माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
.७६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| .तथा स्वप्नदृशोऽपूर्वोऽयं धर्मः। न स्वतः सिद्धो द्रष्टुः स्वरूपवत्। तानेवंप्रकारानपूर्वान्स्वचित्तविकल्पानयं स्थानी स्वप्नदृक्स्वप्नस्थानं गत्वा प्रेक्षते। यथैवेह लोके सुशिक्षितो देशान्तरमार्गस्तेन मार्गेण देशान्तरं गत्वा तान्पदार्थान्पश्यति तद्वत्। तस्माद्यथा स्थानिधर्माणां रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादीनामसत्त्वं तथा स्वप्नदृश्यानामपूर्वाणां स्थानिधर्मत्वमेवेत्यसत्त्वमतो न स्वप्नदृष्टान्तस्यासिद्धत्वम् ॥ ८ ॥ | स्वप्नद्रष्टाका यह अपूर्व धर्म है। द्रष्टाके स्वरूपके समान यह स्वतः-सिद्ध नहीं है। इस प्रकारके अपने चित्तद्वारा कल्पना किये हुए उन धर्मोंको यह जो स्वप्न देखनेवाला स्थानी है स्वप्नस्थानमें जाकर देखा करता है; जिस प्रकार इस लोकमें देशान्तरके मार्गके विषयमें सुशिक्षित पुरुष उस मार्गसे देशान्तरमें जाकर वहाँके पदार्थोंको देखता है उसी प्रकार [यह भी देखता है]। अतः जिस प्रकार स्थानीयके धर्म रज्जु-सर्प और मृगतृष्णा आदिकी असत्यता है उसी प्रकार स्वप्नमें देखे जानेवाले अपूर्व पदार्थोंका भी स्थानिधर्मत्व ही है, अतः वे भी असत् हैं। इसलिये स्वप्नदृष्टान्तकी असिद्धता नहीं है ॥८॥ |
स्वप्नमें मनःकल्पित और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं
| अपूर्वत्वाशङ्का निराकृता स्वप्नदृष्टान्तस्य पुनः स्वप्नतुल्यतां जाग्रद्भेदानां प्रपञ्चयन्नाह— | स्वप्नदृष्टान्तके अपूर्वत्वकी आशंकाका निराकरण कर दिया। अब पुनः जाग्रत्पदार्थोंकी स्वप्नतुल्यताका विस्तृतरूपसे प्रतिपादन करते हुए कहते हैं— |
स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत्।
बहिश्चेतोगृहीतं सद् दृष्टं वैतथ्यमेतयोः ॥ ९ ॥
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५
स्वप्नावस्था में भी चित्तके भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् और चित्तसे बाहर [इन्द्रियोंद्वारा] ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् जान पड़ता है; किन्तु इन दोनोंका ही मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥
| स्वप्नवृत्तावपि स्वप्नस्थानेऽपि अन्तश्चेतसा मनोरथसङ्कल्पितमसत्। सङ्कल्पानन्तरसमकालमेवादर्शनात्तत्रैव स्वप्ने बहिश्चेतसा गृहीतं चक्षुरादिद्वारेणोपलब्धं घटादि सत्। इत्येवमसत्यमिति निश्चितेऽपि सदसद्विभागो दृष्टः। उभयोरप्यन्तर्बहिश्चेतःकल्पितयोर्वैंतथ्यमेव दृष्टम् ॥ ९ ॥ | स्वप्नकी वृत्ति अर्थात् स्वप्नस्थानमें भी चित्तके भीतर मनोरथसे सङ्कल्प की हुई वस्तु असत् होती है; क्योंकि वह सङ्कल्पके पश्चात् तत्क्षण ही दिखायी नहीं देती। तथा उस स्वप्नावस्थामें ही चित्तसे बाहर चक्षु आदिद्वारा ग्रहण किये हुए घट आदि सत् होते हैं। इस प्रकार स्वप्न असत्य है—ऐसा निश्चय हो जानेपर भी उसमें सत्-असत्का विभाग देखा जाता है। किन्तु चित्तसे कल्पना किये हुए इन आन्तरिक और बाह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थोंका मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥ |
जाग्रत्में भी दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं
जाग्रद्वृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।
बहिश्चेतो गृहीतं सद्युक्तं वैतथ्यमेतयोः ॥ १० ॥
इसी प्रकार जाग्रदवस्थामें भी चित्तके भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् तथा चित्तसे बाहर ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् समझा जाता है। परन्तु इन दोनोंहीका मिथ्यात्व मानना उचित है ॥ १० ॥
| ७८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| सदसतोर्वैतथ्यं युक्तम्, अन्तर्बहिश्चेतःकल्पितत्वाविशेषादिति व्याख्यातमन्यत् ॥१०॥ | इन सत् और असत् पदार्थोंका मिथ्यात्व ठीक ही है, क्योंकि हृदयके भीतर या बाहर कल्पित होनेसे उनमें कोई विशेषता नहीं होती । शेष सबकी व्याख्या हो चुकी है ॥१०॥ |
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इन मिथ्या पदार्थोंकी कल्पना करनेवाला कौन है ?
