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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

नूनं मित्रमुखः शत्रुः कश्चिदार्यवदाचरन् । वञ्चयित्वा गतस्त्वां वै तेनासि हरिणः कृशः ॥ १७ ॥ निश्चय ही कोई शत्रु मुँहसे मित्रताकी बातें करता हुआ आया, श्रेष्ठ पुरुषके समान बर्ताव करने लगा और तुम्हें ठगकर चला गया; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो ॥ १७ ॥

प्रकाशार्थगतिर्नूनं रहस्यकुशलः कृती । तज्ज्ञैर्न पूज्यसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ १८ ॥ तुम्हारी अर्थगति—कार्यपद्धति सबको विदित है, तुम रहस्यकी बातें समझानेमें कुशल और विद्वान् हो तो भी गुणज्ञ पुरुष तुम्हारा आदर नहीं करते हैं; इसीसे तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ॥ १८ ॥

असत्स्वपि निविष्टेषु ब्रुवतो मुक्तसंशयम् । गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ १९ ॥ तुम दुराग्रही दुष्ट पुरुषोंके बीचमें ही संशयरहित होकर उत्तम बात कहते हो, तो भी तुम्हारे गुण वहाँ प्रकाशित नहीं होते; इसीलिये तुम दुर्बल होते और फीके पड़ते जा रहे हो ॥ १९ ॥

धनबुद्धिश्रुतैर्हीनः केवलं तेजसान्वितः । महत् प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २० ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्यासे हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसीलिये तुम पाण्डुवर्णके हो गये हो और तुम्हारा शरीर भी सूखता जा रहा है ॥ २० ॥

तपःप्रणिहितात्मानं मन्ये त्वारण्यकाङ्क्षिणम् । बान्धवा नाभिनन्दन्ति तेनासि हरिणः कृशः ॥ २१ ॥ मुझे यह भी जान पड़ता है कि तुम्हारा मन तपस्यामें लगा है और इसलिये तुम जंगलमें रहना चाहते हो, परंतु तुम्हारे भाई-बन्धु इस बातको पसंद नहीं करते हैं; इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो गये हो ॥ २१ ॥

(सुदुर्विनीतः पुत्रो वा जामाता वा प्रमार्जकः । दारा वा प्रतिकूलास्ते तेनासि हरिणः कृशः ॥ अथवा यह भी सम्भव है कि तुम्हारा पुत्र दुर्विनीत—उद्दण्ड हो, या दामाद घरकी सारी सम्पत्ति झाड़-पोंछकर ले जानेवाला हो या तुम्हारी पत्नी प्रतिकूल स्वभावकी हो; इसीसे तुम कृशकाय और पीले होते जा रहे हो ।।

भ्रातरोऽतीव विषमाः पिता वा क्षुत्क्षतो मृतः । माता ज्येष्ठो गुरुर्वापि तेनासि हरिणः कृशः ॥

तुम्हारे भाई बड़े बेईमान हों अथवा तुम्हारे पिता, माता या ज्येष्ठ भाई एवं गुरुजन भूखसे दुर्बल होकर मर गये हों, इस बातकी भी सम्भावना है। शायद इसीसे तुम्हारे शरीरका रंग सफेद हो गया है और तुम सूखते चले जा रहे हो ॥
ब्राह्मणो वा हतो गौर्वा ब्रह्मस्वं वा हृतं पुरा ।
देवस्वं वाधिकं काले तेनासि हरिणः कृशः ॥
अथवा यह भी अनुमान होता है कि पहले तुमने किसी ब्राह्मण या गौकी हत्या की हो, किसी ब्राह्मण या देवताका किसी समय अधिक-से-अधिक धन चुरा लिया हो, इसीलिये तुम कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥
हृतदारोऽथ वृद्धो वा लोके द्विष्टोऽथ वा नरैः ।
अविज्ञानेन वा वृद्धस्तेनासि हरिणः कृशः ॥
यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्रीका किसीने अपहरण कर लिया हो। अथवा तुम बूढ़े हो चले हो या जगत्के मनुष्य तुमसे द्वेष करने लगे हों। अथवा अज्ञानके द्वारा ही तुम बढ़े-चढ़े हो और इसीलिये चिन्ताके कारण तुम्हारा शरीर सफेद तथा दुर्बल हो गया हो ॥
वार्धक्यार्थं धनं दृष्ट्वा स्वां श्रीर्वापि परैर्हृता ।
वृत्तिर्वा दुर्जनापेक्षा तेनासि हरिणः कृशः ॥)
बुढ़ापेके लिये तुम्हारे पास धनका संग्रह देखकर दूसरोंने तुम्हारी उस निजी सम्पत्तिका अपहरण कर लिया हो अथवा जीविकाके लिये दुष्ट पुरुषोंकी अपेक्षा रखनी पड़ती हो, इसकी भी सम्भावना जान पड़ती है। शायद इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर दुबला होता और पीला पड़ता जा रहा हो ॥
इष्टभार्यस्य ते नूनं प्रातिवेश्यो महाधनः ।
युवा सुललितः कामी तेनासि हरिणः कृशः ॥ २२ ॥
यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्री परम सुन्दरी होनेके कारण तुम्हें बहुत प्रिय हो और तुम्हारे पड़ोसमें ही कोई बहुत सुन्दर, महाधनी और कामी नवयुवक निवास करता हो! इसी चिन्तासे तुम दुबले और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २२ ॥
नूनमर्थवतां मध्ये तव वाक्यमनुत्तमम् ।
न भाति कालेऽभिहितं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २३ ॥
निश्चय ही तुम धनवानोंके बीच परम उत्तम और समयोचित बात कहते होगे, किंतु वह उन्हें पसंद न आती होगी। इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ॥
दृढपूर्वं श्रुतं मूर्खं कुपितं हृदयप्रियम् ।
अनुनेतुं न शक्नोषि तेनासि हरिणः कृशः ॥ २४ ॥
तुम्हारा कोई पहलेका दृढ़ निश्चयवाला प्रिय व्यक्ति मूर्खताके कारण तुमपर कुपित हो गया होगा और तुम उसे किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त नहीं कर पाते होगे। इसीलिये तुम दुर्बल और फीके पड़ते जा रहे हो ॥ २४ ॥

नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते । कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २५ ॥ निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत (पीत) वर्णके और दुबले हो रहे हो ॥ २५ ॥

नूनं त्वां सुगुणैर्युक्तं पूजयानं सुहृद्ध्रुवम् । ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ अवश्य ही तुम सद्गुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है। इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो ॥ २६ ॥

अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया । विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिणः कृशः ॥ २७ ॥ निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २७ ॥

नानाबुद्धिरुचो लोके मनुष्यान् नूनमिच्छसि । ग्रहीतुं स्वगुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ २८ ॥ निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो। इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो ॥ २८ ॥

अविद्वान् भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् । यशः प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २९ ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो। इसीलिये कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥ २९ ॥

चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते । कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३० ॥ तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये। इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो ॥ ३० ॥

नूनमात्मकृतं दोषमपश्यन् किंचिदात्मनः । अकारणेऽभिशप्तोऽसि तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३१ ॥

एक बात यह भी ध्यानमें आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखायी नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं। शायद इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३१ ॥

साधून् गृहस्थान् दृष्ट्वा च तथा साधून् वनेचरान् ।
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३२ ॥
तुम विरक्त साधुओंको गृहस्थ, दुर्जनोंको वनवासी तथा संन्यासियोंको मठ-मन्दिरमें आसक्त देखते हो; इसीलिये सफेद और दुर्बल होते जा रहे हो ॥ ३२ ॥

सुहृदां दुःखमार्तानां न प्रमोक्ष्यसि चार्तिजम् ।
अलमर्थगुणैर्हीनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३३ ॥
तुम्हारे स्नेही बन्धु-बान्धव रोग आदिसे पीड़ित होकर महान् दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ाजनित कष्टसे मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी तुम अर्थ-लाभसे हीन पाते हो; शायद इसीलिये तुम सफेद और दुबले-पतले हो गये हो ॥ ३३ ॥

धर्म्ममर्थ्यं च काम्यं च काले चाभिहितं वचः ।
न प्रतीयन्ति ते नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३४ ॥
तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं। इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो ॥ ३४ ॥

दत्तानकुशलैरर्थान् मनीषी संजिजीविषुः ।
प्राप्य वर्तयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३५ ॥
मनीषी होनेपर भी तुम जीवन-निर्वाहकी इच्छासे ही अज्ञानी पुरुषोंके दिये हुए धनको लेकर उसीपर गुजारा करते हो; इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो ॥ ३५ ॥

पापात् प्रवर्धतो दृष्ट्वा कल्याणानावसीदतः ।
ध्रुवं गर्हयसे नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३६ ॥
पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोंमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन्दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो ॥ ३६ ॥

परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि ।
सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३७ ॥
एक दूसरेसे विरोध रखनेवाले अपने सुहृदोंको रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो ॥ ३७ ॥

श्रोत्रियांश्च विकर्मस्थान् प्राज्ञांश्चाप्यजितेन्द्रियान् ।
मन्येऽनुध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३८ ॥

वेदज्ञ ब्राह्मणोंको वेदविरुद्ध कर्ममें तत्पर और विद्वानोंको इन्द्रियोंके अधीन देखकर मेरी समझमें तुम निरन्तर चिन्तित रहते हो। सम्भवतः इसीलिये तुम्हारा शरीर सफेद (पीला) पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो ।। ३८ ।।
एवं सम्पूजितं रक्षो विप्रं तं प्रत्यपूजयत् ।
सखायमकरोच्चैनं संयोज्यार्थैर्मुमोच ह ।। ३९ ।।
ऐसा कहकर जब उस ब्राह्मणने राक्षसका समादर किया, तब राक्षसने भी ब्राह्मणका विशेष सत्कार किया। उसने ब्राह्मणको अपना मित्र बना लिया और उसे धन देकर छोड़ दिया ।। ३९ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हरिणकृशकाख्याने चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्बल और पाण्डुवर्णके राक्षसका आख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६७ १/३ श्लोक हैं)

श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिक

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पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

जन्म मानुष्यकं प्राप्य कर्मक्षेत्रं सुदुर्लभम् ।
श्रेयोऽर्थिना दरिद्रेण किं कर्तव्यं पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मनुष्यकुलमें जन्म और परम दुर्लभ कर्मक्षेत्र पाकर अपना कल्याण चाहनेवाले दरिद्र पुरुषको क्या करना चाहिये? ॥ १ ॥

दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथा यथा ।
मान्यान् पूज्यांश्च गाङ्गेय रहस्यं वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
गंगानन्दन! सब दानोंमें जो उत्तम दान है, जिस वस्तुका जिस-जिस प्रकारसे दान करना उचित है तथा जो माननीय और पूजनीय हैं—इन सब रहस्यमय (गोपनीय) विषयोंका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना ।
धर्माणां परमं गुह्यं भीष्मः प्रोवाच पार्थिवम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भीष्मजीने उनसे धर्मका परम गुह्य रहस्य बताना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् धर्मगुह्यानि भारत ।
यथा हि भगवान् व्यासः पुरा कथितवान् मयि ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! भरतनन्दन! पूर्वकालमें भगवान् वेदव्यासने मुझे धर्मके जो गूढ़ रहस्य बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४ ॥

देवगुह्यमिदं राजन् यमेनाक्लिष्टकर्मणा ।
नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम् ॥ ५ ॥
राजन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले यमने नियमपरायण और योगयुक्त होकर महान् तपके फलस्वरूप इस देवगुह्य रहस्यको प्राप्त किया था ॥ ५ ॥

येन यः प्रीयते देवः प्रीयन्ते पितरस्तथा ।
ऋषयः प्रमथाः श्रीश्च चित्रगुप्तो दिशां गजाः ॥ ६ ॥
जिससे देवता, पितर, ऋषि, प्रमथगण, लक्ष्मी, चित्रगुप्त और दिग्गज प्रसन्न होते हैं ॥ ६ ॥

ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः ।
महादानफलं चैव सर्वयज्ञफलं तथा ॥ ७ ॥
जिसमें महान् फल देनेवाले ऋषिधर्मका रहस्यसहित समावेश हुआ है तथा जिसके अनुष्ठानसे बड़े-बड़े दानों और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है ॥ ७ ॥

यश्चैतदेवं जानीयाज्ज्ञात्वा वा कुरुतेऽनघ ।
सदोषोऽदोषवांश्चैव तैर्गुणैः सह युज्यते ॥ ८ ॥
निष्पाप नरेश! जो उस धर्मको इस प्रकार जानता और जानकर इसके अनुसार आचरण करता है, वह सदोष (पापी) रहा हो भी तो उस दोषसे मुक्त होकर उन सद्गुणोंसे सम्पन्न हो जाता है ॥ ८ ॥

दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः ।
दशध्वजसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृपः ॥ ९ ॥
दस कसाइयोंके समान एक तेली, दस तेलियोंके समान एक कलवार, दस कलवारोंके समान एक वेश्या और दस वेश्याओंके समान एक राजा है ॥ ९ ॥

अर्धेनैतानि सर्वाणि नृपतिः कथ्यतेऽधिकः ।
त्रिवर्गसहितं शास्त्रं पवित्रं पुण्यलक्षणम् ॥ १० ॥
राजा इन सबकी अपेक्षा अधिक दोषयुक्त बताया जाता है, इसलिये ये सब पाप राजाके आधेसे भी कम हैं। (अतः राजाका दान लेना निषिद्ध है।) धर्म, अर्थ और कामका प्रतिपादन करनेवाला जो शास्त्र है, वह पवित्र एवं पुण्यका परिचय करानेवाला है ॥ १० ॥

धर्मव्याकरणं पुण्यं रहस्यश्रवणं महत् ।
श्रोतव्यं धर्मसंयुक्तं विहितं त्रिदशैः स्वयम् ॥ ११ ॥
उसमें धर्म और उसके रहस्योंकी व्याख्या है वह परम पवित्र, महान् रहस्यमय तत्त्वका श्रवण करानेवाला, धर्मयुक्त और साक्षात् देवताओंद्धारा निर्मित है। उसका श्रवण करना चाहिये ॥ ११ ॥

पितॄणां यत्र गुह्यानि प्रोच्यन्ते श्राद्धकर्मणि ।
देवतानां च सर्वेषां रहस्यं कथ्यतेऽखिलम् ॥ १२ ॥
ऋषिधर्मः स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफलः ।
महायज्ञफलं चैव सर्वदानफलं तथा ॥ १३ ॥
जिसमें पितरोंके श्राद्धके विषयमें गूढ़ बातें बतायी गयी हैं, जहाँ सम्पूर्ण देवताओंके रहस्यका पूरा-पूरा वर्णन है तथा जिसमें रहस्यसहित महान् फलदायी ऋषि-धर्मका एवं

