महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
त्वं हि संहारबुद्ध्याथ प्रादुर्भूता रुषो मम । तस्मात् संहर सर्वांस्त्वं प्रजाः सजडपण्डिताः ॥ २१ ॥ मम त्वं हि नियोगेन ततः श्रेयो ह्यवाप्स्यसि । ‘देवि! तू संहारबुद्धिसे मेरे रोषद्वारा प्रकट हुई है, इसलिये मूर्ख और पण्डित सभी प्रजाओंका संहार करती रह, मेरी आज्ञासे तुझे यह कार्य करना होगा। इससे तू कल्याण प्राप्त करेगी’ ।। २१ १/२ ।। एवमुक्ता तु सा तेन मृत्युः कमलोचना ॥ २२ ॥ दध्यौ चात्यर्थमबला प्ररुरोद च सुस्वरम् । ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वह मृत्युनामवाली कमलोचना अबला अत्यन्त चिन्तामग्न हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी ।। २२ १/२ ।। पाणिभ्यां प्रतिजग्राह तान्यश्रूणि पितामहः । सर्वभूतहितार्थाय तां चाप्यनुनयत् तदा ॥ २३ ॥
पितामह ब्रह्माने उसके उन आँसुओंको समस्त प्राणियोंके हितके लिये अपने दोनों हाथोंमें ले लिया और उस नारीको भी अनुनयसे प्रसन्न किया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि मृत्युकथने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें मृत्युवर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २३ १/३ श्लोक हैं)
मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार
चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
मृत्युकी घोर तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उसे वरकी प्राप्ति तथा नारद-अकम्पन-संवादका उपसंहार
नारद उवाच
विनीय दुःखमबला आत्मन्येव प्रजापतिम् ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा लतेवावर्जिता पुनः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वह अबला अपने भीतर ही उस दुःखको दबाकर झुकायी हुई लताके समान विनम्र हो हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे बोली ॥ १ ॥
मृत्युरुवाच
त्वया सृष्टा कथं नारी ईदृशी वदतां वर ।
क्रूरं कर्माहितं कुर्यां तदेव किमु जानती ॥ २ ॥
**मृत्युने कहा—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रजापते! आपने मुझे ऐसी नारीके रूपमें क्यों उत्पन्न किया? मैं जान-बूझकर वही क्रूरतापूर्ण अहितकर कर्म कैसे करूँ? ॥ २ ॥
बिभेम्यहमधर्माद्धि प्रसीद भगवन् प्रभो ।
प्रियान् पुत्रान् वयस्यांश्च भ्रातॄन् मातृः पितॄन् पतीन् ॥ ३ ॥
अपध्यास्यन्ति मे देव मृतेष्वेभ्यो बिभेम्यहम् ।
भगवन्! मैं पापसे डरती हूँ। प्रभो! मुझपर प्रसन्न होइये। जब मैं लोगोंके प्यारे पुत्रों, मित्रों, भाइयों, माताओं, पिताओं तथा पतियोंको मारने लगूँगी, देव! उस समय उनके सम्बन्धी इन लोगोंके मेरे द्वारा मारे जानेपर सदा मेरा अनिष्ट-चिन्तन करेंगे। अतः मैं इन सबसे बहुत डरती हूँ ॥ ३ ½ ॥
कृपणानां हि रुदतां ये पतन्त्यश्रुबिन्दवः ॥ ४ ॥
तेभ्योऽहं भगवन् भीता शरणं त्वाहुमागता ।
भगवन्! रोते हुए दीन-दुःखी प्राणियोंके नेत्रोंसे जो आँसुओंकी बूँदें गिरती हैं, उनसे भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ४ ½ ॥
यमस्य भवनं देव गच्छेयं न सुरोत्तम ॥ ५ ॥
कायेन विनयोपेता मूर्ध्नोदग्रनखेन च ।
एतदिच्छाम्यहं कामं त्वत्तो लोकपितामह ॥ ६ ॥
देव! सुरश्रेष्ठ! लोकपितामह! मैं शरीर और मस्तकको झुकाकर, हाथ जोड़कर विनीतभावसे आपकी शरणागत होकर केवल इसी अभिलाषाकी पूर्ति चाहती हूँ कि मुझे यमराजके भवनमें न जाना पड़े ॥ ५-६ ॥
इच्छेयं त्वत्प्रसादाद्धि तपस्तप्तुं प्रजेश्वर । प्रदिशेमं वरं देव त्वं मह्यं भगवन् प्रभो ॥ ७ ॥ प्रजेश्वर! मैं आपकी कृपासे तपस्या करना चाहती हूँ। देव! भगवन्! प्रभो! आप मुझे यही वर प्रदान करें ॥ ७ ॥
त्वया ह्युक्ता गमिष्यामि धेनुकाश्रममुत्तमम् । तत्र तप्स्ये तपस्तीव्रं तवैवाराधने रता ॥ ८ ॥ आपकी आज्ञा लेकर मैं उत्तम धेनुकाश्रमको चली जाऊँगी और वहाँ आपकी ही आराधनामें तत्पर रहकर कठोर तपस्या करूँगी ॥ ८ ॥
न हि शक्ष्यामि देवेश प्राणाम् प्राणभृतां प्रियान् । हर्तुं विलपमानानामधर्मादभिरक्ष माम् ॥ ९ ॥ देवेश्वर! मैं रोते-बिलखते प्राणियोंके प्यारे प्राणोंका अपहरण नहीं कर सकूँगी, आप इस अधर्मसे मुझे बचावें ॥ ९ ॥
ब्रह्मोवाच
मृत्यो संकल्पितासि त्वं प्रजासंहारहेतुना । गच्छ संहर सर्वास्त्वं प्रजा मा ते विचारणा ॥ १० ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**मृत्यो! प्रजाके संहारके लिये ही मेरे द्वारा संकल्पपूर्वक तेरी सृष्टि की गयी है। जा, तू सारी प्रजाका संहार कर। तेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ॥ १० ॥
