मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ३१४ | * मत्स्यपुराण * |
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| सप्तद्वीपपतिर्जातः सूर्यायुतसमप्रभः।<br><br>यथा सुवर्णकारस्य तरवो हेमनिर्मिताः।<br><br>सम्यगुज्ज्वलिताः पत्न्या सेयं भानुमती तव॥ ३० | जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देव-मूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है॥ २३-३०॥ | | उज्ज्वलनादुज्ज्वलरूपमस्याः<br>संजातमस्मिन् भुवनाधिपत्यम्।<br>यस्मात् कृतं तत् परिकर्म रात्रा-<br>वनुद्धताभ्यां लवणाचलस्य॥ ३१<br><br>तस्माच्च लोकेष्वपराजितत्व-<br>मारोग्यसौभाग्ययुता च लक्ष्मीः।<br>तस्मात्त्वमप्यत्र विधानपूर्वं<br>धान्याचलादीन् दशधा कुरुष्व॥ ३२<br><br>तथेति सत्कृत्य स धर्ममूर्ति-<br>र्वचो वसिष्ठस्य ददौ च सर्वान्।<br>धान्याचलादीञ्शतशो मुरारे-<br>र्लोकं जगामामरपूज्यमानः ॥ ३३<br><br>पश्येदपीमानधनोऽतिभक्त्या<br>स्पृशेन्मनुष्यैरपि दीयमानान्।<br>शृणोति भक्त्याथ मतिं ददाति<br>विकल्मषः सोऽपि दिवं प्रयाति॥ ३४<br><br>दुःस्वप्नं प्रशममुपैति पाठ्यमानैः<br>शैलेन्द्रैर्भवभयभेदनैर्मनुष्यैः ।<br>यः कुर्यात् किमु मुनिपुंगवेह सम्यक्<br>शान्तात्मा सकलगिरीन्द्रसम्प्रदानम्॥ ३५ | मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायक रूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता और सौभाग्यसम्पन्नता लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'तथेति—ऐसा ही करूँगा' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् मुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वत-दानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। मुनिपुंगव! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसङ्गका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है?॥ ३१-३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पर्वतप्रदानमाहात्म्यं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः॥ ९२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पर्वतप्रदानमाहात्म्य नामक बानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९२॥
- अध्याय ९३ * ३१५ तिरानबेवाँ अध्याय शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिका वर्णन * सूत उवाच सूतजी कहते हैं - ऋषियो ! पूर्वकालकी बात है, वैशम्पायनमासीनमपृच्छच्छौनकः पुरा । एक बार सुखपूर्वक बैठे हुए वैशम्पायनजीसे शौनक ने सर्वकामाप्तये नित्यं कथं शान्तिकपौष्टिकम् ॥ १ पूछा- 'महर्षे ! सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मोंका अनुष्ठान किस प्रकार वैशम्पायन उवाच करना चाहिये ?' ॥ १ ॥ श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समारभेत् । वैशम्पायनजीने कहा- ब्रह्मन् ! लक्ष्मीकी कामनावाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और वृष्ट्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिवरन् पुनः । पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना येन ब्रह्मन् विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥ २ चाहिये। वह ग्रहयज्ञ जिस विधानसे करना चाहिये, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य संक्षिप्य ग्रन्थविस्तरम् । करनेके पश्चात् विस्तृत ग्रन्थको संक्षिप्तकर पुराणों एवं ग्रहशान्तिं प्रवक्ष्यामि पुराणश्रुतिचोदिताम् ॥ ३ श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका वर्णन कर रहा हूँ। पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । इसके लिये ज्योतिषी ब्राह्मणद्वारा बतलाये गये पुण्यमय दिनमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहान् ग्रहाधिदेवांश्च स्थाप्य होमं समारभेत् ॥ ४ ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये। ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्रोक्तः पुराणश्रुतिकोविदैः । पुराणों एवं श्रुतियोंके ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारका प्रथमोऽयुतहोमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम् ॥ ५ ग्रहयज्ञ बतलाया है। पहला दस हजार आहुतियोंका, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका तथा सम्पूर्ण तृतीयः कोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः । कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ अयुतेनाहुतीनां च नवग्रहमखः स्मृतः ॥ ६ आहुतियोंका होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधिका, जो पुराणों एवं तस्य तावद्विधिं वक्ष्ये पुराणश्रुतिभाषितम् । श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, मैं वर्णन कर रहा हूँ। गर्तस्योत्तरपूर्वेण वितस्तिद्वयविस्तृताम् ॥ ७ (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डकी पूर्वोत्तर दिशामें देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण वप्रद्वयावृतां वेदिं वितस्त्युच्छ्रितसम्मिताम् । कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो संस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदङ्मुखाम् ॥ ८ परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख अग्निप्रणयनं कृत्वा तस्यामावाहयेत् सुरान् । उत्तरकी ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्निकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर देवतानां ततः स्थाप्या विंशतिर्द्वादशाधिका ॥ ९ बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये ॥ २-९ ॥ सूर्यः सोमस्तथा भौमो बुधजीवसितार्कजाः । सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहुः केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहाः ॥ १० राहु, केतु - ये लोगोंके हितकारी ग्रह कहे गये हैं।
- यह पाँच आथर्वण कल्पों - नक्षत्र, वैतान, संहितार्विध, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमेंसे प्रथम एवं पाँचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अथर्वपरिशिष्ट, याज्ञवल्क्यस्मृति १ । २९५-३०८, वृद्धपाराशर ११, पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड ८२-८६, नारदपुराण १। ५१, भविष्यपुराण, अग्निपुराण २६४-७४ आदिमें भी प्राप्त है। मत्स्यका पाठ बहुत अशुद्ध है। उपर्युक्त ग्रन्थोंकी सहायतासे इसे पूर्णतया शुद्ध कर लिया गया है। इनकी कई बातें शान्ति-संग्रहों और ज्योतिषग्रन्थोंमें भी आयी हैं।
३१६ * मत्स्यपुराण * मध्ये तु भास्करं विद्याल्लोहितं दक्षिणेन तु। उत्तरेण गुरुं विद्याद् बुधं पूर्वोत्तरेण तु॥ ११ पूर्वेण भार्गवं विद्यात् सोमं दक्षिणपूर्वक। पश्चिमेन शनिं विद्याद् राहुं पश्चिमदक्षिणे। पश्चिमोत्तरतः केतुं स्थापयेच्छुक्लतण्डुलैः ॥ १२ भास्करस्येश्वरं विद्यादुमां च शशिनस्तथा। स्कन्दमङ्गारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम् ॥ १३ ब्रह्माणं च गुरोर्विद्याच्छुक्रस्यापि शचीपतिम्। शनैश्चरस्य तु यमं राहोः कालं तथैव च ॥ १४ केतोर्वै चित्रगुप्तं च सर्वेषामधिदेवताः । अग्निरापः क्षितिर्विष्णुंरिन्द्र ऐन्द्री च देवता ॥ १५ प्रजापतिश्च सर्पाश्च ब्रह्मा प्रत्यधिदेवताः । विनायकं तथा दुर्गां वायुराकाशमेव च। आवाहयेद् व्याहृतिभिस्तथैवाश्विकुमारको ॥ १६ संस्मरेद् रक्तमादित्यमङ्गारकसमन्वितम्। सोमशुक्रौ तथा श्वेतौ बुधजीवौ च पिङ्गलौ। मन्दराहू तथा कृष्णौ धूम्रं केतुगणं विदुः ॥ १७ ग्रहवर्णानि देयानि वासांसि कुसुमानि च। धूपामोदोऽत्र सुरभिरुपरिष्टाद् वितानिकम्। शोभनं स्थापयेत् प्राज्ञः फलपुष्पसमन्वितम्॥ १८ गुडौदनं रवेर्दद्यात् सोमाय घृतपायसम्। अङ्गारकाय संयावं बुधाय क्षीरषष्टिकम् ॥ १९ दध्योदनं च जीवाय शुक्राय च घृतौदनम्। शनैश्चराय कृसरामजामांसं च राहवे। चित्रौदनं च केतुभ्यः सर्वैर्भक्ष्यैरथार्चयेत्॥ २० प्रागुत्तरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूषितम्। चूतपल्लवसंच्छन्नं फलवस्त्रयुगान्वितम् ॥ २१ पञ्चरत्नसमायुक्तं पञ्चभङ्गसमन्वितम्। स्थापयेदव्रणं कुम्भं वरुणं तत्र विन्यसेत् ॥ २२ गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्रांश्च सरांसि च। गजाश्वरथ्यावल्मीकसङ्गमाद्ध्रदगोकुलात् ॥ २३ श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी, पूर्वमें शुक्रकी, दक्षिणपूर्वकोणपर चन्द्रमाकी, पश्चिममें शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पश्चिमोत्तरकोणपर केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान् विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनैश्चरके यम, राहुके काल और केतुके चित्रगुप्त अधिदेवता माने गये हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, ऐन्द्री देवता, प्रजापति, सर्प और ब्रह्मा-ये सभी क्रमशः प्रत्यधिदेवता हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश और अश्विनीकुमारोंका भी व्याहृतियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेतवर्णका, बुध और बृहस्पतिको पीतवर्णका, शनि और राहुको कृष्णवर्णका तथा केतुको धूम्रवर्णका जानना और ध्यान करना चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप दे, ऊपर सुन्दर चंदोवा लगा दे। पुनः फल, पुष्प आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलसे बने हुए अन्न (खीर)-का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए पदार्थका, मंगलको गोझियाका, बुधको क्षीरषष्टिक (दूधमें पके हुए साठीके चावल)-का, बृहस्पतिको दही- भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका, राहुको अजा नामक वृक्षके फलके गूदाका और केतुको विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी प्रकारके भक्ष्य पदार्थोंद्वारा पूजन करे ॥१०-२०॥ वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशकी स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आमके पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्न डाल दे और उसे पञ्चभंग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा स्थापन करे। विप्रेन्द्र! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि वह हाथीसार, घुड़शाल, चौराहे, बिमवट, नदीके संगम,
