महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अधरे वसवः सर्वे मुखे चाग्निः प्रतिष्ठितः ॥ ‘नासिका-छिद्रोंमें गन्ध और सुगन्धित पुष्प, नीचेके ओठमें सब वसुगण तथा मुखमें अग्नि निवास करते हैं ।। साध्या देवाः स्थिताः कक्षे ग्रीवायां पार्वती स्थिता । पृष्ठे च नक्षत्रगणाः ककुद्देशे नभःस्थलम् ॥ अपाने सर्वतीर्थानि गोमूत्रे जाह्नवी स्वयम् । अष्टैश्वर्यमयी लक्ष्मीर्गोमये वसते सदा ।। ‘कक्षमें साध्य-देवता, गरदनमें पार्वती, पीठपर नक्षत्रगण, ककुद्के स्थानमें आकाश, अपानमें सारे तीर्थ, मूत्रमें साक्षात् गंगाजी तथा गोबरमें आठ ऐश्वर्योंसे सम्पन्न लक्ष्मीजी रहती हैं ।। नासिकायां सदा देवी ज्येष्ठा वसति भामिनी । श्रोणीतटस्थाः पितरो रमा लाङ्गूलमाश्रिता ॥ ‘नासिकामें परम सुन्दरी ज्येष्ठादेवी, नितम्बोंमें पितर एवं पूँछमें भगवती रमा रहती हैं ।। पार्श्वयोरुभयोः सर्वे विश्वेदेवाः प्रतिष्ठिताः । तिष्ठत्युरसि तासां तु प्रीतः शक्तिधरो गुहः ॥ ‘दोनों पसलियोंमें सब विश्वेदेव स्थित हैं और छातीमें प्रसन्नचित्त शक्तिधारी कार्तिकेय रहते हैं ।। जानुजङ्घोरुदेशेषु पञ्च तिष्ठन्ति वायवः । खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पन्नगाः ॥ ‘घुटनों और ऊरुओंमें पाँच वायु रहते हैं, खुरोंके मध्यमें गन्धर्व और खुरोंके अग्रभागमें सर्प निवास करते हैं ।। चत्वारः सागराः पूर्णास्तस्या एव पयोधराः । रतिर्मेधा क्षमा स्वाहा श्रद्धा शान्तिर्धृतिः स्मृतिः । कीर्तिर्दीप्तिः क्रिया कान्तिस्तुष्टिः पुष्टिश्श्व संततिः । दिशश्च प्रदिशश्चैव सेवन्ते कपिलां सदा ॥ ‘जलसे परिपूर्ण चारों समुद्र उसके चारों स्तन हैं। रति, मेधा, क्षमा, स्वाहा, श्रद्धा, शान्ति, धृति, स्मृति, कीर्ति, दीप्ति, क्रिया, कान्ति, तुष्टि, पुष्टि, संतति, दिशा और प्रदिशा आदि देवियाँ सदा कपिला गौका सेवन किया करती हैं ।। देवाः पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणाः । लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्याः सरितस्तथा ॥ देवाः पितृगणाश्चापि वेदाः साङ्गाः सहाध्वरैः । वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रैः स्तुवन्ति हृषितास्तथा ॥
विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा ।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥
‘देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण—ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं’ ॥
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा ।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे ।
‘वे कहते हैं—‘सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है। तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है। कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो’ ॥
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् ।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम् ॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥
‘समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं—‘अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दुःखोंको दूर करनेवाला है। अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है’ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः ।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-का उत्तम समय कौन-सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ॥
श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्निकम् ।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदुः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म (श्राद्ध) अपराह्नकालमें—ऐसा समझना चाहिये। जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ॥
अवघुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदुः ॥
जिसके लिये लोगोंमें ढिंढोरा पीटा गया हो, जिसमेंसे किसी असत्यवादी मनुष्यने भोजन कर लिया हो तथा जो कुत्तेसे छू गया हो, उस अन्नको राक्षसोंका भाग समझना चाहिये।।
यावन्तः पतिता विप्रा जडोन्मत्तादयोऽपि च।
दैवे च पित्र्ये ते विप्रा राजन् नार्हन्ति सत्क्रियाम्।।
राजन्! जितने पतित, जड और उन्मत्त ब्राह्मण हों, उनका देव-यज्ञ और पितृ-यज्ञमें सत्कार नहीं करना चाहिये।।
क्लीबः प्लीही च कुष्ठी च राजयक्ष्मान्वितश्च यः।
अपस्मारी च यश्चापि पित्र्ये नार्हति सत्कृतिम्।।
नपुंसक, प्लीहा रोगसे ग्रस्त, कोढ़ी और राजयक्ष्मा तथा मृगीका रोगी भी श्राद्धमें आदरके योग्य नहीं माना गया है।।
चिकित्सका देवलका मिथ्यानियमधारिणः।
सोमविक्रयिणश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
वैद्य, पुजारी, झूठे नियम धारण करनेवाले (पाखण्डी) तथा सोमरस बेचनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें सत्कार पानेके अधिकारी नहीं हैं।।
गायका नर्तकाश्चैव प्लवका वादकास्तथा।
कथका यौधिकाश्चैव श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
गवैये, नाचने-कूदनेवाले, बाजा बजानेवाले, बकवादी और योद्धा श्राद्धमें सत्कारके योग्य नहीं हैं।।
अनग्नयश्च ये विप्राः शवनिर्यातकाश्च ये।
