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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

अपनी बपौती—मिल्कियतपर अधिकार रहेगा । अपने विचारका प्रचार करने, सगठन, प्रेस-पत्र आदि स्थापित करनेकी सबको छूट होगी, अर्थात् व्यष्टि एव समष्टि सभीको लौकिक, पारलौकिक अभ्युत्थान एव परम निःश्रेयस प्राप्त करानेकी सुविधा उपस्थित की जायगी । समष्टि व्यष्टिका उपोद्वलक होगा । व्यष्टि समष्टिके अविरोधेन आत्मोन्नतिका लिये प्रयत्न करते हुए समष्टि-सेवामें स्वेच्छासे ही प्रवृत्त होंगे । जैसे कुटुम्बका विश्वासभाजन, ईमानदार, निष्पक्ष, सर्वहितैषी व्यक्ति गृहपति (घरका पुरखा) होता है, इसी प्रकार मण्डल, राज्य, राष्ट्र एव विश्वका पालन करनेवाले व्यक्तियो या व्यक्ति-समूहोको भी सबका विश्वासभाजन, निष्पक्ष, सर्वहितैषी एव ईमानदार होना अनिवार्य होगा । फिर भी यह भूलना न चाहिये कि परिवार बन जानेपर भी परिवारके सदस्योमें लडाई होती है, ग्राम बन जानेपर भी ग्रामीणोंमें लडाई होती है, राष्ट्र बननेपर भी राष्ट्रके भीतर सब उपद्रव होते हैं । रूसमें भी एक दूसरेको हटाकर अधिकारारूढ होनेका प्रयत्न करते ही हैं, उसी तरह आगे भी यह सघर्ष रहेगा । अतः जबतक अविवेक, अविचार, अभिमान, अधर्मको रोकनेके लिये सत्य एवं सात्विक अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि गुणो तथा शास्त्रो एवं आध्यात्मिक जीव-ब्रह्मादिकी भावना दृढ न होगी, तबतक कुटुम्बका भी सगठन असम्भव है, विश्व-सगठनकी बात तो दूर है । वस्तुतः इस मार्गसे ही राष्ट्र एवं विश्वका सघटन सम्भव है । रामराज्यका तो 'वसुधैव कुटुम्बकम्'का सिद्धान्त है ही । किं बहुना, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मक विश्वको ममताका आस्पद बनाकर अभेद-भावना करके उसे आत्मस्वरूप समझना एक उदात्त उपासना है । फलतः तदनुसार चेष्टा ठीक ही है । समष्टि-अविरोधेन राष्ट्र, समाज या व्यक्तिका अपने विकासकी स्वाधीनता होनेसे उनपर जिम्मेदारी होगी, अपनी हानि और लाभकी बाते सोचना, आलस्य-प्रमादका छोडना, सावधानी-तत्परताके साथ पुरुषार्थके लिये अग्रसर होना सम्भव हो सकेगा । तभी विश्वकी उन्नति और शान्ति होगी । तानाशाही-शासन यन्त्रका कल-पुर्जा बन जानेसे सभी व्यक्ति या देश जड-यन्त्रवत् हो जायेंगे । उनका विकास रुक जायगा । समाजवादी कहते हैं कि 'अपने लाभके लिये ही परिश्रम करना, शक्तिसचय करना, यह मनुष्यकी प्रकृति नहीं है—यह तो एक अभ्यास है, जो मनुष्यकी परिस्थितियोके अनुसार बन जाती है । प्राचीन कालमे युद्ध होनेपर हारनेवाले व्यक्तियोको मारकर खा जाते थे । बलवान् कमजोरोंके धन, स्त्रियाँ आदि छीन लेते थे । स्त्रियोंके लिये राजा लोग चढाई करते थे । उस समय समाजका यही अभ्यास था, परतु आजका मनुष्य इसे नहीं सहन कर सकता । असभ्य लोगोंमें आज भी लूटपाट चलती रहती है, परतु आज मनुष्यका स्वभाव बदल गया है ।

४०६ मार्क्सवाद और रामराज्य अतः हानिके डर एवं लाभके लोभसे काम करनेकी आदत बदल सकती है। आज दिन प्राणी कमाता है। खर्च करनेसे अधिक बटोरकर भी रखता है; क्योकि उसे भय है कि उसे आगे शायद पदार्थ न मिल सके पर यह ठीक नहीं, इसका उत्तर पीछे विकासवादके खण्डनमे विस्तारसे आ चुका है।' अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवाद मार्क्सके अनुसार 'वैज्ञानिक साधनोके विकाससे पैदावारकी शक्तिके बहुत अधिक बढ जानेपर जब भिन्न-भिन्न देशोके पूँजीपति अपनीपैदावारको अपने देशमें नहीं खपा सकते, तब उन्हे दूसरे देशोके बाजारोमें अपना माल पहुँचाना पड़ता है। पूँजीपति अपना माल दूसरे देशोंमें बेचकर मुनाफा उठाना तो पसन्द करते हैं, परंतु अपने देशमें दूसरे देशके पूँजीपतियोंका माल आकर बिकना पसन्द नही करते; क्योकि इससे उनके मुनाफेका क्षेत्र घट जाता है । इसके अतिरिक्त प्रकृतिने उपयोगी पदार्थोंको सभी देशोमे समानरूपसे नहीं बॉट दिया है या प्रकृतिने अलग-अलग देशोको अपना-अपना निर्वाह अकेले कर सकनेके योग्य नहीं बनाया । व्यापार, व्यवसाय और पैदावारके कुछ पदार्थ एक देशमें बहुत अधिक मात्रामें मिल सकते हैं, और कई ऐसे पदार्थ हैं, जो उस देशमे नही मिल सकते । जापानमें लोहा नहीं मिलता, इंग्लैंडमें रूई नहीं पैदा होती, जर्मनीको पेट्रोल बाहरसे लेना पडता है । स्वीडनको अपना लोहा बाहर भेजना जरूरी है। कनाडा अपनी लकड़ीको नहीं खपा सकता; अमेरिका अपनी रूईको बेचनेके लिये जगह ढूंढता रहता है। ये पदार्थ इन देशोंको दूसरोंसे लेन-देने पड़ते हैं । कोई देश अकेले अपना निर्वाह नहीं कर सकता, परतु प्रत्येक देशके पूँजीपति अपने-अपने व्यवसायमें मुनाफा कमानेके लिये दूसरे देशोंके व्यापारिक आक्रमणसे बचाना चाहते हैं और दूसरे देशोंपर आक्रमण करना चाहते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि "साम्राज्यवादके ऐतिहासिक विकासकी तुलना हम पूँजीवादसे इस प्रकार कर सकते है। पूँजीपति व्यक्तिकी ही तरह किसी उन्नत देशके पूँजीपति अन्तर्राष्ट्रिय क्षेत्रमें कम हैसियतके पूँजीवादी राष्ट्रोको कुचलकर शोषण-क्षेत्रपर अपना एकाधिकार कायम करनेका यत्न करते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति एक व्यापारीकी अवस्थासे औद्योगिक साधनोंद्वारा पैदावारके पदार्थोंको बनानेवाला बनकर मुनाफेके जरिये भारी पूँजी इकट्ठी कर चुकनेके बाद स्वयं कुछ भी न कर, रुपयेके रूपमें अपनी पूँजीकी शक्तिको उधार देकर पैदावारका मुख्य भाग स्वयं खींचता रहता है, उसी प्रकार पूँजीपति देश अन्तर्राष्ट्रिय बाजारमें पहले केवल व्यापार, वाणिज्यद्वारा पूँजी इकट्ठी करते हैं । उसके बाद अपनी औद्योगिक पैदावार दूसरे देशोपर लादते हैं और इस अवस्थासे उन्नति कर दूसरे देशोको अपनी पूँजीमें जकड़ना आरम्भ करते हैं । ऐसी अवस्थामे पहुँचकर पूँजीपति देश स्वाधीन देशा और उपनिवेशोकी पैदावारमे कोई भाग नही लेते ।