| * अध्याय ९३ * | ३१७ |
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| मृदानीय विप्रेन्द्र सर्वौषधिजलान्विताम्।<br>स्नानार्थं विन्यसेत् तत्र यजमानस्य धर्मवित्॥ २४<br>सर्वे समुद्राः सरितः सरांसि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ २५<br>एवमावाहयेदेतानमरान् मुनिसत्तम।<br>होमं समारभेत् सर्पिर्यवव्रीहितिलादिभिः॥ २६<br>अर्कः पलाशखदिरावपामार्गोऽथ पिप्पलः।<br>औदुम्बरः शमी दूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्॥ २७<br>एकैकस्याष्टकशतमुष्टाविंशतिरेव वा।<br>होतव्या मधुसर्पिर्भ्यां दध्ना चैव समन्विताः॥ २८<br>प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनीः।<br>समिधः कल्पयेत् प्राज्ञः सर्वकर्मसु सर्वदा॥ २९<br>देवानापि सर्वेषामुपांशुः परमार्थवित्।<br>स्वेन स्वेनैव मन्त्रेण होतव्याः समिधः पृथक्॥ ३० | कुण्ड और गोशालेकी मिट्टी लाकर उसे सर्वौषधमिश्रित जलसे अभिषिक्त कर यजमानके स्नानके लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे तथा 'यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदी, नद, बादल और सरोवर यहाँ पधारें' यों कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। मुनिसत्तम ! तत्पश्चात् घी, यव, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचिंडा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश—ये क्रमशः नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दहीसे युक्त एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतियाँ हवन करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कर्मोंमें अँगूठेके सिरेसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बरोह, शाखा और पत्तोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्-पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे॥ २१—३०॥ | | होतव्यं च घृताभ्यक्तं चरुभक्षादिकं पुनः।<br>मन्त्रैर्दशाहुतीर्हुत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः॥ ३१<br><br>उदङ्मुखाः प्राङ्मुखा वा कुर्युर्ब्राह्मणपुंगवाः।<br>मन्त्रवन्तश्च कर्तव्याश्चरवः प्रतिदैवतम्॥ ३२<br><br>दत्त्वा च तांश्चरून् सम्यक् ततो होमं समाचरेत्।<br>आकृष्णेनेति सूर्याय होमः कार्यों द्विजन्मना॥ ३३<br><br>आप्यायस्वेति सोमाय मन्त्रेण जुहुयात् पुनः।<br>अग्निर्मूर्धा दिवो मन्त्र इति भौमाय कीर्तयेत्॥ ३४<br><br>अग्ने विवस्वदुषस इति सोमसुताय वै।<br>बृहस्पते परिदीया रथेनेति गुरोर्मतः॥ ३५<br><br>शुक्रं ते अन्यदिति च शुक्रस्यापि निगद्यते।<br>शनैश्चरायेति पुनः शं नो देवीति होमयेत्॥ ३६ | पुनः चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् व्याहृतियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्निमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोंका हवन करें। इस प्रकार उन चरुओंका भलीभाँति हवन करनेके पश्चात् (प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा) हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आकृष्णेन रजसा०'* (शुक्लयजुर्वाजसने० सं० ३३। ४३)—इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यके लिये हवन करना चाहिये। पुनः 'आप्यायस्व०' (वही १२। ११४) इस मन्त्रसे चन्द्रमाके लिये आहुति डाले। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्०' (वही० १३। १४) इस मन्त्रका पाठ करे। बुधके लिये 'अग्ने विवस्वदुषस०'—(ऋ० सं० १। ४४। १) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'परिदीया रथेन०' (ऋक्० ५। ८३। ७)—ये मन्त्र माने गये हैं।* शुक्रके लिये 'शुक्रं ते अन्यद्०' (ऋ० सं० ६। ५८। १, कृष्णय० तैत्तिरी० सं० ४। १। ११। २)—यह मन्त्र बतलाया गया है। शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभीष्टये०' (शुक्लयजु० वाज० ३६। १२३)—इस मन्त्रसे हवन करना |
* यहाँ ग्रहों और देवताओंके कुछ मन्त्र अन्य पुराणों, स्मृतियों तथा पद्धतियोंसे भिन्न निर्दिष्ट हुए हैं।
३१८ * मत्स्यपुराण *
| मूल संस्कृत (श्लोक) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कयानश्चित्र आभुव इति राहोरुदाहृतः।<br>केतुं कृण्वन्नपि ब्रूयात् केतूनामपि शान्तये ॥ ३७ | चाहिये। राहुके लिये 'कया नश्चित्र आभुव०' (वही २७।३९)—यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये—'केतुं कृण्वन्०' (वही २९।३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये॥ ३१—३७॥ |
| आवो राजेति रुद्रस्य बलिहोमं समाचरेत्।<br>आपो हिष्ठेत्युमायास्तु स्यो नेति स्वामिनस्तथा ॥ ३८<br><br>विष्णोरिदं विष्णुरिति तमीशेति स्वयम्भुवः।<br>इन्द्रमिद्धेवतायेति इन्द्राय जुहुयात् ततः ॥ ३९<br><br>तथा यमस्य चायं गौरिति होमः प्रकीर्तितः।<br>कालस्य ब्रह्म जज्ञानमिति मन्त्रः प्रशस्यते ॥ ४०<br><br>चित्रगुप्तस्य चाज्ञातमिति मन्त्रविदो विदुः।<br>अग्निं दूतं वृणीमह इति वह्नेरुदाहृतः ॥ ४१<br><br>उदुत्तमं वरुणमित्यपां मन्त्रः प्रकीर्तितः।<br>भूमेः पृथिव्यन्तरिक्षमिति वेदेषु पठ्यते ॥ ४२<br><br>सहस्रशीर्षा पुरुष इति विष्णोरुदाहृतः।<br>इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत इति शक्रस्य शस्यते ॥ ४३<br><br>उत्तानपर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत्।<br>प्रजापतेः पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृतः ॥ ४४<br><br>नमोऽस्तु सर्पेभ्य इति सर्पाणां मन्त्र उच्यते।<br>एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्य इति ब्रह्मण उदाहृतः ॥ ४५<br><br>विनायकस्य चानूनमिति मन्त्रो बुधैः स्मृतः।<br>जातवेदसे सुनवामिति दुर्गेऽयमुच्यते ॥ ४६<br><br>आदिप्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृतः।<br>क्राणा शिशुर्महीनां च वायोर्मन्त्रः प्रकीर्तितः ॥ ४७<br><br>एषो उषा अपूर्व्या इत्यश्विनोर्मन्त्र उच्यते।<br>पूर्णाहुतिस्तु मूर्धानं दिव इत्यभिपातयेत् ॥ ४८ | फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रम्' (ऋक्सं० ४।३।१; कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१)—इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देना चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि ष्ठा०' (वाजस-सं० ११।५०)—इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकके लिये 'स्यो ना०'—इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुः०' (शुक्लयजु० वाज० ५।१५)—इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्०' (वाजस० २५।१८)—इस मन्त्रसे, और इन्द्रके लिये 'इन्द्रमिद्धेवताय०'—इस मन्त्रसे आहुति डाले। उसी प्रकार यमके लिये 'अयं गौः०' (वही ३।६)—इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये—'ब्रह्मजज्ञानम्०' (वही १३।३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। मन्त्रवेत्तालोग चित्रगुप्तके लिये 'अज्ञातम्०'—यह मन्त्र बतलाते हैं। अग्निके लिये 'अग्निं दूतं वृणीमहे' (ऋक्सं० १।१२।१; अथर्व० २०।१०१।१)—यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये 'उदुत्तमं वरुणपाशम्' (ऋक्सं० १।२४।१५)—यह मन्त्र कहा गया है। वेदोंमें पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०'—इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०' (वाजस० सं० ३१।१)—यह मन्त्र कहा गया है। इन्द्रके लिये 'इन्द्रायेन्द्रो मरुत्वत०'—यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। देवीके लिये 'उत्तानपर्णे सुभगे०'—यह मन्त्र जानना चाहिये। पुनः प्रजापतिके लिये 'प्रजापतिः०' (वाजस० सं० ३१।१७)—यह हवन-मन्त्र कहा जाता है। सर्पोंके लिये 'नमोऽस्तु सर्पेभ्यः०' (वही १३।६)—यह मन्त्र बतलाया जाता है। ब्रह्माके लिये 'एष ब्रह्मा य ऋत्विग्भ्यः०'—यह मन्त्र कहा गया है। विनायकके लिये विद्वानोंने 'अनूनम्०'—यह मन्त्र बतलाया है। 'जातवेदसे सुनवाम०' (ऋक्० १।९९।१)—यह दुर्गा-मन्त्र कहा जाता है। 'आदिप्रत्नस्य रेतस०'—यह आकाशका मन्त्र बतलाया जाता है। 'क्राणा शिशुर्महीनां च०'—यह वायुका मन्त्र कहा गया है। 'एषो उषाअपूर्व्यात्०'—यह अश्विनी-कुमारोंका मन्त्र कहा जाता है। 'मूर्धानं दिव०' (ऋक्० ६।७।१; वाज० ७।२४)—इस मन्त्रसे हवनकुण्डमें पूर्णाहुति डालनी चाहिये॥ ३८—४८॥ |
