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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

बढ़ा ।। ४४ ।। ततः प्रायात् प्रीतिमान् वै रथेन वैयाघ्रेण श्वेतयुजाथ कर्णः । स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां धनंजयं त्वरया पर्यपृच्छत् ।। ४५ ।।

तदनन्तर व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और श्वेत अश्वोंसे युक्त उस रथके द्वारा कर्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रस्थित हुआ। उसने सामने ही पाण्डवोंकी सेनाको खड़ी देख बड़ी उतावलीके साथ धनंजयका पता पूछा ।। ४५ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्याय ।। ३७ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३७ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1863)

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः

कर्णके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बतानेवालेको नाना प्रकारकी भोगसामग्री और इच्छानुसार धन देनेकी घोषणा

संजय उवाच

प्रयाणे च ततः कर्णो हर्षयन् वाहिनीं तव ।
एकैकं समरे दृष्ट्वा पाण्डवान् पर्यमृच्छत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! प्रस्थानकालमें आपकी सेनाका हर्ष बढ़ाता हुआ कर्ण समरांगणमें पाण्डव-सैनिकोंको देखकर प्रत्येकसे पूछने और कहने लगा— ॥ १ ॥

यो मामद्य महात्मानं दर्शयेच्छ्वेतवाहनम् ।
तस्मै दद्यामभिप्रेतं धनं यन्मनसेच्छति ॥ २ ॥
‘जो आज मुझे महात्मा श्वेतवाहन अर्जुनको दिखा देगा, उसे मैं उसका अभीष्ट धन, जिसे वह मनसे लेना चाहे, दे दूँगा ॥ २ ॥

न चेत् तदभिमन्येत तस्मै दद्यामहं पुनः ।
शकटं रत्नसम्पूर्णं यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ ३ ॥
‘यदि उतने धनसे वह संतुष्ट न होगा तो मैं उसे और धन दूँगा। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं रत्नोंसे भरा हुआ छकड़ा दूँगा ॥ ३ ॥

न चेत्तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।
शतं दद्यां गवां तस्मै नैत्यिकं कांस्यदोहनम् ॥ ४ ॥
‘यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पर्याप्त न माने तो मैं उसे प्रतिदिन दूध देनेवाली सौ गौएँ और कांसका दुग्धपात्र प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥

शतं ग्रामवरांश्चैव दद्यामर्जुनदर्शिने ।
तथा तस्मै पुनर्दद्यां श्वेतमश्वतरीरथम् ॥ ५ ॥
युक्तमञ्जनकेशीभिर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ।
‘इतना ही नहीं, मैं अर्जुनको दिखा देनेवाले व्यक्तिके लिये सौ बड़े-बड़े गाँव दूँगा तथा जो अर्जुनका पता बता देगा उसे खच्चरियोंसे जुता हुआ एक श्वेत रथ भी भेंट करूँगा; जिसमें काले केशवाली युवतियाँ बैठी होंगी ॥ ५ ½ ॥

न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ ६ ॥
अन्यं वास्मै पुनर्दद्यां सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
तथाप्यस्मै पुनर्दद्यां स्त्रीणां शतमलंकृतम् ॥ ७ ॥

श्यामानां निष्ककण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् । 'यदि अर्जुनका पता बतानेवाला पुरुष उस धनको पूरा न समझे तो उसे दूसरा सोनेका बना हुआ रथ प्रदान करूँगा जिसमें हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैल जुते होंगे। साथ ही उसे वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ ऐसी स्त्रियाँ दूँगा, जो श्यामा (सोलह वर्षकी अवस्थावाली), सुवर्णमय कण्ठहारसे अलंकृत तथा गाने-बजानेकी कलामें विदुषी होंगी ।। ६-७ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ८ ।। तस्मै दद्यां शतं नागान् शतं ग्रामान् शतं रथान् । सुवर्णस्य च मुख्यस्य हयाग्र्येणां शतं शतान् ।। ९ ।। ऋद्ध्या गुणैः सुदान्तांश्च धुर्यवाहान् सुशिक्षितान् । 'अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष यदि उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे सौ हाथी, सौ गाँव, पक्के सोनेके बने हुए सौ रथ तथा दस हजार अच्छे घोड़े भी दूँगा। वे घोड़े हृष्ट-पुष्ट, गुणवान्, विनीत, सुशिक्षित तथा रथका भार वहन करनेमें समर्थ होंगे ।। ८-९ १/२ ।। तथा सुवर्णशृङ्गीणां गोधेनूनां चतुःशतम् ।। १० ।। दद्यां तस्मै सवत्सानां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं चार सौ सवत्सा दुधारू गौएँ दूँगा, जिनके सींगोंमें सोने मढ़े होंगे ।। १० १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। ११ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां श्वेतान् पञ्चशतान् हयान् । हेमभाण्डपरिच्छन्नान् सुमृष्टमणिभूषणान् ।। १२ ।। 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पूर्ण नहीं समझेगा तो उसे और भी उत्तम धन, श्वेत रंगके पाँच सौ घोड़े दूँगा, जो सोनेके साज-बाजसे सुसज्जित तथा विशुद्ध मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित होंगे ।। ११-१२ ।। सुदान्तानपि चैवाहं दद्यामष्टादशापरान् । रथं च शुभ्रं सौवर्णं दद्यां तस्मै स्वलंकृतम् ।। १३ ।। युक्तं परमकाम्बोजैर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'इनके सिवा अठारह और भी घोड़े दूँगा, जो अच्छी तरह रथमें सधे हुए होंगे। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा उसे मैं परम उज्ज्वल और अलंकारोंसे सजाया हुआ एक सुवर्णमय रथ दूँगा, जिसमें अच्छी नस्लके काबुली घोड़े जुते होंगे ।। १३ १/२ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।। १४ ।। अन्यदस्मै वरं दद्यां कुञ्जराणां शतानि षट् । काञ्चनैर्विविधैर्भाण्डैराच्छन्नान् हेममालिनः ।। १५ ।। उत्पन्नानपरान्तेषु विनीतान् हस्तिशिक्षकैः ।