वे देश पैदावारका मुख्य साधन पूँजी उन देशोंमें लगाकर मुनाफेका भाग खींचते रहते हैं और उन देशोंकी आर्थिक प्रगति और राजनीतिपर अपना नियन्त्रण रखते हैं। जिस प्रकार पैदावारके साधनोंके मालिक, पूँजीपति और परिश्रम करनेवाली साधनहीन श्रेणीके हितोंमें विरोध होता है, पूँजीपति श्रेणी परिश्रम करनेवाली श्रेणीके परिश्रमको मुनाफेके रूपमें निगलती रहती है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय पूँजीवाद अर्थात् एक देशके पूँजीपतियोंद्वारा दूसरे देशपर अधिकारका अर्थ हो जाता है--पराधीन देशके परिश्रमका शोषण। "जिस प्रकार परिश्रम करनेवाली श्रेणीके शोषणसे पूँजीपति अपनी शक्तिको बढ़ाकर अपने शोषणका क्षेत्र बढ़ाता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्य- वादी देश एक देशका शोषणकर दूसरे देशोंको पराधीन बनाकर शोषण करनेकी शक्ति प्राप्त करते हैं। मार्क्सवादके अनुसार जिस प्रकार पूँजीवादी व्यवस्थाका अन्त एक देशमे उसे समाप्त कर देनेसे नहीं हो सकता, उसी प्रकार साम्राज्यवादका अन्त भी किसी एक देशके प्रयत्नसे नहीं हो सकता। उसके लिये साधनहीनोंके संगठित अन्तराष्ट्रिय प्रयत्नकी आवश्यकता है। जिस प्रकार एक देशमें पूँजीवाद साधनहीन श्रेणीको पैदाकर अपनी विरोधी शक्ति पैदा कर लेता है, उसी प्रकार अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश शोषणके क्षेत्रको घेरकर नये शोषित देश पैदाकर अपना विरोध करनेवाली शक्ति पैदा कर देते हैं। जिस प्रकार पूँजीपति अपने देशमें पैदावारके साधनोंपर अधिकार जमाकर मेहनत करनेवाली श्रेणीको जीवन-उपायोंसे हीन कर देता है, उसी प्रकार एक पूँजीवादी देशके साम्राज्यका विस्तार व्यापारके क्षेत्रोंको अपने वशमें कर नये उगते हुए राष्ट्रों और पराधीन राष्ट्रोंके जीवनको असम्भव कर देता है। जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक संकट लाकर पूँजीवादी व्यवस्थाकी अयोग्यताको स्पष्ट कर देता है और नयी व्यवस्था लानेकी आवश्यकता उपस्थित कर देता है, उसी तरह अन्तराष्ट्रिय क्षेत्रमें साम्राज्यवादी देश साम्राज्यवादके आगे विस्तारको असम्भव कर देते हैं और नयी व्यवस्था लानेको बाध्य करते हैं। काट्स्कीका कहना है कि 'साम्राज्य-विस्तारका यत्न पूँजीवादका आवश्यक परिणाम नहीं। साम्राज्य-विस्तार नीतिकी जिम्मेदारी पूँजीवादी देशोंके कुछ एक पूँजीपतियोंपर है। इस विषयमे यदि पूँजीवादी देश समझौता करके अपने मालको खपानेके लिये और कच्चा माल प्राप्त करनेके लिये संसारको बाँट ले तो सभी पूँजीवादी राष्ट्रोंकी आवश्यकता पूरी हो सकती है और अन्तराष्ट्रिय युद्धोंका होना जरूरी नहीं रहेगा। परन्तु मार्क्सवादियोके विचारमें काट्स्कीका यह सिद्धान्त न तो इतिहासके अनुभवपर पूरा उतरता है और न पूँजीवादके विकासके मार्गके अनुकूल ही है। काट्स्की इस बातको भूल जाता है जिस प्रकार एक देशमें आर्थिक हितोंकी

४०८ मार्क्सवाद और रामराज्य क्षाके लिये श्रेणियाँ राजनैतिक शक्तिका व्यवहार करती हैं, उसी प्रकार अन्ता- राष्ट्रिय क्षेत्रमें पूँजीवादी राष्ट्र अपने आर्थिक हितोंकी रक्षाके लिये अपने राष्ट्रोकी सैनिक शक्तिका व्यवहार करते है । जबतक पूँजीवादी राष्ट्रोके सामने अन्ताराष्ट्रिय क्षेत्रमे मुनाफा कमानेका प्रश्न है, उनमें समझौता हो ही नही सकता । प्रत्येक राष्ट्र इस लूटमे सबसे बड़ा भाग लेनेका यत्न करेगा । जबतक बलवान् पूँजीवादी देशोका भय रहेगा, निर्बल पूँजीवादी देश लूटके बाजारमें कम भाग लेना स्वीकार करेंगे । परन्तु अन्ताराष्ट्रिय लूटद्वारा उनकी सैनिक शक्ति बढ़ते ही वह और अधिक बाजारों और उपनिवेशोंकी माँग पेश करेंगे । अभी हालकी अन्ताराष्ट्रिय घटनाएँ इस बातको प्रमाणित कर देती हैं । अपनी पूँजीकी शक्ति और सैनिक शक्ति पहले बढ़ाकर इटलीने अबीसीनियाको हड़प लिया, बादमे अन्ताराष्ट्रिय शान्तिकी रक्षाके लिये उसका और फ्रांसका समझौता टूट गया । दूसरा उदाहरण हमारे सामने जर्मनीका है । अपनी सीमाके देशोंको अपनी पूँजीवादी लूटका क्षेत्र बना चुकनेके बाद भी जब जर्मनीकी पूँजीपति-श्रेणीकी भूख शान्त नही हुई, तब जर्मनीने दूर देशों और उपनिवेशोंकी माँगपर जोर देना आरम्भ किया । मानो निर्बल और पिछड़े हुए देशोंका जन्म जर्मनीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादका शिकार बननेके लिये ही हुआ हो । “यदि काट्स्कीके अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी साम्राज्यवादके सिद्धान्तके अनुसार पूँजीवादी राष्ट्र परस्पर समझौतेद्वारा ससारके निर्बल राष्ट्रोको शोषणके लिये परस्पर बाँट भी ले तो भी वह समझौता ससारमे चिरशान्ति स्थापित नहीं कर सकता; क्योकि शोषित राष्ट्रोकी जनताका भी अपने जीवनके अधिकारोंके लिये प्रयत्न करना आवश्यक और स्वाभाविक है और इस कारण उपनिवेशो तथा पराधीन देशोंमें अन्ताराष्ट्रिय अशान्तिका कारण बना ही रहेगा ।” पर धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके दृष्टिकोणसे व्यष्टि-समुदाय ही समष्टि है, जैसे वृक्षोका समुदाय ही वन है । प्रत्येक वृक्षके ह्रास, विकास व्यक्तिगत होते हुए भी परिणामतः वनका ह्रास, विकास बन जाता है । व्यक्तिगत विकास-शक्ति नष्ट हो जानेपर वन कभी भी टिक नहीं सकता । इसी तरह प्रत्येकव्यक्ति बुद्धिमानी सावधानीसे व्यक्तिगत एव सामूहिक विकासका प्रयत्न करे तो कुटुम्ब, समाज एव राष्ट्र विकसित हो जाता है । समाजके हितका ध्यान रखते हुए ही व्यक्तिगत विकासका प्रयत्न उचित है। कितने कार्य ऐसे भी होते हैं, जिनमें व्यक्तिगतप्रयत्नसे काम नहीं चलता, वहाँ सामूहिक तोरपर ही कार्य किया जाता है । शुभ, अशुभ कर्मोंका फल व्यक्तिगत रूपसे प्राणियोंको भोगना पड़ता है । छोटी-छोटी इकाइयोमें कार्य करनेमे सुविधा होती है । भोजन-वस्त्रादिका प्रबन्ध भिन्न-भिन्न कुटुम्बोंमें बँटे रहनेसे स्वास्थ्य तथा रुचिकी अनुकूलता अधिक होती है । करोड़ो

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या लाखों आदमियोंका एक स्थानमें भोजन बनाना, बाँटना असम्भव है। पूँजीवादी राज्योंमें भी जनसंख्या, उसकी आवश्यकता तथा पैदावारकी मात्रा और उसके सन्तुलनका विचार किया जाता है। उत्पादन-उपयोग, आय-व्यय, आयात-निर्यात आदि सब बातोंका ज्ञान और उनके आँकड़े सभी राज्योंमें रखे जाते हैं। अतः 'पूँजीवादीराज्यमें भोक्ताओं एवं खाद्यकी मात्राका परिज्ञान नहीं रहता'--यह कहना असङ्गत है। जहाँ व्यक्तिगत सम्पत्तिका सिद्धान्त मान्य है, वहाँ स्वाभाविकरूपसे उत्पादक या व्यापारी दोनों ही मुनाफा चाहेंगे और यही सहज वितरणका मार्ग भी है। व्यापारी जहाँ जिस वस्तुकी बहुतायत है, वहाँसे उसे खरीदकर जहाँ कमी है, वहाँ पहुँचा देता है। इसके बदले उसे कुछ लाभ भी हो जाता है। प्राचीन समयमें प्रत्येक कार्य इसी ढंगसे होते रहे हैं, जिससे समाजका भी कार्य चले और व्यक्तिका लाभ भी होता चले। अध्यापन, याजन, प्रतिग्रह, व्यापार, कृषि, गोरक्षा, शिल्प आदि सभी कामोंसे निर्माता, प्रयोक्ता सभीको लाभ होता है। राम-राज्य-प्रणालीके अनुसार कभी आर्थिक असन्तुलन न होनेसे बेकारी, बेरोजगारी न होगा और राष्ट्रके प्रत्येक नागरिकका जीवनस्तर ऊँचा होगा। क्रयशक्तिके घटनेका कोई प्रश्न ही न रहेगा, फिर मालके खपत न होनेकी भी शिकायत न होगी। जो कहा गया है कि 'समाजमें मेहनत करनेवाले ही पैदावार करते हैं और वे ही तैयार मालकी खपत करते हैं, अतः समाजमें जो पैदावारके लिये परिश्रम करनेवाले हैं, वे ही पैदावारको खर्च करनेवाले हैं। यदि परिश्रम करनेवालोंको अपने परिश्रमका पूरा फल मिल जाय तो पैदावार फालतू पड़ी नहीं रह सकती।' यह ठीक नहीं है, क्योंकि पैदा करनेवालों और उप- भोक्ताओंकी श्रेणियोंमें भेद है। यों तो राष्ट्रका कोई भी नागरिक कुछ-न-कुछ करता ही है। बिना कुछ किये तो कोई क्षणभर भी टिक नहीं सकता। फिर मिल- मजदूरोंद्वारा की गयी पैदावारका उपभोग किसान भी करता है। किसानद्वारा की गयी पैदावारका मिल-मजदूर भी उपभोग करता है। अध्यापक, इंजीनियर, छात्र, सिपाही, सरकारी कर्मचारी, फिल्म-कार्यकर्ता तथा विभिन्न कार्य करनेवाले होते हैं। इस तरह समाजके घटक विभिन्न व्यक्तियोंके कार्यों और शक्तियोंमें भेद होता है। इसीलिये उन्हें काम, दाम, आराममें भी कुछ वैषम्य मानना पड़ता है। अध्यापक, इंजीनियर उत्पादनका कार्य नहीं करते, फिर भी उत्पादकोंसे अधिक उपभोग-सामग्री उन्हें मिलती है। एक फावड़ा चलानेवालेको इंजीनियरके बराबर वेतन कहीं भी नहीं दिया जाता। यदि सम्पूर्ण लाभ उत्पादकका ही है, उसे ही मिल जाय तब तो भूमि, मशीन, मकान तथा मुद्रा लगानेवालेको लाभमें