९४- नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन
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* मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम्।<br>सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा॥ ६२<br>सर्वेषामथवा गावो दातव्या हेमभूषिताः।<br>सुवर्णमथवा दद्याद् गुरुर्वा येन तुष्यति।<br>समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः॥ ६३ | राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेका दान करे। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिये अथवा जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। किंतु सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है॥ ५८—६३॥ |
| कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणी।<br>तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६४ | (दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) 'कपिले! तुम रोहिणीरूपा हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंकी पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।* |
| पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६५ | शङ्ख! तुम पुण्योंके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक।<br>अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६६ | जगत्को आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमबीजं विभावसोः।<br>अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६७ | सुवर्ण! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यफलके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| पीतवस्त्रयुगं यस्माद् वासुदेवस्य वल्लभम्।<br>प्रदानात् तस्य मे विष्णो ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६८ | दो पीला वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो! उसका दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें। |
| विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः।<br>चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६९ | अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मात् त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा।<br>सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७० | पृथ्वी! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, केशवके सदृश फलदायिनी और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाली हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मादायसकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा।<br>लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७१ | लौह! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य सदा तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| छाग त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः।<br>यानं विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७२ | छाग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्निदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।<br>यस्मात् तस्माच्छ्रियै मे स्यादिह लोके परत्र च॥ ७३ | गौ! चूँकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भुवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी लक्ष्मी प्रदान करो। |
| यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि॥ ७४ | जिस प्रकार भगवान् केशवकी शय्या सदा अशून्य (लक्ष्मीसे युक्त) रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान की गयी शय्या जन्म-जन्ममें अशून्य बनी रहे। |
| यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः।<br>तथा रत्नानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः॥ ७५ | जैसे सभी रत्नोंमें समस्त देवता निवास करते हैं, वैसे ही रत्नदान करनेसे वे देवता मुझे भी रत्न प्रदान करें। |
* तुलनीय—'इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे' आदि (यजु० ८।४३ और उसके उव्वट-महीधरादिभाष्य)।
९५- माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
- अध्याय ९३ * ३२१ यथा भूमिप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्। दानान्यन्यानि मे शान्तिर्भूमिदानाद् भवत्विह ॥ ७६ एवं सम्पूजयेद् भक्त्या वित्तशाठ्येन वर्जितः। रत्नकाञ्चनवस्त्रौघैर्धूपमाल्यानुलेपनैः ॥ ७७ अनेन विधिना यस्तु ग्रहपूजां समाचरेत्। सर्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥ ७८ यस्तु पीडाकरो नित्यमल्पवित्तस्य वा ग्रहः। तं च यत्नेन सम्पूज्य शेषानप्यर्चयेद् बुधः ॥ ७९ ग्रहा गावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः। पूजिताः पूजयन्त्येते निर्दहन्त्यवमानिताः ॥ ८० यथा बाणप्रहाराणां कवचं भवति वारणम्। तद्वद् दैवोपघातानां शान्तिर्भवति वारिका ॥ ८१ तस्मान्न दक्षिणाहीनं कर्तव्यं भूतिमिच्छता। सम्पूर्णया दक्षिणया यस्माद् देवोऽपि तुष्यति ॥ ८२ सदैवायुतहोमोऽयं नवग्रहमखे स्थितः। विवाहोत्सवयज्ञेषु प्रतिष्ठादिषु कर्मसु ॥ ८३ निर्विघ्नार्थं मुनिश्रेष्ठ तथोद्वेगाद्भुतेषु च। कथितोऽयुतहोमोऽयं लक्षहोममतः शृणु ॥ ८४ सर्वकामाप्तये यस्माल्लक्षहोमं विदुर्बुधाः। पितॄणां वल्लभं साक्षाद् भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ८५ ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्। गृहस्योत्तरपूर्वेण मण्डपं कारयेद् बुधः ॥ ८६ रुद्रायतनभूमौ वा चतुरस्रमुदङ्मुखम्। दशहस्तमथाष्टौ वा हस्तान् कुर्याद् विधानतः ॥ ८७ प्रागुदक्प्लवनां भूमिं कारयेद् यत्नतो बुधः। जिस प्रकार अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः भूमि-दान करनेसे मुझे इस लोकमें शान्ति प्राप्त हो' ॥ ६४-७६ ॥ इस प्रकार कृपणता छोड़कर भक्तिपूर्वक रत्न, सुवर्ण, वस्त्रसमूह, धूप, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे ग्रहोंकी पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा मरनेपर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी निर्धन मनुष्यको कोई ग्रह नित्य पीड़ा पहुँचा रहा हो तो उस बुद्धिमान्को चाहिये कि उस ग्रहकी यत्नपूर्वक भलीभाँति पूजा करके तत्पश्चात् शेष ग्रहोंकी भी अर्चना करे; क्योंकि ग्रह, गौ, राजा और ब्राह्मण—ये विशेषरूपसे पूजित होनेपर रक्षा करते हैं, अन्यथा अवहेलना किये जानेपर जलाकर भस्म कर देते हैं। जैसे बाणोंके आघातका प्रतिरोध करनेवाला कवच होता है, उसी प्रकार दुर्दैवद्वारा किये गये उपघातोंको निवारण करनेवाली शान्ति (ग्रह-यज्ञ) होती है। इसलिये वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको दक्षिणासे रहित यज्ञ नहीं करना चाहिये; क्योंकि भरपूर दक्षिणा देनेसे (यज्ञका प्रधान) देवता भी संतुष्ट हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ! नवग्रहोंके यज्ञमें यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही होता है। इसी प्रकार विवाह, उत्सव, यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि कर्मोंमें तथा चित्तकी उद्विग्रता एवं आकस्मिक विपत्तियोंमें भी यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही बतलाया गया है। इसके बाद अब मैं एक लाख आहुतियोंवाला हवन बतला रहा हूँ, सुनिये। विद्वानोंने सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये लक्षहोमका विधान किया है; क्योंकि यह पितरोंको परम प्रिय और साक्षात् भोग एवं मोक्षरूपी फलका प्रदाता है। बुद्धिमान् यजमानको चाहिये कि ग्रहबल और ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और अपने गृहके पूर्वोत्तर दिशामें अथवा शिवमन्दिरकी समीपवर्ती भूमिपर विधानपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये, जो दस हाथ अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा चौकोर हो तथा उसका मुख (प्रवेशद्वार) उत्तर दिशाकी ओर हो। उसकी भूमिको यत्नपूर्वक पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू बना देना चाहिये ॥ ७७-८७ १/२ ॥
३२२ * मत्स्यपुराण *
