मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
९२ | मत्स्यपुराण |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| धृतिस्त्यक्त्वा पतिं नन्दिं सोममेवाभजंस्तदा।<br>स्वकीया इव सोमोऽपि कामयामास तास्तदा॥ २६<br>एवं कृतापचारस्य तासां भर्तृगणस्तदा।<br>न शशाकापचाराय शापैः शस्त्रादिभिः पुनः॥ २७<br>तथाप्यराजत विधुर्दशधा भावयन् दिशः।<br>सोमः प्राप्याथ दुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसंस्कृतम्।<br>सप्तलोकैकनाथत्वमवाप तपसा तदा॥ २८ | और धृति अपने पति नन्दिको छोड़कर उस समय चन्द्रमाकी सेवामें नियुक्त हुई। चन्द्रमा उस समय दसों दिशाओंको उद्भासित करते हुए सुशोभित हो रहे थे तथा उन्होंने समस्त सृष्टिमें संस्कृत एवं दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्तकर सातों लोकोंका एकच्छत्र आधिपत्य प्राप्त किया'॥ १५–२८॥ |
| कदाचिदुद्यानगतामपश्य-<br>दनेकपुष्पाभरणैश्च शोभिताम्।<br>बृहन्नितम्बस्तनभारखेदात्-<br>पुष्पस्य भङ्गेऽप्यतिदुर्बलाङ्गीम्॥ २९<br>भार्यां च तां देवगुरोरनङ्ग-<br>बाणाभिरामायतचारुनेत्राम् ।<br>तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः<br>केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ॥ ३०<br>सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे<br>तद्रूपकान्त्या हृतमानसेन।<br>चिरं विहृत्याथ जगाम तारां<br>विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोऽपि॥ ३१ | इसके कुछ दिन बाद चन्द्रमा एक बार कभी ताराको साथ लेकर अपने घर चले गये। बृहस्पतिके कहनेपर भी उन्होंने ताराको उन्हें समर्पित नहीं किया। |
| न तृप्तिरासीच्च गृहेऽपि तस्य<br>तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।<br>बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्ध-<br>स्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव॥ ३२<br>शशाक शापं न च दातुमस्मै<br>न मन्त्रशस्त्राग्निविशेषरौषैः।<br>तस्यापकर्तुं विविधैरुपायै-<br>र्नैवाभिचारैरपि वागधीशः॥ ३३ | तत्पश्चात् महेश्वर, ब्रह्मा, साध्यगण तथा लोकपालोंसहित मरुद्गणके समझानेपर भी जब चन्द्रमाने ताराको किसी प्रकार नहीं लौटाया, तब भगवान् शिव, जो भूतलपर |
| स याचयामास ततस्तु दैन्यात्<br>सोमं स्वभार्यार्थमनङ्गतप्तः।<br>स याच्यमानोऽपि ददौ न तारां<br>बृहस्पतेस्तत्सुखपाशबद्धः॥ ३४<br>महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेण<br>साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।<br>ददौ यदा तां न कथंचिदिन्दु-<br>स्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव॥ ३५ | वामदेव नामसे विख्यात हैं तथा अनेकों रुद्र जिनके चरणकमलोंकी अर्चना किया करते हैं, क्रुद्ध हो उठे। |
| यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्या-<br>मनेकरुद्रार्चितपादपद्मः ।<br>ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी<br>बृहस्पतिस्नेहवशानुबद्धः॥ ३६ | तदनन्तर त्रिपुरासुरके शत्रु एवं पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर बृहस्पतिके प्रति स्नेहके वशीभूत हो शिष्योंके |
| * अध्याय २३ * | ९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारि-<br>र्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।<br>युद्धाय सोमेन विशेषदीप्त-<br>स्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः॥ ३७॥ | साथ 'आजगव' नामक धनुष लेकर चन्द्रमाके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुए। उस समय उनका मुख विशेषरूपसे उद्दीप्त हुए तृतीय नेत्रकी अग्निसे बड़ा भयानक दीख रहा था॥ २९-३७॥ |
| सहैव जगमुश्च गणेशकाद्या<br>विंशच्चतुःषष्टिगणास्त्रयुक्ताः।<br>यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकै-<br>र्युतोऽन्वगात् स्पन्दनसंस्थितानाम्॥ ३८॥ | उनके साथ भूतेश्वरों और सिद्धोंका समुदाय भी था तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित गणेश आदि चौरासी गण भी साथ ही रवाना हुए। उसी प्रकार यक्षराज कुबेरने भी अनेकों शतकोटि सेनाओंके साथ-साथ रथारूढ़ एक |
| वेतालरक्षोरगकिंनराणां<br>पद्मेन चैकेन तथार्बुदेन।<br>लक्षैस्त्रिभिर्द्वादशभी रथानां<br>सोमोऽप्यगात् तत्र विवृद्धमन्युः॥ ३९॥ | पद्म वेताल, एक अरब यक्ष, तीन लाख नाग और बारह लाख किन्नरोंको साथ लेकर शिवजीका अनुसरण किया। उधर चन्द्रमा भी क्रोधाविष्ट हो नक्षत्रों, दैत्यों |
| नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः<br>शनैश्चराङ्गारकवृद्धतेजाः।<br>जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका-<br>श्चचाल भूद्वीपसमुद्रगर्भा॥ ४०॥ | और असुरोंकी सेनाओंके साथ शनैश्चर और मंगलके सहयोगके कारण उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न हो रणभूमिमें आ डटे। उस समाहारको देखकर सातों लोक भयभीत हो उठे तथा द्वीपों एवं समुद्रोंसहित पृथ्वी काँपने लगी। |
| स सोममेवाभ्यगमत् पिनाकी<br>गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।<br>अथाभवद् भीषणभीमसेन-<br>सैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ॥ ४१॥ | शिवजीने प्रकाशमान एवं विशाल आग्नेयास्त्रको लेकर चन्द्रमापर आक्रमण किया। फिर तो दोनों सेनाओंमें अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे उस युद्धने |
| अशेषसत्त्वक्षयकृत्प्रवृद्ध-<br>स्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनेकरूपः।<br>शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं<br>द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः॥ ४२॥ | उग्ररूप धारण कर लिया। उसमें सम्पूर्ण जीवोंका संहार हो रहा था तथा अग्निके समान प्रज्वलित हथियार चमक रहे थे। इस प्रकार एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त तीखे शस्त्रोंके प्रहारसे दोनों सेनाएँ समग्ररूपसे नष्ट होने लगीं। |
| पतन्ति शस्त्राणि तथोज्ज्वलानि<br>स्वर्भूमिपातालमथो दहन्ति।<br>रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीर्षं मुमोच<br>सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम्॥ ४३॥ | उस समय ऐसे जाज्वल्यमान शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी, जो स्वर्गलोक, भूतल और पातालको भस्म कर डालते थे। यह देख रुद्रने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशीर्ष नामक अस्त्र चलाया, तब चन्द्रमाने भी अपने अचूक लक्ष्यवाले सोमास्त्रका प्रयोग किया। |
| तयोर्निपातेन समुद्रभूम्यो-<br>रथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत्।<br>तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय<br>प्रवृद्धमालोक्य पितामहोऽपि॥ ४४॥ | उन दोनों अस्त्रोंके टकरानेसे समुद्र, भूमि और अन्तरिक्ष आदि सभी भयसे काँप उठे। इस प्रकार उन दोनों अस्त्रोंको जगत्का विनाश करनेके लिये बढ़ता हुआ देखकर |
| अन्तःप्रविश्याथ कथं कथंचि-<br>न्निवारयामास सुरैः सहैव।<br>अकारणं किं क्षयकृज्जनानां<br>सोम त्वयापीत्थमकारि कार्यम्॥ ४५॥ | देवताओंके साथ ब्रह्माने उनके भीतर प्रवेश करके किसी-किसी प्रकारसे उनका निवारण किया (और कहा-) 'सोम! तुमने अकारण ही ऐसा कार्य क्यों किया, यह तो लोगोंका विनाशक है। सोम! चूँकि तुमने |
९४ * मत्स्यपुराण *