कुछ भी हिस्सा न मिलेगा । परंतु उत्पादनमें इन वस्तुओका महत्त्वपूर्ण स्थान है—ये सब बाते विस्तारसे पहले सिद्ध की जा चुकी हैं । परिश्रम करनेवालेका वही फल है जो मजदूर और मालिकके समझौते या पञ्चायत अथवा न्यायालयद्वारा वेतन निर्धारित होता है । मुनाफा श्रमका फल नहीं; किंतु कच्चे माल, मशीन तथा पूँजीका फल है । श्रमका फल श्रमिकको वेतनके रूपमें मिल चुका । यदि सम्पूर्ण मुनाफा मजदूरको दे दिया जाय तो पैदावार करनेके साधन; नये यन्त्र, कल, कारखाने आदि विकसित न हो सकेगे न बढ ही सकेगे । मजदूरको जो मिलेगा, वह खर्च कर डालेगा । मजदूर-सरकार भी यदि लागत खर्च निकालकर सब लाभ मजदूरोको बाँट दे तो वह भी कल, कारखानोका विकास न कर सकेगी । अतः मजदूर सरकार भी विकासके लिये लाभांश बचाती है और वह विकास भी समाजके हितके लिये ही होता है । यही बात दूसरे पक्षमें भी कही जा सकती है । अतएव पूँजीवादी भी तो लाभका उपयोग कल, कारखानोंके विस्तारमे—उद्योगोंके विस्तारमें लगाता है । उससे समाजका जीवनस्तर विकसित होता है । कोई भी पूँजीपति रुपयोंको निश्चल जमा रखनेमें लाभ नहीं समझता । पूँजीपतिका अपना निजी खर्च मजदूर-देशके मन्त्रियोसे कम ही होता है । रूसी नेता बुल्गानिन और क्रुश्चेवके स्वागतमें करोड़ों रुपये खर्च हो गये । वे भी मजदूर ही हैं । कहा जा सकता है कि यह सम्मान व्यक्तिका नहीं; किंतु एक राष्ट्रका था । इसपर दूसरे लोग भी कह सकते हैं कि एक राजाका भी स्वागत उसके व्यक्तिगत न होकर राज्यका ही होता है । किसी भी विद्वान् या धनवान्पर जो भी खर्च होता है, वह राष्ट्र एव उसकी विद्या तथा सम्पत्तिपर ही खर्च होता है । जिन पुराने बादशाहोका हजारों रुपये रोजका खर्च था, वह भी क्या था ? उनके हजारों नौकरोंकी जीविका इसीसे चलती थी । उत्तमोत्तम वस्तुके खरीदनेमें जो रुपये खर्च होते थे, वह कारीगरो, कलाकारो और निर्माताओके पास जाता था । अस्तु, रामराज्य-प्रणालीसे उत्पादनवृद्धिके अनुसार कामके घटोंमें कमी, मजदूरोकी संख्या और वेतनवृद्धिका क्रम लगा रहता है । अतः समाज या मजदूरोंके क्रय-शक्तिके घटनेका कोई भी प्रश्न नही खड़ा होता । बेकारी एवं भूखे, नंगे रहनेका किसीको अवसर ही नहीं होगा । व्यक्ति और समाज सबका कर्तव्य है कि समाजमें कोई भी भूखा, नगा, बेरोजगार, बेकार न रहने पाये । पूँजीपति, उत्पादन-साधन, उत्पादक, श्रमिक तथा अन्य बुद्धिजीवी लोगोके हितके स्वत्वरक्षणका प्रयत्न होगा । 'मार्क्सवादियोके अनुसार प्राकृतिक अवस्थाओके कारण सभी देशोमे औद्योगिक विकास समानरूपमे नही हो पाता । औद्योगिकरूपसे जिन देशोका विकास कम हुआ है,

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४११ उनमें खेतीद्वारा कच्चे मालकी पैदावार अधिक होती है और वह देश अपने कच्चे मालकी पैदावारको खपा सकनेमें असमर्थ रहते हैं। इन देशोंमें कच्चा माल सस्ता मिल सकता है और औद्योगिक मालको बेचकर मुनाफा कमानेकी गुंजाइश रहती है। इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत देश कम उन्नत देशोंपर प्रभुत्व जमाकर आर्थिक लाभ उठानेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश पूँजीवादी देशद्वारा अपने शोषण- को रोक न सके, या दूसरे उन्नत पूँजीवादी देश उन देशोंमे आकर उनका बाजार खराब न कर सके, वहाँ उनका पूरा एकाधिकार और ठेका कायम रहे, इसलिये औद्योगिकरूपसे उन्नत पूँजीवादी देश कम उन्नत देशोको अपने राजनैतिक अधिकारमे रखनेका यत्न करते हैं। कम उन्नत देश या तो उन्नत पूँजीपति देशोके अधीन हो जाते हैं या उन्हे उपनिवेश बना लिया जाता है या उन्हे सरक्षणमें ले लिया जाता है। इस प्रकार यूरोपके कुछ देशोने औद्योगिक विकास और पूँजीवाद- की उन्नतिके बाद सन् १८७६ से लेकर १९१४ के महायुद्धसे पूर्व कम उन्नत देशो अफ्रीका, एशिया आदिमें यूरोपके क्षेत्रफलसे दुगुनी भूमिपर अपना अधि- कार कर लिया । इसमें सबसे अधिक भाग था इंग्लैंड और फ्रासका। इंग्लैंड इससे पूर्व भी भारत, ब्रह्मा आदि देशोको अधीन कर चुका था और कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीकामें अपने उपनिवेश बसा चुका था। जर्मनी और इटलीमें पूँजीवादका विकास बादमे होनेके कारण उनके होश सँभालनेसे पहले ही इंग्लैंड और फ्रांस पृथ्वीका बड़ा भाग सँभाल चुके थे। भूमिकी एक सीमा है, उसे पूँजीवाद देशोंके शोषणके लिये आवश्यकतानुसार बढाया नहीं जा सकता; इसलिये पूँजीवादी देशोंमें झगडा होना आवश्यक हो जाता है।' पूँजीवादी साम्राज्यवाद मार्क्सवादके अनुसार 'किसी देशका पूँजीवाद जब मुनाफेके लिये अपने देशसे बाहर कदम फैलाता है, तब वह साम्राज्यवादका रूप धारण कर लेता है। प्राचीन समयका साम्राज्यवाद सैनिक आक्रमणके रूपमें आगे बढ़ता था और पराधीन देशोका शोषण भूमि-करके रूपमें बरतता था। पूँजीवादका साम्राज्य-विस्तार आरम्भ होता है व्यापारसे। फिर अपने व्यापारको दूसरे देशोंके मुकाबलेमें सुरक्षित रखनेके लिये और पिछड़े हुए देशोंके कच्चे मालपर एकाधिकार रखनेके लिये साम्राज्यवादी देशोंमे परस्पर झगड़ा और युद्ध होता है।' मार्क्सवादके अनुसार पूँजीवादके ऐतिहासिक विकासका परिणाम है साम्राज्यवाद। जिस प्रकार पूँजीवाद, व्यक्ति-स्वतन्त्रतासे आरम्भ होकर पूँजी- पतियोंके एकाधिकारमें परिवर्तित हो जाता है, उसी प्रकार साम्राज्यवाद भी अन्तर्- राष्ट्रिय स्वतन्त्र व्यापारसे आरम्भ होकर बलवान् पूँजीपति राष्ट्रके एकाधिकारमें