| प्रागुत्तरं समासाद्य प्रदेशं मण्डपस्य तु॥ ८८ <br><br> शोभनं कारयेत् कुण्डं यथावल्लक्षणान्वितम्। <br> चतुरस्रं समंतात्तु योनिवक्त्रं समेखलम्॥ ८९ <br><br> चतुरङ्गुलविस्तारा मेखला तद्दुच्छ्रिता। <br> प्रागुदक्प्लवना कार्या सर्वतः समवस्थिता॥ ९० <br><br> शान्त्यर्थं सर्वलोकानां नवग्रहमखः स्मृतः। <br> मानहीनाधिकं कुण्डमनेकभयदं भवेत्। <br> यस्मात् तस्मात् सुसम्पूर्णं शान्तिकुण्डं विधीयते॥ ९१ <br><br> अस्माद् दशगुणः प्रोक्तो लक्षहोमः स्वयम्भुवा। <br> आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिस्तथैव च॥ ९२ <br><br> द्विहस्तविस्तृतं तद्वच्चतुर्हस्तायतं पुनः। <br> लक्षहोमे भवेत् कुण्डं योनिवक्त्रं त्रिमेखलम्॥ ९३ <br><br> तस्य चोत्तरपूर्वेण वितस्तित्रयसंस्थितम्। <br> प्रागुदक्प्लवनं तच्च चतुरस्रं समंततः॥ ९४ <br><br> विष्कम्भार्धोच्छ्रितं प्रोक्तं स्थण्डिलं विश्वकर्मणा। <br> संस्थापनाय देवानां वप्रत्रयसमावृतम्॥ ९५ <br><br> द्व्यङ्गुलो ह्युच्छ्रितो वप्रः प्रथमः स उदाहृतः। <br> अङ्गुलोच्छ्रयसंयुक्तं वप्रद्वयमथोपरि॥ ९६ <br><br> त्र्यङ्गुलस्य च विस्तारः सर्वेषां कथ्यते बुधैः। <br> दशाङ्गुलोच्छ्रिता भित्तिः स्थण्डिले स्यात् तथोपरि। <br> तस्मिन्नावाहयेद् देवान् पूर्ववत् पुष्पतण्डुलैः॥ ९७ <br><br> आदित्याभिमुखाः सर्वाः साधिप्रत्यधिदेवताः। <br> स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः॥ ९८ <br><br> गरुत्मानधिकस्तत्र सम्पूज्यः श्रियमिच्छता। <br> सामध्वनिशरीरस्त्वं वाहनं परमेष्ठिनः। <br> विषपापहरो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ९९ | तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड* तैयार कराये, जो चारों ओरसे चौकोर हो, जिसमें योनिरूप मुख बना हो और जो मेखलासे युक्त हो। यह मेखला चार अङ्गुल चौड़ी और उतनी ही ऊँची, कुण्डको चारों ओरसे घेरे हुए और पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू हो। सभी लोगोंके लिये ग्रह-शान्तिके निमित्त नवग्रह-यज्ञ बतलाया गया है। चूँकि उपर्युक्त परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये। ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दस गुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयत्नपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंके द्वारा सम्पन्न करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। विश्वकर्माने कुण्डके पूर्वोत्तर दिशामें तीन बित्तेकी दूरीपर देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो चारों ओरसे चौकोर, पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू, विष्कम्भ (कुण्डके व्यास)-के आधे परिमाणके बराबर ऊँची और तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची तथा शेष दो एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानोंने इन सबकी चौड़ाई तीन अङ्गुलकी बतलायी है। वेदीके ऊपर दस अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। मुनिश्रेष्ठ! अधिदेवताओं एवं प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख ही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें (सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुड़की भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये—) ‘गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो'॥८८—९९॥ |
* कल्याण—अग्निपुराणाङ्क अ० २४ की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।
| * अध्याय ९३ * | ३२३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पूर्ववत् कुम्भमामन्त्र्य तद्वद्धोमं समाचरेत्।<br>सहस्त्राणां शतं हुत्वा समित्संख्याधिकं पुनः।<br>घृतकुम्भवसोधारां पातयेदनलोपरि ॥ १००<br><br>औदुम्बरीं तथाऽर्द्रां च ऋज्वीं कोटरवर्जिताम्।<br>बाहुमात्रां स्रुचं कृत्वा ततः स्तम्भद्वयोपरि।<br>घृतधारां तया सम्यगग्नेरुपरि पातयेत् ॥ १०१<br><br>श्रावयेत् सूक्तमाग्नेयं वैष्णवं रौद्रमैन्दवम्।<br>महावैश्वानरं साम ज्येष्ठसाम च वाचयेत् ॥ १०२<br><br>स्नानं च यजमानस्य पूर्ववत् स्वस्तिवाचनम्।<br>दातव्या यजमानेन पूर्ववद् दक्षिणाः पृथक् ॥ १०३<br><br>कामक्रोधविहीनेन ऋत्विग्भ्यः शान्तचेतसा।<br>नवग्रहमखे विप्राश्चत्वारो वेदवेदिनः ॥ १०४<br><br>अथवा ऋत्विजौ शान्तौ द्वावेव श्रुतिकोविदौ।<br>कार्यावयुतहोमे तु न प्रसज्येत विस्तरे ॥ १०५ | तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये। (वसोर्धाराकी विधि यह है—) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, स्रुवा बनवाकर उसे दो खम्भोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १। १), विष्णुसूक्त (वाजसं० ५। १–२२), रुद्रसूक्त (वही १६) और इन्दु (सोम) सूक्त (ऋ० १। ९१) सुनाना चाहिये तथा महावैश्वानर साम और ज्येष्ठसामका पाठ कराना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नानकर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम-क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्रहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्तस्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये॥ १००–१०५॥ |
| तद्वच्च दश चाष्टौ च लक्षहोमे तु ऋत्विजः।<br>कर्त्तव्याः शक्तितस्तद्वच्चत्वारो वा विमत्सरः ॥ १०६<br><br>नवग्रहमखात् सर्वं लक्षहोमे दशोत्तरम्।<br>भक्ष्यान् दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूषणान्यपि शक्तितः ॥ १०७<br><br>शयनानि सवस्त्राणि हैमानि कटकानि च।<br>कर्णाङ्गुलिपवित्राणि कण्ठसूत्राणि शक्तिमान् ॥ १०८<br><br>न कुर्याद् दक्षिणाहीनं वित्तशाठ्येन मानवः।<br>अददन् लोभतो मोहात् कुलक्षयमवाप्नुते ॥ १०९<br><br>अन्नदानं यथाशक्त्या कर्तव्यं भूतिमिच्छता।<br>अन्नहीनः कृतो यस्माद् दुर्भिक्षफलदो भवेत् ॥ ११०<br><br>अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनस्तु ऋत्विजः।<br>यष्टारं दक्षिणाहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः ॥ १११<br><br>न वाप्यल्पधनः कुर्याल्लक्षहोमं नरः क्वचित्।<br>यस्मात् पीडाकरो नित्यं यज्ञे भवति विग्रहः ॥ ११२ | उसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। मुनिश्रेष्ठ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल, अँगूठी और कण्ठसूत्र (हार) आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दस गुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये; क्योंकि अन्नदानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन ऋत्विज्को और दक्षिणारहित यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है। इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये; क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। |
९६- सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य
| ३२४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमेव पूजयेद् भक्त्या द्वौ वा त्रीन् वा यथाविधि ।<br>एकमप्यर्चयेद् भक्त्या ब्राह्मणं वेदपारगम् ।<br>दक्षिणाभिः प्रयत्नेन न बहूनल्पवित्तवान् ॥ ११३<br>लक्षहोमस्तु कर्तव्यो यदा वित्तं भवेद् बहु ।<br>यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन् कामान् विधानतः ॥ ११४<br>पूज्यते शिवलोके च वस्वादित्यमरुद्गणैः ।<br>यावत् कल्पशतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११५<br>सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि ।<br>स तं काममवाप्नोति पदमानन्त्यमश्नुते ॥ ११६<br>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम् ।<br>भार्यार्थी शोभनां भार्यां कुमारी च शुभं पतिम् ॥ ११७<br>भ्रष्टराज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नुयात् ।<br>यं यं प्रार्थयते कामं स वै भवति पुष्कलः ।<br>निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति ॥ ११८<br>अस्माच्छतगुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयम्भुवा ।<br>आहुतीभिः प्रयत्नेन दक्षिणाभिः फलेन च ॥ ११९ | स्वल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये; क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्तमें मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाकी प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दरी पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लक्ष्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है॥ १०६-११८॥ |
