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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख

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द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

भिन्न-भिन्न कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंकी प्राप्ति बतानेके लिये धृतराष्ट्ररूपधारी इन्द्र और गौतम ब्राह्मणके संवादका उल्लेख

युधिष्ठिर उवाच

एके लोकाः सुकृतिनः सर्वे त्वाहो पितामह ।
तत्र तत्रापि भिन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! (मृत्युके पश्चात्) सभी पुण्यात्मा एक ही तरहके लोकमें जाते हैं या वहाँ उन्हें प्राप्त होनेवाले लोकोंमें भिन्नता होती है? दादाजी! यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

कर्मभिः पार्थ नानात्वं लोकानां यान्ति मानवाः ।
पुण्यान् पुण्यकृतो यान्ति पापान् पापकृतो नराः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**कुन्तीनन्दन! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें जाते हैं। पुण्यकर्म करनेवाले पुण्यलोकोंमें जाते हैं और पापाचारी मनुष्य पापमय लोकोंमें ॥ २ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य मुनेस्तात संवादं वासवस्य च ॥ ३ ॥
तात! इस विषयमें विज्ञ पुरुष इन्द्र और गौतम मुनिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥

ब्राह्मणो गौतमः कश्चिन्मृदुर्दान्तो जितेन्द्रियः ।
महावने हस्तिशिशुं परिद्यूनममातृकम् ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा जीवयामास सानुक्रोशो धृतव्रतः ।
स तु दीर्घेण कालेन बभूवातिबलो महान् ॥ ५ ॥
पूर्वकालमें गौतम नामवाले एक ब्राह्मण थे, जिनका स्वभाव बड़ा कोमल था। वे मनको वशमें रखनेवाले और जितेन्द्रिय थे। उन व्रतधारी मुनिने विशाल वनमें एक हाथीके बच्चेको अपने माताके बिना बड़ा कष्ट पाते देखकर उसे कृपापूर्वक जिलाया। दीर्घकालके पश्चात् वह हाथी बढ़कर अत्यंत बलवान् हो गया ॥

तं प्रभिन्नं महानागं प्रस्रुतं पर्वतोपमम् ।
धृतराष्ट्रस्य रूपेण शक्रो जग्राह हस्तिनम् ॥ ६ ॥

उस महानागके कुम्भस्थलसे फूटकर मदकी धारा बहने लगी। मानो पर्वतसे झरना झर रहा हो। एक दिन इन्द्रने राजा धृतराष्ट्रके रूपमें आकर उस हाथीको अपने अधिकारमें कर लिया ।। ६ ।।

ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा गौतमः संशितव्रतः । अभ्यभाषत राजानं धृतराष्ट्रं महातपाः ।। ७ ।।

कठोर व्रतका पालन करनेवाले महातपस्वी गौतमने उस हाथीका अपहरण होता देख राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ।।

मा मेऽहार्षीर्हस्तिनं पुत्रमेनं दुःखात् पुष्टं धृतराष्ट्राकृतज्ञ । मैत्रं सतां सप्तपदं वदन्ति मित्रद्रोहो मैव राजन् स्पृशेत् त्वाम् ।। ८ ।।

'कृतज्ञताशून्य राजा धृतराष्ट्र! तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ। यह मेरा पुत्र है। मैंने बड़े दुःखसे इसका पालन-पोषण किया है। सत्पुरुषोंमें सात पग साथ चलनेमात्रसे मित्रता हो जाती है। इस नाते हम और तुम दोनों मित्र हैं। मेरे इस हाथीको ले जानेसे तुम्हें मित्रद्रोहका पाप लगेगा। तुम्हें यह पाप न लगे, ऐसी चेष्टा करो ।। ८ ।।

इध्मोदकप्रदातारं शून्यपालं ममाश्रमे । विनीतमाचार्यकुले सुयुक्तं गुरुकर्मणि ।। ९ ।। शिष्टं दान्तं कृतज्ञं च प्रियं च सततं मम । न मे विक्रोशतो राजन् हर्तुमर्हसि कुञ्जरम् ।। १० ।।

'राजन्! यह मुझे समिधा और जल लाकर देता है। मेरे आश्रममें जब कोई नहीं रहता है, तब यही रक्षा करता है। आचार्यकुलमें रहकर इसने विनयकी शिक्षा ग्रहण की है। गुरुसेवाके कार्यमें यह पूर्णरूपसे संलग्न रहता है। यह शिष्ट, जितेन्द्रिय, कृतज्ञ तथा मुझे सदा ही प्रिय है। मैं चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूँ, तुम मेरे इस हाथीको न ले जाओ' ।। ९-१० ।।

धृतराष्ट्र उवाच

गवां सहस्रं भवते ददानि दासीशतं निष्कशतानि पञ्च । अन्यच्च वित्तं विविधं महर्षे किं ब्राह्मणस्येह गजेन कृत्यम् ।। ११ ।।

धृतराष्ट्रने कहा—महर्षे! मैं आपको एक हजार गौएँ दूँगा। सौ दासियाँ और पाँच सौ स्वर्णमुद्राएँ प्रदान करूँगा और भी नाना प्रकारका धन समर्पित करूँगा। ब्राह्मणके यहाँ हाथीका क्या काम है? ।। ११ ।।

गौतम उवाच

तवैव गावो हि भवन्तु राजन् दास्यः सनिष्का विविधं च रत्नम् । अन्यच्च वित्तं विविधं नरेन्द्र किं ब्राह्मणस्येह धनेन कृत्यम् ॥ १२ ॥ **गौतम बोले—**राजन्! वे गौएँ, दासियाँ, स्वर्णमुद्राएँ, नाना प्रकारके रत्न तथा और भी तरह-तरहके धन तुम्हारे ही पास रहें। नरेन्द्र! ब्राह्मणके यहाँ धनका क्या काम है? ॥ १२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