परिवर्तित हो जाता है और इस एकाधिकारको प्रत्येक पूँजीवादी राष्ट्रके पूँजीपति अपने ही अधिकारमें रखना चाहते हैं।' रामराज्य-प्रणालीके अनुसार एक सार्वभौम शासन अन्ताराष्ट्रिय शासन होता है। उसके द्वारा सभी राष्ट्रोंके परस्पर समन्वय एवं सामञ्जस्यका सफल प्रयत्न होता है। उसके अनुसार अन्ताराष्ट्रिय व्यापारकी भी सुविधा होती है। अपने प्रयोजनयोग्य वस्तु रखकर शेष वस्तु उन देशोंमें भेजी जाती है, जहाँ उस वस्तुकी कमी होती है। इसी तरह एक देशमें अधिक उत्पादन होनेपर अन्य देशोंमें माल भी उसी व्यापारद्वारा सहजमें पहुँचाया जा सकता है। स्वभावसे ही जहाँ जिस वस्तुकी कमी होती है, व्यापारी वहीं लाभके लिये माल पहुँचाते हैं। राष्ट्रहितकी दृष्टिसे अपने यहाँसे भी यदि माँग पूर्ति हो सकती है तो बाहरके मालपर प्रतिबन्ध लगाया जाता है। तदनुसार ही व्यापारिक समझौता होता है। इसी समझौतेके द्वारा जिस देशमें जिस वस्तुकी बहुतायत है, वहाँसे उसका निर्यात होता है। जिस वस्तुकी किसी देशमें कमी है, उसमें उस वस्तुका देशान्तरसे आयात होता है। इसी आधारपर जापानको लोहा, इंगलैंडको रूई, जर्मनीको पेट्रोल अन्य देशोंसे मिलता है। इसी आधारपर स्वीडन लोहा, कनाडा लकडी, अमेरिका रूईका निर्यात करता है। अवश्य पाश्चात्य साम्राज्यवादियोंने व्यापारके लिये अनेक देशोंको गुलाम बनाया और उपनिवेशके रूपमें राजनीतिक प्रभावक्षेत्रमें रखकर विविध प्रकारका लाभ उठानेका प्रयत्न किया और अब भी कर रहे हैं। यद्यपि अब उपनिवेशवाद मिट रहा है, फिर भी कई साम्राज्यवादी अभी भी उसका मोह छोड़नेमें असमर्थ हैं। भारतीय अंश गोवाको पुर्तगाली अब भी उपनिवेश बनाये हैं। अमेरिकाके कई क्षेत्रोंमें अब भी उपनिवेशवाद है। उपनिवेशवादके रूपमें न सही, परंतु राजनीतिक प्रभावक्षेत्र बनानेकी दृष्टिसे तो मार्क्सवादी राष्ट्र रूस, चीन आदि भी प्रयत्नशील हैं। इस समय पूँजीवादी अमेरिका एवं मार्क्सवादी रूसकी ही होड है। दोनों ही अपने-अपने प्रभावक्षेत्रके विस्तारके लिये प्रयत्नशील हैं। इनके व्यापारिक समझौते भी उन्हीं क्षेत्रोंमें होते हैं। सिद्धान्तके विचारसे देखा जाय तो किसी देशमें कम्युनिज्म रहे तो भी पूँजीवादी राष्ट्रका कोई नुकसान, नहीं। परंतु कम्युनिष्ट राज्य तो सिद्धान्ततः तबतक किसी देशमें कम्युनिज्मकी स्थापना असम्भव समझते हैं, जब- तक सारे संसारमें उसकी स्थापना न हो जाय। ऐसी दशामें जब हम मार्क्सवादियोंके द्वारा सह-अस्तित्वकी घोषणा सुनते हैं—तो आश्चर्य होता है। अन्ताराष्ट्रिय कम्युनिष्टराज्य या विश्व-मजदूर-सरकार बनाना कम्युनिष्टों- का ध्येय है और जैसे एक राष्ट्रमें तानाशाही मजदूर-शासन होता है, वैसे ही विश्व- भरमें नानाशाही मजदूर-शासन होगा। इसकी अपेक्षा रामराज्य-प्रणालीके अनुसार सार्वभौम विश्व-सरकारकी योजना कहीं श्रेष्ठ है। जिसमें केवल शान्ति, सामञ्जस्य,

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था [४१३]

समन्वय एव विकासके लिये सार्वभौम नियन्त्रण होगा। अपने-अपने क्षेत्रमे अधिकाधिक स्वाधीनताका उपयोग सब कर सकेंगे। जहाँ राष्ट्रके भीतर नागरिकों- को भी पर्याप्त स्वाधीनता रहती है, वहाँ अन्ताराष्ट्रिय क्षेत्रमें तो और अधिक स्वाधीनता मान्य होती है। प्राचीन कालमे यद्यपि चरित्र, बुद्धि, शक्ति और सङ्घटनके बलसे ही विश्वपर सार्वभौम सत्ता स्थापित होती थी तो भी तत्-तत् राजाओंकी स्वीकृति अपेक्षित होती थी, और परम्परासे जन-सामान्य स्वीकृतिकी प्राप्ति की जाती थी। ढंग लगभग वही-का-वही आज भी है। बुद्धि, धन एव सैनिक-सङ्घटन तथा अस्त्र- शस्त्र-शक्ति एव नीतिके बलपर ही आज बड़े-बड़े गुट बनते हैं। उनका कोई मुखिया होता है और उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षरूपमें जनस्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक होता है। जबतक किसी ढंगकी सार्वभौम सत्तावाली विश्वसरकार न बनेगी, तबतक अपने-अपने क्षेत्रके विस्तारका प्रयत्न होता ही रहेगा। व्यापारिक लाभ भी प्रत्येक राष्ट्र उठानेका प्रयत्न करता ही रहेगा। इसमें पूँजीवादी राष्ट्रोंके समान ही समाजवादी राष्ट्र भी सत्परत रहते

·४१४· मार्क्सवाद और रामराज्य अशान्तिकी जड़-आर्थिक विषमता मार्क्सवादके दृष्टिकोणसे 'वर्तमान संसारमे व्यक्तिके जीवनसे लेकर अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितितक सभी संकटोंका कारण आर्थिक विषमता ही है। समाजमे पैदावार समाजके हितके लिये नहीं की जाती, बल्कि कुछ व्यक्तियोके मुनाफेके लिये ही की जाती है। इसीलिये ऐसी विषमता पैदा हो जाती है। इस विषमताको कायम रखने- के लिये पूँजीवादी समाजमे सरकारकी व्यवस्था और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रमें साम्राज्यकी व्यवस्था करनी पडती है। मार्क्सवाद समाजमे एक नयी व्यवस्था लानेके लिये यत्न करना चाहता है, जिसमे यह सब विषमताएँ और बन्धन न रहे, जो व्यक्ति और समाजके विकासको असम्भव बना रहे है। मार्क्सवादके सिद्धान्त इसी प्रकारकी नयी व्यवस्था कायम करनेकी शक्ति रखते है या नही, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये उन्हे उनके वास्तविक रूपमें रख देनेका यत्न किया गया है। समाजमे शान्ति और व्यवस्था कायम करनेके लिये समय-समयपर अनेक सिद्धान्तोंका जन्म हुआ है। इन सिद्धान्तोका समुच्चय ही समाजशास्त्र है। मार्क्सवाद आदि कालसे संकलित होते हुए समाज-शास्त्रका सबसे नवीन अध्याय है।' परंतु उनका यह कथन पिष्टपेषणमात्र है। यदि कोई व्यक्ति, वर्ग अथवा राज्य स्वतन्त्रता चाहता है, तानाशाही कम्युनिष्ट शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा नहीं बनना चाहता, तो वह स्वयं ही परिश्रम कर, सम्पत्ति-विपत्तिका खतरा उठाकर, प्रमाद, आलस्यपरित्यागपूर्वक तत्परतासे विद्वान्, बलवान्, धनवान् बननेके प्रयत्नसे अच्छी स्थितिमें पहुँच सकता है। इसमे कोई आश्चर्य नहीं। जैसे किसी दासको स्वतन्त्ररूपसे अपने परिवार चलानेके लिये चिन्ता नहीं होती थी, मालिक अपनी परिस्थितियोंके अनुसार उनकी व्यवस्था करता था। उसी तरह कम्युनिष्ट-शासनमे दासके तुल्य जनसामान्यको निश्चित रहना सम्भव हो सकता है, खान-पान-वस्त्रकी निश्चिन्तता रह सकती है, परंतु स्वाधीनतापूर्वक अपनी जीवन व्यवस्थाके संचालनकी दृष्टिसे यह स्थिति नगण्य है। यों तो अच्छे मालिकके कुत्तेकी भी खान-पान, आराम शिक्षण आदिकी अच्छी व्यवस्था होती है, किंतु क्या वह आदर्श स्थिति कही जा सकती है ? स्वाधीनतापूर्वक जीवन- निर्वाहके लिये व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति, रोजगारोंकी भी स्वतन्त्रता अपेक्षित होगी। उसमे एकको दूसरेकी सहायता अपेक्षित होगी। इसलिये एकको दूसरेसे ऋणके रूपमें सहायता लेनी पडती है। किसीसे भूमि भी कर देकर लेनी पड़ती है। अपनी कमाईसे ही उस अंशको चुकाना पडता है। इसे कोई भी सभ्य समाज शोषण नहीं कह सकता। हाँ, यदि अनुचितरूपमे कर या सूद देना पड़े तो अवश्य शोषण कहा जा सकता है, परंतु जहाँ सरकार या न्यायालय या पञ्च अथवा आर्ष

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४१५ शास्त्रोंद्वारा सूद या करकी दर निश्चित होती है, वहाँ शोषणकी बात नहीं कही जा सकती । ठीक इसी तरह अधिक विकसित देश कम विकसित देशोंको मुद्रा अथवा कल-कारखानोंकी सहायता दें और उनसे उनके बदले कच्चा माल या अन्य कुछ लें तो यह भी शोषण नहीं कहा जा सकता। किंतु आपसी समझौताके आधारपर ही यह सब होता है । विकसित देशोंकी सहायतासे ही अविकसित देशोंका विकास सम्भव है। कम्युनिष्ट राज्य भी आपसमे सहायता करते हैं और बदलेमे कोई दूसरी चीज प्राप्त करते हे । यदि इसे ही शोषण कहा जाय तो कम्युनिष्ट राज्य भी शोषक हैं। यदि छोटे-से मजदूरसे राज्यका मिनिस्टर या फील्डमार्शल बन जाना अपराध नहीं है तो छोटे व्यापारीसे बडा धनवान् या पूँजीपति बन जाना भी अपराध नहीं है। कोई राज्य-सरकार कभी धनहीन होती है, दूसरोंसे कर्ज लेती है; पर वही सदुद्योगसे बहुधन-सम्पन्न हो जाती है और दूसरोंकी भी सहायता करनेवाली हो जाती है। पर यह कोई अपराध नहीं गिना जाता। हाँ, यदि दूसरोंको नुकसान पहुँचाकर, दूसरोंके साथ अन्याय करके ऐसा किया जाता है तो अवश्य अपराध है और ऐसा अपराधी चाहे व्यक्ति, चाहे वर्ग, चाहे सरकार हो, वह दण्डनीय है। रहा यह कि पूँजीपति बिना कुछ किये ही यह लाभ उठाता है तो यह भी कथन व्यर्थ है। फड़वा चलाना ही काम नहीं है, महाव्यापारका संचालक भी काम करता है। सैनिक बन्दूक चलाता है, युद्ध-मन्त्री केवल नीति-निर्धारण करता है। व्यापार-सञ्चालनसे होनेवाला महान् लाभ भी राष्ट्रकी ही सम्पत्ति होगी। आवश्यकता पड़नेपर राष्ट्रके हितार्थ सहायताके रूपमें उसका उपयोग हो सकता है। रामराज्यप्रणालीका मुख्य आदर्श ही यही है कि न कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्तिका शोषक हो, न कोई वर्ग दूसरे वर्गका शोषक हो और न कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्रका शोषक हो, किंतु सब एक दूसरेके पोषक होने चाहिये। जहाँतक दूसरेको सहायता पहुँचानेका प्रश्न है, वह ठीक है। नाममात्रका उससे अपना भी लाभ निकालना हो तो भी कोई हर्ज नहीं, किंतु सहायता पहुँचानेके नामपर दूसरे वर्गों या राष्ट्रोंका शोषण करना सर्वथा अपराध है। उत्तम सिद्धान्त तो यह है कि परार्थ ही अपना स्वार्थ माना जाय । मध्यम बात यह है कि स्वार्थके अविरोधेन परार्थ किया जाय। दूसरेका नुकसान कर अपना स्वार्थ-साधन तो विशुद्ध आसुरी प्रकृति है और इससे संघर्ष और विनाश ध्रुव होता है। शोषक व्यक्ति, शोषक वर्ग या शोषकराज्यविरोधी शोषितसमूह अवश्य होगा। इसी तरह शोषित राज्यों तथा वर्गोंमें भी प्रबल निर्बलके शोषक होते ही हैं। मार्क्सवादी भी मानेगे कि पराधीन राष्ट्रोंमें भी सामन्त तथा पूँजीपति किसान-मजदूरोंके शोषक होते हैं। बड़े मजदूर तथा बड़े किसान छोटे मजदूर तथा

४१६ मार्क्सवाद और रामराज्य

किसानोके शोषक होते हैं । इसीको मात्स्यन्याय कहते हैं । इसीको अन्त करनेके लिये धर्मनियन्त्रित शासन धर्मराज्य या रामराज्य अपेक्षित होता है । मार्क्सवादी वर्ग- संघर्ष, वर्गविध्वंसद्वारा समस्याका समाधान चाहते हैं। रामराज्यवादी धर्म, अहिंसा, सत्य, सामञ्जस्य, समन्वयद्वारा तथा अचिकित्स्य अन्यायीको दण्डद्वारा वर्ग- विद्वेष रोककर वर्गसद्भाव एव सामञ्जस्यद्वारा समस्याका समाधान चाहता है । वर्गके भीतर पुनः नये वर्ग सम्भव होते हैं । एक वर्गमें भी शतशः संघर्ष देखा जाता है । अतः सद्भाव बिना कभी भी शोषण तथा अशान्तिका अन्त नही हो सकता । अतः रामराज्यवादीकी धर्म नियन्त्रण अङ्गीकार बिना दूसरी गति नहीं है । जैसे शोषक-श्रेणीमें भी एक दूसरेके शोषक होते हैं, वैसे शोषित-श्रेणीके लोग भी एक दूसरेके शोषक होते हैं । साँपके मुँहमें पड़ा हुआ मेढक शोषित-उत्पीड़ित ही है, तो भी वह मच्छरोके खानेके लिये जीभ लपलपाता ही है । इस तरह शोषित ही दूसरोंका शोषक होता है । मालिकका खैरख्वाह बड़ा कर्मचारी एक तरहका मजदूर ही है । वही दूसरे मजदूरोको वेतन कम देकर कामके घंटोको बढ़ाकर शोषण करता है । मार्क्सवादी मजदूरोके इस कार्यको अज्ञानमूलक कहकर समाधान करते हैं । परन्तु कोई भी शोषण वस्तुतः अज्ञानमूलक ही होता है । अपने स्वार्थके सामने जैसे बड़ा मजदूर समाजका हित भूल जाता है, वैसे ही अपने स्वार्थके सामने पूँजीपति भी समाजके हितको भूल जाता है । इसी स्वार्थमूलक अविवेकको मिटानेके लिये ईमानदारी तथा विवेककी आवश्यकता होती है । समाजवादी व्यवस्थामें भूमि, सम्पत्ति, उत्पादनके साधन सबपरसे स्वतन्त्रता समाप्त हो जाती है। सरकारी वस्तु या सहकारिताके आधारपर होनेवाले उत्पादनोमें कोई व्यक्ति इच्छानुसार उपयोग नहीं कर सकता । किसी अतिथिको भोजन कराना हो या किसी समय जाड़ेकी रात काटनेके लिये धानकी भूसीकी ही आवश्यकता हो तो भी अपनी वस्तु-जैसा उसका यथेष्ट विनियोग नहीं किया जा सकता । गेहूँ- जौके खेतसे दम बाली या बजड़े, जुआर या मक्काके कुछ बाल भी शामिलात खेतोंसे स्वतन्त्रतापूर्वक नहीं लिये जा सकते । शहरकी अपेक्षा गाँवोंमें यही विशेषता है । वहाँ हर वस्तुके लिये दामकी अपेक्षा नहीं रहती । किसान स्वतन्त्रता- पूर्वक वस्तु तैयार करता है । स्वतन्त्रतापूर्वक विनियोग करता है । सर्षप, वास्तुक, पालक आदिके शाक इच्छानुसार पैदा किये जा सकते हैं । थोड़े ही खेत तथा थोडी ही सम्पत्तिमें अपने कुटुम्बके उपयोगकी सब वस्तु तैयार कर ली जाती है— तरुणं सर्षपशाकं नवोदनं पिच्छलानि च दधीनि । अल्पव्ययेन सुन्दरि ग्राम्यजनो मिष्टमश्नाति ॥ उसीमेंसे अन्नदान, वस्त्रदान, सुवर्ण-रजतदान, यज्ञ, तीर्थयात्रा सब कुछ कर लेता है । समाजीकरणमें यह सब कुछ नहीं बन सकता । कुत्तोंको रोटी मिल

मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था ४१७ जायगी किंतु भूँकनेकी स्वतन्त्रता न रह जायगी । बकरीको चना मिल जायगा, किंतु जुगाली करनेकी स्वाधीनता न रहेगी । ऐसे ही किसी तरह कुछ रोटी-कपड़ा मिल जायगा, पर धार्मिक आचार-विचारोंकी स्वतन्त्रता नहीं रह जायगी । रामराज्य-प्रणालीमें सब प्रकारकी स्वाधीनता एवं सामञ्जस्य होनेसे संघर्ष बचेगा । धर्मनियन्त्रण तथा विवेकसे अभ्युदय तथा आर्थिक संतुलन एवं समन्वय हो सकता है। व्यक्तिगत-सम्पत्तिका सिद्धान्त रहनेपर ही उत्तराधिकारकी बात चलती है । यह भी पशुओंकी अपेक्षा मनुष्योंकी ही विशेषता है कि पिता-पितामह आदिकी सम्पत्ति पुत्र-पौत्रोंकी बपौती सम्पत्ति होती है, एतदर्थ धर्मका सम्बन्ध भी अनिवार्य होता है । पिता आदिको पिण्ड-श्राद्धादि प्रदान करनेके अधिकारी ही दायाधिकारी होते हैं । इसके लिये प्रत्यक्ष-अनुमानसे भिन्न एक वचन प्रमाण भी मानना पड़ता है । पिताकी सम्पत्तिपर विवाद उठनेपर सिद्ध करना पड़ता है कि अमुक हमारे पिता हैं । इसे सिद्ध करनेके लिये प्रत्यक्षानुमान असमर्थ हैं । इसमें तो माता- पिताका वचन ही प्रमाण मानना पड़ता है । उसके बिना पिता आदिकी सिद्धि नहीं हो सकती । वचन प्रमाण माननेपर ही माता-भगिनी, पुत्री-पत्नी आदिमें भी भेद सिद्ध होता है । तदनुसार ही संसारभरमें सर्वत्र भेद-व्यवहार चलता है । पत्नी, पुत्री, भगिनी सभी स्त्री हैं । फिर भी पत्नी, भगिनी आदिके साथ व्यवहार- भेद करना पड़ता है । पशुओंमें प्रत्यक्षानुमान तो मान्य है, किंतु आगम—वचन प्रमाण मान्य नहीं है, अतः उनके यहाँ न व्यक्तिगत सम्पत्ति है न उत्तराधिकार है और न पत्नी, भगिनी, पुत्री, माता आदिका भेद-व्यवहार ही चलता है । वह इनमेंसे किसीको भी पत्नी बनाकर संतान पैदा कर सकता है, पर यह सब मानवताके विपरीत है । जिस दिन मनुष्य भगिनी-पुत्रीसे संतान उत्पन्न करने लगेगा, उस दिन मनुष्यता-पशुतामें कोई भेद न रहेगा । कम्युनिष्ट भी ऐसा करनेका साहस नहीं कर सकता है । इस तरह रामराज्य-प्रणालीमें आगम-प्रमाण तथा धर्मका भी आदर कर पितृपितामहादिकी सम्पत्तिका उत्तराधिकार तथा धार्मिक विवाहादिकी मान्यता होती है । स्वार्थ-परार्थका समन्वय करके व्यष्टि-समष्टिके अभ्युदयका प्रयत्न किया जाता है । यह सही है कि लोभाभिभूत व्यक्ति या राष्ट्र आत्मनाश नहीं देखते । हरित तृणके लोभमें बकरी कूप-पतनकी चिन्ता नहीं करती है, मधुलोभमें पड़कर प्राणी आत्मप्रपात नहीं देखता, पर कोई भी समझदार सर्वनाश देखकर समझौता करता ही है । अमेरिका और रूस दोनों ही एक-दूसरेका नाश चाहते हैं । दोनों ही परमाणु, हाइड्रोजनबमकी धमकी देते हैं । तथापि एक दूसरेके भयसे नियन्त्रित मा० रा० २७—

है; तभी तो आज सह-अस्तित्वका राग अलापा जा रहा है । यदि रूसी साम्राज्य- वादियोंके साथ सह-अस्तित्व सम्भव समझते हैं, तब तो साम्राज्यवादी भी परस्पर तथा आत्महितकी कामनासे अपने लोभकी मात्राको संकुचित कर सकते हैं । इस समय संयुक्तराष्ट्रसंघद्वारा भी बहुत कुछ नियन्त्रण और समन्वय हो सकता है । मार्क्सवादियोंके मतानुसार भी जब अन्ताराष्ट्रिय मजदूर-राज्य स्थापित हो जायगा, तभी सब संघर्षोंका अन्त हो सकता है । धर्मनियन्त्रित रामराज्यवादीके सार्वभौम शासनमें तो स्पष्ट ही उसके द्वारा सब अन्यायोंका निराकरण हो जायगा । इसे ऐतिहासिक अनुभवोंके विपरीत नहीं कहा जा सकता । भले ही आधुनिक मनगढंत मिथ्या इतिहासके अनुसार रामराज्य ऐतिहासिक तथ्य न हो, परन्तु आर्ष प्राचीन इतिहासके अनुसार अखण्ड भूमण्डलव्यापी सार्वभौम रामराज्य परम ऐतिहासिक तथ्य है । हाँ, मार्क्सका सर्वहारा राज्य अभीतक निराकार स्वप्न ही है । इतिहास साक्षी है कि धर्महीन, जडवादी राज्य कभी पनप नहीं सका है। शान्ति और समन्वय तो धर्महीन राज्यमें असम्भव है । काट्स्कीका अन्ताराष्ट्रिय पूँजीवादी साम्राज्यवाद तथा मार्क्सका विश्वव्यापी सर्वहारा राज्य मुकाबिलेकी ही चीज है । किंतु रामराज्यवादीका धर्मनियन्त्रित सार्वभौम राज्य सहस्रशः अनुभूत प्रयोग है । मान्धाता, दिलीप, अज, रामचन्द्र, नहुष, पुरूरवा, अलर्क आदिका अखण्ड भूमण्डलवर्ती धर्मराज्य पूर्णतया शान्तिके स्थापक रह चुके हैं । लाखो वर्षोंके अनुभवोंके सामने सौ-दो सौ-वर्षके मार्क्सवादी अनुभव कुछ भी मूल्य नहीं रखते । मार्क्सवादी सर्वहारा राज्य या पूँजीवादियोका अन्ताराष्ट्रिय साम्राज्य- वाद किसी पथको अपनाये, उसमें धर्म-नियन्त्रणके बिना लूट-खसोटका अन्त नहीं हो सकता ।

मार्क्सवादमें यह भी कहा जा सकता है कि वहाँ किसीके पास कुछ चीज़ नहीं रह जायगी, फिर कौन किसकी क्या चीज लूटेगा ? इसमें तो सभी फाँकेमस्त ही होगे, परंतु रामराज्य-प्रणालीमें तो सार्वभौमका नाममात्रका ही नियन्त्रण होगा, वस्तुतः सर्वोपरि धर्मका ही नियन्त्रण मुख्यरूपसे रहेगा । मार्गमे पड़े हुए दो लाख- कें नोट पाकर जिसका है उसे लौटा देनेकी सलाह मार्क्सवादी नही दे सकता । यह तो रामराज्यवादी ही कह सकता है । परान्न या परद्रव्य मार्गमें हो चाहे गृहमें ही पड़ा हो, विधिपूर्वक बिना पाये नही लेना चाहिये । यहाँ तो बाजारोंमें माल भेजनेका उद्देश्य केवल मुनाफा नहीं, किंतु वितरण ही है । लाभ भी अवश्य हो सकता है, किंतु वह आनुषङ्गिक है, मुख्य नहीं । अतएव किसीके द्वारा किसी राष्ट्रके शोषण- की भी बात नहीं आयेगी, क्योकि समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताके दृष्टिकोणसे जैसे एक व्यक्ति दूसरेका पोषक होगा, वैसे ही एक राष्ट्र, एक वर्ग भी दूसरे राष्ट्र, दूसरे वर्गोंका शोषक न होकर पोषक ही होगा ।

मार्क्सवादियोंका यह आरोप पाश्चात्त्य पूँजीवादियोंके लिये सही हो सकता है कि पैदावार समाजके हितार्थ नहीं होता, मुनाफा कमानेके लिये ही होता है, किंतु रामराज्यवादियोंके लिये यह आरोप सर्वथा निराधार ही है, क्योंकि रामराज्यवादीके मतमें तो बलवान्‌का बल शोषणके लिये नहीं रक्षणके लिये है। धनवान्‌का धन शोषणके लिये नहीं दानके लिये होता है। उत्पादनसे समाजको वस्तु मिलेगी। उत्पादकको लाभ भी मिल सकता है। आम्रका सिञ्चन भी हो जाय, पितरोंका तर्पण भी हो जाय—‘एकक्रिया द्व्यर्थकरी’का उदाहरण स्पष्ट है। मार्क्सवादियोंका यह कथन भी सही नहीं कि ‘आर्थिक शोषणके कारण ही संग्राम होते हैं।’ सदा अनेकों कारणोंसे संग्राम होते ही रहे हैं। जैसे समान लक्ष्य रहनेपर भी कम्युनिष्टोंमें पदाधिकार-लिप्सासे मारकाट होती रहती है, उसी तरह सार्वभौम बननेकी इच्छासे भी अनेको युद्ध हुए हैं। मनुष्योंमें ही क्या, पशु-पक्षियोंमें भी तो विभिन्न कारणोंको लेकर सघर्ष तथा युद्ध होते रहते हैं, कहीं सम्पत्तिके लिये, कहीं भूमिके लिये, कहीं कन्याके लिये, कभी धर्मके लिये, कभी मान-प्रतिष्ठा, इज्जत-आबरूके नामपर भी संग्राम हुए हैं। देवताओं-असुरोंका संग्राम कौरव-पाण्डवोंका संग्राम, राम-रावणका संग्राम केवल आर्थिक विषमताके लिये नहीं हुए। संसारमें प्रतिस्पर्धासे उन्नति होती है। आजकल भी अन्नोत्पादनमें, पशुपालनमें, तैरनेमें, उड़नेमें, चलनेमें—हरबातोंमें प्रतियोगिता चलती है। प्रतियोगिता उन्नति- का मूल है, एतदर्थ पुरस्कार भी वितरण किया जाता है। प्राणीका यह स्वभाव भी है कि लाभके लोभ और हानिके भयसे उत्प्रेरित होकर वह तन्मयतासे काम करता है, अतः उत्पादनमें होड़ होना अनुचित नहीं है। फिर भी रामराज्यकी नीतिका अनुवर्तन करनेसे आर्थिक असंतुलन नहीं हो सकता। धनका धर्मार्थ, यशोऽर्थ, अर्थार्थ, कामार्थ और स्वजनार्थ इस तरह पञ्चधा विभाग होनेमे आर्थिक असंतुलन अवश्य ही दूर हो सकता है। यज्ञादि प्रसङ्गसे भी अर्थका वितरण होनेसे आर्थिक असंतुलन दूर होता है। रामराज्यकी दृष्टिमें एक वर्ग दूसरे वर्गका पोषक होता है, शोषक नहीं। रामराज्यमे कोई भी दरिद्र, दुखी, अबुध और लक्षणहीन नहीं था— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ सब प्राणी परस्पर प्रेम करते थे, सब स्वधर्म निरत थे, और सब श्रुतिके अनुसार चलते थे— सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥ हाथी और शेर प्रेमसे साथ-साथ विहार करते थे— चरहिं एक सँग गज पंचानन। धन, विद्वान् और शक्तिमानोंका बाहुल्य होना राष्ट्रका भूषण है, दूषण नहीं। जब सभी समानरूपसे बलवान्, बुद्धिमान् एव समान क्रियावान् नहीं होते, तब सभीके

