपर झपटे, उसी प्रकार झपटकर जीमूतको दोनों हाथोंसे पकड़कर खींचा और ऊपर उठाकर उसे घुमाना आरम्भ किया। यह देख वहाँ आये हुए पहलवानों तथा मत्स्यदेशकी प्रजाको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ३३—३५ ।।
भ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् । प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ॥ ३६ ॥ सौ बार घुमानेपर जब वह धैर्य, साहस और चेतनासे भी हाथ धो बैठा, तब बड़ी-बड़ी बाहुओंवाले वृकोदरने उसे पृथ्वीपर गिराकर मसल डाला ॥ ३६ ॥
तस्मिन् विनिहते वीरे जीमूते लोकविश्रुते । विराटः परमं हर्षमगच्छद् बान्धवैः सह ॥ ३७ ॥ इस प्रकार उस लोकविख्यात वीर जीमूतके मारे जानेपर राजा विराटको अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३७ ॥
प्रहर्षात् प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः । बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३८ ॥ उस समय कुबेरके समान महामनस्वी राजा विराटने अत्यन्त हर्षमें भरकर बल्लवको उस विशाल रंगभूमिमें ही बहुत धन दिया ॥ ३८ ॥
एवं स सुबहून् मल्लान् पुरुषांश्च महाबलान् । विनिघ्नन् मत्स्यराजस्य प्रीतिमाहरदुत्तमाम् ॥ ३९ ॥ इसी तरह बहुत-से पहलवानों और महाबली पुरुषोंको मारकर भीमसेनने मत्स्यनरेश विराट्का उत्तम प्रेम प्राप्त किया ॥ ३९ ॥
यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित् तत्र विद्यते । ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् ॥ ४० ॥
जब वहाँ उनकी जोड़का कोई पहलवान नहीं रह गया, तब विराट उन्हें व्याघ्रों, सिंहों और हाथियोंसे लड़ाने लगे ॥ ४० ॥ पुनरन्तःपुरगतः स्त्रीणां मध्ये वृकोदरः । योध्यते स विराटेन सिंहैर्मत्तैर्महाबलैः ॥ ४१ ॥ कभी-कभी विराटकी प्रेरणासे स्त्रियोंके अन्तःपुरमें जाकर भीमसेन उन्हें दिखानेके लिये महान् बलवान् और मतवाले सिंहोंके साथ लड़ा करते थे ॥ ४१ ॥ बीभत्सुरपि गीतेन स्वनृत्येन च पाण्डवः । विराटं तोषयामास सर्वांश्चान्तःपुरस्त्रियः ॥ ४२ ॥ पाण्डुनन्दन अर्जुनने भी अपने गीत और नृत्यसे राजा विराट तथा अन्तःपुरकी सम्पूर्ण स्त्रियोंको संतुष्ट कर लिया था ॥ ४२ ॥ अश्वैर्विनीतैर्जवनैस्तत्र तत्र समागतैः । तोषयामास राजानं नकुलो नृपसत्तमम् ॥ ४३ ॥ तस्मै प्रदेयं प्रायच्छत् प्रीतो राजा धनं बहु । विनीतान् वृषभान् दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभितः । धनं ददौ बहुविधं विराटः पुरुषर्षभः ॥ ४४ ॥ इसी प्रकार नकुलने जहाँ-तहाँसे आये हुए वेगवान् घोड़ोंको सुशिक्षित करके नृपश्रेष्ठ विराटको प्रसन्न किया था। प्रसन्न होकर राजाने पुरस्काररूपमें उन्हें बहुत धन दिया था। इसी तरह सहदेवके द्वारा शिक्षित एवं विनीत किये हुए बैलोंको देखकर नरश्रेष्ठ विराट्ने उन्हें भी इनाममें बहुत धन दिया ॥ ४३-४४ ॥ द्रौपदी प्रेक्ष्य तान् सर्वान् क्लिश्यमानान् महारथान् । नातिप्रीतमना राजन् निःश्वासपरमाभवत् ॥ ४५ ॥ राजन्! अपने सम्पूर्ण महारथी पतियोंको इस प्रकार क्लेश उठाते देख द्रौपदीके मनमें खेद होता था और वह लंबी साँसें भरती रहती थी ॥ ४५ ॥ एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः पुरुषर्षभाः । कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा ॥ ४६ ॥ इस प्रकार वे पुरुषशिरोमणि पाण्डव उस समय राजा विराटके भिन्न-भिन्न कार्य संभालते हुए वहाँ छिपकर रहते थे ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि समयपालनपर्वणि जीमूतवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत समयपालनपर्वमें जीमूतवधसम्बन्धी तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
१- प्रमाथ तथा उन्मथन आदि मल्लयुद्धके दाँव-पेचोंके नाम हैं। इनकी व्याख्या नीलकण्ठी आदि टीकाओंमें मल्लशास्त्रके अनुसार इस प्रकार दी गयी है— निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाथ इति कथ्यते । यत् तूत्थायाङ्गथनं तदुन्मथनमुच्यते ।। १- क्षेपणं कथ्यते यत् तु स्थानात् प्रच्यावनं हठात् ।। २- उभयोर्भुजयोर्मुष्टिरुरोमध्ये निपात्यते । मुष्टिरित्युच्यते तज्ज्ञैर्मल्लविद्याविशारदैः ।। ३- अवाङ्मुखं स्कन्धगतं भ्रामयित्वा तदैव यः । क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद् वराहोद्धूतनिःस्वनः ।। ४- तर्जन्यङ्गुष्ठमध्येन प्रसारितकरो हि यः । सम्प्रहारतलाख्यस्तु संग्राहो वज्रमिष्यते ।। ५- अङ्गुल्यः प्रसृता यास्तु ताः प्रसृष्टा उदीरिताः ।। ६- आकृष्य क्रोडीकरणं प्रकर्षणमुदाहृतम् । आकर्षणं लीलयैव सम्मुखीकरणं स्मृतम् ।। पुरः पश्चात् पार्श्वयोश्चाभ्याकर्षो भ्रमणं तथा । पश्चात् प्रपातनं वेगाद् विकर्षणमुदाहृतम् ।।
(कीचकवधपर्व)
(कीचकवधपर्व)
चतुर्दशोऽध्यायः
कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना
वैशम्पायन उवाच
वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा ।
महारथेषु छन्नेषु मासा दश समाययुः ॥ १ ॥
याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशाम्पते ।
आवसत् परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय कुन्तीके उन महारथी पुत्रोंको मत्स्यराजके नगरमें छिपकर रहते हुए धीरे-धीरे दस महीने बीत गये। राजन्! यज्ञसेनकुमारी द्रौपदी, जो स्वयं स्वामिनीकी भाँति सेवाके योग्य थी, रानी सुदेष्णाकी शुश्रूषा करती हुई बड़े कष्टसे वहाँ रहती थी ॥ १-२ ॥
तथा चरन्ती पाञ्चाली सुदेष्णाया निवेशने ।
तां देवीं तोषयामास तथा चान्तःपुरस्त्रियः ॥ ३ ॥
सुदेष्णाके महलमें पूर्वोक्तरूपसे सेवा करती हुई पांचालीने महारानी तथा अन्तःपुरकी अन्य स्त्रियोंको पूर्ण प्रसन्न कर लिया ॥ ३ ॥
तस्मिन् वर्षे गतप्राये कीचकस्तु महाबलः ।
सेनापतिर्विराटस्य ददर्श द्रुपदात्मजाम् ॥ ४ ॥
जब वह वर्ष पूरा होनेमें कुछ ही समय बाकी रह गया, तबकी बात है; एक दिन राजा विराटके सेनापति महाबली कीचकने द्रुपदकुमारीको देखा ॥ ४ ॥
तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव ।
कीचकः कामयामास कामबाणप्रपीडितः ॥ ५ ॥
राजमहलमें देवांगनाकी भाँति विचरती हुई देवकन्याके समान कान्तिवाली द्रौपदीको देखकर कीचक कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित हो उसे चाहने लगा ॥ ५ ॥
स तु कामाग्निसंतप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै ।
प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
कामवासनाकी आगमें जलता हुआ सेनापति कीचक अपनी बहिन रानी सुदेष्णाके पास गया और हँसता हुआ-सा उससे इस प्रकार बोला- ॥ ६ ॥
नेयं मया जातु पुरेह दृष्टा
राज्ञो विराटस्य निवेशने शुभा ।
रूपेण चोन्मादयतीव मां भृशं
गन्धेन जाता मदिरेव भामिनी ॥ ७ ॥
‘सुदेष्णे! यह सुन्दरी जो अपने रूपसे मुझे अत्यन्त उन्मत्त-सा किये देती है, पहले कभी राजा विराटके इस महलमें मेरे द्वारा नहीं देखी गयी थी। यह भामिनी अपनी दिव्य गन्धसे मेरे लिये मदिरा-सी मादक हो रही है ॥ ७ ॥
का देवरूपा हृदयङ्गमा शुभे
ह्याचक्ष्व मे कस्य कुतोऽत्र शोभने ।
चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे
न चान्यदत्रौषधमस्ति मे मतम् ॥ ८ ॥
‘शुभे! यह कौन है? इसका रूप देवांगनाके समान है। यह मेरे हृदयमें समा गयी है। शोभने! मुझे बताओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे आयी है? यह मेरे मनको मथकर मुझे वशमें किये लेती है। मेरे इस रोगकी ओषधि इसकी प्राप्तिके सिवा दूसरी कोई नहीं जान पड़ती ॥ ८ ॥
अहो तवेयं परिचारिका शुभा
प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामियम् ।
अयुक्तरूपं हि करोति कर्म ते
प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किंचन ॥ ९ ॥
‘अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह सुन्दरी तुम्हारे यहाँ दासीका काम कर रही है। मुझे ऐसा लगता है, इसका रूप नित्य नवीन है। तुम्हारे यहाँ जो काम यह करती है, वह इसके योग्य कदापि नहीं है। मैं चाहता हूँ, यह मेरी गृहस्वामिनी होकर मुझपर और मेरे पास जो कुछ है, उसपर भी एकच्छत्र शासन करे ॥ ९ ॥
प्रभूतनागाश्वरथं महाजनं
समृद्धियुक्तं बहुपानभोजनम् ।
मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं
गृहं महच्छोभयतामियं मम ॥ १० ॥
‘मेरे घरमें बहुत-से हाथी, घोड़े और रथ हैं, बहुत-से सेवा करनेवाले परिजन हैं तथा उसमें प्रचुर सम्पत्ति भरी है। भोजन और पेयकी उसमें अधिकता है। देखनेमें भी वह मनोहर है। सुवर्णमय चित्र उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं। मेरे उस विशाल भवनमें चलकर यह सुन्दरी उसे सुशोभित करे’ ॥ १० ॥
ततः सुदेष्णामनुमन्त्र्य कीचक- स्ततः समभ्येत्य नराधिपात्मजाम् । उवाच कृष्णामभिसान्त्वयंस्तदा मृगेन्द्रकन्यामिव जम्बुको वने ॥ ११ ॥ तदनन्तर रानी सुदेष्णाकी सम्मति ले कीचक राजकुमारी द्रौपदीके पास आकर उसे सान्त्वना देता हुआ बोला; मानो वनमें कोई सियार किसी सिंहकी कन्याको फुसला रहा हो ॥ ११ ॥