| पूर्ववद् ग्रहदेवानामावाहनविसर्जनैः ।<br>होममन्त्रास्त एवोक्ताः स्नाने दाने तथैव च ।<br>कुण्डमण्डपवेदीनां विशेषोऽयं निबोध मे ॥ १२०<br>कोटिहोमे चतुर्हस्तं चतुरस्रं तु सर्वतः ।<br>योनिवक्त्रद्वयोपेतं तदप्याहुस्त्रिमेखलम् ॥ १२१<br>द्व्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमा मेखला बुधैः ।<br>त्र्यङ्गुलाभ्युच्छ्रिता तद्वद् द्वितीया परिकीर्तिता ॥ १२२<br>उच्छ्रायविस्तराभ्यां च तृतीया चतुरङ्गुला ।<br>द्व्यङ्गुलश्चेति विस्तारः पूर्वयोरेव शस्यते ॥ १२३<br>वितस्तिमात्रा योनिःस्यात् षट्सप्ताङ्गुलविस्तृता ।<br>कूर्मपृष्ठोन्नता मध्ये पार्श्वयोश्चाङ्गुलोच्छ्रिता ॥ १२४<br>गजोष्ठसदृशी तद्वदायता छिद्रसंयुता ।<br>एतत् सर्वेषु कुण्डेषु योनिलक्षणमुच्यते ॥ १२५ | मुने! प्रयत्नपूर्वक दी गयी आहुतियों, दक्षिणाओं और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप और वेदीमें कुछ विशेषता है, वह मैं बतला रहा हूँ, सुनिये। इस कोटिहोममें सब ओरसे चौकोर चार हाथके परिमाणवाला कुण्ड बनाना चाहिये। वह दो योनिमुखों और तीन मेखलाओंसे युक्त हो। विद्वानोंको पहली मेखला दो अङ्गुल ऊँची बनानी चाहिये। उसी प्रकार दूसरी मेखला तीन अङ्गुल ऊँची बतलायी गयी है और तीसरी मेखला ऊँचाई और चौड़ाईमें चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। पहली दोनों मेखलाओंकी चौड़ाई तो दो अङ्गुलकी ही ठीक मानी गयी है। इनके ऊपर एक बित्ता लम्बी और छः-सात अङ्गुल चौड़ी योनि होनी चाहिये। उसका मध्य-भाग कछुवेकी पीठकी तरह ऊँचा और दोनों पार्श्वभाग एक अङ्गुल ऊँचा हो। वह हाथीके होंठके समान लम्बी और छिद्र (घी गिरनेका मार्ग) युक्त हो। सभी कुण्डोंमें यही योनिका लक्षण बतलाया जाता है। |
- अध्याय ९३ * ३२५
| मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदलसंनिभम्।<br>वेदी च कोटिहोमे स्याद् वितस्तीनां चतुष्टयम्॥ १२६<br>चतुरस्त्रा समन्ताच्य त्रिभिर्वप्रैस्तु संयुता।<br>वप्रप्रमाणं पूर्वोक्तं वेदीनां च तथोच्छ्रयः॥ १२७<br>तथा षोडशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः।<br>पूर्वद्वारे च संस्थाप्य बह्वृचं वेदपारगम्॥ १२८<br>यजुर्विदं तथा याम्ये पश्चिमे सामवेदिनम्।<br>अथर्ववेदिनं तद्वदुत्तरे स्थापयेद् बुधः॥ १२९<br>अष्टौ तु होमकाः कार्या वेदवेदाङ्गवेदिनः।<br>एवं द्वादश विप्राः स्युर्वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>पूर्ववत् पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ १३०<br>रात्रिसूक्तं च रौद्रं च पावमानं सुमङ्गलम्।<br>पूर्वेतो बह्वृचः शान्तिं पठन्नास्ते ह्युदङ्मुखः॥ १३१<br>शाक्तं शाक्रं च सौम्यं च कौष्माण्डं शान्तिमेव च।<br>पाठयेद् दक्षिणद्वारि यजुर्वेदिनमुत्तमम्॥ १३२<br>सुपर्णमथ वैराजमाग्रेयं रुद्रसंहिताम्।<br>ज्येष्ठसाम तथा शान्तिं छन्दोगः पश्चिमे जपेत्॥ १३३<br>शान्तिसूक्तं च सौरं च तथा शाकुनकं शुभम्।<br>पौष्टिकं च महाराज्यमुत्तरेणाप्यथर्ववित्॥ १३४<br>पञ्चभिः सप्तभिर्वापि होमः कार्योऽत्र पूर्ववत्।<br>स्नाने दाने च मन्त्राः स्युस्त एव मुनिसत्तम॥ १३५<br>वसोर्धाराविधानं च लक्षहोमे विशिष्यते।<br>अनेन विधिना यस्तु कोटिहोमं समाचरेत्।<br>सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णुपदं व्रजेत्॥ १३६<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि ग्रहयज्ञत्रयं नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा पदमिन्द्रस्य गच्छति॥ १३७<br>अश्वमेधसहस्त्राणि दश चाष्टौ च धर्मवित्।<br>कृत्वा यत् फलमाप्नोति कोटिहोमात् तदश्नुते॥ १३८ | योनि सभी मेखलाओंके ऊपर पीपलके पत्तेके सदृश होनी चाहिये। कोटिहोममें चार बित्ता लम्बी, चारों ओरसे चौकोर और तीन परिधियोंसे युक्त एक वेदी होनी चाहिये। परिधियोंका प्रमाण तथा वेदियोंकी ऊँचाई पहले कही जा चुकी है। पुनः सोलह हाथ लम्बे-चौड़े मण्डपकी स्थापना करे, जिसमें चारों दिशाओंमें दरवाजे हों। बुद्धिसम्पन्न यजमान उसके पूर्वद्वारपर ऋग्वेदके पारगामी ब्राह्मणको, दक्षिण द्वारपर यजुर्वेदके ज्ञाताको, पश्चिमद्वारपर सामवेदीको और उत्तरद्वारपर अथर्ववेदीको नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त वेद एवं वेदाङ्गोंके ज्ञाता आठ ब्राह्मणोंको हवन करनेके लिये नियुक्त करना चाहिये। इस प्रकार इस कार्यमें बारह ब्राह्मणोंको नियुक्त करनेका विधान है। इन सभी ब्राह्मणोंका वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला, चन्दन आदि सामग्रियोंद्वारा पूर्ववत् भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये॥ ११९—१३०॥<br><br>(कार्यारम्भ होनेपर) पूर्वद्वारपर स्थित ऋग्वेदी ब्राह्मण उत्तराभिमुख हो परम माङ्गलिक रात्रिसूक्त, रुद्रसूक्त, पवमानसूक्त तथा अन्यान्य शान्ति-सूक्तोंका पाठ करता रहे। दक्षिणद्वारपर स्थित श्रेष्ठ यजुर्वेदी ब्राह्मणसे शक्तिसूक्त, शक्रसूक्त, सोमसूक्त, कूष्माण्डसूक्त तथा शान्ति-सूक्तका पाठ करवाना चाहिये। पश्चिमद्वारपर स्थित सामवेदी ब्राह्मण सुपर्ण, वैराज, आग्नेय—इन ऋचाओं, रुद्रसंहिता, ज्येष्ठसाम तथा शान्तिपाठोंका गान करे। उत्तरद्वारपर नियुक्त अथर्ववेदी ब्राह्मण शान्ति (शांतातीय १९)-सूक्त, सूर्यसूक्त, माङ्गलिक शकुनिसूक्त, पौष्टिक एवं महाराज्य (सूक्त)-का पाठ करे। मुनिश्रेष्ठ ! इसमें भी पूर्ववत् पाँच अथवा सात ब्राह्मणोंद्वारा हवन कराना चाहिये। स्नान और दानके लिये वे ही पूर्वकथित मन्त्र इसमें भी हैं। लक्षहोममें केवल वसोर्धाराका विधान विशेष होता है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे कोटिहोमका विधान करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और मरनेपर विष्णुलोकमें चला जाता है। जो मनुष्य तीनों प्रकारके ग्रहयज्ञोंका पाठ अथवा श्रवण करता है उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और अन्तमें वह इन्द्रलोकमें चला जाता है। धर्मज्ञ मनुष्य अठारह हजार अश्वमेधयज्ञोंके अनुष्ठानसे जो फल प्राप्त करता है, वह फल कोटिहोम नामक यज्ञसे प्राप्त हो जाता |
९७- आदित्यवार-कल्पका विधान और माहात्म्य
३२६ * मत्स्यपुराण *
| ब्रह्महत्यासहस्त्राणि भ्रूणहत्यार्बुदानि च।<br>कोटिहोमेन नश्यन्ति यथावच्छिवभाषितम्॥ १३९<br><br>वश्यकर्माभिचारादि तथैवोच्चाटनादिकम्।<br>नवग्रहमखं कृत्वा ततः काम्यं समाचरेत्॥ १४०<br><br>अन्यथा फलदं पुंसां न काम्यं जायते क्वचित्।<br>तस्मादयुतहोमस्य विधानं पूर्वमाचरेत्॥ १४१<br><br>वृत्तं चोच्चाटने कुण्डं तथा च वशकर्मणि।<br>त्रिमेखलैश्कवक्त्रमरत्निर्विस्तरेण तु॥ १४२<br><br>पलाशसमिधः शस्ता मधुगोरोचनान्विताः।<br>चन्दनागुरुणा तद्वत् कुङ्कुमेनाभिषिञ्चिताः॥ १४३<br><br>होमयेन्मधुसर्पिर्भ्यां बिल्वानि कमलानि च।<br>सहस्राणि दशैवोक्तं सर्वदैव स्वयम्भुवा॥ १४४<br><br>वश्यकर्मणि बिल्वानां पद्मानां चैव धर्मवित्।<br>सुमित्रिया न आप ओषधय इति होमयेत्॥ १४५<br><br>न चात्र स्थापनं कार्यं न च कुम्भाभिषेचनम्।<br>स्नानं सर्वौषधैः कृत्वा शुक्लपुष्पाम्बरो गृही॥ १४६<br><br>कण्ठसूत्रैः सकनकैर्विप्रान् समभिपूजयेत्।<br>सूक्ष्मवस्त्राणि देयानि शुक्ला गावः सकाञ्चनाः॥ १४७<br><br>अवशानि वशीकुर्यात् सर्वशत्रुबलान्यपि।<br>अमित्राण्यपि मित्राणि होमोऽयं पापनाशनः॥ १४८<br><br>विद्वेषणेऽभिचारे च त्रिकोणं कुण्डमिष्यते।<br>त्रिमेखलं कोणमुखं हस्तमात्रं च सर्वशः॥ १४९<br><br>होमं कुर्युस्ततो विप्रा रक्तमाल्यानुलेपनाः।<br>निवीतलोहितोष्णीषा लोहिताम्बरधारिणः॥ १५०<br><br>नववायसरक्ताढ्यपात्रत्रयसमन्विताः ।<br>समिधो वामहस्तेन श्येनास्थिबलसंयुताः।<br>होतव्या मुक्तकेशैस्तु ध्यायद्भिर्भिरशिवं रिपौ॥ १५१<br><br>दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु तथा हुंफडितीति च।<br>श्येनाभिचारमन्त्रेण क्षुरं समभिमन्त्र्य च॥ १५२ | है। शिवजीने यथार्थरूपसे कहा है कि कोटिहोमके अनुष्ठानसे हजारों ब्रह्महत्या और अरबों भ्रूणहत्या-जैसे महापातक नष्ट हो जाते हैं॥१३१-१३९॥<br><br>नारद! यदि वशीकरण, अभिचार तथा उच्चाटन आदि काम्य कर्मोंका अनुष्ठान करना हो तो पहले नवग्रह-यज्ञ सम्पन्न कर तत्पश्चात् काम्य कर्म करना चाहिये, अन्यथा वह काम्य कर्म मनुष्योंको कहीं भी फलदायक नहीं हो सकता। अतः पहले अयुतहोमका सम्पादन कर लेना उचित है। उच्चाटन और वशीकरण कर्मोंमें कुण्डको गोलाकार बनाना चाहिये। उसका विस्तार अर्थात् व्यास एक अरत्नि हो। वह तीन मेखलाओं और एक मुखसे युक्त हो। इन कार्योंमें मधु, गोरोचन, चन्दन, अगुरु और कुङ्कुमसे अभिषिक्त की हुई पलाशकी समिधाएँ प्रशस्त मानी गयी हैं। मधु और घीसे चुपड़े हुए बेल और कमल-पुष्पके हवनका विधान है। ब्रह्माने सदा दस हजार आहुतियोंका ही विधान बतलाया है। धर्मज्ञ यजमानको वशीकरण-कर्ममें 'सुमित्रिया न आप ओषधयः'—इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। इस कार्यमें कलशका स्थापन और अभिषेचन नहीं किया जाता। गृहस्थ यजमान सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान करके श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण कर ले और स्वर्णनिर्मित कण्ठहारोंसे ब्राह्मणोंकी पूजा करे तथा उन्हें महीन वस्त्र एवं स्वर्णसे विभूषित श्वेत रंगकी गौएँ प्रदान करे। (इस प्रकार विधिपूर्वक सम्पन्न किया गया) यह पापनाशक हवन वशमें न आनेवाली शत्रुओंकी सारी सेनाओंको वशीभूत कर देता है और शत्रुओंको मित्र बना देता है॥ १४०-१४८॥<br><br>समृद्धिकामी पुरुषको इन कर्मोंमेंसे केवल शान्तिकर्मका ही अनुष्ठान करना चाहिये। जो मानव निष्कामभावसे इन तीनों ग्रहयज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य इस ग्रहयज्ञको नित्य सुनता अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे न तो ग्रहजनित पीडा होती है और न उसके बन्धुजनोंका विनाश ही होता है। जिस घरमें ये तीनों (ग्रह, लक्ष एवं कोटि होम) |