ब्राह्मणानां हस्तिभिर्नास्ति कृत्यं राजन्यानां नागकुलानि विप्र । स्वं वाहनं नयतो नास्त्यधर्मो नागश्रेष्ठं गौतमास्मान्निवर्त ॥ १३ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**विप्रवर गौतम! ब्राह्मणोंको हाथियोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। हाथियोंके समूह तो राजाओंके ही काम आते हैं। हाथी मेरा वाहन है, अतः इस श्रेष्ठ हाथीको ले जानेमें कोई अधर्म नहीं है। आप इसकी ओरसे अपनी तृष्णा हटा लीजिये ॥ १३ ॥

गौतम उवाच

यत्र प्रेतो नंदति पुण्यकर्मा यत्र प्रेतः शोचते पापकर्मा । वैवस्वतस्य सदने महात्मं- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ १४ ॥ **गौतमने कहा—**महात्मन्! जहाँ जाकर पुण्यकर्मा पुरुष आनंदित होता है और जहाँ जाकर पापकर्मा मनुष्य शोकमें डूब जाता है, उस यमराजके लोकमें मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ १४ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

ये निष्क्रिया नास्तिकाश्रद्दधानाः पापात्मान इन्द्रियार्थे निविष्टाः । यमस्य ते यातनां प्राप्नुवन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ १५ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो निष्क्रिय, नास्तिक, श्रद्धाहीन, पापात्मा और इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त हैं, वे ही यमयातनाको प्राप्त होते हैं; परंतु राजा धृतराष्ट्रको वहाँ नहीं जाना

है ।। १५ ।।

गौतम उवाच

वैवस्वती संयमनी जनानां
यत्रानृतं नोच्यते यत्र सत्यम् ।
यत्राबला बलिनं यातयन्ति
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। १६ ।।
गौतम बोले— जहाँ कोई भी झूठ नहीं बोलता, जहाँ सदा सत्य ही बोला जाता है और जहाँ निर्बल मनुष्य भी बलवान्‌से अपने प्रति किये गये अन्यायका बदला लेते हैं, मनुष्योंको संयममें रखनेवाली यमराजकी वही पुरी संयमनी नामसे प्रसिद्ध है। वहीं मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १६ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

ज्येष्ठां स्वसारं पितरं मातरं च
यथा शत्रुं मदमत्ताश्चरन्ति ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।। १७ ।।
धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो मदमत्त मनुष्य बड़ी बहिन, माता और पिताके साथ शत्रुके समान बर्ताव करते हैं, उन्हींके लिये यह यमराजका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ जानेवाला नहीं है ।। १७ ।।

गौतम उवाच

मन्दाकिनी वैश्रवणस्य राज्ञो
महाभागा भोगिजनप्रवेश्या ।
गन्धर्वयक्षैरप्सरोभिश्च जुष्टा
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। १८ ।।
गौतमने कहा— महान् सौभाग्यशाली मंदाकिनी नदी राजा कुबेरके नगरमें विराज रही हैं, जहाँ नागोंका ही प्रवेश होना संभव है, गंधर्व, यक्ष और अप्सराएँ उस मंदाकिनीका सदा सेवन करती हैं; वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।। १८ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

अतिथिव्रताः सुव्रता ये जना वै
प्रतिश्रयं ददति ब्राह्मणेभ्यः ।
शिष्टाशिनः संविभज्याश्रितांश्च
मंदाकिनीं तेऽपि विभूषयन्ति ।। १९ ।।

**धृतराष्ट्र बोले—**जो सदा अतिथियोंकी सेवामें तत्पर रहकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं, जो लोग ब्राह्मणको आश्रयदान करते हैं, तथा जो अपने आश्रितोंको बाँटकर शेष अन्नका भोजन करते हैं, वे ही लोग उस मंदाकिनीतटकी शोभा बढ़ाते हैं (राजा धृतराष्ट्रको तो वहाँ भी नहीं जाना है) ॥ १९ ॥

गौतम उवाच

मेरोरग्रे यद् वनं भाति रम्यं
सुपुष्पितं किन्नरीगीतजुष्टम् ।
सुदर्शना यत्र जम्बूविशाला
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २० ॥

**गौतम बोले—**मेरुपर्वतके सामने जो रमणीय वन शोभा पाता है, जहाँ सुंदर फूलोंकी छटा छायी रहती है और किन्नरियोंके मधुर गीत गूँजते रहते है, जहाँ देखनेमें सुंदर विशाल जम्बूवृक्ष शोभा पाता है, वहाँ पहुँचकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २० ॥

धृतराष्ट्र उवाच

ये ब्राह्मणा मृदवः सत्यशीला
बहुश्रुताः सर्वभूताभिरामाः ।
येऽधीयते सेतिहासं पुराणं
मध्वाहृत्या जुह्वति वै द्विजेभ्यः ॥ २१ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।
यद् विद्यते विदितं स्थानमस्ति
तद् ब्रूहि त्वं त्वरितो ह्येष यामि ॥ २२ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**महर्षे! जो ब्राह्मण कोमलस्वभाव, सत्यशील, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंको प्यार करनेवाले हैं, जो इतिहास और पुराणका अध्ययन करते तथा ब्राह्मणोंको मधुर भोजन अर्पित करते हैं; ऐसे लोगोंके लिये ही यह पूर्वोक्त लोक है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है। आपको जो-जो स्थान विदित हैं, उन सबका यहाँ वर्णन कर जाइये। मैं जानेके लिये उतावला हूँ। यह देखिये, मैं चला ॥

गौतम उवाच

सुपुष्पितं किन्नरराजजुष्टं
प्रियं वनं नंदनं नारदस्य ।
गंधर्वाणामप्सरसां च शश्वत्
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २३ ॥

गौतमने कहा— सुंदर-सुंदर फूलोंसे सुशोभित, किन्नर-राजोंसे सेवित तथा नारद, गंधर्व और अप्सराओंको सर्वदा प्रिय जो नंदननामक वन है, वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २३ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

ये नृत्यगीते कुशला जनाः सदा
ह्ययाचमानाः सहिताश्चरन्ति ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।। २४ ।।
धृतराष्ट्र बोले— महर्षे! जो लोग नृत्य और गीतमें निपुण हैं; कभी किसीसे कुछ याचना नहीं करते हैं तथा सदा सज्जनोंके साथ विचरण करते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह नंदनवनका जगत् है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ।। २४ ।।