का त्वं कस्यासि कल्याणि कुतो वा त्वं वरानने । प्राप्ता विराटनगरं तत् त्वमाचक्ष्व शोभने ॥ १२ ॥ (उसने द्रौपदीसे पूछा—) ‘कल्याणि! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? अथवा सुमुखि! तुम कहाँसे इस विराटनगरमें आयी हो? शोभने! ये सब बातें मुझे सच-सच बताओ ॥ १२ ॥
रूपमग्र्यं तथा कान्तिः सौकुमार्यमनुत्तमम् । कान्त्या विभाति वक्त्रं ते शशाङ्क इव निर्मलम् ॥ १३ ॥ ‘तुम्हारा यह श्रेष्ठ और सुन्दर रूप, यह दिव्य कान्ति और यह सुकुमारता संसारमें सबसे उत्तम है और तुम्हारा निर्मल मुख तो अपनी छविसे निष्कलंक चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहा है ॥ १३ ॥
नेत्रे सुविपुले सुभ्रु पद्मपत्रनिभे शुभे । वाक्यं ते चारुसर्वाङ्गि परपुष्टरुतोपमम् ॥ १४ ॥ ‘सुन्दर भौंहोंवाली सर्वांगसुन्दरी! तुम्हारे ये उत्तम और विशाल नेत्र कमलदलके समान सुशोभित हैं। तुम्हारी वाणी क्या है; कोकिलकी कूक है ॥ १४ ॥
एवंरूपा मया नारी काचिदन्या महीतले । न दृष्टपूर्वा सुश्रोणि यादृशी त्वमनिन्दिते ॥ १५ ॥ ‘सुश्रोणि! अनिन्दिते! जैसी तुम हो, ऐसे मनोहर रूपवाली कोई दूसरी स्त्री इस पृथ्वीपर मैंने आजसे पहले कभी नहीं देखी थी ॥ १५ ॥
लक्ष्मीः पद्मालया का त्वमथ भूतिः सुमध्यमे । ह्रीः श्रीः कीर्तिरथो कान्तिरासां का त्वं वरानने ॥ १६ ॥ ‘सुमध्यमे! तुम कमलोंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हो अथवा साकार विभूति? सुमुखि! लज्जा, श्री, कीर्ति और कान्ति—इन देवियोंमेंसे तुम कौन हो? ॥ १६ ॥
अतीवरूपिणी किं त्वमनङ्गाङ्गविहारिणी । अतीव भ्राजसे सुभ्रु प्रभेवेन्दोरनुत्तमा ॥ १७ ॥ ‘क्या तुम कामदेवके अंगोंसे क्रीड़ा करनेवाली अतिशय रूपवती रति हो? सुभ्रु! तुम चन्द्रमाकी परम उत्तम प्रभाके समान अत्यन्त उद्भासित हो रही हो ॥
अपि चेक्षणपक्ष्माणां स्मितं ज्योत्स्नोपमं शुभम् । दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम् ॥ १८ ॥ निरीक्ष्य वक्त्रचन्द्रं ते लक्ष्म्यानुपमया युतम् । कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत् ॥ १९ ॥ ‘तुम्हारा सुन्दर मुखचन्द्र अनुपम लक्ष्मीसे अलंकृत है, तुम्हारे नेत्रोंकी अधखुली पलकें चाँदनीके समान मनको आह्लादित करनेवाली हैं। दिव्य रश्मियोंसे आवृत्त तुम्हारा यह मुखचन्द्र दिव्य छबिके द्वारा मनको रमा लेनेवाला है। इसे देखकर सम्पूर्ण जगत्में कौन ऐसा पुरुष है, जो कामके अधीन न हो जाय? ॥ १८-१९ ॥
हारालंकारयोग्यौ तु स्तनौ चोभौ सुशोभनौ । सुजातौ सहितौ लक्ष्म्या पीनौ वृत्तौ निरन्तरौ ॥ २० ॥ ‘तुम्हारे दोनों सान हार आदि आभूषणोंके योग्य और परम सुन्दर हैं। ये ऊँचे, श्रीसम्पन्न, स्थूल, गोल-गोल और परस्पर सटे हुए हैं ॥ २० ॥
