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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]

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[उमा-महेश्वर-संवादमें कितने ही महत्त्वपूर्ण विषयोंका विवेचन]

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश प्रमदा विधवा भृशम् ।

दृश्यन्ते मानुषे लोके सर्वकल्याणवर्जिताः ॥

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्यलोकमें बहुत-सी युवती स्त्रियाँ समस्त

कल्याणोंसे रहित विधवा दिखायी देती हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे

बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

याः पुरा मनुजा देवि बुद्धिमोहसमन्विताः ।

कुटुम्बं तत्र वै पत्युर्नाशयन्ति वृथा तथा ॥

विषदाश्चाग्निदाश्चैव पतीन् प्रति सुनिर्दयाः ।

अन्यासां हि पतीन् यान्ति स्वपतीन् द्वेष्यकारणात् ॥

एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः ॥

निरयस्थाश्चिरं कालं कथंचित् प्राप्य मानुषम् ॥

तत्र ता भोगरहिता विधवाश्च भवन्ति वै ॥

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो स्त्रियाँ पहले जन्ममें बुद्धिमें मोह छा जानेके कारण

पतिके कुटुम्बका व्यर्थ नाश करती हैं, विष देती, आग लगाती और पतियोंके प्रति अत्यन्त

निर्दय होती हैं, अपने पतियोंसे द्वेष रखनेके कारण दूसरी स्त्रियोंके पतियोंसे सम्बन्ध

स्थापित कर लेती हैं, ऐसे आचरणवाली नारियाँ यमलोकमें भलीभाँति दण्डित हो

चिरकालतक नरकमें पड़ी रहती हैं। फिर किसी तरह मनुष्य-योनि पाकर वे भोगरहित

विधवा हो जाती हैं ॥

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।

दासभूताः प्रदृश्यन्ते सर्वकर्मपरा भृशम् ॥

आघातभर्त्सनसहाः पीड्यमानाश्च सर्वशः ।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें ही कोई दासभावको प्राप्त दिखायी देते

हैं, जो सब प्रकारके कर्मोंमें सर्वथा संलग्न रहते हैं। वे पीटे जाते हैं, डाँट-फटकार सहते हैं

और सब तरहसे सताये जाते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।।
ये पुरा मनुजा देवि परेषां वित्तहारकाः ।।
ऋणवृद्धिकरं क्रौर्यान्न्यासदत्तं तथैव च ।
निक्षेपकारणाद् दत्तपरद्रव्यापहारिणः ।।
प्रमादाद् विस्मृतं नष्टं परेषां धनहारकाः ।
वधबन्धपरिक्लेशैर्दासत्वं कुर्वते परान् ।।
तादृशा मरणं प्राप्ता दण्डिता यमशासनैः ।
कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते देवि सर्वथा ।।
दासभूता भविष्यन्ति जन्मप्रभृति मानवाः ।।
तेषां कर्माणि कुर्वन्ति येषां ते धनहारकाः ।
आसमाप्तेः स्वपापस्य कुर्वन्तीति विनिश्चयः ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**कल्याणि! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। देवि! जो मनुष्य पहले दूसरोंके धनका अपहरण करते हैं, जो क्रूरतावश किसीके ऐसे धनको हड़प लेते हैं, जिसके कारण उसके ऊपर ऋण बढ़ जाता है, जो रखनेके लिये दिये हुए या धरोहरके तौरपर रखे हुए पराये धनको दबा लेते हैं अथवा प्रमादवश दूसरोंके भूले या खोये हुए धनको हर लेते हैं, दूसरोंको वध-बन्धन और क्लेशमें डालकर उनसे अपनी दासता कराते हैं; देवि! ऐसे लोग मृत्युको प्राप्त हो यमदण्डसे दण्डित होकर जब किसी तरह मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब जन्मसे ही दास होते हैं और उन्हींकी सेवा करते हैं, जिनका धन उन्होंने पूर्वजन्ममें हर लिया है। जबतक उनके पापका भोग समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वे दासकर्म ही करते रहते हैं, यही शास्त्रका निश्चय है ।।
पशुभूतास्तथा चान्ये भवन्ति धनहारकाः ।
तत् तथा क्षीयते कर्म तेषां पूर्वापराधजम् ।।
पराये धनका अपहरण करनेवाले दूसरे लोग पशु होकर भी धनीकी सेवा करते हैं। ऐसा करनेसे उनका पूर्वापराधजनित कर्म क्षीण होता है ।।
किंतु मोक्षविधिस्तेषां सर्वथा तत्प्रसादनम् ।
अयथावन्मोक्षकामः पुनर्जन्मनि चेष्यते ।।
सब प्रकारसे उस धनके स्वामीको प्रसन्न कर लेना ही उसके ऋणसे छुटकारा पानेका उपाय है, किंतु जो यथावत् रूपसे उस ऋणसे छूटना नहीं चाहता, उसे पुनर्जन्म लेकर उसकी सेवा करनी पड़ती है ।।
मोक्षकामी यथान्यायं कुर्वन् कर्माणि सर्वशः ।
भर्तुः प्रसादमाकांक्षेदायासान् सर्वथा सहन् ।।
जो उस बन्धनसे छूटना चाहता हो, वह यथोचित रूपसे सारे काम करता और परिश्रमको सर्वथा सहता हुआ स्वामीको प्रसन्न करनेकी आकांक्षा रखे ।।

प्रीतिपूर्वं तु यो भर्त्रा मुक्तो मुक्तः स पावनः ।
तथाभूतान् कर्मकरान् सदा संतोषयेत् पतिः ॥
जिसे स्वामी प्रसन्नतापूर्वक दासताके बन्धनसे मुक्त कर देता है, वह मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है। स्वामीको भी चाहिये कि वह ऐसे सेवकोंको सदा संतुष्ट रखे ॥
यथार्हं कारयेत् कर्म दण्डं कारणतः क्षिपेत् ।
वृद्धान् बालांस्तथा क्षीणान् पालयन् धर्ममाप्नुयात् ।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
उनसे यथायोग्य कार्य कराये और विशेष कारणसे ही उन्हें दण्ड दे। जो वृद्धों, बालकों और दुर्बल मनुष्योंका पालन करता है, वह धर्मका भागी होता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो ॥