गौतम उवाच

यत्रोत्तराः कुरवो भान्ति रम्या
देवैः सार्धं मोदमाना नरेन्द्र ।
यत्राग्नियोनाश्च वसन्ति लोका
अब्द्योनयः पर्वतयोनयश्च ।। २५ ।।
यत्र शक्रो वर्षति सर्वकामान्
यत्र स्त्रियः कामचारा भवन्ति ।
यत्र चेष्र्या नास्ति नारीनराणां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ।। २६ ।।
गौतम बोले— नरेन्द्र! जहाँ रमणीय आकृतिवाले उत्तर कुरुके निवासी अपूर्व शोभा पाते हैं, देवताओंके साथ रहकर आनंद भोगते हैं, अग्नि, जल और पर्वतसे उत्पन्न हुए दिव्य मानव जिस देशमें निवास करते हैं, जहाँ इन्द्र सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करते हैं, जहाँकी स्त्रियाँ इच्छानुसार विचरनेवाली होती हैं तथा जहाँ स्त्रियों और पुरुषोंमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ।। २५-२६ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

ये सर्वभूतेषु निवृत्तकामा
अमांसादा न्यस्तदण्डाश्चरन्ति ।
न हिंसन्ति स्थावरं जङ्गमं च
भूतानां ये सर्वभूतात्मभूताः ।। २७ ।।
निराशिशो निर्ममा वीतरागा

लाभालाभे तुल्यनिन्दाप्रशंसाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ २८ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो समस्त प्राणियोंमें निष्काम हैं, जो मांसाहार नहीं करते, किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, स्थावर-जंगम प्राणियोंकी हिंसा नहीं करते, जिनके लिये समस्त प्राणी अपने आत्माके ही तुल्य हैं, जो कामना, ममता और आसक्तिसे रहित हैं, लाभ-हानि, निंदा तथा प्रशंसामें जो सदा समभाव रखते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह उत्तर कुरुनामक लोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ २७-२८ ॥

गौतम उवाच

ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगन्धा विरजा वीतशोकाः ।
सोमस्य राज्ञः सदने महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २९ ॥

गौतमने कहा— राजन्! उससे भिन्न बहुत-से सनातन लोक हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ रजोगुण तथा शोकका सर्वथा अभाव है। महात्मा राजा सोमके लोकमें उनकी स्थिति है। वहाँ पहुँचकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा
न चाप्यर्थांश्चाददते परेभ्यः ।
येषामदेयमर्हते नास्ति किंचित्
सर्वातिथ्याः सुप्रसादा जनाश्च ॥ ३० ॥
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्यान्
सत्रीभूताः सततं पुण्यशीलाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३१ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो सदा दान करते हैं, किंतु दान लेते नहीं, जिनकी दृष्टिमें सुयोग्य पात्रके लिये कुछ भी अदेय नहीं है, जो सबका अतिथि-सत्कार करते तथा सबके प्रति कृपाभाव रखते हैं, जो क्षमाशील हैं, दूसरोंसे कभी कुछ नहीं बोलते हैं और जो पुण्यशील महात्मा सदा सबके लिये अन्नसत्ररूप हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३०-३१ ॥

गौतम उवाच

ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातना विरजसो वितमस्का विशोकाः । आदित्यदेवस्य पदं महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३२ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! सोमलोकसे भी ऊपर कितने ही सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जो रजोगुण, तमोगुण और शोकसे रहित हैं। वे महात्मा सूर्यदेवके स्थान हैं। वहाँ जाकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वसूल करूँगा ।।

धृतराष्ट्र उवाच

स्वाध्यायशीला गुरुशुश्रूषणे रता- स्तपस्विनः सुव्रताः सत्यसंधाः । आचार्याणामप्रतिकूलभाषिणो नित्योत्थिता गुरुकर्मस्वचोद्याः ॥ ३३ ॥ तथाविधानामेष लोको महर्षे विशुद्धानां भावितो वाग्यतानाम् । सत्ये स्थितानां वेदविदां महात्मनां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**महर्षे! जो स्वाध्यायशील, गुरुसेवापरायण, तपस्वी, उत्तम व्रतधारी, सत्यप्रतिज्ञ, आचार्योंके प्रतिकूल भाषण न करनेवाले, सदा उद्योगशील तथा बिना कहे ही गुरुके कार्यमें संलग्न रहनेवाले हैं, जिनका भाव विशुद्ध है, जो मौनव्रतावलम्बी, सत्यनिष्ठ और वेदवेत्ता महात्मा हैं, उन्हीं लोगोंके लिये यह सूर्यदेवका लोक है, परंतु धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है ॥ ३३-३४ ॥

गौतम उवाच

ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः सुपुण्यगंधा विरजा विशोकाः । वरुणस्य राज्ञः सदने महात्मन- स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३५ ॥ **गौतमने कहा—**उसके सिवा दूसरे भी बहुत-से सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ न तो रजोगुण है और न शोक ही। महामना राजा वरुणके लोकमें वे स्थान हैं। वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ३५ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

चातुर्मास्यैर्यै यजन्ते जनाः सदा

तथेष्टीनां दशशतं प्राप्नुवन्ति । ये चाग्निहोत्रं जुह्वति श्रद्दधाना यथाम्नायं त्रीणि वर्षाणि विप्राः ॥ ३६ ॥ सुधारिणां धर्मधुरे महात्मनां यथोदिते वर्त्मनि सुस्थितानाम् । धर्मात्मनामुद्वहतां गतिं तां परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३७ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो लोग सदा चातुर्मास्य याग करते हैं, हजारों इष्टियोंका अनुष्ठान करते हैं तथा जो ब्राह्मण तीन वर्षोंतक वैदिक विधिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र करते हैं, धर्मका भार अच्छी तरह वहन करते हैं, वेदोक्त मार्गपर भलीभाँति स्थित होते हैं, वे ही धर्मात्मा महात्मा ब्राह्मण वरुणलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है। यह उससे भी उत्तम लोक प्राप्त करेगा ॥ ३६-३७ ॥