स्तेनाश्चापि विकर्मस्था राजन् नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
राजन्! अग्निहोत्र न करनेवाले, मुर्दा ढोनेवाले, चोरी करनेवाले और शास्त्रविरुद्ध कर्मसे संलग्न रहनेवाले ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेयोग्य नहीं माने जाते।।
अपरिज्ञातपूर्वाश्च गणपुत्राश्च ये द्विजाः।
पुत्रिकापुत्रकाश्चापि श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
जो अपरिचित हों, जो किसी समुदायके पुत्र हों अर्थात् जिनके पिताका निश्चित पता न हो तथा जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार नानाके घरमें रहते हों, वे ब्राह्मण भी श्राद्धके अधिकारी नहीं हैं।।
रणकर्ता च यो विप्रो यश्च वाणिज्यको द्विजः।
प्राणिविक्रयवृत्तिश्च श्राद्धे नार्हन्ति सत्कृतिम्।।
युद्धमें लड़नेवाला, रोजगार करनेवाला तथा पशु-पक्षियोंकी बिक्रीसे जीविका चलानेवाला ब्राह्मण भी श्राद्धमें सत्कार पानेका अधिकारी नहीं है।।
चीर्णव्रतगुणैर्युक्ता नित्यं स्वाध्यायतत्पराः।
सवित्रीज्ञाः क्रियावन्तस्ते श्राद्धे सत्कृतिक्षमाः ॥ परंतु जो ब्राह्मण व्रतका आचरण करनेवाले, गुणवान्, सदा स्वाध्यायपरायण, गायत्रीमन्त्रके ज्ञाता और क्रियानिष्ठ हों, वे श्राद्धमें सत्कारके योग्य माने गये हैं ॥ श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा । दर्भाः सुमनसः क्षेत्रं तत्काले श्राद्धदो भवेत् ॥ श्राद्धका सबसे उत्तम काल है सुपात्र ब्राह्मणका मिलना। जिस समय भी ब्राह्मण, दही, घी, कुशा, फूल और उत्तम क्षेत्र प्राप्त हो जायँ, उसी समय श्राद्धका दान आस्मभ कर देना चाहिये ॥ चारित्रनिरता राजन् कृशा ये कृशवृत्तयः । तपस्विनश्च ये विप्रास्तथा भैक्षचराश्च ये ॥ अर्थिनः केचिदिच्छन्ति तेषां दत्तं महत् फलम् । राजन्! जो ब्राह्मण सदाचारी, थोड़ी-सी आजीविका-पर गुजारा करनेवाले, दुर्बल, तपस्वी और भिक्षासे निर्वाह करनेवाले हों, वे यदि याचक होकर कुछ माँगने आवें तो उन्हें दिये हुए दानका महान् फल होता है ॥ एवं धर्मभृतां श्रेष्ठ ज्ञात्वा सर्वात्मना तदा । श्रोत्रियाय दरिद्राय प्रयच्छानुपकारिणे ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! इन सब बातोंको पूर्णरूपसे जानकर धनहीन और अपना उपकार न करनेवाले वेदवेत्ता ब्राह्मणको दान करो ॥ दानं यत् ते प्रियं किंचिच्छ्रोत्रियाणां च यत् प्रियम् । तत् प्रयच्छस्व धर्मज्ञ यदिच्छसि तदक्षयम् ॥ धर्मज्ञ! यदि तुम अपने दानको अक्षय बनाना चाहते हो तो जो दान तुम्हें प्रिय लगता हो तथा जिसे वेदवेत्ता ब्राह्मण पसंद करते हों, वही दान करो ॥ निरयं ये च गच्छन्ति तच्छृणुष्व युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! अब नरकमें जानेवाले पुरुषोंका वर्णन सुनो ॥ परदारापहर्तारः परदाराभिमर्शकाः । परदारप्रयोक्तारस्ते वै निरयगामिनः ॥ जो परायी स्त्रीका अपहरण करते हैं, परस्त्रीके साथ व्यभिचार करते हैं और दूसरोंकी स्त्रियोंको दूसरे पुरुषोंसे मिलाया करते हैं, वे भी नरकमें पड़ते हैं ॥ सूचकाः संधिभेत्तारः परद्रव्योपजीविनः । वर्णाश्रमाणां ये बाह्याः पाखण्डाश्चैव पापिनः । उपासते च तानेव ते सर्वे नरकालयाः ॥ चुगलखोर, सुलहकी शर्त तोड़नेवाले, पराये धनसे जीविका चलानेवाले, वर्ण और आश्रमसे विरुद्ध आचरण करनेवाले, पाखण्डी, पापाचारी तथा जो उनकी सेवा करते हैं, वे
सब नरकगामी होते हैं ।। क्षान्तान् दान्तान् कृशान् प्राज्ञान् दीर्घकालं सहोषितान् । त्यजन्ति कृतकृत्या ये ते वै निरयगामिनः ॥ जो मनुष्य चिरकालतक अपने साथ रहे हुए सहनशील, जितेन्द्रिय, दुर्बल और बुद्धिमान् मनुष्योंको भी काम निकल जानेपर त्याग देते हैं, वे नरकगामी होते हैं ।। बालानामपि वृद्धानां श्रान्तानां चापि ये नराः । अदत्त्वाश्नन्ति मृष्टान्नं ते वै निरयगामिनः ॥ जो बच्चों, बूढ़ों तथा थके हुए मनुष्योंको कुछ न देकर अकेले ही मिठाई खाते हैं, उन्हें भी नरकमें गिरना पड़ता है ।। एते पूर्वर्षिभिः प्रोक्ता नरा निरयगामिनः । ये स्वर्गं समनुप्राप्तास्तान् शृणुष्व युधिष्ठिर ॥ प्राचीन कालके ऋषियोंने इस प्रकार नरकगामी मनुष्योंका वर्णन किया है। युधिष्ठिर! अब स्वर्गमें जानेवालोंका वर्णन सुनो ।। दानेन तपसा चैव सत्येन च दमेन च । ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो दान, तपस्या, सत्य-भाषण और इन्द्रियसंयमके द्वारा निरन्तर धर्माचरणमें लगे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। शुश्रूषयाप्युपाध्यायाच्छ्रुतमादाय पाण्डव । ये प्रतिग्रहनिस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ पाण्डुनन्दन! जो उपाध्यायकी सेवा करके उनसे वेद पढ़ते तथा प्रतिग्रहमें आसक्ति नहीं रखते, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।। मधुमांसासवेभ्यस्तु निवृत्ता व्रतिनस्तु ये । परदारनिवृत्ता ये ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मधु, मांस, आसव (मदिरा)-से निवृत्त होकर उत्तम व्रतका पालन करते हैं और परस्त्रीके संसर्गसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। मातरं पितरं चैव शुश्रूषन्ति च ये नराः । भ्रातृणामपि सस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो मनुष्य माता-पिताकी सेवा करते हैं तथा भाइयोंके प्रति स्नेह रखते हैं, वे मनुष्य स्वर्गको जाते हैं ।। ये तु भोजनकाले तु निर्याताश्चातिथिप्रियाः । द्वाररोधं न कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ जो भोजनके समय घरसे बाहर निकलकर अतिथि-सेवा करते हैं, अतिथियोंसे प्रेम रखते हैं और उनके लिये कभी अपना दरवाजा बंद नहीं करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते
हैं ।।
वैवाहिकं तु कन्यानां दरिद्राणां च ये नराः ।
कारयन्ति च कुर्वन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो दरिद्र मनुष्योंकी कन्याओंका धनियोंसे ब्याह करा देते हैं अथवा स्वयं धनी होते हुए भी दरिद्रकी कन्यासे ब्याह करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं ।।
रसानामथ बीजानामोषधीनां तथैव च ।
दातारः श्रद्धयोपेतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो श्रद्धापूर्वक रस, बीज और ओषधियोंका दान करते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
क्षेमाक्षेमं च मार्गेषु समानि विषमाणि च ।
अर्थिनां ये च वक्ष्यन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो मार्गमें जिज्ञासा करनेवाले पथिकोंको अच्छे-बुरे, सुखदायक और दुःखदायक मार्गका ठीक-ठीक परिचय दे देते हैं, वे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं ।।
पर्वद्वये चतुर्दश्यामष्टम्यां संध्ययोर्द्वयोः ।
आर्द्रायां जन्मनक्षत्रे विषुवे श्रवणेऽथवा ।
ये ग्राम्यधर्मविरतास्ते नराः स्वर्गगामिनः ।।
जो अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी—इन तिथियोंमें दोनों संध्याओंके समय, आर्द्रा नक्षत्रमें, जन्म-नक्षत्रमें, विषुव योगमें और श्रवण नक्षत्रमें स्त्रीसमागमसे बचे रहते हैं, वे मनुष्य भी स्वर्गमें जाते हैं ।।
हव्यकव्यविधानं च नरकस्वर्गगामिनौ ।
धर्माधर्मौ च कथितौ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
राजन्! इस प्रकार हव्य-कव्यके विधानका समय बताया गया और स्वर्ग तथा नरकमें ले जानेवाले धर्म-अधर्मोंका वर्णन किया गया। अब और क्या सुनना चाहते हो ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]
[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]
युधिष्ठिर उवाच
इदं मे तत्त्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
हिंसामकृत्वा यो मर्त्यो ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मनुष्य ब्राह्मणकी हिंसा किये बिना ही ब्रह्महत्याके पापसे कैसे लिप्त हो जाता है, इस विषयको पूर्णतया ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थं वृत्तिकर्शितम् ।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! जो जीविकारहित ब्राह्मणको स्वयं ही भिक्षा देनेके लिये बुलाकर पीछे इनकार कर जाता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।
मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष मध्यस्थ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
आश्रमे वाऽऽलये वापि ग्रामे वा नगरेऽपि वा ।
अग्निं यः प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो क्रोधमें भरकर किसी आश्रम, घर, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
गोकुलस्य तृषार्तस्य जलान्ते वसुधाधिप ।
उत्पादयति यो विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
पृथ्वीनाथ! प्याससे तड़पते हुए गोसमुदायको जो पानीके निकट पहुँचनेमें बाधा डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।
दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो परम्परागत वैदिक श्रुतियों और ऋषिप्रणीत सच्छास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।
चक्षुषा वापि हीनस्य पङ्गोर्वापि जडस्य वा ।
हरेद् वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो अन्धे, पंगु और गूँगे मनुष्यका सर्वस्व हरण कर लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।
गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्य च शासनम्।
वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो मूर्खतावश गुरुको ‘तू’ कहकर पुकारता है, हुंकारके द्वारा उनका तिरस्कार करता है तथा उनकी आज्ञाका उल्लंघन करके मनमाना बर्ताव करता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थितिः।
तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो दीन मनुष्य किंचित् प्राप्त वस्तुओंको ही अपने लिये सार-सर्वस्व समझता है और उनके नाशसे जिसकी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे मनुष्यका जो पुरुष सर्वस्व छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामपि दानानां यत् तु दानं विशिष्यते।
अभोज्यान्नांश्च ये विप्रास्तान् वदस्व सुरोत्तम॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवान्! जो दान सब दानोंसे श्रेष्ठ माना गया हो, उसको बतलाइये। सुरश्रेष्ठ! जिन ब्राह्मणोंका अन्न खाने योग्य न हो, उनका परिचय दीजिये॥
श्रीभगवानुवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सराः।
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति॥
