मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अभिन्नता प्रतीत होती है, उसी तरह 'सैवेयं मृत्तिका' वही यह मिट्टी है, इत्यादि स्थलोंमें भी सादृश्यके कारण ही अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है, उनका कथन भी ठीक नहीं; क्योकि एक स्थायी अनुभविता न होनेसे पूर्वोत्तर कालवर्ती तत्पदार्थएव इदं पदार्थका ग्रहण ही नहीं होगा । उनके ग्रहण हुए बिना 'तेनेद सदृशम्' यह सादृश्य-बुद्धि ही नहीं होगी । फिर सादृश्य-बुद्धिमूलक भी प्रत्यभिज्ञाको कैसे कहा जा सकता है ? कोई भी क्षणिक बुद्धि या क्षणिक द्रष्टा भिन्न कालवर्ती पदार्थोंको नहीं ग्रहण कर सकता । इस सम्बन्धमें विज्ञानवादी बौद्धोंका कहना है कि बाह्यार्थके बिना ही बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, अतः सादृश्य बिना ही अर्थात् असत् सादृश्यमें ही सादृश्य-बुद्धि होती है । परंतु इस तरह तो तत् पदार्थ और इद पदार्थकी बुद्धि भी सादृश्य-बुद्धिकी तरह ही असद्विषयक ही समझी जायगी । यदि कहा जाय कि ऐसा भी अभीष्ट ही है अर्थात् विज्ञानवादी बाह्य अर्थका अस्तित्व ही नहीं अङ्गीकार करता । अतः सभी बुद्धियाँ बाह्य विषयके बिना ही उत्पन्न होती हैं तो यह भी ठीक नहीं, क्योकि फिर तो बुद्धि, बुद्धि भी असद्विषयक ही होगी । अतः बाह्य अर्थके समान ही आन्तर अर्थ ( बुद्धि ) का भी असत्त्व सिद्ध हो जायगा । यद्यपि शून्यवादी इसे भी अभीष्ट ही मानता है, तथापि यदि सर्वबुद्धि मिथ्या ही हो तो असद्बुद्धि भी मिथ्या हो जायगी । फिर तो असत् या शून्यकी सिद्धि भी असम्भव ही होगी । इसलिये सादृश्य-बुद्धिसे प्रत्यभिज्ञा होती है—यह कहना गलत है । तथा च कार्योत्पत्तिके पहले कारणका सद्भाव सिद्ध होता है । संसारमें तम आदिद्वारा प्रावृत घटादि वस्तु आलोकादिके द्वारा प्रावरण तिरस्कार- से अभिव्यक्त होती है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व होता है। उसी तरह घटादि कार्य भी कारण-व्यापारद्वारा आवरण तिरस्कारसे अभिव्यक्त होता है । अतः अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व मान्य होना चाहिये । जैसे अविद्यमान वस्तु सूर्योदय होनेपर भी उपलब्ध नहीं होती, उसी तरह कार्य यदि उत्पत्तिके पहले अविद्यमान होता तो कारक-व्यापारसे भी उसकी अभिव्यक्ति सर्वथा असम्भव ही होती । कहा जा सकता है कि सत्कार्यवादीके मतानुसार यदि घटादि कार्य कभी भी अविद्यमान नहीं है, तब तो सूर्योदय होनेपर उसका सदा ही उपलब्ध होना चाहिये, किंतु यह ठीक नहीं; क्योकि आवरण दो प्रकारके होते हैं—जैसे अभिव्यक्त घटका तम आदि आवरण है, उसी प्रकारसे अभिव्यक्तिके पहले अनभिव्यक्त घटका आवरण है मृदादि अवयवोका पिण्डादि कार्यान्तररूपसे संस्थान । इसलिये जबतक मृदादि अवयवोंकी पिण्डादि कार्यान्तररूपसे स्थिति रहती है, तबतक अर्थात् उत्पत्ति- के पहले घटादि कार्य उसी आवरणसे आवृत्त होनेके कारण उपलब्ध नहीं होते । उसी आवरणके भङ्ग होनेसे घटादि कार्योंकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है । जैसे तम हटनेसे घटादिके व्यवहारका भाव होता है, वैसे ही पिण्डादिसे तिरोभूत
रहनेपर अभावका व्यवहार होता है । कपालादिसे तिरोभूत होनेपर घटादिके नष्ट होनेका व्यवहार हुआ करता है। कहा जा सकता है कि पिण्ड-कपालादि घटादिके समान देशवाले होनेके कारण आवरण नहीं हो सकते, क्योंकि तम और कुड्यादि (दीवार) आवरण घटादिसे भिन्न देशवाले होते हैं अर्थात् आवृतके देशसे भिन्न देशवाला ही आवरण होता है, परंतु पिण्ड-कपाल आदि तो सर्वथा आवृतके ही देशवाले होते हैं। यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि क्षीर जलके समान देशमें रहकर भी जलका आवरक रहता है । समानदेशत्व आवरणका बाधक है—इसका क्या अभिप्राय है ? एकाश्रयाश्रितत्व या एककारणत्व ? अर्थात् जो दो वस्तु एक आश्रयमें आश्रित होते हैं उनमें एक दूसरेका आवरक नहीं होता । अथवा जिन दो वस्तुओंका एक ही कारण होता है उनमें एक दूसरा आवरक नहीं होता। इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि एकाश्रयाश्रित होनेपर भी क्षीरके द्वारा क्षीरमिश्रित जलका आवरण होता ही है, तथा दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि कार्यभेदसे कारणका भेद होता है । अतः घटादिके
४९० मार्क्सवाद और रामराज्य वह अभाव क्या है ? घटका स्वरूप ही है या अर्थान्तर ? यदि प्रथम पक्ष कहे तो ठीक नहीं; क्योकि यदि घटस्वरूप ही हो तो घटके द्वारा उसका व्यपदेश कैसे हो ? अर्थात् अभेदमे घटका प्रागभाव इस रूपसे भेदमूलक सम्बन्ध व्यवहार कैसे होगा ? यदि कहा जाय कि कल्पित सम्बन्धको ही लेकर व्यवहार बनता है तो भी यही कहना पडेगा कि कल्पित अभावका ही 'घटस्य प्रागभावः' इस रूपसे व्यवहार होता है। घटस्वरूपका घटसे व्यपदेश नहीं बन सकता । यदि कहा जाय कि घटाभाव घटसे अर्थान्तर है तो वह घटसे अर्थान्तर कारणरूप ही हुआ तथा च घटप्रागभाव घटकारणरूप ही ठहरा । अभिव्यञ्जकके व्यापार होनेसे नियमेन घटकी अभिव्यक्ति होती है, अभिव्यञ्जक व्यापार न होनेसे नहीं । इस तरह अन्वयव्यतिरेकसे घटादि कार्योंके लिये कुलालादि-व्यापार सार्थक होते हैं । उस व्यापारसे आवरण-भङ्ग आर्थिक रूपसे हो जाता है । कारणमे वर्तमान एक कार्य इतर कार्योंका आवरक होता है । यदि घटादिके पूर्वाभिव्यक्त पिण्डादि
मार्क्स-दर्शन ४९१ उस तरह विकसित बीजमें अन्तर्विरोध, वर्गभेद, वर्गसंघर्ष एवं वर्ग- विध्वंसरूपी वाद-प्रतिवादके अङ्कुरका फलपर्यन्त विकास होना और उससे पुनः उसी प्रकार अङ्कुरानन्तररूपी विकासान्तरकी उत्पत्ति यद्यपि किसी अंशमें इष्ट है तथापि भूतोंकी उत्पत्तिमें यह नियम व्यभिचरित है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश बना रहता है। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होनेपर भी वायु नष्ट नहीं हो जाती, इसी प्रकार तेजसे जल एवं जलसे भूमि उत्पन्न होनेपर भी कारण बने ही रहते हैं। कार्यके विकासान्तर होनेपर प्रथम विकास समाप्त हो जानेका नियम सर्वथा अदृष्ट है। वृक्षसे फलोंके विकसित होनेपर भी वृक्षोंके नष्ट होनेका नियम नहीं है। मनुष्य, पशु आदिसे मनुष्य, पशु आदिकी उत्पत्ति होनेपर भी कारणका विनाश नहीं होता । भूत भी सावयव होनेसे कार्य है। जो-जो भी सावयव होता है, घटादिके समान कार्य ही होता है। साथ ही जो भी कार्य है, उसे सकर्तृक एवं सोपादान भी होना चाहिये। कर्त्ता चेतन होता है, इस दृष्टिसे ईश्वरसिद्धि होती है एवं कार्यकी अपेक्षा उपादान व्यापक, शुद्ध एवं नित्य होता है, इस दृष्टिसे कार्यकी अपेक्षा कारणकी अनश्वरता, स्वच्छता एवं व्यापकताका ही निर्णय होता है। इस तरह पृथ्वी जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एवं वायु आकाशसे उत्पन्न होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है। यहाँ वाद-प्रतिवाद, समन्वय आदिका सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता है। पाश्चात्त्य वैज्ञानिक कहते हैं 'कि गणितशास्त्रके किसी अङ्क चिह्नको लीजिये '+क'। इसका प्रतिषेध है '-क'। यदि '-क' से गुणाकर हम इसका प्रतिषेध करते तो इसका फल होता है 'क²'। प्रतिषेधके प्रतिषेधसे मूल अङ्क फिर लौट आया, लेकिन और ऊँचे स्तरपर अपने वर्गफलके रूपमें। इसमें कोई हानि- की बात नहीं है। यही नतीजा क और क के गुणासे भी प्राप्त होता है; क्योंकि 'क²' के वर्गमूलमें सदा दोनो अङ्क रहते हैं 'क' और '-क'। संख्याणुगणितके द्वारा किसी गणितकी समस्याका हल तो इसका और भी अच्छा उदाहरण है। दो अङ्क चिह्न 'क' और 'ख' ले लीजिये। जिनके परिवर्तनका आपसी सम्बन्ध निर्धारित है। यानी किसी एकमें परिवर्तन हो तो दूसरेमें परिवर्तनका स्थिरीकरण उस उक्त सम्बन्धसे हम कर सकते हैं। यदि हम दोनोका प्रतिषेध करें तो घटते-घटते ये दोनों अङ्क नहींके बराबर हो जाते हैं। लेकिन उनका पूर्व सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों बना रहता है । इसको अङ्कमें हम यों रख सकते हैं । संख्याणु+'क' / संख्याणु+'ख' लेकिन यह सम्बन्ध बराबर है, क/ख के अत इस प्रतिषेधके द्वारा जब हम उस समस्याको हल कर लेते हैं, तो हम फिर मूल अङ्कपर उपनीत होते हैं। पूर्व प्रतिषेध का प्रतिषेध और समस्याका हल हो गया।'
४९२ मार्क्सवाद और रामराज्य उपर्युक्त उदाहरण भी वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिपेधका नही। धन-ऋणका बढाव-घटावके रूपमें विरोध होनेसे यद्यपि धनका प्रतिषेध ऋणको कहा जा सकता है, ऋणके गुणनसे निकलनेवाले फलभूत वर्गफल सख्याको भी प्रतिषेधका प्रतिषेध कहा जा सकता है। परंतु केवल वह धनके रूपमें ही मूल सख्याके रूपमें है, वस्तुतः उसका रूप पृथक्-पृथक् है। जैसे अङ्कुर-कारणभूत यवका दाना और अङ्कुरका फलभूत यवके दाने पृथक्-पृथक् हैं। संख्यानुगणितका भी उदाहरण, इस सम्बन्धमें अनुकूल नही है। मूलका प्रतिषेध शून्यवत् ‘क’ अवश्य प्रतिषेधका प्रतिपेध है। उनके निर्धारित परस्पर सम्बन्धके आधारपर उसके प्रतिषेधसे मूलपर पहुँचते हैं, परंतु यह अपेक्षा-बुद्धि- की ही कलाबाजी है। इससे प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रतियोगी सत्त्व-व्यवस्थापन-जैसी कोई चीज नही निकलती। एक अपेक्षा-बुद्धिमे वही वस्तु पहली या दूसरी, छोटी या बडी हो सकती है, परंतु वस्तुतः वह विरोधात्मक नही हो सकती। ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद कहा जाता है कि 'इतिहासके लिये भी यही बात लागू है। सब सभ्य जातियोका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं। आरम्भ भूमिके सामूहिक स्वामित्वसे होता है। कृषिके विकासके लिये एक स्तरपर भूमि- का सामूहिक स्वामित्व उत्पादन-क्रियाके लिये बाधकस्वरूप बन जाता है। इसका अन्त किया जाता है, इसका प्रतिषेध होता है और कुछ बीचके स्तरोको पारकर व्यक्तिगत सम्पत्तिमें रूपान्तरित हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका ऊँचे स्तरपर विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत सम्पत्ति ही आगे चलकर कृषि-उत्पादनकी क्रियाके लिये बाधकस्वरूप हो जाती है। अब इसके प्रतिषेध- की और भूमिपर सामूहिक स्वामित्वकी माँग होने लगती है, लेकिन यह मूल- रूपसे बहुत भिन्न होगा, जिसमें आधुनिक आविष्कारोका पूरा उपयोग किया जा सकेगा।' पर यह कहना भी सङ्गत नहीं है। भूमिपर सामूहिक स्वामित्व ऐतिहासिक नहीं है। ईश्वर-निर्मित भूमि ईश्वरकी थी। बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिने भगवान वामनसे कहा था कि आपने क्रीड़ाके लिये ही जगत्की रचना की है, परंतु दुर्बुद्धि- लोग उसे अपना समझने लगते हैं। आप सर्वकर्ता हैं, आपहीद्वारा जीवोंमें भी कर्तृत्व सफल होता है, फिर बलि आदि आपको क्या दे सकते हैं— क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः । कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥ (श्रीमद्भा० ८।२२।२०)
ईश्वरके उत्तराधिकारी ब्रह्मा, इन्द्र, मनु आदि हुए। धर्म-नियन्त्रणकी स्थिति कमजोर पड़नेपर मात्स्यन्याय-निराकरणके लिये जनताने मनुको शासक बनाया। तदनन्तर विभिन्न व्यक्ति भी व्यष्टिभूमिके ही स्वामी हुए। प्राणियोंका कर्मद्वारा सृष्टिमें हाथ होता है, कर्मके अनुसार ही और भोग-साधन प्राप्त होते हैं। हैरण्यगर्भ, मनु आदिको कर्मानुसार समष्टि-भोग साधन मिलते हैं, सामान्य जीवोंको भी व्यष्टि-भोगसाधन भी कर्मोंके अनुरूप ही मिलते हैं। कोई वस्तु ईश्वर या प्रकृतिद्वारा निर्मित है, एतावता वह सबकी है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। एक स्त्री भी प्रकृतिद्वारा निर्मित होती है, तो भी उसपर माता-पिताका ही स्वत्व होता है। पश्चात् उनके द्वारा दिया हुआ स्वत्व पति आदिको मिलता है, या स्वयं वह जिसे स्वत्व समर्पण करती है, उसे मिलता है। जिस रूपमें भूमि, आकाशादिपर कभी सामूहिक स्वामित्व था, उस रूपमें आज भी है ही। भूमिपर सभी प्राणियोंको जीवित रहने, चलने बैठने, श्वास लेने, अवकाश ग्रहण करनेका अधिकार सदा मिला, आज भी है। परंतु विशिष्ट- रूपसे भूमिका स्वामित्व भूमिपतिका ही है। भूमिपतिद्वारा दिया हुआ सीमित भूमि- पतित्व अन्यलोगोंको भी प्राप्त हुआ। इसीलिये भूमिकर देनेकी प्रथा है। यह कोई भी व्यवस्था सर्वथा आगन्तुक एव नवीन नहीं है। व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका जैसे ऊँचे स्तरपर विकास हुआ, इसी प्रकार आगे भी व्यक्तिगत भूमिका अपहरण किये बिना उसका उच्चतम विकास हो सकता है। अमेरिका आदिमें भी वैसा ही विकास हो रहा है। बड़े कामोंके लिये सहकारिताके आधारपर सम्भूयोत्थान (सम्मिलित कृषि, व्यापारादि) पहले भी होता था, यह अन्यत्र दिखाया गया है, वैसे ही अब भी हो रहा है, आगे भी हो सकेगा। अतः भूमि, सम्पत्ति आदिका अपहरण प्रतिषेधके प्रतिषेधका तदाहरण नहीं हो सकता है। उन्नत साधनोंसे फलमें उन्नति होती है। इस दृष्टिसे जब भी पहले या पीछे उन्नत साधन होते हैं तब कृषि उन्नत होती है। आज भी जहाँ उन्नत साधन नहीं मिलते, वहाँ खेतीका वही निम्नरूप है। अनेक स्थानोंमें आज भी सामूहिक खेतियोंसे व्यक्तिगत खेतियाँ उच्चकोटिकी होती हैं। दूसरी दृष्टिसे अन्न, फल आदिकी उत्पत्ति और अच्छाई तथा मात्रा पहले बहुत अच्छी थी, अब कम अच्छी है। जिन खेतोंमें पहले बीस मन अन्न पैदा होता था, उनमें आज पाँच मन भी उत्पन्न नहीं होता। पशुओं, मनुष्योंकी भी जैसी बुद्धि, शक्ति, आकार, बल- पराक्रम हजारों वर्ष पहले था, उससे आज ह्रास ही है। मनुष्योंके पुराने अस्थिपञ्जर तथा प्राचीन तलवारों और भालोंके बृहत् आकार इसके साक्षी हैं। समाजवादी कहते हैं कि 'यह बात इतिहाससे सिद्ध है कि पारिवारिक और वैयक्तिक सम्पत्ति एकत्रित करनेके नियम चलनेसे पहले मनुष्य हजारों वर्षतक श्रेणी-