भविता त्वेतदेवं हि नैतज्जात्वन्यथा भवेत् । भव त्वनिन्दिता लोके कुरुष्व वचनं मम ॥ ११ ॥ यह बात इसी प्रकार होनेवाली है। इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। तू लोकमें निन्दित न हो, मेरी आज्ञाका पालन कर ॥ ११ ॥
नारद उवाच
एवमुक्ताभवत् प्रीता प्राञ्जलिर्भगवन्मुखी । संहारे नाकरोद् बुद्धिं प्रजानां हितकाम्यया ॥ १२ ॥ **नारदजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर उन्हींकी ओर मुँह करके हाथ जोड़े खड़ी हुई वह नारी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई; परंतु उसने प्रजाके हितकी कामनासे संहार-कार्यमें मन नहीं लगाया ॥ १२ ॥
तूष्णीमासीत् तदा देवः प्रजानामीश्वरेश्वरः । प्रसादं चागमत् क्षिप्रमात्मनैव प्रजापतिः ॥ १३ ॥ तब प्रजेश्वरोंके भी स्वामी भगवान् ब्रह्मा चुप हो गये। फिर वे भगवान् प्रजापति तुरंत अपने-आप ही प्रसन्नताको प्राप्त हुए ॥ १३ ॥
स्मयमानश्च देवेशो लोकान् सर्वानवेक्ष्य च । लोकास्त्वासन् यथापूर्वं दृष्टास्तेनापमन्युना ॥ १४ ॥ देवेश्वर ब्रह्मा सम्पूर्ण लोकोंकी ओर देखकर मुसकराये। उन्होंने क्रोधशून्य होकर देखा, इसलिये वे सभी लोक पहलेके समान हरे-भरे हो गये ॥ १४ ॥ निवृत्तरोषे तस्मिंस्तु भगवत्यपराजिते । सा कन्यापि जगामाथ समीपात् तस्य धीमतः ॥ १५ ॥ उन अपराजित भगवान् ब्रह्माका रोष निवृत्त हो जानेपर वह कन्या भी उन परम बुद्धिमान् देवेश्वरके निकटसे अन्यत्र चली गयी ॥ १५ ॥ अपसृत्याप्रतिश्रुत्य प्रजासंहरणं तदा । त्वरमाणा च राजेन्द्र मृत्युर्धेनुकमभ्यगात् ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! उस समय प्रजाका संहार करनेके विषयमें कोई प्रतिज्ञा न करके मृत्यु वहाँसे हट गयी और बड़ी उतावलीके साथ धेनुकाश्रममें जा पहुँची ॥ १६ ॥ सा तत्र परमं तीव्रं चचार व्रतमुत्तमम् । सा तदा ह्येकपादेन तस्थौ पद्मानि षोडश ॥ १७ ॥ पञ्च चाब्दानि कारुण्यात् प्रजानां तु हितैषिणी । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः प्रियेभ्यः संनिवर्त्य सा ॥ १८ ॥ उसने वहाँ अत्यन्त कठोर और उत्तम व्रतका पालन आरम्भ किया। उस समय वह दयावश प्रजावर्गका हित करनेकी इच्छासे अपनी इन्द्रियोंको प्रिय विषयोंसे हटाकर इक्कीस पद्म वर्षोंतक एक पैरपर खड़ी रही ॥ १७-१८ ॥ ततस्त्वेकेन पादेन पुनरन्यानि सप्त वै । तस्थौ पद्मानि षट् चैव सप्त चैकं च पार्थिव ॥ १९ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर पुनः अन्य इक्कीस पद्म वर्षोंतक वह एक पैरसे खड़ी होकर तपस्या करती रही ॥ १९ ॥ ततः पद्मायुतं तात मृगैः सह चचार सा । पुनर्गत्वा ततो नन्दां पुण्यां शीतामलोदकाम् ॥ २० ॥ अप्सु वर्षसहस्राणि सप्त चैकं च सानयत् । तात! इसके बाद दस हजार पद्म वर्षोंतक वह मृगोंके साथ विचरती रही, फिर शीतल एवं निर्मल जलवाली पुण्यमयी नन्दानदीमें जाकर उसके जलमें उसने आठ हजार वर्ष व्यतीत किये ॥ २० १/२ ॥ धारयित्वा तु नियमं नन्दायां वीतकल्मषा ॥ २१ ॥ सा पूर्वं कौशिकीं पुण्यां जगाम नियमैधिता । तत्र वायुजलाहारा चचार नियमं पुनः ॥ २२ ॥
इस प्रकार नन्दानदीमें नियमोंके पालनपूर्वक रहकर वह निष्पाप हो गयी। तदनन्तर व्रत-नियमोंसे सम्पन्न हो मृत्यु पहले पुण्यमयी कौशिकीनदीके तटपर गयी और वहाँ वायु तथा जलका आहार करती हुई पुनः कठोर नियमोंका पालन करने लगी ॥ २१-२२ ॥
पञ्चगङ्गासु सा पुण्या कन्या वेतसकेषु च ।
तपोविशेषैर्बहुभिः कर्षयद् देहमात्मनः ॥ २३ ॥
उस पवित्र कन्याने पंचगंगामें तथा वेतसवनमें बहुत-सी भिन्न-भिन्न तपस्याओंद्वारा अपने शरीरको अत्यन्त दुर्बल कर दिया ॥ २३ ॥
ततो गत्वा तु सा गङ्गां महामेरुं च केवलम् ।
तस्थौ चाश्मेव निश्चेष्टा प्राणायामपरायणा ॥ २४ ॥
इसके बाद वह गंगाजीके तट और प्रमुख तीर्थ महामेरुके शिखरपर जाकर प्राणायाममें तत्पर हो प्रस्तर-मूर्तिकी भाँति निश्चेष्ट भावसे बैठी रही ॥ २४ ॥
पुनर्हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवाः पुरायजन् ।
तत्राङ्गुष्ठेन सा तस्थौ निखर्वं परमा शुभा ॥ २५ ॥
फिर हिमालयके शिखरपर जहाँ पहले देवताओंने यज्ञ किया था, वहाँ वह परम शुभलक्षणा कन्या एक निखर्व वर्षोंतक अँगूठेके बलपर खड़ी रही ॥ २५ ॥
पुष्करेष्वथ गोकर्णे नैमिषे मलये तथा ।
अपाकर्षत् स्वकं देहं नियमैर्मानसप्रियैः ॥ २६ ॥
तदनन्तर पुष्कर, गोकर्ण, नैमिषारण्य तथा मलयाचलके तीर्थोंमें रहकर मनको प्रिय लगनेवाले नियमोंद्वारा उसने अपने शरीरको अत्यन्त क्षीण कर दिया ॥ २६ ॥
अनन्यदेवता नित्यं दृढभक्ता पितामहे ।
तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास धर्मतः ॥ २७ ॥
दूसरे किसी देवतामें मन न लगाकर वह सदा पितामह ब्रह्मामें ही सुदृढ़ भक्तिभाव रखती थी। उस कन्याने अपने धर्माचरणसे पितामहको संतुष्ट कर लिया ॥ २७ ॥
ततस्तामब्रवीत् प्रीतो लोकानां प्रभवोऽव्ययः ।