उमोवाच

भगवन् भुवि मर्त्यानां दण्डितानां नरेश्वरैः ।
दण्डेनैव कृतेनेह पापनाशो भवेन्न वा ॥
एतन्मया संशयितं तद् भवांश्छेत्तुमर्हति ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर राजा लोग जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, अब उस दण्डसे ही उनके पापोंका नाश हो जाता है या नहीं? यह मेरा संदेह है। आप इसका निवारण करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥
ये नृपैर्दण्डिता भूमावपराधापदेशतः ।
यमलोके न दण्ड्यन्ते तत्र ते यमदण्डनैः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारा संदेह ठीक है, तुम एकाग्रचित्त होकर इसका यथार्थ उत्तर सुनो। इस भूमिपर राजालोग जिस अपराधका नाम लेकर जिन मनुष्योंको दण्ड दे देते हैं, उसके लिये वे यमलोकमें यमराजके दण्डद्वारा दण्डित नहीं होते हैं ॥
अदण्डिता वा ये तथ्या मिथ्या वा दण्डिता भुवि ।
तान् यमो दण्डयत्येव स हि वेद कृताकृतम् ॥
इस पृथ्वीपर जो वास्तविक अपराधी बिना दण्ड पाये रह जाते हैं अथवा झूठे ही दूसरे लोग दण्डित हो जाते हैं, उस दशामें यमराज उन वास्तविक अपराधियोंको अवश्य दण्ड देते हैं; क्योंकि वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि किसने अपराध किया है और किसने नहीं किया है ॥
नातिक्रमेद् यमं कश्चित् कर्म कृत्वेह मानुषः ।
राजा यमश्च कुर्वाते दण्डमात्रं तु शोभने ॥

कोई भी मनुष्य इस लोकमें कर्म करके यमराजको नहीं लाँघ सकता, उसे अवश्य दण्ड भोगना पड़ता है। शोभने! राजा और यम सबको भरपूर दण्ड देते हैं।। नास्ति कर्मफलच्छेत्ता कश्चिल्लोकत्रयेऽपि च।
इति ते कथितं सर्वं निर्विशङ्का भव प्रिये॥
तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है, जो कर्मोंके फलका बिना भोगे नाश कर सके। प्रिये! इस विषयमें तुम्हें सारी बातें बता दीं। अब संदेहरहित हो जाओ।।

उमोवाच

किमर्थं दुष्कृतं कृत्वा मानुषा भुवि नित्यशः।
पुनस्तत्कर्मनाशाय प्रायश्चित्तानि कुर्वते॥
उमाने पूछा— भगवन्! यदि ऐसी बात है तो भूमण्डलके मनुष्य पाप-कर्म करके उसके निवारणके लिये प्रायश्चित्त क्यों करते हैं?।।
सर्वपापहरं चेति हयमेधं वदन्ति च।
प्रायश्चित्तानि चान्यानि पापनाशाय कुर्वते॥
तस्मान्मया संशयितं त्वं तच्छेत्तुमिहार्हसि।
कहते हैं कि अश्वमेधयज्ञ सम्पूर्ण पापोंको हर लेनेवाला है। लोग दूसरे-दूसरे प्रायश्चित्त भी पापोंका नाश करनेके लिये ही करते हैं (इधर आप कहते हैं कि तीनों लोकोंमें कोई कर्मफलका नाश करनेवाला है ही नहीं) अतः इस विषयमें मुझे संदेह हो गया है। आप मेरे इस संदेहका निवारण करें।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वं समाहिता।
संशयो हि महानेव पूर्वेषां च मनीषिणाम्॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुमने ठीक संशय उपस्थित किया है। अब एकाग्रचित्त होकर इसका वास्तविक उत्तर सुनो। पहलेके महर्षियोंके मनमें भी यह महान् संदेह बना रहा है।।
द्विधा तु क्रियते पापं सद्भिश्वासद्भिरेव च।
अभिसंधाय वा नित्यमन्यथा वा यदृच्छया॥
सज्जन हों या असज्जन, सभीके द्वारा दो प्रकारका पाप बनता है, एक तो वह पाप है, जिसे सदा किसी उद्देश्यको मनमें लेकर जान-बूझकर किया जाता है और दूसरा वह है, जो अकस्मात् दैवेच्छासे बिना जाने ही बन जाता है।।
केवलं चाभिसंधाय संरम्भाच्च करोति यत्।
कर्मणस्तस्य नाशस्तु न कथंचन विद्यते॥

जो उद्देश्य-सिद्धिकी कामना रखकर क्रोधपूर्वक कोई असत् कर्म करता है, उसके उस

कर्मका किसी तरह नाश नहीं होता है ।।

अभिसंधिकृतस्यैव नैव नाशोऽस्ति कर्मणः ।

अश्वमेधसहस्रैश्च प्रायश्चित्तशतैरपि ।।

अन्यथा यत् कृतं पापं प्रमादाद् वा यदृच्छया ।

प्रायश्चित्ताश्वमेधाभ्यां श्रेयसा तत् प्रणश्यति ।।

फलाभिसन्धिपूर्वक किये गये कर्मोंका नाश सहस्रों अश्वमेधयज्ञों और सैकड़ों

प्रायश्चित्तोंसे भी नहीं होता। इसके सिवा और प्रकारसे—असावधानी या दैवेच्छासे जो पाप

बन जाता है, वह प्रायश्चित्त और अश्वमेधयज्ञसे तथा दूसरे किसी श्रेष्ठ कर्मसे नष्ट हो जाता

है ।।

विद्ध्येवं पापके कार्ये निर्विशंका भव प्रिये ।

इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।

प्रिये! इस प्रकार पाप कर्मके विषयमें तुम्हारा यह संदेह अब दूर हो जाना चाहिये।

देवि! यह विषय मैंने तुम्हें बताया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश मानुषाश्चेतरा अपि ।

म्रियन्ते मानुषा लोके कारणाकारणादपि ।।

केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! जगत्के मनुष्य तथा दूसरे प्राणी, जो किसी

कारणसे या अकारण भी मृत्युको प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है?

यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

ये पुरा मनुजा देवि कारणाकारणादपि ।

यथासुभिर्वियुज्यन्ते प्राणिनः प्राणिनिर्दयाः ।।

तथैव ते प्राप्नुवन्ति यथैवात्मकृतं फलम् ।

विषदास्तु विषेणैव शस्त्रैः शस्त्रेण घातकाः ।।

श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! जो निर्दयी मनुष्य पहले किसी कारणसे या अकारण भी

दूसरे प्राणियोंके प्राण लेते हैं, वे उसी प्रकार अपनी करनीका फल पाते हैं। विष देनेवाले

विषसे ही मरते हैं और शस्त्रद्वारा दूसरोंकी हत्या करनेवाले लोग स्वयं भी जन्मान्तरमें

शस्त्रोंके आघातसे ही मारे जाते हैं ।।

इति सत्यं प्रजानीहि लोके तत्र विधिं प्रति ।

कर्मकर्ता नरोऽभोक्ता स नास्ति दिवि वा भुवि ।

तुम इसीको सत्य समझो। कर्म करनेवाला मनुष्य उन कर्मोंका फल न भोगे, ऐसा कोई पुरुष न इस पृथ्वीपर है न स्वर्गमें ।। न शक्यं कर्म चाभोक्तुं सदेवासुरमानुषैः ।। कर्मणा ग्रथितो लोक आदिप्रभृति वर्तते । देवता, असुर और मनुष्य कोई भी अपने कर्मोंका फल भोगे बिना नहीं रह सकता। आदिकालसे ही यह संसार कर्मसे गूँथा हुआ है ।। एतदुद्देशतः प्रोक्तं कर्मपाकफलं प्रति ।। यदन्यच्च मया नोक्तं यस्मिंस्ते कर्मसंग्रहे । बुद्धितर्केण तत् सर्वं तथा वेदितुमर्हसि ।। कथितं श्रोतुकामाया भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।। कर्मोंके परिणामके विषयमें ये बातें संक्षेपसे बतायी गयी हैं। कर्मसंचयके विषयमें जो बात मैंने अबतक नहीं कही हो, उसे भी तुम्हें अपनी बुद्धिद्वारा तर्क—ऊहापोह करके जान लेना चाहिये। तुम्हें सुननेकी इच्छा थी, इसलिये मैंने ये सारी बातें बतायीं। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् भगनेत्रघ्न मानुषाणां विचेष्टितम् । सर्वमात्मकृतं चेति श्रुतं मे भगवन्मतम् ।। लोके ग्रहकृतं सर्वं मत्वा कर्म शुभाशुभम् । तदेव ग्रहनक्षत्रं प्रायशः पर्युपासते ।। एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! भगनेत्रनाशन! आपका मत है कि मनुष्योंकी जो भली-बुरी अवस्था है, वह सब उनकी अपनी ही करनीका फल है। आपके इस मतको मैंने अच्छी तरह सुना; परंतु लोकमें यह देखा जाता है कि लोग समस्त शुभाशुभ कर्मफलको ग्रहजनित मानकर प्रायः उन ग्रहनक्षत्रोंकी ही आराधना करते रहते हैं। क्या उनकी यह मान्यता ठीक है? देव! यही मेरा संशय है। आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि शृणु तत्त्वविनिश्चयम् ।। नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव शुभाशुभनिवेदकाः । मानवानां महाभागे न तु कर्मकराः स्वयम् ।। **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुमने उचित संदेह उपस्थित किया है। इस विषयमें जो सिद्धान्त मत है, उसे सुनो। महाभागे! ग्रह और नक्षत्र मनुष्योंके शुभ और अशुभकी सूचनामात्र देनेवाले हैं। वे स्वयं कोई काम नहीं करते हैं ।।

प्रजानां तु हितार्थाय शुभाशुभविधिं प्रति । अनागतमतिक्रान्तं ज्योतिश्चक्रेण बोध्यते ॥ प्रजाके हितके लिये ज्यौतिषचक्र (ग्रह-नक्षत्र मण्डल)-के द्वारा भूत और भविष्यके शुभाशुभ फलका बोध कराया जाता है ॥ किंतु तत्र शुभं कर्म सुग्रहैस्तु निवेद्यते । दुष्कृतस्याशुभैरेव समवायो भवेदिति ॥ किंतु वहाँ शुभ कर्मफलकी सूचना (उत्तम) शुभ ग्रहोंद्वारा प्राप्त होती है और दुष्कर्मके फलकी सूचना अशुभ ग्रहोंद्वारा ॥ केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम् । सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति ॥ केवल ग्रह और नक्षत्र ही शुभाशुभ कर्मफलको उपस्थित नहीं करते हैं। सारा अपना ही किया हुआ कर्म शुभाशुभ फलका उत्पादक होता है। ग्रहोंने कुछ किया है—यह कथन लोगोंका प्रवादमात्र है ॥