भेदके बिना आदिम समष्टिवादकी अवस्था में रहा है', पर यह ऐतिहासिक तत्त्व आधुनिक लोगोंका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्तमात्र है। संसारके सबसे प्राचीन इतिहास महाभारत और रामायण हैं, जिनकी बहुत कुछ सत्यता मोहन-जो-दड़ो तथा हरप्पाके भूगर्भसे मिली हुई वस्तुओसे सिद्ध होती है। उन आर्ष इतिहासों एवं अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोसे सिद्ध है कि न केवल मनुष्योंमें ही किंतु देवताओ, पशुओ, वृक्षोंमें भी ब्राह्मण आदि भेद सृष्टिकालसे ही है। अवश्य यह श्रेणी-भेद शोषक तथा शोषितके आधारपर नहीं हुआ, किंतु धर्मके आधारपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि श्रेणी-भेद और उसके अनुसार ही श्रौत-स्मार्त धर्म एव जीविकाओंके विधान हुए, 'न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्ड्यो न दाण्डिकः' (महा०शा०५९।१४) आदि पूर्वोक्त सर्वोत्कृष्ट धर्म-नियन्त्रणके युगमें भी धर्म तथा ब्राह्म आदि श्रेणियोंकी सत्ता थी ही। 'पुराकालमे सब ब्राह्मण ही थे, क्षत्रिय आदि न थे। स्त्रियाँ भी विवाहित न होती थी, सम्पत्ति सामूहिक होती थी।' आदि बाते भी अत्यन्त असङ्गत है। अनादि सृष्टि-सहारकी परम्परामें मूलभूत धर्मपरम्परा भी अनादि है। तन्मूलक वर्णाश्रम-धर्म, पातिव्रत्यादि-धर्म भी अनादि ही है। कभी भी उत्पत्ति-क्रममें कार्योत्पत्तिके पहले कारण ही रहता है, वायुकी उत्पत्तिके पहले आकाश था ही। क्रम-वर्णनमे क्षत्रिय आदि उत्पत्तिके पहले ब्राह्मण ही थे, विवाह होनेके पहले स्त्रियाँ आज भी अविवाहित होती हैं। आज भी घट बननेके पहले मृत्तिका ही रहती है, परंतु इससे ब्राह्मणादि वर्णों तथा विवाहादि धर्मोंकी अनादितामें कोई बाधा नहीं आती। अतएव इन सबोका उत्पत्ति-क्रम-वर्णनमे ही तात्पर्य है। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एव तेजसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है। यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी, जलके उत्पत्तिके पहले तेज ही था, तेजसे भी पहले वायु ही था, वायुसे भी पहले आकाश था और कुछ नहीं था। उसी तरह भगवान्की मुखशक्तिसे ब्राह्मणकी उत्पत्तिके पश्चात् बाहुकी शक्तिसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई। अतः उदर या ऊरुसे वैश्य, पादसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई। उत्पत्तिक्रममे पौर्वापर्य होता ही है, उसीमे अभावका व्यवहार होता है। जब कि अनादि वेदोंद्वारा ही प्रतिकल्पकी सृष्टि होती है और अनादि वर्णाश्रम-धर्मका प्रतिपादन होता है। अनादि ही पातिव्रत-धर्मका प्रतिपादन है, तब अमुकवर्ण या अमुक धर्म पहले नहीं था - इत्यादि कल्पनाएँ निराधार एव अप्रमाणित हैं। जीव ईश्वरके समान ही धर्माधर्म भी अनादि हैं। तदनुसार ही तद्बोधक शास्त्र एवं तदनुयायी वर्णाश्रम-धर्म भी अनादि हैं। ब्राह्म आदि विवाहोंसे सवर्णामें उत्पन्न ही ब्राह्मणादि वर्ण हैं, अतः विवाह आदि सभी अनादि हैं। श्वेतकेतु आदिकी कथाएँ गुणवादसे लक्ष्यार्थमें पर्यवसित हैं, वाच्यार्थमें नहीं। अर्थात् कुन्तीको देवताओसे सन्तानोत्पादनमे प्रवृत्त करनेके लिये यह अर्थवाद है और अर्थवाद भी
जहाँ प्रमाणान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादक होता है, वहाँ भूतार्थवाद न होकर गुणवाद ही होता है अर्थात् उसका वाच्यार्थमें कुछ भी तात्पर्य न होकर प्रशंसा या निन्दाद्वारा प्रवृत्ति या निवृत्तिमें ही तात्पर्य होता है। सिद्धान्ततः ह्रास-विकासका चक्र ही सिद्ध है। तदनुसार कभी ब्राह्मणोंकी बहुलता, कभी शूद्रोंकी बहुलता होती है, अर्थात् कभी ज्ञान-विज्ञानप्रधान मनुष्योंकी बहुलता होती है, कभी शिल्पादि कर्म-प्रधान मनुष्योंकी— यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल। तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूताः प्रजास्तथा॥ (मत्स्यपुराण अध्याय १४३।७८) मार्क्सवादी कहते हैं कि 'दर्शनके क्षेत्रमें स्वयं द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही एक ऐसा उदाहरण है। पहलेके भौतिकवादका प्रतिषेध हुआ आदर्शवाद, और इस आदर्शवादका प्रतिषेध हुआ, फिर भौतिकवाद। लेकिन यह भौतिकवाद यान्त्रिक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। दार्शनिक क्षेत्रमे एक और उदाहरण है, रूसोके समतावादका तथ्य। रूसोके अनुसार प्राकृतिक बर्बर- युगमें सब मनुष्य समान थे। रूसो भाषाको भी इस प्राकृतिक अवस्थाका विकार मानता है, उसके अनुसार एक ही जातिके पशुओंके बीचकी समताको उन पशु-मनुष्योंके लिये भी लागू करना चाहिये जिनको हेकलने एक आनुमानिक श्रेणीयुक्त किया है, आलालीमूक। लेकिन इन पशु-मनुष्योंको अन्य पशुओंकी अपेक्षा एक सुविधा थी उन्नतिकी शक्ति और यही असमताका कारण थी। इसलिये असमतामें भी रूसो उन्नतिका कारण देखता है। लेकिन यह उन्नति विरोधपूर्ण थी। यह साथ-ही-साथ अवनति भी थी। उन्नतिका मार्ग यही था कि मनुष्य व्यक्तिगतरूपसे पूर्णताकी ओर कदम बढ़ाता, लेकिन यही कदम मनुष्य- जातिके लिये अवनतिका भी कदम था। सभ्यताका हर एक कदम असमताकी ओर अग्रसर होता था। यह निर्विरोध सत्य है और वैज्ञानिक नियमका मूल सत्य भी है कि लोग सरदारोंको चुनते हैं अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिये न कि उसका अन्त करनेके लिये। फिर भी ये सरदार अवश्य ही लोगोंको सतानेवाले बन जाते हैं और यहाँ तक सताते हैं कि यह असमता चरम सीमापर पहुँचकर अपने विपरीत बन जाती है और समताका कारण बन जाती है, क्योंकि निरङ्कुश शासकके सामने सब समान हैं, सब शून्य हैं। लेकिन यह शासक तभीतक प्रभु है जबतक वह जबरदस्त है और जब वह निकाला जाता है तब जबरदस्तीकी शिकायत नहीं कर सकता। शक्ति ही उसकी प्रभुता बनाये रखती है। अन्तमें शक्तिसे ही उसका पतन होता है। सब प्राकृतिक और सही रास्तेपर ही चलते हैं। इस प्रकार असमता फिर एक बार समतामें रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन यह मूक प्राथमिक मनुष्य- की प्राकृतिक समता नहीं है, यह समाजकी उन्नत समता है। सतानेवाले सताये- जानेवाले हो जाते हैं, प्रतिषेधका प्रतिषेध हो जाता है।'