| चोदक आह— | [ इसपर ] पूर्वपक्षी कहता है- |
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उभयोरपि वैतथ्यं भेदानां स्थानयोर्यदि ।
क एतान्बुध्यते भेदान्को वै तेषां विकल्पकः ॥ ११ ॥
यदि [ जागरित और स्वप्न ] दोनों ही स्थानोंके पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो इन पदार्थोंको जानता कौन है और कौन इनकी कल्पना करनेवाला है ? ॥ ११ ॥
| स्वप्नजाग्रत्स्थानयोर्भेदानां यदि वैतथ्यं क एतानन्तर्बहिश्चेतःकल्पितान्बुध्यते । को वै तेषां विकल्पकः । स्मृतिज्ञानयोः क आलम्बनमित्यभिप्रायः, न चेन्निरात्मवाद इष्टः ॥ ११ ॥ | यदि स्वप्न और जागरित [ दोनों ही स्थानों ] के पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो चित्तके भीतर या बाहर कल्पना किये हुए इन पदार्थोंको जानता कौन है ? और कौन उनकी कल्पना करनेवाला है ? तात्पर्य यह है कि यदि निरात्मवाद अभीष्ट नहीं है तो [ यह बताना चाहिये कि ] उक्त स्मरण ( स्वप्न ) और ज्ञान ( जागरित ) का आलम्बन कौन है ? ॥ ११ ॥ |
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७९
इनकी कल्पना करनेवाला और इनका साक्षी आत्मा ही है
कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।
स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ १२ ॥
स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे स्वयं ही कल्पना करता है और वही सब भेदोंको जानता है—यही वेदान्तका निश्चय है ॥ १२ ॥
| स्वयं स्वमायया स्वमात्मानमात्मा देव आत्मन्येव वक्ष्यमाणं भेदाकारं कल्पयति रज्ज्वादाविव सर्पादीन् स्वयमेव च तान्बुध्यते भेदांस्तद्वद्देवेत्येवं वेदान्तनिश्चयः। नान्योऽस्ति ज्ञानस्मृत्याश्रयः । न च निरास्पदे एव ज्ञानस्मृती वैनाशिकानामिवेत्यभिप्रायः।१२। | स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे रज्जुमें सर्पादिके समान अपनेमें आपहीको आगे बतलाये जानेवाले भेदरूपसे कल्पना करता है और स्वयं ही उन भेदोंको जानता है—इस प्रकार यही वेदान्तका निश्चय है । उसके सिवा स्मृति और ज्ञानका कोई और आश्रय नहीं है । तात्पर्य यह कि वैनाशिकों (बौद्धों) के कथनके समान ये ज्ञान और स्मृति निराधार नहीं हैं ॥ १२ ॥ |
पदार्थकल्पनाकी विधि
| सङ्कल्पयन्केन प्रकारेण कल्पयतीत्युच्यते— | वह संकल्प करते हुए किस प्रकार कल्पना करता है ? सो बतलाया जाता है— |
विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् ।
नियतांश्च बहिश्चिन्त एवं कल्पयते प्रभुः ॥ १३ ॥
८० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
प्रभु आत्मा अपने अन्तःकरणमें [ वासनारूपसे ] स्थित अन्य (लौकिक) भावोंको नानारूप करता है तथा बहिश्चित्त होकर पृथिवी आदि नियत और अनियत पदार्थोंकी भी इसी प्रकार कल्पना करता है ॥१३॥
| विकरोति नाना करोत्यपरान् लौकिकान् भावान् पदार्थान् शब्दादीनन्यांश्चान्तश्चित्ते वासनारूपेण व्यवस्थितानव्याकृतान् नियतांश्च पृथ्व्यादीननियतांश्च कल्पनाकालान्यहिश्चित्तःसंस्तथान्तश्चित्तो मनोरथादिलक्षणानित्येवं कल्पयति प्रभुरीश्वर आत्मेत्यर्थः ॥ १३ ॥ | वह चित्तके भीतर वासनारूपसे स्थित अव्याकृत लौकिक भावों—शब्दादि पदार्थोंको तथा अन्य पृथिवी आदि नियत और कल्पनाकालमें ही उत्पन्न होनेवाले अनियत पदार्थोंको बहिश्चित्त होकर एवं मनोरथादिरूप पदार्थोंको अन्तश्चित्त होकर विकृत करता अर्थात् नाना करता है—इस प्रकार प्रभु—ईश्वर अर्थात् आत्मा कल्पना करता है ॥ १३ ॥ |
आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं
| स्वप्नवच्चित्तपरिकल्पितं सर्वमित्येतदाशङ्क्यते। यस्माच्चित्तपरिकल्पितैर्मनोरथादिलक्षणैश्चित्तपरिच्छेद्यैर्वैलक्षण्यं बाह्यानामन्योन्यपरिच्छेद्यत्वमिति। | स्वप्नके समान सब कुछ चित्तका ही कल्पना किया हुआ है—इस विषयमें यह शंका होती है—क्योंकि केवल चित्तपरिकल्पित और चित्तसे ही परिच्छेद्य मनोरथादिसे बाह्य पदार्थोंकी अन्योन्यपरिच्छेद्यत्वरूप विलक्षणता है [अतः स्वप्नके समान ये मिथ्या नहीं हो सकते]। |
| सा न युक्ताशङ्का। | समाधान—यह शंका ठीक नहीं है, [क्योंकि—] |
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८१
चित्तकाला हि येऽन्तस्तु द्वयकालाश्च ये बहिः ।
कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः ॥ १४ ॥