| * अध्याय ९३ * | ३२७ |
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| प्रतिरूपं रिपोः कृत्वा क्षुरेण परिकर्तयेत्।<br>रिपुरूपस्य शकलान्यथैवाग्नौ विनिःक्षिपेत्॥ १५३<br>ग्रहयज्ञविधानान्ते सदैवाभिचरन् पुनः।<br>विद्वेषणं तथा कुर्वन्नेतदेव समाचरेत्॥ १५४<br>इहैव फलदं पुंसामेतन्नामुत्र शोभनम्।<br>तस्माच्छान्तिकमेवात्र कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ १५५<br>ग्रहयज्ञत्रयं कुर्याद् यस्त्वकाम्येन मानवः।<br>स विष्णोः पदमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ १५६<br>य इदं शृणुयान्नित्यं श्रावयेद् वापि मानवः।<br>न तस्य ग्रहपीडा स्यान्न च बन्धुजनक्षयः॥ १५७<br>ग्रहयज्ञत्रयं गेहे लिखितं यत्र तिष्ठति।<br>न पीडा तत्र बालानां न रोगो न च बन्धनम्॥ १५८<br>अशेषयज्ञफलदं निःशेषाघविनाशनम्।<br>कोटिहोमं विदुः प्राज्ञा भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १५९<br>अश्वमेधफलं प्राहुर्लक्षहोमं सुरोत्तमाः।<br>द्वादशाहमखस्तद्वन्नवग्रहमखः स्मृतः॥ १६०<br>इति कथितमिदानीमुत्सवानन्दहेतोः<br>सकलकलुषहारी देवयज्ञाभिषेकः।<br>परिपठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दभिभवति स शत्रूनायुरारोग्ययुक्तः॥ १६१ | यज्ञ-विधान लिखकर रखे रहते हैं, वहाँ न तो बालकोंको कोई कष्ट होता है, न रोग तथा बन्धन भी नहीं होता। विद्वानोंका कहना है कि कोटिहोम सम्पूर्ण यज्ञोंके फलका प्रदाता, अखिल पापोंका विनाशक और भोग एवं मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। श्रेष्ठ देवगण लक्षहोमको अश्वमेध-यज्ञके समान फलदायक बतलाते हैं। उसी प्रकार नवग्रह-यज्ञ, द्वादशाह-यज्ञके सदृश फलकारक बतलाया जाता है। इस प्रकार मैंने इस समय उत्सवके आनन्दकी प्राप्तिके लिये सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले इस देवयज्ञाभिषेकका वर्णन कर दिया। जो मनुष्य प्रसङ्गवश इसका इसी रूपमें पाठ अथवा श्रवण करता है, वह दीर्घायु एवं नीरोगतासे युक्त होकर अपने शत्रुओंको पराजित कर देता है॥ १४९-१६१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नवग्रहहोमशान्तिविधानं नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नवग्रहहोमशान्तिविधान नामक तिरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९३॥
| ३२८ | * मत्स्यपुराण * |
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चौरानबेवाँ अध्याय
नवग्रहोंके स्वरूपका वर्णन
| शिव उवाच | शिवजीने कहा— नारद! (चित्र-प्रतिमादिमें) सूर्यदेवकी दो भुजाएँ निर्दिष्ट हैं, वे कमलके आसनपर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथोंमें कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमलके भीतरी भागकी-सी है और वे सात घोड़ों तथा सात रस्सियोंसे जुते रथपर आरूढ़ रहते हैं। चन्द्रमा गौरवर्ण, श्वेतवस्त्र और श्वेत अश्वयुक्त हैं। उनका वाहन—श्वेत अश्वयुक्त रथ है। उनके दोनों हाथ गदा और वरदमुद्रासे युक्त बनाना चाहिये। धरणीनन्दन मंगलके चार भुजाएँ हैं। उनके शरीरके रोएँ लाल हैं, वे लाल रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं और उनके चारों हाथ क्रमशः शक्ति, त्रिशूल, गदा एवं वरमुद्रासे सुशोभित रहते हैं। बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। उनकी शरीर-कान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे भी चारों हाथोंमें क्रमशः तलवार, ढाल, गदा और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं। देवताओं और दैत्योंके गुरु बृहस्पति और शुक्रकी प्रतिमाएँ क्रमशः पीत और श्वेत वर्णकी करनी चाहिये। उनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे दण्ड, रुद्राक्षकी माला, कमण्डलु और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। शनैश्चरकी शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणिकी-सी है। वे गीधपर सवार होते हैं और हाथमें धनुष-बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। राहुका मुख भयंकर है। उनके हाथोंमें तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा शोभा पाती हैं तथा वे नील रंगके सिंहासनपर आसीन होते हैं। ध्यान (प्रतिमा)-में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। केतु बहुतेरे हैं। उन सबोंके दो भुजाएँ हैं। उनके शरीर आदि धूम्रवर्णके हैं। उनके मुख विकृत हैं। वे दोनों हाथोंमें गदा एवं वरमुद्रा धारण किये हैं और नित्य गीधपर समासीन रहते हैं। इन सभी लोक-हितकारी ग्रहोंको किरीटसे सुशोभित कर देना चाहिये तथा इन सबकी ऊँचाई एक सौ आठ अङ्गुल (४॥ हाथ)-की होनी चाहिये॥ १—९॥ |
|---|---|
| पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भसमद्युतिः।<br>सप्ताश्वः सप्तरज्जुश्च द्विभुजः स्यात् सदा रविः॥ १<br><br>श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेताश्वः श्वेतवाहनः।<br>गदापाणिर्द्विबाहुश्च कर्तव्यो वरदः शशी॥ २<br><br>रक्तमाल्याम्बरधरः शक्तिशूलगदाधरः।<br>चतुर्भुजः रक्तरोमा वरदः स्याद् धरासुतः॥ ३<br><br>पीतमाल्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः।<br>खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो वरदो बुधः॥ ४<br><br>देवदैत्यगुरू तद्वत् पीतश्वेतौ चतुर्भुजौ।<br>दण्डिनौ वरदौ कार्यौ साक्षसूत्रकमण्डलू॥ ५<br><br>इन्द्रनीलद्युतिः शूली वरदो गृध्रवाहनः।<br>बाणबाणासनधरः कर्तव्योऽर्कसुतस्तथा॥ ६<br><br>करालवदनः खड्गचर्मशूली वरप्रदः।<br>नीलसिंहासनस्थश्च राहुरत्र प्रशस्यते॥ ७<br><br>धूम्रा द्विबाहवः सर्वे गदिनो विकृताननाः।<br>गृध्रासनगता नित्यं केतवः स्युर्वरप्रदाः॥ ८<br><br>सर्वे किरीटिनः कार्या ग्रहा लोकहितावहाः।<br>ह्यङ्गुलेनोच्छ्रिताः सर्वे शतमष्टोत्तरं सदा॥ ९ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ग्रहरूपाख्यानं नाम चतुर्णवतितमोऽध्यायः॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ग्रहरूपाख्यान नामक चौरानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९४॥
९८- संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि
| * अध्याय ९५ * | ३२९ |
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पंचानबेवाँ अध्याय
माहेश्वर-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| नारद उवाच<br><br>भगवन् भूतभव्येश तथान्यदपि यच्छ्रुतम्।<br>भुक्तिमुक्तिफलायालं तत् पुनर्वक्तुमर्हसि॥ १<br>एवमुक्तोऽब्रवीच्छम्भुरयं वाङ्मयपारगः।<br>मत्समस्तपसा ब्रह्मन् पुराणश्रुतिविस्तरैः॥ २<br>धर्मोऽयं वृषरूपेण नन्दी नाम गणाधिपः।<br>धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यतः प्रभृति नारद॥ ३ | नारदजीने पूछा— भूत और भविष्यके स्वामी भगवन्! इनके अतिरिक्त भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेमें समर्थ यदि कोई अन्य व्रत सुना गया हो तो उसे पुनः कहनेकी कृपा करें। ऐसा पूछे जानेपर भगवान् शम्भुने कहा—‘ब्रह्मन्! यह नन्दी शब्दशास्त्रका पारगामी विद्वान् और तपस्या तथा पुराणों एवं श्रुतियोंकी विस्तृत जानकारीमें मेरे समान है। यह वृषरूपसे साक्षात् धर्म और गणका अधीश्वर है। नारद! अब यही इससे आगे माहेश्वर-धर्मोंका वर्णन करेगा॥’ १-३॥ |
| मत्स्य उवाच<br><br>इत्युक्त्वा देवदेवेशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि हि शुश्रूषुरपृच्छन्नन्दिकेश्वरम्।<br>आदिष्टस्त्वं शिवेनेह वद माहेश्वरं व्रतम्॥ ४ | मत्स्यभगवान्ने कहा— ऐसा कहकर देवाधिदेव शम्भु वहीं अन्तर्हित हो गये। तब श्रवण करनेकी उत्कट इच्छावाले नारदने नन्दिकेश्वरसे पूछा—‘नन्दी! शिवजीने आपको इसके लिये जैसा आदेश दिया है, आप उस प्रकार माहेश्वर-व्रतका वर्णन कीजिये'॥ ४॥ |