बड़े-बड़े यज्ञों और सम्पूर्ण दानोंके फलका प्रतिपादन किया गया है ।। १२-१३ ।। ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति । श्रुत्वा च फलमाचष्टे स्वयं नारायणः प्रभुः ।। १४ ।। जो मनुष्य उस शास्त्रको सदा पढ़ते हैं, जिन्हें उसका तत्त्व हृदयंगम हो जाता है तथा जो उसका फल सुनकर दूसरोंके सामने व्याख्या करते हैं, वे साक्षात् भगवान् नारायणस्वरूप हो जाते हैं ।। १४ ।। गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम् । एतत् फलमवाप्नोति यो नरोऽतिथिपूजकः ।। १५ ।। जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है ।। १५ ।। श्रोतारः श्रद्धानाश्च येषां शुद्धं च मानसम् । तेषां व्यक्तं जिता लोकाः श्रद्दधानेन साधुना ।। १६ ।। जो श्रद्धापूर्वक धर्मशास्त्रका श्रवण करते हैं तथा जिनका हृदय शुद्ध हो गया है, वे श्रद्धालु एवं श्रेष्ठ मनके द्वारा अवश्य ही पुण्यलोकपर विजय प्राप्त कर लेते हैं ।। १६ ।। मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते । धर्मं च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नरः ।। १७ ।। शुद्धचित्त पुरुष श्रद्धापूर्वक शास्त्र-श्रवण करनेसे पूर्व पापसे मुक्त हो जाता है तथा वह भविष्यमें भी पापसे लिप्त नहीं होता है। नित्य-प्रति धर्मका अनुष्ठान करता है और मरनेके बाद उसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ।। १७ ।। कस्यचित् त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया । स्थितो ह्यन्तर्हितो भूत्वा पर्यभाषत वासवम् ।। १८ ।। एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात् पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा— ।। १८ ।। यौ तौ कामगुणोपेतावश्विनौ भिषजां वरौ । आज्ञयाहं तयोः प्राप्तः सनरान् पितृदैवतान् ।। १९ ।। 'वे जो कमनीय गुणोंसे सम्पन्न वैद्यप्रवर अश्विनीकुमार हैं, उन दोनोंकी आज्ञासे मैं यहाँ देवताओं, पितरों और मनुष्योंके पास आया हूँ ।। १९ ।। कस्माद्धि मैथुनं श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् । किमर्थं च त्रयः पिण्डाः प्रविभक्ताः पृथक् पृथक् ।। २० ।। 'मेरे मनमें यह जिज्ञासा हुई है कि श्राद्धके दिन श्राद्ध-कर्ता और श्राद्धान्न भोजन करनेवाले ब्राह्मणके लिये जो मैथुनका निषेध किया गया है, उसका क्या कारण है? तथा श्राद्धमें पृथक्-पृथक् तीन पिण्ड किसलिये दिये जाते हैं? ।। २० ।।

प्रथमः कस्य दातव्यो मध्यमः क्व च गच्छति । उत्तरश्च स्मृतः कस्य एतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २१ ॥ ‘प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ श्रद्दधानेन दूतेन भाषितं धर्मसंहितम् । पूर्वस्थास्त्रिदशाः सर्वे पितरः पूज्य खेचरम् ॥ २२ ॥ उस श्रद्धालु देवदूतके इस प्रकार धर्मयुक्त भाषण करनेपर पूर्वदिशामें स्थित हुए सभी देवताओं और पितरोंने उस आकाशचारी पुरुषकी प्रशंसा करते हुए कहा ॥ २२ ॥

पितर ऊचुः स्वागतं तेऽस्तु भद्रं ते श्रूयतां खेचरोत्तम । गूढार्थः परमः प्रश्नो भवता समुदीरितः ॥ २३ ॥ **पितर बोले—**आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! तुम्हारा स्वागत है। तुम कल्याणके भागी होओ। तुमने गूढ़ अभिप्रायसे युक्त बहुत उत्तम प्रश्न उपस्थित किया है। इसका उत्तर सुनो ॥ २३ ॥ श्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं व्रजेत् ।

पितरस्तस्य तं मासं तस्मिन् रेतसि शेरते ॥ २४ ॥
जो पुरुष श्राद्धका दान और भोजन करके स्त्रीके साथ समागम करता है, उसके पितर उस महीनेभर उसी वीर्यमें शयन करते हैं ॥ २४ ॥

प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।
पिण्डो ह्यधस्ताद् गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत् ॥ २५ ॥
पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नी त्वेका समश्नुते ।
पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तै दद्याज्जातवेदसि ॥ २६ ॥
अब मैं पिण्डोंका क्रमशः विभाग बताऊँगा। श्राद्धमें जो तीन पिण्डोंका विधान है, उनमें पहला पिण्ड जलमें डाल देना चाहिये। मध्यम पिण्ड केवल श्राद्धकर्ताकी पत्नीको भोजन करना चाहिये और उनमें जो तीसरा पिण्ड है, उसे आगमें डाल देना चाहिये ॥ २५-२६ ॥

एष श्राद्धविधिः प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते ।
पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहृष्टमनसः सदा ॥ २७ ॥
प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति ।
यही श्राद्धकी विधि बतायी गयी है, जिसके अनुसार चलनेपर धर्मका लोप नहीं होता। जो इस धर्मका पालन करता है, उसके पितर सदा प्रसन्नचित्त एवं संतुष्ट रहते हैं। उसकी संतति बढ़ती है और कभी क्षीण नहीं होती ॥ २७ १/२ ॥

देवदूत उवाच

आनुपूर्व्येण पिण्डानां प्रविभागः पृथक् पृथक् ॥ २८ ॥
पितॄणां त्रिषु सर्वेषां निरुक्तं कथितं त्वया ।
देवदूतने पूछा—पितृगण! आपलोगोंने क्रमशः पिण्डोंका विभाग बतलाया और तीनों लोकोंमें जो समस्त पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेका शास्त्रोक्त प्रकार भी बतला दिया ॥ २८ १/२ ॥