कुड्मलाम्बुरुहाकारौ तव सुभ्रु पयोधरौ । कामप्रतोदाविव मां तुदतश्चारुहासिनि ॥ २१ ॥ ‘सुन्दर भौंहों तथा मनोरम मुसकानवाली सुन्दरी! कमलकोशके समान आकारवाले तुम्हारे दोनों उरोज कामदेवके चाबुककी भाँति मुझे पीड़ा दे रहे हैं ॥ २१ ॥
वलीविभङ्गचतुरं स्तनभारविनामितम् । कराग्रसम्मितं मध्यं तवेदं तनुमध्यमे ॥ २२ ॥ ‘तनुमध्यमे! तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि हाथोंके अग्रभागसे (अँगूठेसे लेकर तर्जनीतकके बित्तेसे) माप ली जा सकती है। वह त्रिवलीकी तीन रेखाओंसे परम सुन्दर दीखती है। तुम्हारे स्तनोंके भारने उसे कुछ झुका दिया है ॥ २२ ॥
दृष्ट्वैव चारु जघनं सरित्पुलिनसंनिभम् । कामव्याधिरसाध्यो मामप्याक्रामति भामिनि ॥ २३ ॥ ‘भामिनि! नदीके दो किनारोंके समान तुम्हारे मनोहर जघनको देख लेनेसे ही कामरूपी असाध्य रोग मुझ-जैसे वीरपर भी आक्रमण कर रहा है ॥ २३ ॥
जज्वाल चाग्निमदनो दावानलिरिव निर्दयः । त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम् ॥ २४ ॥ ‘निर्दयी कामदेव अग्निस্বরূপ होकर दावानलकी भाँति मेरे हृदयरूपी वनमें जल उठा है। तुम्हारे समागमका संकल्प इसमें घीका काम करता है। इससे अत्यन्त प्रज्वलित होकर यह काम मुझे जला रहा है ॥ २४ ॥
आत्मप्रदानवर्षेण संगमाम्भोधरेण च । शमयस्व वरारोहे ज्वलन्तं मन्मथानलम् ॥ २५ ॥
'वरारोहे! तुम अपने संगमरूपी मेघसे आत्म-समर्पणरूपी वर्षाद्वारा इस प्रज्वलित
मदनाग्निको बुझा दो ।।
मच्चित्तोन्मादनकरा मन्मथस्य शरोत्कराः ।
त्वत्संगमाशानिशितास्तीव्रा शशिनिभानने ।
मह्यं विदार्य हृदयमिदं निर्दयवेगिताः ।। २६ ।।
प्रविश ह्यसितापाङ्गि प्रचण्डाश्चण्डदारुणाः ।
अत्युन्मादसमारम्भाः प्रीत्युन्मादकरा मम ।
आत्मप्रदानसम्भोगैर्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ।। २७ ।।
'चन्द्रमुखी! मेरे मनको उन्मत्त बना देनेवाले कामदेवके बाणसमूह तुम्हारे समागमकी
आशारूपी शानपर चढ़कर अत्यन्त तीखे और तीव्र हो गये हैं। कजरारे नयनप्रान्तोंवाली
सुन्दरी! अत्यन्त क्रोधपूर्वक चलाये हुए कामके वे प्रचण्ड एवं भयंकर बाण दयाशून्य हो
वेगसे आकर मेरे इस हृदयको विदीर्ण करके भीतर घुस गये हैं और अतिशय उन्माद
(सन्निपातजनित बेहोशी) पैदा कर रहे हैं। वे मेरे लिये प्रेमोन्मादजनक हो रहे हैं। अब तुम्हीं
आत्मदान-जनित सम्भोगरूप औषधके द्वारा यहाँ मेरा उद्धार कर सकती हो ।। २६-२७ ।।
चित्रमाल्याम्बरधरा सर्वाभरणभूषिता ।
कामं प्रकामं सेव त्वं मया सह विलासिनि ।। २८ ।।
'विलासिनि! विचित्र माला और सुन्दर वस्त्र धारण करके समस्त आभूषणोंसे विभूषित
हो मेरे साथ अतिशय कामभोगका सेवन करो ।। २८ ।।
नार्हसीहासुखं वस्तुं सुखार्हा सुखवर्जिता ।
प्राप्नुह्यनुत्तमं सौख्यं मत्तस्त्वं मत्तगामिनि ।। २९ ।।
'यहाँ अनेक प्रकारके कष्ट हैं। अतः तुम ऐसे स्थानमें निवास करने योग्य नहीं हो। तुम
सुख भोगनेके योग्य हो, किंतु यहाँ सुखसे वंचित हो। मस्तीभरी चालसे चलनेवाली सैरन्ध्री!