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता अन्नकी प्रशंसा करते हैं, अतः अन्नके समान दान न कोई हुआ है न होगा॥
अन्नमूर्जस्करं लोके ह्यन्नात् प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
अभोज्यान्नान् मया राजन् वक्ष्यमाणान् निबोध मे॥
क्योंकि अन्न ही इस जगत्में बल देनेवाला है तथा अन्नके ही आधारपर प्राण टिके रहते हैं। राजन्! अब मैं उन लोगोंका परिचय दे रहा हूँ, जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं माना गया है, ध्यान देकर सुनो॥
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च।
अभिशप्तस्य षाण्ढस्य पाकभेदकरस्य च॥
चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिनः।
उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च॥
द्विषदन्नं न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छ्रुतम्।
यज्ञमें दीक्षित, कदर्य, क्रोधी, शठ, शापग्रस्त, नपुंसक, भोजनमें भेद करनेवाले, चिकित्सक, दूत, उच्छिष्टभोजी, वर्णसंकर तथा अशौचमें पड़े हुए मनुष्यका अन्न, शूद्रकी
जूठन, शत्रु का अन्न और जो पतितका अन्न माना गया है, उसे भी नहीं खाना चाहिये ।।
तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ।।
शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ।
अम्बष्ठकनिषादानां रङ्गावतरकस्य च ।।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ।
सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ।।
स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च ।
अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ।।
इसी प्रकार चुगलखोर, यज्ञका फल बेचनेवाले, नट और कपड़ा बुननेवाले जुलाहेका अन्न एवं कृतघ्नका अन्न, अम्बष्ठ, निषाद, रंगभूमिमें नाटक खेलनेवाले, सुनार, वीणा बजाकर जीनेवाले, हथियार बेचनेवाले, सूत, शराब बेचनेवाले, वैद्य, धोबी, स्त्रीके वशमें रहनेवाले, क्रूर और भैंस चरानेवालेका अन्न भी अग्राह्य माना गया है। जिनके यहाँ मरणाशौचके दस दिन न बीते हों, उनका तथा वेश्याओंका अन्न नहीं खाना चाहिये ।।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविक्रन्तिनः ।।
राजाका अन्न तेजका, शूद्रका अन्न ब्राह्मणत्वका, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न सुयशका नाश करता है ।।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकीर्तितम् ।
पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं तु वृषलीपतेः ।।
विष्टा वार्धुषिक्स्यान्नं तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।
किसी समूहका और वेश्याका अन्न भी लोकनिन्दित माना गया है। वैद्यका अन्न पीब तथा व्यभिचारिणीके पतिका अन्न वीर्यके समान एवं व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान माना गया है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिये ।।
अमत्यान्नमथैतेषां भुक्त्वा तु त्र्यहं क्षियेत् ।
मत्या भुक्त्वा सकृद् वापि प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ।।
यदि अनजानमें इनका अन्न ग्रहण कर लिया गया हो तो तीन दिनतक उपवास करना चाहिये; किंतु जान-बूझकर एक बार भी इनका अन्न खा लेनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रतका आचरण करना चाहिये ।।
दानानां च फलं यद् वै शृणु पाण्डव तत्त्वतः ।
जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः ।।
पाण्डुनन्दन! अब मैं दानोंका यथार्थ फल बतला रहा हूँ, सुनो। जल-दान करनेवालेको तृप्ति होती है और अन्न देनेवालेको अक्षय सुख मिलता है ।।
तिलदश्च प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम् ।
भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ॥ तिलका दान करनेवाला मनुष्य मनके अनुरूप संतान, दीप-दान करनेवाला पुरुष उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि और सुवर्ण-दान करनेवाला दीर्घ आयु पाता है ।।
गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् । वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ॥ गृह देनेवालेको सुन्दर भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें और अश्वदान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है ।।
अनडुहः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्रुते । यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः ॥ गाड़ी ढोनेवाले बैलका दान करनेवाला मनोऽनुकूल लक्ष्मीको पाता है और गो-दान करनेवाला पुरुष गोलोकके सुखका अनुभव करता है। सवारी और शय्या-दान करनेवाले पुरुषको स्त्रीकी तथा अभय दान देनेवालेको ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।।
धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम् । सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ॥ धान्य दान करनेवाला मनुष्य शाश्वत सुख पाता है और वेद प्रदान करनेवाला पुरुष परब्रह्मकी समताको प्राप्त होता है। वेदका दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है ।।
हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु । योऽर्चितः प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च । तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं च विपर्यये ॥ जो सोना, पृथ्वी, गौ, अश्व, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि वस्तुओंको सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायानुसार आदरपूर्वक दान करता है, वे दोनों ही स्वर्गमें जाते हैं; परंतु जो इसके विपरीत अनुचितरूपसे देते और लेते हैं, उन दोनोंको नरकमें गिरना पड़ता है ।।
अनृतं न वदेद् विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् । नार्तोऽप्यभिभवेद् विप्रान् न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ॥ विद्वान् पुरुष कभी झूठ न बोले, तपस्या करके उसपर गर्व न करे, कष्टमें पड़ जानेपर भी ब्राह्मणोंका अनादर न करे तथा दान देकर उसका बखान न करे ।।
यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रावमानेन दानं तु परिकीर्तनात् ॥ झूठ बोलनेसे यज्ञका क्षय होता है, गर्व करनेसे तपस्याका क्षय होता है, ब्राह्मणके अपमानसे आयुका और अपने मुँहसे बखान करनेपर दानका नाश हो जाता है ।।
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते । एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ॥
जीव अकेले जन्म लेता है, अकेले मरता है तथा अकेले ही पुण्यका फल भोगता है और अकेले ही पापका फल भोगता है ।।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ।।
बन्धु-बान्धव मनुष्यके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान पृथ्वीपर डालकर मुँह फेरकर चल देते हैं। उस समय केवल धर्म ही जीवके पीछे-पीछे जाता है ।।
अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मनः ।
शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तकः ।।
तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात् सदा ।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।।
मनुष्यका मन भविष्यके कार्योंको करनेका हिसाब लगाया करता है, किंतु काल उसके नाशवान् शरीरको लक्ष्य करके मुसकराता रहता है; इसलिये धर्मको ही सहायक मानकर सदा उसीके संग्रहमें लगे रहना चाहिये; क्योंकि धर्मकी सहायतासे मनुष्य दुस्तर नरकके पार हो जाता है ।।
येषां तडागानि बहूदकानि
सभाश्च कूपाश्च शुभाः प्रपाश्च ।
अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी
यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ।।
जिन्होंने अधिक जलसे भरे हुए अनेक सरोवर, धर्मशालाएँ, कुएँ और सुन्दर पौंसले बनवाये हैं तथा जो सदा अन्नका दान करते हैं और मीठी वाणी बोलते हैं, उनपर यमराजका जोर नहीं चलता ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार
[धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार
दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा]
युधिष्ठिर उवाच
अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
किंलक्षणोऽसौ भवति तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥
युधिष्ठिरने पूछा— जनार्दन! मनीषी पुरुष धर्मको अनेक प्रकारका और बहुत-से द्वारवाला बतलाते हैं। वास्तवमें उसका लक्षण क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥
श्रीभगवानुवाच
शृणु राजन् समासेन धर्मशौचविधिक्रमम् ।
अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दमः शमः ।
आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! तुम धर्म और शौचकी विधिका क्रम संक्षेपसे सुनो। राजेन्द्र! अहिंसा, शौच, क्रोधका अभाव, क्रूरताका अभाव, दम, शम और सरलता—ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं॥
ब्रह्मचर्यं तपः क्षान्तिर्मधुमांसस्य वर्जनम् ।
मर्यादायां स्थितिश्चैव शमः शौचस्य लक्षणम् ॥
ब्रह्मचर्य, तपस्या, क्षमा, मधु-मांसका त्याग, धर्म-मर्यादाके भीतर रहना और मनको वशमें रखना—ये सब शौच (पवित्रता)-के लक्षण हैं॥
बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम् ।
वार्धके मौनमातिष्ठेत् सर्वदा धर्ममाचरेत् ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह बचपनमें विद्याध्ययन करे, युवावस्था होनेपर स्त्रीके साथ विवाह करे और बुढ़ापेमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले एवं धर्मका आचरण सदा ही सब अवस्थाओंमें करता रहे॥
ब्राह्मणान् नावमन्येत गुरून् परिवदेन्न च ।
यतीनामनुकूलः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥
ब्राह्मणोंका अपमान न करे, गुरुजनोंकी निन्दा न करे और संन्यासी महात्माओंके अनुकूल बर्ताव करे—यह सनातन धर्म है॥
यतिर्गुरुर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥
ब्राह्मणोंका गुरु संन्यासी है, चारों वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है, समस्त स्त्रियोंके लिये गुरु उनका पति है और सबका गुरु राजा है॥
एकदण्डी त्रिदण्डी वा शिखी वा मुण्डितोऽपि वा ।
काषायदण्डधारोऽपि यतिः पूज्यो न संशयः ।। संन्यासी एक दण्ड धारण करनेवाला हो या तीन दण्ड, बड़ी-बड़ी जटाएँ रखता हो या माथा मुँडाये रहता हो अथवा गेरुआ वस्त्र पहननेवाला हो, निःसंदेह उसका सत्कार करना चाहिये ।।