एकः समुद्धृतः पिण्डो ह्यधस्तात् कस्य गच्छति ॥ २९ ॥
कं वा प्रीणयते देवं कथं तारयते पितॄन् ।
किंतु पहले पिण्डको उठाकर जो नीचे जलमें डाल देनेकी बात कही गयी है, उसके अनुसार यदि वह जलमें डाला जाय तो वह किसको प्राप्त होता है? किस देवताको तृप्त करता है? और किस प्रकार पितरोंको तारता है? ॥ २९ १/२ ॥

मध्यमं तु तदा पत्नी भुङ्क्तेऽनुज्ञातमेव हि ॥ ३० ॥
किमर्थं पितरस्तस्य कव्यमेव च भुञ्जते ।
इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार मध्यम पिण्ड पत्नी ही खाती है तो उसके पितर किस प्रकार उस पिण्डका उपभोग करते हैं? ॥ ३० १/२ ॥

अत्र यस्त्वन्तिमः पिण्डो गच्छते जातवेदसम् ॥ ३१ ॥ भवते का गतिस्तस्य कं वा समनुगच्छति । तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है? ॥ ३१ ½ ॥ एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गतिः ॥ ३२ ॥ फलं वृत्तिं च मार्गं च यश्चैनं प्रतिपद्यते । यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये ॥ ३२ ½ ॥

पितर ऊचुः

सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरितः ॥ ३३ ॥ रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टाः स्म गगनेचर । एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्च मुनयस्तथा ॥ ३४ ॥ पितरोंने कहा—आकाशचारी देवदूत! तुमने यह महान् प्रश्न उपस्थित किया है और हमलोगोंसे अद्भुत रहस्यकी बात पूछी है। देवता और मुनि भी इस पितृकर्मकी प्रशंसा करते हैं ॥ ३३-३४ ॥ तेऽप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् । वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम् ॥ ३५ ॥ पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशाः । परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं। जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है, उन सर्वश्रेष्ठ चिरजीवी महात्मा मार्कण्डेयको छोड़कर और किसीको उसका पता नहीं है ॥ ३५ ½ ॥ त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम् ॥ ३६ ॥ देवदूतेन यः पृष्टः श्राद्धस्य विधिनिश्चयः । गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम ॥ ३७ ॥ उन्होंने भगवान् विष्णुसे तीनों पिण्डोंकी गति सुनकर श्राद्धका रहस्य जान लिया है। देवदूत! तुमने जो श्राद्धविधिका निर्णय पूछा है, उसके अनुसार तीनों पिण्डोंकी गति बतायी जा रही है। सावधान होकर मुझसे सुनो ॥ ३६-३७ ॥ अपो गच्छति यो ह्यत्र शशिनं ह्येष प्रीणयेत् । शशी प्रीणयते देवान् पितॄंश्चैव महामते ॥ ३८ ॥ महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ॥ भुङ्क्ते तु पत्नी यं चैषामनुज्ञाता तु मध्यमम् ।

पुत्रकामाय पुत्रं तु प्रयच्छन्ति पितामहाः ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार श्राद्धकर्ताकी पत्नी गुरुजनोंकी आज्ञासे जो मध्यम पिण्डका भक्षण करती है, उससे प्रसन्न हुए पितामह पुत्रकी कामनावाले पुरुषको पुत्र प्रदान करते हैं ॥ ३९ ॥ हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे । पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीताः कामान् दिशन्ति च ॥ ४० ॥ अग्निमें जो पिण्ड डाला जाता है, उसके विषयमें भी मुझसे समझ लो। उससे पितर तृप्त होते हैं और तृप्त होकर वे मनुष्यकी सब कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ४० ॥ एतत् ते कथितं सर्वं त्रिषु पिण्डेषु या गतिः । ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति ॥ ४१ ॥ तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्यं हि मैथुनम् । शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम ॥ ४२ ॥ इस प्रकार तुम्हें यह सब कुछ बताया गया। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका भी प्रतिपादन किया गया। श्राद्धमें भोजनके लिये निमन्त्रित हुआ ब्राह्मण उस दिनके लिये यजमानके पितृभावको प्राप्त हो जाता है; अतः उस दिन उसके लिये मैथुनको त्याज्य मानते हैं। आकाशचारियोंमें श्रेष्ठ देवदूत! ब्राह्मणको स्नान आदिसे पवित्र होकर सदा श्राद्धमें भोजन करना चाहिये ॥ ४१-४२ ॥ ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा । तस्मात् स्नातः शुचिः क्षान्तः श्राद्धं भुञ्जीत वै द्विजः ॥ ४३ ॥ मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ॥ प्रजा विवर्धते चास्य यश्चैवं सम्प्रयच्छति । ततो विद्युत्प्रभो नाम ऋषिराह महातपाः ॥ ४४ ॥ जो इस प्रकार श्राद्धका दान देता है, उसकी संतति बढ़ती है। पितरोंके इस प्रकार कहनेके बाद विद्युत्प्रभ नामवाले एक महातपस्वी महर्षिने अपना प्रश्न उपस्थित किया ॥ ४४ ॥ आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूपं प्रकाशते । स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत् ॥ ४५ ॥ उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा- ॥ तिर्यग्योनिगतान् सत्त्वान् मर्त्या हिंसन्ति मोहिताः । कीटान् पिपीलिकान् सर्पान् मेषान् समृगपक्षिणः ॥ ४६ ॥ किल्बिषं सुबहु प्राप्ताः किंस्विदेषां प्रतिक्रिया ।