सौम्येन मनसा राजन् प्रीतः प्रीतमनास्तदा ॥ २८ ॥
राजन्! तब लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत अविनाशी ब्रह्मा उस समय मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो सौम्य हृदयसे प्रीतिपूर्वक उससे बोले— ॥ २८ ॥
मृत्यो किमिदमत्यन्तं तपांसि चरसीति ह ।
ततोऽब्रवीत् पुनर्मृत्युर्भगवन्तं पितामहम् ॥ २९ ॥
‘मृत्यो! तू किसलिये इस प्रकार अत्यन्त कठोर तपस्या कर रही है?’ तब मृत्युने भगवान् पितामहसे फिर इस प्रकार कहा— ॥ २९ ॥
नाहं हन्यां प्रजा देव स्वस्थाश्चाक्रोशतीस्तथा ।
एतदिच्छामि सर्वेश त्वत्तो वरमहं प्रभो ॥ ३० ॥
'देव! प्रभो! सर्वेश्वर! मैं आपसे यही वर पाना चाहती हूँ कि मुझे रोती-चिल्लाती हुई स्वस्थ प्रजाओंका वध न करना पड़े ।। ३० ।। अधर्मभयभीतास्मि ततोऽहं तप आस्थिता । भीतायास्तु महाभाग प्रयच्छाभयमव्यय ।। ३१ ।। 'महाभाग! मैं अधर्मके भयसे बहुत डरती हूँ, इसलिये तपस्यामें लगी हुई हूँ। अविनाशी परमेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको अभय-दान दीजिये ।। ३१ ।। आर्ता चानागसी नारी याचामि भव मे गतिः । तामब्रवीत् ततो देवो भूतभव्यभविष्यवित् ।। ३२ ।। 'नाथ! मैं एक निरपराध नारी हूँ और आपके सामने आर्तभावसे याचना करती हूँ, आप मेरे आश्रयदाता हों।' तब भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता भगवान् ब्रह्माने उससे कहा — ।। ३२ ।। अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संहरन्त्या इमाः प्रजाः । मया चोक्तं मृषा भद्रे भविता न कथंचन ।। ३३ ।। 'मृत्यो! इन प्रजाओंका संहार करनेसे तुझे अधर्म नहीं होगा। भद्रे! मेरी कही हुई बात किसी प्रकार झूठी नहीं हो सकती ।। ३३ ।। तस्मात् संहर कल्याणि प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः । धर्मः सनातनश्च त्वां सर्वथा पावयिष्यति ।। ३४ ।। 'इसलिये कल्याणि! तू चार श्रेणियोंमें विभाजित समस्त प्राणियोंका संहार कर। सनातनधर्म तुझे सब प्रकारसे पवित्र बनाये रखेगा ।। ३४ ।। लोकपालो यमश्चैव सहाया व्याधयश्च ते । अहं च विबुधाश्चैव पुनर्दास्याम ते वरम् ।। ३५ ।। यथा त्वमेनसा मुक्ता विरजाः ख्यातिमेष्यसि । 'लोकपाल, यम तथा नाना प्रकारकी व्याधियाँ तेरी सहायता करेंगी। मैं और सम्पूर्ण देवता तुझे पुनः वरदान देंगे, जिससे तू पापमुक्त हो अपने निर्मल स्वरूपसे विख्यात होगी' ।। ३५ १/२ ।। सैवमुक्ता महाराज कृताञ्जलिरिदं विभुम् ।। ३६ ।। पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं प्रसाद्य शिरसा तदा । महाराज! उनके ऐसा कहनेपर मृत्यु हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रसन्न करके उस समय पुनः यह वचन बोली— ।। ३६ १/२ ।। यद्येवमेतत् कर्तव्यं मया न स्याद् विना प्रभो ।। ३७ ।। तवाज्ञा मूर्ध्नि मे न्यस्ता यत् ते वक्ष्यामि तच्छृणु ।
'प्रभो! यदि इस प्रकार यह कार्य मेरे बिना नहीं हो सकता तो आपकी आज्ञा मैंने शिरोधार्य कर ली है, परंतु इसके विषयमें मैं आपसे जो कुछ कहती हूँ, उसे (ध्यान देकर) सुनिये ।। ३७ १/२ ।। लोभः क्रोधोऽभ्यसूयेर्ष्या द्रोहो मोहश्च देहिनाम् ।। ३८ ।। अह्रीश्चान्योन्यपरुषा देहं भिन्द्युः पृथग्विधाः। 'लोभ, क्रोध, असूया, ईर्ष्या, द्रोह, मोह, निर्लज्जता और एक-दूसरेके प्रति कही हुई कठोर वाणी—ये विभिन्न दोष ही देहधारियोंकी देहका भेदन करें' ।। ३८ १/२ ।।
ब्रह्मोवाच
तथा भविष्यते मृत्यो साधु संहर भोः प्रजाः। अधर्मस्ते न भविता नापध्यास्याम्यहं शुभे ।। ३९ ।। ब्रह्माजीने कहा— मृत्यो! ऐसा ही होगा। तू उत्तम रीतिसे प्राणियोंका संहार कर। शुभे! इससे तुझे पाप नहीं लगेगा और मैं भी तेरा अनिष्ट-चिन्तन नहीं करूँगा ।। ३९ ।। यान्यश्रुबिन्दूनि करे ममासं- स्ते व्याधयः प्राणिनामात्मजाताः। ते मारयिष्यन्ति नरान् गतासून् नाधर्मस्ते भविता मा स्म भैषीः ।। ४० ।। तेरे आँसुओंकी बूँदें, जिन्हें मैंने हाथमें ले लिया था, प्राणियोंके अपने ही शरीरोंसे उत्पन्न हुई व्याधियाँ बनकर गतायु प्राणियोंका नाश करेंगी। तुझे अधर्मकी प्राप्ति नहीं होगी; इसलिये तू भय न कर ।। ४० ।। नाधर्मस्ते भविता प्राणिनां वै त्वं वै धर्मस्त्वं हि धर्मस्य चेशा। धर्म्या भूत्वा धर्मनित्या धरित्री तस्मात् प्राणान् सर्वथेमान् नियच्छ ।। ४१ ।। निश्चय ही, तुझे पाप नहीं लगेगा। तू प्राणियोंका धर्म और उस धर्मकी स्वामिनी होगी। अतः सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और धर्मानुकूल जीवन बितानेवाली धरित्री होकर इन समस्त जीवोंके प्राणोंका नियन्त्रण कर ।। ४१ ।। सर्वेषां वै प्राणिनां कामरोषौ संत्यज्य त्वं संहरस्वेह जीवान्। एवं धर्मस्त्वां भविष्यत्यनन्तो मिथ्यावृत्तान् मारयिष्यत्यधर्मः ।। ४२ ।। काम और क्रोधका परित्याग करके इस जगत्के समस्त प्राणियोंके प्राणोंका संहार कर। ऐसा करनेसे तुझे अक्षय धर्मकी प्राप्ति होगी। मिथ्याचारी पुरुषोंको तो उनका अधर्म
ही मार डालेगा ॥ ४२ ॥
तेनात्मानं पावयस्वात्मना त्वं
पापेऽऽत्मानं मज्जयिष्यन्त्यसत्यात् ।
तस्मात् कामं रोषमप्यागतं त्वं
संत्यज्यान्तः संहरस्वेति जीवान् ॥ ४३ ॥
तू धर्माचरणद्वारा स्वयं ही अपने-आपको पवित्र कर। असत्यका आश्रय लेनेसे प्राणी स्वयं अपने-आपको पापपंकमें डुबो लेंगे। इसलिये अपने मनमें आये हुए काम और क्रोधका त्याग करके तू समस्त जीवोंका संहार कर ॥ ४३ ॥
नारद उवाच
सा वै भीता मृत्युसंज्ञोपदेशा-
च्छापाद् भीता बाढमित्यब्रवीत् तम् ।
सा च प्राणं प्राणिनामन्तकाले
कामक्रोधौ त्यज्य हरत्यसक्ता ॥ ४४ ॥
**नारदजी कहते हैं—**राजन्! वह मृत्यु नामवाली नारी ब्रह्माजीके उस उपदेशसे और विशेषतः उनके शापके भयसे भीत होकर उनसे बोली—'बहुत अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है'। वही मृत्यु अन्तकाल आनेपर काम और क्रोधका परित्याग करके अनासक्तभावसे समस्त प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करती है ॥ ४४ ॥
मृत्युस्त्वेषां व्याधयस्तत्प्रसूता
व्याधी रोगो रुज्यते येन जन्तुः ।
सर्वेषां च प्राणिनां प्रायणान्ते
तस्माच्छोकं मा कृथा निष्फलं त्वम् ॥ ४५ ॥
यही प्राणियोंकी मृत्यु है, इसीसे व्याधियोंकी उत्पत्ति हुई है। व्याधि नाम है रोगका, जिससे प्राणी रुग्ण होता है (उसका स्वास्थ्य भंग होता है)। आयु समाप्त होनेपर सभी प्राणियोंकी मृत्यु इसी प्रकार होती है। अतः राजन्! तुम व्यर्थ शोक न करो ॥ ४५ ॥
सर्वे देवाः प्राणिभिः प्रायणान्ते
गत्वा वृत्ताः संनिवृत्तास्तथैव ।
एवं सर्वे प्राणिनस्तत्र गत्वा
वृत्ता देवा मर्त्यवद् राजसिंह ॥ ४६ ॥
आयुके अन्तमें सारी इन्द्रियाँ प्राणियोंके साथ परलोकमें जाकर स्थित होती हैं और पुनः उनके साथ ही इस लोकमें लौट आती हैं। नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार सभी प्राणी देवलोकमें जाकर वहाँ देवस्वरूपमें स्थित होते हैं तथा वे कर्मदेवता मनुष्योंकी भाँति भोगोंकी समाप्ति होनेपर पुनः इस लोकमें लौट आते हैं ॥ ४६ ॥
वायुर्भीमो भीमनादो महौजा भेत्ता देहान् प्राणिनां सर्वगोऽसौ । नो वाऽऽवृत्तिं नैव वृत्तिं कदाचित् प्राप्नोत्युग्रोऽनन्ततेजोविशिष्टः ॥ ४७ ॥ भयंकर शब्द करनेवाला महान् बलशाली भयानक प्राणवायु प्राणियोंके शरीरोंका ही भेदन करता है (चेतन आत्माका नहीं, क्योंकि) वह सर्वव्यापी, उग्र प्रभावशाली और अनन्त तेजसे सम्पन्न है। उसका कभी आवागमन नहीं होता ॥ ४७ ॥
सर्वे देवा मर्त्यसंज्ञाविशिष्टा- स्तस्मात् पुत्रं मा शुचो राजसिंह । स्वर्गं प्राप्तो मोदते ते तनूजो नित्यं रम्यान् वीरलोकानवाप्य ॥ ४८ ॥ राजसिंह! सम्पूर्ण देवता भी मर्त्य (मरणधर्मा) नामसे विभूषित हैं, इसलिये तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो। तुम्हारा पुत्र स्वर्गलोकमें जा पहुँचा है और नित्य रमणीय वीर-लोकोंमें रहकर आनन्दका अनुभव करता है ॥ ४८ ॥
त्यक्त्वा दुःखं संगतः पुण्यकृद्भि- रेषा मृत्युर्देवदिष्टा प्रजानाम् । प्राप्ते काले संहरन्ती यथावत् स्वयं कृता प्राणहरा प्रजानाम् ॥ ४९ ॥ वह दुःखका परित्याग करके पुण्यात्मा पुरुषोंसे जा मिला है। प्राणियोंके लिये यह मृत्यु भगवान्की ही दी हुई है; जो समय आनेपर यथोचितरूपसे (प्रजाजनोंका) संहार करती है। प्रजावर्गके प्राण लेनेवाली इस मृत्युको स्वयं ब्रह्माजीने ही रचा है ॥ ४९ ॥
आत्मानं वै प्राणिनो घ्नन्ति सर्वे नैतान् मृत्युर्दण्डपाणिर्हिनस्ति । तस्मान्मृतान् नानुशोचन्ति धीरा मृत्युं ज्ञात्वा निश्चयं ब्रह्मसृष्टम् । इत्थं सृष्टिं देवक्लृप्तां विदित्वा पुत्रान्नष्टाच्छोकमाशु त्यजस्व ॥ ५० ॥ सब प्राणी स्वयं ही अपने-आपको मारते हैं। मृत्यु हाथमें डंडा लेकर इनका वध नहीं करती है। अतः धीर पुरुष मृत्युको ब्रह्माजीका रचा हुआ निश्चित विधान समझकर मरे हुए प्राणियोंके लिये कभी शोक नहीं करते हैं। इस प्रकार ब्रह्माजीकी बनायी हुई सारी सृष्टिको ही मृत्युके वशीभूत जानकर तुम अपने पुत्रके मर जानेसे प्राप्त होनेवाले शोकका शीघ्र परित्याग कर दो ॥ ५० ॥
द्वैपायन उवाच