| नन्दिकेश्वर उवाच<br><br>शृणुष्वावहितो ब्रह्मन् वक्ष्ये माहेश्वरं व्रतम्।<br>त्रिषु लोकेषु विख्याता नाम्ना शिवचतुर्दशी॥ ५<br>मार्गशीर्षत्रयोदश्यां सितायामेकभोजनः।<br>प्रार्थयेद् देवदेवेशं त्वामहं शरणं गतः॥ ६<br>चतुर्दश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य शंकरम्।<br>सुवर्णवृषभं दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि॥ ७<br>एवं नियमकृत् सुप्त्वा प्रातरुत्थाय मानवः।<br>कृतस्नानजपः पश्चादुमया सह शंकरम्।<br>पूजयेत् कमलैः शुभ्रैर्गन्धमाल्यानुलेपनैः॥ ८<br>पादौ नमः शिवायति शिरः सर्वात्मने नमः।<br>त्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाटं हरये नमः॥ ९<br>मुखमिन्दुमुखायेति श्रीकण्ठायेति कन्थराम्।<br>सद्योजाताय कर्णौ तु वामदेवाय वै भुजौ॥ १०<br>अघोरहृदयायेति हृदयं चाभिपूजयेत्।<br>स्तनौ तत्पुरुषायेति तथेशानाय चोदरम्॥ ११ | नन्दिकेश्वर बोले— ब्रह्मन्! मैं माहेश्वर-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, आप समाहितचित्तसे श्रवण कीजिये। वह व्रत तीनों लोकोंमें शिवचतुर्दशीके नामसे विख्यात है। (इस व्रतके आरम्भमें) व्रती मानव मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको एक बार भोजन कर देवाधिदेव शंकरजीसे इस प्रकार प्रार्थना करे—‘भगवन्! मैं आपके शरणागत हूँ। मैं चतुर्दशी तिथिको निराहार रहकर भगवान् शंकरकी भलीभाँति अर्चना करनेके पश्चात् स्वर्ण-निर्मित वृषभका दान करके दूसरे दिन भोजन करूँगा।' इस प्रकारका नियम ग्रहण कर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि नित्यकर्मसे निवृत्त होकर सुन्दर कमल-पुष्पों, सुगन्धित पुष्पमालाओं और चन्दन आदिसे पार्वतीसहित शंकरजीकी वक्ष्यमाण रीतिसे पूजा करे—‘शिवाय नमः' से दोनों चरणोंका, ‘सर्वात्मने नमः' से सिरका, ‘त्रिनेत्राय नमः' से नेत्रोंका, ‘हरये नमः' से ललाटका, ‘इन्दुमुखाय नमः' से मुखका, ‘श्रीकण्ठाय नमः' से कंधोंका, ‘सद्योजाताय नमः' से कानोंका, ‘वामदेवाय नमः' से भुजाओंका और ‘अघोरहृदाय नमः' से हृदयका पूजन करे। ‘तत्पुरुषाय नमः' से स्तनोंकी, ‘ईशानाय नमः' से उदरकी, |
९९- विभूतिद्वादशी-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ३३० | * मत्स्यपुराण * |
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| पार्श्वौ चानन्तधर्माय ज्ञानभूताय वै कटिम्।<br>ऊरू चानन्तवैराग्यसिंहायेत्यभिपूजयेत् ॥ १२<br>अनन्तैश्वर्यनाथाय जानुनी चार्चयेद् बुधः।<br>प्रधानाय नमो जङ्घे गुल्फौ व्योमात्मने नमः ॥ १३<br>व्योमकेशात्मरूपाय केशान् पृष्ठं च पूजयेत्।<br>नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यै पार्वतीं चापि पूजयेत् ॥ १४<br>ततस्तु वृषभं हैममुदकुम्भसमन्वितम्।<br>शुक्लमाल्याम्बरधरं पञ्चरत्नसमन्वितम्।<br>भक्ष्यैर्नानाविधैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ १५<br>प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्।<br>ततो विप्रान् समाहूय तर्पयेद् भक्तितः शुभान्।<br>पृषदाज्यं च सम्प्राश्य स्वपेद् भूमावुदङ्मुखः ॥ १६<br>पञ्चदश्यां च सम्पूज्य विप्रान् भुञ्जीत वाग्यतः।<br>तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामेतत् सर्वं समाचरेत् ॥ १७<br>चतुर्दशीषु सर्वासु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम्।<br>ये तु मासे विशेषाः स्युस्तान् निबोध क्रमादिह ॥ १८<br>मार्गशीर्षादिमासेषु क्रमादेतदुदीरयेत्।<br>शंकराय नमस्तेऽस्तु नमस्ते करवीरक ॥ १९<br>त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम्।<br>नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम् ॥ २०<br>नमः पशुपते नाथ नमस्ते शाम्भवे पुनः।<br>नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे ॥ २१<br>नमो भीमाय इत्येवं त्वामहं शरणं गतः।<br>गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ॥ २२<br>पञ्चगव्यं ततो बिल्वं कर्पूरचागुरुं यवाः।<br>तिलाः कृष्णाश्च विधिवत् प्राशनं क्रमशः स्मृतम्।<br>प्रतिमासं चतुर्दश्योरेकैकं प्राशनं स्मृतम् ॥ २३ | ‘अनन्तधर्माय नमः’ से दोनों पार्श्वभागोंकी, ‘ज्ञानभूताय नमः’ से कटिकी और ‘अनन्तवैराग्यसिंहाय नमः’ से ऊरुओंकी अर्चना करे। बुद्धिमान् व्रतीको ‘अनन्तैश्वर्यनाथाय नमः’ से जानुओंका, ‘प्रधानाय नमः’ से जङ्घाओंका और ‘व्योमात्मने नमः’ से गुल्फोंका पूजन करना चाहिये। फिर ‘व्योमकेशात्मरूपाय नमः’ से बालों और पीठकी अर्चना करे। ‘पुष्ट्यै नमः’ एवं ‘तुष्ट्यै नमः’ से पार्वतीका भी पूजन करे। तत्पश्चात् जलपूर्ण कलशसहित, श्वेत पुष्पमाला और वस्त्रसे सुशोभित, पञ्चरत्नयुक्त स्वर्णमय वृषभको नाना प्रकारके खाद्य पदार्थोंके साथ ब्राह्मणको दान कर दे और यों प्रार्थना करे—‘पिनाकधारी देवाधिदेव सद्योजात मेरे व्रतमें प्रसन्न हों।’ तदनन्तर माङ्गलिक ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें भक्तिपूर्वक भोजन एवं दक्षिणा आदि देकर तृप्त करे और स्वयं दधिमिश्रित घी खाकर रात्रिमें उत्तराभिमुख हो भूमिपर शयन करे। पूर्णिमा तिथिको प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके पश्चात् मौन होकर भोजन करे। उसी प्रकार कृष्णपक्षकी चतुर्दशीमें भी यह सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ ५—१७॥<br><br>इसी प्रकार सभी चतुर्दशी तिथियोंमें पूर्ववत् शिवपार्वतीका पूजन करना चाहिये। अब प्रत्येक मासमें जो विशेषताएँ हैं, उन्हें क्रमशः (बतला रहा हूँ,) सुनिये। मार्गशीर्ष आदि प्रत्येक मासमें क्रमशः इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये—‘शंकराय नमस्तेऽस्तु’— आप शंकरके लिये मेरा नमस्कार प्राप्त हो। ‘नमस्ते करवीरक’—करवीरक! आपको नमस्कार है। ‘त्र्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु’—आप त्र्यम्बकके लिये प्रणाम है। इसके बाद ‘महेश्वराय नमः’—महेश्वरको अभिवादन है। ‘महादेव नमस्तेऽस्तु’—महादेव! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। उसके बाद ‘स्थाणवे नमः’—स्थाणुको प्रणाम है। ‘पशुपतये नमः’—पशुपतिको अभिवादन है। ‘नाथ नमस्ते’—नाथ! आपको नमस्कार है। पुनः ‘शाम्भवे नमः’—शम्भुको प्रणाम है। ‘परमानन्द नमस्ते’—परमानन्द! आपको अभिवादन है। ‘सोमार्थधारिणे नमः’—ललाटमें अर्धचन्द्र धारण करनेवालेको नमस्कार है। ‘भीमाय नमः’—भयंकर रूपधारीको प्रणाम है। ऐसा कहकर अन्तमें कहे कि ‘मैं आपके शरणागत हूँ।’ प्रत्येक मासकी दोनों चतुर्दशी तिथियोंमें गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी, कुशोदक, पञ्चगव्य, बेल, कर्पूर, अगुरु, यव और काला तिल—इनमेंसे क्रमशः एक-एक पदार्थका प्राशन बतलाया गया है। इसी प्रकार प्रत्येक मासकी दोनों |
| * अध्याय ९५ * | ३३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकैरपि।<br>सिन्धुवारैरशोकैश्च मल्लिकाभिश्च पाटलैः॥ २४<br>अर्कपुष्पैः कदम्बैश्च शतपत्न्या तथोत्पलैः।<br>एकैकेन चतुर्दश्योरर्चयेत् पार्वतीपतिम्॥ २५ | चतुर्दशी तिथियोंमें मन्दार (पारिभद्र), मालती, धतूरा, सिन्दुवार, अशोक, मल्लिका, पाटल (पाँढर पुष्प या लाल गुलाब), मन्दार-पुष्प (सूर्यमुखी), कदम्ब, शतपत्री (श्वेत कमल या गुलाब) और कमल—इनमेंसे क्रमशः एक-एकके द्वारा पार्वतीपति शंकरकी अर्चना करनी चाहिये॥ १८–२५॥ |
| पुनश्च कार्तिके मासे प्राप्ते संतर्पयेद् द्विजान्।<br>अन्नैर्नानाविधैर्भक्ष्यैर्वस्त्रमाल्यविभूषणैः ॥ २६<br>कृत्वा नीलवृषोत्सर्गं श्रुत्युक्तविधिना नरः।<br>उमामहेश्वरं हैमं वृषभं च गवा सह॥ २७<br>मुक्ताफलाष्टकयुतं सितनेत्रपटावृताम्।<br>सर्वोपस्करसंयुक्तां शय्यां दद्यात् सकुम्भकाम्॥ २८<br>ताम्रपात्रोपरि पुनः शालितण्डुलसंयुतम्।<br>स्थाप्य विप्राय शान्ताय वेदव्रतपराय च॥ २९<br>ज्येष्ठसामविदे देयं न वकव्रतिने क्वचित्।<br>गुणज्ञे श्रोत्रिये दद्यादाचार्ये तत्त्ववेदिनि॥ ३०<br>अव्यङ्गाङ्गाय सौम्याय सदा कल्याणकारिणे।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य वस्त्रमाल्यविभूषणैः॥ ३१<br>गुरौ सति गुरोर्देयं तदभावे द्विजातये।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत कुर्वन् दोषात् पतत्यधः॥ ३२ | पुनः कार्तिकमास आनेपर अन्न, नाना प्रकारके खाद्य पदार्थ, वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंको पूर्णरूपसे तृप्त करे। व्रती मनुष्यको वेदोक्त विधिके अनुसार नील वृषका भी उत्सर्ग करनेका विधान है। तत्पश्चात् अगहनीके चावलसे परिपूर्ण ताँबेके पात्रपर स्वर्णनिर्मित उमा, महेश्वर और वृषभकी मूर्तिको स्थापित कर दे और उसके निकट आठ मोती रख दे, फिर उसे गौके साथ ब्राह्मणको दान कर दे। साथ ही दो श्वेत चादरोंसे आच्छादित तथा समस्त उपकरणोंसे युक्त घटसहित एक शय्या भी दान करनी चाहिये। यह दान ऐसे ब्राह्मणको देना चाहिये, जो शान्तस्वभाव, वेदव्रत-परायण और ज्येष्ठसामका ज्ञाता हो। बगुलाव्रती (कपटी) ब्राह्मणको कभी भी दान नहीं देना चाहिये। वस्तुतस्तु गुणज्ञ, वेदपाठी, तत्त्ववेत्ता, सुडौल अङ्गोंवाले, सौम्यस्वभाव, कल्याणकारक एवं सपत्नीक आचार्यकी वस्त्र, पुष्पमाला और आभूषण आदिसे भलीभाँति पूजा करके यह दान उन्हींको देना चाहिये। यदि गुरु (आचार्य) उस समय उपस्थित हों तो उन्हींको दान देनेका विधान है। उनकी अनुपस्थितिमें अन्य ब्राह्मणको दान दिया जा सकता है। इस दानमें कृपणता नहीं करनी चाहिये। यदि करता है तो उसके दोषसे कर्ताका अधःपतन हो जाता है॥ २६–३२॥ |