उपर्युक्त कथन भी असङ्गत ही है; क्योकि किसी भी शास्त्रार्थमें जब एक पक्षका खण्डन होता है तब वह दूसरे प्रकारसे अपने खण्डित पक्षका समर्थन करता है। जैसे द्वैत-अद्वैत पक्षके ही शास्त्रार्थकी बात लीजिये । श्रीमध्वके द्वैतका खण्डन मधुसूदनने ‘सिद्धान्तबिन्दु’ ग्रन्थके द्वारा किया। उसका खण्डन करके 'न्यायामृत'- द्वारा पुनः द्वैतका प्रतिष्ठापन हुआ । उसका खण्डन पुनः 'अद्वैतसिद्धि'द्वारा हुआ । पुनश्च 'न्यायामृत-तरङ्गिणी'द्वारा उसका प्रतिष्ठापन हुआ, पुनश्च 'गौड़ब्रह्मानन्दी' द्वारा उसका खण्डन हुआ, 'न्यायभास्कर' द्वारा पुनः प्रतिष्ठापन हुआ । 'न्यायेन्दुशेखर'- द्वारा पुनः खण्डन होनेपर पुनः प्रतिष्ठापनार्थ प्रयत्न हुआ, परंतु एतावता उनके पहलेके द्वैत और अद्वैतसे पिछले द्वैत-अद्वैतमे कोई भेद नही हुआ । इसी तरह जड़वाद एवं भौतिकवादका भले ही सहस्रो बार खण्डन तथा मण्डन हो तथापि वस्तुत्वमे कोई अन्तर नही पडता । ऐसे प्रतिषेधके प्रतिषेधको प्रतिप्रसव कहा जाता है । दर्शनशास्त्रोमें सिद्धान्ततः भी इसके उदाहरण मिलते हैं । जैसे सन्यासका विधान, पुनश्च कलियुगके लिये निषेध, पुनश्च कलिमें भी वर्णविभाग वैदिकधर्म-प्रवृत्ति-पर्यन्त विधानद्वारा प्रतिषेधके प्रतिषेध होनेसे विधानका प्रतिप्रसव होता है । यह निर्दोष उदाहरण है । इसी प्रकार व्याकरणकी दृष्टिसे राम शब्दके प्रथमा या द्वितीयाके द्विवचनमे ‘राम औ’ इस स्थितिमें ‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि प्राप्त होती है । उसका बाधकर ‘प्रथमयोः पूर्वसवर्णः’ से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है । पुनश्च ‘नादिचि’से उसका बाध होकर ‘वृद्धिरेचि’से वृद्धि हो जाती है । तब ‘रामौ’ शब्द बनता है । भौतिकवाद एवं आदर्शवादके तत्त्वोमे कोई भी अन्तर नही है । यह नहीं कहा जा सकता कि वस्तुतः पहले भौतिकवादका खण्डन हो गया था और अब वह पुनः सिद्ध ही हो गया है । रूसो हैकेल आदिकोके मनःकल्पित इतिहासकी अपेक्षा ऋषियोके आर्ष इतिहासका महत्त्व कहीं अधिक है । तदनुसार सृष्टिकालके वशिष्ठ, अत्रि आदि उच्चकोटिके महामानव थे । उनके धर्म, योग, वेदान्त आदिके सिद्धान्त आजके सभ्य कहे जानेवाले नरपशुओको दुर्विज्ञेय ही हैं । उनमें जो आध्यात्मिक समता थी, वह आज भी है । विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ (गीता ५ । १८) सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ (गीता ६ । ९) विद्वान् सदा ही सर्वत्र समब्रह्मका दर्शन करता है, यही समता है । शरीर- बुद्धि या कर्म अथवा उसके फलकी दृष्टिसे न कभी समता थी, न होनेवाली है ।
पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है जब उसका सद्गुरु-सम्बन्ध नहीं होता । आज भी यह बात स्पष्ट है। जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान-विद्या विकसित होती है, जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता । ईश्वरने ब्रह्माको नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । (श्वेता० उप० ६।१८) ब्रह्माने सनकादिको एव मरीचि आदिकोको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि शास्त्रोका उपदेश किया है । जिन मनुष्योका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया, वे ही पशुतुल्य हो गये हैं । हान्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं । हान्सके मता- नुसार 'आदिम प्राणी समताकी स्थितिमे नहीं था, किंतु खूँखार था ।' लाकका 'आदिम मनुष्य बहुत नेक था', रूसोका भी ऐसा ही था । सुकरातके अनुसार 'मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है' इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं । हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर ही है । मनुष्यो एव पशुओके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने पड़ेंगे । निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है । मनुष्योंमें भी कर्मतारतम्यसे ही उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी अन्तिम उद्देश्य है उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती । व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं होता । व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति सुतरा सम्भव होती है । उन्नति एव सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका कदम नही है । क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान होता है ? इतनी सहज-सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया है ? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढनेके लिये अग्रसर होते हैं और यदि कुछ आलसियो, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोडकर कुछ लोग आगे बढते हैं तो स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढनेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही । अतः आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी ओर ले जानेका ही प्रयत्न है । मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है । उच्छृङ्खल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं । धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृङ्खल या निरङ्कुश शासन होते हैं, वेन, रावणादि इसके उदाहरण हैं । मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित राजाओंमें निरङ्कुशताका लेश भी नहीं हो सकता था। समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटि मा० रा० ३२—