'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो उसे मैं और भी श्रेष्ठ धन दूँगा। नाना प्रकारके सुवर्णमय आभूषणोंसे सुशोभित तथा सोनेकी मालाओंसे अलंकृत छः सौ ऐसे हाथी प्रदान करूँगा जो भारतवर्षकी पश्चिमी सीमाके जंगलोंमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें गजशिक्षकोंने अच्छी तरह सुशिक्षित कर लिया है।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् ॥ १६ ॥ अन्यदस्मै वरं दद्यां वैश्यग्रामांश्चतुर्दश । सुस्फीतान् धनसंयुक्तान् प्रत्यासन्नवनोदकान् । अकुतोभयान् सुसम्पन्नान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे दूसरा श्रेष्ठ धन प्रदान करूँगा। जिनमें वैश्य निवास करते हों ऐसे चौदह समृद्धिशाली और धनसम्पन्न ग्राम दूँगा जिनके आसपास जंगल और जलकी सुविधा होगी और जहाँ किसी प्रकारका भय नहीं होगा। वे चौदहों गाँव अधिक सम्पन्न तथा राजोचित भोगोंसे परिपूर्ण होंगे ।। १६-१७ ।। दासीनां निष्ककण्ठीनां मागधीनां शतं तथा । प्रत्यग्रवयसां दद्यां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ १८ ॥ 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं सोनेके कण्ठहारोंसे विभूषित मगधदेशकी सौ नवयुवती दासियाँ दूँगा ।। १८ ।। न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिमान् । अन्यं तस्मै वरं दद्यां यमसौ कामयेत् स्वयम् ॥ १९ ॥ 'यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पर्याप्त न समझे तो मैं उसे दूसरा वर प्रदान करूँगा, जिसकी वह स्वयं इच्छा करे ।। १९ ।। पुत्रदारान् विहारांश्च यदन्यद् वित्तमस्ति मे । तच्च तस्मै पुनर्दद्यां यद् यच्च मनसेच्छति ॥ २० ॥ 'स्त्री, पुत्र, विहारस्थान तथा दूसरा भी जो कुछ धन-वैभव मेरे पास है, उसमेंसे जिस-जिस वस्तुको वह अपने मनसे चाहेगा, वह सब कुछ मैं उसे दे डालूँगा ।। २० ।। हत्वा च सहितौ कृष्णौ तयोर्वित्तानि सर्वशः । तस्मै दद्यामहं यो मे प्रब्रूयात् केशवार्जुनौ ॥ २१ ॥ 'जो मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं उन दोनोंको मारकर उनका सारा धन-वैभव दे दूँगा' ।। २१ ।। एता वाचः सुबहुशः कर्ण उच्चारयन् युधि । दध्मौ सागरसम्भूतं सुस्वरं शङ्खमुत्तमम् ॥ २२ ॥ इन सब बातोंको बारंबार कहते हुए कर्णने युद्धस्थलमें समुद्रसे उत्पन्न हुए अपने उत्तम शंखको उच्च स्वरसे बजाया ।। २२ ।।

ता वाचः सूतपुत्रस्य तथा युक्ता निशम्य तु । दुर्योधनो महाराज संहृष्टः सानुगोऽभवत् ॥ २३ ॥ महाराज! सूतपुत्रकी कही हुई उस अवसरके अनुरूप उन बातोंको सुनकर दुर्योधन अपने सेवकोंसहित बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ २३ ॥ ततो दुन्दुभिनिर्घोषो मृदङ्गानां च सर्वशः । सिंहनादः सवादित्रः कुञ्जराणां च निःस्वनः ॥ २४ ॥ फिर तो सब ओर दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, मृदंग बजने लगे, वाद्योंकी ध्वनिके साथ-साथ वीरोंका सिंहनाद तथा हाथियोंके चिग्घाड़नेका शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ २४ ॥ प्रादुरासीत् तदा राजन् सैन्येषु पुरुषर्षभ । योधानां सम्प्रहृष्टानां तथा समभवत् स्वनः ॥ २५ ॥ पुरुषप्रवर नरेश! उस समय सभी सेनाओंमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए योद्धाओंका गम्भीर गर्जन होने लगा ॥ २५ ॥ तथा प्रहृष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् । विकत्थमानं च तदा राधेयमरिकर्षणम् । मद्रराजः प्रहस्येदं वचनं प्रत्यभाषत ॥ २६ ॥ इस प्रकार हर्षसे उल्लसित हुई सेनामें जाते और बढ़-बढ़कर बातें बनाते हुए शत्रुसूदन राधापुत्र महारथी कर्णसे मद्रराज शल्यने हँसकर इस प्रकार कहा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णावलेपे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिमानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1867)

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

शल्यका कर्णके प्रति अत्यन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना

शल्य उवाच

मा सूतपुत्र दानेन सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनंजयम् ॥ १ ॥
शल्य बोले— सूतपुत्र! तुम किसी पुरुषको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट छः बैलोंसे जुता हुआ सोनेका रथ न दो। आज अवश्य ही अर्जुनको देखोगे ॥ १ ॥

बाल्यादिह त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा ।
अयत्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनंजयम् ॥ २ ॥
राधापुत्र! तुम मूर्खतासे ही यहाँ कुबेरके समान धन लुटा रहे हो, आज अर्जुनको तो तुम बिना यत्न किये ही देख लोगे ॥ २ ॥

परान् सृजसि यद् वित्तं किंचित्त्वं बहु मूढवत् ।
अपात्रदाने ये दोषास्तान् मोहान्नावबुध्यसे ॥ ३ ॥
मूढ़ पुरुषोंके समान तुम अपना बहुत कुछ धन जो दूसरोंको दे रहे हो, इससे जान पड़ता है कि अपात्रको धनका दान देनेसे जो दोष पैदा होते हैं, उन्हें मोहवश तुम नहीं समझ रहे हो ॥ ३ ॥

यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया ।
शक्यं बहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ॥ ४ ॥
सूत! तुम जो बहुत धन देनेकी यहाँ घोषणा कर रहे हो, निश्चय ही उसके द्वारा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हो; अतः तुम उन धन-वैभवोंद्वारा यज्ञोंका ही अनुष्ठान करो ॥ ४ ॥

यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद् वृथैव तत् ।
न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ॥ ५ ॥
और जो तुम मोहवश श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको मारना चाहते हो, वह मनसूबा तो व्यर्थ ही है; क्योंकि हमने यह बात कभी नहीं सुनी है कि किसी गीदड़ने युद्धमें दो सिंहोंको मार गिराया हो ॥ ५ ॥

अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुहृदो न हि सन्ति ते ।
ये त्वां न वारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ॥ ६ ॥
तुम ऐसी चीज चाहते हो, जिसकी अबतक किसीने इच्छा नहीं की थी। जान पड़ता है तुम्हारे कोई सुहृद् नहीं हैं, जो शीघ्र ही आकर तुम्हें चलती आगमें गिरनेसे रोक नहीं रहे हैं ॥ ६ ॥