तुम मुझसे सर्वोत्तम सुखभोग प्राप्त करो' ।। २९ ।।
स्वादून्यमृतकल्पानि पेयानि विविधानि च ।
पिबमाना मनोज्ञानि रममाणा यथासुखम् ।। ३० ।।
'अमृतके समान स्वादिष्ट और मनोहर भाँति-भाँतिके पेय रसोंका पान करती हुई तुम्हें
जैसे सुख मिले, उसी प्रकार रमण करो ।। ३० ।।
भोगोपचारान् विविधान् सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम् ।
पानं पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ।। ३१ ।।
इदं हि रूपं प्रथमं तवानघे
निरर्थकं केवलमद्य भामिनि ।
अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा शुभा
न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ।। ३२ ।।
‘महाभागे! नाना प्रकारकी भोग-सामग्री तथा सर्वोत्तम सौभाग्य पाकर उत्तमोत्तम शुभ भोगोंके साथ पीने योग्य रसोंका आस्वादन करो। अनघे! तुम्हारा यह सर्वोत्कृष्ट रूप-सौन्दर्य आजकी परिस्थितिमें केवल व्यर्थ जा रहा है। भामिनि! जैसे उत्तम हारको यदि किसीने गलेमें धारण नहीं किया, तो उसकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार सुन्दरि! तुम शुभस्वरूपा और शोभामयी होकर भी किसीके गलेका हार न बन सकनेके कारण सुशोभित नहीं होती हो ।। ३१-३२ ।।
त्यजामि दारान् मम ये पुरातना
भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि ।
अहं च ते सुन्दरि दासवत् स्थितः
सदा भविष्ये वशगो वरानने ।। ३३ ।।
‘चारुहासिनि! यदि तुम चाहो तो मैं पहली स्त्रियोंको त्याग दूँगा अथवा वे सब तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी। सुन्दरि! सुमुखि! मैं स्वयं भी दासकी भाँति सदा तुम्हारे अधीन रहूँगा’ ।। ३३ ।।
द्रौपद्युवाच
अप्राार्थनीयामिह मां सूतपुत्राभिमन्यसे ।
निहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिणीम् ।। ३४ ।।
**द्रौपदीने कहा—**सूतपुत्र! तुम मुझे चाहते हो। छिः छिः; मुझसे इस तरहकी याचना करना तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है। एक तो मेरी जाति छोटी है, दूसरे मैं सैरन्ध्री (दासी) हूँ, बीभत्स वेशवाली स्त्री हूँ तथा केश सँवारनेका काम करनेवाली एक तुच्छ सेविका हूँ ।। ३४ ।।
(स्वेषु दारेषु मेधावी कुरुते यत्नमुत्तमम् ।
स्वदारनिरतो ह्याशु नरो भद्राणि पश्यति ।।
बुद्धिमान् पुरुष अपनी पत्नीको ही अनुकूल बनाये रखनेके लिये उत्तम यत्न करता है। अपनी स्त्रीमें अनुराग रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही कल्याणका भागी होता है।
न चाधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात् ।
स्वदारेषु रतिर्धर्मो मृतस्यापि न संशयः ।।
मनुष्यको चाहिये कि वह पापमें लिप्त न हो, अपयशका पात्र न बने, अपनी ही पत्नीके प्रति अनुराग रखना परम धर्म है। वह मृत पुरुषके लिये भी कल्याणकारी होता है, इसमें संशय नहीं है।
स्वजातिदारा मर्त्यस्य इहलोके परत्र च ।
