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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका

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चतुरशीतितमोऽध्यायः

भीष्मजीका अपने पिता शान्तनुके हाथमें पिण्ड न देकर कुशपर देना, सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानकी महिमाके सम्बन्धमें वसिष्ठ और परशुरामका संवाद, पार्वतीका देवताओंको शाप, तारकासुरसे डरे हुए देवताओंका ब्रह्माजीकी शरणमें जाना

युधिष्ठिर उवाच

उक्तं पितामहेनेदं गवां दानमनुत्तमम् ।
विशेषेण नरेन्द्राणामिह धर्ममवेक्षताम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! आपने सब मनुष्योंके लिये, विशेषतः धर्मपर दृष्टि रखनेवाले नरेशोंके लिये परम उत्तम गोदानका वर्णन किया है ॥ १ ॥

राज्यं हि सततं दुःखं दुर्धरं चाकृतात्मभिः ।
भूयिष्ठं च नरेन्द्राणां विद्यते न शुभा गतिः ॥ २ ॥
राज्य सदा ही दुःखरूप है। जिन्होंने अपना मन वशमें नहीं किया है, उनके लिये राज्यको सुरक्षित रखना बहुत ही कठिन है। इसलिये प्रायः राजाओंको शुभ गति नहीं प्राप्त होती है ॥ २ ॥

पूयन्ते तत्र नियतं प्रयच्छन्तो वसुन्धराम् ।
सर्वे च कथिता धर्मास्त्वया मे कुरुनन्दन ॥ ३ ॥
उनमें वे ही पवित्र होते हैं जो नियमपूर्वक पृथ्वीका दान करते हैं। कुरुनन्दन! आपने मुझसे समस्त धर्मोंका वर्णन किया है ॥ ३ ॥

एवमेव गवामुक्तं प्रदानं ते नृगेण ह ।
ऋषिणा नाचिकेतैन पूर्वमेव निदर्शितम् ॥ ४ ॥
इसी तरह राजा नृगने जो गोदान किया था तथा नाचिकेत ऋषिने जो गौओंका दान और पूजन किया था, वह सब आपने पहले ही कहा और निर्देश किया है ॥ ४ ॥

वेदोपनिषदश्चैव सर्वकर्मसु दक्षिणाः ।
सर्वक्रतुषु चोद्दिष्टं भूमिर्गावोऽथ काञ्चनम् ॥ ५ ॥
वेद और उपनिषदोंने भी प्रत्येक कर्ममें दक्षिणाका विधान किया है। सभी यज्ञोंमें भूमि, गौ और सुवर्णकी दक्षिणा बतायी गयी है ॥ ५ ॥

तत्र श्रुतिस्तु परमा सुवर्णं दक्षिणेति वै ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पितामह यथातथम् ॥ ६ ॥

इनमें सुवर्ण सबसे उत्तम दक्षिणा है—ऐसा श्रुतिका वचन है, अतः पितामह! मैं इस विषयको यथार्थ रूपसे सुनना चाहता हूँ ।। ६ ।। किं सुवर्णं कथं जातं कस्मिन् काले किमात्मकम् । किं दैवं किं फलं चैव कस्माच्च परमुच्यते ।। ७ ।। सुवर्ण क्या है? कब और किस तरहसे इसकी उत्पत्ति हुई? सुवर्णका उपादान क्या है? इसका देवता कौन है? इसके दानका फल क्या है? सुवर्ण क्यों उत्तम कहलाता है? ।। ७ ।। कस्माद् दानं सुवर्णस्य पूजयन्ति मनीषिणः । कस्माच्च दक्षिणार्थं तद् यज्ञकर्मसु शस्यते ।। ८ ।। मनीषी विद्वान् सुवर्णदानका अधिक आदर क्यों करते हैं? तथा यज्ञ-कर्मोंमें दक्षिणाके लिये सुवर्णकी प्रशंसा क्यों की जाती है? ।। ८ ।। कस्माच्च पावनं श्रेष्ठं भूमेर्गोभ्यश्च काञ्चनम् । परमं दक्षिणार्थे च तद् ब्रवीहि पितामह ।। ९ ।। पितामह! क्यों सुवर्ण पृथ्वी और गौओंसे भी पावन और श्रेष्ठ है? दक्षिणाके लिये सबसे उत्तम वह क्यों माना गया है? यह मुझे बताइये ।। ९ ।।