| यस्मात् परस्त्रीहरणाय सोम<br>त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।<br>पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु<br>शान्तोऽप्यलं नूनमथो सितान्ते॥<br>भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं<br>न चावमानोऽस्ति परस्वहारे॥ ४६ | दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेके लिये इतना भयंकर युद्ध किया है, इसलिये शान्तस्वरूप होनेपर भी तुम शुक्लपक्षके अन्तमें अर्थात् कृष्णपक्षमें निश्चय ही जनतामें पापग्रहके रूपसे प्रसिद्ध होओगे। तुम बृहस्पतिकी इस भार्याको उन्हें समर्पित कर दो। दूसरेका धन लेकर उसे लौटा देनेमें अपमान नहीं होता'॥ ३८—४६॥ | | सूत उवाच<br>तथेति चोवाच हिमांशुमाली<br>युद्धादपाक्रामदतः प्रशान्तः।<br>बृहस्पतिः स्वामपगृह्य तारां<br>हृष्टो जगाम स्वगृहं सरुद्रः॥ ४७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तब चन्द्रमाने 'तथेति—ऐसा ही हो' यों कहकर ब्रह्माकी आज्ञा स्वीकार कर ली और वे शान्त होकर युद्धसे हट गये। इधर बृहस्पति भी अपनी पत्नी ताराको ग्रहण करके शिवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चले गये॥ ४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशाख्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशाख्यानमें सोमापचार नामक तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त
| सूत उवाच<br>ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।<br>दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥ १<br>तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।<br>सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥ २<br>नाम यद्राजपुत्रीयं विश्रुतं गजवैद्यकम्।<br>राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥ ३<br>जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।<br>ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥ ४<br>बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।<br>अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ। वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिमान् था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आदि विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्रीय' (या 'पालकाप्य'<sup>१</sup>)-नामसे विख्यात है, इसमें गज-चिकित्साका विशद वर्णन है।<sup>२</sup> सोम राजाका पुत्र होनेके कारण वह राजकुमार राजपुत्र तथा बुधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकर्म-संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियोंके साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण |
१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्लास १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६।२४-३० की तथा रघुवंश ५।५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।
२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।
| * अध्याय २४ * | ९५ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
| ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।<br>पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६<br>सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्लाद् विधुः सुतम्।<br>बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७<br>अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः।<br>ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९<br>अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।<br>पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥ १०<br>हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।<br>लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥ ११<br>केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।<br>उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता॥ १२<br>सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।<br>धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥ १३<br>चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।<br>विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददार्धासनं तदा॥ १४ | कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥ १-१४॥ |
| धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।<br>धर्मार्थकामाः संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५<br>जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।<br>भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥ १६<br>आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।<br>निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद् धर्मेऽधिकां पुनः॥ १७<br>जग्मतुस्तेन कामार्थावतिक्षोपं नृपं प्रति।<br>अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥ १८<br>कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।<br>कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥ १९<br>धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।<br>सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०<br>शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥ २१ | पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा—'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा—'राजेन्द्र! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा—'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे ॥ १५-२१ ॥ |
| ९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।<br>कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२<br>सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।<br>केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३<br>तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।<br>बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना॥ २४<br>तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।<br>मित्रत्वमगमद् देवैर्दाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५<br>ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।<br>सर्वलोकातिशायित्वं बलमूर्जो यशः श्रियम्॥ २६<br>प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।<br>सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥ २७<br>लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।<br>मेनकामुर्वशीं रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८<br>ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।<br>सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥ २९<br>विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।<br>शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥ ३०<br>पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।<br>पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति॥ ३१ | राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशीको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा—तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा—'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा॥ २२—३१॥ |
| ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।<br>शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२<br>अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।<br>आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुर्धृतिमान् वसुः॥ ३३<br>शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।<br>आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥ ३४<br>रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।<br>रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५<br>रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।<br>तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥ ३६ | तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे—आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर |
* कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।
२६- देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
* अध्याय २४ * ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा।<br>अथ देवासुरं युद्धमभूद् वर्षशतत्रयम्॥ ३७<br>प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद् विजयी तयोः।<br>ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुखः॥ ३८<br>अनयोर्विजयी कः स्याद् रजियंत्रैति सोऽब्रवीत्।<br>जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥ ३९<br>दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्।<br>नासूरैः प्रतिपन्नं तत् प्रतिपन्नं सुरैस्तथा॥ ४०<br>स्वामी भव त्वमस्माकं संग्रामे नाशय द्विषः।<br>ततो विनाशिताः सर्वे येऽवध्या वज्रपाणिना॥ ४१<br>पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः।<br>दत्त्वेन्द्राय तदा राज्यं जगाम तपसे रजिः॥ ४२ | प्रदान किये, जिससे वे उस समय देवों, असुरों और मनुष्योंके विजेता हो गये। तदनन्तर प्रह्लाद और इन्द्रका भयंकर देवासुर-संग्राम छिड़ गया, जो तीन सौ वर्षोंतक चलता रहा; परंतु उन दोनोंमें कोई किसीपर विजय नहीं पा रहा था। तब देवताओं और असुरोंने मिलकर देवाधिदेव ब्रह्मासे पूछा—'ब्रह्मन्! इन दोनोंमें कौन (पक्ष) विजयी होगा?' यह सुनकर ब्रह्माने उत्तर दिया—'जिस पक्षमें राजा रजि रहेंगे (वही विजयी होगा)।' तब दैत्योंने राजाके पास जाकर अपनी विजयके लिये उनसे प्रार्थना की कि 'आप हमारे सहायक हो जायें।' उनकी प्रार्थना सुनकर रजिने कहा—'यदि मैं आप लोगोंका स्वामी हो जाऊँ तभी उपयुक्त सहायता हो सकेगी।' परंतु असुरोंने उस प्रस्तावको स्वीकार नहीं किया, किंतु देवताओंने उसे स्वीकार करते हुए कहा—'राजन् ! आप हमलोगोंके स्वामी हो जायें और संग्राममें शत्रुओंका संहार करें।' तदनन्तर राजा रजिने उन सभी असुरोंको मौतके घाट उतार दिया, जो इन्द्रद्वारा अवध्य थे। इस कर्मसे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र राजाके पुत्र बन गये। तब राजा रजि इन्द्रको राज्य समर्पित कर स्वयं तपस्या करनेके लिये चले गये॥ ३२—४२ ॥ |
| रजिपुत्रैस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम्।<br>यज्ञभागं च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः॥ ४३<br>राज्याद् भ्रष्टस्तदा शक्रो रजिपुत्रैर्निपीडितः।<br>प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः॥ ४४<br>न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च बृहस्पते।<br>राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप॥ ४५<br>ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद् बलदर्पितम्।<br>ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा॥ ४६<br>गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान् बृहस्पतिः।<br>जिनधर्मे समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित्॥ ४७<br>वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः।<br>वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्॥ ४८<br>जघान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान्।<br>नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान् सप्तैव धार्मिकान्॥ ४९<br>यतिर्ययातिः संयातिरुद्भवः पचिरेव च।<br>शर्यातिर्मेघजातिश्च सप्तैते वंशवर्धनाः॥ ५० | तत्पश्चात् तपस्या, बल और गुणोंसे सम्पन्न रजिपुत्रोंने इन्द्रके वैभव, यज्ञभाग और राज्यको बलपूर्वक छीन लिया। इस प्रकार रजि-पुत्रोंद्वारा सताये गये एवं राज्यसे भ्रष्ट हुए दीन-दुःखी इन्द्र बृहस्पतिके पास जाकर बोले—'गुरुदेव ! मैं रजिके पुत्रोंद्वारा सताया जा रहा हूँ, मुझे अब यज्ञमें भाग नहीं मिलता तथा मेरा राज्य जीत लिया गया, अतः धिषणाधिप! (बृहस्पते) पुनः मेरी राज्य-प्राप्तिके लिये किसी उपायका विधान कीजिये।' तब बृहस्पतिने ग्रह-शान्तिके विधानसे तथा पौष्टिक कर्मद्वारा इन्द्रको बलसम्पन्न बना दिया और रजि-पुत्रोंके पास जाकर उन्हें मोहमें डाल दिया। उन वेदज्ञ बृहस्पतिने वेदोंद्वारा बहिष्कृत जिनधर्मका आश्रय लेकर उन्हें वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)-से परिभ्रष्ट कर दिया। तदुपरान्त इन्द्रने उन्हें हेतुवाद (तर्कवाद-नास्तिक्य)-से समन्वित और वेदबाह्य जानकर अपने वज्रसे उन सभी धर्मबहिष्कृत रजि-पुत्रोंका संहार कर डाला। अब मैं नहुषके सात धार्मिक पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम हैं—यति, ययाति, संयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति। ये सातों वंश-विस्तारक थे॥ ४३—५०॥ |
| ९८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यतिः कुमारभावेऽपि योगी वैखानसोऽभवत्।<br>ययातिश्चाकरोद् राज्यं धर्मैकशरणः सदा॥ ५१<br>शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद् दुहिता वृषपर्वणः।<br>भार्गवस्यात्मजा तद्वद्देवयानी च सुव्रता॥ ५२<br>ययातेः पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः।<br>देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्॥ ५३<br>तथा द्रुह्युमनुं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत् सुतान्।<br>यदुः पूरुश्चाभवतां तेषां वंशविवर्धनौ॥ ५४<br>ययातिर्नाहुषश्चासीद् राजा सत्यपराक्रमः।<br>पालयामास स महीमीजे च विधिवन्मखैः॥ ५५<br>अतिभक्त्या पितॄनर्च्च देवांश्च प्रयतः सदा।<br>अथाजयत् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः॥ ५६<br>स शाश्वतीः समा राजा प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>जरामाच्छेन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्॥ ५७<br>जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत्।<br>यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च पार्थिवः॥ ५८<br>यौवनेन चलान् कामान् युवा युवतिभिः सह।<br>विहर्तुमहमिच्छामि सहायं कुरुतात्मजाः॥ ५९ | (इनमें सबसे) ज्येष्ठ यति जब अपनी कुमारावस्थामें ही वैखानसका रूप धारण करके योगी हो गये, तब दूसरे पुत्र ययाति सदा एकमात्र धर्मका ही आश्रय लेकर राज्यभार सँभालने लगे। उस समय दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा तथा शुक्राचार्यकी कन्या व्रतपरायणा देवयानी—ये दोनों ययातिकी पत्नियाँ हुईं। इनके गर्भसे राजा ययातिके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका मैं नाम-निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको पैदा किया। इनमें यदु और पूरु—ये दोनों वंशका विस्तार करनेवाले हुए। नहुषनन्दन राजा ययाति सत्यपराक्रमी एवं अजेय थे। उन्होंने (धर्मपूर्वक) पृथ्वीका पालन किया और विधिपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा जितेन्द्रिय होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवों और पितरोंकी अर्चना करके सारी प्रजाओंपर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार नहुष-पुत्र राजा ययाति अनेकों वर्षोंतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे। इसी बीच वे रूपको विकृत कर देनेवाली महान् भयंकर वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। बुढ़ापाके वशीभूत हुए राजा ययातिने अपने यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक पुत्रोंसे ऐसी बात कही—'पुत्रो! यद्यपि युवावस्थाके साथ-साथ मेरी कामनाएँ भी चली गयीं, तथापि मैं पुनः युवा होकर युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, इस विषयमें तुमलोग मेरी सहायता करो॥ ५१–५९॥ |
| तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरब्रवीत्।<br>साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभिर्यौवनेन किम्॥ ६० | यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने राजासे कहा—'पिताजी! हमलोगोंको अपनी युवावस्थाद्वारा आपकी कौन-सी सहायता करनी है।' तब ययातिने अपने पुत्रोंसे कहा— |
| ययातिरब्रवीत् पुत्रा जरा मे प्रतिगृह्यताम्।<br>यौवनेनाथ भवतां चरेयं विषयानहम्॥ ६१<br>यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्छोशनसो मुनेः।<br>कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहं तेन पुत्रकाः॥ ६२<br>स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः।<br>अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम्॥ ६३<br>न तेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम्।<br>चतुरस्तान् स राजर्षिरशपच्चेति नः श्रुतम्॥ ६४<br>तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः।<br>जरां मां देहि नवया तन्वा मे यौवनात् सुखी॥ ६५ | 'तुमलोग मेरा बुढ़ापा ले लेना, तत्पश्चात् मैं तुमलोगोंकी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। पुत्रो! दीर्घकालव्यापी अनेकों यज्ञोंके अनुष्ठान तथा महर्षि शुक्राचार्यके शापसे मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गये हैं, इसी कारण मैं उनसे तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसलिये तुमलोगोंमेंसे कोई अपने शरीरद्वारा इस बुढ़ापेको स्वीकार करे और मैं उसके अभिनव शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर विषयोंका उपभोग करूँ।' परंतु जब यदु आदि चार पुत्रोंने पिताकी वृद्धावस्थाको ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तब राजर्षि ययातिने उन्हें शाप दे दिया—ऐसा हमलोगोंने सुन रखा है। तत्पश्चात् सबसे कनिष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने राजासे कहा—'पिताजी! आप अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिये और मेरे नूतन शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर सुखोंका उपभोग कीजिये। |
| * अध्याय २५ * | ९९ |
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| अहं जरां तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया।<br>एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्॥ ६६<br>संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।<br>पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः॥ ६७<br>ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः॥ ६८<br>अतृप्त इव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।<br>त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः॥ ६९<br>पौरवो वंश इत्येष ख्यातिं लोके गमिष्यति।<br>ततः स नृपशार्दूलः पूरुं राज्येऽभिषिच्य च॥ ७०<br>कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान्।<br>पूरुवंशं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः।<br>यत्र ते भारता जाता भरतान्वयवर्धनाः॥ ७१ | मैं आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करके आपके आज्ञानुसार राजकार्य सँभालूँगा।' पूरुके यों कहनेपर राजर्षि ययातिने अपने तपोबलका आश्रय लेकर उस महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपने बुढ़ापेको स्थापित किया और वे स्वयं पूरुकी युवावस्थाको लेकर तरुण हो गये। तदनन्तर ययातिकी वृद्धावस्थासे युक्त हुए पूरु राजकाजका संचालन करने लगे। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भी अजेय ययाति कामोपभोगसे अतृप्त-से ही बने रहे। तब उन्होंने अपने पुत्र पूरुसे कहा—'बेटा! अकेले तुम्हींसेमैं पुत्रवान् हूँ और तुम्हीं मेरे वंशविस्तारक पुत्र हो। आजसे यह वंश पूरुवंशके नामसे लोकमें विख्यात होगा।' तदनन्तर राजसिंह ययाति पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं उससे उपराम हो गये और बहुत समय बीतनेके पश्चात् कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हो गये। श्रेष्ठ ऋषियो! अब मैं जिस वंशमें भरत-वंशकी वृद्धि करनेवाले भारत नामसे प्रसिद्ध नरेश हो चुके हैं, उस पूरुवंशका वर्णन करने जा रहा हूँ, आपलोग समाहितचित्त होकर श्रवण कीजिये॥ ६०—७१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय
कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना
| ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं पौरवो वंशः श्रेष्ठत्वं प्राप भूतले।<br>ज्येष्ठस्यापि यदोर्वंशः किमर्थं हीयते श्रिया॥ १<br>अन्यद् ययातिचरितं सूत विस्तरतो वद।<br>यस्मात् तत्पुण्यमायुष्यमभिनन्द्यं सुरैरपि॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (अनुज होकर भी) पूरुका वंश भूतलपर श्रेष्ठताको क्यों प्राप्त हुआ और ज्येष्ठ होते हुए भी यदुका वंश (राज्य-) लक्ष्मीसे हीन क्यों हो गया? इसका तथा ययातिके चरितका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि यह पुण्यप्रद, आयुवर्धक और देवताओंद्वारा भी अभिनन्दनीय है॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः शतानीकेन शौनकः।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं ययातिचरितं महत्॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें शतानीकने (भी) महर्षि शौनकसे ययातिके इसी पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक एवं महत्त्वशाली चरितके विषयमें (इस प्रकार) प्रश्न किया था॥ ३॥ |
२७- देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| १०० | * मत्स्यपुराण * |
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| शतानीक उवाच<br>ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः।<br>कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्॥ ४<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन।<br>आनुपूर्व्याच्च मे शंस पूरोर्वंशधरान् नृपान्॥ ५ | **शतानीकने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे पूरुके सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये॥ ४-५॥ | | शौनक उवाच<br>ययातिरासीद् राजर्षिर्देवराजसमद्युतिः।<br>तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा॥ ६<br>तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो राजसत्तम।<br>देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च॥ ७<br>सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः।<br>ऐश्वर्यं प्रति सङ्घर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे॥ ८<br>जिगीषया ततो देवा वब्रुराङ्गिरसं मुनिम्।<br>पौरोहित्ये च यज्ञार्थे काव्यं तूर्शनसं परे॥ ९<br>ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यं स्पर्धिनौ भृशम्।<br>तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान्॥ १०<br>तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात्।<br>ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाञ्चक्रिरे सुरान्॥ ११<br>असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि।<br>न तान् स जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः॥ १२<br>न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्यवान्।<br>सञ्जीवनीं ततो देवा विषादमगमन् परम्॥ १३ | **शौनकजीने कहा—**राजसत्तम! राजर्षि ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिरूपमें जिस प्रकार वरण किया था, वह सब प्रसङ्ग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ। एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ, उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने यज्ञ-कार्यके लिये अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिको पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाँट रखते थे। देवता उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारते थे, उन्हें शुक्राचार्य अपनी संजीवनी-विद्याके बलसे पुनः जीवित कर देते थे। वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगते; परंतु असुरगण युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारते, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते; क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीवनी-विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको न था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ॥ ६-१३॥ | | अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा।<br>ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः॥ १४<br>भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम्।<br>यासौ विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि॥ १५<br>शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागमग्र्यौ भविष्यसि।<br>वृषपर्वणः समीपेऽसौ शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः॥ १६<br>रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान्।<br>तमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चिदृते त्वया॥ १७<br>देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः।<br>तामाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते॥ १८ | देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो गये। तब वे बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले—'ब्रह्मन्! हम तुम्हारी शरणमें हैं। तुम हमें अपनाओ और हमारी उत्तम सहायता करो। अमित तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी-विद्या है, उसे तुम शीघ्र सीख लो, इससे तुम हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकोगे। राजा वृषपर्वाके समीप तुम्हें विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है। वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं; किंतु जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। उनकी आराधना करनेके लिये तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा तुम्हीं प्रसन्न कर सकते हो। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है। |
- अध्याय २५ * । १०१
| शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।<br>देवयान्यां तु तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥ १९<br>तदा हि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।<br>तथेत्युक्त्वा तु स प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः॥ २०<br>स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्पूजितः कचः।<br>असुरेन्द्रपुरे शुक्रं प्रणम्येदमुवाच ह॥ २१<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः।<br>नाम्ना कचेति विख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ २२<br>ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो।<br>अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रपरिवत्सरान्॥ २३ | अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर तुम निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लोगे।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पति-पुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गया। राजन्! देवताओंद्वारा भेजा गया कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिला और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'भगवन्! मैं अङ्गिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें। ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षांतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ १४-२३॥ |
| शुक्र उवाच<br>कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः।<br>अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २४ | **शुक्राचार्यने कहा—**कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका (ही) आदर-सत्कार होगा॥ २४॥ |
| शौनक उवाच<br>कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम्।<br>आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २५<br>व्रतं च व्रतकालं च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत।<br>आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २६<br>नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगोचराम्।<br>गायन् नृत्यन् वादयँश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २७<br>संशीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम्।<br>पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भार्गवीम् ॥ २८<br>देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतचारिणम्।<br>अनुगायन्ती ललना रहः पर्यचरत् तदा॥ २९<br>पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो भृशम्।<br>तत्तत्तीव्रं व्रतं बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ ३०<br>गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येनममर्षिताः।<br>जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषात्संञ्जिंरक्षार्थमेव च॥ ३१<br>हत्वा सालावृकेभ्यश्च प्रायच्छंस्तिलशः कृतम्।<br>ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वनिवेशनम् ॥ ३२ | **शौनकजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण किया। राजन्! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी—दोनोंकी नित्य आराधना करने लगा। वह नवयुवक था और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखता था। आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आता तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करता। (इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वह सदा उसे प्रसन्न रखता था।) देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उसकी सेवा करती थी। इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी-विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला। उन्होंने मारनेके बाद उसके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं। जब |
१०२ * मत्स्यपुराण *
| ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचो नाभ्यागतो वनात्।<br>उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम् ॥ ३३<br>हुतं चैवाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो।<br>अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३४<br>व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३५ | देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं है, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा—'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देता। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारा गया है या पकड़ लिया गया है। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी'॥ २५—३५॥ | | शुक्र उवाच<br>अथेह्येहीति शब्देन मृतं संजीवयाम्यहम्।<br>ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत् ॥ ३६<br>आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।<br>हतोऽहमिति चाचख्यौ राक्षसैर्धिषणात्मजः ॥ ३७<br>स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया।<br>वनं ययौ कचो विप्रः पठन् ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ ३८<br>वने पुष्पाणि चिन्वन्तं ददृशुर्दानवाश्च तम्।<br>ततो द्वितीये तं हत्वा दग्धं कृत्वा च चूर्णवत्।<br>प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ३९<br>देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।