गौतम उवाच

इन्द्रस्य लोका विरजा विशोका दुरन्वयाः काङ्क्षिता मानवानाम् । तस्याहं ते भवने भूरितेजसो राजन्निर्मं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ३८ ॥ **गौतमने कहा—**राजन्! इन्द्रके लोक रजोगुण और शोकसे रहित हैं। उनकी प्राप्ति बहुत कठिन है। सभी मनुष्य उन्हें पानेकी इच्छा करते हैं। उन्हीं महातेजस्वी इन्द्रके भवनमें चलकर मैं आपसे अपने इस हाथीको वापस लूँगा ॥ ३८ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

शतवर्षजीवी यश्च शूरो मनुष्यो वेदाध्यायी यश्च यज्वाप्रमत्तः । एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३९ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**जो सौ वर्षतक जीनेवाला शूरवीर मनुष्य वेदोंका स्वाध्याय करता, यज्ञमें तत्पर रहता और कभी प्रमाद नहीं करता है, ऐसे ही लोग इन्द्रलोकमें जाते हैं। धृतराष्ट्र उससे भी उत्तम लोकमें जायगा। उसे वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३९ ॥

गौतम उवाच

प्राजापत्याः सन्ति लोका महान्तो नाकस्य पृष्ठे पुष्कला वीतशोकाः ।

मनीषिताः सर्वलोकोद्भवानां
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४० ॥
**गौतम बोले—**राजन्! स्वर्गके शिखरपर प्रजापतिके महान् लोक हैं जो हृष्ट-पुष्ट और शोकरहित हैं। सम्पूर्ण जगत्के प्राणी उन्हें पाना चाहते हैं। मैं वहीं जाकर तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४० ॥

धृतराष्ट्र उवाच
ये राजानो राजसूयाभिषिक्ता
धर्मात्मानो रक्षितारः प्रजानाम् ।
ये चाश्वमेधावभृथे प्लुतांगा-
स्तेषां लोका धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ४१ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**मुने! जो धर्मात्मा राजा राजसूय यज्ञमें अभिषिक्त होते हैं प्रजाजनोंकी रक्षा करते हैं तथा अश्वमेधयज्ञके अवभृथ-स्नानमें जिसके सारे अंग भीग जाते हैं, उन्हींके लिये प्रजापतिलोक हैं। धृतराष्ट्र वहाँ भी नहीं जायगा ॥ ४१ ॥

गौतम उवाच
ततः परं भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगंधा विरजा वीतशोकाः ।
तस्मिन्नहं दुर्लभे चाप्यधृष्ये
गवां लोके हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ४२ ॥
**गौतम बोले—**उससे परे जो पवित्र गन्धसे परिपूर्ण, रजोगुणरहित तथा शोकशन्य सनातन लोक प्रकाशित होते हैं, उन्हें गोलोक कहते हैं। उस दुर्लभ एवं दुर्धर्ष गोलोकमें जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ४२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतदः समां समां
गवां शती दश दद्याच्च शक्त्या ।
तथा दशभ्यो यश्च दद्यादिहैकां
पञ्चभ्यो वा दानशीलस्तथैकाम् ॥ ४३ ॥
ये जीर्यन्ते ब्रह्मचर्येण विप्रा
ब्राह्मीं वाचं परिरक्षन्ति चैव ।
मनस्विनस्तीर्थयात्रापरायणा-
स्ते तत्र मोदन्ति गवां निवासे ॥ ४४ ॥

**धृतराष्ट्रने कहा—**जो सहस्र गौओंका स्वामी होकर प्रतिवर्ष सौ गौओंका दान करता है, सौ गौओंका स्वामी होकर यथाशक्ति दस गौओंका दान करता है, जिसके पास दस ही गौएँ हैं, वह यदि उनमेंसे एक गायका दान करता है अथवा जो दानशील पुरुष पाँच गौओंमेंसे एक गायका दान कर देता है, वह गोलोकमें जाता है। जो ब्राह्मण ब्रह्मचर्यका पालन करते-करते ही बूढ़े हो जाते हैं, जो वेदवाणीकी सदा रक्षा करते हैं तथा जो मनस्वी ब्राह्मण सदा तीर्थयात्राओंमें ही तत्पर रहते हैं, वे ही गौओंके निवास-स्थान गोलोकमें आनंद भोगते हैं ।। ४३-४४ ।।

प्रभासं मानसं तीर्थं पुष्कराणि महत्सरः । पुण्यं च नैमिषं तीर्थं बाहुदां करतोयिनीम् ॥ ४५ ॥ गयां गयशिरश्चैव विपाशां स्थूलवालुकाम् । कृष्णां गंगां पञ्चनदं महाह्रदमथापि च ॥ ४६ ॥ गोमतीं कौशिकीं पम्पां महात्मानो धृतव्रताः । सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां ये तु यान्ति च ॥ ४७ ॥ तत्र ते दिव्यसंस्थाना दिव्यमाल्यधराः शिवाः । प्रयान्ति पुण्यगंधाढ्या धृतराष्ट्रो न तत्र वै ॥ ४८ ॥

प्रभात, मानसरोवर तीर्थ, त्रिपुष्कर नामक महान् सरोवर, पवित्र नैमिषतीर्थ, बाहुदा नदी, करतोया नदी, गया, गयशिर, स्थूल बालुकायुकत्त विपाशा (व्यास), कृष्णा, गंगा, पंचनद, महाह्रद, गोमती, कौशिकी, पम्पासरोवर, सरस्वती, दृषद्वती और यमुना—इन तीर्थोंमें जो व्रतधारी महात्मा जाते हैं, वे ही दिव्य रूप धारण करके दिव्य मालाओंसे अलंकृत हो गोलोकमें जाते हैं और कल्याणमय स्वरूप तथा पवित्र सुगंधसे व्याप्त होकर वहाँ निवास करते हैं। धृतराष्ट्र उस लोकमें भी नहीं मिलेगा ।।

गौतम उवाच

यत्र शीतभयं नास्ति न चोष्णभयमण्वपि । न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न दुःखं न सुखं तथा ॥ ४९ ॥ न द्वेष्यो न प्रियः कश्चिन्न बन्धुर्न रिपुस्तथा । न जरामरणे तत्र न पुण्यं न च पातकम् ॥ ५० ॥ तस्मिन् विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते । स्वयम्भुभवने पुण्ये हस्तिनं मे प्रदास्यसि ॥ ५१ ॥