भीष्म उवाच

शृणु राजन्नवहितो बहुकारणविस्तरम् । जातरूपसमुत्पत्तिमनुभूतं च यन्मया ।। १० ।। **भीष्मजीने कहा—**राजन्! ध्यान देकर सुनो! सुवर्णकी उत्पत्तिका कारण बहुत विस्तृत है। इस विषयमें मैंने जो अनुभव किया है, उसके अनुसार तुम्हें सब बातें बता रहा हूँ ।। १० ।। पिता मम महातेजाः शान्तनुर्निधनं गतः । तस्य दित्सुरहं श्राद्धं गंगाद्वारमुपागमम् ।। ११ ।। मेरे महातेजस्वी पिता महाराज शान्तनुका जब देहावसान हो गया तब मैं उनका श्राद्ध करनेके लिये गंगाद्वार तीर्थ (हरद्वार)-में गया ।। ११ ।। तत्रागम्य पितुः पुत्र श्राद्धकर्म समारभम् । माता मे जाह्नवी चात्र साहाय्यमकरोत् तदा ।। १२ ।। बेटा! वहाँ पहुँचकर मैंने पिताका श्राद्धकर्म आरम्भ किया। इस कार्यमें वहाँ उस समय मेरी माता गंगाने भी बड़ी सहायता की ।। १२ ।। ततोऽग्रतस्ततः सिद्धानुपवेश्य बहून्ऋषीन् । तोयप्रदानात् प्रभृति कार्याण्यहमथारभम् ।। १३ ।। तदनन्तर अपने सामने बहुत-से सिद्ध-महर्षियोंको बिठाकर मैंने जलदान आदि सारे कार्य आरम्भ किये ।। १३ ।।

तत् समाप्य यथोद्दिष्टं पूर्वकर्म समाहितः ।
दातुं निर्वपणं सम्यग् यथावदहमारभम् ॥ १४ ॥
एकाग्रचित्त होकर शास्त्रोक्तविधिसे पिण्डदानके पहलेके सब कार्य समाप्त करके मैंने विधिवत् पिण्डदान देना आरम्भ किया ॥ १४ ॥

ततस्तं दर्भविन्यासं भित्त्वा सुरुचिरांगदः ।
प्रलम्बाभरणो बाहुरुदतिष्ठद् विशाम्पते ॥ १५ ॥
प्रजानाथ! इसी समय पिण्डदानके लिये जो कुश बिछाये गये थे, उन्हें भेदकर एक बड़ी सुन्दर बाँह बाहर निकली। उस विशाल भुजामें बाजूबंद आदि अनेक आभूषण शोभा पा रहे थे ॥ १५ ॥

तमुत्थितमहं दृष्ट्वा परं विस्मयमागमम् ।
प्रतिग्रहीता साक्षान्मे पितेति भरतर्षभ ॥ १६ ॥
ततो मे पुनरेवासीत् संज्ञा संचिन्त्य शास्त्रतः ।
नायं वेदेषु विहितो विधिर्हस्त इति प्रभो ॥ १७ ॥
पिण्डो देयो नरेणेह ततो मतिरभून्मम ।
साक्षान्नेह मनुष्यस्य पिण्डं हि पितरः क्वचित् ॥ १८ ॥

गृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देयः कुशेष्विति । उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! साक्षात् मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे। प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया, तब मेरे मनमें सहसा यह बात स्मरण हो आयी कि मनुष्यके लिये हाथपर पिण्ड देनेका वेदमें विधान नहीं है। पितर साक्षात् प्रकट होकर कभी मनुष्यके हाथसे पिण्ड लेते भी नहीं हैं। शास्त्रकी आज्ञा तो यही है कि कुशोंपर पिण्डदान करें ।। १६—१८ १/२ ।।

ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् ।। १९ ।।
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् ।
ततो दर्भेषु तत् सर्वमददं भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! यह सोचकर मैंने पिताके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले हाथका आदर नहीं किया। शास्त्रको ही प्रमाण मानकर उसकी पिण्डदानसम्बन्धी सूक्ष्म विधिका ध्यान रखते हुए कुशोंपर ही सब पिण्डोंका दान किया ।। १९-२० ।।