४२० मार्क्सवाद और रामराज्य समान धनवान् होनेकी कल्पना भी व्यर्थ है। निर्बल बलवान्का सहारा चाहता है, अल्पबुद्धि विपुल बुद्धिकी अपेक्षा करता है। इसी तरह सब लोग समानरूपसे धनार्जन नहीं कर सकते, अतः अल्पधन भी विपुलधन-सम्पन्नकी अपेक्षा कर सकता है। इसीलिये योग्यता एवं आवश्यकताको ध्यानमें रखते हुए ही 'चींटीको कणभर और हाथीको मनभर' के अनुसार सभीके लिये समुचित काम, दाम और आरामकी व्यवस्था होनी चाहिये—यह रामराज्यका सिद्धान्त है। इससे लूले, लँगड़े, वृद्ध-अपाहिज आदिका भी निर्वाह होगा। इसी दृष्टिसे सबको सस्ता कपड़ा, सस्ती रोटी, सस्ता आवास-स्थान, सस्ती शिक्षा, सस्ती चिकित्सा और सस्ता न्याय सुलभ हो सकेगा। उद्यमोंमें होड़, बाजारों, पेट्रोल, कोयलों आदिके लिये संग्राम आदि तबतक अवश्य बने रहेंगे, जबतक एक राष्ट्रसे दूसरे राष्ट्रका भेद बना रहेगा। सिद्धान्त और शासनकी दृष्टिसे एक दूसरेको अपनेमें मिलानेके लिये सभी प्रयत्न- शील बने ही रहेंगे। सब कम्युनिष्ट हो जायें, सब सोवियत-संघमें मिल जायें, तभी संघर्ष रुक सकता है। परंतु फिर भी लेनिन, ट्राटस्की, स्टालिन आदिमें जैसे संघर्ष चला, वैसे ही सत्ता हथियानेके लिये संघर्ष चल ही सकता है। इस दृष्टिसे सर्वोत्तम पक्ष धर्म-नियन्त्रित शासनका है, जिसमें पृथक्-पृथक् शासन रहनेपर भी युद्ध, संघर्षसे सब दूर रह सकते हैं। यदि अखण्ड भूमण्डलका एक ही धर्म- नियन्त्रित शासक हो, तभी सब सुख-स्वप्न पूरे हो सकते हैं। जिन कम्युनिष्टोंका वर्ग-भेद, वर्ग-संघर्ष एवं वर्ग-विध्वंस ही अभ्युदयका मार्ग है, उनकी सद्भावना और भ्रातृता कैसी है—यह समझनेमें किसीको कठिनाई न होगी। सब चीजें समाजकी हों यही कहकर सब चीजें मुट्ठीभर मजदूर अधिनायकोंके हाथकी ही बना दी जायेंगी। बैलगाड़ीवालो, ऊँटवालो, गधेवालों—सबका पूर्ण सत्यानाश तो कम्युनिज्ममें ही होगा। किसान, व्यापारी तथा बुद्धिजीवी-वर्गको भी कम्युनिष्ट अधिनायकोंके दास बनकर ही गुलामीका जीवन बिताना पड़ता है। नमूनेके तौरपर कुछ शहरो, ग्रामोंमें अवश्य मजदूरोंको स्वर्ग दिखायी दे, परंतु व्यापक तौरपर रूसकी कहानी तो कुछ और है। जो इसे अपनी आँखों देख चुके हैं, उनके वर्णनोंको 'पत्थरके देवता' नामक पुस्तकमें कोई भी देख सकता है। जो कहा जाता है कि 'कम्युनिज्ममें हर काम हर व्यक्तिको सिखलाया जायगा' यह भी अत्यन्त अव्यावहारिक बात है। सब काम सब नहीं कर सकते, सब काममें सबको दक्षता भी नहीं प्राप्त हो सकती है। प्रत्येक व्यक्तिको उच्चकोटिकी मोटरें, नये-नये वायुयान सुलभ कर देना कम्युनिस्टोंका दिमागी पुलावमात्र है। जब सैनिक और सेनापति, शासक और शासितका भेद न रहेगा, तब कोई भी व्यवस्था न चल सकेगी। यदि उपर्युक्त भेद रहेगा तो रूपान्तरसे वही स्वामी और सेवकका

[Page header] माक्र्सीय अर्थ-व्यवस्था ४२१

भाव आ ही जाता है । अफसर और मातहत लोगोंमें भी वही भावनाएँ चलती हैं । धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे ही प्राणी अत्याचार, पापाचार आदिसे- बचता है । अन्यथा शासकोंकी आँखमें धूल डालकर लोग मनमाना अनाचार, दुराचार कर सकते हैं । धर्म और ईश्वरकी कल्पना न होनेसे ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र परस्पर एक दूसरेसे जाल-फरेब करते हैं । धर्म और ईश्वरपर विश्वास होनेसे प्राणिमात्रमें परमेश्वरका अस्तित्व दिखायी देता है । सब प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं (‘अमृतस्य पुत्राः’), फिर किससे विग्रह और किससे वैर ? यह भावना सिवा अध्यात्मवादके जडवादमें कभी पनप ही नहीं सकती । अध्यात्मवादमें ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का पाठ पढाया जाता है । जडवादमें तो थोड़ा-सा ही मतभेद होनेपर एक दूसरेको मौतके घाट उतार देनेकी बात सोची जाती है । रामराज्य ही महायन्त्रोंका निर्माण रोकना और उद्योग-धंधोंका विकेन्द्रीकरण करना चाहता है, परंतु कम्युनिज्ममें तो यन्त्रीकरणका विस्तार ही अभीष्ट है, फिर छोटे-छोटे कारीगरों या बैलों, ऊँटों, गधों आदिकी समस्या कम्युनिज्ममें कैसे हल होगी ? रामराज्य-परिषद्की दृष्टिमें आर्थिक असंतुलन दूर करनेकी पूर्ण योजना है ही । पूँजी और श्रम दोनोंही उत्पादनके मूल हैं । दोनोंकी उचित कदर की जायगी । विविध प्रकारके करों तथा आयात-निर्यातोंके सम्बन्धमें सदा ही समष्टि तथा व्यष्टिके हितोंका ध्यान रखा जाता है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व—सभी आत्मोन्नतिके उपाय कर सकते हैं, परंतु समष्टिके परस्पर हितका सामञ्जस्य रखना उनका अनिवार्य कर्त्तव्य है । यह केवल कम्युनिस्टोंकी ही बात नहीं है, किसी भी शासनमें समूचा राष्ट्र ही एक कुटुम्ब माना जाता है । सर्वत्र राष्ट्रके उन्नायकों, नेताओं तथा प्रबन्धकोंकी योग्यता और ईमानदारीके अनुसार- ही उत्पादन एवं वितरणकी ठीक-ठीक व्यवस्था होती है । खपतके अनुरूप ही माल पैदा करनेका नियम रामराज्य-पद्धतिमें रहता है, क्योकि समष्टि-हितके अविरुद्ध ही व्यष्टिको प्रत्येक कार्य करनेकी स्वाधीनता मान्य है । शास्त्रों एवं तर्कोंसे किसीकी बपौती, मिल्कियत एवं गाढे पसीनेकी कमाई और दान या पुरस्कारमें पायी हुई सम्पत्तिका अपहरण करना अन्याय एव पाप है । अवश्य ही उत्पत्तिके पुराने साधनों एव पद्धतियोंमें रद्दोबदल होनेसे उत्पादनमें विस्तार हो जाता है । उत्पन्न वस्तुओंमें सस्तापन भी आता है, आमदनी- में भी वृद्धि हो जाती है । खपतके लिये बाजारोंकी आवश्यकता, माल भेजने, मँगानेके लिये एवं कारखानोंके लिये कोयले, पेट्रोल आदिके खानोंकी आवश्यकता, बाजारों एवं कोयले, पेट्रोल आदिके लिये संघर्ष और बेकारीकी समस्या आदि भी खडी हो जाती हैं । इसीलिये रामराज्यमें उद्योगोंका विकेन्द्रीकरण ही अभीष्ट

है । छोटे-छोटे व्यवसायोंद्वारा स्वावलम्बी ढंगसे बेकारी दूर करके व्यापक- रूपसे रोजगारोंकी व्यवस्था की जाती है। कम्युनिष्ट यद्यपि बड़ी-बड़ी पुस्तकोंमें कल- कारखानोंके द्वारा गरीबोंके रोजगार छिन जानेकी चीख-पुकार मचाते हैं, परंतु उन्हीं कल-कारखानोंका वे समर्थन भी करते हैं। इतना ही क्यो, वे कल-कारखानों- के विस्तारसे ही लाखोंकी संख्यामें मजदूरोका एकत्रित एवं संगठित हो सकना और मजदूर-आन्दोलनोके द्वारा कम्युनिष्टराज्य-स्थापनाका भी स्वप्न देखते हैं। ईश्वर एव धर्मकी भावना दृढ़ होनेसे वैभव एवं सम्पत्तिवाले अपनी सम्पत्तिका सदुपयोग राष्ट्रके पोषण तथा जीवन-स्तर उन्नत करनेमें करेंगे। बेकारी दूर करनेके काममें उनकी सम्पत्ति उपयुक्त होगी । इसीलिये प्राचीनकालमे आजकी अपेक्षा कहीं अधिक सम्पत्ति, शक्ति, बल, विद्या और दक्षताके रहनेपर भी असंतुलित विषमता, बेकारी, कलह आदि नहीं थे। ईश्वर एवं धर्मकी भावना घटनेसे ही मात्स्य न्याय, परस्पर भक्ष्य-भक्षकभाव, शोषक-शोषितभाव बढ़ता है और उसे ही मार्क्सवादी गुण मानते हैं। वर्ग-कलह, वर्ग-विद्वेष तथा वर्ग-विध्वंस ही जिस संस्थाके सिद्धान्त एव आधार हों, वे ही जिसके जीवन एव उन्नतिके एक- मात्र साधन हों, उससे विश्वशान्ति एवं विश्वमें समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ताकी स्थापनाकी आशा करना व्यर्थ ही है । उत्पादन-विस्तारसे इस तरह कुछ भौतिक परिवर्तन होनेपर भी धर्म, दर्शन एव राजनीतिक-नियमों, स्वत्वोंमें रद्दोबदलका कोई प्रसङ्ग नहीं होता । अमेरिका आदिकोंमें बिना मौलिक रद्दोबदलके भी काम चलता ही है। आर्थिक दशा सामाजिक, धार्मिक नियमोंका नींव ही नही है, जिससे कि आर्थिक दशामें परिवर्तन होनेसे सामाजिक, धार्मिक नियमरूपी भवन ढह पड़े और उनमें रद्दोबदल करना आवश्यक हो । जो यह कहा जाता है कि 'जिन लोगोंने उत्पादन-साधनोंमें रद्दोबदल कर लिया, उन्हे उत्पन्न हुई वस्तुओंके वितरण- सम्बन्धी नियमोंमें भी परिवर्तन कर लेनेका अधिकार मानना न्यायसङ्गत है। अतः पुत्र-पौत्र आदिका पिता-पितामहकी सम्पत्तिपर दायभूतसे बपौती-सम्पत्तिके रूपमें अधिकार माननेके नियममे भी हेरफेर करके तथा सभी स्वत्व-सम्बन्धी पुराने नियमोंमें परिवर्तन करके समाजीकरण या राष्ट्रीयकरणका सिद्धान्त माना जाना ठीक ही है।' परंतु यह बात विचारणीय है कि उत्पादन-साधनोंमें परिवर्तन करनेका मुख्य श्रेय किसको है ? क्या साधारण मजदूर-समुदायको ? नही, मानना पड़ेगा कि इसका पहला श्रेय बडे वैज्ञानिको एव अन्वेषकोको है । फिर ऐसे भी बहुतसे शाश्वत नियम हैं, जिनमें परिवर्तन असम्भव है। ऐसी दशामें यह सब कथन भी निस्सार है। इसपर विस्तृत विचार आगेके ४२८ से ४३२ पृष्ठोंपर देखना चाहिये।