**गौतम बोले—**जहाँ सर्दीका भय नहीं है, गर्मीका अणुमात्र भी भय नहीं है, जहाँ न भूख लगती है न प्यास, न ग्लानि प्राप्त होती है न दुःख-सुख, जहाँ न कोई द्वेषका पात्र है न प्रेमका, न कोई बन्धु है न शत्रु, जहाँ जरा-मृत्यु, पुण्य और पाप कुछ भी नहीं है, उस

रजोगुणसे रहित, समृद्धिशाली, बुद्धि और सत्त्वगुणसे सम्पन्न तथा पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाकर तुम्हें मुझे यह हाथी वापस देना पड़ेगा ॥ ४९–५१ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

निर्मुक्ताः सर्वसंगैर्यै कृतात्मानो यतव्रताः । अध्यात्मयोगसंस्थानैर्युक्ताः स्वर्गगतिं गताः ॥ ५२ ॥ ते ब्रह्मभवनं पुण्यं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः । न तत्र धृतराष्ट्रस्ते शक्यो द्रष्टुं महामुने ॥ ५३ ॥ धृतराष्ट्रने कहा—महामुने! जो सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हैं, जिन्होंने अपने मनको वशमें कर लिया है, जो नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं जो अध्यात्मज्ञान और योगसंबंधी आसनोंसे युक्त हैं, जो स्वर्गलोकके अधिकारी हो चुके हैं, ऐसे सात्त्विक पुरुष ही पुण्यमय ब्रह्मलोकमें जाते हैं। वहाँ तुम्हें धृतराष्ट्र नहीं दिखायी दे सकता ॥ ५२-५३ ॥

गौतम उवाच

रथन्तरं यत्र बृहच्च गीयते यत्र वेदी पुण्डरीकैस्तृणोति । यत्रोपयाति हरिभिः सोमपीथी तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ ५४ ॥ गौतम बोले—जहाँ रथन्तर और बृहतसामका गान किया जाता है, जहाँ याज्ञिक पुरुष वेदीको कमलपुष्पोंसे आच्छादित करते हैं तथा जहाँ सोमपान करनेवाला पुरुष दिव्य अश्वोंद्वारा यात्रा करता है, वहाँ जाकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ ५४ ॥ बुध्यामि त्वां वृत्रहणं शतक्रतुं व्यतिक्रमन्तं भुवनानि विश्वा । कच्चिन्न वाचा वृजिनं कदाचि- दकार्षं ते मनसोऽभिषंगात् ॥ ५५ ॥ मैं जानता हूँ, आप राजा धृतराष्ट्र नहीं, वृत्रासुरका वध करनेवाले शतक्रतु इन्द्र हैं और सम्पूर्ण जगत्का निरीक्षण करनेके लिये सब ओर घूम रहे हैं। मैंने मानसिक आवेशमें आकर कदाचित् वाणीद्वारा आपके प्रति कोई अपराध तो नहीं कर डाला? ॥ ५५ ॥

शतक्रतुरुवाच

मघवाहं लोकपथं प्रजाना- मन्वागमं परिवादे गजस्य । तस्माद् भवान् प्रणतं मानुशास्तु

ब्रवीषि यत् तत् करवाणि सर्वम् ॥ ५६ ॥
शतक्रतु बोले— मैं इन्द्र हूँ और आपके हाथीके अपहरणके कारण मानव प्रजाके दृष्टिपथमें निन्दित हो गया हूँ। अब मैं आपके चरणोंमें मस्तक झुकाता हूँ। आप मुझे कर्तव्यका उपदेश दें। आप जो-जो कहेंगे, वह सब करूँगा ॥ ५६ ॥

गौतम उवाच

श्वेतं करेणुं मम पुत्रं हि नागं
यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि बालम् ।
यो मे वने वसतोऽभूद् द्वितीय-
स्तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ॥ ५७ ॥
गौतम बोले— देवेन्द्र! यह श्वेत गजराजकुमार जो इस समय नवजवान हाथीके रूपमें परिणत हो चुका है, मेरा पुत्र है और अभी दस वर्षका बच्चा है। यही इस वनमें रहते हुए मेरा सहचर एवं सहयोगी है। इसे आपने हर लिया है। मेरी प्रार्थना है कि मेरे इसी हाथीको आप मुझे लौटा दें ॥ ५७ ॥

शतक्रतुरुवाच

अयं सुतस्ते द्विजमुख्य नाग
आगच्छति त्वामभिवीक्षमाणः ।
पादौ च ते नासिकयोपजिघ्रते
श्रेयो ममाध्याहि नमश्च तेऽस्तु ॥ ५८ ॥
शतक्रतुने कहा— विप्रवर! आपका पुत्रस्वरूप यह हाथी आपकीही ओर देखता हुआ आ रहा है और पास आकर आपके दोनों चरणोंको अपनी नासिकासे सूँघता है। अब आप मेरा कल्याण-चिंतन कीजिये, आपको नमस्कार है ॥

गौतम उवाच

शिवं सदैवहे सुरेन्द्र तुभ्यं
ध्यायामि पूजां च सदा प्रयुञ्जे ।
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व
त्वया दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ॥ ५९ ॥
गौतम बोले— सुरेन्द्र! मैं सदा ही यहाँ आपके कल्याणका चिंतन करता हूँ और सदा आपके लिये अपनी पूजा अर्पित करता हूँ। शक्र! आप भी मुझे कल्याण प्रदान करें। मैं आपके दिये हुए इस हाथीको ग्रहण करता हूँ ॥ ५९ ॥