‘देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों, मृग, पक्षी और भेड़ आदिको तथा कीड़ों, चींटे-चींटियों एवं सर्पोंकी हिंसा करते हैं, इससे वे बहुत-सा पाप बटोर लेते हैं। उनके लिये इन पापोंसे छूटनेका क्या उपाय है?’ ।। ४६ १/२ ।।
ततो देवगणाः सर्वे ऋषयश्च तपोधनाः ।। ४७ ।।
पितरश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म तं मुनिम् ।
उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।। ४७ १/२ ।।

शक्र उवाच

कुरुक्षेत्रं गयां गङ्गां प्रभासं पुष्कराणि च ।। ४८ ।।
एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम् ।
तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ।। ४९ ।।
इन्द्र बोले— मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे। ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ।।
त्र्यहं स्नातः स भवति निराहारश्च वर्तते ।
स्पृशते यो गवां पृष्ठं बालधिं च नमस्यति ।। ५० ।।
जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोंमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ।।
ततो विद्युत्प्रभो वाक्यमभ्यभाषत वासवम् ।
अयं सूक्ष्मपरो धर्मस्तं निबोध शतक्रतो ।। ५१ ।।
तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा—‘शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।
घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्तः प्रियंगुणा ।
क्षीरेण षष्टिकान् भुक्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ५२ ।।
‘बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
श्रूयतां चापरं गुह्यं रहस्यमृषिचिन्तितम् ।
श्रुतं मे भाषमाणस्य स्थाणोः स्थाने बृहस्पतेः ।। ५३ ।।
रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते ।
‘एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये। इसे मैंने भगवान् शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान् रुद्रके साथ ही सुना था। देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।

पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम् ॥ ५४ ॥ निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताञ्जलिः । तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत् ॥ ५५ ॥ ‘जो पर्वतपर चढ़कर भोजनसे पूर्व एक पैरसे खड़ा हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हाथ जोड़े वहाँ अग्निदेवकी ओर देखता है, वह महान् तपस्यासे युक्त होकर उपवास करनेका फल पाता है’ ॥ ५४-५५ ॥

रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति । ग्रीष्मकालेऽथ वा शीते एवं पापमपोहति ॥ ५६ ॥ ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती । तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुनः ॥ ५७ ॥ ‘जो ग्रीष्म अथवा शीतकालमें सूर्यकी किरणोंसे तापित होता है, वह अपने सारे पापोंको नाश कर देता है। इस प्रकार मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। पापसे मुक्त हुए पुरुषको सनातन कान्ति प्राप्त होती है। वह अपने तेजसे सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है’ ॥ ५६-५७ ॥

मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराजः शतक्रतुः । उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम् ॥ ५८ ॥ तत्पश्चात् देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा— ॥

धर्मगुह्यं तु भगवन् मानुषाणां सुखावहम् । सरहस्यांश्च ये दोषास्तान् यथावदुदीरय ॥ ५९ ॥ ‘भगवन्! मनुष्योंको सुख देनेवाले धर्मके गूढ़-स्वरूपका तथा रहस्योंसहित जो दोष हैं, उनका भी यथावत्रूपसे वर्णन कीजिये’ ॥ ५९ ॥

बृहस्पतिरुवाच

प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये । हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्वति ॥ ६० ॥ बालवत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् । तेषां दोषान् प्रवक्ष्यामि तान् निबोध शचीपते ॥ ६१ ॥ बृहस्पतिजीने कहा—शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो ।।

भानुमाननिलश्चैव हव्यवाहश्च वासव ।

लोकानां मातरश्चैव गावः सृष्टाः स्वयम्भुवा ॥ ६२ ॥ वासव! साक्षात् ब्रह्माजीने सूर्य, वायु, अग्नि तथा लोकमाता गौओंकी सृष्टि की है ॥ ६२ ॥ लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येष्वेतेषु देवताः । सर्वे भवन्तः शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम् ॥ ६३ ॥ ये मर्त्यलोकके देवता हैं तथा सम्पूर्ण जगत्‌का उद्धार करनेकी शक्ति रखते हैं। आप सब लोग सुनें, मैं एक-एक धर्मका निश्चय बता रहा हूँ ॥ ६३ ॥ वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वृत्ताः कुलपांसनाः । स्त्रियः सर्वाश्च दुर्वृत्ताः प्रतिमेहन्ति या रविम् ॥ ६४ ॥ अनिलद्वेषिणः शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोंतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है ॥ ६४ १/२ ॥ हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिधं ये न जुह्वति ॥ ६५ ॥ अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावकः । जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते, उनके अग्निहोत्रमें अग्निदेव हविष्य ग्रहण नहीं करते हैं (अतः अग्नि प्रज्वलित किये बिना उसे आहुति नहीं देनी चाहिये) ॥ ६५ १/२ ॥ क्षीरं तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवाः ॥ ६६ ॥ न तेषां क्षीरपाः केचिज्जायन्ते कुलवर्धनाः । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च ॥ ६७ ॥ जो मानव छोटे बछड़ेवाली गौओंके दूध दुहकर पी जाते हैं, उनके वंशमें दूध पीनेवाले और कुलकी वृद्धि करनेवाले कोई बालक नहीं उत्पन्न होते हैं। उनकी संतान नष्ट हो जाती है तथा उनके कुल एवं वंशका क्षय हो जाता है ॥ ६६-६७ ॥ एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्विजातिभिः । तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्यं कार्यं च नित्यशः ॥ ६८ ॥ भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अतः अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है, उन कर्मोंको त्याग देना चाहिये और जो कर्तव्य कर्म है, उसका सदा अनुष्ठान करते रहना चाहिये। यह मैं तुम्हें सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ६८ १/२ ॥ ततः सर्वा महाभाग देवताः समरुद्गणाः ॥ ६९ ॥ ऋषयश्च महाभागाः पृच्छन्ति स्म पितृंस्ततः ।

तब मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा— ।। ६९ १/२ ।।
पितरः केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम् ।। ७० ।।
अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवोर्ध्वदैहिकम् ।
आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयुः केन कर्मणा ।। ७१ ।।
एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि नः ।
‘मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन-सा कर्म करें, जिससे आप सम्पूर्ण पितर उनके ऊपर संतुष्ट होंगे? श्राद्धमें दिया हुआ दान किस प्रकार अक्षय हो सकता है? अथवा मनुष्य किस कर्मसे किस प्रकार पितरोंके ऋणसे छुटकारा पा सकते हैं? हम यह सुनना चाहते हैं। यह सब सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है’ ।। ७०-७१ १/२ ।।

पितर ऊचुः
न्यायतो वै महाभागाः संशयः समुदाहृतः ।। ७२ ।।
श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्याना साधुकर्मणाम् ।
पितरोंने कहा—महाभाग देवताओ! आपने न्यायतः अपना संदेह उपस्थित किया है। उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये ।। ७२ १/२ ।।'
नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकैः ।। ७३ ।।
वर्षासु दीपकैश्चैव पितॄणामनृणो भवेत् ।
नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे और वर्षा-ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ।।
अक्षयं निर्व्यलीकं च दानमेतन्महाफलम् ।। ७४ ।।
अस्माकं परितोषश्च अक्षयः परिकीर्त्यते ।
इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान् फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है—ऐसा शास्त्रका कथन है ।।
श्रद्दधानाश्च ये मर्त्या आहरिष्यन्ति संततिम् ।। ७५ ।।
दुर्गात् ते तारयिष्यन्ति नरकात् प्रपितामहान् ।
जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ।।
पितॄणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोमा तपोधनः ।। ७६ ।।
वृद्धगार्ग्यो महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् ।
पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा— ।। ७६ १/२ ।।
के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधनाः ।। ७७ ।।

वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः । 'तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं?" ।। ७७१/२ ।।

पितर ऊचुः

नीलषण्डस्य लाङ्गूलं तोयमभ्युद्धरेद् यदि ।। ७८ ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः । **पितरोंने कहा—**मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोंतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ।।

यस्तु शृङ्गगतं पङ्कं कूलादुद्धृत्य तिष्ठति ।। ७९ ।। पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् । जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं ।। ७९१/२ ।।

वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छोभते नरः ।। ८० ।। तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं यः प्रयच्छति । वर्षा-ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं ।। ८०१/२ ।।

अमावास्यां तु ये मर्त्याः प्रयच्छन्ति तिलोदकम् ।। ८१ ।। पात्रमौदुम्बरं गृह्य मधुमिश्रं तपोधन । कृतं भवति तैः श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत् ।। ८२ ।। तपोधन! जो मनुष्य अमावास्याके दिन ताँबेके पात्रमें मधु एवं तिलसे मिश्रित जल लेकर उसके द्वारा पितरोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा रहस्यसहित श्राद्धकर्म यथार्थरूपसे सम्पादित हो जाता है ।। ८१-८२ ।।

हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा । कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् । श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात् पितृणामनृणो भवेत् ।। ८३ ।। उनकी प्रजा सदा हृष्ट-पुष्ट मनवाली होती है। कुल और वंश-परम्पराकी वृद्धि श्राद्धका फल है। पिण्डदान करनेवालेको यह फल सुलभ होता है। जो श्रद्धापूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, वह उनके ऋणसे छुटकारा पा जाता है ।। ८३ ।।

एवमेव समुद्दिष्टः श्राद्धकालक्रमस्तथा । विधिः पात्रं फलं चैव यथावदनुकीर्तितम् ।। ८४ ।।

इस प्रकार यह श्राद्धके काल, क्रम, विधि, पात्र और फलका यथावत्रूपसे वर्णन किया गया है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितृरहस्यं नाम पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२५ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पितरोंका रहस्य नामक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२५ ।।

विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन

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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन

भीष्म उवाच

केन ते च भवेत् प्रीतिः कथं तुष्टिं तु गच्छसि ।
इति पृष्टः सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरीश्वरः ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन कालकी बात है, एक बार देवराज इन्द्रने भगवान् विष्णुसे पूछा—'भगवन्! आप किस कर्मसे प्रसन्न होते हैं? किस प्रकार आपको संतुष्ट किया जा सकता है?' सुरेन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर जगदीश्वर श्रीहरिने कहा ॥ १ ॥