कार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् । बह्वबद्धमकणीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ ७ ॥ तुम्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है। निःसंदेह तुम्हें कालने पका दिया है। (अतः तुम पके हुए फलके समान गिरनेवाले ही हो); अन्यथा जो जीवित रहना चाहता है, ऐसा कौन पुरुष ऐसी बहुत-सी न सुननेयोग्य ऊटपटांग बातें कह सकता है? ॥ ७ ॥ समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् । गिर्यग्राद् वा निपतनं तादृक् तव चिकीर्षितम् ॥ ८ ॥ जैसे कोई गलेमें पत्थर बाँधकर दोनों हाथोंसे समुद्र पार करना चाहे अथवा पहाड़ की चोटीसे पृथ्वीपर कूदनेकी इच्छा करे, ऐसी ही तुम्हारी सारी चेष्टा और अभिलाषा है ॥ ८ ॥ सहितः सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकैः सुरक्षितः । धनंजयेन युध्यस्व श्रेयश्चेत् प्राप्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥ यदि तुम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो व्यूहरचनापूर्वक खड़े हुए समस्त सैनिकोंके साथ सुरक्षित रहकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ ९ ॥ हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया । श्रद्धत्स्वैवं मया प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ॥ १० ॥ दुर्योधनके हितके लिये ही मैं ऐसा कह रहा हूँ, हिंसाभावसे नहीं। यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो मेरे इस कथनपर विश्वास करो ॥ १० ॥

कर्ण उवाच

स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे । त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषयितुमिच्छसि ॥ ११ ॥ **कर्ण बोला—**शल्य! मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके रणक्षेत्रमें अर्जुनको पाना चाहता हूँ; परंतु तुम तो मुँहसे मित्र बने हुए वास्तवमें शत्रु हो, जो मुझे यहाँ डराना चाहते हो ॥ ११ ॥ न मामस्मादभिप्रायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् । अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किमु मर्त्यः कथंचन ॥ १२ ॥ परंतु मुझे इस अभिप्रायसे आज कोई भी पीछे नहीं लौटा सकता। वज्र उठाये हुए इन्द्र भी मुझे किसी तरह इस निश्चयसे डिगा नहीं सकते, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है? ॥ १२ ॥

संजय उवाच

इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोत्तरं वचः । चुकोपयिषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ॥ १३ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्णकी यह बात समाप्त होते ही मद्रराज शल्य उसे अत्यन्त कुपित करनेकी इच्छासे पुनः इस प्रकार उत्तर देने लगे— ॥ १३ ॥

यदा वै त्वां फाल्गुनवेगयुक्ता ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टाः । अन्वेतारः कङ्कपत्राः सिताग्रा- स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्यानुयोगात् ॥ १४ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनके वेगसे युक्त हो उनकी प्रत्यंचासे प्रेरित और सुशिक्षित हाथोंसे छोड़े हुए तीखी धारवाले कंकपत्रविभूषित बाण जब तुम्हारे शरीरमें घुसने लगेंगे, तब जो तुम अर्जुनको पूछते फिरते हो, इसके लिये पश्चात्ताप करोगे ॥ १४ ॥

यदा दिव्यं धनुरदाय पार्थः प्रतापयन् पृतनां सव्यसाची । त्वां मर्दयिष्यन्निशितैः पृषत्कै- स्तदा पश्चात् तप्स्यसे सूतपुत्र ॥ १५ ॥ ‘सूतपुत्र! जब सव्यसाची कुन्तीकुमार अर्जुन अपने हाथमें दिव्य धनुष लेकर शत्रुसेनाको तपाते हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हें रौंदने लगेंगे, तब तुम्हें अपने कियेपर पछतावा होगा ॥

बालश्चन्द्रं मातुरङ्के शयानो यथा कश्चित् प्रार्थयतेऽपहर्तुम् । तद्वन्मोहाद् द्योतमानं रथस्थं सम्प्राथर्यस्यर्जुनं जेतुमद्य ॥ १६ ॥ ‘जैसे अपनी माँकी गोदमें सोया हुआ कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ लाना चाहता हो, उसी प्रकार तुम भी रथपर बैठे हुए तेजस्वी अर्जुनको आज मोहवश परास्त करना चाहते हो ॥ १६ ॥

त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्ष्णधारं सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ॥ १७ ॥ ‘कर्ण! अर्जुनका पराक्रम अत्यन्त तीखी धारवाले त्रिशूलके समान है। उन्हीं अर्जुनके साथ आज जो तुम युद्ध करना चाहते हो, वह दूसरे शब्दोंमें यों है कि तुम पैनी धारवाले त्रिशूलको लेकर उसीसे अपने सारे अंगोंको रगड़ना या खुजलाना चाहते हो ॥ १७ ॥

क्रुद्धं सिंहं केसरिणं बृहन्तं बालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्वयेत् तद्वदेतत् तवाद्य

समाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ॥ १८ ॥ ‘सूतपुत्र! जैसे बालक, मूढ़ और वेगसे चौकड़ी भरनेवाला क्षुद्र मृग क्रोधमें भरे हुए विशालकाय, केसरयुक्त सिंहको ललकारे, तुम्हारा आज यह अर्जुनका युद्धके लिये आह्वान करना भी वैसा ही है ॥ १८ ॥

मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥ १९ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो। जैसे वनमें मांस-भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ॥ १९ ॥

ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् । शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २० ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई खरगोश ईषादण्डके समान दाँतोंवाले महान् मदस्रावी गजराजको अपने साथ युद्धके लिये बुलाता हो, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीपुत्र धनंजयका रणक्षेत्रमें आह्वान करते हो ॥ २० ॥

बिलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात् काष्ठेन विध्यसि । महाविषं पूर्णकोपं यत् पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥ २१ ॥ ‘तुम यदि पूर्णतः क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके साथ जूझना चाहते हो तो मूर्खतावश बिलमें बैठे हुए महाविषैले काले सर्पको किसी काठकी छड़ीसे बींध रहे हो ॥ २१ ॥

सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥ २२ ॥ ‘कर्ण! तुम मूर्ख हो; जैसे गीदड़ क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहका अनादर करके गर्जना करे, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी और क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनका लंघन करके गरज रहे हो ॥ २२ ॥

सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् । भोगीवाह्वयसे पाते कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २३ ॥ ‘कर्ण! जैसे कोई सर्प अपने पतनके लिये ही पक्षियोंमें श्रेष्ठ वेगशाली विनतानन्दन गरुडका आह्वान करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने विनाशके लिये ही कुन्तीकुमार अर्जुनको ललकार रहे हो ॥ २३ ॥

सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषायुतम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवः संस्तितीर्षसि ॥ २४ ॥

'अरे! तुम चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए, जलजन्तुओंसे पूर्ण तथा उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त अगाध जलराशिवाले भयंकर समुद्रको बिना किसी नावके ही केवल दोनों हाथोंके सहारे पार करना चाहते हो ।। २४ ।।

ऋषभं दुन्दुभिग्रीवं तीक्ष्णशृङ्गं प्रहारिणम् ।
वत्स आह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ।। २५ ।।
'बेटा कर्ण! दुन्दुभिकी ध्वनिके समान जिसका कंठस्वर गम्भीर है, जिसके सींग तीखे हैं तथा जो प्रहार करनेमें कुशल है, उस साँड़के समान पराक्रमी पृथापुत्र अर्जुनको तुम युद्धके लिये ललकार रहे हो ।। २५ ।।