४९८ मार्क्सवाद और रामराज्य की होगी, यह उनके अपने, घरकी-ही कल्पना है। मुर्गों, कबूतरोंकी तरह साम्यवादी बन्धनमें मनुष्योंको सर्वथा परतन्त्र कर देना ही अगर समानता है, तो इससे कोई भी समझदार दूर ही रहना चाहेगा। यदि प्रकृति ही सबको सही रास्तेपर चलाती है, तब तो संसारमे प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था एवं दण्डविधान सब पागलपन ही ठहरेगा और समाजवादियोका भी प्रचार और उपदेश सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा। अतः इसे प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण समझना व्यर्थ है। प्रतिषेध कभी भी कारण नही हो सकता है। यदि प्रतिषेध ही कारण है, तब तो अवश्य ही मसलकर, जलाकर भी जौके दानेका प्रतिषेध होता ही है, फिर उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति क्यो नही होती ? यदि विशिष्ट प्रतिषेधसे अङ्कुरकी उत्पत्ति है, तो कहना पड़ेगा कि वह प्रतिषेध नहीं है, किंतु परिणामोपयोगी विकारमात्र है, प्रतिषेध या विनाश अभावात्मक ही है, विशेषता प्रतियोगीमे ही हो सकती है, अभावमें नही, क्योकि कार्यके लिये विशिष्ट कारणका अन्वेषण होता है, प्रतिषेध या अभावका अन्वेषण नही होता । अतः प्रतिषेधसे या प्रतिषेधके प्रतिषेधसे किसी भी विशिष्टकार्यसिद्धिकी कल्पना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त प्रतिषेधका प्रतिषेध भावात्मक ही होता है। जैसे किसीको भ्रमवशात् रजतमे अरजत-बुद्धि होती है। तब वह कहता है कि 'नेदं रजतम्', पुनश्च जब उसका बोध होता है तब उस प्रतिषेधका प्रतिषेध होता है—'इदं नारजतम्' । यह अरजत नहीं है, इसका फल होता है रजतका व्यवस्थापन। प्रकृतिमे जिस बीजका प्रतिषेध होकर अङ्कुरकी उत्पत्ति होती है, उस अङ्कुरके प्रतिषेधसे भी उस बीजका पुनः व्यवस्थापन नही होता । अतः वस्तुतः यहाँपर प्रतिषेधका प्रतिषेध हुआ ही नही। अङ्कुरको प्रतिषेधका फल किसी तरहसे कहा भी जाय, परंतु वह प्रतिषेधरूप नहीं हो सकता। और बीजको भी अङ्कुर प्रतिषेधका फल भले ही कहा जाय, परंतु अङ्कुरका प्रतिषेध अङ्कुर फल नही कहा जा सकता । अङ्कुरका कारणभूत बीज अन्य है, बीजसे अङ्कुरादि क्रमसे उत्पन्न फलरूप बीज उससे भिन्न होता है। पिता-पुत्रमे जैसे भेद होता है, वैसे ही प्रथम बीज एव बीजजन्य फलभूत बीजोमे भेद है। एक पिताके अनेक पुत्र होते हैं, वैसे ही एक बीजसे सैकडो फल उत्पन्न होते हैं। अतः यहाँ भी अन्तिम बीज प्रतिषेधका प्रतिषेध स्वरूप नही हो सकता । वस्तुतः प्रतिषेधके प्रतिषेधका व्यवहार वही होता है जहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रथम प्रतिषेधके प्रतियोगीका सत्त्व-व्यवस्थापन किया जाता है। जैसे रजतनिषेधका निषेध करके रजतके सत्त्वका व्यवस्थापन किया जाता है । कहा जाता है कि 'विचारजगत् और द्वन्द्वन्याय तर्कशास्त्रका साधारण नियम है, 'हाँ' 'हाँ' है और 'नही' 'नहीं'। इसके विपरीत द्वन्द्वमान कहता है कि
मार्क्स दर्शन ४९९ 'हाँ' नहीं है और 'नहीं' हाँ है। उपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है। लेकिन कुछ विचार करनेपर इसकी सत्यता प्रमाणित हो जायगी। तर्कशास्त्रके तीन बुनियादी नियम हैं। १. एकताका नियम, २. विरोधका नियम और ३. मध्यपरिहारका नियम। पहले नियमके अनुसार 'क' है, या 'क'='क' दूसरा नियम पहले नियमका नकारात्मक रूप है। इसका रूप है 'क' नहीं है=न 'क'। तीसरे नियमके अनुसार किसीके लिये दो विरोधी गुण एक साथ नहीं हो सकते, वास्तवमें या तो 'क', 'ख' है या 'क', 'ख' नहीं है। यदि इनमेंसे एक बात सत्य है तो दूसरी असत्य है और दूसरी सत्य है तो पहली असत्य है। इनके मध्यमे कोई बात नहीं हो सकती। 'युवेरवेगके निर्देशानुसार दूसरे और तीसरे नियमोंको इस प्रकार मिलाया जा सकता है। किसी विशिष्ट प्रश्नका, किसी वस्तुविशेषका अमुक गुण है या नहीं ? उत्तर हो सकता है 'हाँ' या नहीं। 'हाँ' और 'ना' दोनोंमे उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। इन नियमोंमे कोई भूल नहीं मालूम पडती। फिर द्वन्द्वमानका नियम क्योंकर सही है ? प्रकृतिमे ही इसका उत्तर मिल जाता है, जिसका विवरण पहले दिया जा चुका है और अभी आगे चलकर फिर दिया जायगा। अतिभौतिक विचारप्रणालीकी जो कि तर्कशास्त्रमे मिलती है, गडबडी यह है कि व्यष्टि और समष्टि, इकाई और समूह-सबको एक साथ मिला दिया जाता है। इसी प्रकार निश्चित परिमाणोमे हाइड्रोजन, उद्रजन और आक्सीजनके मिश्रणसे पानी बनता है। आधिभौतिकवादके लिये पानीमे अम्लजन और उद्रजनका पृथक् अस्तित्व बना रहता है। केवल तर्कन्यायमें पानी तथा अम्लजान और उद्रजनका एकीकरण होता है। यह रहस्यमय कल्पना है। इससे यह परिणाम निकलता है कि अम्लजन और उद्रजन तथा पानी-सभी एक साथ आसपास रहते हैं और अनन्त कालतक रहेंगे।' वस्तुतः पाश्चात्य अतिभौतिकवाद भी भौतिकवादके समान ही निस्तत्त्व है। वास्तविक अध्यात्मवाद एवं तर्क वेदान्तके सिद्धान्त बिना समझे हुए मार्क्सवादी उसके खण्डनकी निरर्थक चेष्टा करते हैं। अध्यात्मवादी जब कहता है, सत् सत् ही है असत् नहीं, असत् असत् ही है सत् नहीं, तब उसका तात्पर्य है कि कोई वस्तु उसी रूपसे उसी दृष्टिसे सत् एव असत् दोनो नहीं हो सकती। इसी आधार- पर अनेकान्तवादका खण्डन किया जाता है। सभी देशकालमें व्यभिचरित वस्तु ही है, किसी देशकालमे व्यभिचरित वस्तु असत् है। मृत्तिकाविकार घटादिमें मृत्तिका अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान होती है। अतः वह घटादिकी अपेक्षा सत् है। परंतु मृत्तिकाका कारण जल है, जलकी अपेक्षा मृत्तिका असत् है। उनकी
अपेक्षा जल सत्, परंतु सर्वकारण, स्वप्रकाश, अखण्डबोधस्वरूप सत् सर्वदेश, काल तथा वस्तुओंमें अव्यभिचरित होनेसे निरपेक्ष सत् है। तद्भिन्न सब वस्तु असत् ही है। यदि सत्-असत्की अव्यवस्था हो तो किन्हीं भी सिद्धान्तो, मन्तव्यो अर्थात् अनेकान्तवाद या मार्क्सवाद एव द्वन्द्ववादके सम्बन्धमें भी वही बाते लागू होगी। -मार्क्सवाद भी एकान्ततः सत्य नही है। किसी रूपमे सत् है, अन्य रूपोमे असत् -भी है। फिर अनिश्चित सिद्धान्तमे किसीकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? अपेक्षा-बुद्धिसे भाव-अभावकी एकत्र स्थिति तो भारतीय दर्शनोमे अधिक प्राचीनकालसे मान्य है— भावान्तरमभावो हि कयाचित्त्वपेक्षया। अर्थात् किसी अपेक्षासे दूसरा भाव ही अभाव है। जैसे घटघट-रूपसे भाव होनेपर भी पटरूपसे अभाव भी है। इसीलिये स्वरूप-पररूपसे हरेक वस्तु सत्, असत्, उभयात्मक है— स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्। परंतु इतने मात्रसे सत्-असत्का अविरोध नही कहा जा सकता। स्वरूपसे सत् असत् नहीं हो सकता। अन्यरूपसे सत्का असत् होना यह अपेक्षाबुद्धिकृत है। नियम तभी निर्दोष होता है जब वह अव्याप्ति, अतिव्याप्ति तथा असम्भव दोषोसे मुक्त हो। विचित्र ससारमे गुणधर्मकी विचित्रता स्वाभाविक है। केवल कतिपय स्थलोमे सहचार-दर्शनमात्रसे व्याप्ति नही होती। पार्थिवत्व एवं लोह लेख्यत्वका सर्वत्र सहचार होनेपर भी केवल हीरकमे अव्याप्ति होनेमात्रसे यह व्याप्ति अशुद्ध समझी जाती है। फिर द्वन्द्वमानके तो लगभग सभी नियम अव्याप्ति-अतिव्याप्ति दोषोसे ग्रस्त होते हैं। कहा जाता है कि 'द्वन्द्वमान इस स्थावर आधिभौतिकताका भेदन कर जाता है। 