एतच्छ्रुत्वार्थवद् वाक्यं नारदेन प्रकाशितम् । उवाचाकम्पनो राजा सखायं नारदं तथा ॥ ५१ ॥ व्यासजी कहते हैं— युधिष्ठिर! नारदजीकी कही हुई यह अर्थभरी बात सुनकर राजा अकम्पन अपने मित्र नारदसे इस प्रकार बोले— ॥ ५१ ॥ व्यपेतशोकः प्रीतोऽस्मि भगवन्नृषिसत्तम । श्रुत्वेतिहासं त्वत्तस्तु कृतार्थोऽस्म्यभिवादये ॥ ५२ ॥ ‘भगवन्! मुनिश्रेष्ठ! आपके मुँहसे यह इतिहास सुनकर मेरा शोक दूर हो गया। मैं प्रसन्न और कृतार्थ हो गया हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ ॥ ५२ ॥ तथोक्तो नारदस्तेन राज्ञा ऋषिवरोत्तमः । जगाम नन्दनं शीघ्रं देवर्षिरमितात्मवान् ॥ ५३ ॥ राजा अकम्पनके इस प्रकार कहनेपर ऋषियोंमें श्रेष्ठतम अमितात्मा देवर्षि नारद शीघ्र ही नन्दन वनको चले गये ॥ ५३ ॥ पुण्यं यशस्यं स्वर्ग्यं च धन्यमायुष्यमेव च । अस्येतिहासस्य सदा श्रवणं श्रावणं तथा ॥ ५४ ॥ जो इस इतिहासको सदा सुनता और सुनाता है, उसके लिये यह पुण्य, यश, स्वर्ग, धन तथा आयु प्रदान करनेवाला है ॥ ५४ ॥ एतदर्थपदं श्रुत्वा तदा राजा युधिष्ठिर । क्षत्रधर्मं च विज्ञाय शूराणां च परां गतिम् ॥ ५५ ॥ सम्प्राप्तोऽसौ महावीर्यः स्वर्गलोकं महारथः । युधिष्ठिर! उस समय महारथी महापराक्रमी राजा अकम्पन इस उत्तम अर्थको प्रकाशित करनेवाले वृत्तान्तको सुनकर तथा क्षत्रियधर्म एवं शूरवीरोंकी परम गतिके विषयमें जानकर यथासमय स्वर्गलोकको प्राप्त हुए ॥ ५५ ॥ अभिमन्युः परान् हत्वा प्रमुखे सर्वधन्विनाम् ॥ ५६ ॥ युध्यमानो महेष्वासो हतः सोऽभिमुखो रणे । असिना गदया शक्त्या धनुषा च महारथः । विरजाः सोमसूनुः स पुनस्तत्र प्रलीयते ॥ ५७ ॥ महाधनुर्धर अभिमन्यु पूर्वजन्ममें चन्द्रमाका पुत्र था, वह महारथी वीर समरांगणमें समस्त धनुर्धरोंके सामने शत्रुओंका वध करके खड्ग, शक्ति, गदा और धनुषद्वारा सम्मुख युद्ध करता हुआ मारा गया है तथा दुःखरहित हो पुनः चन्द्रलोकमें ही चला गया है ॥ ५६-५७ ॥ तस्मात् परां धृतिं कृत्वा भ्रातृभिः सह पाण्डव । अप्रमत्तः सुसंनद्धः शीघ्रं योद्धुमुपाक्रम ॥ ५८ ॥
अतः पाण्डुनन्दन! तुम भाइयोंसहित उत्तम धैर्य धारण करके प्रमाद छोड़कर भलीभाँति कवच आदिसे सुसज्जित हो पुनः शीघ्र ही युद्धके लिये तैयार हो जाओ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि मृत्युप्रजापतिसंवादे चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें मृत्युप्रजापतिसंवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५४ ।।
अध्याय (पृष्ठ 400)
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
षोडशराजकीयोपाख्यानका आरम्भ, नारदजीकी कृपासे राजा सृंजयको पुत्रकी प्राप्ति, दस्युओंद्वारा उसका वध तथा पुत्रशोकसंतप्त सृंजयको नारदजीका मरुत्तका चरित्र सुनाना
सञ्जय उवाच
श्रुत्वा मृत्युसमुत्पत्तिं कर्माण्यनुपमानि च ।
धर्मराजः पुनर्वाक्यं प्रसाद्यैनमथाब्रवीत् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! मृत्युकी उत्पत्ति और उसके अनुपम कर्म सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः व्यासजीको प्रसन्न करके उनसे यह बात कही ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गुरवः पुण्यकर्माणः शक्रप्रतिमविक्रमाः ।
स्थाने राजर्षयो ब्रह्मन्ननघाः सत्यवादिनः ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**ब्रह्मन्! इन्द्रके समान पराक्रमी, श्रेष्ठ, पुण्यकर्मा, निष्पाप तथा सत्यवादी राजर्षिगण अपने योग्य उत्तम स्थान (लोक)-में निवास करते हैं ॥ २ ॥
भूय एव तु मां तथ्यैर्वचोभिरभिबृंहय ।
राजर्षीणां पुराणानां समाश्वासय कर्मभिः ॥ ३ ॥
अतः आप पुनः उन प्राचीन राजर्षियोंके सत्कर्मोंका बोध करानेवाले अपने यथार्थ वचनोंद्वारा मेरा सौभाग्य बढ़ाइये और मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३ ॥
कियन्त्यो दक्षिणा दत्ताः कैश्च दत्ता महात्मभिः ।
राजर्षिभिः पुण्यकृद्भिस्तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ॥ ४ ॥
पूर्वकालके किन-किन महामनस्वी पुण्यात्मा राजर्षियोंने यज्ञोंमें कितनी-कितनी दक्षिणाएँ दी थीं। यह सब आप मुझे बताइये ॥ ४ ॥
व्यास उवाच
शैब्यस्य नृपतेः पुत्रः सृञ्जया नाम नामतः ।
सखायौ तस्य चैवोभौ ऋषी पर्वतनारदौ ॥ ५ ॥
**व्यासजीने कहा—**राजन्! राजा शैब्यके सृंजय नामसे प्रसिद्ध एक पुत्र था। उसके पर्वत और नारद—ये दो ऋषि मित्र थे ॥ ५ ॥
तौ कदाचिद् गृहं तस्य प्रविष्टौ तद्दिदृक्षया ।
विधिवच्चार्चितौ तेन प्रीतौ तत्रोषतुः सुखम् ॥ ६ ॥
एक दिन वे दोनों महर्षि सृंजयसे मिलनेके लिये उसके घर पधारे। उसने विधिपूर्वक उनकी पूजा की और वे दोनों वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ६ ॥
तं कदाचित् सुखासीनं ताभ्यां सह शुचिस्मिता ।
दुहिताभ्यागमत् कन्या सृञ्जयं वरवर्णिनी ॥ ७ ॥
एक समय उन दोनों ऋषियोंके साथ राजा सृंजय सुखपूर्वक बैठे थे। उसी समय पवित्र मुसकानवाली परम सुन्दरी सृंजयकी कुमारी पुत्री वहाँ आयी ॥ ७ ॥
तयाभिवादितः कन्यामभ्यनन्दद् यथाविधि ।
तत्सलिङ्गाभिराशीर्भिरिष्टाभिरभितः स्थिताम् ॥ ८ ॥
आकर उसने राजाको प्रणाम किया। राजाने उसके अनुरूप अभीष्ट आशीर्वाद देकर अपने पार्श्वभागमें खड़ी हुई उस कन्याका विधिपूर्वक अभिनन्दन किया ॥ ८ ॥