| अनेन विधिना यस्तु कुर्याच्छिवचतुर्दशीम्।<br>सोऽश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ३३<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>पितृभिर्भ्रातृभिर्वापि तत् सर्वं नाशमाप्नुयात्॥ ३४<br>दीर्घायुरारोग्यकुलान्नवृद्धि-<br>रत्राक्षयामुत्र चतुर्भुजत्वम् ।<br>गणाधिपत्यं दिवि कल्पकोटि-<br>शतान्युषित्वा पदमेति शम्भोः॥ ३५ | जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस शिवचतुर्दशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, उसे एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। उसके द्वारा अथवा उसके पिता या भाईद्वारा इस जन्ममें अथवा जन्मान्तरमें जो कुछ ब्रह्महत्या आदि पाप घटित हुए रहते हैं, वे सभी नष्ट हो जाते हैं। इस लोकमें वह दीर्घायु, नीरोगता, कुल और अन्नकी समृद्धिसे युक्त होता है और मरणोपरान्त स्वर्गलोकमें चार भुजाधारी होकर गणाधिप हो जाता है। वहाँ सौ करोड़ कल्पोंतक निवास कर शम्भु-पद—शिवलोकको चला जाता है। |
१००- विभूतिद्वादशीके प्रसङ्गमें राजा पुष्पवाहनका वृत्तान्त
| ३३२ | * मत्स्यपुराण * |
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| न बृहस्पतिरप्यनन्तमस्याः<br>फलमिन्द्रो न पितामहोऽपि वक्तुम्।<br>न च सिद्धगणोऽप्यलं न चाहं<br>यदि जिह्वायुतकोटयोऽपि वक्त्रे॥ ३६<br><br>भवत्यमरवल्लभः पठति यः स्मरेद् वा सदा<br>शृणोत्यपि विमत्सरः सकलपापनिर्मोचनीम्।<br>इमां शिवचतुर्दशीममरकामिनीकोटयः<br>स्तुवन्ति तमनिन्दितं किमु समाचरेद् यः सदा॥ ३७<br><br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या<br>भर्तारमापृच्छ्य सुतान् गुरून् वा।<br>सापि प्रसादात् परमेश्वरस्य<br>परं पदं याति पिनाकपाणेः॥ ३८ | यदि मुखमें दस हजार करोड़ जिह्वाएँ हो जायँ तो भी इस चतुर्दशीके अनन्त फलका वर्णन करनेमें न तो बृहस्पति समर्थ हैं न इन्द्र, न ब्रह्मा समर्थ हैं न सिद्धगण तथा मैं भी इसका वर्णन नहीं कर सकता। जो मनुष्य मत्सररहित हो सम्पूर्ण पापोंसे विमुक्त करनेवाली इस शिवचतुर्दशीके माहात्म्यको सदा पढ़ता, स्मरण करता अथवा श्रवण करता है, उस पुण्यात्माका करोड़ों देवाङ्गनाएँ स्तवन करती हैं, फिर जो सदा इसका अनुष्ठान करता है, उसकी तो बात ही क्या है? स्त्री भी यदि अपने पति, पुत्र और गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक इस व्रतका अनुष्ठान करती है तो वह भी परमेश्वरकी कृपासे पिनाकपाणि भगवान् शंकरके परमपदको प्राप्त हो जाती है*॥ ३३—३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शिवचतुर्दशीव्रतं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शिवचतुर्दशी-व्रत नामक पंचानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९५॥
छानबेवाँ अध्याय
सर्वफलत्याग-व्रतका विधान और उसका माहात्म्य
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>फलत्यागस्य माहात्म्यं यद् भवेच्छृणु नारद।<br>यदक्षयं परं लोके सर्वकामफलप्रदम्॥ १<br>मार्गशीर्षे शुभे मासि तृतीयायां मुने व्रतम्।<br>द्वादश्यामथवाष्टम्यां चतुर्दश्यामथापि वा।<br>आरभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्॥ २<br>अन्येष्वपि हि मासेषु पुण्येषु मुनिसत्तम।<br>सदक्षिणं पायसेन भोजयेच्छक्तितो द्विजान्॥ ३ | **नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! अब कर्म-'फलत्याग' नामक व्रतका जो महत्त्व है, उसे सुनिये। वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंके फलका प्रदाता और परलोकमें अक्षय फलदायक है। मुने! मङ्गलमय मार्गशीर्षमासमें शुक्लपक्षकी तृतीया, अष्टमी, द्वादशी अथवा चतुर्दशी तिथिको ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। मुनिसत्तम! इसी प्रकार यह व्रत अन्य पुण्यप्रद महीनोंमें भी किया जा सकता है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। |
* मन्वादिके अनुसार पति आदिकी आज्ञाके बिना स्त्रीको व्रत करनेका अधिकार नहीं है।
| * अध्याय ९६ * | ३३३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अष्टादशानां धान्यानामवद्यं फलमूलकैः।<br>वर्जयेदब्दमेकं तु ऋते औषधकारणम्।<br>सवृषं काञ्चनं रुद्रं धर्मराजं च कारयेत्॥ ४<br>कूष्माण्डं मातुलुङ्गं च वार्त्ताकं पनसं तथा।<br>आम्राम्रातककपित्थानि कलिङ्गमथ वालुकम्॥ ५<br>श्रीफलाश्र्वत्थबदरं जम्बीरं कदलीफलम्।<br>काश्मरं दाडिमं शक्त्या कलधौतानि षोडश॥ ६<br>मूलकामलकं जम्बूतिन्तिडी करमर्दकम्।<br>कङ्कोलैलाकतूण्डीरकरीरकुटजं शमी॥ ७<br>औदुम्बरं नारिकेलं द्राक्षाथ बृहतीद्वयम्।<br>रौप्याणि कारयेच्छक्त्या फलानीमानि षोडश॥ ८ | इस व्रतमें औषधके अतिरिक्त सामान्यरूपसे निन्द्य फल और मूलके साथ अठारह* प्रकारके धान्य त्याज्य—वर्जनीय माने गये हैं, अतः उन्हें एक वर्षतक त्याग देना चाहिये। पुनः रुद्र, धर्मराज और वृषभकी स्वर्णमयी मूर्ति बनवायी जाय। इसी प्रकार यथाशक्ति कूष्माण्ड, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), वार्त्ताक (भाँटा), पनस (कटहल), आम, आम्रातक (आमड़ा), कपित्थ (कैथ), कलिङ्ग (तरबूज), बालुक (पनियाला), बेल, पीपल, बेर, जम्बीर (जमीरी नींबू), केला, काश्मर (गम्भारी) और दाडिम (अनार)—ये सोलह प्रकारके फल भी सोनेके बनवाये जायें। मूली, आँवला, जामुन, इमली, करमर्दक (करौंदा), कङ्कोल (शीतलचीनीकी जातिके एक वृक्षका फल), इलायची, तुण्डीर (कुँदरू), करीर (करील), कुटज (इन्द्रयव), शमी, गूलर, नारियल, अंगूर और दोनों बृहती (बनभंटा, भटकटैया)—इन सोलहोंको अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीका बनवाना चाहिये॥ १—८॥ |
| ताम्रं तालफलं कुर्यादगस्तिफलमेव च।<br>पिण्डारकाश्मर्यफलं तथा सूरणकन्दकम्॥ ९<br>रक्ताल्लुकाकन्दकं च कनकाह्वं च चिर्भिटम्।<br>चित्रवल्लीफलं तद्वत् कूटशाल्मलिजं फलम्॥ १०<br>आम्रनिष्पावमधुकवटमुद्गपटोलकम् ।<br>ताम्राणि षोडशैतानि कारयेच्छक्तितो नरः॥ ११<br>उदकुम्भद्वयं कुर्याद् धान्योपरि सवस्त्रकम्।<br>ततश्र्व कारयेच्छय्यां यथोपरि सुवाससी॥ १२<br>भक्ष्यपात्रत्रयोपेतं यमरुद्रवृषान्वितम्।<br>धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने।<br>सपत्नीकाय सम्पूज्य पुण्येऽह्नि विनिवेदयेत्॥ १३<br>यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटयः।<br>तथा सर्वफलत्यागव्रताद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे॥ १४<br>यथा शिवश्र्व धर्मश्र्व सदानन्तफलप्रदौ।<br>तद्युक्तफलदानेन तौ स्यातां मे वरप्रदौ॥ १५<br>यथा फलान्यनन्तानि शिवभक्तेषु सर्वदा।<br>तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि॥ १६<br>यथा भेदं न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्।<br>तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकरः शंकरः सदा॥ १७ | व्रती मनुष्य सम्पत्तिके अनुकूल ताड़-फल, अगस्तफल, पिण्डारक (विकंकत या पिड़ार), काश्मर्य (गम्भारी)-फल, सूरणकन्द (जमीकन्द), रतालू, धतूरा, चिर्भिट (ककड़ी या पिहटिया), चित्रवल्ली (तेजपात)-फल, काले सेमलका फल, आम, निष्पाव (सेम या मटर), महुआ, बरगद, मूँग और परवल—इन सोलहोंका ताँबेसे निर्माण कराये। तत्पश्चात् वस्त्रसे सुशोभित दो कलश सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। वह तीन भोजन-पात्रोंसे युक्त हो और उसपर धर्मराज, रुद्र और वृषकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। साथ ही दो सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित एक शय्या भी प्रस्तुत करे। फिर उस पुण्यप्रद दिनमें यह सारा उपकरण एक गौके साथ किसी शान्त स्वभाववाले एवं कुटुम्बी सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उसे दान कर दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—'जिस प्रकार सभी फलोंमें करोड़ों देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार सर्वफलत्याग-व्रतके अनुष्ठानसे शिवजीमें मेरी भक्ति हो। जैसे शिव और धर्म—दोनों सदा अनन्त फलके दाता कहे गये हैं, अतः उनसे युक्त फलका दान करनेसे वे दोनों मेरे लिये भी वरदायक हों। जिस प्रकार शिवभक्तोंको सदा अनन्त फलकी प्राप्ति होती रहती है, उसी तरह मुझे प्रत्येक जन्ममें अनन्त फलकी प्राप्ति हो। जैसे मैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और सूर्यमें कोई भेद नहीं मानता, वैसे ही विश्वात्मा भगवान् शंकर सदा मेरे लिये कल्याणकारक हों'॥ ९—१७॥ |
* अठारह प्रकारके धान्योंकी बात यहाँके अतिरिक्त मत्स्यपुराणके अगले दानप्रकरणमें (विशेषकर २७६।७, २७७।११ आदिमें) भी आयी है, पर इसमें उनका पूर्ण विवरण कहीं नहीं आया है। ये अठारह धान्य—याज्ञवल्क्य-स्मृ० १।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसने० संहिता १८।१२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं—सावाँ, धान, जौ, मूँग, तिल, अणु (कँगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टाँगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिककी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।