'मनुष्य' शब्दमे सब सम्भव मनुष्य सम्मिलित हैं। लेकिन मनुष्यजाति और मनुष्यगण यद्यपि भिन्न और पृथक् तर्कसिद्ध श्रेणियाँ हैं, लेकिन केवल तार्किक दृष्टिसे ही वे ऐसे हैं। एक ही घटनावलीके देखनेके लिये ये विभिन्न दृष्टिकोण हैं। व्यापकताके दृष्टिकोणसे अर्थात् उस दृष्टिकोणसे, जिसमे एक ही मनुष्य जातिका सदस्य होनेके नाते सब एक समान हैं। 'मनुष्यजाति' सब मनुष्योकी समष्टि है। मनुष्यगण सब मनुष्योकी समष्टिकी ही एक और कल्पना है, लेकिन इस अर्थमे कि कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यके समान नही है। द्वन्द्वमानके लिये विशेष और व्यापक याने 'साधारण एक और सब' विरोध रहते हुए भी ये दोनों एक दूसरेमे और एक दूसरेके द्वारा अवस्थित हैं। 'श्याम' का 'श्यामत्व' और उसके मनुष्यत्वसे पृथक् रूपमे न रह सकता है न उसके रहनेकी कल्पना ही की जा सकती है। मनुष्यको मनुष्यरूपमें हम उस साधारण गुणसे जानते हैं— जो सब विशिष्ट मनुष्योमे विद्यमान है, और हर विशिष्ट मनुष्यकी पहचान तभी हो सकती है, जब व्यापक मनुष्यरूपसे उसकी भिन्नताको दिखलाया जाय।
हेगेलके तर्कशास्त्रका यही गुण है कि वह विरोधियोंके एकत्वको मानता है और उनको श्रेणीबद्ध करता है । 'तर्कसिद्धके रूपमें, एक ओर पूर्णरूपसे व्यापक और दूसरी ओर पूर्णरूपसे एक । हेगेलीय भाषामें दो विरोधियों—उद्जन, अम्लजन— का एकत्व ही पानी है। ये तर्ककी दृष्टिमें विरोधी हैं। उन दो विरोधियोंके मेलसे जो पानीरूप वस्तु बनती है वह न उद्जन है और न अम्लजन । गुणात्मकरूपसे दोनोंका अन्तर्धान हो जाता है और बिल्कुल नये गुणोंके संयोगकी सृष्टि हो जाती है । परिणाम तो उतना ही रहता है, लेकिन रूप परिवर्तित हो जाता है।' उपर्युक्त कथन भी निःसार है । यह तो अध्यात्मवादमें ही स्वीकृत है कि वस्तुओंमें सामान्य-विशेषभाव एवं साधर्म्य-वैधर्म्य विभिन्नरूपसे मान्य होते हैं । जाति एवं गुणकी दृष्टिसे समष्टि-व्यष्टिका उपर्युक्त विवेचन भ्रान्तिपूर्ण है । नित्य एक एव अनेकोंमें समवेत जाति है । जैसे अनेक गोव्यक्तियोंमें एक गोत्वजाति रहती है, उसीके आधारपर सभी गोव्यक्तियोंको जाना जाता है, परंतु गण या समूह तो विशेषों (नैयायिकस्वीकृत पदार्थ) का भी कहा जा सकता है, जिनमें जाति नहीं है। अनेक जातिके मनुष्योंके समूहको भी गण कहा जा सकता है, परंतु उन्हें एक जातिका नहीं कहा जा सकता यह प्रसङ्ग ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व आदि अवान्तर जातिका है । मनुष्यत्व जाति तो सभी मनुष्योंमें होती ही है । व्यष्टि और समष्टि अध्यात्मवादमें वृक्ष और वनके तुल्य है । व्यष्टित्व और समष्टित्वका तो भेद होता ही है । ऐसे अनेक गुणधर्म समष्टिमें मान्य होते हैं, जो व्यष्टिमें नहीं होते । जैसे-एक-एक तन्तुओंसे शीतापनयन नहीं होता, परंतु वही तन्तु-समुदाय पटरूपमें परिवर्तित होकर अङ्गप्रावरण, शीतापनयन आदि कार्य करते हैं। व्यक्ति-समुदायसे भिन्न होकर समष्टि कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है । जिन तत्त्वोंसे जिस वस्तुका निर्माण होता है उन तत्त्वोंका किसी-न-किसी रूपमें उस वस्तुमें बना रहना स्वाभाविक है । कर्त्ता, निमित्त आदिके बिना भी कार्य रह सकता है, परंतु उपादान या समवायी कारण बिना तो कार्यकी स्थिति सम्भव ही नहीं होती । कोई नियम तभी निर्दोष माना जाता है, जब वह अव्याप्ति- अतिव्याप्ति आदि दोषोंसे रहित हो । ब्राह्मणत्व मनुष्यत्वका व्याप्य धर्म है, सुतरां व्यापक धर्मके बिना व्याप्य धर्मकी अवस्थिति नहीं हो सकती । जैसे क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्व-व्याप्त धर्म है । अतः क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्वके बिना नहीं रह सकते । विभिन्न विशेषोंमें ही सामान्यका पर्यवसान होता है । वस्तुतः जिस रूपमें आक्सीजन और हाइड्रोजन जलके जनक होते हैं; उस रूपमें वे विरोधी नहीं हैं । यद्यपि अग्नि और तेल किसी रूपमें विरोधी हैं;
परंतु वे ही युक्तिसे समन्वित होकर दीपक-प्रज्वलनका भी काम करते हैं। जल-अग्नि परस्पर विरोधी हैं, परंतु युक्तिसे समन्वित होकर बाष्पद्वारा यन्त्र संचालन करते हैं । वे विरोधी अन्यरूपसे हैं, कार्यवाहक अन्यरूपसे हैं। इसीलिये स्वरूपसे भाव, अभाव, सत्, असत्की एकता नहीं हो सकती । अन्यथा सरोवर- कमल और गगन-कमलकी तथा मित्रातनय एव वन्ध्यातनयकी एकता भी कही जानी चाहिये । अतः इस प्रकारके काल्पनिक विरोधके दृष्टान्तसे सत्, असत्, भाव, अभावकी तरह उसी सम्बन्धसे उसी देशमे उसी वस्तुका भाव-अभाव नहीं रह सकता । जैसे भूतलके उसी प्रदेशमें संयोग सम्बन्धसे उसी प्रकारके उसी घटका भाव-अभाव-दोनो नही हो सकते । यदि यह हो सके तब तो ससारसे विरोधमात्र ही दत्तजलाञ्जलि हो जायगा । उद्रजन, अम्लजन दो विरोधियोंके मिलनेसे पानी बना । उद्रजन, अम्लजन केवल इतनेमात्रसे विरोधी नहीं होते क्योकि एक वह है जो दूसरा नहीं है । इतना दूर क्यो जाया जाय, और सरल लौकिक दृष्टान्त लें । अनेक तन्तुओसे पट बनता है, तन्तुओमे भी एक वह नहीं है, जो दूसरे हैं। एक दृष्टिसे सब परस्पर भाव एवं अभावस्वरूप हैं और उनके मिलनेसे ही पट बनता है । पटमे तन्तुओका अन्तर्भाव हो जाता है, एक नयी वस्तु पट बन जाती है । परंतु यह कलाबाजी अविचारित रमणीय ही है । तन्तुओको परस्पर विरोधी कहनेकी अपेक्षा परस्पर सहयोगी कहना प्रत्यक्ष-प्रमाणके अधिक अनुकूल है । विरोधी तो उन्हे एक दूसरेका अभावात्मक होनेसे केवल ' अपेक्षा-बुद्धिसे कहा जाता है । इसी तरह पट बननेपर तन्तुका लुप्त हो जाना, पटरूपी नयी वस्तुका बन जाना भी अविचारित रमणीय है । विचारनेपर अब भी तन्तुओसे भिन्न होकर पट कोई वस्तु नही है । शीतापनयनादि-अर्थ- क्रियाकारिता विशेषरूपसे अवस्थित समुदायका गुण है। समुदाय समुदायीसे भिन्न नहीं, एव विशेष अवस्थिति अवस्थावालोसे भिन्न नही हो सकती है । व्यष्टिवृक्षोसे भिन्न होकर समष्टि वन नहीं है। पटसे भिन्न होकर उसकी संकुचित-प्रसारित अवस्था भी भिन्न नहीं है । यही स्थिति उद्रजन, अम्लजनकी है, उन्हे परस्पर विरोधी न कहकर सहयोगी कहना अधिक उपयुक्त है। पञ्चभूत भी परस्पर विरुद्ध कहे जा सकते हैं । जलसे अग्निका निर्वाण हो जाता है, किसी ढगसे अग्निसे जलका शोषण हो जाता है; पर साथ ही उनका कार्य-कारणभाव भी है । तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है और तेजमे ही जलका सहार होता है । ब्रह्मसे ही विश्वकी उत्पत्ति होती है, उसीमे उसका संहार भी होता है । इस दृष्टिसे ब्रह्म ही विश्वका उत्पादक भी है, सहारक भी है । परंतु यह विरोध अपेक्षा बुद्धिकृत है । सत्, असत्का-सा विरोध नहीं है । इसी