उमोवाच

भगवन् विविधं कर्म कृत्वा जन्तुः शुभाशुभम् । किं तयोः पूर्वतरं भुङ्क्ते जन्मान्तरे पुनः ॥ एष मे संशयो देव तं मे त्वं छेत्तुमर्हसि । **उमाने पूछा—**भगवन्! जीव नाना प्रकारके शुभाशुभ कर्म करके जब दूसरा जन्म धारण करता है, तब दोनोंमेंसे पहले किसका फल भोगता है, शुभका या अशुभका? देव! यह मेरा संशय है। आप इसे मिटा दीजिये ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थाने संशयितं देवि तत् ते वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ अशुभं पूर्वमित्याहुरपरे शुभमित्यपि । मिथ्या तदुभयं प्रोक्तं केवलं तद् ब्रवीमि ते ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! तुम्हारा संदेह उचित ही है, अब मैं तुम्हें इसका यथार्थ उत्तर देता हूँ। कुछ लोगोंका कहना है कि पहले अशुभ कर्मका फल मिलता है, दूसरे कहते हैं कि पहले शुभ कर्मका फल प्राप्त होता है। परंतु ये दोनों ही बातें मिथ्या कही गयी हैं। सच्ची बात क्या है? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ ॥ भुञ्जानाश्चापि दृश्यन्ते क्रमशो भुवि मानवाः । ऋद्धिं हानिं सुखं दुःखं तत् सर्वमभयं भयम् ॥ इस पृथ्वीपर मनुष्य क्रमशः दोनों प्रकारके फल भोगते देखे जाते हैं। कभी धनकी वृद्धि होती है कभी हानि, कभी सुख मिलता है कभी दुःख, कभी निर्भयता रहती है और कभी

भय प्राप्त होता है। इस प्रकार सभी फल क्रमशः भोगने पड़ते हैं ।।
दुःखान्यनुभवन्त्याढ्या दरिद्राश्च सुखानि च ।
यौगपद्याद्धि भुञ्जाना दृश्यन्ते लोकसाक्षिकम् ॥
कभी धनाढ्य लोग दुःखका अनुभव करते हैं और कभी दरिद्र भी सुख भोगते हैं। इस प्रकार एक ही साथ लोग शुभ और अशुभका भोग करते देखे जाते हैं। सारा जगत् इस बातका साक्षी है ।।
नरके स्वर्गलोके च न तथा संस्थितिः प्रिये ।
नित्यं दुःखं हि नरके स्वर्गे नित्यं सुखं तथा ॥
प्रिये! किंतु नरक और स्वर्गलोकमें ऐसी स्थिति नहीं है। नरकमें सदा दुःख ही दुःख है और स्वर्गमें सदा सुख ही सुख ।।
तत्रापि सुमहद् भुक्त्वा पूर्वमल्पं पुनः शुभे ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
शुभे! वहाँ भी शुभ या अशुभमेंसे जो बहुत अधिक होता है, उसका भोग पहले और जो बहुत कम होता है, उसका भोग पीछे होता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो लोके म्रियन्ते केन हेतुना ।
जाता जाता न तिष्ठन्ति तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस लोकमें प्राणी किस कारणसे मर जाते हैं? जन्म ले-लेकर वे यहीं बने क्यों नहीं रहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सत्यं समाहिता ।
आत्मा कर्मक्षयाद् देहं यथा मुञ्चति तच्छृणु ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इस विषयमें जो यथार्थ बात है, वह मैं तुम्हें बता रहा हूँ। कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर आत्मा इस शरीरको कैसे छोड़ता है? यह एकाग्रचित्त होकर सुनो ।।
शरीरात्मसमाहारो जन्तुरित्यभिधीयते ।
तत्रात्मानं नित्यमाहुरनित्यं क्षेत्रमुच्यते ॥
शरीर और आत्माका (जड और चेतनका) जो संयोग है, उसीको जीव या प्राणी कहते हैं। इनमें आत्माको नित्य और शरीरको अनित्य बताया जाता है ।।
एवं कालेन संक्रान्तं शरीरं जर्जरीकृतम् ।
अकर्मयोग्यं संशीर्णं त्यक्त्वा देही ततो व्रजेत् ॥

जब कालसे आक्रान्त होकर शरीर जरावस्थासे जर्जर हो जाता है, कोई कर्म करने योग्य नहीं रह जाता और सर्वथा गल जाता है, तब देहधारी जीव उसे त्यागकर चल देता है॥

नित्यस्यानित्यसंत्यागाल्लोके तन्मरणं विदुः ।
कालं नातिक्रमेरेन् हि सदेवासुरमानवाः ॥
नित्य जीवात्मा जब अनित्य शरीरको त्यागकर चला जाता है, तब लोकमें उस प्राणीकी मृत्यु हुई मानी जाती है। देवता, असुर और मनुष्य कोई भी कालका उल्लंघन नहीं कर सकते॥

यथाऽऽकाशे न तिष्ठेत द्रव्यं किंचिदचेतनम् ।
तथा धावति कालोऽयं क्षणं किंचिन्न तिष्ठति ॥
जैसे आकाशमें कोई भी जड द्रव्य स्थिर नहीं रह सकता, उसी प्रकार यह काल निरन्तर दौड़ लगाता रहता है। एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता॥

स पुनर्जायतेऽन्यत्र शरीरं नवमाविशन् ।
एवं लोकगतिर्नित्यमादिप्रभृति वर्तते ॥
वह जीव फिर किसी दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अन्यत्र जन्म लेता है। इस प्रकार आदि कालसे ही लोककी सदा ऐसी ही गति चल रही है॥

उमोवाच

भगवन् प्राणिनो बाला दृश्यन्ते मरणं गताः ।
अतिवृद्धाश्च जीवन्तो दृश्यन्ते चिरजीविनः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! इस संसारमें बाल्यावस्थामें भी प्राणियोंकी मृत्यु होती देखी जाती है और अत्यन्त वृद्ध मनुष्य भी चिरजीवी होकर जीवित दिखायी देते हैं॥

केवलं कालमरणं न प्रमाणं महेश्वर ।
तस्मान्मे संशयं ब्रूहि प्राणिनां जीवकारणम् ॥
महेश्वर! केवल काल-मृत्यु अर्थात् वृद्धावस्थामें ही मृत्यु होनेकी बात प्रमाणभूत नहीं रह गयी है; अतः प्राणियोंके जीवनके लिये उठे हुए मेरे इस संदेहका आप निवारण कीजिये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् कारणं देवि निर्णयस्त्वेक एव सः ।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! इसका कारण सुनो। इस विषयमें एक ही निर्णय है॥

यावत् पूर्वकृतं कर्म तावज्जीवति मानवः ।
तत्र कर्मवशाद् बाला म्रियन्ते कालसंक्षयात् ॥
चिरं जीवन्ति वृद्धाश्च तथा कर्मप्रमाणतः ।

इति ते कथितं देवि निर्विशङ्का भव प्रिये ॥ जबतक पूर्वकृत कर्म (प्रारब्ध) शेष है, तबतक मनुष्य जीवित रहता है। उसी कर्मके अधीन होकर प्रारब्ध भोगका काल समाप्त होनेपर बालक भी मर जाते हैं और उसी कर्मकी मात्राके अनुसार वृद्ध पुरुष भी दीर्घकालतक जीवित रहते हैं। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। प्रिये इस विषयमें अब तुम संशयरहित हो जाओ ॥

उमोवाच

भगवन् केन वृत्तेन भवन्ति चिरजीविनः । अल्पायुषो नराः केन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**भगवन्! किस आचरणसे मनुष्य चिरजीवी होते हैं और किससे अल्पायु हो जाते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु तत् सर्वमखिलं गुह्यं पथ्यतरं नृणाम् । येन वृत्तेन सम्पन्ना भवन्ति चिरजीविनः ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह सारा गूढ़ रहस्य मनुष्योंके लिये परम लाभदायक है। जिस आचरणसे सम्पन्न मनुष्य चिरजीवी होते हैं, वह सब सुनो ॥ अहिंसा सत्यवचनमक्रोधः क्षान्तिराजर्वम् । गुरूणां नित्यशुश्रूषा वृद्धानामपि पूजनम् ॥ शौचादकार्यसंत्यागः सदा पथ्यस्य भोजनम् । एवमादिगुणं वृत्तं नराणां दीर्घजीविनाम् ॥ अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोधका त्याग, क्षमा, सरलता, गुरुजनोंकी नित्य सेवा, बड़े-बूढ़ोंका पूजन, पवित्रताका ध्यान रखकर न करनेयोग्य कर्मोंका त्याग, सदा ही पथ्य भोजन इत्यादि गुणोंवाला आचार दीर्घजीवी मनुष्योंका है ॥ तपसा ब्रह्मचर्येण रसायननिषेवणात् । उदग्रसत्त्वा बलिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥ तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा रसायनके सेवनसे मनुष्य अधिक धैर्यशाली, बलवान् और चिरजीवी होते हैं ॥ स्वर्गे वा मानुषे वापि चिरं तिष्ठन्ति धार्मिकाः ॥ अपरे पापकर्माणः प्रायशोऽनृतवादिनः । हिंसाप्रिया गुरुद्विष्टा निष्क्रियाः शौचवर्जिताः ॥ नास्तिका घोरकर्माणः सततं मांसपानपाः । पापाचारा गुरुद्विष्टाः कोपनाः कलहप्रियाः ॥ एवमेवाशुभाचारास्तिष्ठन्ति निरये चिरम् ।

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और स्त्री-भावनासे युक्त पुरुष तदनुरूप कर्म करके उस कर्मके अनुसार स्त्री हो सकता है॥

उमोवाच

भगवन् सर्वलोकेश कर्मात्मा न करोति चेत्।
कोऽन्यः कर्मकरो देहे तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि॥
उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! यदि आत्मा कर्म नहीं करता तो शरीरमें दूसरा कौन कर्म करनेवाला है? यह मुझे बताइये॥

श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु भामिनि कर्तारमात्मा हि न च कर्मकृत्।
प्रकृत्या गुणयुक्तेन क्रियते कर्म नित्यशः॥
श्रीमहेश्वरने कहा— भामिनि! कर्ता कौन है? यह सुनो। आत्मा कर्म नहीं करता है। प्रकृतिके गुणोंसे युक्त प्राणीद्वारा ही सदा कर्म किया जाता है॥
शरीरं प्राणिनां लोके यथा पित्तकफानिलैः।
व्याप्तमेभिस्त्रिभिर्दोषैस्तथा व्याप्तं त्रिभिर्गुणैः॥
जगत्में प्राणियोंका शरीर जैसे वात, पित्त और कफ—इन तीन दोषोंसे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार प्राणी सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंसे व्याप्त होता है॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्वेते शरीरिणः।
प्रकाशात्मकमेतेषां सत्त्वं सततमिष्यते॥
रजो दुःखात्मकं तत्र तमो मोहात्मकं स्मृतम्।
त्रिभिरेतैर्गुणैर्युक्तं लोके कर्म प्रवर्तते॥
सत्त्व, रज और तम—ये तीनों शरीरधारीके गुण हैं। इनमेंसे सत्त्व सदा प्रकाशस्वरूप माना गया है। रजोगुण दुःखरूप और तमोगुण मोहरूप बताया गया है। लोकमें इन तीनों गुणोंसे युक्त कर्मकी प्रवृत्ति होती है॥
सत्यं प्राणिदया शौचं श्रेयः प्रीतिः क्षमा दमः।
एवमादि तथान्यच्च कर्म सात्त्विकमुच्यते॥
सत्यभाषण, प्राणियोंपर दया, शौच, श्रेय, प्रीति, क्षमा और इन्द्रिय-संयम—ये तथा ऐसे ही अन्य कर्म भी सात्त्विक कहलाते हैं॥
दाक्ष्यं कर्मपरत्वं च लोभो मोहो विधिं प्रति।
कलत्रसङ्गो माधुर्यं नित्यमैश्वर्यलुब्धता॥
रजसश्चोद्भवं चैतत् कर्म नानाविधं सदा॥
दक्षता, कर्मपरायणता, लोभ, विधिके प्रति मोह, स्त्री-संग, माधुर्य तथा सदा ऐश्वर्यका लोभ—ये नाना प्रकारके भाव और कर्म रजोगुणसे प्रकट होते हैं॥