महामेघं महाघोरं दर्दुरः प्रतिनर्दसि ।
बाणतोयप्रदं लोके नरपर्जन्यमर्जुनम् ।। २६ ।।
'जैसे महाभयंकर महामेघके मुकाबलेमें कोई मेढक टर्र-टर्र कर रहा हो, उसी प्रकार तुम संसारमें बाणरूपी जलकी वर्षा करनेवाले मानवमेघ अर्जुनको लक्ष्य करके गर्जना करते हो ।। २६ ।।

यथा च स्वगृहस्थः श्वा व्याघ्रं वनगतं भषेत् ।
तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २७ ।।
'कर्ण! जैसे अपने घरमें बैठा हुआ कोई कुत्ता वनमें रहनेवाले बाघकी ओर भूँके, उसी प्रकार तुम भी नरव्याघ्र अर्जुनको लक्ष्य करके भूँक रहे हो ।। २७ ।।

शृगालोऽपि वने कर्ण शशैः परिवृतो वसन् ।
मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति ।। २८ ।।
'कर्ण! वनमें खरगोशोंके साथ रहनेवाला गीदड़ भी जबतक सिंहको नहीं देखता, तबतक अपनेको सिंह ही मानता रहता है ।। २८ ।।

तथा त्वमपि राधेय सिंहमात्मानमिच्छसि ।
अपश्यन् शत्रुदमनं नरव्याघ्रं धनंजयम् ।। २९ ।।
'राधानन्दन! उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखनेके कारण ही अपनेको सिंह समझना चाहते हो ।। २९ ।।

व्याघ्रं त्वं मन्यसेऽऽत्मानं यावत् कृष्णौ न पश्यसि ।
समास्थितावेकरथे सूर्याचन्द्रमसाविव ।। ३० ।।
'एक रथपर बैठे हुए सूर्य और चन्द्रमाके समान सुशोभित श्रीकृष्ण और अर्जुनको जबतक तुम नहीं देख रहे हो, तभीतक अपनेको बाघ माने बैठे हो ।। ३० ।।

यावद् गाण्डीवघोषं त्वं न शृणोषि महाहवे ।
तावदेव त्वया कर्ण शक्यं वक्तुं यथेच्छसि ।। ३१ ।।
'कर्ण! महासमरमें जबतक गाण्डीवकी टंकार नहीं सुनते हो, तभीतक तुम जैसा चाहो, बक सकते हो ।। ३१ ।।

रथशब्दधनुःशब्दैर्नादयन्तं दिशो दश ।
नर्दन्तमिव शार्दूलं दृष्ट्वा क्रोष्टा भविष्यसि ॥ ३२ ॥
‘रथकी घर्घराहट और धनुषकी टंकारसे दसों दिशाओंको निनादित करते हुए सिंहसदृश अर्जुनको जब दहाड़ते देखोगे, तब तुरंत गीदड़ बन जाओगे ।। ३२ ।।
नित्यमेव शृगालस्त्वं नित्यं सिंहो धनंजयः ।
वीरप्रद्वेषणान्मूढ तस्मात् क्रोष्टेव लक्ष्यसे ॥ ३३ ॥
‘ओ मूढ! तुम सदासे ही गीदड़ हो और अर्जुन सदासे ही सिंह हैं। वीरोंके प्रति द्वेष रखनेके कारण ही तुम गीदड़-जैसे दिखायी देते हो ।। ३३ ।।
यथाखुः स्याद् विडालश्च श्वा व्याघ्रश्च बलाबले ।
यथा शृगालः सिंहश्च यथा च शशकुञ्जरौ ॥ ३४ ॥
‘जैसे चूहा और बिलाव, कुत्ता और बाघ, गीदड़ और सिंह तथा खरगोश और हाथी अपनी निर्बलता और प्रबलताके लिये प्रसिद्ध हैं, उसी प्रकार तुम निर्बल हो और अर्जुन सबल हैं ।। ३४ ।।
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते ।
तथा त्वमपि पार्थश्च प्रख्यातावात्मकर्मभिः ॥ ३५ ॥
‘जैसे झूठ और सच तथा विष और अमृत अपना अलग-अलग प्रभाव रखते हैं, उसी प्रकार तुम और अर्जुन भी अपने-अपने कर्मोंके लिये सर्वत्र विख्यात हो' ।। ३५ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्याधिक्षेपे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णके प्रति शल्यका आक्षेपविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1873)

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चत्वारिंशोऽध्यायः

कर्णका शल्यको फटकारते हुए मद्रदेशके निवासियोंकी निन्दा करना एवं उसे मार डालनेकी धमकी देना

संजय उवाच

अधिक्षिप्तस्तु राधेयः शल्येनामिततेजसा । शल्यमाह सुसंक्रुद्धो वाक्शल्यमवधारयन् ।। १ ।।

**संजय कहते हैं—**राजन्! अमिततेजस्वी शल्यके इस प्रकार आक्षेप करनेपर राधापुत्र कर्ण अत्यन्त कुपित हो उठा और यह वचनरूपी शल्य (बाण) छोड़नेके कारण ही इसका नाम शल्य पड़ा है, ऐसा निश्चय करके शल्यसे इस प्रकार बोला ।। १ ।।

कर्ण उवाच

गुणान् गुणवतां शल्य गुणवान् वेत्ति नागुणः । त्वं तु शल्य गुणैर्हीनः किं ज्ञास्यसि गुणागुणम् ।। २ ।।

**कर्णने कहा—**शल्य! गुणवान् पुरुषोंके गुणोंको गुणवान् ही जानता है, गुणहीन नहीं। तुम तो समस्त गुणोंसे शून्य हो; फिर गुण-अवगुण क्या समझोगे? ।। २ ।।

अर्जुनस्य महास्त्राणि क्रोधं वीर्यं धनुः शरान् । अहं शल्याभिजानामि विक्रमं च महात्मनः ।। ३ ।।

शल्य! मैं महात्मा अर्जुनके महान् अस्त्र, क्रोध, बल, धनुष, बाण और पराक्रमको अच्छी तरह जानता हूँ ।। ३ ।।

तथा कृष्णस्य माहात्म्यमृषभस्य महीक्षिताम् । यथाहं शल्य जानामि न त्वं जानासि तत् तथा ।। ४ ।।

शल्य! इसी प्रकार महीपालशिरोमणि श्रीकृष्णके माहात्म्यको जैसा मैं जानता हूँ, वैसा तुम नहीं जानते ।। ४ ।।

एवमेवात्मनो वीर्यमहं वीर्यं च पाण्डवे । जानन्नेवाह्वये युद्धे शल्य गाण्डीवधारिणम् ।। ५ ।।

शल्य! मैं अपना और पाण्डुपुत्र अर्जुनका बल-पराक्रम समझकर ही गाण्डीवधारी पार्थको युद्धके लिये बुलाता हूँ ।। ५ ।।

अस्ति वायमिषुः शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजनः । एकतूणीशयः पत्री सुधौतः समलंकृतः ।। ६ ।।

शल्य! मेरा यह सुन्दर पंखोंसे युक्त बाण शत्रुओंका रक्त पीनेवाला है। यह अकेले ही एक तरकसमें रखा जाता है, जो बहुत ही स्वच्छ, कंकपत्रयुक्त और भलीभाँति अलंकृत

है॥ ६॥ शेते चन्दनचूर्णेषु पूजितो बहुलाः समाः। आहेयो विषवानुग्रो नराश्वद्विपसंघहा॥ ७॥ यह सर्पमय भयानक विषैला बाण बहुत वर्षोंतक चन्दनके चूर्णमें रखकर पूजित होता आया है, जो मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके समुदायका संहार करनेवाला है॥ ७॥ घोररूपो महारौद्रस्तनुत्रास्थिविदारणः। निर्भिन्द्यां येन रुष्टोऽहमपि मेरुं महागिरिम्॥ ८॥ यह अत्यन्त भयंकर घोर बाण कवच तथा हड्डियोंको भी चीर देनेवाला है। मैं कुपित होनेपर इस बाणके द्वारा महान् पर्वत मेरुको भी विदीर्ण कर सकता हूँ॥ ८॥ तमहं जातु नास्येयमन्यस्मिन् फाल्गुनादृते। कृष्णाद् वा देवकीपुत्रात् सत्यं चापि शृणुष्व मे॥ ९॥ इस बाणको मैं अर्जुन अथवा देवकीपुत्र श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरे किसीपर कभी नहीं छोड़ूँगा। मेरी सच्ची बातको तुम कान खोलकर सुन लो॥ ९॥ तेनाहमिषिणा शल्य वासुदेवधनंजयौ। योत्स्ये परमसंक्रुद्धस्तत् कर्म सदृशं मम॥ १०॥ शल्य! मैं अत्यन्त कुपित होकर उस बाणके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनके साथ युद्ध करूँगा और वह कार्य मेरे योग्य होगा॥ १०॥ सर्वेषां वृष्णिवीराणां कृष्णे लक्ष्मीः प्रतिष्ठिता। सर्वेषां पाण्डुपुत्राणां जयः पार्थे प्रतिष्ठितः॥ ११॥ उभयं तु समासाद्य को निवर्तितुमर्हति। समस्त वृष्णिवंशी वीरोंकी सम्पत्ति श्रीकृष्णपर ही प्रतिष्ठित है और पाण्डुके सभी पुत्रोंकी विजय अर्जुनपर ही अवलम्बित है; फिर उन दोनोंको एक साथ युद्धमें पाकर कौन वीर पीछे लौट सकता है?॥ ११ १/२॥ तावेतौ पुरुषव्याघ्रौ समेतौ स्यन्दने स्थितौ॥ १२॥ मामेकमभिसंयातौ सुजातं पश्य शल्य मे। शल्य! वे दोनों पुरुषसिंह एक साथ रथपर बैठकर एकमात्र मुझपर आक्रमण करनेवाले हैं। देखो, मेरा जन्म कितना उत्तम है?॥ १२ १/२॥ पितृष्वसामातुलजौ भ्रातरावपराजितौ॥ १३॥ मणी सूत्र इव प्रोतौ द्रष्टासि निहतौ मया। धागेमें पिरोयी हुई दो मणियोंके समान प्रेमसूत्रमें बँधे हुए उन दोनों फुफेरे और ममेरे भाइयोंको, जो किसीसे पराजित नहीं होते, तुम मेरे द्वारा मारा गया देखोगे॥ १३ १/२॥ अर्जुने गाण्डिवं कृष्णे चक्रं तार्क्ष्यकपिध्वजौ॥ १४॥ भीरूणां त्रासजननं शल्य हर्षकरं मम।

अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष और श्रीकृष्णके हाथमें सुदर्शन चक्र है। एक कपिध्वज है तो दूसरा गरुड़ध्वज। शल्य! ये सब वस्तुएँ कायरोंको भय देनेवाली हैं; परंतु मेरा हर्ष बढ़ाती हैं ।। १४ १/२ ।। त्वं तु दुष्प्रकृतिमूढो महायुद्धेष्वकोविदः ।। १५ ।। भयावदीर्णः संत्रासादबद्धं बहु भाषसे । तुम तो दुष्ट स्वभावके मूर्ख मनुष्य हो। बड़े-बड़े युद्धोंमें कैसे शत्रुका सामना किया जाता है, इस बातसे अनभिज्ञ हो। भयसे तुम्हारा हृदय विदीर्ण-सा हो रहा है; अतः डरके मारे बहुत-सी असंगत बातें कह रहे हो ।। १५ १/२ ।। संस्तौषि तौ तु केनापि हेतुना त्वं कुदेशज ।। १६ ।। तौ हत्वा समरे हन्ता त्वामद्य सहबान्धवम् । पापदेशज दुर्बुद्धे क्षुद्र क्षत्रियपांसन ।। १७ ।। दुष्ट और पापी देशमें उत्पन्न हुए नीच क्षत्रिय-कुलांगार दुर्बुद्धि शल्य! तुम उन दोनोंकी किसी स्वार्थसिद्धिके लिये स्तुति करते हो; परंतु आज समरांगणमें उन दोनोंको मारकर बन्धु-बान्धवोंसहित तुम्हारा भी वध कर डालूँगा ।। १६-१७ ।। सुहृद् भूत्वा रिपुः किं मां कृष्णाभ्यां भीषयिष्यसि । तौ वा मामद्य हन्तारौ हनिष्ये वापि तावहम् ।। १८ ।। तुम मेरे शत्रु होकर भी सुहृद् बनकर मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनसे क्यों डरा रहे हो। आज या तो वे ही दोनों मुझे मार डालेंगे या मैं ही उन दोनोंका संहार कर दूँगा ।। १८ ।। नाहं बिभेमि कृष्णाभ्यां विजानन्नात्मनो बलम् । वासुदेवसहस्रं वा फाल्गुनानां शतानि वा ।। १९ ।। अहमेको हनिष्यामि जोषमास्स्व कुदेशज । मैं अपने बलको अच्छी तरह जानता हूँ; इसलिये श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कदापि नहीं डरता हूँ। नीच देशमें उत्पन्न शल्य! तुम चुप रहो। मैं अकेला ही सहस्रों श्रीकृष्णों और सैकड़ों अर्जुनोको मार डालूँगा ।। स्त्रियो बालाश्च वृद्धाश्च प्रायः क्रीडागता जनाः ।। २० ।। या गाथाः सम्प्रगायन्ति कुर्वन्तोऽध्ययनं यथा । ता गाथाः शृणु मे शल्य मद्रकेषु दुरात्मसु ।। २१ ।। ब्राह्मणैः कथिताः पूर्वं यथावद् राजसंनिधौ । श्रुत्वा चैकमना मूढ क्षम वा ब्रूहि चोत्तरम् ।। २२ ।। मूर्ख शल्य! स्त्रियाँ, बच्चे और बूढ़े लोग, खेलकूदमें लगे हुए मनुष्य और स्वाध्याय करनेवाले पुरुष भी दुरात्मा मद्रनिवासियोंके विषयमें जिन गाथाओंको गाया करते हैं तथा ब्राह्मणोंने पहले राजाके समीप आकर यथावत् रूपसे जिनका वर्णन किया है, उन

गाथाओंको एकाग्रचित्त होकर मुझसे सुनो और सुनकर चुपचाप सह लो या जवाब दो॥ २०—२२॥

मित्रध्रुङ्मद्रको नित्यं यो नो द्वेष्टि स मद्रकः। मद्रके संगतं नास्ति क्षुद्रवाक्ये नराधमे॥ २३॥ मद्रदेशका अधम मनुष्य सदा मित्रद्रोही होता है। जो हमलोगोंसे अकारण द्वेष करता है, वह मद्रदेशका ही अधम मनुष्य है। क्षुद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले मद्रदेशके निवासीमें किसीके प्रति सौहार्दकी भावना नहीं होती॥

दुरात्मा मद्रको नित्यं नित्यमानृतिकोऽनृजुः। यावदन्त्यं हि दौरात्म्यं मद्रकेष्विति नः श्रुतम्॥ २४॥ मद्रनिवासी मनुष्य सदा ही दुरात्मा, सर्वदा झूठ बोलनेवाला और सदा ही कुटिल होता है। हमने सुन रखा है कि मद्रनिवासियोंमें मरते दमतक दुष्टता बनी रहती है॥ २४॥

पिता पुत्रश्च माता च श्वश्रूश्वशुरमातुलाः। जामाता दुहिता भ्राता नप्तान्ये ते च बान्धवाः॥ २५॥ वयस्याभ्यागताश्चान्ये दासीदासं च संगतम्। पुम्भिर्विमिश्रा नार्यश्च ज्ञाताज्ञाताः स्वयेच्छया॥ २६॥ येषां गृहेष्वशिष्टानां सक्तुमत्स्याशिनां तथा। पीत्वा सीधु सगोमांसं क्रन्दन्ति च हसन्ति च॥ २७॥ गायन्ति चाप्यबद्धानि प्रवर्तन्ते च कामतः। कामप्रलापिनोऽन्योन्यं तेषु धर्मः कथं भवेत्॥ २८॥ मद्रकेष्ववलिप्तेषु प्रख्याताशुभकर्मसु। सत्तू और मांस खानेवाले जिन अशिष्ट मद्रनिवासियोंके घरोंमें पिता, पुत्र, माता, सास, ससुर, मामा, बेटी, दामाद, भाई, नाती, पोते, अन्यान्य बन्धु-बान्धव, समवयस्क मित्र, दूसरे अभ्यागत अतिथि और दास-दासी—ये सभी अपनी इच्छाके अनुसार एक-दूसरेसे मिलते हैं। परिचित-अपरिचित सभी स्त्रियाँ सभी पुरुषोंसे सम्पर्क स्थापित कर लेती हैं और गोमांससहित मदिरा पीकर रोती, हँसती, गाती, असंगत बातें करती तथा कामभावसे किये जानेवाले कार्योंमें प्रवृत्त होती हैं। जिनके यहाँ सभी स्त्री-पुरुष एक-दूसरेसे कामसम्बन्धी प्रलाप करते हैं, जिनके पापकर्म सर्वत्र विख्यात हैं, उन घमंडी मद्रनिवासियोंमें धर्म कैसे रह सकता है?॥

नापि वैरं न सौहार्दं मद्रकेण समाचरेत्॥ २९॥ मद्रके संगतं नास्ति मद्रको हि सदामलः। मद्रनिवासीके साथ न तो वैर करे और न मित्रता ही स्थापित करे, क्योंकि उसमें सौहार्दकी भावना नहीं होती। मद्रनिवासी सदा पापमें ही डूबा रहता है॥ २९ १/२॥

मद्रकेषु च संसृष्टं शौचं गान्धारकेषु च॥ ३०॥

राजयाजकयाज्ये च नष्टं दत्तं हविर्भवेत् ।
शूद्रसंस्कारको विप्रो यथा याति पराभवम् ॥ ३१ ॥
यथा ब्रह्मद्विषो नित्यं गच्छन्तीह पराभवम् ।
यथैव संगतं कृत्वा नरः पतति मद्रकैः ॥ ३२ ॥
मद्रके संगतं नास्ति हतं वृश्चिक ते विषम् ।
आथर्वणेन मन्त्रेण यथा शान्तिः कृता मया ॥ ३३ ॥
‘ओ बिच्छू! जैसे मद्रनिवासियोंके पास रखी हुई धरोहर और गान्धारनिवासियोंमें शौचाचार नष्ट हो जाते हैं, जहाँ क्षत्रिय पुरोहित हो उस यजमानके यज्ञमें दिया हुआ हविष्य जैसे नष्ट हो जाता है, जैसे शूद्रोंका संस्कार करानेवाला ब्राह्मण पराभवको प्राप्त होता है, जैसे ब्रह्मद्रोही मनुष्य इस जगत्‌में सदा ही तिरस्कृत होते रहते हैं, जैसे मद्रनिवासियोंके साथ मित्रता करके मनुष्य पतित हो जाता है तथा जिस प्रकार मद्रनिवासीमें सौहार्दकी भावना सर्वथा नष्ट हो गयी है, उसी प्रकार तेरा यह विष भी नष्ट हो गया। मैंने अथर्ववेदके मन्त्रसे तेरे विषको शान्त कर दिया’ ॥ ३०—३३ ॥

इति वृश्चिकदष्टस्य विषवेगहतस्य च ।
कुर्वन्ति भेषजं प्राज्ञाः सत्यं तच्चापि दृश्यते ॥ ३४ ॥
ये उपर्युक्त बातें कहकर जो बुद्धिमान् विषवैद्य बिच्छूके काटनेपर उसके विषके वेगसे पीड़ित हुए मनुष्यकी चिकित्सा या औषध करते हैं, उनका वह कथन सत्य ही दिखायी देता है ॥ ३४ ॥