तां निरीक्ष्याब्रवीद् वाक्यं पर्वतः प्रहसन्निव ।
कस्येयं चञ्चलापाङ्गी सर्वलक्षणसम्मता ॥ ९ ॥
तब महर्षि पर्वतने उस कन्याकी ओर देखकर हँसते हुए-से कहा—'राजन्! यह समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्मानित चंचल कटाक्षवाली कन्या किसकी पुत्री है? ॥ ९ ॥
उताहो भाः स्विदर्क्स्य ज्वलनस्य शिखा त्वियम् ।
श्रीर्हीः कीर्तिर्धृतिः पुष्टिः सिद्धिश्चन्द्रमसः प्रभा ॥ १० ॥
'अहो! यह सूर्यकी प्रभा है या अग्निदेवकी शिखा अथवा श्री, ह्री, कीर्ति, धृति, पुष्टि, सिद्धि या चन्द्रमाकी प्रभा है?' ॥ १० ॥
एवं ब्रुवाणं देवर्षिं नृपतिः सृञ्जयोऽब्रवीत् ।
ममेयं भगवन् कन्या मत्तो वरमभीप्सति ॥ ११ ॥
इस प्रकार पूछते हुए देवर्षि पर्वतसे राजा सृंजयने कहा—'भगवन्! यह मेरी कन्या है, जो मुझसे वर प्राप्त करना चाहती है' ॥ ११ ॥
नारदस्त्वब्रवीदेनं देहि मह्यमिमां नृप ।
भार्यार्थं सुमहच्छ्रेयः प्राप्तुं चेदिच्छसे नृप ॥ १२ ॥
इसी समय नारदजी राजासे बोले—'नरेश्वर! यदि तुम परम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो अपनी इस कन्याको धर्मपत्नी बनानेके लिये मुझे दे दो' ॥ १२ ॥
ददानीत्येव संहृष्टः सृञ्जयः प्राह नारदम् ।
पर्वतस्तु सुसंक्रुद्धो नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ १३ ॥
तब सृंजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर नारदजीसे कहा—'दे दूँगा'। यह सुनकर पर्वत अत्यन्त कुपित हो नारदजीसे बोले— ॥ १३ ॥
हृदयेन मया पूर्वं वृतां वै वृतवानसि ।
यस्माद् वृता त्वया विप्र मा गाः स्वर्गं यथेप्सया ॥ १४ ॥
'ब्रह्मन्! मैंने मन-ही-मन पहले ही जिसका वरण कर लिया था, उसीका तुमने वरण किया है। अतः तुमने मेरी मनोनीत पत्नीको वर लिया है, इसलिये अब तुम इच्छानुसार स्वर्गमें नहीं जा सकते' ।। १४ ।।
एवमुक्तो नारदस्तं प्रत्युवाचोत्तरं वचः । मनोवाग्बुद्धिसम्भाषा दत्ता चोदकपूर्वकम् ।। १५ ।। पाणिग्रहणमन्त्राश्च प्रथितं वरलक्षणम् । न त्वेषा निश्चिता निष्ठा निष्ठा सप्तपदी स्मृता ।। १६ ।।
उनके ऐसा कहनेपर नारदजीने उन्हें यह उत्तर दिया—'मनसे संकल्प करके, वाणीद्वारा प्रतिज्ञा करके, बुद्धिके द्वारा पूर्ण निश्चयके साथ, परस्पर सम्भाषणपूर्वक तथा संकल्पका जल हाथमें लेकर जो कन्यादान किया जाता है, वरके द्वारा जो कन्याका पाणिग्रहण होता है और वैदिक मन्त्रके पाठ किये जाते हैं, यही विधि-विधान कन्या-परिग्रहके साधकरूपसे प्रसिद्ध है; परंतु इतनेसे ही पाणिग्रहणकी पूर्णताका निश्चय नहीं होता है। उसकी पूर्ण निष्ठा तो सप्तपदी ही मानी गयी है ।। १५-१६ ।।
अनुत्पन्ने च कार्यार्थे मां त्वं व्याहृतवानसि । तस्मात् त्वमपि न स्वर्गं गमिष्यसि मया विना ।। १७ ।।
'अतः इस कन्याके ऊपर पतिरूपसे तुम्हारा अधिकार नहीं हुआ है—ऐसी अवस्थामें भी तुमने मुझे शाप दे दिया है, इसलिये तुम भी मेरे बिना स्वर्ग नहीं जा सकोगे' ।। १७ ।।
अन्योन्यमेवं शप्त्वा वै तस्थतुस्तत्र तौ तदा । अथ सोऽपि नृपो विप्रान् पानाच्छादनभोजनैः ।। १८ ।। पुत्रकामः परं शक्त्या यत्नाच्चोपाचरच्छुचिः ।
इस प्रकार एक-दूसरेको शाप देकर वे दोनों उस समय वहीं ठहर गये। इधर राजा सृञ्जयने पुत्रकी इच्छासे पवित्र हो पूरी शक्ति लगाकर बड़े यत्नसे भोजन, पीनेयोग्य पदार्थ तथा वस्त्र आदि देकर ब्राह्मणोंकी आराधना की ।। १८ १/२ ।।
तस्य प्रसन्ना विप्रेन्द्राः कदाचित् पुत्रमीप्सवः ।। १९ ।। तपःस्वाध्यायनिरता वेदवेदाङ्गपारगाः । सहिता नारदं प्राहुर्देह्यस्मै पुत्रमीप्सितम् ।। २० ।।
एक दिन राजापर प्रसन्न होकर उन्हें पुत्र देनेकी इच्छावाले सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण, जो तपस्या और स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाले तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे, एक साथ नारदजीसे बोले—'देवर्षे! आप इन राजा सृञ्जयको अभीष्ट पुत्र प्रदान कीजिये' ।। १९-२० ।।
तथेत्युक्त्वा द्विजैरुक्तः सृञ्जयं नारदोऽब्रवीत् । तुभ्यं प्रसन्ना राजर्षे पुत्रमीप्सन्ति ब्राह्मणाः ।। २१ ।।
ब्राह्मणोंके ऐसा कहनेपर नारदजीने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। फिर वे सृंजयसे इस प्रकार बोले—'राजर्षे! ये ब्राह्मणलोग प्रसन्न होकर तुम्हारे लिये अभीष्ट पुत्र प्राप्त करना चाहते हैं ।। २१ ।। वरं वृणीष्व भद्रं ते यादृशं पुत्रमीप्सितम् । तथोक्तः प्राञ्जली राजा पुत्रं वव्रे गुणान्वितम् ।। २२ ।। यशस्विनं कीर्तिमन्तं तेजस्विनमरिंदमम् । यस्य मूत्रं पुरीषं च क्लेदः स्वेदश्च काञ्चनम् ।। २३ ।। (सर्वं भवेत् प्रसादाद् वै तादृशं तनयं वृणे । 'तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें जैसा पुत्र अभीष्ट हो, उसके लिये वर माँगो'। नारदजीके ऐसा कहनेपर राजाने हाथ जोड़कर उनसे एक सद्गुणसम्पन्न, यशस्वी, कीर्तिमान्, तेजस्वी तथा शत्रुदमन पुत्र माँगा। वह बोला—'मुने! मैं ऐसे पुत्रकी याचना करता हूँ, जिसका मल, मूत्र, थूक और पसीना सब कुछ आपके कृपाप्रसादसे सुवर्णमय हो जाय' ।। २२-२३ १/२ ।।