अनृतं चैव पारुष्यं धृतिर्विद्वेषिता भृषम् ।
हिंसासत्यं च नास्तिक्यं निद्रालस्यभयानि च ॥
तमसश्चोद्भवं चैतत् कर्म पापयुतं तथा ॥
असत्यभाषण, रूखापन, अत्यन्त अधीरता, हिंसा, असत्य, नास्तिकता, निद्रा, आलस्य और भय—ये तथा पापयुक्त कर्म तमोगुणसे प्रकट होते हैं ।।

तस्माद् गुणमयः सर्वः कार्यारम्भः शुभाशुभः ।
तस्मादात्मानमव्यग्रं विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
इसलिये समस्त शुभाशुभ कार्यारम्भ गुणमय है, अतः आत्माको व्यग्रतारहित, अकर्ता और अविनाशी समझो ।।

सात्त्विकाः पुण्यलोकेषु राजसा मानुषे पदे ।
तिर्यग्योनौ च नरके तिष्ठेयुस्तामसा नराः ॥
सात्त्विक मनुष्य पुण्यलोकोंमें जाते हैं। राजस जीव मनुष्यलोकमें स्थित होते हैं तथा तमोगुणी मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिमें और नरकमें स्थित होते हैं ।।

उमोवाच

किमर्थमात्मा भिन्नेऽस्मिन् देहे शस्त्रेण वा हते ।
स्वयं प्रयास्यति तदा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा—इस शरीरके भेदनसे अथवा शस्त्रद्वारा मारे जानेसे आत्मा स्वयं ही क्यों चला जाता है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।
एतन्नैर्मापिकैश्चापि मुह्यन्ते सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा—कल्याणि! इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। इस विषयमें सूक्ष्म बुद्धिवाले विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं ।।

कर्मक्षये तु सम्प्राप्ते प्राणिनां जन्मधारिणाम् ।
उपद्रवो भवेद् देहे येन केनापि हेतुना ॥
तन्निमित्तं शरीरी तु शरीरं प्राप्य संक्षयम् ।
अपयाति परित्यज्य ततः कर्मवशेन सः ॥
जन्मधारी प्राणियोंके कर्मोंका क्षय हो जानेपर इस देहमें जिस किसी भी कारणसे उपद्रव होने लगता है। उसके कारण शरीरका क्षय हो जानेपर देहाभिमानी जीव कर्मके अधीन हो उस शरीरको त्यागकर चला जाता है ।।

देहः क्षयति नैवात्मा वेदनाभिर्न चाल्यते ।
तिष्ठेत् कर्मफलं यावद् व्रजेत् कर्मक्षये पुनः ॥

शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं। वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता। जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ।।
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता ।
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
आदिकालसे ही इस जगत्में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है। देवि! यह सब विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

अध्याय (पृष्ठ 1282)

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[प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]

उमोवाच

भगवन् देवदेवेश कर्मणैव शुभाशुभम् ।
यथायोगं फलं जन्तुः प्राप्नोतीति विनिश्चयः ॥
**उमाने पूछा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! जीव अपने कर्मसे यथायोग्य शुभाशुभ फल पाता है—यह निश्चय हुआ ॥
परेषां विप्रियं कुर्वन् यथा सम्प्राप्नुयाच्छुभम् ।
यदेतदस्मिंश्चेद् देहे तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
दूसरोंका अप्रिय करके भी इस शरीरमें स्थित हुआ जीवात्मा किस प्रकार शुभ फल पाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तदप्यस्ति महाभागे अभिसंधिबलान्नृणाम् ।
हितार्थं दुःखमन्येषां कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! ऐसा भी होता है कि शुभ संकल्पके बलसे मनुष्योंके हितके लिये उन्हें दुःख देकर भी पुरुष सुख प्राप्त कर सके ॥
दण्डयन् भर्त्सयन् राजा प्रजाः पुण्यमवाप्नुयात् ।
गुरुः संतर्जयन् शिष्यान् भर्ता भृत्यजनान् स्वकान् ॥
राजा प्रजाको अपराधके कारण दण्ड देता और फटकारता है तो भी वह पुण्यका ही भागी होता है। गुरु अपने शिष्योंको और स्वामी अपने सेवकोंको उनके सुधारके लिये यदि डाँटता-फटकारता है तो इससे सुखका ही भागी होता है ॥
उन्मार्गप्रतिपन्नांश्च शास्ता धर्मफलं लभेत् ॥
चिकित्सकश्च दुःखानि जनयन् हितमाप्नुयात् ।
जो कुमार्गपर चल रहे हों, उनका शासन करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है। चिकित्सक रोगीकी चिकित्सा करते समय उसे कष्ट ही देता है तथापि रोग मिटानेका प्रयत्न करनेके कारण वह हितका ही भागी होता है ॥
एवमन्ये सुमनसो हिंसकाः स्वर्गमाप्नुयुः ॥
एकस्मिन् निहते भद्रे बहवः सुखमाप्नुयुः ।
तस्मिन् हते भवेद् धर्मः कुत एव तु पातकम् ॥
इस प्रकार दूसरे लोग भी यदि शुद्ध हृदयसे किसीको कष्ट पहुँचाते हैं तो स्वर्गलोकमें जाते हैं। भद्रे! जहाँ किसी एक दुष्टके मारे जानेपर बहुत-से सत्पुरुषोंको सुख प्राप्त होता हो तो उसके मारनेपर पातक क्या लगेगा, उलटे धर्म होता है ॥

अभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात् । एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयुः क्वचित् ॥ यदि उद्देश्य कुटिलतापूर्ण न हो, अपितु धर्मके गौरवसे शुद्ध हो तो पापियोंके प्रति ऐसा व्यवहार करके भी कहीं दोषकी प्राप्ति नहीं होती ॥

उमोवाच

चतुर्विधानां जन्तूनां कथं ज्ञानमिह स्मृतम् । कृत्रिमं तत्स्वभावं वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ **उमाने पूछा—**इस जगत्में रहनेवाले चार प्रकारके प्राणियोंको कैसे ज्ञान प्राप्त होता है! वह कृत्रिम है या स्वाभाविक? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते । चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा ॥ **श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! यह जगत् स्थावर और जंगमके भेदसे दो प्रकारका पाया जाता है! इसमें प्रजाकी क्रमशः चार योनियाँ हैं—जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ॥

तेषामुद्भिदजा वृक्षा लतावल्ल्यश्च वीरुधः । दंशयूकादयश्चान्ये स्वेदजाः कृमिजातयः ॥ इनमेंसे वृक्ष, लता, वल्ली और तृण आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं। डाँस और जूँ आदि कीट जातिके प्राणी स्वेदज कहे गये हैं ॥

पक्षिणश्छिद्रकर्णाश्च प्राणिनस्त्वण्डजा मताः । मृगव्यालमनुष्यांश्च विद्धि तेषां जरायुजान् ॥ जिनके पंख होते हैं और कानके स्थानमें एक छिद्र मात्र होता है, ऐसे प्राणी अण्डज माने गये हैं। पशु, व्याल (हिंसक जन्तु बाघ, चीते आदि) और मनुष्य—इनको जरायुज समझो ॥

एवं चतुर्विधां जातिमात्मा संसृत्य तिष्ठति ॥ इस तरह आत्मा इन चार प्रकारकी जातियोंका आश्रय लेकर रहता है ॥

तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजाः प्रिये । शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजाः प्रिये ॥ प्रिये! पृथ्वी और जलके संयोगसे उद्भिज्ज प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है तथा स्वेदज जीव सर्दी और गर्मीके संयोगसे जीवन ग्रहण करते हैं ॥

अण्डजाश्चापि जायन्ते संयोगात् क्लेदबीजयोः । शुक्लशोणितसंयोगात् सम्भवन्ति जरायुजाः ॥

जरायुजानां सर्वेषां मानुषं पदमुत्तमम् ।। क्लेद और बीजके संयोगसे अण्डज प्राणियोंका जन्म होता है और जरायुज प्राणी रज-वीर्यके संयोगसे उत्पन्न होते हैं। समस्त जरायुजोंमें मनुष्यका स्थान सबसे ऊँचा है ।।

अतः परं तमोत्पत्तिं शृणु देवि समाहिता । द्विविधं हि तमो लोके शार्वरं देहजं तथा ।। देवि! अब एकाग्रचित्त होकर तमकी उत्पत्ति सुनो। लोकमें दो प्रकारका तम बताया गया है—रात्रिका और देहजनित ।।

ज्योतिर्भिश्श्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम् । देहजं तु तमो लोके तैः समस्तैर्न शाम्यति ।। लोकमें ज्योति या तेजके द्वारा रात्रिका अन्धकार नष्ट हो जाता है; परंतु जो देहजनित तम है, वह सम्पूर्ण ज्योतियोंके प्रकाशित होनेपर भी नहीं शान्त होता ।।

तमसस्तस्य नाशार्थं नोपायमधिजग्मिवान् । तपश्चचार विपुलं लोककर्ता पितामहः ।। लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीको जब उस तमका नाश करनेके लिये कोई उपाय नहीं सूझा, तब वे बड़ी भारी तपस्या करने लगे ।।

चरतस्तु समुद्भूता वेदाः साङ्गाः सहोत्तराः । ताँल्लब्ध्वा मुमुदे ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ।। देहजं तत् तमो घोरं वेदैरेव विनाशितम् ।। तपस्या करते समय उनके मुखसे छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेद प्रकट हुए। उन्हें पाकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकोंके हितकी कामनासे वेदोंके ज्ञानद्वारा ही उस देहजनित घोर तमका नाश किया ।।

कार्याकार्यमिदं चेति वाच्यावाच्यमिदं त्विति । यदि चेन्न भवेल्लोके श्रुतं चारित्रदैशिकम् ।। पशुभिर्निर्विशेषं तु चेष्टन्ते मानुषा अपि ।। यह वेदज्ञान कर्तव्य और अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाला है, वाच्य और अवाच्यका बोध करानेवाला है। यदि संसारमें सदाचारकी शिक्षा देनेवाली श्रुति न हो तो मनुष्य भी पशुओंके समान ही मनमानी चेष्टा करने लगें ।।

यज्ञादीनां समारम्भः श्रुतेनैव विधीयते । यज्ञस्य फलयोगेन देवलोकः समृद्ध्यते ।। वेदोंके द्वारा ही यज्ञ आदि कर्मोंका आरम्भ किया जाता है। यज्ञफलके संयोगसे देवलोककी समृद्धि बढ़ती है ।।

प्रीतियुक्ताः पुनर्देवा मानुषाणां भवन्त्युत । एवं नित्यं प्रवर्धेते रोदसी च परस्परम् ।।

इससे देवता मनुष्योंपर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्गलोक दोनों एक-दूसरेकी उन्नतिमें सदा सहयोगी होते हैं।।

लोकसंधारणं तस्माच्छ्रुतमित्यवधारय।
ज्ञानाद् विशिष्टं जन्तूनां नास्ति लोकत्रयेऽपि च।।
अतः तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि वेद ही धर्मकी प्रवृत्तिद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करनेवाला है। जीवोंके लिये इस त्रिलोकीमें ज्ञानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है।।