तस्मात् तु यत्नतः पूज्या मद्भक्ता मत्परायणाः । मयि संन्यस्तकर्माणः परत्र हितकाङ्क्षिभिः ।। इसलिये जो परलोकमें अपना कल्याण चाहते हों, उन पुरुषोंको उचित है कि वे मुझमें समस्त कर्मोंका अर्पण करनेवाले मेरे शरणागत भक्तोंका यत्नपूर्वक सत्कार करें ।।
प्रहरेन्न द्विजान् विप्रो गां न हन्यात् कदाचन । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ।। ब्राह्मणोंपर हाथ न छोड़े और गायको कभी न मारे। जो ब्राह्मण इन दोनोंपर प्रहार करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है ।।
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रदापयेत् । नाधः कुर्यात् कदाचित् तु न पृष्ठं परितापयेत् ।। अग्निको मुँहसे न फूँके, पैरोंको आगपर न तपावे और आगको पैरसे न कुचले तथा पीठकी ओरसे अग्निका सेवन न करे ।।
श्वचण्डालादिभिः स्पृष्टो नाङ्गमग्नौ प्रतापयेत् । सर्वदेवमयो वह्निस्तस्माच्छुद्धः सदा स्पृशेत् ।। जो मनुष्य कुत्ते या चाण्डालसे छू गया हो, उसे अपना अंग अग्निमें नहीं तपाना चाहिये; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतारूप है। अतः सदा शुद्ध होकर उसका स्पर्श करना चाहिये ।।
प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद् वह्निमात्मवान् । यावत् तु धारयेद् वेगं तावदप्रयतो भवेत् ।। मल या मूत्रकी हाजत होनेपर बुद्धिमान् पुरुषको अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये, क्योंकि जबतक यह मल-मूत्रका वेग धारण करता है, तबतक अशुद्ध रहता है ।।
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् । कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन ।। युधिष्ठिरने पूछा— जनार्दन! जिनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा किस प्रकारके ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये? यह मुझे बताइये ।।
श्रीभगवानुवाच
अक्रोधनाः सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः ।
तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! जो क्रोध न करनेवाले, सत्यपरायण, सदा धर्ममें लगे रहनेवाले और जितेन्द्रिय हों, वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं तथा उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है॥
अमानिनः सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रियाः ।
सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो अभिमानशून्य, सब कुछ सहनेवाले, शास्त्रीय अर्थके ज्ञाता, इन्द्रियजयी, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितकारी, सबके साथ मैत्रीका भाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक है॥
अलुब्धाः शुचयो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः ।
स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान्, संकोची, सत्यवादी और स्वधर्मपरायण हों, उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है॥
साङ्गांश्च चतुरो वेदान् योऽधीयेत दिने दिने ।
शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत् पात्रमृषयो विदुः ॥
जो प्रतिदिन अंगोंसहित चारों वेदोंका स्वाध्याय करता हो और उसके उदरमें शूद्रका अन्न न पड़ा हो, उसको ऋषियोंने दानका उत्तम पात्र माना है॥
प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः ।
तारयेत् तत्कुलं सर्वमेकोऽपीह युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! यदि शुद्ध बुद्धि, शास्त्रीय ज्ञान, सदाचार और उत्तम शीलसे युक्त एक ब्राह्मण भी दान ग्रहण कर ले तो वह दाताके समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥
गामश्वमन्नं वित्तं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् ।
निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसम्मत्तम् ।
दूरादाहृत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत् ॥
ऐसे ब्राह्मणको गाय, घोड़ा, अन्न और धन देना चाहिये। सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित किसी गुणवान् ब्राह्मणका नाम सुनकर उसे दूरसे भी बुलाना और प्रयत्नपूर्वक उसका सत्कार तथा पूजन करना चाहिये॥
युधिष्ठिर उवाच
धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीष्मेण सम्प्रभाषितम् ।
भीष्मवाक्यात् सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर! धर्म और अधर्मकी इस विधिका भीष्मजीने विस्तारके साथ वर्णन किया था। आप उनके वचनोंमेंसे सारभूत धर्म छाँटकर बतलाइये॥
श्रीभगवानुवाच
अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम् । अन्नात् प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः ॥ श्रीभगवान् बोले— राजन्! समस्त चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अन्नसे प्राणकी उत्पत्ति होती है, यह बात प्रत्यक्ष है; इसमें संशय नहीं है ॥
कलत्रं पीडयित्वा तु देशो काले च शक्तितः । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ॥ अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको स्त्रीको कष्ट देकर अर्थात् उसके भोजनमेंसे बचाकर भी देश और कालका विचार करके भिक्षुकको शक्तिके अनुसार अवश्य अन्नदान करना चाहिये ॥