जो आन्तरिक पदार्थ केवल कल्पनाकालतक ही रहनेवाले हैं और जो बाह्य पदार्थ द्विकालिक [ अर्थात् अन्योन्यपरिच्छेद्य ] हैं वे सभी कल्पित हैं । उनकी विशेषताका [ अर्थात् आन्तरिक पदार्थ असत्य हैं और बाह्य सत्य हैं-इस प्रकारकी भेदकल्पनाका ] कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ १४ ॥
| चित्तकाला हि येऽन्तस्तु चित्तपरिच्छेद्याः नान्यश्चित्तकालव्यतिरेकेण परिच्छेदकः कालो येषां ते चित्तकालाः । कल्पनाकाल एवोपलभ्यन्त इत्यर्थः । द्वयकालाश्च भेदकाला अन्योन्यपरिच्छेद्याः । यथा- गोदोहनमास्ते; यावदास्ते तावद्गां दोग्धि यावद्गां दोग्धि तावदास्ते । तावानयमेतावान्स इति परस्परपरिच्छेद्यपरिच्छेदकत्वं बाह्यानां भेदानां ते द्वयकालाः । अन्तश्चित्तकाला बाह्याश्च द्वयकालाः कल्पिता एव ते सर्वे । न बाह्यो द्वयकालत्वविशेषः कल्पितत्व- | जो आन्तरिक हैं अर्थात् चित्तपरिच्छेद्य हैं वे चित्तकाल हैं; जिनका चित्तकालके सिवा और कोई काल परिच्छेदक न हो उन्हें चित्तकाल कहते हैं। अर्थात् वे केवल कल्पनाके समय ही उपलब्ध होते हैं। तथा बाह्य पदार्थ दो कालवाले-भेदकालिक यानी अन्योन्यपरिच्छेद्य हैं। जैसे गोदोहनपर्यन्त बैठता है; यानी जबतक बैठता है तबतक गौ दुहता है और जबतक गौ दुहता है तबतक बैठता है। उतने समयतक यह रहता है और इतने समयतक वह रहता है- इस प्रकार बाह्य पदार्थोंका परस्पर परिच्छेद्य-परिच्छेदकत्व है; अतः वे दो कालवाले हैं। किन्तु आन्तरिक चित्तकालिक और बाह्य द्विकालिक- ये सब कल्पित ही हैं। बाह्य पदार्थोंकी जो द्विकालिकत्वरूप विशेषता है |
११-१२
| ८२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| व्यतिरेकेणान्यहेतुकः । अत्रापि हि स्वप्नदृष्टान्तो भवतीत्येव ॥१४॥ | वह कल्पितत्वके सिवा किसी अन्य कारणसे नहीं है। इस विषयमें भी स्वप्नका दृष्टान्त* है ही ॥ १४ ॥ |
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आन्तरिक और बाह्य पदार्थोंका भेद केवल इन्द्रियजनित हैं
अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु स्फुटा एव च ये बहिः ।
कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥ १५ ॥
जो आन्तरिक पदार्थ हैं वे अव्यक्त ही हैं और जो बाह्य हैं वे स्पष्ट प्रतीत होनेवाले हैं । किन्तु वे सब हैं कल्पित ही । उनकी विशेषता तो केवल इन्द्रियोंके ही भेदमें है ॥ १५ ॥
| यदप्यन्तरव्यक्तत्वं भावानां मनोवासनामात्राभिव्यक्तानां स्फुटत्वं वा बहिश्चक्षुरादीन्द्रियान्तरे विशेषो नासौ भेदानामस्तित्वकृतः स्वप्नेऽपि तथा दर्शनात् । किं तर्हि ? इन्द्रियान्तरकृत एव । अतः कल्पिता एव जाग्रद्भावा अपि स्वप्नभाववदिति सिद्धम् ॥ १५ ॥ | चित्तकी वासनामात्रासे अभिव्यक्त हुए पदार्थोंका जो अन्तःकरणमें अव्यक्तत्व ( अस्फुटत्व ) और बाह्य चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंमें जो उनका स्फुटत्व है वह विशेषता पदार्थोंकी सत्ताके कारण नहीं है, क्योंकि ऐसा ही स्वप्नमें भी देखा जाता है । तो फिर इसका क्या कारण है ? यह इन्द्रियोंके भेदके ही कारण है । अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्नके पदार्थोंके समान जाग्रत्कालीन पदार्थ भी कल्पित ही हैं ॥१५॥ |
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* अर्थात् जाग्रत्के समान स्वप्नके भी चित्तपरिकल्पित पदार्थ कल्पनाकालिक और बाह्य पदार्थ द्विकालिक ही होते हैं; परन्तु वे होते दोनों ही मिथ्या हैं। इसी प्रकार जाग्रत्में भी समझो ।
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८३
पदार्थकल्पनाकी मूल जीवकल्पना है
| बाह्याध्यात्मिकानां भावानामितरेतरनिमित्तनैमित्तिकतया कल्पनायां किं मूलमित्युच्यते— | बाह्य और आन्तरिक पदार्थोंकी परस्पर निमित्त और नैमित्तिकरूपसे कल्पना होनेमें क्या कारण है ? सो बतलाया जाता है— |
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जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग्विधान् ।
बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव यथाविद्यस्तथास्मृतिः ॥ १६ ॥
[ वह प्रभु ] सबसे पहले जीवकी कल्पना करता है; फिर तरह-तरहके बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी कल्पना करता है। उस जीवका जैसा विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है ॥ १६ ॥
| जीवं हेतुफलात्मकम्; अहं करोमि मम सुखदुःखे इत्येवंलक्षणम्; अनेवंलक्षण एव शुद्ध आत्मनि रज्जाविव सर्पं कल्पयते पूर्वम् । ततस्तदर्थ्येन क्रियाकारकफलभेदेन प्राणादीन्नानाविधान्भावान्बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव कल्पते । <br><br> तत्र कल्पनायां को हेतुरित्युच्यते । योऽसौ स्वयं कल्पितो जीवः सर्वकल्पनायामधिकृतः स यथाविद्यः, यादृशी विद्या विज्ञानमस्येति यथाविद्यः; तथाविधैव स्मृतिस्तस्येति तथास्मृतिर्भवति | सबसे पहले 'मैं करता हूँ, मुझे सुख-दुःख हैं' इस प्रकारके हेतुफलात्मक जीवकी [ वह प्रभु ] इससे विपरीत लक्षणोंवाले शुद्ध आत्मामें रज्जुमें सर्पके समान कल्पना करता है। फिर उसीके लिये क्रिया, कारक और फलके भेदसे प्राण आदि नाना प्रकारके बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी कल्पना करता है । <br><br> उस कल्पनामें क्या हेतु है—इसपर कहा जाता है—यह जो स्वयं कल्पना किया हुआ जीव सब प्रकारकी कल्पनाका अधिकारी है, वह जैसी विद्यावाला होता है अर्थात् उसकी जैसी विद्या यानी विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है । अतः वह वैसी ही स्मृतिवाला होता है । |
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| ८४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| स इति । अतो हेतुकल्पना- | इस प्रकार [अन्नभक्षणादि] हेतुकी | | विज्ञानात्फलविज्ञानं ततो हेतुफल- | कल्पनाके विज्ञानसे ही [तृप्ति आदि] | | | फलका विज्ञान होता है; उससे [दूसरे | | | दिन भी] उन हेतु और फलकी स्मृति | | स्मृतिस्ततस्तद्विज्ञानं तदर्थक्रिया- | होती है और उस स्मृतिसे उनका ज्ञान | | | तथा उनके लिये होनेवाले [पाकादि] | | कारकतत्फलभेदविज्ञानानि । | कर्म, [तण्डुलादि] कारक और उनके | | | [तृप्ति आदि] फलभेदके ज्ञान होते हैं। | | तेभ्यस्तत्स्मृतिस्तत्स्मृतेश्च पुन- | उनसे उनकी स्मृति होती है तथा उस | | स्तद्विज्ञानानीत्येवं बाह्यानाध्या- | स्मृतिसे फिर उन [हेतु आदि] के | | | विज्ञान होते हैं। इस प्रकार यह जीव | | त्मिकांश्चेतरेतरनिमित्तनैमित्तिक- | बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी | | | पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिकभावसे | | भावेनानेकधा कल्पयते ॥१६॥ | अनेक प्रकार कल्पना करता है ॥१६॥ |
<div align="center">❧ ❦ ❧</div>जीवकल्पनाका हेतु अज्ञान है
| तत्र जीवकल्पना सर्वकल्पना- | यहाँतक जीवकल्पना ही सब | | मूलमित्युक्तं सैव जीवकल्पना | कल्पनाओंका मूल है—यह कहा गया; | | किंनिमित्तेति दृष्टान्तेन प्रति- | किन्तु वह जीव-कल्पना है किस | | पादयति— | निमित्तसे ?—इस बातका दृष्टान्तसे | | | प्रतिपादन करते हैं— |
अनिश्चिता यथा रज्जुरन्धकारे विकल्पिता ।
सर्पधारादिभिर्भावैस्तद्वदात्मा विकल्पितः ॥ १७ ॥
जिस प्रकार [अपने स्वरूपसे] निश्चय न की हुई रज्जु अन्धकारमें सर्प-धारा आदि भावोंसे कल्पना की जाती है उसी प्रकार आत्मामें भी तरह-तरहकी कल्पनाएँ हो रही हैं ॥ १७ ॥
| यथा लोके स्वेन रूपेणानिश्चि- | जिस प्रकार अपने स्वरूपसे | | तानवधारितैवंमेवेति रज्जुर्मन्दा- | अनिश्चित अर्थात् यह ऐसी ही है— |
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८५
| न्धकारे किं सर्प उदकधारा दण्ड इति वानेकधा विकल्पिता भवति पूर्वं स्वरूपानिश्चयनिमित्तम्। यदि हि पूर्वमेव रज्जुः स्वरूपेण निश्चिता स्यात्; न सर्पादिविकल्पोऽभविष्यद् यथा स्वहस्ताङ्गुल्यादिषु, एष दृष्टान्तः। तद्वद्धेतुफलादिसंसारधर्मानर्थविलक्षणतया स्वेन विशुद्धविज्ञप्तिमात्रसत्ताद्वयरूपेणानिश्चितत्वाज्जीवप्राणाद्यनन्तभावभेदैरात्मा विकल्पित इत्येष सर्वोपनिषदां सिद्धान्तः ॥ १७ ॥ | इस प्रकार निर्धारण न की हुई रज्जु मन्द अन्धकारमें 'यह सर्प है?' 'जलकी धारा है?' अथवा 'दण्ड है?' इस प्रकार—पहलेसे स्वरूपका निश्चय न होनेके कारण—अनेक प्रकारसे कल्पना की जाती है; यदि रज्जु पहले ही अपने स्वरूपसे निश्चित हो तो उसमें सर्पादिका विकल्प नहीं हो सकता, जैसे कि अपने हाथकी अँगुली आदिमें [ ऐसा कोई विकल्प नहीं होता ]। यह एक दृष्टान्त है। इसी तरह हेतु-फलादि सांसारिक धर्मरूप अनर्थसे विलक्षण अपने विशुद्ध विज्ञप्तिमात्र अद्वितीय सत्तारूपसे निश्चित न होनेके कारण ही आत्मा जीव एवं प्राण आदि अनन्त विभिन्न भावोंसे विकल्पित हो रहा है—यही सम्पूर्ण उपनिषदोंका सिद्धान्त है १७ |
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अज्ञाननिवृत्ति ही आत्मज्ञान है
निश्चितायां यथा रज्ज्वां विकल्पो विनिवर्तते ।
रज्जुरेवेति चाद्वैतं तद्वदात्मविनिश्चयः ॥ १८ ॥
जिस प्रकार रज्जुका निश्चय हो जानेपर उसमें [ सर्पादिका ] विकल्प निवृत्त हो जाता है तथा 'यह रज्जु ही है' ऐसा अद्वैत निश्चय होता है उसी प्रकार आत्माका निश्चय है ॥ १८ ॥
| ८६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| रज्जुरेवेति निश्चये सर्ववि-<br>कल्पनिवृत्तौ रज्जुरेवेति चाद्वैतं<br>यथा तथा "नेति नेति" (बृ०<br>उ० ४।४।२२) इति सर्व-<br>संसारधर्मशून्यप्रतिपादकशास्त्रज-<br>नितविज्ञानसूर्यालोककृतात्मवि-<br>निश्चयः "आत्मैवेदं सर्वम्"<br>(छा० उ० ७।२५।२)<br>"अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्"<br>(बृ० उ० २।५।१९)<br>"सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः" (मु०<br>उ० २।१।२) "अजरोऽमरो-<br>ऽमृतोऽभयः" (बृ० उ० ४।४।<br>२५) "एक एवाद्वयः" इति॥१८॥ | 'यह रज्जु ही है' ऐसा निश्चय<br>होनेसे सर्पादि विकल्पकी निवृत्ति<br>हो जानेपर जिस प्रकार 'यह रज्जु<br>ही है' ऐसा अद्वैत-भाव हो जाता<br>है उसी प्रकार "नेति-नेति" इस<br>सर्वसंसारधर्मशून्य आत्माका प्रति-<br>पादन करनेवाले शास्त्रसे उत्पन्न हुए<br>विज्ञानरूप सूर्यके प्रकाशसे आत्माका<br>ऐसा निश्चय होता है कि "यह सब<br>आत्मा ही है" "वह कारण-कार्यसे<br>रहित और अन्तर्बाह्यशून्य है""बाहर-<br>भीतरसे (कार्य-कारण दोनों दृष्टियों-<br>से) अजन्मा है" "वह जराशून्य,<br>अमर, अमृत और अभय है" तथा "वह<br>एक अद्वितीय ही है" ॥ १८ ॥ |
| यद्यात्मैक एवेति निश्चयः<br>कथं प्राणादिभिरनन्तैर्भावैरैतैः<br>संसारलक्षणैर्विकल्पित इति,<br>उच्यते, शृणु— | यदि यह बात निश्चित है कि<br>आत्मा एक ही है तो वह इन<br>संसाररूप प्राणादि अनन्त भावोंसे<br>कैसे विकल्पित हो रहा है ?<br>सो इस विषयमें कहा जाता<br>है, सुनो— |
विकल्पकी मूल माया है
प्राणादिभिरनन्तैश्च भावैरेतैर्विकल्पितः ।
मायैषा तस्य देवस्य यया संमोहितः स्वयम् ॥ १९ ॥
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८७
यह जो इन प्राणादि अनन्त भावोंसे विकल्पित हो रहा है सो यह उस प्रकाशमय आत्मदेवकी माया ही है, जिससे कि वह स्वयं ही मोहित हो रहा है ॥ १९ ॥
| मायैषा तस्यात्मनो देवस्य । यथा मायाविना विहिता माया गगनमतिविमलं कुसुमितैः सपलाशैस्तरुभिराकीर्णमिव करोति तथेयमपि देवस्य माया ययायं स्वयमपि मोहित इव मोहितो भवति । "मम माया दुरत्यया" (गीता ७ । १४) इत्युक्तम् ॥ १९ ॥ | यह उस आत्मदेवकी माया है। जिस प्रकार मायावीद्वारा प्रयोग की हुई माया अति निर्मल आकाशको पल्लवयुक्त पुष्पित पादपोंसे परिपूर्ण कर देती है उसी प्रकार यह भी उस देवकी माया है जिससे कि यह स्वयं भी मोहित हुएके समान मोह-ग्रस्त हो रहा है। "मेरी मायाका पार पाना कठिन है" ऐसा [भगवान्ने] कहा भी है ॥ १९ ॥ |
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मूलतत्त्वसम्बन्धी विभिन्न मतवाद
प्राण इति प्राणविदो भूतानीति च तद्विदः ।
गुणा इति गुणविदस्तत्त्वानीति च तद्विदः ॥ २० ॥
प्राणोपासक कहते हैं—'प्राण ही जगत्का कारण है।' भूतज्ञों (प्रत्यक्षवादी चार्वाकादि) का कथन है—'[पृथिवी आदि] चार भूत ही परमार्थ हैं।' गुणोंको जाननेवाले [सांख्यवादी] कहते हैं—'गुण ही सृष्टिके हेतु हैं।' तथा तत्त्वज्ञ (शैव) कहते हैं—'[आत्मा, अविद्या और शिव—ये तीन] तत्त्व ही जगत्के प्रवर्तक हैं' ॥ २० ॥
पादा इति पादविदो विषया इति तद्विदः ।
लोका इति लोकविदो देवा इति च तद्विदः ॥ २१ ॥
| ८८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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पादवेत्ता कहते हैं—‘विश्व आदि पाद ही सम्पूर्ण व्यवहारके हेतु हैं।’ [ वात्स्यायनादि ] विषयज्ञ कहते हैं—‘शब्दादि विषय ही सत्य वस्तु हैं।’ लोकवेत्ताओं ( पौराणिकों ) का कथन है—‘लोक ही सत्य हैं।’ तथा देवोपासक कहते हैं—‘इन्द्रादि देवता ही सृष्टिके सञ्चालक हैं’ ॥ २१ ॥
वेदा इति वेदविदो यज्ञा इति च तद्विदः ।
भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः ॥ २२ ॥
वेदज्ञ कहते हैं—‘ऋगादि चार वेद ही परमार्थ हैं।’ याज्ञिक कहते हैं—‘यज्ञ ही संसारके आदिकारण हैं।’ भोक्ताको जाननेवाले भोक्ताकी ही प्रधानता बतलाते हैं तथा भोज्यके मर्मज्ञ ( सूपकारादि ) भोज्यपदार्थोंकी ही सारवत्ताका प्रतिपादन करते हैं ॥ २२ ॥
सूक्ष्म इति सूक्ष्मविदः स्थूल इति च तद्विदः ।
मूर्त इति मूर्तविदोऽमूर्त इति च तद्विदः ॥ २३ ॥
सूक्ष्मवेत्ता कहते हैं—‘आत्मा सूक्ष्म (अणु-परिमाण) है।’ स्थूलवादी ( चार्वाकादि ) कहते हैं—‘वह स्थूल है।’ मूर्त्तवादी ( साकारोपासक ) कहते हैं—‘परमार्थ वस्तु मूर्तिमान् है।’ तथा अमूर्त्तवादियों ( शून्यवादियों ) का कथन है कि वह मूर्तिहीन है ॥ २३ ॥
काल इति कालविदो दिश इति च तद्विदः ।
वादा इति वादविदो भुवनानीति तद्विदः ॥ २४ ॥
कालज्ञ ( ज्योतिषी लोग ) कहते हैं—‘काल ही परमार्थ है।’ दिशाओंके जाननेवाले ( स्वरोदयशास्त्री ) कहते हैं—‘दिशाएँ ही सत्य वस्तु हैं।’ वादवेत्ता कहते हैं—‘[ धातुवाद, मन्त्रवाद आदि ] वाद ही सत्य वस्तु है।’ तथा भुवनकोषके ज्ञाताओंका कथन है कि भुवन ही परमार्थ हैं ॥ २४ ॥
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८९
मन इति मनोविदो बुद्धिरिति च तद्विदः ।
चित्तमिति चित्तविदो धर्माधर्मौ च तद्विदः ॥ २५ ॥
मनोविद् कहते हैं—'मन ही आत्मा है', बौद्धोंका कथन है—'बुद्धि ही आत्मा है', चित्तज्ञोंका विचार है—'चित्त ही सत्यवस्तु है;' तथा धर्माधर्मवेत्ता (मीमांसक) 'धर्माधर्मको ही परमार्थ मानते हैं' ॥ २५ ॥
पञ्चविंशक इत्येके षड्िंवश इति चापरे ।
एकत्रिंशक इत्याहुरनन्त इति चापरे ॥ २६ ॥
कोई (सांख्यवादी) पच्चीस तत्त्वोंको, कोई (पातञ्जलमतावलम्बी) छब्बीसोंको और कोई (पाशुपत) इकतीस तत्त्वोंको सत्य मानते हैं* तथा अन्य मतावलम्बी परमार्थको अनन्त भेदोंवाला मानते हैं ॥ २६ ॥
लोकाँल्लोकविदः प्राहुराश्रमा इति तद्विदः ।
स्त्रीपुंनपुंसकं लैङ्गाः परापरमथापरे ॥ २७ ॥
लौकिक पुरुष लोकानुरञ्जनको और आश्रमवादी आश्रमोंको ही प्रधान बतलाते हैं। लिङ्गवादी स्त्रीलिङ्ग, पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिखोंको तथा दूसरे लोग पर और अपर ब्रह्मको ही परमार्थ मानते हैं ॥ २७ ॥
सृष्टिरिति सृष्टिविदो लय इति च तद्विदः ।
स्थितिरिति स्थितिविदः सर्वे चेह तु सर्वदा ॥ २८ ॥
सृष्टिवेत्ता कहते हैं—'सृष्टि ही सत्य है', लयवादी कहते हैं—'लय ही परमार्थ वस्तु है' तथा स्थितिवेत्ता कहते हैं—'स्थिति ही सत्य है।' इस प्रकार ये [कहे हुए और बिना कहे हुए] सभी वाद इस आत्मतत्त्वमें सर्वदा कल्पित हैं ॥ २८ ॥
* प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और मन—ये सांख्यवादियोंके पच्चीस तत्त्व हैं; योगी इनके सिवा छब्बीसवाँ तत्त्व ईश्वर मानते हैं और पाशुपतोंके मतमें इन पच्चीस तत्त्वोंके अतिरिक्त राग, अविद्या, नियति, काल, कला और माया—ये छः तत्त्व और हैं।
९० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० कां० २
| प्राणः प्राज्ञो वीजात्मा तत्कार्यभेदा हीतरे स्थित्यन्ताः। अन्ये च सर्वे लौकिकाः सर्वप्राणिपरिकल्पिता भेदा रज्ज्वामिव सर्पादयः तच्छून्य आत्मन्यात्मस्वरूपानिश्चयहेतोरविद्यया कल्पिता इति पिण्डीकृतोऽर्थः । प्राणादिश्लोकानां प्रत्येकं पदार्थव्याख्याने फल्गुप्रयोजनत्वात्सिद्धपदार्थत्वाच्च यत्नो न कृतः ॥ २८ ॥ | प्राण बीजस्वरूप प्राज्ञको कहते हैं। उपर्युक्त स्थितिपर्यन्त सब विकल्प उसीके कार्यभेद हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंसे परिकल्पित अन्य सब लौकिकधर्म रज्जुमें सर्पके समान उन विकल्पोंसे शून्य आत्मामें आत्मस्वरूपके अनिश्चयके कारण अविद्यासे कल्पना किये गये हैं—यह इन श्लोकोंका समुदायार्थ है। प्राणादिश्लोकोंके प्रत्येक पदार्थके व्याख्यानका अत्यन्त अल्प प्रयोजन होनेके कारण तथा वे सिद्ध पदार्थ हैं—इसलिये प्रयत्न नहीं किया ॥ २८ ॥ |
किं बहुना— | अधिक क्या ?—
यं भावं दर्शयेद्यस्य तं भावं स तु पश्यति ।
तं चावति स भूत्वासौ तद्ग्रहः समुपैति तम् ॥ २९ ॥
[ गुरु ] जिसे जो भाव दिखला देता है वह उसीको आत्मस्वरूपसे देखने लगता है तथा इस प्रकार देखनेवाले उस व्यक्तिकी वह भाव तद्रूप होकर रक्षा करने लगता है। फिर उस (भाव) में होनेवाला अभिनिवेश उस [के आत्मभाव] को प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥
| प्राणादीनामन्यतममुक्तमनुक्तं वान्यं भावं पदार्थं दर्शयेद्यस्याचार्योऽन्यो वाप्त इदमेव तत्त्वमिति स तं भावमात्मभूतं पश्यत्यय- | जिसका आचार्य अथवा कोई अन्य आप्त पुरुष जिसे प्राणादिमेंसे किसी कहे हुए अथवा किसी बिना कहे हुए अन्य भावको भी 'यही परमार्थतत्त्व है' इस प्रकार दिखा देता है वह उसी भावको आत्मभूत |
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९१
| महमिति वा ममेति वा । तं च द्रष्टारं स भावोऽवति यो दर्शितो भावोऽसौ भूत्वा रक्षति । स्वेनात्मना सर्वतो निरुणद्धि । तस्मिन्ग्रहस्तद्ग्रहस्तदभिनिवेशः । इदमेव तत्त्वमिति स तं ग्रहीतारमुपैति । तस्यात्मभावं निगच्छतीत्यर्थः ॥ २९ ॥ | हुआ देखता है [ और समझता है कि-] 'मैं यही हूँ' अथवा 'यही मेरा स्वरूप है' । तथा उस द्रष्टाकी भी, जो भाव उसे दिखलाया गया है, तद्रूप होकर रक्षा करता है; अर्थात् उसे सब प्रकार अपने स्वरूपसे निरुद्ध कर देता है। उसी भावमें जो ग्रह-आग्रह अर्थात् 'यही तत्त्व है' इस प्रकारका अभिनिवेश है वह उस भावके ग्रहण करनेवालेको प्राप्त होता है, अर्थात् उसके आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥२९॥ |
आत्मा सर्वाधिष्ठान है ऐसा जाननेवाला ही परमार्थदर्शी है
एतैरेषोऽपृथग्भावैः पृथगेवेति लक्षितः ।
एवं यो वेद तत्त्वेन कल्पयेत्सोऽविशङ्कितः ॥ ३० ॥
[ इस प्रकार सबका अधिष्ठान होनेके कारण ] इन प्राणादि अपृथग् भावोंसे [पृथक् न होनेपर भी अज्ञानियोंद्वारा] यह आत्मा भिन्न ही माना गया है । इस बातको जो वास्तविकरूपसे जानता है वह निःशंक होकर [ वेदार्थकी ] कल्पना कर सकता है ॥ ३० ॥
| एतैः प्राणादिभिरात्मनोऽपृथग्भूतैरपृथग्भावैरेष आत्मा रज्जुरिव सर्पादिविकल्पनारूपैः पृथगेवेति लक्षितोऽभिलक्षितो निश्चितो मूढैरित्यर्थः । विवेकिनां | रज्जुमें कल्पित सर्पादि भावोंसे रज्जुके समान यह आत्मा अपनेसे अपृथग्भूत प्राणादि अपृथग्भावोंसे पृथक् ही है—ऐसा मूर्खोंको लक्षित—अभिलक्षित अर्थात् निश्चित हो रहा है । विवेकियोंकी दृष्टिमें तो "यह |
| ९२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तु रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयो नात्मव्यतिरेकेण प्राणादयः सन्तीत्यभिप्रायः “इदं सर्वं यदयमात्मा” (बृ० उ० २ । ४ । ६, ४ । ५ । ७) इति श्रुतेः । | जो कुछ हैं सब आत्मा ही हैं” इस श्रुतिके अनुसार रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान ये प्राणादि आत्मासे भिन्न हैं ही नहीं—ऐसा इसका तात्पर्य है। | | एवमात्मव्यतिरेकेणासत्त्वं रज्जुसर्पवदात्मनि कल्पितानामात्मानं च केवलं निर्विकल्पं यो वेद तत्त्वेन श्रुतितो युक्तितश्च सोऽविशङ्कितो वेदार्थं विभागतः कल्पयेत्कल्पयतीत्यर्थः—इदमेवं परं वाक्यमदोऽन्यपरमिति । न ह्यनध्यात्मविद्वेदाञ्ज्ञातुं शक्नोति तत्त्वतः। “न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते” (मनु० ६ । ८२) इति हि मानवं वचनम् ॥ ३० ॥ | इस प्रकार रज्जुमें कल्पित सर्पके समान जो आत्मामें कल्पित पदार्थोंका आत्माके सिवा असत्यत्व समझता है तथा आत्माको श्रुति और युक्तिसे परमार्थतः निर्विकल्प जानता है वह निःशंक होकर वेदार्थकी 'यह वाक्य इस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला है और यह अन्यार्थपरक है' इस प्रकार विभागपूर्वक कल्पना कर सकता है—यह इसका तात्पर्य है। जो अध्यात्मतत्त्वको नहीं जानता वह पुरुष तत्त्वतः वेदोंको भी नहीं जान सकता। “अध्यात्मतत्त्वको न जाननेवाला पुरुष किसी भी कर्मफलको प्राप्त नहीं करता” ऐसा मनुजीका भी वचन है ॥ ३० ॥ |
द्वैतका असत्यत्व वेदान्तवेद्य है
| यदेतद्द्वैतस्यासत्त्वमुक्तं युक्तितस्तदेतद्वेदान्तप्रमाणावगतमित्याह— | यह जो युक्तिपूर्वक द्वैतकी असत्यता बतलायी है वह वेदान्तप्रमाणसे जानी गयी है—इस आशयसे कहते हैं— |
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९३
स्वप्नमाये यथा दृष्टे गन्धर्वनगरं यथा ।
तथा विश्वमिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः ॥ ३१ ॥
जिस प्रकार स्वप्न और माया देखे गये हैं तथा जैसा गन्धर्व-नगर जाना गया है उसी प्रकार विचक्षण पुरुषोंने वेदान्तोंमें इस जगत्को देखा है ॥ ३१ ॥
| स्वप्नश्च माया च स्वप्नमाये असद्वस्त्वात्मिके असत्यौ सद्वस्त्वात्मिके इव लक्ष्येते अविवेकिभिः । यथा च प्रसारितपण्यापणगृहप्रासादस्त्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्यमानमेव सद्यकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असद्रूपे, तथा विश्वमिदं द्वैतं समस्तमसद्दृष्टम् । | अविवेकी पुरुषोंद्वारा स्वप्न और माया, जो असद्वस्तुरूप अर्थात् असत्य हैं, सद्वस्तुरूप देखे जाते हैं। जिस प्रकार विस्तृत दूकान, बाजार, गृह, प्रासाद और नगरनिवासी स्त्री-पुरुषोंके व्यवहारसे भरपूर-सा गन्धर्व-नगर देखते-ही-देखते अकस्मात् अभावको प्राप्त होता देखा गया है, और जिस प्रकार ये स्वप्न और माया असद्रूप देखे गये हैं, उसी प्रकार यह विश्व अर्थात् समस्त द्वैत असत् देखा गया है । |
| क्वेत्याह—वेदान्तेषु । “नेह नानास्ति किंचन” (क०उ० २।४।११ बृ० उ० ४।४।१९) “इन्द्रो मायाभिः” (बृ० उ० २।५।१९) “आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१७) “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १।४।१०) “द्वितीयाद्वै भयं भवति” (बृ० उ० १।४। | कहाँ देखा गया है ? इसपर कहते हैं—वेदान्तोंमें । “यहाँ नाना कुछ नहीं है” “इन्द्रने मायासे” “पहले यह आत्मा ही था” “पहले यह ब्रह्म ही था” “दूसरे-से निश्चय भय होता है” “उससे |
९४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
२) "न तु तद्द्वितीयमस्ति" (बृ० उ० ४।३।२३) "यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्" (बृ० उ० ४।५।१५) इत्यादिषु विचक्षणैर्निपुणतरवस्तुदर्शिभिः पण्डितैरित्यर्थः । | दूसरा कोई नहीं है" "जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है" इत्यादि वेदान्तोंमें विचक्षण अर्थात् निपुणतर वस्तुदर्शी पण्डितोंद्वारा देखा गया है—यह इसका तात्पर्य है । "तमःश्वभ्रनिभं दृष्टं वर्षबुद्बुदसंनिभम् । नाशप्रायं सुखाद्दीनं नाशोत्तरमभावगम्" इति व्यासस्मृतेः ॥ ३१ ॥ | "वह जगत् अँधेरे गड्ढेके समान और वर्षाकी बूँदके सदृश नाशप्राय, सुखसे रहित, और नाशके अनन्तर अभावको प्राप्त हो जानेवाला देखा गया है"—इस व्यासस्मृतिसे भी यही बात प्रमाणित होती है ॥३१॥
परमार्थ क्या है ?
प्रकरणार्थोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः । यदा वितथं द्वैतमात्मैकैकः परमार्थतः संस्तदेदं निष्पन्नं भवति सर्वोऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारोऽविद्याविषय एवेति । तदा— | यह (आगेका) श्लोक इस प्रकरणके विषयका उपसंहार करनेके लिये है। जब कि द्वैत असत् है और एकमात्र आत्मा ही परमार्थतः सत् है तो यह निश्चित होता है कि यह सारा लौकिक और वैदिक व्यवहार अविद्याका ही विषय है। उस अवस्थामें—
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ३२ ॥
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ९५
न प्रलय है, न उत्पत्ति है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त ही है—यही परमार्थता है ॥ ३२ ॥
| न निरोधः—निरोधनं निरोधः प्रलयः, उत्पत्तिर्जननम्, बद्धः संसारी जीवः, साधकः साधनवान्मोक्षस्य, मुमुक्षुर्मोचनार्थी, मुक्तो विमुक्तबन्धः। उत्पत्तिप्रलययोरभावाद्बद्धादयो न सन्तीत्येषा परमार्थता। | न निरोध है। निरोधनका नाम निरोध यानी प्रलय है। उत्पत्ति जननको, बद्ध-संसारी जीवको, साधक मोक्षके साधनवालेको, मुमुक्षु मुक्त होनेकी इच्छावालेको और मुक्त बन्धनसे छूटे हुएको कहते हैं। उत्पत्ति और प्रलयका अभाव होनेके कारण ये बद्ध आदि भी नहीं हैं—यही परमार्थता है। |
| कथमुत्पत्तिप्रलययोरभावः, इत्युच्यते, द्वैतस्यासत्त्वात्। "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) "य इह नानेव पश्यति" (क० उ० २।१।१०, ११) "आत्मैवेदं सर्वम्" (छा० उ० ७।२५।२) "ब्रह्मैवेदं सर्वम्" (नृसिंहोत्तर० ७) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "इदं सर्वं यदयमात्मा" (बृ० उ० २।४।६, ४।५।७) इत्यादिनानाश्रुतिभ्यो द्वैतस्यासत्त्वं सिद्धम्। | उत्पत्ति और प्रलयका अभाव किस प्रकार है? इसपर कहा जाता है—द्वैतकी असत्यता होनेके कारण [इनकी भी सत्ता नहीं है]। "जहाँ द्वैत-जैसा होता है" "जो यहाँ नानावत् देखता है" "यह सब आत्मा ही है" "यह सब ब्रह्म ही है" "एक ही अद्वितीय" "यह जो कुछ है सब आत्मा है" इत्यादि अनेकों श्रुतियोंसे द्वैतकी असत्यता सिद्ध होती है। |
| सतो ह्युत्पत्तिः प्रलयो वा स्यान्नासतः शशविषाणादेः। नाप्यद्वैतमुत्पद्यते लीयते वा। | उत्पत्ति अथवा प्रलय सत्की ही हो सकती है, शशशृङ्गादि असद्वस्तुकी नहीं हो सकती। इसी प्रकार अद्वैत वस्तु भी उत्पन्न या |