प्रेतकार्याणि कुर्वन्ति निवापैस्तर्पयन्ति च ।।
अपनी जातिकी स्त्रियाँ मनुष्यके लिये इहलोक और परलोकमें भी हितकारिणी होती हैं। वे प्रेतकार्य (अन्त्येष्टि-संस्कार) करती और जलांजलि देकर मृतात्माको तृप्त करती हैं।
तदक्षयं च धर्म्यं च स्वर्ग्यमाहुर्मनीषिणः ।
स्वजातिदारजाः पुत्रा जायन्ते कुलपूजिताः ॥
उनके इस कार्यको मनीषी पुरुषोंने अक्षय, धर्मसंगत एवं स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला बताया है। अपनी जातिकी स्त्रीसे उत्पन्न हुए पुरुष कुलमें सम्मानित होते हैं।
प्रिया हि प्राणिनां दारास्तस्मात् त्वं धर्मभाग् भव ।
परदाररतो मर्त्यो न च भद्राणि पश्यति ॥)
सभी प्राणियोंको अपनी ही पत्नी प्यारी होती है। इसलिये तुम भी ऐसा करके धर्मके भागी बनो। परस्त्रीलम्पट पुरुष कभी कल्याण नहीं देखता।
परदारास्मि भद्रं ते न युक्तं तव साम्प्रतम् ।
दयिताः प्राणिनां दारा धर्मं समनुचिन्तय ॥ ३५ ॥
सबसे बड़ी बात यह है कि मैं दूसरेकी पत्नी हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। इस समय मुझसे इस तरहकी बातें करना तुम्हारे लिये किसी तरह उचित नहीं है। जगत्के सब प्राणियोंके लिये अपनी ही स्त्री प्रिय होती है। तुम धर्मका विचार करो ॥ ३५ ॥
परदारे न ते बुद्धिर्जातु कार्या कथंचन ।
विवर्जनं ह्यकार्याणामेतत् सुपुरुषव्रतम् ॥ ३६ ॥
परायी स्त्रीमें तुम्हें कभी किसी तरह भी मन नहीं लगाना चाहिये। न करने योग्य अनुचित कर्मोंको सर्वथा त्याग दिया जाय, यही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है ॥ ३६ ॥
मिथ्याभिगृध्नो हि नरः पापात्मा मोहमास्थितः ।
अयशः प्राप्नुयाद् घोरं महद् वा प्राप्नुयाद् भयम् ॥ ३७ ॥
झूठे विषयोंमें आसक्त होनेवाला पापात्मा मनुष्य मोहमें पड़कर भयंकर अपयश पाता है अथवा उसे बड़े भारी भय (मृत्यु) का सामना करना पड़ता है ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु सैरन्ध्र्या कीचकः काममोहितः ।
जानन्नपि सुदुर्बुद्धिः परदाराभिमर्शने ॥ ३८ ॥
दोषान् बहून् प्राणहरान् सर्वलोकविगर्हितान् ।
प्रोवाचेदं सुदुर्बुद्धिर्द्रौपदीमजितेन्द्रियः ॥ ३९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सैरन्ध्रीके इस प्रकार समझानेपर भी कीचकको होश न हुआ। वह कामसे मोहित हो रहा था। यद्यपि उस दुर्बुद्धिको यह मालूम था कि परायी स्त्रीके स्पर्शसे बहुत-से ऐसे दोष प्रकट होते हैं, जिनकी सब लोग निन्दा करते हैं तथा
जिनके कारण प्राणोंसे भी हाथ धोना पड़ता है; तो भी उस अजितेन्द्रिय तथा अत्यन्त दुर्बुद्धिने द्रौपदीसे इस प्रकार कहा— ॥ ३८-३९ ॥
नार्हस्येवं वरारोहे प्रत्याख्यातुं वरानने ।
मां मन्मथसमाविष्टं त्वत्कृते चारुहासिनि ॥ ४० ॥
‘वरारोहे! सुमुखि! तुम्हें इस प्रकार मेरी प्रार्थना नहीं ठुकरानी चाहिये! चारुहासिनि! मैं तुम्हारे लिये कामवेदनासे पीड़ित हूँ ॥ ४० ॥
प्रत्याख्याय च मां भीरु वशगं प्रियवादिनम् ।
नूनं त्वमसितापाङ्गि पश्चात्तापं करिष्यसि ॥ ४१ ॥
‘भीरु! मैं तुम्हारे वशमें हूँ और प्रिय वचन बोलता हूँ। कजरारे नयनोंवाली सैरन्ध्री! मुझे ठुकराकर तुम निश्चय ही पश्चात्ताप करोगी ॥ ४१ ॥
अहं हि सुभ्रु राज्यस्य कृत्स्नस्यास्य सुमध्यमे ।
प्रभुर्वासयिता चैव वीर्ये चाप्रतिमः क्षितौ ॥ ४२ ॥
‘सुभ्रू! सुमध्यमे! मैं इस सम्पूर्ण राज्यका स्वामी और इसे बसानेवाला हूँ। बल और पराक्रममें इस पृथ्वीपर मेरी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ४२ ॥
पृथिव्यां मत्समो नास्ति कश्चिदन्यः पुमानिह ।
रूपयौवनसौभाग्यैर्भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ॥ ४३ ॥
‘रूप, यौवन, सौभाग्य और सर्वोत्तम शुभ भोगोंकी दृष्टिसे इस भूतलपर मेरी समता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ ४३ ॥
सर्वकामसमृद्धेषु भोगेष्वनुपमेष्विह ।
भोक्तव्येषु च कल्याणि कस्माद् दास्ये रता ह्यसि ॥ ४४ ॥
‘कल्याणि! जब सम्पूर्ण मनोरथोंसे सम्पन्न अनुपम भोग यहाँ भोगनेके लिये तुम्हें सुलभ हो रहे हैं, तब तुम दासीपनमें क्यों आसक्त हो? ॥ ४४ ॥
मया दत्तमिदं राज्यं स्वामिन्यसि शुभानने ।
भजस्व मां वरारोहे भुङ्क्ष्व भोगाननुत्तमान् ॥ ४५ ॥
‘शुभानने! मैंने यह सम्पूर्ण राज्य तुम्हें अर्पित कर दिया। अब तुम्हीं इसकी स्वामिनी हो। वरारोहे! मुझे अपना लो और मेरे साथ उत्तमोत्तम भोगोंका उपभोग करो’ ॥ ४५ ॥
एवमुक्ता तु सा साध्वी कीचकेनाशुभं वचः ।
कीचकं प्रत्युवाचेदं गर्हयन्त्यस्य तद् वचः ॥ ४६ ॥
कीचकके इस प्रकार अशुभ (पापपूर्ण) वचन कहनेपर सती-साध्वी द्रौपदीने उसकी उन ओछी बातोंकी निन्दा करते हुए इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ४६ ॥
सैरन्ध्र्युवाच
मा सूतपुत्र मुह्यस्व माद्य त्यक्ष्यस्व जीवितम् ।
जानीहि पञ्चभिर्घोरैर्नित्यं मामभिरक्षिताम् ॥ ४७ ॥ **सैरन्ध्री बोली—**सूतपुत्र! तू आज इस प्रकार मोहके फंदेमें न पड़। अपनी जान न गँवा। तुझे मालूम होना चाहिये कि पाँच भयंकर गन्धर्व मेरी नित्य रक्षा करते हैं ॥ ४७ ॥
न चाप्यहं त्वया लभ्या गन्धर्वाः पतयो मम । ते त्वां निहन्युः कुपिताः साध्वलं मा व्यनीनशः ॥ ४८ ॥ वे गन्धर्व ही मेरे पति हैं। तू कदापि मुझे पा नहीं सकता। मेरे पति कुपित होकर तुझे मार डालेंगे; अतः सँभल जा। इस पापबुद्धिका त्याग कर दे। अपना सर्वनाश न करा ॥ ४८ ॥
अशक्यरूपं पुरुषैरध्वानं गन्तुमिच्छसि । यथा निश्चेतनो बालः कूलस्थः कूलमुत्तरम् । तर्तुमिच्छति मन्दात्मा तथा त्वं कर्तुमिच्छसि ॥ ४९ ॥ अरे! तू उस राहपर जाना चाहता है, जहाँ दूसरे पुरुष नहीं जा सकते। जैसे नदीके एक किनारेपर बैठा हुआ कोई मन्दबुद्धि अचेत बालक दूसरे किनारेपर तैरकर जाना चाहता हो, वैसा ही विनाशकारी कार्य तू भी करना चाहता है ॥ ४९ ॥
अन्तर्महीं वा यदि वोर्ध्वमुत्पतेः समुद्रपारं यदि वा प्रधावसि ।