<br>पुष्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४०<br>व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४१ | शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं मरे हुए कचको अभी 'आओ, आओ'—इस प्रकार बुलाकर जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी-विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा। फिर तो गुरुके पुकारनेपर सरस्वतीन्दन कच दूरसे ही दौड़ पड़ा और शुक्राचार्यके निकट आकर उन्हें प्रणाम कर बोला—'गुरो! राक्षसोंने मुझे मार डाला था।' पुनः देवयानीने स्वेच्छानुसार वनसे पुष्प लानेके लिये कचको आज्ञा दी, तब ब्राह्मण कच सनातन ब्रह्म (वेद)-का पाठ करते हुए वनमें गया। दानवोंने वनमें उसे पुष्पोंका चयन करते हुए देख लिया। तत्पश्चात् असुरोंने दूसरी बार मारकर आगमें जलाया और उसकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे शुक्राचार्यको ही पिला दिया। अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—'पिताजी! आज मैंने उसे फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वह दिखायी नहीं दिया। तात! जान पड़ता है कि वह मार दिया गया या मर गया। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती'॥ ३६—४१॥ | | शुक्र उवाच<br>बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः।<br>विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४२<br>मैवं शुचो मा रुद देवयानि<br>न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।<br>यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च<br>सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च ॥ ४३<br>सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-<br>मुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।<br>अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः<br>स जीवितो यो वध्यते चैव भूयः ॥ ४४ | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी! बृहस्पतिका पुत्र कच मर गया। मैंने विद्यासे उसे कई बार जिलाया तो भी वह इस प्रकार मार दिया जाता है, अब मैं क्या करूँ। देवयानि! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है।) ॥४२—४४॥ |
२८- शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| * अध्याय २५ * | १०३ |
|---|
| देवयान्युवाच<br>यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो<br>बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः।<br>ऋषेः सुपुत्रं तमथापि पौत्रं<br>कथं न शोचे यमहं न रुद्याम्॥ ४५<br>स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च<br>सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।<br>कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये<br>प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः॥ ४६ | देवयानी बोली— पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अङ्गिरा जिसके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिसके पिता हैं, जो ऋषिका पुत्र और ऋषिका ही पौत्र है, उस ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ? तात! वह ब्रह्मचर्यपालनमें रत था, तपस्या ही उसका धन था। वह सदा ही सजग रहनेवाला और कार्य करनेमें कुशल था। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय था। वह सदा मेरे मनके अनुरूप चलता था। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गया है, वहीं मैं भी चली जाऊँगी॥ ४५-४६॥ | | शौनक उवाच<br>स त्वेवमुक्तो देवयान्या महर्षिः<br>संरम्भेण व्याजहाराथ काव्यः।<br>असंशयं मामसुरा द्विषन्ति<br>ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति॥ ४७<br>अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा<br>एभिर्व्यर्थं प्रस्तुतो दानवैर्हि।<br>तत्कर्मणाप्यस्य भवेदिहान्तः<br>कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्॥ ४८<br>स तेनापृष्टो विद्यया चोपहूतो<br>शनैर्वाचं जठरे व्याजहार।<br>तमब्रवीत् केन चेहोपनीतो<br>ममोदरे तिष्ठसि ब्रूहि वत्स॥ ४९ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं। ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हों?' जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठा हुआ कच भयभीत हो धीरेसे बोला। (उसकी आवाज सुनकर) शुक्राचार्यने पूछा—'वत्स! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये। ठीक-ठीक बताओ'॥ ४७-४९॥ | | कच उवाच<br>भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः<br>सर्वं स्मरेयं यच्च यथा च वृत्तम्।<br>न त्वेवं स्यात् तपसः क्षयो मे<br>ततः क्लेशं घोरतरं स्मरामि॥ ५०<br>असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो<br>हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य।<br>ब्राह्मीं मायां त्वासुरीं त्वन्न माया<br>त्वयि स्थिते कथमेवाभिबाधते॥ ५१ | कचने कहा— गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई, वह सब मुझे स्मरण है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल जानेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया। विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी—तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लङ्घन कैसे कर सकता है?॥ ५०-५१॥ | | शुक्र उवाच<br>किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से<br>विनैव मे जीवितं स्यात् कचस्य।<br>नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनाच्च<br>दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि॥ ५२ | शुक्राचार्य बोले— बेटी देवयानि! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ! मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके अतिरिक्त और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे॥ ५२॥ |
२९- शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको सन्तुष्ट करना
| * अध्याय २६ * | १०५ |
|---|
| शुक्र उवाच | |
|---|---|
| यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-<br>न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः।<br>अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-<br>दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६२ | शुक्राचार्यने कहा— आजसे (इस जगत्का) जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इहलोक और परलोक—दोनोंमें निन्दित होगा। धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें ॥ ६२-६३ ॥ |
| मया चेमां विप्रधर्मोक्तसीमां<br>मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।<br>सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां<br>देवा दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६३ | |
| शौनक उवाच | |
| इतीदमुक्त्वा स महाप्रभाव-<br>स्ततो निधीनां निधिरप्रमेयः।<br>तान् दानवांश्चैव निगूढबुद्धी-<br>निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६४ | शौनकजी कहते हैं— ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने, दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था, उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा ॥ ६४ ॥ |
| शुक्र उवाच | |
| आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ<br>शिष्यः कचो वत्स्यति मत्समीपे।<br>संजीवनीं प्राप्य विद्यां मयायं<br>तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ६५ | शुक्राचार्यने कहा— 'दानवो! तुम सब (बड़े) मूर्ख हो। मैं तुम्हें बताये देता हूँ—(महात्मा) कच मुझसे संजीवनी-विद्या पाकर सिद्ध हो गया है। इसका प्रभाव मेरे ही समान है। यह ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप है ॥ ६५ ॥ |
| शौनक उवाच | |
| गुरोरुष्य सकाशे च दशवर्षशतानि सः।<br>अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ६६ | शौनकजी कहते हैं— कचने (इस प्रकार) एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब (गुरुसे) घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर उसने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ६६ ॥ |
॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय देवयानीने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥ |
|---|---|
| समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा।<br>प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत् ॥ १ |
१०६ * मत्स्यपुराण *
| देवयान्युवाच<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च।<br>भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च॥ २<br>ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः।<br>तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः॥ ३<br>एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद् ब्रवीमि तपोधन।<br>व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि॥ ४<br>स समापितविद्यो मां भक्तां न त्यक्तुमर्हसि।<br>गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्॥ ५ | देवयानी बोली—महर्षि अङ्गिराके पौत्र! तुम सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हो। महायशस्वी महर्षि अङ्गिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ, उसपर विचार करो। तुम जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, (आशा है,) उसे तुम भूले नहीं होगे। अब तुम व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो; अतः वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण करो॥ २–५॥ | | कच उवाच<br>पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव।<br>तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता॥ ६<br>आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः।<br>त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम॥ ७<br>यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव।<br>देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि॥ ८ | कचने कहा—निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे मेरी सदा पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ६–८॥ | | देवयान्युवाच<br>गुरुपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः।<br>तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम॥ ९<br>असुरैर्हन्यमाने तु कच त्वयि पुनः पुनः।<br>तदाप्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्व मे॥ १०<br>सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्।<br>न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसाम्॥ ११ | देवयानी बोली—द्विजोत्तम! तुम मेरे गुरुके पुत्र हो, मेरे पिताके नहीं; (अतः मेरे भाई नहीं लगते, पर) मेरे पूजनीय और माननीय हो। कच! जब असुर तुम्हें बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक तुम्हारे प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे तुम्हीं स्मरण करो। तुम्हें मेरे सौहार्द और अनुराग तथा मेरी उत्तम भक्तिका परिचय मिल चुका है। तुम धर्मके ज्ञाता भी हो। मैं तुम्हारे प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। तुम्हें मेरा त्याग करना (कदापि) उचित नहीं है॥ ९–११॥ | | कच उवाच<br>अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभव्रते।<br>प्रसीद सुभ्रु मह्यं त्वं गुरोर्गुरुतरा शुभे॥ १२<br>यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने।<br>तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि॥ १३<br>भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने।<br>सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम॥ १४ | कचने कहा—उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरि! तुम मुझे ऐसे कार्यमें प्रवृत्त कर रही हो, जो कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहन हो; अतः शुभानने! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणि! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है। |
३०- सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह
* अध्याय २६ * <p align="right">१०७</p>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमस्त्वथ मे पथि।<br>अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ १५<br><br>अप्रमत्तोद्यता नित्यमाराधय गुरुं मम। | अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ; आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेव (अपने पिता शुक्राचार्य) की सेवामें लगी रहना ॥ १२-१५ १/२ ॥ |
| देव्यान्युवाच<br>दैत्यैर्हतस्त्वं यद्भर्तृबुद्ध्या त्वं रक्षितो मया ॥ १६<br><br>यदि मां धर्मकामार्था प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः।<br>ततः कच न ते विद्या सिद्धिरेषा गमिष्यति ॥ १७ | देवयानी बोली— कच! दैत्योंद्वारा बार-बार तुम्हारे मारे जानेपर मैंने पति-बुद्धिसे ही तुम्हारी रक्षा की है (अर्थात् पिताद्वारा जीवनदान दिलाया है, इसीलिये) मैंने धर्मानुकूल कामके लिये तुमसे प्रार्थना की है। यदि तुम मुझे ठुकरा दोगे तो यह संजीवनी-विद्या तुम्हारे कोई काम न आयेगी ॥ १६-१७ ॥ |
| कच उवाच<br>गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याख्यास्ये न दोषतः।<br>गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ॥ १८<br><br>आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया।<br>शप्तुं नार्होऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्य च धर्मतः ॥ १९<br><br>तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति।<br>ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ॥ २०<br><br>फलिष्यति न मे विद्या त्वद्वचश्चेति तत् तथा।<br>अध्यापयिष्यामि च यं तस्य विद्या फलिष्यति ॥ २१ | कचने कहा— देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है, तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजी भी इसे जानते-मानते हैं। स्वेच्छासे मुझे शाप भी दे दो। बहन! मैं आर्ष-धर्मकी बात कर रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही ॥ १८-२१ ॥ |
| शौनक उवाच<br>एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानीं कचस्तदा।<br>त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ २२<br><br>तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>बृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ शतानीक! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चला गया। उसे आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्हें साथ ले आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नतासे कचसे इस प्रकार बोले ॥ २२-२३ ॥ |
| देवा ऊचुः<br>त्वं कचास्मद्धितं कर्म कृतवान् महदद्भुतम्।<br>न ते यशः प्रणशिता भागभाक् च भविष्यसि ॥ २४ | देवता बोले— कच! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे ॥ २४ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
१०८ * मत्स्यपुराण *
सत्ताईसवाँ अध्याय
देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शौनक उवाच<br>कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।<br>कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १<br>सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।<br>कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २<br>एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।<br>तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३<br>क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।<br>वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४<br>ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।<br>वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५<br>तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।<br>व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६<br>ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत।<br>देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७ | शौनकजी कहते हैं— भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीवनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा—दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥ १—७॥ |