शास्त्रमार्गानुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
ततः सोऽन्तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप ।। २१ ।।
नरश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैंने शास्त्रीय मार्गका अनुसरण करके ही सब कुछ किया। नरेश्वर! तदनन्तर मेरे पिताकी वह बाँह अदृश्य हो गयी ।। २१ ।।

ततो मां दर्शयामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तथा ।
प्रीयमाणास्तु मामूचुः प्रीताः स्म भरतर्षभ ।। २२ ।।
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः ।
तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ ।। २२ १/२ ।।

त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव ।। २३ ।।
आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ।
साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः ।। २४ ।।
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः ।
'पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी—इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है ।। २३-२४ १/२ ।।

तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ ।। २५ ।।
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति ।
'भरतश्रेष्ठ! यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो ।। २५ १/२ ।।

एवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहाः ॥ २६ ॥ पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत् । 'धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है ।। २६ १/२ ।। दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते ।। २७ ।। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन् । ततोऽहं विस्मितो राजन् प्रतिबुद्धो विशाम्पते ।। २८ ।। सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ । 'जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।' राजन्! जब मेरे पितरोंने ऐसा कहा तो मेरी नींद खुल गयी। उस समय स्वप्नका स्मरण करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने सुवर्णदान करनेका निश्चित विचार कर लिया ।। २७-२८ १/२ ।। इतिहासमिमं चापि शृणु राजन् पुरातनम् ।। २९ ।। जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च । राजन्! अब (सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है। विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है ।। २९ १/२ ।। जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै ॥ ३० ॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ।। ३० १/२ ।। ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः ।। ३१ ।। आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम् । वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम् ।। ३२ ।। महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर वीर कमलनयन परशुरामजीने ब्राह्मणों और क्षत्रियोंद्वारा सम्मानित तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ३१-३२ ।। पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् । विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च ।। ३३ ।। नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽध्यगच्छत ।

यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके। इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया ।। ३३ ½ ।।

स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता ।। ३४ ।।
पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन् देवांश्च भार्गवः ।
पावनं यत् परं नृणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् ।। ३५ ।।
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽब्रवीत् ।
इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षयः ।। ३६ ।।
प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न उस श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण करके महामना भृगुवंशी परशुरामजीने मनमें दयाभाव लेकर शास्त्रज्ञ ऋषियों और देवताओंसे इस प्रकार पूछा—‘महाभाग महात्माओ! उग्र कर्ममें लगे हुए मनुष्योंके लिये जो परम पावन वस्तु हो, वह मुझे बताइये।’ उनके इस प्रकार पूछनेपर उन वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता महर्षियोंने इस प्रकार कहा— ।। ३४—३६ ।।

राम विप्राः सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् ।
भूयश्च विप्रर्षिगणाः प्रष्टव्याः पावनं प्रति ।। ३७ ।।
‘परशुराम! तुम वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए ब्राह्मणोंका सत्कार करो और ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे पुनः इस पावन वस्तुके लिये प्रश्न करो ।। ३७ ।।

ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर ।
ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम् ।। ३८ ।।
तमेवार्थं महातेजाः पप्रच्छ भृगुनन्दनः ।
जाता मतिर्मे विप्रेन्द्राः कथं पूयेयमित्युत ।। ३९ ।।
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा ।
‘और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें, उसीका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो।’ तब महातेजस्वी भृगुनन्दन परशुरामजीने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यपजीके पास जाकर पूछा—‘विप्रवरो! मैं पवित्र होना चाहता हूँ। बताइये, कैसे किस कर्मके अनुष्ठानसे अथवा किस दानसे पवित्र हो सकता हूँ? ।। ३८-३९ ½ ।।

यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमाः ।
प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधनाः ॥ ४० ॥
‘साधुशिरोमणे! तपोधनो! यदि आपलोग मुझपर अनुग्रह करना चाहते हों तो बतायें, मुझे पवित्र करनेवाला साधन क्या है?’ ॥ ४० ॥