विप्रमध्वपरिश्रान्तं बालं वृद्धमथापि वा । अर्चयेद् गुरुवत् प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ब्राह्मण बालक हो अथवा बूढ़ा, यदि वह रास्तेका थका-माँदा घरपर आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको बड़ी प्रसन्नताके साथ गुरुकी भाँति उसका सत्कार करना चाहिये ॥
क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अर्चयेदतिथिं प्रीतः परत्र हितभूतये ॥ परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये मनुष्यको अपने प्रकट हुए क्रोधको भी रोककर, मत्सरताका त्याग करके सुशीलता और प्रसन्नतापूर्वक अतिथिकी पूजा करनी चाहिये ॥
अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत् । न पृच्छेद् गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन ॥ गृहस्थ पुरुष कभी अतिथिका अनादर न करे, उससे झूठी बात न कहे तथा उसके गोत्र, शाखा और अध्ययनके विषयमें भी कभी प्रश्न न करे ॥
चण्डालो वा श्वपाको वा काले यः कश्चिदागतः । अन्नेन पूजनीयः स्यात् परत्र हितमिच्छता ॥ भोजनके समयपर चाण्डाल या श्वपाक (महा चाण्डाल) भी घर आ जाय तो परलोकमें हित चाहनेवाले गृहस्थको अन्नके द्वारा उसका सत्कार करना चाहिये ॥
पिधाय तु गृहद्वारं भुङ्क्ते योऽन्नं प्रहृष्टवान् । स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! जो (किसी भिक्षुकके भयसे) अपने घरका दरवाजा बंद करके प्रसन्नतापूर्वक भोजन करता है, उसने मानो अपने लिये स्वर्गका दरवाजा बंद कर दिया है ॥
पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च निराश्रयान् । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥
जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों, अतिथियों और निराश्रय मनुष्योंको अन्नसे तृप्त करता है, उसको महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है।। कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। जिसने अपने जीवनमें बहुत-से पाप किये हों, वह भी यदि याचक ब्राह्मणको विशेषरूपसे अन्नदान करता है तो सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।। अन्नदः प्राणदो लोके प्राणदः सर्वदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।। संसारमें अन्न देनेवाला पुरुष प्राणदाता माना जाता है और जो प्राणदाता है, वही सब कुछ देनेवाला है। अतः कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्नका दान विशेषरूपसे करना चाहिये।।
अन्नं ह्यमृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम् । अन्नप्रणाशे सीदन्ति शरीरे पञ्च धातवः ।। अन्नको अमृत कहते हैं और अन्न ही प्रजाको जन्म देनेवाला माना गया है। अन्नके नाश होनेपर शरीरके पाँचों धातुओंका नाश हो जाता है।।
बलं बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिनः ।
तस्मादन्नं विशेषेण श्रद्धयाश्रद्धयापि वा ॥
बलवान् पुरुष भी यदि अन्नका त्याग कर दे तो उसका बल नष्ट हो जाता है। इसलिये श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, अधिक चेष्टा करके अन्न-दान देना चाहिये ।।
आदत्ते हि रसं सर्वमादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुस्तस्मात् समादाय रसं मेघेषु धारयेत् ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीका सारा रस खींचते हैं और हवा उसे लेकर बादलोंमें स्थापित कर देती है ।।
तत् तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम् ।
तेन दिग्धा भवेद् देवी मही प्रीता च भारत ॥
भरतनन्दन! बादलोंमें पड़े हुए उस रसको इन्द्र पुनः इस पृथ्वीपर बरसाते हैं। उससे आप्लावित होकर पृथ्वी देवी तृप्त होती हैं ।।
तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिलाः प्रजाः ।
मांसमेदोऽस्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि ॥
तब उसमेंसे अन्नके पौधे उगते हैं, जिनसे सम्पूर्ण प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है। मांस, मेद, अस्थि और मज्जाकी उत्पत्ति नाना प्रकारके अन्नसे ही होती है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध]
[भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध]
युधिष्ठिर उवाच
अन्नदानफलं श्रुत्वा प्रीतोऽस्मि मधुसूदन ।
भोजनस्य विधिं वक्तुं देवदेव त्वमर्हसि ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**देवाधिदेव मधुसूदन! अन्न-दानका फल सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, अब आप भोजनकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये ।।
श्रीभगवानुवाच
भोजनस्य द्विजातीनां विधानं शृणु पाण्डव ।
स्नातः शुचिः शुचौ देशे निर्जने हुतपावकः ।।
मण्डलं कारयित्वा च चतुरस्रं द्विजोत्तमः ।
क्षत्रियश्चैत् ततो वृत्तं वैश्योऽर्धेन्दुसमाकृतम् ।।
**श्रीभगवान् बोले—**पाण्डुनन्दन! द्विजातियोंके भोजनका जो विधान है, उसे सुनो। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह स्नान करके पवित्र हो अग्निहोत्र करनेके बाद शुद्ध और एकान्त स्थानमें बैठकर ब्राह्मण हो तो चौकोना, क्षत्रिय हो तो गोलाकार और वैश्य हो तो अर्धचन्द्राकार मण्डल बनावे ।।
आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्यां धरणीं स्पृष्ट्वा पादेनैकेन वा पुनः ।।