सप्तम परिच्छेद ऐतिहासिक भौतिकवाद इतिहास क्या है ? मार्क्सके ऐतिहासिक भौतिकवादपर विचार करनेके पूर्व यह समझना आवश्यक है कि 'इतिहास' है क्या ? यूनानी भाषामें इतिहास (हिस्ट्री) का अर्थ जिज्ञासा होता है । मुसलमानोंमें शिक्षापूर्ण उच्च आदर्शका वर्णन ही इतिहास समझा जाता था । फ्रांसके प्रसिद्ध लेखक वाल्टेयरके अनुसार मनुष्यकी मानसिक शक्तिका वर्णन ही इतिहास है, छोटी-छोटी घटनाओंका वर्णन इतिहास नहीं । उसके अनुसार शासकोंका वर्णन भी इतिहास नहीं, किंतु 'मनुष्य जंगलीसे सभ्य कैसे हुआ', इस विकासका वर्णन ही इतिहास है । विज्ञान-वृद्धिसे विज्ञानका अनुसरण इतिहासमें भी होने लगा । प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, मुद्राओं, खण्डहरोंद्वारा सत्यका अनुसंधान होने लगा । व्यूरी-जैसी प्रसिद्ध लेखिकाने कहा कि 'इतिहास एक विज्ञान है।' एक फ्रांसीसी लेखकका कहना है कि 'इतिहास शुद्ध विज्ञान है।' परंतु दूसरे लोग कहते हैं कि इतिहास कभी विज्ञान नहीं हो सकता । लेख-मुद्राओंके द्वारा भी सत्य घटनाओंका ज्ञान नहीं हो सकता । लेखोंमें परस्पर विरोध भी होता है । कुछ लोग 'इतिहास' को एक 'कला कहते हैं किंतु कलामें विशेषरूप देनेके लिये वस्तुकी कुछ काट-छाँट करनी पड़ती है, और ऐसा करनेमें सत्य अंश छिप जाता है । कुछ लोगोंका कहना है कि कला लेखन-शैलीमें होनी चाहिये । विज्ञान घटनाओंके अनुसंधानमें होना चाहिये । विश्वमें पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग भी हैं, उनका प्रभाव भी इतिहासपर पड़ता है । १४ वीं शतीमें युरोपमें प्लेगका भीषण प्रकोप हुआ था । उससे डेढ करोड़ मनुष्य मरे थे । इसके कारण वहाँ बड़ा भारी धार्मिक एवं राजनीतिक उथल- पुथल हुआ था । इन सबका कारण चूहे ही थे । हैजा आदि भी कीटाणुओंके ही परिणाम हैं । नेपोलियनकी अजेय सेना संग्रहणीके कीटाणुओंका शिकार बनकर रूसमें नष्ट-भ्रष्ट हो गयी थी । जंगल नष्ट होनेसे जमीनका कटाव बढ गया । प्रकृतिकी उथल-पुथलसे कितने ही साम्राज्य भूगर्भमें विलीन हो गये । कभी-कभी साधारण- साधारण घटनाओंसे ही इतिहासका कायापलट हो जाता है । फ्रांसकी क्रान्तिके दिनो वहाँका राजा लुई भाग निकला । रास्तेमें एक गाड़ी पड़ी होनेके कारण उसका मार्ग रुक गया । गाड़ी हटानेमें देर होते ही भीड़ एकत्रित हो गयी। राजा पहचाना गया और पकड़ लिया गया । यदि वह भागकर राज-भक्त सेनामें पहुँच गया होता तो क्या फ्रांसकी क्रान्ति सफल हो सकती थी ?

४२४ मार्क्सवाद और रामराज्य हीगेलके अनुसार 'इतिहास ईश्वरकी आत्मकथा है। वह मनुष्योंको अपनी रुचि- के अनुसार कार्य करने देता है। उनका फल वही होता है, जो ईश्वर चाहता है।' इंग्लैण्ड- के डिल्टन मेरका मत है कि 'संसार अज्ञातरूपसे, पर बड़े कष्टपूर्वक ईश्वरकी ओर बढ़ रहा है—मेरे लिये इतिहासका यही अर्थ है।' यह भी एक पक्ष है कि इतिहास- में निष्पक्षता हो ही नहीं सकती । लेखक जिस देशकालमें रहता है, उसका प्रभाव उसपर अवश्य होता है । अतः वह अतीतको भी वर्तमानके चश्मेसे देखता है। जर्मन इतिहासज्ञों- का कहना है कि 'जर्मनीके जंगलो, पहाड़ों, नदियो तथा जर्मन वीर-गाथाओंका गौरव- पूर्ण वर्णन ही इतिहास है।' एक इटालियनका कहना है—'यदि प्राचीन इतिहासके अध्ययनसे हममें उत्साह नहीं बढ़ता तो फिर गड़े मुर्दे खोदनेकी क्या आवश्यकता ?' कुछ लोगोंका मत है कि इतिहास अपनेको दोहराता रहता है । दूसरे कहते हैं— 'प्राचीन घटनाओंकी पुनरावृत्ति असम्भव है।' कुछ लोग 'विशिष्ट ऐतिहासिक व्यक्तियोंका विस्तृत वर्णन ही इतिहास' समझते हैं । कुछ लोग छोटी-से-छोटी घटनाओंका भी इतिहासपर प्रभाव मानते हैं । मेरके अनुसार सार्वजनिक घटनाओं- का क्रम-बद्ध वर्णन ही इतिहास है । प्रो० हॉर्नशॉकी रायमें विश्व-घटनाओंकी गति या उसके कुछ अंशका वर्णन इतिहास है। लार्ड ऐक्टनका कहना है कि विश्व- का इतिहास राष्ट्रोंके इतिहासका संग्रह नहीं, किंतु वह लगातार विकास है। वह स्मरण-शक्तिके लिये भार न होकर आत्माके लिये प्रकाश है। 'स्टडी आफ हिस्ट्री' के अनुसार 'इतिहासका आधार राष्ट्र नहीं हो सकता । अपने राष्ट्रको ही विश्व मान लेना भूल है। वह तो विश्वका अङ्गमात्र है, इसी दृष्टिसे उसका इतिहास लिखा जाना चाहिये।' मिस्टर वेल्सके अनुसार मानव जाति ही राष्ट्र है। इस तरह इतिहासके सम्बन्धमें अनेक प्रकारकी धारणा होनेपर भी इतिहासका उद्देश्य सत्यकी खोज अवश्य होना चाहिये। इससे भिन्न उद्देश्य होनेपर घटनाओं- की खींचा-तानी तोड़-मरोड़ अवश्य करनी पड़ेगी । 'आई फाउण्ड नो पीस' के लेखक मिस्टर वेन मिलरका कहना है कि आँखों देखी घटना भी ठीक नहीं बतायी जा सकती । दो आदमी उसे भिन्नरूपसे देखते हैं । प्रत्येक व्यक्तिकी कल्पना अलग ही चलती है। पत्रों, सरकारी लेखोंमे भी भाव बदले जाते हैं। फिर हजारों वर्ष पुराने इतिहासका वर्णन सत्य कैसे हो सकता है ?' वस्तुतः इसीलिये रामायण, महाभारत आदि आर्ष इतिहासके लेखक वाल्मीकि, व्यास आदि ऋषि प्रत्यक्षा- नुमान या संवाददाताओंके तारों, पत्रोंके आधारपर नहीं, किंतु समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञाके अनुसार घटनाओंको पूर्णतया जानकर ही इतिहास लिखनेमें संलग्न हुए थे। वैदिकोंके यहाँ वेदार्थ जाननेमें इतिहास-पुराणका अत्यन्त उपयोग है—'इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्', पुराणमितिवृत्तमाख्यायिको- दाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रञ्चेतीतिहासः । (कौ० अर्थ० १ । ५ । १४) ब्रह्मादिपुराण, रामायण महाभारतादि इतिहास, वृहतकथादिआख्यायिका, मीमांसादि उदाहरण, मनु