ऋषय ऊचुः
गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन ।
पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम ॥ ४१ ॥
ऋषियोंने कहा— भृगुनन्दन! हमने सुना है कि पाप करनेवाला मनुष्य यहाँ गाय, भूमि और धनका दान करके पवित्र हो जाता है ॥ ४१ ॥
अन्यद् दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् ।
दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदसः ॥ ४२ ॥
ब्रह्मर्षे! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो। वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है। उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ॥
दग्ध्वा लोकान् पुरा वीर्यात् सम्भूतमिह शुश्रुम ।
सुवर्णमिति विख्यातं तद् ददत् सिद्धिमेष्यसि ॥ ४३ ॥

उस वस्तुका नाम है सुवर्ण। हमने सुना है कि पूर्वकालमें अग्निने सम्पूर्ण लोकोंको भस्म करके अपने वीर्यसे सुवर्णको प्रकट किया था। उसीका दान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी॥ ४३॥

ततोऽब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान् संशितव्रतः। शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम्॥ ४४॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान् वसिष्ठने कहा—'परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो॥

फलं दास्यति ते यत् तु दाने परमिहोच्यते। सुवर्णं यच्च यस्माच्च यथा च गुणवत्तमम्॥ ४५॥
तन्निबोध महाबाहो सर्वं निगदतो मम।
'सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है। महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जिस प्रकार वह विशेष गुणकारी है, वह सब बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥ ४५ १/२॥

अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये॥ ४६॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्व इति दर्शनम्।
'यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो। बकरा, अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये॥

कुञ्जराश्च मृगा नागा महिषाश्चासुरा इति॥ ४७॥
कुक्कुटाश्च वराहाश्च राक्षसा भृगुनन्दन।
इडा गावः पयः सोमो भूमिरित्येव च स्मृतिः॥ ४८॥
'भृगुनन्दन! हाथी और मृग नागोंके अंश हैं। भैंसे असुरोंके अंश हैं। मुर्गा और सूअर राक्षसोंके अंश हैं इडा—गौ, दुग्ध और सोम—ये सब भूमिरूप ही हैं। ऐसी स्मृति है॥ ४७-४८॥

जगत् सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशिः समुत्थितः।
सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम्॥ ४९॥
'सारे जगत्‌का मन्थन करके जो तेजकी राशि प्रकट हुई है, वही सुवर्ण है। अतः ब्रह्मर्षे! यह अज आदि सभी वस्तुओंसे परम उत्तम रत्न है॥ ४९॥

एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसाः।
मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत्॥ ५०॥
'इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं॥

मुकुटैरङ्गदयुतैरलंकारैः पृथग्विधैः।
सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम॥ ५१॥

'भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं।। तस्मात् सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम्। भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ।। ५२ ।। ‘अतः नरश्रेष्ठ! जगत्में भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो।। ५२ ।। पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन। विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो।। ५३ ।। ‘विभो! पृथिवी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है।। अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते। प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम्।। ५४ ।। ‘देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो।। ५४ ।। सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत।। ५५ ।। सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं।। देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ। अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम्।। ५६ ।। ‘जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है।। ५६ ।। तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः। भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः।। ५७ ।। ‘पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया—ऐसा माना जाता है। अतः विद्वान् पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं।। ५७ ।। भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे। गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर।। ५८ ।। ‘सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो।। ५८ ।। मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन। प्रजापतेः कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै।। ५९ ।।

'भृगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ।। ५९ ।। शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ।। ६० ।। देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ।। ६१ ।। 'भृगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान् रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान् शिवको उमादेवीके साथ समागम-सुख प्राप्त था ।। ६०-६१ ।। ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ।। ६२ ।। 'उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ।। ६२ ।। प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह । अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ।। ६३ ।। तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । भृगुश्रेष्ठ! वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा—'पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्वतीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है ।। ६३ १/२ ।। अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ।। ६४ ।। अपत्यं युवयोर्देव बलवद् भविता विभो । तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ।। ६५ ।। 'देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।। तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन । वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ।। ६६ ।। 'विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ।। ६६ ।। अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो । त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं संतापयिष्यथः ।। ६७ ।।

‘प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये। आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं। अतः अपनी संतानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को संतप्त कर डालेंगे ॥ ६७ ॥

तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद् ध्रुवम् ।
न हि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो ॥ ६८ ॥
नेदं धारयितुं शक्ताः समस्ता इति मे मतिः ।
तेजःप्रभावनिर्दग्धं तस्मात् सर्वमिदं जगत् ॥ ६९ ॥
‘आप दोनोंसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही देवताओंको पराजित कर देगा। प्रभो! हमारा तो ऐसा विश्वास है कि न तो पृथिवीदेवी, न आकाश और न स्वर्ग ही आपके तेजको धारण कर सकेगा। ये सब मिलकर भी आपके इस तेजको धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सारा जगत् आपके तेजके प्रभावसे भस्म हो जायगा ॥ ६८-६९ ॥

तस्मात् प्रसादं भगवन् कर्तुमर्हसि नः प्रभो ।
न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवतः सुरसत्तम ।
धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ॥ ७० ॥
‘अतः भगवन्! हमपर कृपा कीजिये। प्रभो! सुरश्रेष्ठ! हम यही चाहते हैं कि देवी पार्वतीके गर्भसे आपके कोई पुत्र न हो। आप धैर्यसे ही अपने प्रज्वलित उत्तम तेजको भीतर ही रोक लीजिये’ ॥ ७० ॥

इति तेषां कथयतां भगवान् वृषभध्वजः ।
एवमस्त्विति देवांस्तान् विप्रर्षे प्रत्यभाषत ॥ ७१ ॥
‘विप्रर्षे! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् वृषभध्वजने उनसे ‘एवमस्तु’ कह दिया ॥ ७१ ॥

इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहनः ।
ऊर्ध्वरेताः समभवत् ततः प्रभृति चापि सः ॥ ७२ ॥
‘देवताओंसे ऐसा कहकर वृषभवाहन भगवान् शंकरने अपने ‘रेतस्’ अर्थात् वीर्यको ऊपर चढ़ा लिया। तभीसे वे ‘ऊर्ध्वरेता’ नामसे विख्यात हुए ॥ ७२ ॥

रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते ।
देवानथाब्रवीत् तत्र स्त्रीभावात् परुषं वचः ॥ ७३ ॥
‘देवताओंने मेरी भावी संतानका उच्छेद कर डाला’ यह सोचकर उस समय देवी रुद्राणी बहुत कुपित हुईं और स्त्री-स्वभाव होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे यह कठोर वचन कहा— ॥ ७३ ॥

यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः ।
तस्मात् सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ ॥ ७४ ॥

‘देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वंश हो जाओगे ।। प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद् युष्माभिरद्य वै । तस्मात् प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥ ७५ ॥ ‘आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अतः तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी' ।। ७५ ।। पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह । देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥ ७६ ॥ भृगुश्रेष्ठ! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ।। ७६ ।। रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि ॥ ७७ ॥ रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज (वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित् स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ७७ ।। उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम् ॥ ७८ ॥ वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा। तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा ।। ७८ ।। एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः । असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम् ॥ ७९ ॥ इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ।। ७९ ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि । साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥ ८० ॥ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा साध्य—सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे ।। ८० ।। स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥ ८१ ॥ असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे ।। ८१ ।। ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्च ये । प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥ ८२ ॥

वे सब देवता और ऋषि दीनचित्त हो अजर-अमर एवं सर्वव्यापी देवता भगवान् ब्रह्माकी शरणमें गये ।। ८२ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ।। ८४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८४ ।।

ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध

देवा ऊचुः असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो । सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम् ॥ १ ॥ देवता बोले— प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ॥ १ ॥

तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह । परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ॥ २ ॥ पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है। आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २ ॥

ब्रह्मोवाच समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये । हन्यतां तारकः क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अतः देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो ॥ ३ ॥

वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः ॥ ४ ॥ सुरश्रेष्ठगण! वेदों और धर्मोंका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४ ॥

देवा ऊचुः वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वितः ।

देवैर्न शक्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत् ॥ ५ ॥
**देवता बोले—**भगवन्! आपके ही वरदानसे वह दैत्य बलके घमंडसे भर गया है। देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसी दशामें वह कैसे शान्त हो सकता है? ॥ ५ ॥
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम् ।
वध्यः स्यामिति जग्राह वरं त्वत्तः पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ ॥ ६ ॥
देवाश्च शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुराकृते ।
न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वे जगत्पते ॥ ७ ॥
जगत्पते! पूर्वकालमें जब हमने रुद्राणीकी संततिका उच्छेद कर दिया, तब उन्होंने सब देवताओंको शाप दे दिया कि तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी ॥ ७ ॥

