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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

तथा सबके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही धर्मवेत्ताओंमें उत्तम ऋषि है ॥ ११३—११५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०६ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २२१ १/२ श्लोक हैं)


* यहाँ आचार्य नीलकण्ठके मतमें श्मशान शब्दसे काशीका महाश्मशान ही गृहीत होता है। इसीलिये वहाँ शवके दर्शनसे शिवके दर्शनका फल माना जाता है।
* कुछ लोग दूध पीनेके समय बछड़ोंके मुँहमें लगे हुए फेनको ही वह अमृत मानते हैं, उसीका पान करनेवाले उनके मतमें फेनप हैं। आचार्य नीलकण्ठ अन्नके अग्रभाग (रसोईसे निकाले गये अग्राशन) को फेन और उसका उपयोग करनेवालेको फेनप कहते हैं।
१- जो भोजनके पश्चात् पात्रको धो-पोंछकर रख देते हैं, दूसरे दिनके लिये कुछ भी नहीं बचाते हैं, उन्हें सम्प्रक्षाल कहते हैं।
२- पत्थरसे फोड़कर खानेवालेको अश्मकुट्ट कहते हैं।
३- जो दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं अर्थात् अन्नको ओखलीमें न कूटकर दाँतोंसे ही चबाकर खाते हैं वे दन्तोलूखलिक कहलाते हैं।

उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा

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द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा

उमोवाच

देशेषु रमणीयेषु नदीनां निर्झरेषु च ।
स्रवन्तीनां निकुञ्जेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १ ॥
देशेषु च पवित्रेषु फलवत्सु समाहिताः ।
मूलवत्सु च मेध्येषु वसन्ति नियतव्रताः ॥ २ ॥
**पार्वतीने कहा—**भगवन्! नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले एकाग्रचित्त वानप्रस्थी महात्मा नदियोंके रमणीय तटप्रदेशोंमें, झरनोंमें, सरिताओंके तटवर्ती निकुंजोंमें, पर्वतोंपर, वनोंमें और फल-मूलसे सम्पन्न पवित्र स्थानोंमें निवास करते हैं ॥ १-२ ॥

तेषामपि विधिं पुण्यं श्रोतुमिच्छामि शङ्कर ।
वानप्रस्थेषु देवेश स्वशरीरोपजीविषु ॥ ३ ॥
कल्याणकारी देवेश्वर! वानप्रस्थी महात्मा अपने शरीरको ही कष्ट पहुँचाकर जीवन-निर्वाह करते हैं; अतः उनके पालन करनेयोग्य जो पवित्र कर्तव्य या नियम है, उसीको मैं सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

वानप्रस्थेषु यो धर्मस्तं मे शृणु समाहिता ।
श्रुत्वा चैकमना देवि धर्मबुद्धिपरा भव ॥ ४ ॥
**भगवान् महेश्वरने कहा—**देवि! (गृहस्थ एवं) वानप्रस्थोंका जो धर्म है, उसको मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो और सुनकर एकचित्त हो अपनी बुद्धिको धर्ममें लगाओ ॥ ४ ॥

संसिद्धैर्नियमैः सद्भिर्वनवासमुपागतैः ।
वानप्रस्थैरिदं कर्म कर्तव्यं शृणु यादृशम् ॥ ५ ॥
नियमोंका पालन करके सिद्ध हुए वनवासी साधु वानप्रस्थोंको यह कर्म करना चाहिये। कैसा कर्म? यह बताता हूँ, सुनो ॥ ५ ॥

(भूत्वा पूर्वं गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च ।
कलत्रकार्यं संतृप्य कारणात् संत्यजेद् गृहम् ॥
मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंके ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ॥
अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरस्सरः ।

निर्द्वन्द्वो वा सदारो वा वनवासाय सव्रजेत् ॥ मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्वन्द्व (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।।

देशाः परमपुण्या ये नदीवनसमन्विताः । अबोधमुक्ताः प्रायेण तीर्थायतनसंयुताः ॥ तत्र गत्वा विधिं ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद् यथाक्रमम् । दीक्षितश्चैकमना भूत्वा परिचर्यां समाचरेत् ॥ नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमशः ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात् एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।।

कल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम् । शकृदालेपनं काये त्यक्तदोषप्रमादता ॥ सायम्प्रातश्चाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि । काले शौचं च कार्यं च जटावल्कलधारणम् ॥ सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात् । नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम् ॥ सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रातःकाल स्नान एवं विधिवत् अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटिप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना—आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।।

अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ॥ पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाहारनिमन्त्रणम् । अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं तथा ॥ पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्माः सनातनाः । पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात् अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।।

शिष्टैर्धर्मासने चैव धर्मार्थसहिताः कथाः ।।
प्रतिश्रयविभागश्च भूमिशय्या शिलासु वा ।
धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये। उसे अपने लिये पृथक् आश्रम बना लेना चाहिये। वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ।।
व्रतोपवासयोगश्च क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ।।
दिवारात्रं यथायोगं शौचं धर्मस्य चिन्तनम् ।)
वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे। दिन-रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ।।
त्रिकालमभिषेकं च पितृदेवार्चनं तथा ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा ।। ६ ।।
उन्हें दिनमें तीन बार स्नान, पितरों और देवताओंका पूजन, अग्निहोत्र तथा विधिवत् यज्ञ करने चाहिये ।।
नीवारग्रहणं चैव फलमूलनिषेवणम् ।
इङ्गुदैरण्डतैलानां स्नेहार्थे च निषेवणम् ।। ७ ।।
वानप्रस्थको जीविकाके लिये नीवार (तिन्नीका चावल) और फल-मूलका सेवन करना चाहिये तथा शरीरमें स्निग्धता लाने या तेलसे होनेवाले कार्योंके निर्वाहके लिये इंगुद और रेड़ीके तेलका सेवन करना उचित है ।। ७ ।।
योगचर्याकृतैः सिद्धैः कामक्रोधविवर्जितैः ।
वीरशय्यामुपासद्भिर्वीरस्थानोपसेविभिः ।। ८ ।।
उन्हें योगका अभ्यास करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी चाहिये। काम और क्रोधको त्याग देना चाहिये। वीरासनसे बैठकर वीरस्थान (विशाल और घने जंगल) में निवास करने चाहिये ।। ८ ।।
युक्तैर्योगवहैः सद्भिर्ग्रीष्मे पञ्चतपैस्तथा ।
मण्डूकयोगनियतैर्यथान्यायं निषेविभिः ।। ९ ।।
मनको एकाग्र रखकर योगसाधनमें तत्पर रहना चाहिये। श्रेष्ठ वानप्रस्थको गर्मीमें पंचाग्नि सेवन करना चाहिये। हठयोगशास्त्रमें प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अभ्यासमें नियमपूर्वक लगे रहना चाहिये। किसी भी वस्तुका न्यायाानुकूल सेवन करना चाहिये ।। ९ ।।
वीरासनरतैर्नित्यं स्थण्डिले शयनं तथा ।
शीततोयाग्नियोगश्च चर्तव्यो धर्मबुद्धिभिः ।। १० ।।
सदा वीरासनसे बैठना और वेदी या चबूतरेपर सोना चाहिये। धर्ममें बुद्धि रखनेवाले वानस्थ मुनियोंको शीततोयाग्नियोगका आचरण करना चाहिये अर्थात् उन्हें सर्दीकी

मौसममें रातको जलके भीतर बैठना या खड़े रहना, बरसातमें खुले मैदानमें सोना और ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्निका सेवन करना चाहिये ।। १० ।। अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च शैवलोत्तरभोजनैः । अश्मकुट्टैस्तथा दान्तैः सम्प्रक्षालैस्तथापरैः ।। ११ ।। वे वायु अथवा जल पीकर रहें। सेवारका भोजन करें। पत्थरसे अन्न या फलको कूँचकर खायँ अथवा दाँतोंसे चबाकर ही भक्षण करें। सम्प्रक्षालके नियमसे रहें अर्थात् दूसरे दिनके लिये आहार संग्रह करके न रखें ।। चीरवल्कलसंवीतैर्मृगचर्मनिवासिभिः । कार्या यात्रा यथाकालं यथाधर्मं यथाविधि ।। १२ ।। अधोवस्त्रकी जगह चीर और वल्कल पहनें, उत्तरीयके स्थानमें मृगछालेसे ही अपने अंगोंको आच्छादित करें। उन्हें समयके अनुसार धर्मके उद्देश्यसे विधिपूर्वक तीर्थ आदि स्थानोंकी ही यात्रा करनी चाहिये ।। १२ ।। वननित्यैर्वनचरैर्वनस्थैर्वनगोचरैः । वनं गुरुमिवासाद्य वस्तव्यं वनजीविभिः ।। १३ ।। वानप्रस्थको सदा वनमें ही रहना, वनमें ही विचरना, वनमें ही ठहरना, वनके ही मार्गपर चलना और गुरुकी भाँति वनकी शरण लेकर वनमें ही जीवन-निर्वाह करना चाहिये ।। १३ ।। तेषां होमक्रिया धर्मः पञ्चयज्ञनिषेवणम् । भागं च पञ्चयज्ञस्य वेदोक्तस्यानुपालनम् ।। १४ ।। प्रतिदिन अग्निहोत्र और पंचमहायज्ञोंका सेवन वानप्रस्थोंका धर्म है। उन्हें विभागपूर्वक वेदोक्त पंच-यज्ञोंका निरन्तर पालन करना चाहिये ।। १४ ।। अष्टमीयज्ञपरता चातुर्मास्यनिषेवणम् । पौर्णमासादयो यज्ञा नित्ययज्ञस्तथैव च ।। १५ ।। अष्टमी तिथिको होनेवाले अष्टका श्राद्धरूप यज्ञमें तत्पर रहना, चातुर्मास्य व्रतका सेवन करना, पौर्णमास और दर्शादि यज्ञ तथा नित्ययज्ञका अनुष्ठान करना वानप्रस्थ मुनिका धर्म है ।। १५ ।। विमुक्ता दारसंयोगैर्विमुक्ताः सर्वसंकरैः । विमुक्ताः सर्वपापैश्च चरन्ति मुनयो वने ।। १६ ।। वानप्रस्थ मुनि स्त्री-समागम, सब प्रकारके संकर तथा सम्पूर्ण पापोंसे दूर रहकर वनमें विचरते रहते हैं ।। १६ ।। स्रुग्भाण्डपरमा नित्यं त्रेताग्निशरणाः सदा । सन्तः सत्पथनित्या ये ते यान्ति परमां गतिम् ।। १७ ।।

स्रुक्-स्रुवा आदि यज्ञपात्र ही उनके लिये उत्तम उपकरण हैं। वे सदा आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियोंकी शरण लेकर सदा उन्हींकी परिचर्यामें लगे रहते हैं और नित्य सन्मार्गपर चलते हैं। इस प्रकार अपने धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे श्रेष्ठ पुरुष परमगतिको प्राप्त होते हैं।। १७ ।।
ब्रह्मलोकं महापुण्यं सोमलोकं च शाश्वतम् ।
गच्छन्ति मुनयः सिद्धाः सत्यधर्मव्यपाश्रयाः ॥ १८ ॥
वे मुनि सत्यधर्मका आश्रय लेनेवाले और सिद्ध होते हैं, अतः महान् पुण्यमय ब्रह्मलोक तथा सनातन सोमलोकमें जाते हैं ।। १८ ।।
एष धर्मो मया देवि वानप्रस्थाश्रितः शुभः ।
विस्तरेणाथ सम्पन्नो यथास्थूलमुदाहृतः ॥ १९ ॥
देवि! यह मैंने तुम्हारे निकट विस्तारयुक्त एवं मंगलमय वानप्रस्थधर्मका स्थूलभावसे वर्णन किया है ।।

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश सर्वभूतनमस्कृत ।
यो धर्मो मुनिसंघस्य सिद्धिवादेषु तं वद ॥ २० ॥
उमादेवी बोलीं— भगवन्! सर्वभूतेश्वर! समस्त प्राणियोंद्वारा वन्दित महेश्वर! ज्ञानगोष्ठियोंमें मुनि-समुदायका जो धर्म निश्चित किया गया है, उसे बताइये ।।
सिद्धिवादेषु संसिद्धास्तथा वननिवासिनः ।
स्वैरिणो दारसंयुक्तास्तेषां धर्मः कथं स्मृतः ॥ २१ ॥
ज्ञानगोष्ठियोंमें जो सम्यक् सिद्ध बताये गये हैं, वे वनवासी मुनि कोई तो एकाकी ही स्वच्छन्द विचरते हैं, कोई पत्नीके साथ रहते हैं। उनका धर्म कैसा माना गया है? ।। २१ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्वैरिणस्तपसा देवि सर्वे दारविहारिणः ।
तेषां मौण्ड्यं कषायञ्च वासे रात्रिश्च कारणम् ॥ २२ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! सभी वानप्रस्थ तपस्यामें संलग्न रहते हैं, उनमेंसे कुछ तो स्वच्छन्द विचरनेवाले होते हैं (स्त्रीको साथ नहीं रखते) और कुछ अपनी-अपनी स्त्रीके साथ रहते हैं। स्वच्छन्द विचरनेवाले मुनि सिर मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहनते हैं; (उनका कोई एक स्थान नहीं होता) किंतु जो स्त्रीके साथ रहते हैं, वे रात्रिको अपने आश्रममें ही ठहरते हैं ।। २२ ।।
त्रिकालमभिषेकश्च होत्रं त्वृषिकृतं महत् ।
समाधिसत्पथस्थानं यथोद्दिष्टनिषेवणम् ॥ २३ ॥

दोनों प्रकारके ही ऋषियोंका यह महान् कर्तव्य है कि वे प्रतिदिन तीनों समय जलमें स्नान करें और अग्निमें आहुति डालें। समाधि लगावें, सन्मार्गपर चलें और शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करें॥ २३ ॥

ये च ते पूर्वकथिता धर्मास्ते वनवासिनाम्।
यदि सेवन्ति धर्मांस्तानाप्नुवन्ति तपःफलम् ॥ २४ ॥
पहले जो तुम्हारे समक्ष वनवासियोंके धर्म बताये गये हैं, उन सबका यदि वे पालन करते हैं तो उन्हें अपनी तपस्याका पूर्ण फल मिलता है॥ २४ ॥

ये च दम्पतिधर्माणः स्वदारनियतेन्द्रियाः।
चरन्ति विधिवद् दृष्टं तदनुकालाभिगामिनः ॥ २५ ॥
तेषामृषिकृतो धर्मो धर्मिणामुपपद्यते।
न कामकारात् कामोऽन्यः संसेव्यो धर्मदर्शिभिः ॥ २६ ॥
जो गृहस्थ दाम्पत्य धर्मका पालन करते हुए स्त्रीको अपने साथ रखते हैं, उसके साथ ही इन्द्रियसंयम-पूर्वक वेदविहित धर्मका आचरण करते हैं और केवल ऋतुकालमें ही स्त्री-समागम करते हैं, उन धर्मात्माओंको ऋषियोंके बताये हुए धर्मोंके पालन करनेका फल मिलता है। धर्मदर्शी पुरुषोंको कामनावश किसी भोगका सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २५-२६॥

सर्वभूतेषु यः सम्यग् ददात्यभयदक्षिणाम्।
हिंसादोषविमुक्तात्मा स वै धर्मेण युज्यते ॥ २७ ॥
जो हिंसादोषसे मुक्त होकर सम्पूर्ण प्राणियोंको अभयदान कर देता है, उसीको धर्मका फल प्राप्त होता है॥ २७ ॥

सर्वभूतानुकम्पी यः सर्वभूतार्जवव्रतः।
सर्वभूतात्मभूतश्च स वै धर्मेण युज्यते ॥ २८ ॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करता है, सबके साथ सरलताका बर्ताव करता और समस्त भूतोंको आत्मभावसे देखता है, वही धर्मके फलसे युक्त होता है ॥ २८ ॥

सर्ववेदेषु वा स्नानं सर्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे एते समे स्यातामार्जवं वा विशिष्यते ॥ २९ ॥
चारों वेदोंमें निष्णात होना और सब जीवोंके प्रति सरलताका बर्ताव करना—ये दोनों एक समान समझे जाते हैं अथवा सरलताका ही महत्त्व अधिक माना जाता है॥

आर्जवं धर्ममित्याहुरधर्मो जिह्म उच्यते।
आर्जवेनेह संयुक्तो नरो धर्मेण युज्यते ॥ ३० ॥
सरलताको धर्म कहते हैं और कुटिलताको अधर्म। सरलभावसे युक्त मनुष्य ही यहाँ धर्मके फलका भागी होता है॥ ३० ॥

आर्जवे तु रतो नित्यं वसत्यमरसंनिधौ।

तस्मादार्जवयुक्तः स्याद् य इच्छेद् धर्ममात्मनः ॥ ३१ ॥
जो सदा सरल बर्तावमें तत्पर रहता है, वह देवताओंके समीप निवास करता है। इसलिये जो अपने धर्मका फल पाना चाहता हो, उसे सरलतापूर्ण बर्तावसे युक्त होना चाहिये ॥ ३१ ॥
क्षान्तो दान्तो जितक्रोधो धर्मभूतो विहिंसकः ।
धर्मे रतमना नित्यं नरो धर्मेण युज्यते ॥ ३२ ॥
क्षमाशील, जितेन्द्रिय, क्रोधविजयी, धर्मनिष्ठ, अहिंसक और सदा धर्मपरायण मनुष्य ही धर्मके फलका भागी होता है ॥ ३२ ॥
व्यपेततन्द्रिर्धर्मात्मा शक्त्या सत्पथमाश्रितः ।
चारित्रपरमो बुद्धो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३३ ॥
जो पुरुष आलस्यरहित, धर्मात्मा, शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ मार्गपर चलनेवाला, सच्चरित्र और ज्ञानी होता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३३ ॥

उमोवाच

(एषां यायावराणां तु धर्ममिच्छामि मानद ।
कृपया परयाऽऽविष्टस्तन्मे ब्रूहि महेश्वर ॥
**उमादेवी बोलीं—**सबको मान देनेवाले महेश्वर! मैं यायावरोंके धर्मको सुनना चाहती हूँ, आप महान् अनुग्रह करके मुझे यह बताइये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

धर्मं यायावराणां त्वं शृणु भामिनि तत्परा ॥
व्रतोपवासशुद्धाङ्गास्तीर्थस्नानपरायणाः ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**भामिनि! तुम तत्पर होकर यायावरोंके धर्म सुनो। व्रत और उपवाससे उनके अंग-प्रत्यंग शुद्ध हो जाते हैं तथा वे तीर्थ-स्नानमें तत्पर रहते हैं ॥
धृतिमन्तः क्षमायुक्ताः सत्यव्रतपरायणाः ॥
पक्षमासोपवासैश्च कर्शिता धर्मदर्शिनः ।
उनमें धैर्य और क्षमाका भाव होता है। वे सत्यव्रत-परायण होकर एक-एक पक्ष और एक-एक मासका उपवास करके अत्यन्त दुर्बल हो जाते हैं। उनकी दृष्टि सदा धर्मपर ही रहती है ॥
वर्षैः शीतातपैरैव कुर्वन्तः परमं तपः ॥
कालयोगेन गच्छन्ति शक्रलोकं शुचिस्मिते ।
पवित्र मुसकानवाली देवि! वे सर्दी, गर्मी और वर्षाका कष्ट सहन करते हुए बड़ी भारी तपस्या करते हैं और कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥
तत्र ते भोगसंयुक्ता दिव्यगन्धसमन्विताः ॥

दिव्यभूषणसंयुक्ता विमानवरसंयुताः ।
विचरन्ति यथाकामं दिव्यस्त्रीगणसंयुताः ॥
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
वहाँ भी नाना प्रकारके भोगोंसे संयुक्त और दिव्यगन्धसे सम्पन्न हो दिव्य आभूषण धारण करके सुन्दर विमानोंपर बैठते और दिव्यांगनाओंके साथ इच्छानुसार विहार करते हैं। देवि! यह सब यायावरोंका धर्म मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥

उमोवाच

तेषां चक्रचराणां च धर्ममिच्छामि वै प्रभो ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! वानप्रस्थ ऋषियोंमें जो चक्रचर (छकड़ेसे यात्रा करनेवाले) हैं उनके धर्मको मैं जानना चाहती हूँ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

एतत् ते कथयिष्यामि शृणु शाकटिकं शुभे ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शुभे! यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। चक्रचारी या शाकटिक मुनियोंका धर्म सुनो ॥
संवहन्तो धुरं दारैः शकटानां तु सर्वदा ।
प्रार्थयन्ते यथाकालं शकटैर्भैक्षचर्यया ॥
तपोऽर्जनपरा धीरास्तपसा क्षीणकल्मषाः ।
पर्यटन्तो दिशः सर्वाः कामक्रोधविवर्जिताः ॥
वे अपनी स्त्रियोंके साथ सदा छकड़ोंके बोझ ढोते हुए यथासमय छकड़ोंद्वारा ही जाकर भिक्षाकी याचना करते हैं। सदा तपस्याके उपार्जनमें लगे रहते हैं। वे धीर मुनि तपस्याद्वारा अपने सारे पापोंका नाश कर डालते हैं तथा काम और क्रोधसे रहित हो सम्पूर्ण दिशाओंमें पर्यटन करते हैं ॥
तेनैव कालयोगेन त्रिदिवं यान्ति शोभने ।
तत्र प्रमुदिता भोगैर्विचरन्ति यथासुखम् ॥
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शोभने! उसी जीवनचर्यासे रहित हुए वे कालयोगसे मृत्युको प्राप्त होकर स्वर्गमें जाते हैं और वहाँ दिव्य भोगोंसे आनन्दित हो अपने मौजसे घूमते-फिरते हैं। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका भी उत्तर दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो ॥

उमोवाच

वैखानसानां वै धर्मं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥
**उमाने कहा—**प्रभो! अब मैं वैखानसोंका धर्म सुनना चाहती हूँ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ते वै वैखानसा नाम वानप्रस्थाः शुभेक्षणे ।

तीव्रेण तपसा युक्ता दीप्तिमन्तः स्वतेजसा ।।

सत्यव्रतपरा धीरास्तेषां निष्कल्मषं तपः ।

श्रीमहेश्वरने कहा—शुभेक्षणे! वे जो वैखानस नामवाले वानप्रस्थ हैं, बड़ी कठोर

तपस्यामें संलग्न रहते हैं। अपने तेजसे देदीप्यमान होते हैं। सत्यव्रत-परायण और धीर होते

हैं। उनकी तपस्यामें पापका लेश भी नहीं होता है ।।

अश्मकुट्टास्तथान्ये च दन्तोलूखलिनस्तथा ।

शीर्णपर्णाशिनश्चान्ये उञ्छवृत्तास्तथा परे ।।

कपोतवृत्तयश्चान्ये कापोतीं वृत्तिमास्थिताः ।

पशुप्रचारनिरताः फेनपाश्च तथा परे ।।

मृगवन्मृगचर्यायां संचरन्ति तथा परे ।

उनमेंसे कुछ लोग अश्मकुट्ट (पत्थरसे ही अन्न या फलको कूँचकर खानेवाले) होते हैं।

दूसरे दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेते हैं, तीसरे सूखे पत्ते चबाकर रहते हैं, चौथे

उञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले होते हैं। कुछ कापोती वृत्तिका आश्रय लेकर कबूतरोंके

समान अन्नके एक-एक दाने बीनते हैं। कुछ लोग पशुचर्याको अपनाकर पशुओंके साथ ही

चलते और उन्हींकी भाँति तृण खाकर रहते हैं। दूसरे लोग फेन चाटकर रहते हैं तथा अन्य

बहुतेरे वैखानस मृगचर्याका आश्रय लेकर मृगोंके समान उन्हींके साथ विचरते हैं ।।

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च निराहारास्तथैव च ।।

केचिच्चरन्ति सद्धिष्णोः पादपूजनमुत्तमम् ।

कुछ लोग जल पीकर रहते, कुछ लोग हवा खाकर निर्वाह करते और कितने ही

निराहार रह जाते हैं। कुछ लोग भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंका उत्तम रीतिसे पूजन करते

हैं ।।

संचरन्ति तपो घोरं व्याधिमृत्युविवर्जिताः ।।

स्ववशादेव ते मृत्युं भीषयन्ति च नित्यशः ।।

इन्द्रलोके तथा तेषां निर्मिता भोगसंचयाः ।

अमरैः समतां यान्ति देववद्भोगसंयुताः ।।

वे रोग और मृत्युसे रहित हो घोर तपस्या करते हैं और अपनी ही शक्तिसे प्रतिदिन

मृत्युको डराया करते हैं। उनके लिये इन्द्रलोकमें ढेर-के-ढेर भोग संचित रहते हैं। वे देवतुल्य

भोगोंसे सम्पन्न हो देवताओंकी समानता प्राप्त कर लेते हैं ।।

वराप्सरोभिः संयुक्ताश्चिरकालमनिन्दिते ।

एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

सती साध्वी देवि! वे चिरकालतक श्रेष्ठ अप्सराओंके साथ रहकर सुखका अनुभव करते हैं। यह तुमसे वैखानसोंका धर्म बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् श्रोतुमिच्छामि वालखिल्यांस्तपोधनान् ।। उमाने कहा— भगवन्! अब मैं तपस्याके धनी वालखिल्योंका परिचय सुनना चाहती हूँ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

धर्मचर्यां तथा देवि वालखिल्यगतां शृणु ।। मृगनिर्मोकवसना निर्द्वन्द्वास्ते तपोधनः । अङ्गुष्ठमात्राः सुश्रोणि तेष्वेवाङ्गेषु संयुताः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! वालखिल्योंकी धर्मचर्याका वर्णन सुनो। वे मृगछाला पहनते हैं, शीत-उष्ण आदि द्वन्द्वोंका उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तपस्या ही उनका धन है। सुश्रोणि! उनके शरीरकी लम्बाई एक अंगूठेके बराबर है, उन्हीं शरीरोंमें वे सब एक साथ रहते हैं।। उद्यन्तं सततं सूर्य स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः । भास्करस्येव किरणैः सहसा यान्ति नित्यदा ।। द्योतयन्तो दिशः सर्वा धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ।। वे प्रतिदिन नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा निरन्तर उगते हुए सूर्यकी स्तुति करते हुए सहसा आगे बढ़ते जाते हैं और अपनी सूर्यतुल्य किरणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते रहते हैं। वे सब-के-सब धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं ।। तेष्वेव निर्मलं सत्यं लोकार्थं तु प्रतिष्ठितम् । लोकोऽयं धार्यते देवि तेषामेव तपोबलात् ।। महात्मनां तु तपसा सत्येन च शुचिस्मिते । क्षमया च महाभागे भूतानां संस्थितिं विदुः ।। उन्हींमें लोकरक्षाके लिये निर्मल सत्य प्रतिष्ठित है। देवि! उन वालखिल्योंके ही तपोबलसे यह सारा जगत् टिका हुआ है। पवित्र मुसकानवाली महाभागे! उन्हीं महात्माओंकी तपस्या, सत्य और क्षमाके प्रभावसे सम्पूर्ण भूतोंकी स्थिति बनी हुई है, ऐसा मनीषी पुरुष मानते हैं ।। प्रजार्थमपि लोकार्थं महद्भिः क्रियते तपः । तपसा प्राप्यते सर्वं तपसा प्राप्यते फलम् ।। दुष्प्रापमपि यल्लोके तपसा प्राप्यते हि तत् ।।)

महान् पुरुष समस्त प्रजावर्ग तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करते हैं। तपस्यासे सब कुछ प्राप्त होता है। तपस्यासे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। लोकमें जो दुर्लभ वस्तु है, वह भी तपस्यासे सुलभ हो जाती है ।।

उमोवाच

आश्रमाभिरता देव तापसा ये तपोधनाः । दीप्तिमन्तः कया चैव चर्ययाथ भवन्ति ते ।। ३४ ।। उमाने पूछा—देव! जो तपस्याके धनी तपस्वी अपने आश्रमधर्ममें ही रम रहे हैं, वे किस आचरणसे तपस्वी होते हैं? ।। ३४ ।। राजानो राजपुत्राश्च निर्धना ये महाधनाः । कर्मणा केन भगवन् प्राप्नुवन्ति महाफलम् ।। ३५ ।। भगवन्! जो राजा या राजकुमार हैं अथवा जो निर्धन या महाधनी हैं, वे किस कर्मके प्रभावसे महान् फलके भागी होते हैं? ।। ३५ ।। नित्यं स्थानमुपागम्य दिव्यचन्दनभूषिताः । केन वा कर्मणा देव भवन्ति वनगोचराः ।। ३६ ।। देव! वनवासी मुनि किस कर्मसे दिव्य स्थानको पाकर दिव्य चन्दनसे विभूषित होते हैं? ।। ३६ ।। एतन्मे संशयं देव तपश्चर्याऽऽश्रितं शुभम् । शंस सर्वमशेषेण त्र्यक्ष त्रिपुरनाशन ।। ३७ ।। देव! त्रिपुरनाशन त्रिलोचन! तपस्याके आश्रित शुभ फलके विषयमें मेरा यही संदेह है। इस सारे संदेहका उत्तर आप पूर्णरूपसे प्रदान करें ।। ३७ ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

उपवासव्रतैर्दान्ता ह्यहिंस्राः सत्यवादिनः । संसिद्धाः प्रेत्य गन्धर्वैः सह मोदन्त्यनामयाः ।। ३८ ।। श्रीमहेश्वरने कहा—जो उपवास व्रतसे सम्पन्न, जितेन्द्रिय, हिंसारहित और सत्यवादी होकर सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं, वे मृत्युके पश्चात् रोग-शोकसे रहित हो गन्धर्वोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ।। ३८ ।। मण्डूकयोगशयनो यथान्यायं यथाविधि । दीक्षां चरति धर्मात्मा स नागैः सह मोदते ।। ३९ ।। जो धर्मात्मा पुरुष न्यायानुसार विधिपूर्वक हठयोग-प्रसिद्ध मण्डूकयोगके अनुसार शयन करता और यज्ञकी दीक्षा लेता है, वह नागलोकमें नागोंके साथ सुख भोगता है ।। ३९ ।। शष्पं मृगमुखोच्छिष्टं यो मृगैः सह भक्षति ।

दीक्षितो वै मुदा युक्तः स गच्छत्यमरावतीम् ।। ४० ।। जो मृगचर्या-व्रतकी दीक्षा ले मृगोंके मुखसे उच्छिष्ट हुई घासको प्रसन्नतापूर्वक उन्हींके साथ रहकर भक्षण करता है, वह मृत्युके पश्चात् अमरावतीपुरीमें जाता है ।। शैवालं शीर्णपर्णं वा तद्व्रती यो निषेवते । शीतयोगवहो नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् ।। ४१ ।। जो व्रतधारी वानप्रस्थ मुनि सेवार अथवा जीर्ण-शीर्ण पत्तेका आहार करता तथा जाड़ेमें प्रतिदिन शीतका कष्ट सहन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है ।। ४१ ।। वायुभक्षोऽम्बुभक्षो वा फलमूलाशनोऽपि वा । यक्षेष्वैश्वर्यमाधाय मोदतेऽप्सरसां गणैः ।। ४२ ।। जो वायु, जल, फल अथवा मूल खाकर रहता है, वह यक्षोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ।। ४२ ।। अग्नियोगवहो ग्रीष्मे विधिदृष्टेन कर्मणा । चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि राजा भवति पार्थिवः ।। ४३ ।। जो गर्मीमें शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पंचाग्नि सेवन करता है, वह बारह वर्षोंतक उक्त व्रतका पालन करके जन्मान्तरमें भूमण्डलका राजा होता है ।। ४३ ।। आहारनियमं कृत्वा मुनिर्द्वादशवार्षिकम् । मरुं संसाध्य यत्नेन राजा भवति पार्थिवः ।। ४४ ।। जो मुनि बारह वर्षोंतक आहारका संयम करता हुआ यत्नपूर्वक मरु-साधना करके अर्थात् जलको भी त्यागकर तप करता है, वह भी इस पृथ्वीका राजा होता है ।। ४४ ।। स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्य समन्ततः । प्रविश्य च मुदा युक्तो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।। ४५ ।। देहं चानशने त्यक्त्वा स स्वर्गे सुखमेधते । जो वानप्रस्थ अपने चारों ओर विशुद्ध आकाशको ग्रहण करता हुआ खुले मैदानमें वेदीपर सोता और बारह वर्षोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक व्रतकी दीक्षा ले उपवास करके अपना शरीर त्याग देता है, वह स्वर्गलोकमें सुख भोगता है ।। ४५ १/२ ।। स्थण्डिलस्य फलान्याहुर्यानानि शयनानि च ।। ४६ ।। गृहाणि च महार्हाणि चन्द्रशुभ्राणि भामिनि । भामिनि! वेदीपर शयन करनेसे प्राप्त होनेवाले फल इस प्रकार बताये गये हैं—सवारी, शय्या और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल बहुमूल्य गृह ।। ४६ १/२ ।। आत्मानमुपजीवन् यो नियतो नियताशनः ।। ४७ ।। देहं वानशने त्यक्त्वा स स्वर्गं समुपश्नुते ।

जो केवल अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ नियमपूर्वक रहता है और नियमित भोजन करता है अथवा अनशन व्रतका आश्रय ले शरीरको त्याग देता है, वह स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४७ १/२ ॥
आत्मानमुपजीवन् दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ॥ ४८ ॥
त्यक्त्वा महार्णवे देहं वारुणं लोकमश्नुते ।
जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ बारह वर्षोंकी दीक्षा ले महासागरमें अपने शरीरका त्याग कर देता है, वह वरुणलोकमें सुख भोगता है ॥ ४८ १/२ ॥
आत्मानमुपजीवन् दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ॥ ४९ ॥
अश्मना चरणौ भित्त्वा गुह्यकेषु स मोदते ।
साधयित्वाऽऽत्मनाऽऽत्मानं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ ५० ॥
जो अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ निर्द्वन्द्व और परिग्रहशून्य हो बारह वर्षोंके लिये व्रतकी दीक्षा ले अन्तमें पत्थरसे अपने पैरोंको विदीर्ण करके स्वयं ही अपने शरीरको त्याग देता है, वह गुह्यकलोकमें आनन्द भोगता है ॥ ४९-५० ॥
चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम् ।
स्वर्गलोकमवाप्नोति देवैश्च सह मोदते ॥ ५१ ॥
जो बारह वर्षोंतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता और देवताओंके साथ आनन्द भोगता है ॥ ५१ ॥
आत्मानमुपजीवन् यो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
हुत्वाग्नौ देहमुत्सृज्य वह्निलोके महीयते ॥ ५२ ॥
जो बारह वर्षोंके लिये व्रत-पालनकी दीक्षा ले अपने ही सहारे जीवन-यापन करता हुआ अपने शरीरको अग्निमें होम देता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ५२ ॥
यस्तु देवि यथान्यायं दीक्षितो नियतो द्विजः ।
आत्मन्यात्मानमाधाय निर्ममो धर्मलालसः ॥ ५३ ॥
चीर्त्वा द्वादशवर्षाणि दीक्षामेतां मनोगताम् ।
अरणीसहितं स्कन्धे बद्ध्वा गच्छत्यनावृतः ॥ ५४ ॥
वीराध्वानगतो नित्यं वीरासनरतस्तथा ।
वीरस्थायी च सततं स वीरगतिमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
देवि! जो ब्राह्मण नियमपूर्वक रहकर यथोचित रीतिसे वनवास-व्रतकी दीक्षा ले अपने मनको परमात्मचिन्तनमें लगाकर ममताशून्य और धर्मका अभिलाषी होकर बारह वर्षोंतक इस मनोगत दीक्षाका पालन करके अरणी-सहित अग्निको वृक्षकी डालीमें बाँधकर अर्थात् अग्निका परित्याग करके अनावृत भावसे यात्रा करता है, सदा वीर मार्गसे चलता है, वीरासनपर बैठता है और वीरकी भाँति खड़ा होता है, वह वीरगतिको प्राप्त होता है ॥
स शक्रलोकगो नित्यं सर्वकामपुरस्कृतः ।

दिव्यपुष्पसमाकीर्णो दिव्यचन्दनभूषितः ॥ ५६ ॥ वह इन्द्रलोकमें जाकर सदा सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होता है। उसके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होती है तथा वह दिव्य चन्दनसे विभूषित होता है ॥ ५६ ॥

सुखं वसति धर्मात्मा दिवि देवगणैः सह । वीरलोकगतो नित्यं वीरयोगसहः सदा ॥ ५७ ॥ वह धर्मात्मा देवलोकमें देवताओंके साथ सुख-पूर्वक निवास करता है और निरन्तर वीरलोकमें रहकर वीरोंके साथ संयुक्त होता है ॥ ५७ ॥

सत्त्वस्थः सर्वमुत्सृज्य दीक्षितो नियतः शुचिः । वीराध्वानं प्रपद्येत यस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥ ५८ ॥ जो सब कुछ त्यागकर वनवासकी दीक्षा ले सत्त्वगुणमें स्थित नियमपरायण एवं पवित्र हो वीरपथका आश्रय लेता है, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं ॥ ५८ ॥

कामगेन विमानेन स वै चरति छन्दतः । शक्रलोकगतः श्रीमान् मोदते च निरामयः ॥ ५९ ॥ वह इन्द्रलोकमें जाकर नीरोग और दिव्य शोभासे सम्पन्न हो आनन्द भोगता है और इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वच्छन्द विचरता रहता है ॥ ५९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९६ १/३ श्लोक हैं)

१४३-

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न पूष्णो दन्तनिपातन ।
दक्षक्रतुहर त्र्यक्ष संशयो मे महानयम् ॥ १ ॥
पार्वतीजीने पूछा— भगदेवताकी आँख फोड़कर पूषाके दाँत तोड़ डालनेवाले दक्षयज्ञविध्वंसी भगवान् त्रिलोचन! मेरे मनमें यह एक महान् संशय है ॥ १ ॥

चातुर्वर्ण्यं भगवता पूर्वं सृष्टं स्वयम्भुवा ।
केन कर्मविपाकेन वैश्यो गच्छति शूद्रताम् ॥ २ ॥
भगवान् ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिन चार वर्णोंकी सृष्टि की है, उनमेंसे वैश्य किस कर्मके परिणामसे शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है? ॥ २ ॥

वैश्यो वा क्षत्रियः केन द्विजो वा क्षत्रियो भवेत् ।
प्रतिलोमः कथं देव शक्यो धर्मो निवर्तितुम् ॥ ३ ॥
अथवा क्षत्रिय किस कर्मसे वैश्य होता है और ब्राह्मण किस कर्मसे क्षत्रिय हो जाता है? देव! प्रतिलोम धर्मको कैसे निवृत्त किया जा सकता है? ॥ ३ ॥

केन वा कर्मणा विप्रः शूद्रयोनौ प्रजायते ।
क्षत्रियः शूद्रतामेति केन वा कर्मणा विभो ॥ ४ ॥
प्रभो! कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण शूद्र-योनिमें जन्म लेता है अथवा किस कर्मसे क्षत्रिय शूद्र हो जाता है? ॥ ४ ॥

एतन्मे संशयं देव वद भूतपतेऽनघ ।
त्रयो वर्णाः प्रकृत्येह कथं ब्राह्मण्यमाप्नुयुः ॥ ५ ॥
देव! पापरहित भूतनाथ! मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय—इन तीन वर्णोंके लोग किस प्रकार स्वभावतः ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो सकते हैं? ॥ ५ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

ब्राह्मण्यं देवि दुष्प्रापं निसर्गाद् ब्राह्मणः शुभे ।
क्षत्रियो वैश्यशूद्रौ वा निसर्गादिति मे मतिः ॥ ६ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। शुभे! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये चारों वर्ण मेरे विचारसे नैसर्गिक (प्राकृतिक या स्वभावसिद्ध) हैं, ऐसा मेरा विचार है ॥ ६ ॥

कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद् भ्रश्यति वै द्विजः । ज्येष्ठं वर्णमनुप्राप्य तस्माद् रक्षेत् वै द्विजः ॥ ७ ॥ इतना अवश्य है कि यहाँ पापकर्म करनेसे द्विज अपने स्थानसे-अपनी महत्तासे नीचे गिर जाता है। अतः द्विजको उत्तम वर्णमें जन्म पाकर अपनी मर्यादाकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ७ ॥

स्थितो ब्राह्मणधर्मेण ब्राह्मण्यमुपजीवति । क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्मभूयं स गच्छति ॥ ८ ॥ यदि क्षत्रिय अथवा वैश्य ब्राह्मण-धर्मका पालन करते हुए ब्राह्मणत्वका सहारा लेता है तो वह ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्मं निषेवते । ब्राह्मण्यात् स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते ॥ ९ ॥ जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका त्याग करके क्षत्रिय-धर्मका सेवन करता है, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर क्षत्रिय योनिमें जन्म लेता है ॥ ९ ॥

वैश्यकर्म च यो विप्रो लोभमोहव्यपाश्रयः । ब्राह्मण्यं दुर्लभं प्राप्य करोत्यल्पमतिः सदा ॥ १० ॥ स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात् । स्वधर्मात् प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते ॥ ११ ॥ जो विप्र दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर लोभ और मोहके वशीभूत हो अपनी मन्दबुद्धिताके कारण वैश्यका कर्म करता है, वह वैश्ययोनिमें जन्म लेता है। अथवा यदि वैश्य शूद्रके कर्मको अपनाता है, तो वह भी शूद्रत्वको प्राप्त होता है। शूद्रोचित कर्म करके अपने धर्मसे भ्रष्ट हुआ ब्राह्मण शूद्रत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ १०-११ ॥

तत्रासौ निरयं प्राप्तो वर्णभ्रष्टो बहिष्कृतः । ब्रह्मलोकात् परिभ्रष्टः शूद्रः समुपजायते ॥ १२ ॥ ब्राह्मण-जातिका पुरुष शूद्र-कर्म करनेके कारण अपने वर्णसे भ्रष्ट होकर जातिसे बहिष्कृत हो जाता है और मृत्युके पश्चात् वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिसे वंचित होकर नरकमें पड़ता है। इसके बाद वह शूद्रकी योनिमें जन्म ग्रहण करता है ॥ १२ ॥

क्षत्रियो वा महाभागे वैश्यो वा धर्मचारिणि । स्वानि कर्माण्यपाहाय शूद्रकर्म निषेवते ॥ १३ ॥ स्वस्थानात् स परिभ्रष्टो वर्णसंकरतां गतः । ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रत्वं याति तादृशः ॥ १४ ॥ महाभागे! धर्मचारिणि! क्षत्रिय अथवा वैश्य भी अपने-अपने कर्मोंको छोड़कर यदि शूद्रका काम करने लगता है तो वह अपनी जातिसे भ्रष्ट होकर वर्णसंकर हो जाता है और

दूसरे जन्ममें शूद्रकी योनिमें जन्म पाता है। ऐसा व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य कोई भी क्यों न हो, वह शूद्रभावको प्राप्त होता है ।। १३-१४ ।।

यस्तु बुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवान् शुचिः । धर्मज्ञो धर्मनिरतः स धर्मफलमश्नुते ।। १५ ।। जो पुरुष अपने वर्णधर्मका पालन करते हुए बोध प्राप्त करता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न, पवित्र तथा धर्मज्ञ होकर धर्ममें ही लगा रहता है, वही धर्मके वास्तविक फलका उपभोग करता है ।। १५ ।।

इदं चैवापरं देवि ब्रह्मणा समुदाहृतम् । अध्यात्मं नैष्ठिकं सद्भिर्धर्मकामैर्निषेव्यते ।। १६ ।। देवि! ब्रह्माजीने यह एक बात और बतायी है—धर्मकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंको आजीवन अध्यात्म-तत्त्वका ही सेवन करना चाहिये ।। १६ ।।

उग्रान्नं गर्हितं देवि गणान्नं श्राद्धसूतकम् । दुष्टान्नं नैव भोक्तव्यं शूद्रान्नं नैव कर्हिचित् ।। १७ ।। देवि! उग्रस्वभावके मनुष्यका अन्न निन्दित माना गया है। किसी समुदायका, श्राद्धका, जननाशौचका, दुष्ट पुरुषका और शूद्रका अन्न भी निषिद्ध है—उसे कभी नहीं खाना चाहिये ।। १७ ।।

शूद्रान्नं गर्हितं देवि सदा देवैर्महात्मभिः । पितामहमुखोत्सृष्टं प्रमाणमिति मे मतिः ।। १८ ।। देवताओं और महात्मा पुरुषोंने शूद्रके अन्नकी सदा ही निन्दा की है। इस विषयमें पितामह ब्रह्माजीके श्रीमुखका वचन प्रमाण है, ऐसा मेरा विश्वास है ।। १८ ।।

शूद्रान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । आहिताग्निस्तथा यज्वा स शूद्रगतिभाग् भवेत् ।। १९ ।। जो ब्राह्मण पेटमें शूद्रका अन्न लिये मर जाता है, वह अग्निहोत्री अथवा यज्ञ करनेवाला ही क्यों न रहा हो, उसे शूद्रकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है ।। १९ ।।

तेन शूद्रान्नशेषेण ब्रह्मस्थानादपाकृतः । ब्राह्मणः शूद्रतामेति नास्ति तत्र विचारणा ।। २० ।। उदरमें शूद्रान्नका शेषभाग स्थित होनेके कारण ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे वंचित हो शूद्रभावको प्राप्त होता है; इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ।। २० ।।

यस्यान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रियेद् द्विजः । तां तां योनिं व्रजेद् विप्रो यस्यान्नमुपजीवति ।। २१ ।। उदरमें जिसके अन्नका अवशेष लेकर जो ब्राह्मण मृत्युको प्राप्त होता है, वह उसीकी योनिमें जाता है। जिसके अन्नसे जीवन-निर्वाह करता है, उसीकी योनिमें जन्म ग्रहण करता

है ।। २१ ।।

ब्राह्मणत्वं शुभं प्राप्य दुर्लभं योऽवमन्यते । अभोज्यान्नानि चाश्नाति स द्विजत्वात् पतेत वै ।। २२ ।। जो शुभ एवं दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर उसकी अवहेलना करता है और नहीं खानेयोग्य अन्न खाता है, वह निश्चय ही ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है ।। २२ ।।

सुरापो ब्रह्महा क्षुद्रचोरो भग्नव्रतोऽशुचिः । स्वाध्यायवर्जितः पापो लुब्धो नैकृतिकः शठः ।। २३ ।। अव्रती वृषलीभर्ता कुण्डाशी सोमविक्रयी । निहीनसेवी विप्रो हि पतति ब्रह्मयोनितः ।। २४ ।। शराबी, ब्रह्महत्यारा, नीच, चोर, व्रतभंग करनेवाला, अपवित्र, स्वाध्यायहीन, पापी, लोभी, कपटी, शठ, व्रतका पालन न करनेवाला, शूद्रजातिकी स्त्रीका स्वामी, कुण्डाशी (पतिके जीते-जी उत्पन्न किये हुए जारज पुत्रके घरमें खानेवाला अथवा पाकपात्रमें ही भोजन करनेवाला), सोमरस बेचनेवाला और नीचसेवी ब्राह्मण ब्राह्मणकी योनिसे भ्रष्ट हो जाता है ।। २३-२४ ।।

गुरुतल्पी गुरुद्रोही गुरुकुत्सारतिश्च यः । ब्रह्मविच्चापि पतति ब्राह्मणो ब्रह्मयोनितः ।। २५ ।। जो गुरुकी शय्यापर सोनेवाला, गुरुद्रोही और गुरुनिन्दामें अनुरक्त है, वह ब्राह्मण वेदवेत्ता होनेपर भी ब्रह्मयोनिसे नीचे गिर जाता है ।। २५ ।।

एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा । शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत् ।। २६ ।। देवि! इन्हीं शुभ कर्मों और आचरणोंसे शूद्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त होता है और वैश्य क्षत्रियत्वको ।।

शूद्रकर्माणि सर्वाणि यथान्यायं यथाविधि । शुश्रूषां परिचर्यां च ज्येष्ठे वर्णे प्रयत्नतः ।। २७ ।। कुर्यादविमनाः शूद्रः सततं सत्पथे स्थितः । देवद्विजातिसत्कर्ता सर्वातिथ्यकृतव्रतः ।। २८ ।। ऋतुकालाभिगामी च नियतो नियताशनः । चोक्षंश्चोक्षजनान्वेषी शेषान्नकृतभोजनः ।। २९ ।। वृथामांसं न भुञ्जीत शूद्रो वैश्यत्वमृच्छति । शूद्र अपने सभी कर्मोंको न्यायानुसार विधिपूर्वक सम्पन्न करे। अपनेसे ज्येष्ठ वर्णकी सेवा और परिचर्यामें प्रयत्नपूर्वक लगा रहे। अपने कर्तव्यपालनसे कभी ऊबे नहीं। सदा सन्मार्गपर स्थित रहे। देवताओं और द्विजोंका सत्कार करे। सबके आतिथ्यका व्रत लिये रहे। ऋतुकालमें ही स्त्रीके साथ समागम करे। नियमपूर्वक रहकर नियमित भोजन करे।

स्वयं शुद्ध रहकर शुद्ध पुरुषोंका ही अन्वेषण करे। अतिथि-सत्कार और कुटुम्बीजनोंके भोजनसे बचे हुए अन्नका ही आहार करे और मांस न खाय। इस नियमसे रहनेवाला शूद्र (मृत्युके पश्चात् पुण्यकर्मोंका फल भोगकर) वैश्ययोनिमें जन्म लेता है॥ ऋतवागनहंवादी निर्द्वन्द्वः शमकोविदः ॥ ३० ॥ यजते नित्ययज्ञैश्च स्वाध्यायपरमः शुचिः । दान्तो ब्राह्मणसत्कर्ता सर्ववर्णबुभूषकः ॥ ३१ ॥ गृहस्थव्रतमातिष्ठन् द्विकालकृतभोजनः । शेषाशी विजिताहारो निष्कामो निरहंवदः ॥ ३२ ॥ अग्निहोत्रमुपासंश्च जुह्वानश्च यथाविधि । सर्वातिथ्यमुपातिष्ठन् शेषान्नकृतभोजनः ॥ ३३ ॥ त्रेताग्निमन्त्रविहितो वैश्यो भवति वै द्विजः । स वैश्यः क्षत्रियकुले शुचौ महति जायते ॥ ३४ ॥ वैश्य सत्यवादी, अहंकारशून्य, निर्द्वन्द्व, शान्तिके साधनोंका ज्ञाता, स्वाध्यायपरायण और पवित्र होकर नित्य यज्ञोंद्वारा यजन करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्मणोंका सत्कार करते हुए समस्त वर्णोंकी उन्नति चाहे। गृहस्थके व्रतका पालन करते हुए प्रतिदिन दो ही समय भोजन करे। यज्ञशेष अन्नका ही आहार करे। आहारपर काबू रखे। सम्पूर्ण कामनाओंको त्याग दे। अहंकारशून्य होकर विधिपूर्वक आहुति देते हुए अग्निहोत्र कर्मका सम्पादन करे। सबका आतिथ्य-सत्कार करके अवशिष्ट अन्नका स्वयं भोजन करे। त्रिविध अग्नियोंकी मन्त्रोच्चारणपूर्वक परिचर्या करे। ऐसा करनेवाला वैश्य द्विज होता है। वह वैश्य पवित्र एवं महान् क्षत्रियकुलमें जन्म लेता है॥ ३०—३४॥ स वैश्यः क्षत्रियो जातो जन्मप्रभृति संस्कृतः । उपनीतो व्रतपरो द्विजो भवति सत्कृतः ॥ ३५ ॥ ददाति यजते यज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः । अधीत्य स्वर्गमन्विच्छंस्त्रेताग्निशरणः सदा ॥ ३६ ॥ आर्तहस्तप्रदो नित्यं प्रजा धर्मेण पालयन् । सत्यः सत्यानि कुरुते नित्यं यः सुखदर्शनः ॥ ३७ ॥ क्षत्रियकुलमें उत्पन्न हुआ वह वैश्य जन्मसे ही क्षत्रियोचित संस्कारसे सम्पन्न हो उपनयनके पश्चात् ब्रह्मचर्यव्रतके पालनमें तत्पर हो सर्वसम्मानित द्विज होता है। वह दान देता है, पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन करता है, वेदोंका अध्ययन करके स्वर्गकी इच्छा रखकर सदा त्रिविध अग्नियोंकी शरण ले उनकी आराधना करता है, दुःखी एवं पीड़ित मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, प्रतिदिन प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करता है, स्वयं सत्यपरायण होकर सत्यपूर्ण व्यवहार करता है तथा दर्शनसे ही सबके लिये सुखद होता है, वही श्रेष्ठ क्षत्रिय अथवा राजा है॥ ३५—३७॥