शतक्रतुरुवाच

येषां वेदा निहिता वै गुहायां

मनीषिणां सत्यवतां महात्मनाम् । तेषां त्वयैकेन महात्मनास्मि वृद्धस्तस्मात् प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ।। ६० ।। हन्तैहि ब्राह्मण क्षिप्रं सह पुत्रेण हस्तिना । त्वं हि प्राप्तुं शुभाँल्लोकानह्नाय च चिराय च ।। ६१ ।। **शतक्रतुने कहा—**जिन सत्यवादी मनीषी महात्माओंकी हृदय-गुफामें सम्पूर्ण वेद निहित हैं, उनमें आप प्रमुख महात्मा हैं। केवल आपके कल्याण-चिंतनसे मैं समृद्धिशाली हो गया। इसलिये आज मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ। ब्राह्मण! मैं बड़े हर्षके साथ कहता हूँ कि आप अपने इस पुत्रभूत हाथीके साथ शीघ्र चलिये। आप अभी चिरकालके लिये कल्याणमय लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी हो गये हैं ।। ६०-६१ ।। स गौतमं पुरस्कृत्य सह पुत्रेण हस्तिना । दिवमाचक्रमे वज्री सद्भिः सह दुरासदम् ।। ६२ ।। पुत्रस्वरूप हाथीके साथ गौतमको आगे करके वज्रधारी इन्द्र श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ दुर्गम देवलोकमें चले गये ।। ६२ ।। इदं यः शृणुयान्नित्यं यः पठेद्वा जितेन्द्रियः । स याति ब्रह्मणो लोकं ब्राह्मणो गौतमो यथा ।। ६३ ।। जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनेगा, अथवा इसका पाठ करेगा, वह गौतम ब्राह्मणकी भाँति ब्रह्मलोकमें जायगा ।। ६३ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि हस्तिकूटो नाम द्वयधिकशततमोऽध्यायः ।। १०२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें हस्तिकूट नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०२ ।।

ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा

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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्माजी और भगीरथका संवाद, यज्ञ, तप, दान आदिसे भी अनशन-व्रतकी विशेष महिमा

युधिष्ठिर उवाच

दानं बहुविधाकारं शांतिः सत्यमहिंसितम् । स्वदारतुष्टिश्चोक्ता ते फलं दानस्य चैव यत् ॥ १ ॥ पितामहस्य विदितं किमन्यत् तपसो बलात् । तपसो यत्परं तेऽद्य तन्नो व्याख्यातुमर्हसि ॥ २ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आपने अनेक प्रकारके दान, शांति, सत्य और अहिंसा आदिका वर्णन किया। अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहनेकी बात बतायी और दानके फलका भी निरूपण किया। आपकी जानकारीमें तपोबलसे बढ़कर दूसरा कौन बल है? यदि आपकी रायमें तपस्यासे भी कोई उत्कृष्ट साधन हो तो हमारे समक्ष उसकी व्याख्या करें ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

तपः प्रचक्षते यावत् तावल्लोको युधिष्ठिर । मतं ममात्र कौन्तेय तपो नानशनात् परम् ॥ ३ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनुष्य जितना तप करता है, उसीके अनुसार उसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; किन्तु कुंतीकुमार! मेरी रायमें अनशनसे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ३ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । भगीरथस्य संवादं ब्रह्मणश्च महात्मनः ॥ ४ ॥

इस विषयमें विज्ञ पुरुष राजा भगीरथ और महात्मा ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥

अतीत्य सुरलोकं च गवां लोकं च भारत । ऋषिलोकं च सोऽगच्छद् भगीरथ इति श्रुतम् ॥ ५ ॥

भारत! सुननेमें आया है कि राजा भगीरथ देवलोक, गौओंके लोक और ऋषिलोकको भी लाँघकर ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे ॥ ५ ॥

तं तु दृष्ट्वा वचः प्राह ब्रह्मा राजन् भगीरथम् । कथं भगीरथागास्त्वमिमं लोकं दुरासदम् ॥ ६ ॥

राजन्! राजा भगीरथको वहाँ उपस्थित देख ब्रह्माजीने उनसे पूछा—'भगीरथ! इस लोकमें तो आना बहुत ही कठिन है, तुम कैसे यहाँ आ पहुँचे ॥ ६ ॥

न हि देवा न गंधर्वा न मनुष्या भगीरथ । आयान्त्यतप्ततपसः कथं वै त्वमिहागतः ॥ ७ ॥ 'भगीरथ! देवता, गंधर्व और मनुष्य बिना तपस्या किये यहाँ नहीं आ सकते। फिर तुम कैसे यहाँ आ गये?' ॥ ७ ॥

भगीरथ उवाच

निष्काणां वै ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः शतं सहस्राणि सदैव दानम् । ब्राह्मं व्रतं नित्यमास्थाय विद्वन् न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ॥ ८ ॥ भगीरथने कहा—विद्वन्! मैं ब्रह्मचर्यव्रतका आश्रय लेकर प्रतिदिन एक लाख स्वर्ण-मुद्राओंका ब्राह्मणोंके लिये दान किया करता था; परंतु उस दानके फलसे मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ८ ॥

दशैकरात्रान् दशपञ्चरात्रा- नेकादशैकादशकान् क्रतूनंश्च । ज्योतिष्टोमानां च शतं यदिष्टं फलेन तेनापि च नागतोऽहम् ॥ ९ ॥ मैंने एक रातमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, पाँच रातोंमें पूर्ण होनेवाले दस यज्ञ, ग्यारह रातोंमें समाप्त होनेवाले ग्यारह यज्ञ और ज्योतिष्टोम नामक एक सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया है, परंतु उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ९ ॥

यच्चावसं जाह्नवतीरनित्यः शतं समास्तप्यमानस्तपोऽहम् । अदां च तत्राश्वतरीसहस्रं नारीपुरं न च तेनाहमागाम् ॥ १० ॥ मैंने जो घोर तपस्या करते हुए लगातार सौ वर्षोंतक प्रतिदिन गंगाजीके तटपर निवास किया है और वहाँ सहस्रों खच्चरियों तथा झुंड-की-झुंड कन्याओंका दान किया, उस पुण्यके प्रभावसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १० ॥

दशायुतानि चाश्वानां गोऽयुतानि च विंशतिम् । पुष्करेषु द्विजातिभ्यः प्रादां शतसहस्रशः ॥ ११ ॥ सुवर्णचन्द्रोत्तमधारिणीनां कन्योत्तमानामददं सहस्रम् । षष्टिं सहस्राणि विभूषितानां जाम्बूनदैराभरणैर्न तेन ॥ १२ ॥

पुष्करतीर्थमें जो सैकड़ों-हजारों बार मैंने ब्राह्मणोंको एक लाख घोड़े और दो लाख गौएँ दान कीं तथा सोनेके उत्तम चन्द्रहार धारण करनेवाली जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित हुई साठ हजार सुन्दरी कन्याओंका जो सहस्रों बार दान किया, उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ दशार्बुदान्यददं गोसवेज्या- स्वकैकशो दश गा लोकनाथ । समानवत्साः पयसा समन्विताः सुवर्णकांस्योपदुहा न तेन ॥ १३ ॥ लोकनाथ! गोसव नामक यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें मैंने दूध देनेवाली सौ करोड़ गौओंका दान किया। उस समय एक-एक ब्राह्मणको दस-दस गायें मिली थीं। प्रत्येक गायके साथ उसीके समान रंगवाले बछड़े और सुवर्णमय दुग्धपात्र भी दिये गये थे; परंतु उस यज्ञके पुण्यसे भी मैं यहाँतक नहीं पहुँचा हूँ ॥ १३ ॥ आप्तोर्यामेषु नियतमेकैकस्मिन् दशाददम् । गृष्टीनां क्षीरदात्रीणां रोहिणीनां शतानि च ॥ १४ ॥ अनेक बार सोमयागकी दीक्षा लेकर उन यज्ञोंमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको पहले बारकी ब्यायी हुई दूध देनेवाली दस-दस गौएँ और रोहिणी जातिकी सौ-सौ गौएँ दान की हैं ॥ १४ ॥ दोग्ध्रीणां वै गवां चापि प्रयुतानि दशैव ह । प्रादां दशगुणं ब्रह्मन् न तेनाहमिहागतः ॥ १५ ॥ ब्रह्मन्! इनके अतिरिक्त भी मैंने दस बार दस-दस लाख दुधारू गौएँ दान की हैं; किंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ १५ ॥ वाजिनां बाह्लिजातानामयुतान्यददं दश । कर्काणां हेममालानां न च तेनाहमागतः ॥ १६ ॥ बाह्लीक देशमें उत्पन्न हुए श्वेतरंगके एक लाख घोड़ोंको सोनेकी मालाओंसे सजाकर मैंने ब्राह्मणोंको दान किया; किंतु उस पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां ब्रह्मन् दशान्वहम् । एकैकस्मिन् क्रतौ तेन फलेनाहं न चागतः ॥ १७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने एक-एक यज्ञमें प्रतिदिन अठारह-अठारह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ बाँटी थीं; परंतु उसके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ १७ ॥ वाजिनां श्यामकणीनां हरितानां पितामह । प्रादां हेमस्रजां ब्रह्मन् कोटीर्दश च सप्त च ॥ १८ ॥ ईषादन्तान् महाकायान् काञ्चनस्रग्विभूषितान् । पद्मिनो वै सहस्राणि प्रादां दश च सप्त च ॥ १९ ॥

अलंकृतानां देवेश दिव्यैः कनकभूषणैः । रथानां काञ्चनाङ्गानां सहस्राण्यददं दश ॥ २० ॥ सप्त चान्यानि युक्तानि वाजिभिः समलंकृतैः । ब्रह्मन्! पितामह! फिर स्वर्णहारसे विभूषित हरे रंगवाले सत्रह करोड़ श्यामकर्ण घोड़े, ईषादण्ड (हरिस) के समान दाँतोंवाले, स्वर्णमालामण्डित एवं विशाल शरीरवाले सत्रह हजार कमलचिह्नयुक्त हाथी तथा सोनेके बने हुए दिव्य आभूषणोंसे विभूषित स्वर्णमय उपकरणोंसे युक्त और सजे-सजाये घोड़े जुते हुए सत्रह हजार रथ दान किये ॥ १८—२० १/२ ॥

दक्षिणावयवाः केचिद् वेदैर्ये सम्प्रकीर्तिताः ॥ २१ ॥ वाजपेयेषु दशसु प्रादां तेष्वपि चाप्यहम् । इनके अतिरिक्त भी जो वस्तुएँ वेदोंमें दक्षिणाके अवयवरूपसे बतायी गयी हैं, उन सबको मैंने दस वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान करके दान किया था ॥ २१ १/२ ॥

शक्रतुल्यप्रभावाणामिज्यया विक्रमेण ह ॥ २२ ॥ सहस्रं निष्ककण्ठानामददं दक्षिणामहम् । विजित्य भूपतीन् सर्वानर्थैरिष्ट्वा पितामह ॥ २३ ॥ अष्टभ्यो राजसूयेभ्यो न च तेनाहमागतः । पितामह! यज्ञ और पराक्रममें जो इन्द्रके समान प्रभावशाली थे, जिनके कण्ठमें सुवर्णके हार शोभा पा रहे थे, ऐसे हजारों राजाओंको युद्धमें जीतकर प्रचुर धनके द्वारा आठ राजसूययज्ञ करके मैंने उन्हें ब्राह्मणोंको दक्षिणामें दे दिया; परंतु उस पुण्यसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २२-२३ १/२ ॥

स्रोतश्च यावद्गङ्गाकयाश्छन्नमासीज्जगत्पते ॥ २४ ॥ दक्षिणाभिः प्रवृत्ताभिर्मम नागां च तत्कृते । जगत्पते! मेरी दी हुई दक्षिणाओंसे गंगानदी आच्छादित हो गयी थी; परंतु उसके कारण भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ २४ १/२ ॥

वाजिनां च सहस्रे द्वे सुवर्णशतभूषिते ॥ २५ ॥ वरं ग्रामशतं चाहमेकैकस्य त्रिधाददम् । उस यज्ञमें मैंने प्रत्येक ब्राह्मणको तीन-तीन बार सोनेके सैकड़ों आभूषणोंसे विभूषित दो-दो हजार घोड़े और एक-एक सौ अच्छे गाँव दिये थे ॥ २५ १/२ ॥

तपस्वी नियताहारः शममास्थाय वाग्यतः ॥ २६ ॥ दीर्घकालं हिमवति गङ्गायाश्च दुरुत्सहाम् । मूर्ध्ना धारां महादेवः शिरसा यामधारयत् । न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह ॥ २७ ॥