व्यास उवाच
तथा भविष्यतीत्युक्ते जज्ञे तस्येप्सितः सुतः ।। काञ्चनस्याकरः श्रीमान् प्रसादाच्च सुकाङ्क्षितः । अपतत् तस्य नेत्राभ्यां रुदतस्तस्य नेत्रजम् ।।) सुवर्णष्ठीविरित्येवं तस्य नामाभवत् कृतम् । तस्मिन् वरप्रदानेन वर्धयत्यमितं धनम् ।। २४ ।। **व्यासजी कहते हैं—**राजन्! तब मुनिने कहा—'ऐसा ही होगा'। उनके ऐसा कहनेपर राजाको मनोवांछित पुत्र प्राप्त हुआ। मुनिके प्रसादसे वह शोभाशाली पुत्र सुवर्णकी खान निकला। राजा वैसा ही पुत्र चाहते थे। रोते समय उसके नेत्रोंसे सुवर्णमय आँसू गिरता था। इसीलिये उस पुत्रका नाम सुवर्णष्ठीवी प्रसिद्ध हो गया। वरदानके प्रभावसे वह अनन्त धनराशिकी वृद्धि करने लगा ।। २४ ।। कारयामास नृपतिः सौवर्णं सर्वमीप्सितम् । गृहप्राकारदुर्गाणि ब्राह्मणावसथान्यपि ।। २५ ।। शय्यासनानि यानानि स्थाली पिठरभाजनम् । तस्य राज्ञोऽपि यद् वेश्म बाह्याश्चोपस्कराश्च ये ।। २६ ।। सर्वं तत् काञ्चनमयं कालेन परिवर्धितम् । राजाने घर, परकोटे, दुर्ग एवं ब्राह्मणोंके निवासस्थान सारी अभीष्ट वस्तुएँ सोनेकी बनवा लीं। शय्या, आसन, सवारी, बटलोई, थाली, अन्य बर्तन, उस राजाका महल तथा बाह्य उपकरण—ये सब कुछ सुवर्णमय बन गये थे, जो समयके अनुसार बढ़ रहे थे ।। २५-२६ १/२ ।।
अथ दस्युगणाः श्रुत्वा दृष्ट्वा चैनं तथाविधम् ॥ २७ ॥ सम्भूय तस्य नृपतेः समारब्धारिचिकीर्षितुम् । तदनन्तर लुटेरोंने राजाके वैभवकी बात सुनकर तथा उन्हें वैसा ही सम्पन्न देखकर संगठित हो उनके यहाँ लूटपाट आरम्भ कर दी ॥ २७ १/२ ॥ केचित् तत्राब्रुवन् राज्ञः पुत्रं गृह्णीम वै स्वयम् ॥ २८ ॥ सोऽस्याकरः काञ्चनस्य तस्य यत्नं चरामहे । उन डाकुओंमेंसे कोई-कोई इस प्रकार बोले—‘हम सब लोग स्वयं इस राजाके पुत्रको अधिकारमें कर लें; क्योंकि वही इस सुवर्णकी खान है। अतः हम उसीको पकड़नेका यत्न करें’ ॥ २८ १/२ ॥ ततस्ते दस्यवो लुब्धाः प्रविश्य नृपतेर्गृहम् ॥ २९ ॥ राजपुत्रं तथा जह्रुः सुवर्णष्ठीविनं बलात् । तब उन लोभी लुटेरोंने राजमहलमें प्रवेश करके राजकुमार सुवर्णष्ठीवीको बलपूर्वक हर लिया ॥ २९ १/२ ॥ गृह्यैनमनुपायज्ञा नीत्वारण्यमचेतसः ॥ ३० ॥ हत्वा विशस्य चापश्यन् लुब्धा वसु न किञ्चन । तस्य प्राणैर्विमुक्तस्य नष्टं तद् वरदं वसु ॥ ३१ ॥ योग्य उपायको न जाननेवाले उन विवेकशून्य डाकुओंने उसे वनमें ले जाकर मार डाला और उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े करके देखा, परंतु उन्हें थोड़ा-सा भी धन नहीं दिखायी दिया। उसके प्राणशून्य होते ही वह वरदायक वैभव नष्ट हो गया ॥ ३०-३१ ॥ दस्यवश्च तदान्योन्यं जघ्नुर्मूर्खा विचेतसः । हत्वा परस्परं नष्टाः कुमारं चाद्भुतं भुवि ॥ ३२ ॥ असम्भाव्यं गता घोरं नरकं दुष्कारिणः । उस समय वे विचारशून्य मूर्ख एवं दुराचारी दस्यु भूमण्डलके उस अद्भुत और असम्भव कुमारका वध करके परस्पर एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार मार-पीट करके वे भी नष्ट हो गये और भयंकर नरकमें पड़ गये ॥ ३२ १/२ ॥ तं दृष्ट्वा निहतं पुत्रं वरदत्तं महातपाः ॥ ३३ ॥ विललाप सुदुःखार्तो बहुधा करुणं नृपः । मुनिके वरसे प्राप्त हुए उस पुत्रको मारा गया देख वे महातपस्वी नरेश अत्यन्त दुःखसे आतुर हो नाना प्रकारसे करुणाजनक विलाप करने लगे ॥ ३३ १/२ ॥ विलपन्तं निशम्याथ पुत्रशोकहतं नृपम् ॥ ३४ ॥ प्रत्यदृश्यत देवर्षिर्नारदस्तस्य संनिधौ ।
पुत्रशोकसे पीड़ित हुए राजा सृंजय विलाप कर रहे हैं—यह सुनकर देवर्षि नारद उनके समीप दिखायी दिये।।
उवाच चैनं दुःखार्तं विलपन्तमचेतसम् ।। ३५ ।।
सृञ्जयं नारदोऽभ्येत्य तन्निबोध युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिर! दुःखसे पीड़ित हो अचेत होकर विलाप करते हुए राजा सृंजयके निकट आकर नारदजीने जो कुछ कहा था, वह सुनो ।। ३५ १/२ ।।
(नारद उवाच)
त्यज शोकं महाराज वैक्लव्यं त्यज बुद्धिमन् ।
न मृतः शोचतो जीवेन्मुह्यतो वा जनाधिप ।।
**नारदजी बोले—**महाराज! शोकका त्याग करो! बुद्धिमान् नरेश! व्याकुलता छोड़ो! जनेश्वर! कोई कितना ही शोक क्यों न करे या दुःखसे मूर्च्छित क्यों न हो जाय, इससे मरा हुआ मनुष्य जीवित नहीं हो सकता।
त्यज मोहं नृपश्रेष्ठ न हि मुह्यन्ति त्वद्विधाः ।
धीरो भव महाराज ज्ञानवृद्धोऽसि मे मतः ॥)