| देवयान्युवाच<br>कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।<br>समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८ | देवयानी बोली— अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥ ८॥ |
| शर्मिष्ठोवाच<br>आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।<br>स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९<br>याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १० | शर्मिष्ठाने कहा— अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते। |
* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।
* अध्याय २७ * । १०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।<br>लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥ ११ | अरी भिक्षुकि ! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥ ९—११ ॥ |
| शौनक उवाच<br><br>सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।<br>शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥ १२<br>हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।<br>अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥ १३<br>अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।<br>श्रान्तयुग्यः श्रन्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥ १४<br>नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।<br>ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥ १५<br>तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।<br>सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥ १६<br>का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।<br>दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥ १७<br>कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।<br>दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे॥ १८ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी—ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा—'सुमध्यमे ! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२–१८॥ |
| देवयान्युवाच<br><br>योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।<br>तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥ १९<br>एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।<br>समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥ २०<br>जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।<br>तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि॥ २१ | देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज ! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥ १९–२१॥ |
| शौनक उवाच<br><br>तामथ ब्राह्मणीं स्त्रीं च विज्ञाय नहुषात्मजः।<br>गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्॥ २२<br>उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।<br>आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने |
१९० * मत्स्यपुराण *
| गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।<br>उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः॥ २४ | नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली॥ २२—२४॥ |
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| देवयानुवाच<br>त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः।<br>नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥ २५ | **देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी—उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी॥ २५॥ |
| शौनक उवाच<br>सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।<br>दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना॥ २६<br>आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।<br>शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥ २७<br>श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्।<br>त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने॥ २८<br>दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।<br>बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥ २९<br>आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।<br>मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३० | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा—‘महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।’ अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—‘बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है’॥ २६—३०॥ |
| देवयानुवाच<br>निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।<br>शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥ ३१<br>सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।<br>एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥ ३२<br>वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।<br>स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥ ३३<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।<br>इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।<br>क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥ ३४<br>यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।<br>प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥ ३५ | **देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। ‘देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१—३५॥ |
३१- ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
- अध्याय २८ * १११
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७ ॥ |
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| स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।<br>अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥ ३६ | |
| वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।<br>अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ १—७ ॥ |
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| यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ १ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।<br>स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥ २ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ ३ | |
| यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति।<br>यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४ | |
| यस्तु भावयते धर्मं योऽतिमात्रं तितिक्षति।<br>यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५ | |
| यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।<br>यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥ ६ | |
| ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युश्चेतसः।<br>नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७ |