एवं विद्वञ्जोषमास्स्व शृणु चात्रोत्तरं वचः ।
वासांस्युत्सृज्य नृत्यन्ति स्त्रियो या मद्यमोहिताः ॥ ३५ ॥
मैथुनेऽसंयताश्चापि यथाकामवराश्च ताः ।
तासां पुत्रः कथं धर्मं मद्रको वक्तुमर्हति ॥ ३६ ॥
विद्वान् राजा शल्य! ऐसा समझकर तुम चुपचाप बैठे रहो और इसके बाद जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे भी सुन लो। जो स्त्रियाँ मद्यसे मोहित हो कपड़े उतारकर नाचती हैं, मैथुनमें संयम एवं मर्यादाको छोड़कर प्रवृत्त होती हैं और अपनी इच्छाके अनुसार जिस किसी पुरुषका वरण कर लेती हैं, उनका पुत्र मद्रनिवासी नराधम दूसरोंको धर्मका उपदेश कैसे कर सकता है? ॥ ३५-३६ ॥

यास्तिष्ठन्त्यः प्रमेहन्ति यथैवोष्ट्रदशेरकाः ।
तासां विभ्रष्टधर्माणां निर्लज्जानां ततस्ततः ॥ ३७ ॥
त्वं पुत्रस्तादृशीनां हि धर्मं वक्तुमिहेच्छसि ।
जो ऊँटों और गदहोंके समान खड़ी-खड़ी मूतती हैं तथा जो धर्मसे भ्रष्ट होकर लज्जाको तिलांजलि दे चुकी हैं, वैसी मद्रनिवासिनी स्त्रियोंके पुत्र होकर तुम मुझे यहाँ धर्मका उपदेश करना चाहते हो ॥ ३७ १/२ ॥

सुवीरकं याच्यमाना मद्रिका कर्षति स्फिचौ ॥ ३८ ॥ अदातुकामा वचनमिदं वदति दारुणम् । मा मां सुवीरकं कश्चिद् याचतां दयितं मम ॥ ३९ ॥ पुत्रं दद्यां पतिं दद्यां न तु दद्यां सुवीरकम् । यदि कोई पुरुष मद्रदेशकी किसी स्त्रीसे कांजी माँगता है तो वह उसकी कमर पकड़कर खींच ले जाती है और कांजी न देनेकी इच्छा रखकर यह कठोर वचन बोलती है—'कोई मुझसे कांजी न माँगे, क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। मैं अपने पुत्रको दे दूँगी, पतिको भी दे दूँगी; परंतु कांजी नहीं दे सकती' ॥ ३८-३९ १/२ ॥

गौर्यो बृहत्यो निर्ह्रीका मद्रिकाः कम्बलावृताः ॥ ४० ॥ घस्मरा नष्टशौचाश्च प्राय इत्यनुशुश्रुम । मद्रदेशकी स्त्रियाँ प्रायः गोरी, लंबे कदवाली, निर्लज्ज, कम्बलसे शरीरको ढकनेवाली, बहुत खानेवाली और अत्यन्त अपवित्र होती हैं, ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ४० १/२ ॥

एवमादि मयान्यैर्वा शक्यं वक्तुं भवेद् बहु ॥ ४१ ॥ आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्येषु कुकर्मसु । मद्रनिवासी सिरकी चोटीसे लेकर पैरोंके नखाग्रभागतक निन्दाके ही योग्य हैं। वे सब-के-सब कुकर्ममें लगे रहते हैं। उनके विषयमें हम तथा दूसरे लोग भी ऐसी बहुत-सी बातें कह सकते हैं ॥ ४१ १/२ ॥

मद्रकाः सिन्धुसौवीराः धर्मं विद्युः कथं त्विह ॥ ४२ ॥ पापदेशोद्भवा म्लेच्छा धर्माणामविचक्षणाः । मद्र तथा सिन्धु-सौवीर देशके लोग पापपूर्ण देशमें उत्पन्न हुए म्लेच्छ हैं। उन्हें धर्म-कर्मका पता नहीं है। वे इस जगत्में धर्मकी बातें कैसे समझ सकते हैं? ॥ ४२ १/२ ॥

एष मुख्यतमो धर्मः क्षत्रियस्येति नः श्रुतम् ॥ ४३ ॥ यदाजौ निहतः शेते सद्भिः समभिपूजितः । हमने सुना है कि क्षत्रियके लिये सबसे श्रेष्ठ धर्म यह है कि वह युद्धमें मारा जाकर रणभूमिमें सो जाय और सत्पुरुषोंके आदरका पात्र बने ॥ ४३ १/२ ॥

आयुधानां साम्पराये यन्मुच्येयमहं ततः ॥ ४४ ॥ ममैष प्रथमः कल्पो निधने स्वर्गमिच्छतः । मैं अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा किये जानेवाले युद्धमें अपने प्राणोंका परित्याग करूँ, यही मेरे लिये प्रथम श्रेणीका कार्य है; क्योंकि मैं मृत्युके पश्चात् स्वर्ग पानेकी अभिलाषा रखता हूँ ॥ ४४ १/२ ॥

सोऽयं प्रियः सखा चास्मि धार्तराष्ट्रस्य धीमतः ॥ ४५ ॥ तदर्थे हि मम प्राणा यच्च मे विद्यते वसु ।

व्यक्तं त्वमप्युपहितः पाण्डवैः पापदेशज ।। ४६ ।। यथा चामित्रवत् सर्वं त्वमस्मासु प्रवर्तसे । मैं बुद्धिमान् दुर्योधनका प्रिय मित्र हूँ। अतः मेरे पास जो कुछ धन-वैभव है, वह और मेरे प्राण भी उसीके लिये हैं। परंतु पापदेशमें उत्पन्न हुए शल्य! यह स्पष्ट जान पड़ता है कि पाण्डवोंने तुम्हें हमारा भेद लेनेके लिये ही यहाँ रख छोड़ा है; क्योंकि तुम हमारे साथ शत्रुके समान ही सारा बर्ताव कर रहे हो ।। ४५-४६ १/२ ।।

कामं न खलु शक्योऽहं त्वद्विधानां शतैरपि ।। ४७ ।। संग्रामाद् विमुखः कर्तुं धर्मज्ञ इव नास्तिकैः । जैसे सैकड़ों नास्तिक मिलकर भी धर्मज्ञ पुरुषको धर्मसे विचलित नहीं कर सकते, उसी प्रकार तुम्हारे-जैसे सैकड़ों मनुष्योंके द्वारा भी मुझे संग्रामसे विमुख नहीं किया जा सकता, यह निश्चय है ।। ४७ १/२ ।।

सारङ्ग इव घर्मार्तः कामं विलप शुष्य च ।। ४८ ।। नाहं भीषयितुं शक्यः क्षत्रवृत्ते व्यवस्थितः । तुम धूपसे संतप्त हुए हरिणके समान चाहे विलाप करो चाहे सूख जाओ। क्षत्रियधर्ममें स्थित हुए मुझ कर्णको तुम डरा नहीं सकते ।। ४८ १/२ ।।