नृपश्रेष्ठ! मोह त्याग दो! तुम्हारे-जैसे पुरुष मोहित नहीं होते हैं। महाराज! धैर्य धारण करो! मैं तुम्हें ज्ञानमें बढ़ा-चढ़ा मानता हूँ।
कामानामतृप्तस्त्वं सृञ्जयेह मरिष्यसि ।। ३६ ।।
यस्य चैते वयं गेहे उषिता ब्रह्मवादिनः ।
सृंजय! जिसके घरमें ये हम-जैसे ब्रह्मवादी मुनि निवास करते हैं, वह तुम भी यहाँ एक दिन भोगोंसे अतृप्त रहकर ही मर जाओगे ।। ३६ १/२ ।।
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।। ३७ ।।
संवर्तो याजयामास स्पर्धया वै बृहस्पतेः ।
यस्मै राजर्षये प्रादाद् धनं स भगवान् प्रभुः ।। ३८ ।।
हैमं हिमवतः पादं यियक्षोर्विविधैः स वै ।
यस्य सेन्द्राऽमरगणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।। ३९ ।।
देवा विश्वसृजः सर्वे यजनान्ते समासत ।
यज्ञवाटस्य सौवर्णाः सर्वे चासन् परिच्छदाः ।। ४० ।।
यस्य सर्वं तदा ह्यन्नं मनोऽभिप्रायगं शुचि ।
कामतो बुभुजुर्विप्राः सर्वे चान्नार्थिनो द्विजाः ।। ४१ ।।
पयो दधि घृतं क्षौद्रं भक्ष्यं भोज्यं च शोभनम् ।
यस्य यज्ञेषु सर्वेषु वासांस्याभरणानि च ।। ४२ ।।
ईप्सितान्युपतिष्ठन्ते प्रहृष्टान् वेदपारगान् ।
मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्याभवन् गृहे ॥ ४३ ॥
आविक्षितस्य राजर्षेर्विश्वेदेवाः सभासदः ।
यस्य वीर्यवतो राज्ञः सुवृष्ट्या सस्यसम्पदः ॥ ४४ ॥
हविर्भिस्तर्पिता येन सम्यक् क्लृप्तैर्दिवौकसः ।
ऋषीणां च पितॄणां च देवानां सुखजीविनाम् ॥ ४५ ॥
ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः सर्वैर्दानैश्च सर्वदा ।
शयनासनयानानि स्वर्णराशींश्च दुस्त्यजाः ॥ ४६ ॥
तत् सर्वममितं वित्तं दत्तं विप्रेभ्य इच्छया ।
सोऽनुध्यातस्तु शक्रेण प्रजाः कृत्वा निरामयाः ॥ ४७ ॥
श्रद्दधानो जिताँल्लोकान् गतः पुण्यदुहोऽक्षयान् ।
संजय! अविक्षितके पुत्र राजा मरुत्त भी मर गये, ऐसा हमने सुना है। बृहस्पतिजीके साथ स्पर्धा रखनेके कारण उनके भाई संवर्तने जिन राजर्षि मरुत्तका यज्ञ कराया था, भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करनेकी इच्छा होनेपर जिन्हें साक्षात् भगवान् शंकरने प्रचुर धनराशिके रूपमें हिमालयका एक सुवर्णमय शिखर प्रदान किया तथा प्रतिदिन यज्ञकार्यके अन्तमें जिनकी सभामें इन्द्र आदि देवता और बृहस्पति आदि समस्त प्रजापतिगण सभासद्के रूपमें बैठा करते थे, जिनके यज्ञमण्डपकी सारी सामग्रियाँ सोनेकी बनी हुई थीं, जिनके यहाँ उन दिनों सब प्रकारका अन्न, मनकी इच्छाके अनुरूप और पवित्र रूपमें उपलब्ध होता था और सभी भोजनार्थी ब्राह्मण एवं द्विज जहाँ अपनी इच्छाके अनुसार दूध, दही, घी, मधु एवं सुन्दर भक्ष्य-भोज्य पदार्थ भोजन करते थे, जिनके सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्रसन्नतासे भरे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण प्राप्त होते थे, जिन अविक्षितकुमार (राजर्षि मरुत्त)-के घरमें मरुद्गण रसोई परोसनेका काम करते थे और विश्वेदेवगण सभासद् थे, जिन पराक्रमी नरेशके राज्यमें उत्तम वृष्टिके कारण खेतीकी उपज बहुत होती थी, जिन्होंने उत्तम विधिसे समर्पित किये हुए हविष्योंद्वारा देवताओंको तृप्त किया था, जो ब्रह्मचर्यपालन और वेदपाठ आदि सत्कर्मोंद्वारा तथा सब प्रकारके दानोंसे सदा ऋषियों, पितरों एवं सुखजीवी देवताओंको भी संतुष्ट करते थे तथा जिन्होंने इच्छानुसार ब्राह्मणोंको शय्या, आसन, सवारी और दुस्त्यज स्वर्णराशि आदि वह सारा अपरिमित धन दान कर दिया था, देवराज इन्द्र जिनका सदा शुभ चिन्तन करते थे, वे श्रद्धालु नरेश मरुत्त अपनी प्रजाको नीरोग करके अपने सत्कर्मोंद्वारा जीते हुए पुण्यफलदायक अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ ३७—४७ १/२ ॥
सप्रजः सनृपामात्यः सदारापत्यबान्धवः ॥ ४८ ॥
यौवनेन सहस्राब्दं मरुत्तो राज्यमन्वशात् ।
राजा मरुत्तने युवावस्थामें रहकर प्रजा, मन्त्री, धर्मपत्नी, पुत्र और भाइयोंके साथ एक हजार वर्षोंतक राज्यशासन किया था ॥ ४८ १/२ ॥
स चेन्ममार सृञ्जय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।। ४९ ।।
पुत्रात् पुण्यतरस्तुभ्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
अयज्वानमदाक्षिण्यमभि श्वैत्येत्युदाहरत् ।। ५० ।।
श्वैत्य सृंजय! धर्म, ज्ञान, वैराग्य तथा ऐश्वर्य—इन चारों बातोंमें राजा मरुत्त तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। तुम्हारे पुत्रने न तो कोई यज्ञ किया था और न उसमें कोई उदारता ही थी। अतः उसको लक्ष्य करके तुम चिन्ता न करो—नारदजीने राजा सृंजयसे यही बात कही ।। ४९-५० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५५ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर ५४ श्लोक हैं)