ब्रह्मोवाच
हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः ।
स उत्पादयितापत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम् ॥ ८ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**सुरश्रेष्ठगण! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे। अतः देवद्रोहियोंके वधके लिये वे ही संतान उत्पन्न करेंगे ॥ ८ ॥
तद् वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् ।
मानुषानथ गन्धर्वान् नागानथ च पक्षिणः ॥ ९ ॥
अस्त्रेणामोधपातेन शक्त्या तं घातयिष्यति ।
यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः ॥ १० ॥
वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँघकर अपने अचूक अस्त्र-शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है। दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा ॥ ९-१० ॥
सनातनो हि संकल्पः काम इत्यभिधीयते ।
रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च यत् ॥ ११ ॥
तत्तेजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिति पावकम् ।
वधार्थं देवशत्रूणां गंगायां जनयिष्यति ॥ १२ ॥
सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं। उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है। द्वितीय अग्निके समान उस महान् तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे। वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा ॥ ११-१२ ॥
स तु नावाप तं शापं नष्टः स हुतभुक् तदा ।

तस्माद् वो भयहृद् देवाः समुत्पत्स्यति पावकिः ॥ १३ ॥
अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ॥
अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम् ।
तारकस्य वधोपायः कथितो वै मयानघाः ॥ १४ ॥
तुमलोग अग्निदेवकी खोज करो और उन्हें आज ही इस कार्यमें नियुक्त करो। निष्पाप देवताओ! तारकासुरके वधका यह उपाय मैंने बता दिया ॥ १४ ॥
न हि तेजस्विनां शापास्तेजःसु प्रभवन्ति वै ।
बलान्यतिबलं प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै ॥ १५ ॥
तेजस्वी पुरुषोंके शाप तेजस्वियोंपर अपना प्रभाव नहीं दिखाते। साधारण बली कितने ही क्यों न हों, अत्यन्त बलशालीको पाकर दुर्बल हो जाते हैं ॥ १५ ॥
हन्यादवध्यान् वरदानपि चैव तपस्विनः ।
संकल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽभवत् ॥ १६ ॥
तपस्वी पुरुषका जो काम है, वही संकल्प एवं अभिरुचिके नामसे प्रसिद्ध है। वह सनातन या चिरस्थायी होता है। वह वर देनेवाले अवध्य पुरुषोंका भी वध कर सकता है ॥ १६ ॥
जगत्पतिरनिर्देश्यः सर्वगः सर्वभावनः ।
हृच्छयः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः ॥ १७ ॥
अग्निदेव इस जगत्के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ॥
अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः ।
स वो मनोगतं कामं देवः सम्पादयिष्यति ॥ १८ ॥
तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो। वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ॥
एतद् वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः ।
जग्मुः संसिद्धसंकल्पाः पर्यैषन्तो विभावसुम् ॥ १९ ॥
महात्मा ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सफलमनोरथ हुए देवता अग्निदेवका अन्वेषण करनेके लिये वहाँसे चले गये ॥ १९ ॥
ततस्त्रैलोक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरैः सह ।
कांक्षन्तो दर्शनं बह्नेः सर्वे तद्गतमानसाः ॥ २० ॥
तब देवताओंसहित ऋषियोंने तीनों लोकोंमें अग्निकी खोज प्रारम्भ की। उन सबका मन उन्हींमें लगा था और वे—सभी अग्निदेवका दर्शन करना चाहते थे ॥ २० ॥
परेण तपसा युक्ताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ।

लोकानन्वचरन् सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम ॥ २१ ॥
भृगुश्रेष्ठ! उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे ॥ २१ ॥

नष्टात्मनि संलीनं नाधिजग्मुर्हुताशनम् ।
ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान् ॥ २२ ॥
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाग्नेः प्रदीपितः ।
उवाच देवान् मण्डूको रसातलतलोत्थितः ॥ २३ ॥
वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला— ॥ २२-२३ ॥

रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो ।
संतापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ॥ २४ ॥
'देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥

स संसुप्तो जले देवा भगवान् हव्यवाहनः ।
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम् ॥ २५ ॥
'देवगण! भगवान् अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं। हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं ॥ २५ ॥

तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः ।
तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ॥ २६ ॥
'देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये ॥ २६ ॥

गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात् सुराः ।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ॥ २७ ॥
'देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।' इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया ॥ २७ ॥

हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् ।
शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै ॥ २८ ॥
अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि 'तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा' ॥ २८ ॥

तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत् ॥ २९ ॥

मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया ।। २९ ।।

देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम । यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः ।। ३० ।।

भृगुश्रेष्ठ! महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो ।। ३० ।।

देवा ऊचुः

अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानबहिष्कृताः । सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ ।। ३१ ।।

देवता बोले—मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्वा नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे ।। ३१ ।।

बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः । गतासूनपि संशुष्कान् भूमिः संधारयिष्यति ।। ३२ ।। तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ ।

बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी—वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुनः जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे ।। ३२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम् ।। ३३ ।। परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन् हुताशनम् ।

मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके ।। ३३ १/२ ।।

अथ तान् द्विरदः कश्चित् सुरेन्द्रद्विरदोपमः ।। ३४ ।। अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान् भृगूद्वह ।

भृगुश्रेष्ठ! तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला—‘अश्वत्थ अग्निरूप है’ ।। ३४ १/२ ।।

शशाप ज्वलनः सर्वान् द्विरदान् क्रोधमूर्च्छितः ।। ३५ ।। प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह ।

भृगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्वल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा—‘तुमलोगोंकी जिह्वा उलटी हो जायगी’ ।। ३५ १/२ ।।

इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः । प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया ।। ३६ ।।

ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये। वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे ।। ३६ ।। अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो। देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः ।। ३७ ।। प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ! तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो ।। ३७ ।।

देवा ऊचुः प्रतीपया जिह्वयापि सर्वाहारीं करिष्यथ। वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यज्जिताक्षराम् ।। ३८ ।। **देवता बोले—**हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी ।। ३८ ।।

इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः। अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत् ।। ३९ ।। ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे ।। ३९ ।।

शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् । शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि ।। ४० ।। विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया—'तू वाणीसे रहित हो जायगा' ।।

जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक् तथा। दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः ।। ४१ ।। भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति। आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति ।। ४२ ।। अग्निदेवने उसकी भी जिह्वा उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा—'तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा—कुछ-कुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।।

बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम्। 'जैसे बड़े-बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अद्भुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी' ।। ४२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः ।। ४३ ।। तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि।

ततः प्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते ॥ ४४ ॥
ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया। तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे ॥ ४३-४४ ॥
उत्पादने तथोपायमभिजग्मुश्च मानवाः ।
आपो रसातले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना ॥ ४५ ॥
ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव ।
पावकेनाधिशयता संतप्तास्तस्य तेजसा ॥ ४६ ॥
भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन्थन ही उपाय जाना। अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है ॥ ४५-४६ ॥
अथाग्निर्देवता दृष्ट्वा बभूव व्यथितस्तदा ।
किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः ॥ ४७ ॥
उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे—'किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है?' ॥ ४७ ॥
तमूचुर्विबुधाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ।
त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ४८ ॥
कृते च तस्मिन् भविता तवापि सुमहान् गुणः ॥ ४९ ॥
तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले—'हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे। उसे तुम्हें करना चाहिये। उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा' ॥ ४८-४९ ॥

अग्निरुवाच
ब्रूत यद् भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुराः ।
भवतां तु नियोज्योऽस्मि मा वोऽत्रास्तु विचारणा ॥ ५० ॥
**अग्निने कहा—**देवताओ! आपलोगोंका जो कार्य है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, अतः उसे कहिये। मैं आपलोगोंका आज्ञापालक हूँ। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ५० ॥

देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अस्मान् प्रबाधते वीर्याद् वधस्तस्य विधीयताम् ॥ ५१ ॥