तनुत्यजां नृसिंहानामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।। ४९ ।। या गतिर्गुरुणा प्रोक्ता पुरा रामेण तां स्मरे । पूर्वकालमें गुरुवर परशुरामजीने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले एवं शत्रुका सामना करते हुए प्राण विसर्जन कर देनेवाले पुरुषसिंहोंके लिये जो उत्तम गति बतायी है, उसे मैं सदा याद रखता हूँ ।। ४९ १/२ ।।

तेषां त्राणार्थमुद्यन्तं वधार्थं द्विषतामपि ।। ५० ।। विद्धि मामास्थितं वृत्तं पौरूरवसमुत्तमम् । शल्य! तुम यह जान लो कि मैं धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी रक्षाके लिये वैरियोँका वध करनेके लिये उद्यत हो राजा पुरूरवाके उत्तम* चरित्रका आश्रय लेकर युद्धभूमिमें डटा हुआ हूँ ।। ५० १/२ ।।

न तद् भूतं प्रपश्यामि त्रिषु लोकेषु मद्रप ।। ५१ ।। यो मामस्मादभिप्रायाद् वारयेदिति मे मतिः । मद्रराज! मैं तीनों लोकोंमें किसी ऐसे प्राणीको नहीं देखता, जो मुझे मेरे इस संकल्पसे विचलित कर दे, यह मेरा दृढ़ निश्चय है ।। ५१ १/२ ।।

एवं विद्वञ्जोषमास्व त्रासात् किं बहु भाषसे ।। ५२ ।। मा त्वां हत्वा प्रदास्यामि क्रव्याद्भ्यो मद्रकाधम ।

समझदार शल्य! ऐसा जानकर चुपचाप बैठे रहो। डरके मारे बहुत बड़बड़ाते क्यों हो। मद्रदेशके नराधम! यदि तुम चुप न हुए तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके मांसभक्षी प्राणियोंको बाँट दूँगा ।। ५२ ½ ।।
मित्रप्रतीक्षया शल्य धृतराष्ट्रस्य चोभयोः ।। ५३ ।।
अपवादतितिक्षाभिस्त्रिभिरेतैर्हि जीवसि ।
शल्य! एक तो मैं मित्र दुर्योधन और राजा धृतराष्ट्र दोनोंके कार्यकी ओर दृष्टि रखता हूँ, दूसरे अपनी निन्दासे डरता हूँ और तीसरे मैंने क्षमा करनेका वचन दिया है—इन्हीं तीन कारणोंसे तुम अबतक जीवित हो ।। ५३ ½ ।।
पुनश्चेदीदृशं वाक्यं मद्रराज वदिष्यसि ।। ५४ ।।
शिरस्ते पातयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
मद्रराज! यदि फिर ऐसी बात बोलोगे तो मैं अपनी वज्र-सरीखी गदासे तुम्हारा मस्तक चूर-चूर करके गिरा दूँगा ।। ५४ ½ ।।
श्रोतारस्त्विदमद्येह द्रष्टारो वा कुदेशज ।। ५५ ।।
कर्णं वा जघ्नतुः कृष्णौ कर्णो वा निजघान तौ ।
नीच देशमें उत्पन्न शल्य! आज यहाँ सुननेवाले सुनेंगे और देखनेवाले देख लेंगे कि 'श्रीकृष्ण और अर्जुनने कर्णको मारा या कर्णने ही उन दोनोंको मार गिराया' ।। ५५ ½ ।।
एवमुक्त्वा तु राधेयः पुनरेव विशाम्पते ।
अब्रवीन्मद्रराजानं याहि याहीत्यसम्भ्रमम् ।। ५६ ।।
प्रजानाथ! ऐसा कहकर राधापुत्र कर्णने बिना किसी घबराहटके पुनः मद्रराज शल्यसे कहा—‘चलो, चलो’ ।। ५६ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णमद्राधिपसंवादे चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।


* युद्धसे पीछे न हटना ही राजा पुरूरवाका उत्तम चरित्र है।

राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना

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एकचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा शल्यका कर्णको एक हंस और कौएका उपाख्यान सुनाकर उसे श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए उनकी शरणमें जानेकी सलाह देना

संजय उवाच

मारिषाधिरथेः श्रुत्वा वाचो युद्धाभिनन्दिनः ।
शल्योऽब्रवीत् पुनः कर्णं निदर्शनमिदं वचः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**माननीय नरेश! युद्धका अभिनन्दन करनेवाले अधिरथपुत्र कर्णकी पूर्वोक्त बात सुनकर फिर शल्यने उससे यह दृष्टान्तयुक्त बात कही— ॥ १ ॥

जातोऽहं यज्वनां वंशे संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् ।
राज्ञां मूर्धाभिषिक्तानां स्वयं धर्मपरायणः ॥ २ ॥
'सूतपुत्र! मैं युद्धमें पीठ न दिखानेवाले यज्ञपरायण, मूर्धाभिषिक्त नरेशोंके कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और स्वयं भी धर्ममें तत्पर रहता हूँ ॥ २ ॥

यथैव मत्तो मद्येन त्वं तथा लक्ष्यसे वृष ।
तथाद्य त्वां प्रमाद्यन्तं चिकित्सेयं सुहृत्तया ॥ ३ ॥
किंतु वृषभस्वरूप कर्ण! जैसे कोई मदिरासे मतवाला हो गया हो, उसी प्रकार तुम भी उन्मत्त दिखायी दे रहे हो; अतः मैं हितैषी सुहृद् होनेके नाते तुम-जैसे प्रमत्तकी आज चिकित्सा करूँगा ॥ ३ ॥

इमां काकोपमां कर्ण प्रोच्यमानां निबोध मे ।
श्रुत्वा यथेष्टं कुर्यास्त्वं निहीन कुलपांसन ॥ ४ ॥
ओ नीच कुलांगार कर्ण! मेरे द्वारा बताये जानेवाले कौएके इस दृष्टान्तको सुनो और सुनकर जैसी इच्छा हो वैसा करो ॥ ४ ॥

नाहमात्मनि किंचिद् वै किल्बिषं कर्ण संस्मरे ।
येन मां त्वं महाबाहो हन्तुमिच्छस्यनागसम् ॥ ५ ॥
महाबाहु कर्ण! मुझे अपना कोई ऐसा अपराध नहीं याद आता है, जिसके कारण तुम मुझ निरपराधको भी मार डालनेकी इच्छा रखते हो ॥ ५ ॥

अवश्यं तु मया वाच्यं बुद्ध्यता त्वद्धिताहितम् ।
विशेषतो रथस्थेन राज्ञश्चैव हितैषिणा ॥ ६ ॥
मैं राजा दुर्योधनका हितैषी हूँ और विशेषतः रथपर सारथि बनकर बैठा हूँ; इसलिये तुम्हारे हिताहितको जानते हुए मेरा आवश्यक कर्तव्य है कि तुम्हें वह सब बता दूँ ॥ ६ ॥