पितामह! मिताहारी, मौन और शांतभावसे रहकर मैंने हिमालय पर्वतपर सुदीर्घ कालतक तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने गंगाजीकी दुःसह धाराको अपने मस्तकपर धारण किया; परंतु उस तपस्याके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ॥ २६-२७ ॥ शम्याक्षेपैरयजं यच्च देवान् साद्यस्कानांयुतैश्चापि यत्तत् । त्रयोदशद्वादशाहैश्च देव सपौण्डरीकान्न च तेषां फलेन ॥ २८ ॥ देव! मैंने अनेक बार 'शम्याक्षेप*' याग किये। दस हजार 'साद्यस्क' यागोंका अनुष्ठान किया। कई बार तेरह और बारह दिनोंमें समाप्त होनेवाले याग और 'पुण्डरीक' नामक यज्ञ पूर्ण किये; परंतु उनके फलोंसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ २८ ॥ अष्टौ सहस्राणि ककुद्मिनामहं शुक्लर्षभाणामददं द्विजेभ्यः । एकैकं वै काञ्चनं शृंगमेभ्यः पत्नीश्चैषामददं निष्ककण्ठीः ॥ २९ ॥ इतना ही नहीं, मैंने सफेद रंगके ककुद्वाले आठ हजार वृषभ भी ब्राह्मणोंको दान किये, जिनके एक-एक सींगमें सोना मढ़ा हुआ था तथा उन ब्राह्मणोंको सुवर्णमय हारसे विभूषित गौएँ भी मैंने दी थीं ॥ २९ ॥ हिरण्यरत्ननिचयानददं रत्नपर्वतान् । धनधान्यसमृद्धांश्च ग्रामांश्चान्ये सहस्रशः ॥ ३० ॥ शतं शतानां गृष्टीनामददं चाप्यतन्द्रितः । इष्ट्वानेकैर्महायज्ञैर्ब्राह्मणेभ्यो न तेन च ॥ ३१ ॥ मैंने आलस्यरहित होकर अनेक बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके उनमें सोने और रत्नोंके ढेर, रत्नमय पर्वत, धनधान्यसे सम्पन्न हजारों गाँव और एक बारकी ब्यायी हुई सहस्रों गौएँ ब्राह्मणोंको दान कीं; किंतु उनके पुण्यसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३०-३१ ॥ एकादशाहैरयजं सदक्षिणै- र्द्विद्वादशाहैरश्वमेधैश्च देव । आर्कायणैः षोडशभिश्च ब्रह्मं- स्तेषां फलेनेह न चागतोऽस्मि ॥ ३२ ॥ देव! ब्रह्मन्! मैंने ग्यारह दिनोंमें होनेवाले और चौबीस दिनोंमें होनेवाले दक्षिणासहित यज्ञ किये। बहुत-से अश्वमेधयज्ञ भी कर डाले तथा सोलह बार आर्कायणयज्ञोंका अनुष्ठान किया; परंतु उन यज्ञोंके फलसे मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥ ३२ ॥ निष्कैककण्ठमददं योजनायतं

तद्विस्तीर्णं काञ्चनपादपानाम् । वनं वृतानां रत्नविभूषितानां न चैव तेषामागतोऽहं फलेन ॥ ३३ ॥ चार कोस लंबा-चौड़ा एक चम्पाके वृक्षोंका वन, जिसके प्रत्येक वृक्षमें रत्न जड़े हुए थे, वस्त्र लपेटा गया था और कण्ठदेशमें स्वर्णमाला पहनायी गयी थी, मैंने दान किया है; किंतु उस दानके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३३ ॥

तुरायणं हि व्रतमप्यधृष्य- मक्रोधनोऽकरवं त्रिंशतोऽब्दान् । शतं गवामष्टशतानि चैव दिने दिने ह्यददं ब्राह्मणेभ्यः ॥ ३४ ॥ मैं तीस वर्षोंतक क्रोधरहित होकर तुरायण नामक दुष्कर व्रतका पालन करता रहा, जिसमें प्रतिदिन नौ सौ गायें ब्राह्मणोंको दान देता था ॥ ३४ ॥

पयस्विनीनामथ रोहिणीनां तथैवान्याननडुहो लोकनाथ । प्रादां नित्यं ब्राह्मणेभ्यः सुरेश नेहागतस्तेन फलेन चाहम् ॥ ३५ ॥ लोकनाथ! सुरेश्वर! इनके अतिरिक्त रोहिणी (कपिला) जातिकी बहुत-सी दुधारू गौएँ तथा बहुसंख्यक साँड़ भी मैं प्रतिदिन ब्राह्मणोंको दान करता था; परंतु उन सब दानोंके फलसे भी मैं इस लोकमें नहीं आया हूँ ॥

त्रिंशदग्नीनहं ब्रह्मन्नयजं यच्च नित्यदा । अष्टाभिः सर्वमेधैश्च नरमेधैश्च सप्तभिः ॥ ३६ ॥ दशभिर्विश्वजिद्भिश्च शतैरष्टादशोत्तरैः । न चैव तेषां देवेश फलेनाहमिहागमम् ॥ ३७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने प्रतिदिन एक-एक करके तीस बार अग्निचयन एवं यजन किया। आठ बार सर्वमेध, सात बार नरमेध और एक सौ अट्ठाईस बार विश्वजित् यज्ञ किया है; परंतु देवेश्वर! उन यज्ञोंके फलसे भी मैं यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३६-३७ ॥

सरय्वां बाहुदायां च गङ्गायामथ नैमिषे । गवां शतानामयुतमददं न च तेन वै ॥ ३८ ॥ सरयू, बाहुदा, गंगा और नैमिषारण्य तीर्थमें जाकर मैंने दस लाख गोदान किये हैं; परंतु उनके फलसे भी यहाँ आना नहीं हुआ है (केवल अनशनव्रतके प्रभावसे मुझे इस दुर्लभ लोककी प्राप्ति हुई है) ॥ ३८ ॥

इन्द्रेण गुह्यं निहितं वै गुहायां यद्गार्गवस्तपसेहाभ्यविन्दत् ।