सम्प्रगृह्य श्रुतं सर्वं कृतकृत्यो भवत्युत।
उपर्युपरि मर्त्यानां देववत् सम्प्रकाशते।।
सम्पूर्ण वेदोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य हो जाता है और साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा ऊँची स्थितिमें पहुँचकर देवताके समान प्रकाशित होने लगता है।।

कामं क्रोधं भयं दर्पमज्ञानं चैव बुद्धिजम्।
तच्छ्रुतं नुदति क्षिप्रं यथा वायुर्बलाहकान्।।
जैसे हवा बादलोंको उड़ाकर छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वेदशास्त्रजनित ज्ञान काम, क्रोध, भय, दर्प और बौद्धिक अज्ञानको भी शीघ्र ही दूर कर देता है।।

अल्पमात्रं कृतो धर्मो भवेज्ज्ञानवता महान्।
महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानान्निष्फलो भवेत्।।
ज्ञानवान् पुरुषके द्वारा किया हुआ थोड़ा-सा धर्म भी महान् बन जाता है और अज्ञानपूर्वक किया हुआ महान् धर्म भी निष्फल हो जाता है।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिज्जातिस्मरणसंयुताः।
किमर्थमभिजायन्ते जानन्तः पौर्वदैहिकम्।।
उमाने पूछा— भगवन्! कुछ मनुष्योंको पूर्वजन्म-की बातोंका स्मरण होता है। वे किसलिये पूर्व शरीरके वृत्तान्तको जानते हुए जन्म लेते हैं?।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता।।
ये मृताः सहसा मर्त्या जायन्ते सहसा पुनः।
तेषां पौराणिकोऽभ्यासः कंचिद् कालं हि तिष्ठति।।
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक बना रहता है।।

तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः।

तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ।।
परलोकस्य चास्तित्वे मूढानां कारणं त्विदम् ।।
इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर (पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाले) कहलाते हैं। फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है। ऐसी घटनाएँ मूर्ख मनुष्योंको परलोककी सत्तापर विश्वास करानेमें कारण बनती हैं ।।

उमोवाच

भगवन् मानुषाः केचिन्मृता भूत्वापि सम्प्रति ।
निवर्तमाना दृश्यन्ते देहेष्वेव पुनर्नराः ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! कई मनुष्य मरनेके बाद भी फिर उसी शरीरमें लौटते देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? ।।

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि कारणं शृणु शोभने ।।
प्राणैर्वियुज्यमानानां बहुत्वात् प्राणिनां क्षये ।
तथैव नामसामान्याद् यमदूता नृणां प्रति ।।
वहन्ति ते क्वचिन्मोहादन्यं मर्त्यं तु धार्मिकाः ।
निर्विकारं हि तत् सर्वं यमो वेद कृताकृतम् ।।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**शोभने! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो। प्राणी बहुत हैं और मृत्युकाल आनेपर सभीका अपने प्राणोंसे वियोग हो जाता है। धार्मिक यमदूत कभी-कभी कई मनुष्योंके एक ही नाम होनेके कारण मोहवश एकके बदले दूसरेको पकड़ ले जाते हैं, परंतु यमराज निर्विकार भावसे दूतोंके द्वारा किये गये और नहीं किये गये, सभी कार्योंको जानते हैं ।।

तस्मात् संयमनीं प्राप्य यमेनैकेन मोक्षिताः ।
पुनरेवं निवर्तन्ते शेषं भोक्तुं स्वकर्मणः ।।
स्वकर्मण्यसमाप्ते तु निवर्तन्ते हि मानवाः ।।
अतः संयमनीपुरीमें जानेपर भूलसे गये हुए मनुष्यको एकमात्र यमराज फिर छोड़ देते हैं; अतः वे अपने प्रारब्ध कर्मका शेष भाग भोगनेके लिये पुनः लौट आते हैं। वे ही मनुष्य लौटते हैं, जिनका कर्म-भोग समाप्त नहीं हुआ होता है ।।

उमोवाच

भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि ।।

**उमाने पूछा—**भगवन्! सोनेमात्रसे प्राणियोंको स्वप्नका दर्शन होने लगता है। यह उनका स्वभाव है, या और कोई बात है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीमहेश्वर उवाच

सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते ।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मनः ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! सोये हुए प्राणियोंके मनकी जो चेष्टा है, उसीको स्वप्न कहते हैं। स्वप्नमें विचरता हुआ मन भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखता है॥
निमित्तं च भवेत् तस्मात् प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
अतः उन घटनाओंके देखनेमें प्राणियोंके लिये स्वप्नदर्शन निमित्त बनता है। देवि! तुम्हें स्वप्नका विषय बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो?॥

उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश लोके कर्मक्रियापथे ।
दैवात् प्रवर्तते सर्वमिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! सर्वभूतेश्वर! जगत्में दैवकी प्रेरणासे ही सबकी कर्ममार्गमें प्रवृत्ति होती है। ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है॥
अपरे चेष्टया चेति दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः क्रियाम् ।
पक्षभेदे द्विधा चास्मिन् संशयस्थं मनो मम ॥
तत्त्वं वद महादेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
दूसरे लोग क्रियाको प्रत्यक्ष देखकर ऐसा मानते हैं कि चेष्टासे ही सबकी प्रवृत्ति होती है, दैवसे नहीं। ये दो पक्ष हैं। इनमें मेरा मन संशयमें पड़ जाता है; अतः महादेव! यथार्थ बात बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है॥

श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो॥
लक्ष्यते द्विविधं कर्म मानुषेष्वेव तच्छृणु ।
पुराकृतं तयोरेकमैहिकं त्वितरत् तथा ॥
मनुष्योंमें दो प्रकारका कर्म देखा जाता है, उसे सुनो। इनमें एक तो पूर्वकृत कर्म है और दूसरा इहलोकमें किया गया है॥
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि दैवमानुषनिर्मितम् ।
कृषौ तु दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा ॥