तरह सत्त्व, रज, तमका भी परस्पर विरोध कहा जा सकता है । सत्त्व प्रकाशात्मक है, रज चल है, तम आवरणात्मक एव अवष्टम्भात्मक है । व्यवहारमें भी सत्त्वके बढनेपर रज-तमका घटना अनिवार्य है । रजके बढनेपर अन्यका घटना अनिवार्य है, तो भी महदादि कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों सहयोगी बनते हैं । अवश्य ही जबतक उनका सम परिणाम चलता रहता है, तबतक वे कोई कार्य नहीं आरम्भ कर सकते, परन्तु विषमता होनेपर प्रधानके अप्रधान सहयोगी हो जाते हैं, फिर कार्यका उत्पादन करते हैं और हर एक कार्यमें वे उपलब्ध भी होते हैं । यही चीज हर एक उपादानकारणके सम्बन्धमें कही जा सकती है। अगर आक्सीजन, हाइड्रोजन जलके कारण हैं, तो अवश्य ही उनमें सयोग अपेक्षित है । इसी तरह कार्यावस्थामें भी उनका अस्तित्व रहना ही चाहिये । और कार्य भी कारणसे भिन्न होकर सर्वथा नयी वस्तु नहीं है । जैसे पटकी ही अवस्थाविशेष, उनका सकोच और प्रसार है, वैसे ही कारणकी अवस्थाविशेष ही कार्य है । इसीलिये जलसे पुनरपि हाइड्रोजन, आक्सीजन निकल आनेपर जल कुछ भी नहीं रह जाता है । भाव-अभावके समान उद्जन, अम्लजनकका विरोध नहीं होता । अतएव उनका सम्बन्ध होता है, सम्बन्धसे जल बनता है, किंतु भाव-अभावके सम्बन्धसे, सत्-असत्के सम्बन्धसे किसी कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती । इसी तरह कहा जाता है कि 'तर्कशास्त्रके अनुसार आरम्भ क्या है ? यह कुछ ( अस्तित्व ) नहीं है, क्योंकि आरम्भमात्र है । लेकिन इसी कारणसे वह कुछ नहीं भी नहीं हो सकता । इस प्रकार आरम्भ न अस्तित्व है, न नास्तित्व है । साथ ही वह अस्तित्व, नास्तित्व—दोनों ही है । यही अस्तित्व-नास्तित्वकी एकता है । एकका दूसरेमें रूपान्तर है । संक्षेपमें यह होनेकी एक क्रिया है जिसमें अस्तित्व और नास्तित्वकी साधारण बुनियाद है । इस तर्कको वास्तविकताके रूपमें देखा जाय तो श्याम एक मनुष्य है । जो एक मनुष्य-श्रेणीका है जिसमें सब मनुष्य सम्मिलित हैं । श्यामका और अन्य मनुष्योंमें व्यावर्तक धर्मोंसे भेद होता है, जो कि एकमें होते हैं, दूसरेमें नहीं । इस तरह वे विशिष्ट अंगोंमें भिन्न होते हुए भी मनुष्यत्वेन समान हैं । उन चीजोंको देकर जो उनमें नहीं हैं, किंतु दूसरोंमें हैं । लेकिन इस प्रभेदका अर्थ यही है कि अपने विशिष्ट गुणोंके अलावा वह और मनुष्योंके समान है । इस प्रकार तार्किक दृष्टिसे श्यामका पूरा ज्ञान हो जाता है । जब उसकी कल्पना विशिष्ट 'श्याम' तथा सर्वसाधारण मनुष्योंके एकत्वके रूपमें की जाय ।' मार्क्सवादी इसे एक सहज और महान् सत्य कहते हैं । विशुद्ध सत् विशुद्ध असत्से अभिन्न है । विशेष गुणोंके द्वारा ही एक वस्तुको दूसरीसे अलग किया जा सकता है और इस अलग करनेका अर्थ ही है दो बातोंका एक साथ
कहना । भावात्मकरूपसे वही वस्तु एक है और अभावात्मकरूपसे अन्य । इस प्रकार विचारमें एक वस्तुको दूसरेसे पृथक् करना हाँ और ना दोनो करना है और इसमें विरोध और पुनर्मिलन दोनो है । समरूपता और पार्थक्य-दोनोका रहना आवश्यक है, नहीं तो एकको दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता । "यही तत्त्व है सत् और असत्के एकत्वका । हेगेलकी इस तार्किक प्रथाका रूप है वाद ( थिसिस ), प्रतिवाद ( एन्टीथिसिस ) और समन्वितवाद ( सिन्थिसिस ) । दूसरे शब्दोंमें भाव-अभाव, अभावका अभाव या प्रतिषेधका प्रतिषेध । इस त्रिगुट सम्बन्धकी विशेषता यह है कि ये एक साथ विराजमान रहते हैं । एकके बाद दूसरेका आविर्भाव नहीं होता । जब कहा जाता है कि 'राम मनुष्य है' तो राम और अरामका विरोध तथा उसका साथ-साथ इन सबकी कल्पना एक साथ हो जाती है । मनमें तर्ककी जो क्रिया होती है, उसमें इन दोनोके पृथक्करणका पहले एक सिरा, फिर दूसरा सिरा और फिर दोनोका सम्बन्धित अस्तित्व दीखता है । लेकिन वास्तवमें इस त्रिगुट सम्बन्धका अस्तित्व आरम्भसे ही है और तर्कक्रिया इस अस्तित्वको मान लेती है । हेगेलने लिखा है कि इस त्रिगुट क्रियाको हम चतुष्क्रियाके रूपमें भी देख सकते हैं । पहला है अविभाजित एक, दूसरा विभाजन, तीसरा भावात्मक तथा अभावात्मक, फिर विभाजितरूपमे उस एककी पुनः स्थापना । जीवन संघर्षमें अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका प्रदर्शन अवयवके विकासका मुख्य स्तम्भ है ।' विरोधियोंके एकत्वके नियमको हेगेलने इस भाषामें लिखा है—'यह समझा जाता है कि भाव और अभावका अन्तर अमिट है । लेकिन तहमें ये दोनो चीजें एक हैं । कोई एक नाम दूसरेमें परिवर्तित हो सकता है । इस प्रकार जमा और उधार सम्पत्तिके दो विशेष प्रकार नहीं हैं । कर्ज लेनेवालेके लिये जो अभाव है, देनेवालेके लिये वह भाव है । पूरवका रास्ता पश्चिमका भी रास्ता है। भाव और अभाव एक दूसरेके ऊपर निर्भर है और परस्पर सम्बन्धमें ही इनका रूप प्रकाशित है । चुम्बक पत्थरका उत्तरी ध्रुव बिना दक्षिणी ध्रुवके नहीं रह सकता । किसी चुम्बकको दो भागोंमें काटनेपर एक हिस्सेमें उत्तरी और दूसरेमें दक्षिणी ध्रुव नहीं रहता । इसी प्रकार बिजलीकी दो धाराएँ-धनात्मक और ऋणात्मक, एक दूसरेसे स्वतन्त्र नही होतीं ।' वस्तुतः उपर्युक्त बाते भी वागाडम्बरके अतिरिक्त कुछ नहीं हैं—यह पीछे कहा जा चुका है । किसी अपेक्षासे भावान्तर ही अभाव होता है । स्वरूपसे कोई भी वस्तु सत् है, किंतु वही अन्य रूपसे असत् है परंतु स्वरूपसे ही कोई वस्तु सत्-असत् नहीं हो सकती । परमाणुवादियोकी दृष्टिसे समवायी कारण
मार्क्स-दर्शन ५०५ तन्तुओमे पटका आरम्भ होता है, जो पहले असत् ही रहता है। इसका असत्- कार्यवादकी दृष्टिसे खण्डन हो जाता है। असत् खपुष्प सहस्रों प्रयत्नोंसे निर्मित नहीं होता । अतः सत् ही कार्यकी अभिव्यक्ति मात्र कारकव्यापारोंसे होती है। इस स्थितिमें आरम्भके पहले, आरम्भकालमें तथा कार्य सम्पन्न होनेपर—इन तीनो अवस्थाओमे भी कारणरूपसे कार्य सत् ही रहता है। अतः स्वेन रूपेण आरम्भ या आरब्ध वस्तु सत् ही है, 'हाँ' हाँ ही है, उसे 'नहीं' नहीं कहा जा सकता । इसलिये आरम्भको अस्तित्व नास्तित्वकी एकता नहीं कहा जा सकता । राम-श्याम नामका कोई मनुष्य भी हो सकता है । कोई भी मनुष्य अपनेमें असाधारणता भी रखता है और इतर साधारणता भी है । विशिष्ट रूपसे इतर भिन्नता और तदितर व्यापक सामान्य रूपसे अभिन्नता कहनेकी अपेक्षा यह कहना अधिक सङ्गत है कि अमुक मनुष्यमें कुछ अपने असाधारण गुण हैं और कुछ मनुष्य-सामान्य-गुण । एक मनुष्य कुछ गुणोंकी अविशेषतासे ही इतर मनुष्योंसे भिन्न नहीं है। मनुष्यत्व सामान्य