विष्णुरुवाच

ब्राह्मणानां परीवादो मम विद्वेषणं महत् ।
ब्राह्मणैः पूजितैर्नित्यं पूजितोऽहं न संशयः ॥ २ ॥

भगवान् विष्णु बोले—इन्द्र! ब्राह्मणोंकी निन्दा करना मेरे साथ महान् द्वेष करनेके समान है तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे सदा मेरी भी पूजा हो जाती हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

नित्याभिवाद्या विप्रेन्द्रा भुक्त्वा पादौ तथात्मनः ।
तेषां तुष्यामि मर्त्यानां यश्चक्रे च बलिं हरेत् ॥ ३ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिये। भोजनके पश्चात् अपने दोनों पैरोंकी भी सेवा करे अर्थात् पैरोंको भलीभाँति धो ले तथा तीर्थकी मृत्तिकासे सुदर्शन चक्र बनाकर उसपर मेरी पूजा करे और नाना प्रकारकी भेंट चढ़ावे। जो ऐसा करते हैं, उन मनुष्योंपर मैं सन्तुष्ट होता हूँ ॥ ३ ॥

वामनं ब्राह्मणं दृष्ट्वा वराहं च जलोत्थितम् ।
उद्धृतां धरणीं चैव मूर्ध्ना धारयते तु यः ॥ ४ ॥
न तेषामशुभं किंचित् कल्मषं चोपपद्यते ।

जो मनुष्य बौने ब्राह्मण और पानीसे निकले हुए वराहको देखकर नमस्कार करता और उनकी उठायी मृत्तिकाको मस्तकसे लगाता है, ऐसे लोगोंको कभी कोई अशुभ या पाप नहीं प्राप्त होता ॥ ४ ½ ॥

अश्वत्थं रोचनां गां च पूजयेद् यो नरः सदा ॥ ५ ॥
पूजितं च जगत् तेन सदेवासुरमानुषम् ।

जो मनुष्य अश्वत्थ वृक्ष, गोरोचना और गौकी सदा पूजा करता है, उसके द्वारा देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण जगत्की पूजा हो जाती है ।। ५ १/२ ।।
तेन रूपेण तेषां च पूजां गृह्णामि तत्त्वतः ।। ६ ।।
पूजा ममैषा नास्त्यन्या यावल्लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
उस रूपमें उनके द्वारा की हुई पूजाको मैं यथार्थरूपसे अपनी पूजा मानकर ग्रहण करता हूँ। जबतक ये सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं, तबतक यह पूजा ही मेरी पूजा है। इससे भिन्न दूसरे प्रकारकी पूजा मेरी पूजा नहीं है ।। ६ १/२ ।।
अन्यथा हि वृथा मर्त्याः पूजयन्त्यल्पबुद्धयः ।। ७ ।।
नाहं तत् प्रतिगृह्णामि न सा तुष्टिकरी मम ।। ८ ।।
अल्पबुद्धि मानव अन्य प्रकारसे मेरी व्यर्थ पूजा करते हैं। मैं उसे ग्रहण नहीं करता हूँ। वह पूजा मुझे संतोष प्रदान करनेवाली नहीं हैं ।। ७-८ ।।

इन्द्र उवाच
चक्रं पादौ वराहं च ब्राह्मणं चापि वामनम् ।
उद्धृतां धरणीं चैव किमर्थं त्वं प्रशंससि ।। ९ ।।
इन्द्रने पूछा—भगवन्! आप चक्र, दोनों पैर, बौने ब्राह्मण, वराह और उनके द्वारा उठायी हुई मिट्टीकी प्रशंसा किसलिये करते हैं? ।। ९ ।।
भवान् सृजति भूतानि भवान् संहरति प्रजाः ।
प्रकृतिः सर्वभूतानां समर्त्यानां सनातनी ।। १० ।।
आप ही प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, आप ही समस्त प्रजाका संहार करते हैं और आप ही मनुष्योंसहित सम्पूर्ण प्राणियोंकी सनातन प्रकृति (मूल कारण) हैं ।।

भीष्म उवाच
सम्प्रहस्य ततो विष्णुरिदं वचनमब्रवीत् ।
चक्रेण निहता दैत्याः पद्भ्यां क्रान्ता वसुन्धरा ।। ११ ।।
वाराहं रूपमास्थाय हिरण्याक्षो निपातितः ।
वामनं रूपमास्थाय जितो राजा मया बलिः ।। १२ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तब भगवान् विष्णुने हँसकर इस प्रकार कहा—‘देवराज! मैंने चक्रसे दैत्योंको मारा है। दोनों पैरोंसे पृथ्वीको आक्रान्त किया है। वाराहरूप धारण करके हिरण्याक्ष दैत्यको धराशायी किया है और वामन ब्राह्मणका रूप ग्रहण करके मैंने राजा बलिको जीता है ।। ११-१२ ।।
परितुष्टो भवाम्येवं मानुषाणां महात्मनाम् ।
तन्मां ये पूजयिष्यन्ति नास्ति तेषां पराभवः ।। १३ ।।