उसके बाद पैर धोकर उसी मण्डलमें बिछे हुए शुद्ध आसनके ऊपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और दोनों पैरोंसे अथवा एक पैरके द्वारा पृथ्वीका स्पर्श किये रहे ।।
नैकवासास्तु भुञ्जीयान्न चान्तर्धाय वा द्विजः ।
न भिन्नपात्रे भुञ्जीत पर्णपृष्ठे तथैव च ।।
द्विज एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीरको कपड़ेसे ढककर भी भोजन न करे। इसी प्रकार फूटे हुए बर्तनमें तथा उलटी पत्तलमें भी भोजन करना निषिद्ध है ।।
अन्नं पूर्वं नमस्कुर्यात् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
नान्यदालोकयेदन्नान्न जुगुप्सेत तत्परः ।।
भोजन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि प्रसन्नचित्त होकर पहले अन्नको नमस्कार करे। अन्नके सिवा दूसरी ओर दृष्टि न डाले तथा भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे ।।
जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते ।
पाणिना जलमुद्धृत्य कुर्यादन्नं प्रदक्षिणम् ।।
जिस अन्नकी निन्दा की जाती है, उसे राक्षस खाते हैं! भोजन आरम्भ करनेसे पहले हाथमें जल लेकर उसके द्वारा अन्नकी प्रदक्षिणा करे ।।
पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।।
फिर मन्त्र पढ़कर पृथक्-पृथक् पाँचों प्राणोंको अन्नकी आहुति दे ।।
यथा रसं न जानाति जिह्वा प्राणाहुतौ नृप ।
तथा समाहितः कुर्यात् प्राणाहुतिमतन्द्रितः ।।
राजन्! प्राणोंको आहुति देते समय स्थिरचित्त और सावधान होकर इस प्रकार प्राणोंको आहुति दे जिससे जिह्वाको रसका ज्ञान न हो ।।
विदित्वाऽन्नमथान्नादं पञ्च प्राणांश्च पाण्डव ।
यः कुर्यादाहुतीः पञ्च तेनेष्टाः पञ्च वायवः ।।
पाण्डुनन्दन! अन्न, अन्नाद और पाँचों प्राणोंके तत्त्वको जानकर जो प्राणाग्निहोत्र करता है, उसके द्वारा पञ्चवायुओंका यजन हो जाता है ।।
अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।
इसके विपरीत भोजन करनेवाला मूर्ख ब्राह्मण अन्नके द्वारा असुर, प्रेत और राक्षसोंको ही तृप्त करता है ।।
वक्त्रप्रमाणान् पिण्डांश्च ग्रसेदेकैकशः पुनः ।
वक्त्राधिकं तु यत् पिण्डमात्मोच्छिष्टं तदुच्यते ।।
प्राणोंको आहुति देनेके पश्चात् अपने मुखमें पड़ने लायक एक-एक ग्रास अन्न उठाकर भोजन करे। जो ग्रास अपने मुखमें जानेकी अपेक्षा बड़ा होनेके कारण एक बारमें न खाया जा सके, उसमेंसे बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा जाता है ।।
पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।
ग्राससे बचे हुए तथा मुँहसे निकले हुए अन्नको अखाद्य समझे और उसे खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।
स्वमुच्छिष्टं तु यो भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते मुक्तभोजनम् ।।
चान्द्रायणं चरेत् कृच्छ्रं प्राजापत्यमथापि वा ।
जो अपना जूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोड़े हुए भोजनको फिर ग्रहण करता है, उसको चान्द्रायण, कृच्छ्र अथवा प्राजापत्य-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।।
जो पापी स्त्रीके भोजन किये हुए पात्रमें भोजन करता है, स्त्रीका जूठा खाता है तथा स्त्रीके साथ एक बर्तनमें भोजन करता है, वह मानो मदिरा पान करता है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने उस पापसे छूटनेका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं देखा है ।।
पिबतः पतिते तोये भोजने मखनिस्सृते ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि पानी पीते-पीते उसकी बूँद मुँहसे निकलकर भोजनमें गिर पड़े तो वह खानेयोग्य नहीं रह जाता। जो उसे खा लेता है, उस पुरुषको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन ।
पिबेद् यदि हि तन्मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीनेसे बचा हुआ पानी भी पुनः पीनेके योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसको पी ले तो उसे चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
मौनी वाप्यथवा भूमौ नावलोक्य दिशस्तथा ।
भुञ्जीत विधिवद् विप्रो न चोच्छिष्टं प्रदापयेत् ।।
ब्राह्मणको उचित है कि वह मौन होकर पृथ्वी या दिशाओंकी ओर न देखते हुए विधिवत् भोजन करे, किसीको अपना जूठा न दे ।।
सदा चात्यशनं नाद्यान्नातिहीनं च कर्हिचित् ।
यथान्नेन व्यथा न स्यात् तथा भुञ्जीत नित्यशः ।।
कभी भी न तो बहुत अधिक और न कम ही भोजन करे। प्रतिदिन उतना ही अन्न खाय, जिससे अपनेको कष्ट न हो ।।
केशकीटोपपन्नं च मुखमारुतवीजितम् ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
जिस भोजनमें बाल या कोई कीड़ा पड़ा हो, जिसे मुँहसे फूँककर ठंडा किया गया हो, उसको अखाद्य समझना चाहिये। ऐसे अन्नको भोजन कर लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।
उत्थाय च पुनः स्पृष्टं पादस्पृष्टं च लङ्घितम् ।
अन्नं तद् राक्षसं विद्यात् तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।।
भोजनके स्थानसे उठ जानेके बाद जिसे फिर छू दिया गया हो, जो पैरसे छू गया या लाँघ दिया गया हो, वह राक्षसके खानेयोग्य अन्न है; ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिये ।।
यद्युत्तिष्ठत्यनाचान्तो भुक्तवानासनात् ततः ।
स्नानं सद्यः प्रकुर्वीत सोऽन्यथाप्रयतो भवेत् ।।