रहनेपर भी व्यक्तियोंमें परस्पर भिन्नता रहती है, अतः यह अस्तित्व-नास्तित्वकी एकताका उदाहरण नहीं कहा जा सकता । इस उदाहरणसे अस्तित्व-नास्तित्वकी एकाधिकरणता और विरोधपरिहार नहीं कहा जा सकता । विरोधका स्वरूप यही होता है कि— यस्य यद्देशावच्छिन्नयत्कालावच्छिन्नयत्सम्बन्धावच्छिन्नयद्धर्मावच्छिन्न- यदधिकरणता यत्र, तत्र तस्य तद्देशावच्छिन्नतत्कालावच्छिन्नतत्सम्बन्धावच्छिन्न- तद्धर्मावच्छिन्नतदत्यन्ताभावो न सम्भवति । जिस वस्तुका जिस देशमें, जिस कालमें, जिस सम्बन्धसे, जिस धर्मसे, जिस रूपसे जहाँ भाव रहता है, उस वस्तुका उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्ध- से, उसी रूपसे अभाव नहीं कहा जा सकता । पर्वतमें धूमत्वेन धूम रहनेपर भी वह्नित्वेन धूम नहीं है, तो भी यह अभाव अग्निके अनुमानमें बाधक नहीं हो सकता । विशेष गुणोंके कारण विशिष्टकी सामान्यसे भिन्नताका अर्थ विलक्षणता- मात्र है। इससे एक वस्तुमें सालक्षण्य-वैलक्षण्यका सह अस्तित्व सिद्ध होता है। नैयायिकोंके मतानुसार साधर्म्य-वैधर्म्य अनेक पदार्थोंमें सहावस्थित होते हैं, परंतु एतावता मूल वस्तुमें भेद नहीं सिद्ध होता । जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटमें वैलक्षण्य प्रतीत होनेपर भी वस्तुमे भेद नही सिद्ध होता । व्यावर्तक भेदक धर्मसे वस्तुकी भिन्नता या व्यावृत्ति होती है। इसका अभिप्राय यही है कि—'नील- मुत्पलम्' नीलता कमलकी विशेषता है, इससे वह अनील श्वेत, अरुण आदि कमलोसे भिन्न सिद्ध होता है। नीलताको छोड़कर वह अन्य कमलोसे अभिन्न ही
५०६ मार्क्सवाद और रामराज्य
रहता है । यद्यपि भेद-अभेद दोनो असमानता तथा समानताके ही बोधक हैं, भिन्नता अर्थात् भिन्नजातीयता अभिन्नता अर्थात् अभिन्नजातीयता । परंतु इस समानजातीयता, असमानजातीयताका भेदाभेदके समान परस्पर विरोध नहीं होता, क्योकि कमल व्यापक है । नील कमल उसका ही अवान्तर भेद है, जैसे मनुष्यजातिके भीतर ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ हैं । एक ब्राह्मणमें ब्राह्मणत्व भी है, मनुष्यत्व भी । इनका आपसमें कोई विरोध नही होता । यह भावात्मक-अभावात्मक वस्तुओका एकीकरण नहीं कहा जा सकता । इतनेमात्रके लिये इतनी दूर भटकनेकी आवश्यकता नही । यो तो सहयोगी वस्तुओमे भी भावात्मकता, अभावात्मकताका सह अस्तित्व किसी अपेक्षा-भेदसे मिलता ही है । यह विरोध परिहार स्वमनःपरिकल्पित ही है । जैसे कोई अपने मनसे ही प्रेतकी कल्पना करके उससे संग्राम करता हो और कहता हो कि हमने अपने प्रतिद्वन्द्वीको हरा दिया, ठीक यह भी वैसा ही है । भाव, अभाव एव अभावका अभाव या वाद, प्रतिवाद, समन्वितवाद अथवा अविभक्त एक तथा उसका भावात्मक, अभावात्मक विभाजन, फिर विभक्त स्वरूपोसे एक वस्तुकी स्थापना आदि कल्पना मनोरञ्जक अवश्य है, पर है सारशून्य ही । यह केवल बौद्धोंके विनाश ( अभाव ) कारणवादके आधारपर गढी गयी है । बौद्धोने देखा कि बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होनेमें बीजका स्वरूप नष्ट हो जाता है; अतः अङ्कुरोत्पत्तिके अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती विनाश ही है; अतः विनाशहीको कारण मानना ठीक है । परंतु साख्यो और वेदान्तियोने उसका खण्डन किया है । यदि विनाश ही कारण है तो बीजदाहसे भी अङ्कुर उत्पन्न होना चाहिये । यदि अभाव ही कारण है तो वह तो सर्वत्र सुलभ है तो फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारण-सामग्री ढूँढनेकी प्रवृत्ति क्यों होती है ! फिर कार्यमें कारणांश सत्की अनुवृत्ति देखी जाती है । विनाश, अभाव या असत्की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती । अतः भाव ही कार्यका कारण है, अभाव नहीं । इस मण्डन एवं खण्डनसे प्रभावित होकर मार्क्सवादियोने मूलबीजको अविभाजित एक वस्तु मान पुनः उसका विभाजन मानकर भाव, अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अङ्कुरकी उत्पत्ति मान ली । परंतु वस्तुतः यहाँ भाव-अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता ! विनाश, अभाव या असत्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत्का कोई सम्बन्ध हो सकता है । न ख-पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है । बीजावयव ही अङ्कुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है । परंतु एक उपादानमे कार्यान्तरकी
मार्क्स-दर्शन [५०७]
उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है। इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयक रूपसे होता है। अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है। जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है। अवयव- परिवर्तनादिद्वारा गोलाङ्गूल, मनुष्य आदिके विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है। उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन-उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है। न कोई मनुष्यका अङ्ग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है। यों परिणामवादमें कार्याके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही। इसका तत्त्व भेदाभेद-विवेचनमें आ चुका है। हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव-अभाव, सत्-असत्का विरोध मिट नहीं सकता। जमा-उधार, लेना-देना, ऋण-धन, पूर्व-पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है। उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण-धन ओर पूर्व-पश्चिमकी एकता हो सकती है, परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है—'क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वा- नधिकरणत्व' ही असत् है। अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो वही असत् है। जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है। कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है। ऐसे सत्-असत्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है। फिर शोषक शोषित-वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है। दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है। वस्तुतः सत्-असत्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है। हाँ, जहाँ भावान्तर ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है। पटाभाव घट स्वरूप है, अतः घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है, एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही