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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

बौद्ध अविद्यादिनिरोधको प्रतिसंख्यानिरोध मानते हैं, इस सम्बन्धमें प्रश्न होता है कि यह निरोध साधनसहित सम्यग्ज्ञानसे होता है या स्वतः। यदि प्रथम पक्ष मान्य है तो निर्हेतुक विनाश स्वीकारका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। यदि निरोध स्वतः माने तो क्षणिक नैरात्म्यादि भावनादिरूप मार्गोपदेश, धर्मदर्शनादि प्रवर्तन, साधनाभ्यासादि व्यर्थ ही होंगे। इसी तरह आकाशको भी निरुपाख्य नहीं कहा जा सकता। वेदादिशास्त्रोंसे आकाशकी उत्पत्ति और वस्तुत्व ज्ञात होता है। शब्दगुणके द्वारा उसका अनुमान भी हो सकता है। जैसे गन्धादिगुण पृथिवी आदिके आश्रित रहते हैं वैसे ही शब्द आकाशके। 'शब्द गुण है जातिमान् होकर स्पर्शरहित होकर बाह्य एक इन्द्रियसे ग्राह्य होनेके कारण गन्धके समान' इस अनुमानके आधारपर सिद्ध होता है कि शब्द गुण है। सामान्यविशेषतया समवायमे शब्दका अन्तर्भाव नही है, क्योकि वे जातिहीन होते हैं। किंतु शब्दके शब्दत्व जाति होनेसे वह जातिमान् है। हेतुका वायुमे व्यभिचार नहीं है। वायु स्पर्शवान् है और यह स्पर्शरहित है। हेतुका दिक्काल आदिसे व्यभिचार नही है, क्योकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें व्यभिचार नहीं है क्योकि हेतुमें एकेन्द्रियग्राह्यत्व विशेषण है, ऐसा हेतु शब्दमे ही है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें नहीं, गन्धत्वजातिमे भी व्यभिचार नही है, यतः यह जातिमान् है और गन्धत्वादि जातिहीन है। गुणत्वसिद्धिके बाद यह भी विचार ठीक है कि शब्द किस द्रव्यका गुण है। वह आत्माका गुण नहीं हो सकता। कारण बाह्येन्द्रिय ग्राह्य है। आत्मगुण इच्छादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य नहीं होते। वह मनका भी गुण नही है, क्योकि मनके भी गुण प्रत्यक्ष नहीं होते। यद्यपि वेदान्तमतमें सुखादि मनके ही गुण होते हैं तथापि वे साक्षिग्राह्य हैं इन्द्रियग्राह्य नहीं। शब्द पृथिव्यादिका भी गुण नहीं है। क्योंकि गन्धादिके साथ शब्दका नियत साहचर्य उपलब्ध नहीं होता। गन्धादिके समान असाधारण इन्द्रियग्राह्य शब्दगुण जिस द्रव्यके आश्रित है वह पञ्चमभूत आकाश ही मान्य होना चाहिये। बौद्ध कहते हैं कि आवरणाभाव आकाश है। परंतु उनका यह कथन ठीक नहीं। एक पक्षीके भी उड़ते समय आवरण हो ही जायगा फिर उड़नेकी इच्छा रखने- वाले दूसरे पक्षीको अवकाश नहीं होना चाहिये। यदि कहा जाय कि जहाँ आवरण नहीं होगा वहाँ दूसरा पक्षी उड़ेगा ? तो यह भी ठीक नहीं, यतः आवरणाभावको जिससे विशेषित किया जायगा वह वस्तुभूत ही रहेगा। अतः आवरणाभावमात्र आवश्यक नहीं। सार यह है कि निषेध्यके निषेधाधिकरणका निरूपण किये बिना निषेधका

७३० मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण हो ही नहीं सकता। इसलिये आवरणाभावाधिकरण वस्तु ही आकाश है। साथ ही आकाश वस्तु नहीं है, यह सिद्धान्त बौद्धके स्वसिद्धान्तके विरुद्ध है। 'पृथिवी भगव. किं संन्निःश्रया' वे इस प्रकारके प्रश्न प्रतिवचन प्रवाहमें 'वायुः किं संन्नि.श्रय.' इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है 'वायुराकाशसन्निश्रयः।' अर्थात् वायुका क्या आश्रय है इस प्रश्नके उत्तरमे कहा गया है कि वायुका आकाश आश्रय है। इस प्रकार आकाशको अवस्तु मानना अभ्युपगमविरुद्ध होगा। इसके साथ ही बौद्ध कहते हैं (अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येत- न्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं च) अर्थात् दोनो निरोध और आकाश यह तीनो निरुपाख्य अवस्तु एवं नित्य है। यह बात परस्परविरुद्ध है। जो अवस्तु है उसमे नित्यता या अनित्यता कुछ भी नही हो सकती। नित्यत्वादि धर्म वस्तुके आश्रित होते हैं। जहाँ धर्म-धर्मिभाव होता है, वहाँ निरुपाख्यता हो ही नही सकती। बौद्ध सब वस्तुको क्षणिक मानता हुआ उपलब्धाको भी क्षणिक ही मानता है। परंतु यदि उपलब्धा भी क्षणिक हो तो अनुभवसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति कैसे बन सकेगी; क्योकि वह तो तभी बन सकती है जब कि उपलब्धि और स्मृतिका कर्ता एक ही हो। अतएव पुरुषान्तरसे अनुभूत विषयमें पुरुषान्तरको स्मृति नहीं होती है। अनुभव करनेवालेको ही अनुभूतकी स्मृति होती है। जबतक पूर्वोत्तरदर्शी एक आधार न हो तबतक 'मैंने उसको देखा, अब इसे देख रहा हूँ, यह व्यवहार नहीं बन सकता। कथञ्चित् समान-सततिमें कार्य- कारणभावसे स्मृति बन भी जाय तो भी यह प्रत्यभिज्ञा तो उपलब्धाके अस्थिर होनेपर बन ही नहीं सकती। दर्शन-स्मरणके एक कर्ता होनेपर ही प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यय होता है 'उसे देखा, इसे देख रहा हूँ, यदि यहाँ दर्शन-स्मरणका कर्ता भिन्न-भिन्न हो तो 'देखा अन्यने और स्मरण मै कर रहा हूँ' ऐसा प्रत्यय होना चाहिये, परंतु ऐसा अनुभव किसीको भी नही होता। जहाँ ऐसा प्रत्यय होता है वहाँ कर्ता अवश्य ही भिन्न-भिन्न होते हैं। मै स्मरण कर रहा हूँ, अमुकने देखा है'। 'अहं स्मरामि, असावद्राक्षीत्।' बौद्ध भी दर्शन स्मरणका एक ही कर्ता समझता है। परंतु जैसे अग्निको अनुष्ण और अप्रकाश नही कहा जा सकता, उसी प्रकार दर्शन-स्मरण-कर्ता आत्मा- को भिन्न नहीं कहा जा सकता। जब उपलब्धामें, भिन्नकारणके दर्शन-स्मरणका सम्बन्ध हुआ तो सुतरा क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य हो जाती है। जन्मसे मरणतककी उत्तरोत्तर प्रतिपत्तियोंकी एककर्तृकता देखता हुआ भी वैनाशिक आत्माको किस प्रकार क्षणिक कह सकता है ? यदि कहा जाय कि सादृश्यके कारण उपलब्धामें एकताकी प्रतीति होती है, तो यह भी ठीक नहीं, कारण 'तेनेदं सदृशम्', 'उसके यह तुल्य है' इस प्रकारकी

सादृश्यबुद्धि तभी हो सकती है जब भिन्नकालवर्ती दो वस्तुका ग्राहक एक हो, यदि पूर्वोत्तर क्षण और सादृश्यका ग्राहक एक स्थिर आत्मा है तो एककी अनेक- क्षणवर्तिता सिद्ध हो गयी फिर क्षणिकत्व-प्रतिज्ञा भङ्ग ही हो गयी । बौद्ध कहता है कि ‘तेनेदं सदृशम्’ यह स्वतन्त्र ही एक विकल्प-प्रत्यय है । विकल्प स्वाकारको ही बाह्यरूपसे निश्चित करता है, वह तत्त्वतः पूर्वोत्तरक्षण तथा उसके सादृश्यका ग्रहण नहीं करता । अतः पूर्वोत्तरक्षणग्रहणनिमित्तक ‘तेनेदं सदृशम्’ यह प्रत्यय नहीं है । इस प्रत्ययसे स्थिर आत्मा नहीं सिद्ध होता, परन्तु यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘तेन, इदं’ इन दोनों पदोंका उपादान होनेके कारण इसे पूर्वोत्तर क्षणग्रहणनिरपेक्ष प्रत्यय नहीं कहा जा सकता । सादृश्य-ज्ञान स्वतन्त्र-ज्ञान होता तो ‘सदृशम्’ इस ढंगसे उल्लेख होना चाहिये था । ‘तेन इदं सदृशम्’ इस प्रकारका उल्लेख तथा वाक्यका प्रयोग नहीं होना चाहिये । यदि बौद्ध नानापदार्थ सम्पृक्त वाक्यार्थबोधक ‘तेनेदं सदृशम्’ इस विकल्पकी प्रथा या प्रतीति मानता है, तो फिर कैसे कह सकता है कि उसमें ‘तेनेदं सदृशम्’ ये नाना पदार्थ नहीं भासित होते हैं । ऐसा कहना तो अपने संवेदनके ही विरुद्ध है । इसके सिवा यदि उसके यह सदृश है, यह एक विकल्प ज्ञान हो तो इसमें ‘तेन इदम्’ इत्यादि नाना आकार नहीं हो सकते थे । क्योंकि एकका नानात्व व्याहत होता है । जब ज्ञानसे अतिरिक्त आकार नहीं है तो आकार नानात्व-ज्ञान नानात्व ही ठहरेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जितने आकार हैं उतने ही ज्ञान हैं, क्योंकि तब तो प्रत्येक आकारमें ज्ञानकी समाप्ति होगी और वे सभी परस्पर वार्तान- भिज्ञ होंगे, फिर ‘नाना’ यह व्यवहार भी न होगा, क्योंकि जब एक ज्ञानसे नाना पदार्थोंकी प्रतीति होती है, तभी नाना यह उल्लेख होता है । इसीलिये ज्ञानसे भिन्न अर्थ मानना चाहिये । तथा च ‘तेन इदं’ इत्यादि नाना आकारवाले ज्ञानकी उपपत्ति स्थायी एक आत्मा माननेसे ही सम्भव है । बौद्ध कहता है कि ज्ञानमें अर्थाकार कल्पित है, अर्थ बाह्य नहीं है और प्रतीतिमात्र भी नहीं है, तथा च उसी कल्पित आकारभेदसे व्यवहार भी उपपन्न होगा । पर यहाँ यह प्रश्न होगा कि वह कल्पित अर्थ ज्ञानसे अभिन्न हैं या भिन्न । तीसरा पक्ष अनिर्वाच्यताका है वह बौद्धको मान्य ही नहीं । यदि भिन्न है तो जैसे ज्ञानसे भिन्न दूसरा ज्ञान अकल्पित होता है, वैसे ही ज्ञानसे भिन्न अर्थाकार भी अकल्पित ही होगा । यदि आकारोंका ज्ञानसे अभेद माना जाय तो उसके समान ही ( ‘तेन इदम्’ इत्यादि पदार्थोंका भी परस्पर अभेद ही हो जायगा । क्योंकि ज्ञानसे अभिन्न सभी आकारोंका परस्पर भी अभेद ही होना है, तथा च इतरेतररूपने प्रसिद्ध पदार्थोंका और ज्ञानसे ज्ञेयके प्रसिद्ध भेदका भी अपलाप हो जायगा । यदि लोकप्रसिद्ध पदार्थोंको परीक्षक स्वीकार न करेंगे तो स्वपक्ष साधन परपक्ष-दूषणके

७३२ मार्क्सवाद और रामराज्य निरूपण करनेपर भी वे किसीकी बुद्धिमें आरूढ़ न होंगे। अतः जो लोकसिद्ध हो वही कहना चाहिये। अन्यथा कथन अनर्गल प्रलाप ही समझा जायगा। एक ही अधिकरणमें परस्पर विरुद्ध दो प्रकारके धर्मोंका अभ्युपगम करनेसे ही विवाद होता है। तभी कोई स्वपक्षका साधन तथा अन्य पक्षको दूषित करता है। यदि विकल्पोंके विषय लोकप्रसिद्ध बाह्य पदार्थ न हो तो यह सब नहीं बन सकता। यदि विकल्पमें भासित होनेवाले नित्यत्व-अनित्यत्वादि ज्ञानाकार ही हैं और ज्ञान भी 'इदं नित्यम्, इदमनित्यम्' इस प्रकारसे दो हैं तो एक आश्रय न होनेसे विवाद ही न उठेगा। आत्मा नित्य है और बुद्धि अनित्य, इस तरह कहनेवालोंमें कभी कोई विवाद ही नही होता। यदि कोई अनित्य शब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ छोड़कर विभु अर्थ माने विभुत्व अर्थमें ही अनित्य शब्दका प्रयोग आत्मामें करे और अन्य कोई लौकिकार्थ नित्यशब्दका आत्मामें प्रयोग करे तो उनका आपसमें विवाद नही हो सकता है। अतः जिसे परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्षकी स्थापना करनी है उसे विकल्पोंका लोकप्रसिद्ध अर्थ एव बाह्य आलम्बन मानना चाहिये। यह प्रासङ्गिक विज्ञानवाद खण्डन आ गया है परन्तु वैभाषिक तथा सौत्रान्तिक बाह्यार्थ मानते हैं। उनके अनुसार यद्यपि बाह्यार्थ क्षणिक एवं निर्विकल्पज्ञानमें भासित होता है, सविकल्पक प्रत्यय तो विकल्परूप है। वही सादृश्यादिरूपसे भासित होता है, अतः बाह्यार्थवादमें विप्रतिपत्ति आदि व्यवहार बन जायगा। तथा च विकल्पोंके विषय ग्राह्य एव अवसेयरूपसे दो प्रकारके होते हैं। ज्ञानका स्वाकार तो ग्राह्य होता है और बाह्यविषय अवसेय होते हैं। उसी अवसेयरूप विषयको लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष- परिग्रह आदि सम्पन्न हो जायँगे। तथापि यह पक्ष भी ठीक नहीं है ? क्योकि यहाँ भी विचारणीय यह है कि विकल्प विषयकी अवसेयता क्या है। यदि ग्राह्यता ही है तो विषयकी द्विविधता नहीं हुई। यदि वह अन्य है तो क्या है ? यदि कहा जाय कि ज्ञानमें उसका स्वाकार ही प्रतिभासित होता है तथापि उसी बाह्यार्थरहित भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थ अध्यवसायसे बाह्यार्थ घटादिमें प्रवृत्ति होती है, अतः भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थका आरोप ही विषयकी अवसेयता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ भी विचारणीय है कि विकल्पाकारका अर्थाध्यवसाय क्या है अर्थात् आन्तर अनभिधेय ज्ञानाकारका तद्विपरीत बाह्याकाररूपसे अध्य- वसाय क्या है ? तद्रूपसे निष्पादन है या सम्बन्ध या उसके आकारसे आरोपण। पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योकि अन्यका अन्यरूपसे निष्पादन असम्भव है। हजारो शिल्पी भी मिलकर घटको पट नहीं बना सकते, फिर आन्तर ज्ञानाकारका बाह्य- रूपमें सम्पादन कैसे होगा। निष्पादनके समान ही आन्तर- का बाह्यसे सम्बन्ध या संयोजन भी नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो भी तो बाह्य अर्थ

मार्क्स और आत्मा ७३३ है इस व्यवहारके विपरीत बाह्य आन्तरसे जुड़ा है यह व्यवहार होना चाहिये । आरोपपक्षमें भी यह विचारणीय है कि गृह्यमाण बाह्यमें आन्तर ज्ञानाकारका आरोप है या अगृह्यमाणमें। यदि गृह्यमाणमें तो भी क्या विकल्पात्मक ज्ञानसे गृह्यमाणमेंया उसी समय उत्पन्न अविकल्पक ज्ञानसे गृह्यमाणमें ? यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि उसमें भी गृह्यमाण बाह्य क्या है स्वलक्षण है या सामान्यरूप है ? विकल्प-प्रत्ययसे स्वलक्षण ( जात्यादिरहित स्वरूपमात्र ) ग्राह्य होता है, यह इसलिये ठीक नहीं कि विकल्प-प्रत्यय तो अभिलापसंसर्ग योग्यको ही विषय करता है जिसके साथ शब्दका शक्तिग्रह हो ही नहीं सकता, ऐसे देशकालाननुगत स्वलक्षणको वह विषय नहीं कर सकता । इसीलिये कहा गया है कि— अशक्यसमयो ह्यात्मा सुखादीनामनन्यभाक् । तेषामतः स्वसंवित्तिर्नाभिजल्पानुषङ्गिणी ॥ अर्थात् विकल्प-प्रत्यय शब्द संसर्ग ग्रह योग्य जाति विशिष्ट वस्तुको ही विषय करता है । क्योंकि शब्दका शक्तिग्रह सामान्यके ही साथ सम्भव है, स्वलक्षणके साथ नहीं, क्योकि देशकालाननुगत होनेसे स्वलक्षण अनन्त होता है । अतः उसमें सङ्गतिग्रह सम्भव नहीं । सुखादि क्षणिक भावोका स्वरूप अननुगत होनेके कारण सङ्गतिग्रहके अयोग्य है । अर्थात् उसमें शब्दका शक्तिग्रह नहीं हो सकता । अतः उनकी असाधारणाकार विषया स्वसंवित्ति अभिजल्पानुषङ्गिणी नहीं होती, किंतु निर्विकल्पक ही होती है । पहले कही हुई रीतिसे जैसे सविकल्प प्रत्ययसे स्वलक्षण-बाह्य नहीं गृहीत हो सकता, वैसे ही सामान्यात्मक बाह्य भी नहीं गृहीत हो सकता । क्योंकि व्यक्ति-ग्रह बिना जातिरूप-सामान्यका ग्रहण सम्भव है। यदि विकल्पसे अगृहीत तत्समय समुद्भूत निर्विकल्प प्रत्ययसे गृह्यमाण बाह्य पदार्थमें विकल्प-प्रत्यय स्वाकार आरोपित करेगा ऐसा कहे तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे रजतज्ञानमे भासित होनेवाले पुरोवर्तीमें रजत- ज्ञान रजतका आरोप नही कर सकता, किंतु 'इदं रजतम्' इस रूपसे रजतज्ञानमे भासित पुरोवर्तीमे ही रजतका आरोप करता है उसी तरह निर्विकल्प प्रत्यय भासित होनेपर भी बाह्य पदार्थ यदि विकल्प-प्रत्ययमे भासित नही होता तो उसमे वह स्वाकारका आरोप नहीं कर सकता । अर्थात् विकल्पसे अगृहीत एव विकल्प समयोद्भूत अविकल्पसे गृहीत बाह्यमें विकल्प साकारका आरोप नहीं कर सकता। यदि बाह्य गृह्यमाण नहीं है तो अधिष्ठानके ग्रहण बिना आरोप्यमात्र प्रतीत हो सकता है किंतु आरोप नहीं हो सकता। इस तरह अधिष्ठानका प्रतिभास असम्भव होनेसे बाह्यमे ज्ञानस्वरूपका आरोप नहीं हो सकता है। इसी तरह आरोप्यका स्फुरण भी असम्भव होनेसे आरोप नहीं बन सकेगा। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या यह विकल्प जब स्वसंवेदन सत् विकल्पको बाह्यरूपसे आरोप करता है तब पहले वस्तु सत्-स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात्

७३४ मार्क्सवाद और रामराज्य आरोप करता है, अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है ? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है, क्रमरहित है फिर उसमें क्रमवर्ती ग्रहण और आरो- पण कैसे सम्भव हो सकता है ? इसलिये दूसरा पक्ष ही सम्भव है कि जिस समय ही अर्थशून्य आकारका ग्रहण करता है उसी समय स्वसंवेदन-स्वाकारको बाह्य अर्थरूपमे आरोपण करता है, परंतु यह भी असंगत है; क्योकि विकल्पका अपना स्वाकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष होनेसे अत्यन्त विशद है, बाह्य अर्थ आरोप्यमाण होनेसे अविशद है । अतः आरोप्य बाह्यको विशद स्वाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । अतः विकल्पका स्वाकार ही बाह्यरूपमे आरोपित है यह पक्ष नही बन सकता, अर्थात् जब समकालमे ही स्वाकारग्रहण एव बाह्यत्वेन आरोपण माना जाय तो सोचना होगा कि यहाँ आरोप क्या है । स्वाकार और बाह्यका ऐक्यस्फुरण ही आरोप है अथवा— अख्यातिमतके समान विवेकाग्रहमात्र आरोप है । पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योकि स्वाकार-स्वप्रकाश बाह्यपर प्रकाश है । अतः उनका भेदावभास स्फुट है फिर ऐक्य- स्फुरण किस तरह सम्भव है । अतः बाह्यको ज्ञानाकारसे भिन्न ही होना चाहिये । दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; भेदाग्रहमात्रको भी समारोप नही कहा जा सकता; क्योकि वैशद्य अवैशद्यरूपसे उनका भेद स्पष्ट ही है । यदि कहा जाय कि बाह्य अगृह्यमाण है तो भी गृह्यमाण आन्तर स्वलक्षणसे उसका भेद अगृहीत है, इसीलिये बाह्यमे प्रवृत्ति होती है । फिर तो यह भी कहा जा सकता है कि त्रैलोक्यसे ही ज्ञानके स्वाकारका भेदाग्रहण होनेसे जहाँ कही भी प्रवृत्ति हो जायगी । इस तरह परमार्थ ज्ञानाकारका बाह्य वस्तुरूपसे आरोप असम्भव ही है । इसी तरह वासनापरिप्रापित कल्पित ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें आरोप होता है यह भी नही कहा जा सकता; क्योकि वह भी स्वप्रकाशज्ञानरूप है । अतः उसका भी बाह्यसे भेद प्रसिद्ध ही है । इस तरह आन्तर एव बाह्य स्थिर पदार्थोंको बिना स्वीकार किये कोई भी व्यवहार नही बन सकता । फलतः सादृश्यमूलक भी प्रत्यभिज्ञा आदि व्यवहार नहीं बन सकते । क्योकि उनमे 'तेनेदं सदृशम्' सादृश्यका ऐसा आकार होता है और 'तदेवेद' यह वही है ऐसा प्रत्यभिज्ञाका व्यवहार होता है । यद्यपि यहाँ कहा जाता है कि जैसे दीपज्वाला या नदी प्रवाह आदिमें सादृश्यबुद्धि न होनेपर भी सादृश्यके कारण ही 'सैवेय धारा, सैवेय ज्वाला' यह वही धारा है यह वही ज्वाला है इत्यादि- रूपसे प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) होती है । वैसे ही विज्ञानधारामे भी सादृश्यके कारण ही 'सोऽहम्' इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा बन जायगी । परतु यह ठीक नहीं, कारण, कदाचित् बाह्य वस्तुमे विनम्रके कारण यह उसके सदृश अन्य है या वही है इस प्रकारका सदेह हो भी जाय, परतु स्वप्रकाश-संवेदनरूप आत्मामे 'मै वही हूँ या

तत्सदृश अन्य हूँ' इस प्रकारका संशय सर्वथा असम्भव है । जिसे मैंने कल देखा था वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ यहाँ निश्चित ही आत्माकी एकता प्रत्यभिज्ञात होती है । जो अपनेको पहचाननेके लिये अपने आपको विशिष्ट प्रकारके चिह्नसे अङ्कित करता है जनसाधारण भी उसकी बुद्धिपर तरस खाते हैं । बौद्ध स्थिर-अन्वित कारण नहीं मानते सुतरा उनके यहाँ अभावसे ही भावोत्पत्तिका प्रसङ्ग आ जाता है । क्षणिक कारणवादी बौद्धसे यह प्रश्न होता है कि वह कारण सापेक्ष है या निरपेक्ष ? पहले पक्षकी असङ्गति पीछे कही जा चुकी, दूसरा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निरपेक्ष क्षणिक बीजादिसे यदि अङ्कुरादि उत्पन्न हो तब तो किसान आदिका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा । क्षणिक कारणोंमें उपकार भी सम्भव नहीं होता । निरपेक्षताका निषेध होनेसे सापेक्षता ही आयगी । क्योंकि कोई प्रकारान्तरसम्भव नहीं । अस्थिर भावसे भावकी उत्पत्ति हो नहीं सकती, इसलिये क्षणवादमें अर्थतः— अभावसे ही भावकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है । बौद्ध स्पष्टरूपसे अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं । 'नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्' बीजका उपमर्द (विनाश) हुए बिना अङ्कुरकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती । किंतु विनष्ट बीजसे ही अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है । विनष्ट क्षीरसे दधि एव विनष्ट मृत्पिण्डसे घटादिकी उत्पत्ति होती है । यदि कूटस्थ स्थिर कारणसे कार्यकी उत्पत्ति हो तो अविशेषात् सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अत अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है इस पक्षका खण्डन करते हुए भगवान् व्यासने कहा है 'नासतोजदृष्टत्वात्' अर्थात् अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो अभावत्वाविशेषात् कारणविशेषमे कार्यविशेषकी उत्पत्तिका सिद्धान्त व्यर्थ होगा । उपमृदित बीजोंके अभावमे और शशविषाणादिमें यदि निःस्वभावता समान ही है तो भेद क्या है ? फिर क्या कारण है कि बीजसे ही अङ्कुर उत्पन्न हो, क्षीरसे ही दधि हो । यदि निर्विशेष अभावसे कार्य उत्पन्न होता तो शशविषाण आदिसे भी अङ्कुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये । पर ऐसा देखा नहीं जाता । यदि कमलादिमें नीलत्वादिके तुल्य अभावमे कोई विशेष माना जाय तो कमलादिके ही तुल्य अभाव भी भाव ही ठहरेगा । इस प्रकार अभाव किसी भावकी उत्पत्तिका कारण नहीं सिद्ध होता । बौद्धोंके अभावकारणवादका सार यह है कि यदि कूटस्थ कारणका कार्यो- त्पादन स्वभाव है तब तो जितना कार्य करता है उसे सहसा एक क्षणमे ही सब कार्य उत्पन्न कर देना चाहिये । क्योंकि समर्थकालक्षेप नहीं कर सकता है । यदि कहा जाय कि समर्थ भी क्रमयुक्त सहकारियोंकी अपेक्षासे ही क्रमेण कार्य उत्पन्न करना है तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि यहाँ प्रश्न होगा कि क्या सहकारीमूलकारणमें

७३६ मार्क्सवाद और रामराज्य किसी उपकारका आधान करते हैं या नही । यदि नहीं तो अनुपकारक सहकारियों- की अपेक्षा ही क्यों होगी । यदि आधान करते हैं तो वह उपकार मूल कारणोंसे भिन्न होता है या अभिन्न ? यदि अभिन्न तो यह सिद्ध हुआ कि सहकारियोंद्वारा आहित उपकार मूल- कारणसे अभिन्न है, अर्थात् मूलकारणरूप ही है । इस तरह सहकारियोंद्वारा उत्पन्न उपकारस्वरूप मूलकारण टस्थ कैसे रह सकता है । उच्छूनता या उपमर्द आदि ही सहकारियोंद्वारा किया उपकार है । यदि सहकारिकृत उपकार कारणसे भिन्न है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उपकारके होनेपर कार्य होता है उसके न होनेपर कार्य नहीं होता । भले ही कूटस्थ विद्यमान रहे तब तो उपकार ही कार्यकारी सिद्ध होता है । कूटस्थ कारण कार्यकारी सिद्ध नही होता इसीलिये कहा गया है कि:— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्येव तयोः फलम् । चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्यः खतुल्यश्चेदसत्फलम् ॥ अर्थात् वर्षा एव आतपका प्रभाव चर्ममें होता है आकाशमें नहीं । यदि कारण चर्मके तुल्य है तो उसे विकारी और अनित्य मानना ही पड़ेगा । यदि आकाशके तुल्य है तब कार्यकारी ही नहीं होगा । यदि अकिञ्चित्कर कूटस्थ कारणसे कार्य उत्पन्न हो तब तो सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये । परंतु बौद्धका यह कथन बिना विचारे ही अच्छा जँचता है, विचार करनेपर सर्वथा निःसार है । अभावसे भावोत्पत्तिके सम्बन्धमें दूषण कहे जा चुके हैं । वस्तुतः स्थिर कारण ही सहकारीके समवधानसे क्रमेण कार्यकारी होता है । स्थिरमें ही उपकार हो सकता है । क्षणिकमें न उपकार ही होता न उसका ज्ञान ही हो सकता है । यदि क्षणिक पदार्थोंमें उपकार्योपकार्य भाव माना जाय तो प्रश्न होगा कि वह क्षणिक पदार्थ अन्यकृत उपकार का आश्रय होता है या नहीं ? पहला पक्ष असम्भव है क्योकि जो वस्तु पहले अनुपकृत होकर पीछे उपकारसे सम्बन्धित हो वही उपकृत रूपसे जानी जा सकती है । उपकृत पदार्थ एवं उसका ज्ञाता दोनो ही स्थायी हों तभी वस्तुमें उपकृतत्व एवं ज्ञाताको उसका ज्ञान हो सकता है । यदि प्रथम अनुपकृतत्वका ज्ञान न हो तो उपकार वस्तुका स्वाभाविक धर्म समझा जा सकता है । सहकारियोंद्वारा कारणमें उपकार होता है, किंतु वह उपकार मूलकारणसे न भिन्न होता है न अभिन्न, किंतु अनिर्वाच्य होता है । इसीलिये उससे उत्पन्न कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है । इसीलिये अनिर्वाच्य मायोपहित कूटस्थ ब्रह्म विश्वका कारण माना जाता है । घट मृत्तिकासे भिन्न नहीं है, क्योकि अन्वयव्यतिरेकसे मृत्तिकासे भिन्न घटका उपलब्ध नहीं होता । अभिन्न भी नहीं है क्योकि मृत्तिकासे जलानयनादि कार्य

मार्क्स और आत्मा ७३७ नहीं होता, घटसे ही होता है, अतः वह अनिर्वाच्य ही है। फिर भी स्थिरको अकारण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अनिर्वचनीय शक्ति विशिष्ट मृत्तिकादि उपादान रूपसे स्थिर ही कारण होता है। उसीसे अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न होता है। इसीलिये श्रुति भी कारणको ही सत्य और कार्यको मिथ्या कहती है (वाचा- रम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्) जैसे रज्जु सर्पभ्रममें स्थिर रज्जु उपादान है, वैसे ही स्थिर कारण ही कार्यका उपादान होता है। जो लोग सर्वतो विलक्षण स्वलक्षणको ही सत् मानते हैं उनके यहाँ यह विचारणीय है कि क्यों बीज जातियोसे अङ्कुर जातियोंकी ही उत्पत्ति होती है। क्रमेलक (उष्ट्र) जातियों- की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ? जैसे बीजसे बीजान्तर विलक्षण है, वैसे ही क्रमेलक (उष्ट्र) भी विलक्षण है, विलक्षणतामें कोई भेद नहीं है। बीजत्व, अङ्कुरत्व, सामान्य जाति भी परमार्थ सत् नहीं है। इसीलिये इनका कार्यकारणभाव भी परमार्थ नहीं है। अतएव काल्पनिक स्वलक्षण बीजजातीय उपादानसे काल्पनिक ही अङ्कुरजातीय कार्यकी उत्पत्तिका नियम है यह मानना पड़ेगा। बौद्धसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि व्यक्तियोंका ही कार्य-कारणभाव होता है या सामान्य (जाति) का भी अथवा सामान्योपहित व्यक्तियोंका ? यदि व्यक्तियोंका कार्य कारणभाव हो तो व्यक्ति अनन्त होते हैं सबका ज्ञान असम्भव है। उनमें कार्य-कारणभावकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती। फिर कार्यहेतुक अनुमान ही लुप्त हो जायगा। क्योंकि अनुमान सदा ही सामान्योपाधिमें प्रवृत्त होता है। यदि सामान्योंका ही कार्य-कारणभाव माने तो भी प्रश्न होगा कि बीजत्व, अङ्कुरत्व आदि सामान्य वस्तु सत् हैं कि असत् ? पहला पक्ष बौद्धको मान्य नहीं है साथ ही वस्तुओंका कार्य-कारणभाव भी विरुद्ध है। क्योंकि बौद्ध अर्थक्रियाकारिताको ही सत्य मानता है फिर जो कारण है वह असत् कैसा ? यदि अवस्तुभूत सामान्यसे उपहित सत् स्वलक्षण वस्तुका कार्य-कारणभाव माना जाय तो जैसे काल्पनिक बीजत्व सामान्योपहित स्वलक्षण बीजसे अङ्कुरत्व जातीयकी उत्पत्ति मानी जा सकती है उसी तरह अनिर्वचनीय शक्ति उपहित कूटस्थ कारणसे अनिर्वचनीय कार्यकी उत्पत्ति होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती। उसी तरह काल्पनिक उपकारसे काल्पनिक कार्यकी उत्पत्ति वेदान्त सिद्धान्तमे उपपन्न होती है। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति मानी जाय तो सभी कार्योंको अभावान्वित होना चाहिये। परन्तु ऐसा देखा नहीं जाता। सभी कार्य अपने भावरूपसे अन्वित ही देखे जाते हैं। मृत्तिकासे अन्वित घटादिभाव मृत्तिकाके ही विकार माने जाते हैं तन्तुविकार नहीं। उसी प्रकार भावान्वित विकारोंको भी अभावका विकार नहीं माना जा सकता। यह कहना सङ्गत नहीं है कि स्वरूपो- मा० आ० ४७--

७३८ मार्क्सवाद और रामराज्य पमर्द्द बिना किसी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं होती । अतः कूटस्थ किसी कार्यका कारण नहीं हो सकता । इसलिये अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है क्योंकि स्थिर स्वभाववाले एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात सुवर्णादि ही कटकादिके कारण देखे जाते हैं । उपमर्द तो पूर्व अवस्थाका होता है । उपमृदित पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है । किंतु अनुपमृदित अन्वयी बीजावयव ही अङ्कुरादिके कारण होते हैं । कारणमें युगपत् अनेक अवस्था नहीं रह सकती । इसीलिये अङ्कुरावस्थाको लानेके लिये बीजावस्थाको हटना पड़ता है । घटावस्था लानेमें पिण्डावस्थाको भी हटना पड़ता है । अतएव बीजावस्था या पिण्डावस्था अङ्कुरादिके कारण नहीं है । किंतु बीजादिके अवयव ही कारण हैं । अतएव उन्हीका कार्यमें अन्वय है अवस्थाका अन्वय नहीं । शशविषाणादि असत्से उत्पत्ति नहीं होती ! सुवर्णादि सत्से ही उत्पत्ति होती देखी जाती है अतः अभावसे भावोत्पत्तिका सिद्धान्त सर्वथा असङ्गत है । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो प्रयत्नहीन लोगोंकी भी अभीष्ट- सिद्धिमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये । क्योंकि अभावरूपी साधन तो सबको सुलभ है । कृषकको बिना प्रयत्न ही व्रीहि-यवादिकी प्राप्ति होनी चाहिये । कुलालको भी प्रयत्न बिना ही घटादिकी निष्पत्ति होनी चाहिये । तन्तुवायके प्रयत्न बिना ही वस्त्रकी प्राप्ति होनी चाहिये । शिल्पियोंके प्रयत्न बिना ही विविध प्रकारके यन्त्रोंका निर्माण हो जाना चाहिये । स्वर्ग-अपवर्गके लिये भी किसीको कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिये । पर यह सब सङ्गत नहीं । विज्ञानवादी योगाचारका कहना है कि बाह्यार्थवादमें बुद्धका तात्पर्य नहीं था। कुछ शिष्योंका बाह्यार्थमें अभिनिवेश देखकर ही उन्होंने पञ्चस्कन्धका निरूपण किया है । वस्तुतः विज्ञानमात्र एक ही स्कन्ध बुद्धको अभीष्ट था । कहा जा सकता है कि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति—ये चार प्रकारके तत्त्व होते हैं । इनमेंसे एकके अभावमें भी तत्त्वका व्यवस्थापन नहीं बन सकता । अतः विज्ञानमात्रको तत्त्वसिद्ध करनेके लिये प्रमात्रादितत्त्व चतुष्टय मानना ही पड़ेगा । फिर जब, चार वस्तुएँ माननी ही पड़ीं तो विज्ञानमात्र वस्तु है यह कैसे कहा जा सकता है । परंतु विज्ञानवादीका कथन है कि यद्यपि विज्ञानरूप अनुभवसे भिन्न अनुभाव्य, अनुभविता एव अनुभवन कुछ भी नहीं है । तथापि बुद्धिकल्पितरूपसे विज्ञानमें प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति आदिका व्यवहार बन जाता है । असत्य आकारयुक्त विज्ञानका स्वरूप प्रमेय है । प्रमेय प्रकाशन प्रमाण फल है । प्रकाशन शक्ति ही प्रमाण है । बाह्यार्थवादमें भी बुद्ध्यारोहके बिना प्रमाणादि व्यवहार नहीं बन सकता । यदि प्रमाण और फलके भिन्न अधिकरण हो तो प्रमाण फलभाव हो ही नहीं सकता ।

मार्क्स और आत्मा ७३९ इसीलिये खदिर गोचर परशु व्यापार होनेसे भी पलाशमें द्वैधीभाव ( टुकड़ा ) नहीं होता जिसमें व्यापार होता है उसीमें फल होता है। उसी तरह प्रमाण (करण) और प्रमिति फल दोनोंका एक ही अधिकरण होनेपर ही करण फलभाव हो सकता है। यद्यपि परशु स्वावयवोंमें समवेत है और द्वैधीभाव खदिरमें समवेत है तथापि व्यापाराविष्ट करणीभूत परशु संयोग सम्बन्धसे खदिरमें रहता है और द्वैधीभाव भी खदिरमें है ही। इस तरह करणफलका एकाधिकरण्य सामानाधिकरण्य ही है, इसी तरह एक ज्ञानमें ही प्रमाणफलभाव मानना ठीक है। अब यहाँ विचार करना होगा कि ज्ञानमें प्रमाण और फल कैसे सम्भव होंगे। जैसे कुण्डमें बदर ( बेर ) की अवस्थिति होती है, उसी तरह क्या ज्ञानमे प्रमाण और फलका अवस्थान हो सकता है ? कहना होगा कि ज्ञान असंयोगी वस्तु है, अतः उसमें संयोग-सम्बन्धसे प्रमाण और फल नहीं रह सकते, किंतु तादात्म्य या अभेद सम्बन्धसे ही ज्ञानमे उनकी स्थिति कहनी पड़ेगी। यदि वस्तुतः प्रमाण और फल ज्ञानसे भिन्न हों तो उनका ज्ञानके साथ एकता या तादात्म्य असम्भव ही है। अतः ज्ञानमें ही कल्पित प्रमाण फलभाव मानना ठीक है। यदि प्रमाण और फल दोनो ही ज्ञानके अश हों तभी प्रमाण और फल ज्ञानस्थ हो सकते है । परंतु ज्ञान स्वलक्षण ( सर्वविशेषरहित ) अनंश होता है, अतः उसमें वस्तु सत्प्रमाण और फल नहीं रह सकते, वही ज्ञान अज्ञान व्यावृत्ति या अज्ञानापहाररूपसे फल है वही अशक्ति व्यावृत्तिरूप आत्मस्वरूप अनात्म बाह्यार्थ प्रकाश शक्तिरूपसे प्रमाण है। ज्ञानका ही बाह्याकार बाह्य घटादि पदार्थ है। वैभाषिकोंके यहाँ बाह्य अर्थ प्रत्यक्ष होता है और सौत्रान्तिकोंके यहाँ ज्ञानगत आकारके वैचित्र्यसे बाह्यार्थका अनुमान होता है। ज्ञानमे जो बाह्य नीलादि सारूप्य भासमान होता है वह अनीलाकारका अपोहरूप ही है, वही बाह्यार्थका व्यवस्थापन करता है जैसे कि प्रतिबिम्ब बिम्बका व्यवस्थापन करता है। इस दृष्टिसे ज्ञान ही बाह्यार्थ व्यवस्थापक होनेके कारण प्रमाण है। अज्ञान ( अर्थात् ज्ञानभिन्न अन्य ) की व्यावृत्तिरूपसे ज्ञानत्व सामान्य ही प्रमाण फल है क्यो

७४० मार्क्सवाद और रामराज्य सकता। क्योकि बाह्यार्थ असम्भव है। यहाँ यह विचारणीय है कि क्या बाह्यार्थ घटादि परमाणुरूप ही हैं या परमाणुसमूह ? परमाणुघटादि प्रत्ययके आलम्बन नही हो सकते; क्योकि व्यवहारमे एक और स्थूल घटाद्याकाराभास ज्ञान होता है परम सूक्ष्म परमाण्वाभास ज्ञान नहीं होता। अन्याभास ज्ञान अन्यको विषय नही कर सकता। अतः एक घटाद्याभास ज्ञान अनेक परम सूक्ष्म परमाणुओको विषय नहीं कर सकता। यदि ऐसा नहीं माने तो घटाभास ज्ञानके सर्वगोचर होनेसे सर्वज्ञतापत्ति हो जायेगी। इसलिये एक-एक परमाणु घटादि प्रत्ययका परिच्छेद्य नही हो सकता है। परमाणु समूह भी घटादिप्रत्यय परिच्छेद्य नहीं बन सकते, क्योकि समूहका समूहियोसे भिन्न या अभिन्नरूपसे निरूपण नहीं हो सकता। अभिन्न कहे तो पूर्वोक्त दोष ही होगा भिन्न कहे तो समूहियोके पृथक् हो जानेपर भी उसकी सत्ता रहनी चाहिये, भिन्न होनेपर भी दोनो किसी सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि हैं तो कौन सम्बन्ध है समवाय सम्बन्ध कहे तो वह समवायियोसे सम्बन्धित हैं या नहीं ? यदि नही तो वह स्वयं असंबद्ध दूसरोको कैसे सम्बन्धित करेगा। यदि स्वयं सम्बन्धान्तरसे सम्बन्धित है तो वह सम्बन्ध सम्बन्धान्तर सापेक्ष होगा इस तरह अनवस्था प्रसङ्ग होगा। यह भी विचारणीय है कि घटादिगत स्थूलत्वादि प्रतिभासमान ज्ञानका धर्म हे अथवा प्रतिभासकालमे प्रतिभासित अर्थका। यदि पहली बात मान्य है तो ज्ञान- स्वांशका ही अवलम्बन करता है। अतः ज्ञानभिन्न अर्थ नही है यह पक्ष स्वीकृत हो गया, यदि कहा जाय कि रूपपरमाणु ही निरन्तर (मिलकर) एक विज्ञानके विषय होकर स्थूलरूपसे भासित होते हैं ऐसा माननेमे भ्रान्तिको भी कोई स्थान नही। वे परमाणु नहीं हैं यह तो नही कहा जा सकता। इसी तरह वे सम्मिलित नही हैं यह भी नही कहा सकता। एक विज्ञानोपारोही (एक विज्ञानके विषय) नहीं है यह भी नहीं कहा सकता, अतः भले ही नीलत्वादिके तुल्य स्थूलत्व परमाणु- का धर्म न हो क्योकि नीलत्वादिकी तरह वह प्रत्येक परमाणुमें नही है परंतु प्रतिभासदशापन्न परमाणुओका स्थूलत्वादि बहुत्वदिके समान सांवृतिक (मायिक) धर्म हो सकता है। ग्रहेऽनेकस्य चैकेन किञ्चिद्रूपं हि गृह्यते। साम्प्रतं प्रतिभासस्थ तदेकात्मन्यसंभवात् ॥ १ ॥ न च तद्दर्शनं भ्रान्तं नानावस्तुग्रहाद्यतः। सांवृतं ग्रहणं नान्यत् न च वस्तुग्रहो भ्रमः ॥ २ ॥ अर्थात् एक ज्ञानसे अनेक परमाणुओका ग्रहण होनेपर सांवृत स्थूलरूप भासित होता है। विशकलित परमाणुतत्त्वको स्थूल बुद्धि ढक देती है इसीलिये वह सांवृति है, एक-एक परमाणुओमे स्थूल बुद्धि असम्भव है, इस तरह स्थूल दर्शनको भ्रान्त नही कहा जा सकता। क्योकि नाना वस्तु परमाणु उसके विषयमे हैं ही। जो

भिन्न बुद्धिसे गृहीत होते हैं वे ही मिलित होकर एक बुद्धि गृहीत होकर स्थूलता- कारसे प्रतिभासित होते हैं । विज्ञानवादी वाह्यार्थवादीके इस पक्षका भी खण्डन करता है और कहता है कि परमाणुओमें नैरन्तर्यकी प्रतीति भ्रान्ति ही है क्योकि रूप परमाणु गन्ध, रस, स्पर्श, परमाणुओंसे व्यवहित ही हैं अव्यवहित (निरन्तर) नही, जैसे दूरसे देखने- पर व्यवधानयुक्त अनेक वृक्षोंमें भी एक सघन वन प्रत्यय होता है। उसी तरह सान्तर व्यवहित परमाणुओमे स्थूल प्रत्यय भ्रान्ति ही है। इस घटादि प्रत्यय 'पीतः शंखः, इस ज्ञानके तुल्य भ्रान्ति ही है अतः परमाणु घटादि प्रत्ययके विषय नही हो सकते । कुछ लोगोका कहना है कि स्थूल प्रत्यय स्वलक्षण विषयक है अतः निर्विकल्पक प्रत्यय होनेसे भ्रान्त नहीं है। सविकल्प प्रत्यय अवस्तुभूत सामान्यविषयक होनेसे भ्रान्त होता है । परतु यह ठीक नहीं क्योकि यद्यपि 'स्थूलम्' यह ज्ञान व्यक्ति ज्ञान है व्यक्तिमे सम्बन्ध ग्राह्य होनेसे वह शब्द वाच्य भी नहीं है तो भी पूर्वोक्त युक्तिसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्त है। अतः वह प्रत्यय नही 'कल्पनापोढमभ्रान्त प्रत्यक्षम्' यही प्रत्यक्षका लक्षण है अभिलापादि कल्पनारहित कल्पना पाठ होनेपर भी वह अभ्रान्त नही है। इस तरह यदि परमाणुसमूह घटादि परमाणुओंसे अभिन्न है तो परमाणु स्वरूप ही होनेसे वे घटाद्याभास प्रत्ययके गोचर नहीं हो सकते । यदि भेद है तो गवाश्वादिके समान अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनमे तादात्म्य नही बन सकता । समवायसम्बन्ध भी निराकृत ही है। इसी तरह जाति-गुण-कर्मादिका भी प्रत्याख्यान किया जा सकता है। जो जो प्रतिभासित होता है वह-वह विचारा सह है। अप्रतिभासमानके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है। अतः कोई भी प्रत्यय बाह्यालम्बन नहीं होते हैं। विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नही कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वय विलीन (अज्ञात) रहकर ही अर्थका प्रकाशन करेगा । यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे इन्द्रिय अर्थ विषयक ज्ञान उत्पन्न करती है वैसे ही ज्ञान भी किसी अन्य ज्ञानको उत्पन्न करेगा क्योकि इस तरह समान होनेसे वह ज्ञान भी ज्ञानान्तर जनन करेगा तो अनवस्था प्रसङ्ग होगा । यह भी नही कहा जा सकता कि ज्ञान अर्थमें प्राकट्य लक्षण फलका आधान करेगा, क्योकि अतीत अनागत विषयोमें अविद्यमानताके कारण प्राक्स्वरूप फलका आधान हो ही नहीं सकता, इसलिये यह मानना चाहिये कि ज्ञानस्वरूपकी प्रत्यक्षता ही अर्थकी प्रत्यक्षता है वह ज्ञान अनाकार होनेसे स्वभावतः भेदरहित है फिर उसके द्वारा अर्थभेद व्यवस्था कैसे हो सकती है ? अतः अर्थभेद व्यवस्थाके लिये ज्ञानमे आकारभेद भी स्वीकार करना आवश्यक है। पीछे कहा जा चुका है कि 'वित्तिसत्ता ही अर्थवेदन नहीं हो

७४२ मार्क्सवाद और रामराज्य सकती इत्यादि, परंतु आकार एक ही अनुभूत होता है । यदि यह विज्ञानका आकार है तो अर्थ सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं सिद्ध होता । एक रूपसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानोंमेंसे घटज्ञान, पटज्ञान आदि रूपसे प्रति- विषयोमे पक्षपात प्रतीत होता है, वह ज्ञानगत विशेषके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; अतः ज्ञानमें विषय-सारूप्य मानना चाहिये । यदि ज्ञानमे विषयसारूप्य मान लिया गया तो ज्ञानकी विषयाकारता ज्ञानसे ही अवरुद्ध है फिर बाह्यार्थ सद्भावकी कल्पना व्यर्थ ही है। इसी तरह सहोपलम्भ नियमसे भी विषय और ज्ञानका अभेद मालूम पड़ता है, इनमेसे एकके उपलम्भ हुए बिना दूसरेका उपलम्भ नही होता । यदि ज्ञान और अर्थका स्वाभाविक भेद हो तो यह नियम नही बन सकता घट-पट आदि भिन्न हैं तो उनमे सहोर्पालम्भका नियम नही होता है। मृत्तिका और घटमें सहोपलम्भका नियम होता है अतः मृत्तिकासे भिन्न घटकी सत्ता नही होती । यही स्थिति ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । जिसका जिसके साथ नियमेन सहोपलम्भ होता है वह उससे भिन्न नही होता । जैसे एक चन्द्रसे भ्रान्ति सिद्ध द्वितीय चन्द्रका भेद नही होता उसी तरह ज्ञानके साथ अर्थका सहोपा- लम्भ नियत है । भिन्न-भिन्न घट-पटको एव दो अश्विनीकुमारोका भी ऐसा सहोपलम्भ नियम नही होता, अपितु पृथक् भी उनका उपालम्भ होता है। बादलसे एकके ढके रहनेपर भी दूसरा दीखता है। इस तरह भेद व्यापक अनियमके विरुद्ध सहो- लम्भ नियम तद् व्याप्यभेदको निवृत्त कर देता है, यही विज्ञानवादियोका सिद्धान्त निम्नकारिकासे व्यक्त होता है। सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः । भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये ॥ अर्थात् सहोपलम्भके नियमसे नीलज्ञेय और नीलज्ञानका अभेद ही है । भ्रान्तिके कारण भेद उसी तरह प्रतीत होता है जैसे अद्वितीय चन्द्रमें चन्द्रका भेद प्रतीत होता है । जैसे स्वप्न, माया, रज्जु, सर्प तथा गन्धर्व नगरादि प्रत्यय बाह्यार्थ- के बिना ही ग्राह्य-ग्राह्याकार होते हैं, वैसे ही जागरितकालके घटादि-प्रत्यय भी बाह्यार्थ बिना ही ग्राह्य-ग्राह्यकाकार होते हैं । क्योकि सभीमें प्रत्ययत्व समान है। अर्थात् जो-जो प्रत्यय है वह सभी बाह्यार्थशून्य है । किसीका भी बाह्यार्थ आलम्बन ( विषय ) नही होता है । प्रत्ययत्व स्वभाव ही इसमें हेतु है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्त्वादिमात्रानुबन्धिनी वृक्षता होती है, उसी प्रकार प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी बाह्यानालम्बनता रहती है । जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि जहाँ हैं वहाँ वृक्षता होती ही है, उसी तरह प्रत्ययत्व जहाँ है वहाँ निरालम्बनता है ही । इसी तरह प्रत्ययत्व हेतुसे ही स्वप्नादि प्रत्ययोके समान ही घटादि प्रत्ययकी निरालम्बनता सिद्ध होती है ।

उस सम्बन्धमें सौत्रान्तिक कहता है कि बाह्यार्थ न रहनेसे घटादि प्रत्ययोंमें विचित्रता किसी तरह उपपन्न नहीं हो सकती है, अतः बाह्यार्थका स्वीकार करना आवश्यक है। इस विषयमें निम्न अनुमान किया जा सकता है जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं वे तद्भिन्न हेतुकी अपेक्षा रखते हैं जैसे मुझमें आलय-विज्ञान जिगमिषा (गमनेच्छा) विवक्षा (भाषणेच्छा) न रहनेपर भी जब वचन, गमन प्रतिभास प्रत्यय होता है तो उन्हें मेरेसे भिन्न पुरुषान्तर संतान-सापेक्ष मानना पड़ता है। इसी तरह 'अहं अहम्' उस रूपसे उदीयमान आलय विज्ञानसे जायमान शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और सुखादि प्रत्यय कादाचित्क होते हैं, ये छहों अर्थ प्रकृतिके हेतु होनेसे प्रवृत्ति विज्ञान कहे जाते हैं। ये आलय विज्ञानके रहनेपर भी कभी ही होते हैं, अतः ये भी ज्ञानातिरिक्त हेतुसे उत्पन्न होने चाहिये । जो आलय-विज्ञान संताना- तिरिक्तका कादाचित्क प्रवृत्ति विज्ञान विशेषका हेतु है वही बाह्यार्थ है। यहाँ विज्ञान- वादी कहता है कि वासनापरिपाक प्रत्ययके कादाचित्क होनेसे प्रवृत्ति विज्ञानका बाह्यार्थ- निरपेक्ष ही कादाचित्क उत्पाद बन जायगा । क्योंकि विज्ञानवादके अनुसार एक संतानवर्ती आलय-विज्ञानोंकी प्रवृत्ति विज्ञान जनन-शक्ति ही वासना है, उस शक्तिका स्वकार्य जननाभिमुखता ही परिपाक है। स्वसंतानवर्ती पूर्व क्षण ही उस परिपाकका प्रत्यय हेतु है। अर्थात् प्रवृत्ति-विज्ञानजनक आलय-विज्ञानसे पूर्व उसी आलय- विज्ञान संतानमें जब कभी उत्पन्न नीलादि प्रत्यय ही वासना परिपाकका हेतु (प्रत्यय) है। विज्ञानवादीके अनुसार स्वसंतानपतित नील प्रत्ययक्षण ही उत्तरवर्ती वासना परिपाकका हेतु माना जाता है। सर्वज्ञादि संतानवर्ती क्षण वासना परिपाकका कारण नहीं होता इस पर सौत्रान्तिकका कहना है कि प्रवृत्ति विज्ञानजनक आलय-विज्ञानवर्ति- वासना परिपाकके प्रति आलय विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंको हेतु कहना चाहिये अन्यथा किसी भी क्षणको हेतु नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सभी क्षण संतानान्तःपाती हैं फिर क्या कारण है कि कोई क्षण वासना परि- पाकका हेतु बने और कोई न बने। यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि क्षणभेदसे शक्तिमें भेद होता है। इस प्रकार आलय विज्ञान संतानवर्ती क्षणोंमें भेद है तथा प्रति- क्षणोंमें शक्ति भेद भी है। वह शक्तिविशेष कादाचित्क ही होता है। उस शक्त एक क्षणके अनन्तर उसका कार्य आलय-विज्ञान क्षणवर्तिवासना परिपाक भी कादाचित्क होगा। पुनश्च तज्जनित प्रवृत्ति विज्ञान भी कादाचित्क होगा । विज्ञानवादीके इस पक्षका खण्डन करता हुआ सौत्रान्तिक कहता है कि फिर तो आलय-विज्ञान संतानसे एक ही आलय-विज्ञानमें नीलादि प्रवृत्ति विज्ञानजनकता होगी, और उसमें प्राक्तन- आलय विज्ञानवर्ती एक नीलादि विज्ञान क्षणमें वासना परिपाक हेतुता होगी। उस तरह एक संतानमें एक ही आलय-विज्ञान प्रवृत्ति विज्ञानजनन समर्थ होगा और उससे प्राक्तन-

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य आलय-विज्ञानवर्ती नील विज्ञान क्षण ही वासना परिपाकका हेतु होगा । इस तरह एक आलय संतानमें दो ही क्षण कारण होगे और कोई भी क्षण कारण नही होगा, परंतु होता है इसके विपरीत । अनेको वार नील विज्ञान होते ही हैं । यदि तदितर पूर्व ज्ञानोमें परिपाक हेतुता हो और उत्तरोत्तर आलय विज्ञानोमें प्रवृत्ति विज्ञान जनकता हो तो यह कैसे कहा जा सकता है कि क्षण भेदसे शक्तिभेद मान्य है । ऐसी स्थितिमें यदि विज्ञानवादी आलयविज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोका प्रवृत्ति विज्ञान जनन समर्थ तथा सभी तत्सतानवर्ती प्राक्तन नीलादि ज्ञान क्षणोको वासना परिपाकका हेतु मानता है तो समर्थमें कालक्षेप होता नहीं । अतः सदा ही नीलज्ञान होते रहना चाहिये साथ नीलज्ञानको कादाचित्क न होना चाहिये । इस प्रकार विचार करनेपर स्वसतान मात्राधीन होनेपर कादाचित्कत्वके विरुद्ध सदा सत्त्वकी प्राप्ति होती है । उससे नीलज्ञानका कादाचित्कत्व निवृत्त होगा, परंतु यह उपलब्धि विरुद्ध है । नीलज्ञानमें कादाचित्कत्व, उपलब्ध होता ही है । इसीलिये आलय विज्ञानसे अन्य वाह्यार्थ सापेक्ष होनेपर भी नीलज्ञानका कादाचित्क- त्व बन सकता है और तब जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते है वे तदतिरिक्त सापेक्ष होते हैं । इस प्रकार सौत्रान्तिकके द्वारा कथित व्याप्य व्यापकका व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध होता है । यदि कहा जाय कि नीलविज्ञान हेत्वन्तर अपेक्षा रख सकता है, पर वह हेत्वन्तर अन्य आश्रय-विज्ञान सतान ही हो सकता है बाह्यार्थ नहीं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि विज्ञानवादी प्रवृत्ति विज्ञानोको सतानान्तर निबन्धन नही मानते । जिस समय चैत्रसतानमे गमन, वचन प्रतिभासप्रत्यय विच्छिन्न होते हैं उस समय मैत्र सतानमे रहनेवाले वचन, गमन प्रतिभास निमित्तक ही चैत्रमे गमनवचनादि गोचर प्रवृत्ति विज्ञान उत्पन्न होते हैं किंतु विवक्षु, जिगमिषु चैत्रमें होनेवाले गमन- वचन प्रतिभास चैत्र संतान हेतुक ही होते हैं । स्वसंतान हेतुक प्रवृत्ति विज्ञान माननेपर पूर्वोक्तरीतिसे नीलादिज्ञानका कादाचित्क नही बन सकता । अतः नीलादि- ज्ञानको वाह्यार्थ सापेक्ष मानना ही ठीक है । यदि प्रवृत्तिज्ञानको अन्यसतान निमित्तक माना जाय तो भी वह सत्त्वान्तर सतान भी तो सदा सन्निहित ही रहता है । अतः प्रवृत्तिविज्ञानोका कादाचित्कत्व बन नहीं सकता । क्योंकि चैत्रसंतानसे मैत्रसतानका देश तथा कालद्वारा विप्रकर्ष (दूरी) सम्भव नहीं है । इसमे यह कारण है कि विज्ञानवादीको विज्ञानसे भिन्न देशकालादि अमान्य ही होते हैं । अमूर्त होनेसे विज्ञानोको अदेशात्मक माना जाता है अतः देशकृत विप्रकर्ष नही हो सकता । इसी तरह विज्ञान संतानोंका कालकृत विप्रकर्ष भी नहीं हो सकता क्योकि सादिता दोष प्रसक्तिके डरसे विज्ञानवादी नवीन सत्त्वो (विज्ञानसतानरूप

आत्मा ) का आविर्भाव नहीं मानते हैं । जब देशकृत या कालकृत विप्रकर्ष सम्भव ही नहीं तो मनानान्तर सन्निधान भी सर्वदा रहेगा ही, फिर प्रवृत्ति विज्ञानको सदा ही उत्पन्न होते रहना चाहिये किंतु प्रवृत्ति विज्ञानकी कादाचित्कता ही प्रत्यक्ष है, अतः बाह्यार्थ मानना अत्यावश्यक है उसके बिना कादाचित्क प्रवृत्तिविज्ञान नहीं बन सकता । सौत्रान्तिकके इस मतका खण्डन करता हुआ विज्ञानवादी कहता है कि वासना वैचित्र्यसे प्रत्यय वैचित्र्य उत्पन्न हो ही सकता है । उनका अभिप्राय यह है कि स्वसंतानसे ही प्रवृत्तिविज्ञानोंकी उत्पत्ति मानी जायतो भी उसके कादाचित्कत्वकी उपपत्ति हो जायगी । अतः सौत्रान्तिकके बाह्यार्थ साधक हेतुकी विपक्ष व्यावृत्ति संदिग्ध है जिससे वह अनेकान्तिक है । नीलादि ज्ञानको बाह्यनिमित्तक मान भी लें तो भी क्यों कभी नीलज्ञान कभी पीतज्ञान होता है यदि बाह्यनील पीतके सन्निधान-असन्निधानमे यह व्यवस्था कही जाय तो भी प्रश्न होगा कि पीत सन्निधानमें भी नीलज्ञान क्यो नहीं होता, पीत ही ज्ञान क्यो होता है । यदि कहें कि पीतमें नीलज्ञानजननकी सामर्थ्य नहीं है तो भी प्रश्न होगा कि यह सामर्थ्य-असामर्थ्यका भेद कैसे होता है । यदि हेतुभेदसे कहा जाय तो इसी तरह क्षणों ( क्षणिक आलय विज्ञानों ) में भी स्वकारण भेदके कारण शक्ति भेद हो ही सकता है संतानीक्षण ही कार्य भेदके हेतु होंगे, वे प्रति कार्य भिन्न ही होते हैं । मतान नामकी कोई एक वस्तु क्षणोंकी उत्पादिका नहीं होती जिसके अभेदसे क्षण भेदमें बाधा पड सके । जो यह कहा जाता है कि आलय-विज्ञान क्षणोंमें स्वस्वहेतु वैचित्र्यसे सामर्थ्य भेद होनेपर भी एक मतानस्थ होनेके कारण सबमें एक ही प्रकारकी सामर्थ्य होगी वह इसलिये ठीक नहीं कि यह कहा ही जा चुका है कि मतानके अभेद होनेपर भी क्षणोंमें सामर्थ्यभेद है । सौत्रान्तिकका कहना है कि क्षणके भेदा-भेदसे शक्तिका भेदा-भेद नहीं हो सकता । क्योंकि भिन्न क्षणोंमें भी एक सामर्थ्यकी उपलब्धि होती है । अन्यथा यदि एक ही क्षण नीलज्ञान जनन समर्थ हो तो पुन. कभी भी नील- ज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये । क्योंकि इस दृष्टिमे जो समर्थ क्षण था वह व्यतीत हो चुका और क्षणान्तरोंमें नीलज्ञानजनन सामर्थ्य है ही नहीं, इसलिये क्षण भेदसे सामर्थ्य भेद होता है यह पक्ष उचित नहीं । एक ज्ञान मतानमें अनेकों बार नीलज्ञान होता ही है किंतु मनान भेदसे ही सामर्थ्य भेद होता है । अतः आलय विज्ञान संतानोंसे भिन्न बाह्य नीलादि संतानोंसे नीलादि प्रवृत्तिविज्ञानोंका उत्पन्न होना सगत होता है । इस दृष्टिसे बाह्यार्थ सिद्ध होता है परंतु यह भी ठीक नहीं । क्योंकि यदि भिन्न संतानोंमें सामर्थ्यभेद मान्य होगा तो यह भी कहना पड़ेगा कि भिन्न मनानोंमें एक सामर्थ्य नहीं है । ऐसी स्थितिमें विभिन्न नीलसंतानोंमे भी नीलाकारके

आधानकी एक सामर्थ्य होनी चाहिये । फिर तो अन्यनील सतानोंका सन्निधान रहने- पर भी नीलज्ञान न होना चाहिये, परतु यह 'सब अनुभवविरुद्ध है । अतः नील- पीतादि सतानोंके समान ही स्वकारणाधीन उत्पन्न होनेवाले क्षणान्तरोंमें भी किन्हीमे सामर्थ्य विशेष होता है किन्हीमें नही । इस प्रकार एक आलयविज्ञान सन्तति- पतित क्षणोमे किसी ही ज्ञानक्षणमें सामर्थ्य विशेष होता है किसीमे नही होता । स्वप्रत्यय ( पूर्वोत्पन्न नीलज्ञान ) से आसादित वही सामर्थ्यातिशय वासना है । किसीसे नीलाकार ही ज्ञान होता है पीताकार नही और किसीसे पीताकार ही ज्ञान होता है इस तरह वासनावैचित्र्यसे ही ज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । विज्ञानवादीके कहनेका सार यह है कि बाह्यार्थवादमे भी नीलादि अर्थ क्षणिक होते है तथाच नीलसन्तान भी अनेको होते है । उनमे भी संतानभेदसे यदि शक्ति- भेद माना जाय तो लीलादि सतानोंमें भी एक प्रकारकी शक्ति न सिद्ध होगी । तथा च एक ही नील नीलाकार ज्ञान उत्पन्न कर सकेगा, संतानान्तरवर्ती नील नीलाकार ज्ञानका उत्पादक न हो सकेगा । अतः क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद माननेमे जो दोष आते हैं, संतान-भेदसे सामर्थ्यभेद माननेपर भी वे ही दोष हो सकते हैं । अतः कहना पड़ेगा कि जैसे किन्ही संतानोंके परस्परभिन्न रहनेपर भी उनमें समान सामर्थ्य होता है तभी अनेक नीलसंतानोंसे समानरूपसे नीलाकारज्ञान उत्पन्न हो सकता है । अतः सौत्रान्तिकको मानना पड़ेगा कि अनेक नीलपीतादि सतानोमे स्वकारणभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है । तथा च कोई नीलज्ञानका जनक होता है कोई पीत ज्ञानका । इसी तरह आलयविज्ञानपतित क्षणोके सम्बन्ध भी व्यवस्था हो सकती है । किन्ही क्षणोंमें ही उस प्रकारसे आसादित वासनारूप सामर्थ्यातिशय होता है, जिससे नीलादि प्रवृत्तविज्ञान होते हैं । सबमे वह सामर्थ्य नही होता । अतः न तो यही कहा जा सकता है कि हर एक आलय विज्ञानसे नीलज्ञान होता रहेगा और न यही कहा जा सकता है कि एक ही आलयविज्ञानसे एक ही नील ज्ञान होगा । इस तरह वासनावैचित्र्यसे सज्ञानवैचित्र्य बन सकता है । अतः प्रत्ययसे अति- रिक्ति बाह्यार्थके सद्भावमे कोई प्रमाण नहीं है । इस तरह आलयविज्ञान संतान- पतित असविदित पूर्वज्ञान ही वासना है । यद्यपि पहले शक्तिको वासना कहा गया था पर यहाँ शक्ति शक्ति मानकर अभेद समझकर पूर्व विज्ञानको ही वासना कहा गया है । वर्तमान ज्ञानमे विदित होता है, अनागत असिद्ध ही है । अतः पूर्वविज्ञानको ही असविदित कहा गया है । वासनाके वैचित्र्यसे ही नीलादि अनुभवोमे भी विचित्रता बनती है । पूर्वविज्ञानमे विचित्रता कैसे हुई इस शंकाका समाधान यही है कि अनादि संसारमे पूर्व-पूर्व नीलादि अनुभवोंसे ही उत्तरोत्तर विज्ञानोंमे वासना- वैचित्र्य सम्पन्न होता है ।

इस प्रकार पूर्व नीलादि अनुभवोंके वैचित्र्यसे वासनावैचित्र्य होता है और वासनावैचित्र्यसे अनुभवोंमें भी विचित्रता आती है। बीजाङ्कुरके समान यह परम्परा भी अनादि ही है। अन्वय-व्यतिरेकसे भी यही मालूम पड़ता है कि वासना- वैचित्र्य ही ज्ञान-वैचित्र्यका हेतु है, क्योकि स्वप्नादिमे स्पष्ट है कि बाह्यार्थके बिना भी वासनाके कारण ही विचित्र ज्ञान उत्पन्न होते हैं। यह उभयसम्मत है। परंतु वासनाके बिना अर्थनिमित्तक ज्ञान-वैचित्र्य उभयसम्मत नहीं है। अतः बाह्यार्थका अस्तित्व नही सिद्ध होता । इस प्रकार विज्ञानवादीके बाह्यार्थापलापका श्रीव्यास- शङ्कराचार्यादि वैदिक आचायोंने निराकरण किया है । 'नाभाव उपलब्धे' अर्थात् बाह्यार्थका अभाव नहीं कहा जा सकता क्योकि उसका उपलब्ध होता है। यहाँ विज्ञानवादीसे प्रश्न हो सकता है कि क्या उपलब्ध न होनेसे बाह्यार्थका असत्त्व होता है या वह उपलब्ध ही बाह्यविषयक नही है। बाच्यार्थविषयक होनेपर भी बाधक प्रमाणके सद्भावसे बाह्यार्थाभाव है। प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं क्योकि घटादि- का उपलब्ध सर्वजनप्रसिद्ध है। खम्भ, कुड्य, घट पटादि बाह्यविषयक प्रत्येक ज्ञानोसे स्पष्टतया बाह्यार्थ भासित होते हैं। यदि कहा जाय कि उपलब्ध तो अवश्य है किंतु उपलब्धका विषय बाह्य घटादि असत् है तो यह भी ठीक नहीं, कारण कि जैसे कोई भोजन तथा भोजनसाध्य तृप्तिका अनुभव करता हुआ भी कहे कि 'न मैं भोजन करता हूँ न तृप्त ही होता हूँ' तो उसका कहना अनर्गल है। इसी तरह इन्द्रिय-सन्निकर्षसे बाह्यार्थका उपलब्ध करते हुए भी विज्ञानवादीका यह कथन कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं कर रहा हूँ सर्वथा अनर्गल है। यदि वह कहे कि मै यह नही कहता कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं करता हूँ अपितु यह कहता हूँ कि उपलब्धिसे भिन्न बाह्यार्थ नही है। परतु यह भी उसका कथन ठीक नहीं यतः उपलब्धिवलसे ही बाह्यार्थ स्वीकृत होता है। उपलब्धिग्राहक साक्षीसे जैसे उपलब्धि गृहीत होती है वैसे ही उसकी बाह्यविषयता भी गृहीत होती है। घटादिके ज्ञानके साथ घटादि बाह्यविषय भी गृहीत होते हैं इसीलिये बाह्यार्थका प्रत्याख्यान करने- वाला भी कहता है कि अन्तर्ज्ञेयरूप है। वही बाह्यवत् प्रतीत होता है। वे लोग भी लोकप्रसिद्ध बाह्यार्थविषयीणी संवित्‌को समझते हुए ही उसके प्रत्याख्यानके लिये बाह्यार्थको वहिर्वत् ( बाह्यतुल्य ) कहते हैं। अन्यथा वहिर्वत् कहनेका कुछ भी अर्थ नही रह जाता । अत्यन्त असत्‌के साथ उपमा उपमेयभाव भी नही बन सकता कोई यह नहीं कहता है कि विष्णुमित्र वन्ध्यापुत्रके तुल्य भासित होता है। इन सब दृष्टियोसे अनुभवके अनुसार तत्त्व स्वीकार करनेवाले स्पष्टरूपसे कहते हैं कि घट पटादि बाह्य अर्थ ही भासित होता है बहिर्वत् नही।

७४८ मार्क्सवाद और रामराज्य यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है अतः बाह्यवत् कहा जाता है। परन्तु यह भी ठीक नहीं, क्योकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है। सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती। जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है। जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो वह असम्भव है। यहाँ तो यथा- योग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है। ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोको स्थान ही नहीं है। जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है यह भी ठीक नहीं कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा ? विषय तो 'इदन्ता एव बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है। मार यह है कि यद्यपि घट-पटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं परम् सूक्ष्ममें नहीं। नाना दिशाओं एवं